82 वर्षीय कामरेड पेरिन दाजी की किताब ‘‘यादों की रोशनी में’’ विमोचित

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: संघर्षों के रास्ते पर फैलता वामपंथ का उजियारा : इंदौर। आमतौर पर राजनेताओं की स्थिति यह रहती है कि जब तक वे सत्ता में रहते हैं, लोगों की भीड़ उनके इर्द-गिर्द मंडराती रहती है। सत्ता से दूर होकर उनके आसपास का दायरा सिमटकर कुछ चमचों तक सिमट जाता है जो धीरे-धीरे सिकुड़ता जाता है। और यदि राजनेता सक्रिय राजनीति से ही संन्यास ले ले तो उसकी पूछ-परख सिर्फ़ कुछ आयोजनों में अध्यक्षता आदि तक सिमट जाती है।

कुछ लोगों को उनके सक्षम-संपन्न परिवार वाले कुछ समय तक याद करते हैं और धीरे-धीरे वहाँ भी रौनक घटती जाती है। लेकिन 2 अक्टूबर 2011 को इंदौर प्रेस क्लब के राजेन्द्र माथुर सभागृह में अटाटूट लोग जिस नेता की याद में आयोजित सभा में इकट्ठे थे वह न कभी सत्ता में रहा और न ही बरसों से राजनीति में सक्रिय था। फिर भी न केवल हाल में क्षमता से ज़्यादा लोग मौजूद थे बल्कि बाहर लगी स्क्रीन पर भी लोगों की भीड़ जमा थी। और यह सब तब था जब कार्यक्रम स्थल की क्षमता देखते हुए ज़्यादा लोगों को बुलाने की कोशिशों को धीमा करना पड़ा था।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की इंदौर ज़िला परिषद् द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में इकट्ठे हुए विभिन्न तबक़ों के लोगों के दिलों में कामरेड होमी दाजी का नाम सिर्फ़ इसलिए नहीं था कि वे दो बार विधायक रहे और एक बार सांसद। बल्कि इसलिए कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने चुनावी राजनीति का इस्तेमाल जनता के हक़ में किया और इस पूँजीवादी लोकतंत्र के भीतर, अधिक संसाधन न होते हुए भी जनता का विश्वास कैसे अर्जित किया जाता है, यह करके दिखाया। उन्होंने मज़दूर वर्ग की राजनीति को इतना प्रभावी बनाया कि मेहनतकशों को ये ताक़त महसूस हुई कि ‘‘ये सेठ व्यापारी रजवाड़े, दस लाख तो हम दस लाख करोड़।’’ उनमें ये हिम्मत पैदा हुई कि वे ही हैं जो दुनिया बनाते और बदलते हैं। आज भले ही नयी आर्थिक नीतियों को लागू कर संगठित उद्योगों को  सिलसिलेवार ख़त्म किये जाने से मज़दूर तबक़े की रीढ़ पर ज़बर्दस्त चोट पहुँची हो लेकिन वह अपनी ताक़त के दिनों को भूला नहीं है। बताते हैं कि होमी दाजी जब स्वस्थ और सक्रिय थे तो लोग उन्हें पूँजीपतियों के ख़िलाफ़ ‘जनता का शेर’ कहते थे।

यही नहीं, होमी दाजी के संक्षिप्त राजनीतिक दौर ने बाद की राजनीति व राजनीतिज्ञों पर भी ऐसा असर छोड़ा जिसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता। इसीलिए विरोधी राजनीतिक दलों के लोग भी दाजी का नाम सम्मान से लेते हैं और सिर्फ़ एक बार सांसद रहने के बावजूद आज भी संसद में उनका नाम विशिष्ट कार्यों के लिए लगा हुआ है। दो अक्टूबर के कार्यक्रम में भी श्रोताओं में मज़दूरों के बीच ही सांसद, पूर्व सांसद, विधायक, पूर्व विधायक एवं अन्य राजनेता भी बैठे थे जिन्होंने दो घंटे के कार्यक्रम में सिर्फ़ श्रोता की हैसियत से शिरकत की। न वे मंचासीन हुए और न ही उनके लिए अलग कुर्सियों की व्यवस्था की गई थी।

मंच पर जो थे, उन्हें अगर होमी दाजी देख पाते तो ख़ुश हो जाते। कामरेड अमरजीत कौर जो एटक में कामरेड दाजी की युवा साथी थीं जब दाजी एटक के राष्ट्रीय महासचिव थे; कामरेड पेरिन दाजी जो ज़िंदगी के साठ वर्ष दाजी के साथ रहीं और घर से लेकर राजनीति तक दाजी का साथ देती रहीं; महेंद्र कुमार शेजवार जो फल का ठेला लगाते हैं और दाजी को रोज़ घर आकर दो केले देकर जाते थे जिससे दाजी को दवा लेनी होती थी; और श्रीमती मसीना हीरालाल जिन्हें दाजी ने कभी नहीं देखा लेकिन जिनके पति हीरालाल को दाजी प्यार से राजाबाबू कहते थे। हीरालाल की जूते-चप्पल सुधारने व पालिश करने की गुमटी दाजी के आफ़िस के सामने ही थी। पिछले दिनों हीरालाल का भी निधन हो गया था। एक कम्युनिस्ट का ख़्वाब आख़िरकार उन्हें इज़्ज़त भरी ज़िंदगी और हक़ दिलाना ही तो होता है जो मेहनत करते हैं।

और ये मंच क्यों सजा था? क्योंकि 2009 में जब होमी दाजी नहीं रहे तो उनकी जीवनसंगिनी पेरिन ने हीरालाल के कहने पर दाजी की ज़िंदगी के बारे में एक किताब लिखनी शुरू की थी जिसका विमोचन था 2 अक्टूबर को। कामरेड पेरिन दाजी से अनेक बड़े-बड़े नेता, अधिकारी और कामरेड्स कहा करते थे कि दाजी के जीवन पर आप लिखो लेकिन वे उन बातों को कभी गंभीरता से नहीं लेती थीं। एक दिन हीरालाल ने उनसे कहा कि बाबूजी, यानी दाजी की ज़िंदगी और उनके विचारों के बारे में लोगों को जानना चाहिए कि उनका दिल कैसे ग़रीबों के लिए प्यार और इज़्ज़त से भरा हुआ था। हीरालाल की बातों से द्रवित पेरिन दाजी ने ठाना कि भले ही उन्हें अच्छी साहित्यिक भाषा न आती हो लेकिन वे हीरालाल जैसे लोगों के लिए दाजी के बारे में लिखेंगी। और इस तरह 82 वर्ष की आयु में पेरिन दाजी ने अपने भीतर की लेखिका को प्रकट किया। जब किताब पूरी की तो हीरालाल को बताने गईं। पता चला कि वह भी नहीं रहा। तो उसका घर ढँढ़कर उसकी पत्नी से कहा कि हीरालाल को समर्पित इस किताब का विमोचन तुम्हें ही करना है। और ग़रीबी, उम्र व ज़िल्लत के बोझ से दोहरी हो गईं दलित हीरालाल की बेवा श्रीमती मसीना को इस पूरे सभ्य समाज के सामने पूरी इज़्ज़त के साथ मंच पर अपने बराबर बिठाया।

इप्टा इंदौर की सारिका श्रीवास्तव, पूजा त्रिवेदी, सुलभा लागू व रुचिता श्रीवास्तव ने ‘‘सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कह दो देश क्या आज़ाद है’’ और ‘‘रुके न जो झुके न जो दबे न जो मिटे न जो, हम वो इंक़लाब हैं जु़ल्म का जवाब हैं’’ जनगीतों के साथ सभा का स्वागत कर श्रोताओं को एक वाम माहौल में शामिल कर लिया। विमोचित किताब ‘‘यादों की रोशनी में’’ पर साहित्यकार-कवि श्री ब्रजेश कानूनगो ने अपनी पाठकीय टिप्पणी देते हुए कहा कि ये केवल भावुकतापूर्ण यादों की किताब भर नहीं है बल्कि इसकी भाषा, शैली आदि तत्व इसे साहित्य की भी एक उत्कृष्ट कृति बनाते हैं। ये किताब आम लोगों के साथ-साथ साहित्य के पाठकों और नये रचनाकारों के लिए भी ज़रूरी है। इसका संपादन कर विनीत तिवारी ने एक अच्छी किताब और एक अच्छी लेखिका हिंदी साहित्य को दिए हैं।

विमोचन के पूर्व ही किताब के एक अंश की एकल नाट्य प्रस्तुति डा. यामिनी ने दी जिसका निर्देशन विनीत तिवारी ने ही किया था। उस संक्षिप्त किन्तु शानदार ब्रेष्टियन प्रस्तुति ने दर्शकों को पूरी किताब पढ़ने की तीव्र उत्सुकता से भर दिया। इसके उपरांत कामरेड पेरिन दाजी ने कहा कि फल के ठेलेवाले महेंद्रकुमार के केलों के पैसे तो वे चुका सकती हैं लेकिन उस प्यार का कोई मूल्य नहीं जो इन जैसे लाखों मेहनतकश लोगों ने दाजी को दिया और जिसकी वजह से अनेक तकलीफ़ों के बावजूद दाजी को आख़िरी साँस तक ज़िंदगी से प्यार रहा। उनके संक्षिप्त किंतु भावुक संबोधन से सभी उपस्थितों की आँखों में आँसू भर आये।

यूँ तो भारत में वामपंथ की विभिन्न धाराएँ मौजूद हैं लेकिन ये भी सच है कि कामरेड दाजी जैसे लोग सभी धाराओं में इसलिए आदर से याद पाते हैं क्योंकि उन्होंने हर क्षण और सिद्धांत का इस्तेमाल वंचित वर्ग के भले के लिए ही किया। कामरेड होमी दाजी तब वामपंथ के प्रखर प्रतिनिधि थे जब भारत में वामपंथ चरमपंथ और संसदीय लोकतंत्र के बीच अपनी जगह तलाश कर रहा था। उस वक़्त सक्रिय कामरेड्स की जमात ने ये सिखाया कि संसदीय लोकतंत्र अपनाने के बावजूद वामपंथ को धारदार और संघर्षशील कैसे बनाये रखा जा सकता है।

यही सोचकर कामरेड दाजी की याद में आयोजित इस कार्यक्रम में ‘‘मौजूदा जनसंघर्ष और वामपंथ की भूमिका’’ विषय पर एटक और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की जुझारू राष्ट्रीय सचिव कामरेड अमरजीत कौर का व्याख्यान भी साथ रखा गया था। उनका विस्तृत परिचय दिया एटक के ज़िला सचिव कामरेड रुद्रपाल यादव ने। कामरेड दाजी की व्यावहारिक राजनीति पर पकड़ और अपने माक्र्सवादी सिद्धांतों पर अविचल अडिग बने रहने की खूबी की याद करते हुए कामरेड अमरजीत ने देशभर के जनसंघर्षों का एक व्यापक कैनवास प्रस्तुत किया।

ज़मीनी और ज़मीन की लड़ाइयों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने पास्को, नारायणपुर, उड़ीसा, महाराष्ट्र आदि के भीतर चल रहे संघर्षों और अगली कतारों में लड़ रहे वामपंथियों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि नेहरू के ज़माने में खड़े किए गए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बेचने की मनमोहन सिंह सरकार की साज़िशों के ख़िलाफ़ भी वामपंथियों ने ही मोर्चा संभाला चाहे वह बाल्को का मसला रहा हो या नाल्को का। छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम के सरकारी आतंक का जवाब देने में, महाराष्ट्र के जैतापुर में परमाणु संयंत्र लगाकर मछुआरों और किसानों की ज़मीनों को हड़पने के ख़िलाफ़ हो रहे संघर्ष में, झारखण्ड, उड़ीसा से लेकर असम, मणिपुर, त्रिपुरा आदि जगहों पर जनता के संघर्षों में वामपंथी ही अपनी जान हथेली पर रख कर लड़ रहे हैं।

देशभर में किसानों की आत्महत्याओं ने किसानी संकट को उजागर किया है। सरकार खेती को कार्पोरेट के लिए मुनाफ़ा कमाने की ज़मीन बनाना चाहती है। उसे परवाह नहीं कि किसान मरें या जियें। यहाँ भी वामपंथी सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ डटे हैं। उन्होंने कहा कि आजकल भ्रष्टाचार की बहुत चर्चा हो रही है और अण्णा हजारे के आंदोलन का भी मीडिया ने खूब प्रचार किया है। लेकिन भ्रष्टाचार तो इस पूँजीवादी व्यवस्था का एक ज़रूरी उत्पाद है। अण्णा के आंदोलन को यही पूँजीवादी मीडिया इसलिए जगह देता है क्योंकि यह आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन की बात नहीं करता। वह कार्पोरेट के भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ नहीं बोलता। कार्पोरेट मीडिया भी इन आंदोलनों को इसीलिए समर्थन दे रहा है क्योंकि इनसे व्यवस्था को कोई ख़तरा नहीं महसूस होता। इससे काफ़ी भ्रम भी फैला है। हमें ऐसे आंदोलनों और जनसंघर्षों के बीच के अंतर को समझना चाहिए।

उन्होंने कहा कि असली लड़ाई अमीरी और ग़रीबी की खाई को पाटने की, भूमिसुधार करने की, श्रम क़ानूनों के उल्लंघन को रोकने की है। आज हालत यह है कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं व शिक्षकों को न्यूनतम से भी कम वेतन में काम करना पड़ रहा है। हमें किसानों, गरीबों, वंचितों व बेरोजगारों के हक में अपना संघर्ष जारी रखने की ज़रूरत है। होमी दाजी को याद करने का मतलब भी यही है कि हम इस संघर्ष को आगे बढ़ाएँ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता की भाकपा जिला परिषद के सदस्य व प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई के उपाध्यक्ष श्री एस. के. दुबे ने और भाकपा जिला परिषद के सदस्य एडवोकेट ओमप्रकाश खटके भी मंच पर मौजूद थे। कार्यक्रम  का संयोजन व संचालन किया प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य महासचिव कामरेड विनीत तिवारी ने। काॅमरेड पेरिन दाजी की किताब के संपादक भी वही हैं। यह किताब भारतीय महिला फ़ेडरेशन की केन्द्रीय इकाई व प्रगतिशील लेखक संघ की इन्दौर इकाई द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित की गई है। कविता पोस्टरों व होमी दाजी के चित्रों की प्रदर्शनी भी इस मौके पर इप्टा इंदौर के सचिव श्री अशोक दुबे ने लगायी थी जो काले-सफ़ेद चित्रों के साथ अतीत के एक चमकदार दौर की याद दिला रही थी और उस दौर को वर्तमान में हासिल करने के लिए उकसा रही थी। कार्यक्रम के दौरान और कार्यक्रम के बाद लगते ‘‘कामरेड होमी दाजी को लाल सलाम’’ के जोशीले नारे बुजुर्ग कामरेडों की आँखों में उम्मीद की एक चमक पैदा कर रही थीं।

भारतीय महिला फेडरेशन, इंदौर शाखा की सचिव सारिका श्रीवास्तव की रिपोर्ट.


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