मीडिया की राजनीति पर संजय की एक प्रशंसित कहानी

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संजय कुमारकई अखबारों में काम कर चुके और इन दिनों आकाशवाणी, पटना में समाचार संपादक के रूप में कार्यरत संजय कुमार ने अखबार के अंदर की राजनीति और घात-प्रतिघात पर एक कहानी लिखी है। यह कहानी वर्तमान साहित्य द्वारा आयोजित ''कमलेश्वर कहानी प्रतियोगिता'' में चयनित की गई। कहानी 'आकाश पर मत थूको' में अखबारों के अंदर एक दूसरे को गिराने-उठाने की साजिशों का सजीव चित्रण किया गया है। साथ ही यह भी दिखाया गया है कि जो लोग जेनुइन हैं, ईमानदारी से काम करते हैं, उन्हें किस प्रकार तरह-तरह के मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। इस कहानी को पढ़ने के बाद अगर संजय तक आप अपनी प्रतिक्रिया भेजना चाहें तो This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it या 09934293148 का सहारा ले सकते हैं। यहां बता दें कि संजय की लिखी पांच किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। पिछले दिनों उन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद की तरफ से नवोदित साहित्य सम्मान से नवाजा जा चुका है। -संपादक, भड़ास4मीडिया


आकाश पर मत थूको

शाम का वक्त था। समाचार पत्र 'सत्य' के डाक संस्करण को अंतिम रूप देने में समाचार संपादक त्रिभुवन जी पूरे जोश-खरोश से लगे थे। आम दिनों की तरह आज पेज छोड़ने को लेकर अफरा-तफरी और कोलाहल वाला माहौल नहीं था। दफ्तर में हर ओर एक अजीब तरह की खामोशी थी। सभी की निगाहें सम्मेलन कक्ष में प्रबंधन कमेटी की चल रही बैठक पर लगी थी। त्रिभुवन जी को लेकर ही बैठक चल रही थी। अचानक सम्मेलन कक्ष के बाहर लगे कॉलबेल की आवाज से दरवाजे के पास टेबुल पर बैठा उंघ रहा चपरासी रामदीन हड़बड़ाया। उसकी आदत थी कि दफ्तर आते ही वह बैठे-बैठे ही ऊंघने लगता था। हड़बड़ाते हुए जितनी तेजी से वह अंदर गया, उतनी ही तेजी से बाहर आया और सीधे त्रिभुवन जी के पास जाकर बोला- 'सर आपको अंदर बुलाया जा रहा है'।

सुबह से ही त्रिभुवन जी को लेकर प्रबंधन की बैठक चल रही थी। त्रिभुवन जी सुबह दस बजे से दफ्तर आये हुए थे। जांच का दौर भी चल रहा था। अखबार में काम करने वाली एक लड़की ने उन पर उत्पीड़न का आरोप लगाया था। उम्र ढल रही थी फिर भी उनमें काम करने के प्रति एक स्वस्थ दृष्टिकोण और गजब का जज्बा था। उन्होंने 'हूं' कहा और डाक संस्करण के प्रूफ पर 'ओके' करते हुए अपने फाऊंटेन पेन के ढक्कन को बंद किया, उठे और सम्मेलन कक्ष की ओर बढ़ गये। अंदर जाते हुए उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। थोड़ी देर बाद वे अंदर से बाहर आये। फिर भी उनके चेहरे पर कोई सिकन या भाव नहीं था। हां, उन्होंने अपने खादी के कुरते के कोने से अपने मोटे फ्रेम के चश्मे को जरूर पोंछा और केबिन में आकर टेबुल का दराज खोलने के बाद कुछ किताबें और आलेख की प्रतियों को झोले में डाला। तभी प्रबंधक के पीए महेश ने आकर एक लिफाफा थमाया।

बीस साल से अखबार को अपने खून पसीने से सींचते आ रहे समाचार संपादक त्रिभुवन जी को आज प्रबंधन बोर्ड ने बाहर का रास्ता दिखला दिया था। त्रिभुवन जी ने लिफाफे को खोल कर देखा भी नहीं, उसे वहीं फाड़ा और डस्टबीन में डालते हुए झोले को कंधे पर रख, दरवाजे की ओर चल पड़े। त्रिभुवन जी की खबर संपादकीय विभाग से होते हुए रिर्पोटिंग और नीचे मशीन रूम तक पहुंच गई थी। सभी की निगाहें खामोश थीं। चाह कर भी कोई सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। केवल रामदीन सामने आया और हाथ जोड़ कर उसने त्रिभुवन जी को प्रणाम किया। उसकी आंखें भर आयीं थीं। यूनियन चाह कर भी कुछ नहीं कर पाया। सचिव रामप्रकाश त्रिभुवन जी से आंख नहीं मिला पा रहा था। मिला भी तो गेट के बाहर। रामप्रकाश लम्बे समय से पत्रकारों के यूनियन का सचिव बना हुआ है। तीन-चार साल में जो हालात बदले थे, उससे यूनियन का वजूद ही खत्म हो गया था। प्रबंधन हावी था और पुराने लोगों को निकालने की जब मुहिम चली तो यूनियन ने विरोध भर जरूर किया था। विरोध का नतीजा यह हुआ कि रामप्रकाश को छोड़ कर सभी का तबादला इधर-उधर कर दिया गया। वर्षों से एक जगह जमे पत्रकारों में खलबली मच गई थी। वैसे ही अखबार में गाहे-बगाहे पत्रकारों को 'वीआरएस' दिये जाने से कोहराम मचा हुआ था। लेकिन स्वभाव से शांत और काम के प्रति कड़क त्रिभुवन जी को हटाने के पीछे 'वीआरएस' का मामला नहीं था बल्कि मामला महिला-उत्पीड़न का था।

सभी जानते थे कि त्रिभुवन जी गलती को बर्दाश्त नहीं करते थे। वे अखबार के एक-एक शब्द की गरिमा पर ध्यान देते थे और इसकी अहमियत को समझते हुए गलती करने वाले को डांटते हुए बताते-सिखाते भी थे। कई रिपोर्टरों / उप-संपादकों को उन्होंने बहुत कुछ सिखाया था। यही नहीं, उनसे सीखे लोग आज दूसरी जगहों पर बेहतर काम कर रहे थे। त्रिभुवन जी की डांटने और सिखानें की आदत उन्हें तब महंगी पड़ी, जब सुनीता से उनका वास्ता पड़ा। ऊंची जाति और हाईप्रोफाइल परिवार की सुनीता ने हाल ही में अखबार ज्वाइन किया था। 'हाईफाई' में रमी पच्चीस वर्षीया सुनीता के पास अखबार का कोई अनुभव नहीं था। बस उसे शौक था मीडिया में काम करने का और जैसा कि मीडिया में होता है, जुगाड़-संस्कृति को उसने भी अपनाया और अपने अप्रोच से अखबार में उपसंपादक के पद पर आ गई। पहले तो उसे फीचर पेज से जोड़ा गया। छह माह बाद सुनीता ने संपादक से कह कर अपनी डयूटी प्रादेशिक पेज पर करवा ली। वहीं पर पत्रकारिता में डिग्री हासिल किये कई नये लड़के-लड़कियां प्रशिक्षु के तौर पर काम कर रहे थे। उन्हें वहीं का वहीं छोड़ सुनीता को कुछ ही दिनों में उपसंपादक बना दिया गया। खैर ! सभी का पाला त्रिभुवन जी से पड़ता था। सुनीता का भी पाला त्रिभुवन जी से पड़ने लगा। त्रिभुवन जी सभी पेज देखते और ओके करते थे, तभी फाइनल के लिए संपादक के पास जाता था। पहले ही दिन सुनीता जो पेज देखी थी, उसमें काफी गलतियां मिलीं। प्रूफ का मामला हो या फिर समाचार के चयन का, बिना सीनियर के पूछे वह खबर पेज पर लगा देती। लगाती भी क्यों नहीं, संपादक जी जो मेहरबान थे? सभी जान गये थे कि उसकी पहुंच कहां तक है। संपादक से नजदीकियां को लेकर चर्चा दबी जुबान से होने लगी थी। बात यही तक नहीं थी। वहीं सरोज को चिढ़ भी होती कि उसके पास पत्रकारिता में डिग्री और अनुभव होने के बावजूद अभी तक वह अखबार में प्रतिनिधि के तौर पर ही काम कर रही थी जबकि, उससे पेज बनवाने से लेकर रिर्पोटिंग तक का भी काम लिया जाता था। उसके पास जुगाड़ संस्कृति के टूल्स नहीं थे और न ही उस हद तक वह जा सकती थी ? ऊपर से वह कमजोर वर्ग की थी।

खैर ! बात सुनीता की हो रही थी। एक दिन तो उसने बिना त्रिभुवन जी को पेज दिखाये सीधे संपादक से 'ओके' करवा कर प्रेस में भिजवा दी। बात त्रिभुवन जी के पास पहुंची तो वे सीधे संपादक के पास गये और अपनी आपत्ति जताई। संपादक दिनेश्वर जी उनका आदर करते थे। उन्होंने बताया कि सुनीता ने कहा कि उन्होंने देख लिया है। फिर क्या था, त्रिभुवन जी ने सबके सामने सुनीता की जम कर खिंचाई कर दी। सुनीता को इसकी उम्मीद नहीं थी। सबके के सामने त्रिभुवन जी की डांट से वह अंदर ही अंदर तिलमिला उठी। चेहरे का भाव बदल गया। नथुने फड़फड़ाये और चेहरा लाल हो उठा। ठीक आधे घण्टे बाद दफ्तर का माहौल बदला हुआ था। हुआ यों कि सुनीता आपा खोते हुए सीधे त्रिभुवन जी के कक्ष में जाकर गाली गलौज करने लगी। यही नहीं, उन्हें देख लेने की धमकी भी दे डाली। सुनीता की तेज आवाज ने लोगों को चौंका दिया था। त्रिभुवन जी ही नहीं, वहां कापी चेक करवा रही सरोज एवं दीपक भी अवाक रह गये। तमतमाई हुई सुनीता तेजी से निकलती हुई संपादक के कक्ष में गई और उसने त्रिभुवन जी पर गाली देने और उत्पीड़न का आरोप लगाया। संपादक दिनेश्वर जी ने उसे किसी तरह से शांत किया और समझा-बुझाकर घर भेज दिया।    

दूसरे दिन जैसे ही त्रिभुवन जी दफ्तर आये, संपादक ने उन्हें बुलाया। सुनीता ने उन पर उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए प्रबंधक से शिकायत कर दी थी। उसकी एक प्रति संपादक के पास भेज दी गई थी। दिनेश्वर जी ने उन्हें समझाते हुए कहा-'कई लोगों का फोन आ चुका है जिसमें राजनेता भी शामिल हैं। मामले को आगे बढ़ाने के पहले आप उससे माफी मांग ले।' दिनेश्वर जी ने आश्वासन दिया कि वे स्थिति को सभांल लेंगे। सिद्धांतों पर चलने वाले त्रिभुवन जी ने दो टूक जवाब दिया-'मैंने कोई गलती नहीं की बल्कि गलती उसकी है, और उल्टे मुझसे ही आप माफी मांगने को कह रहे हैं'। दिनेश्वर जी ने सोच लेने की सलाह त्रिभुवन जी को दी। शाम होते ही प्रबंधन की ओर से नोटिस मिला और दो दिन के भीतर जवाब देने को कहा गया। त्रिभुवन जी ने घटना की चर्चा करते हुए उसी दिन जवाब दे दिया। घटना के दौरान कक्ष में उपस्थित सरोज, दीपक को गवाह बनाते हुए लिखा कि उन्होंने किसी तरह का अभद्र व्यवहार नहीं किया है। सरोज, दीपक के नाम आने से प्रबंधन ने उनसे स्पष्टीकरण मांगा। दोनों ने ही त्रिभुवन जी का समर्थन किया। मामले को हाथ से जाते देख सुनीता ने इसे आगे बढ़ान के लिए राजनीतिक पहुंच का इस्तेमाल किया। एक मंत्री महोदय ने फोन कर संपादक और प्रबंधक को हड़काया और त्रिभुवन जी के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर दी। बात त्रिभुवन जी के पास पहुंची। त्रिभुवन जी ने भी मंत्री को फोन लगा कर घटना से अवगत कराया। चूंकि राजनेता जानते हैं कि अखबार का इस्तेमाल कैसे किया जाता है, त्रिभुवन जी का फोन मिलते ही वे कहने लगे कि देखिये, मुझे तो घटना के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। वह लड़की आपके चीफ रिर्पोटर के साथ मेरे पास आयी थी। खैर! मंत्री जी ने तुरंत ही संपादक और प्रबंधक को फोन कर अपने को मामले से अलग कर लिया।

दफ्तर में अब सभी को बात समझ में आ गयी थी कि इसके पीछ चीफ रिपोर्टर मदन का हाथ था। बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब मदन  ने एक महिला रिपोर्टर स्वाति के साथ बदतमीजी की थी। जब से स्वाति ने अखबार ज्वाइन किया था, मदन के मातहत उसे काम करना पड़ा था। दोनों साथ-साथ कवरेज के लिए जाते थे। बात यह थी कि मदन खुद उसे सिखाने के खयाल से ले जाते थे। एक दिन सीढ़ी के नीचे चपरासी रामदीन ने दोनों को अस्त-व्यस्त स्थिति में देख लिया था। दोनों सकपका गये थे। बात भला कैसे छुपती। चर्चा होने लगी थी। स्वाति अब मदन से कटी कटी रहने लगी थी। उसने अपनी ड्यूटी डेस्क पर लगवा लिया था। कई बार उसका मोबाइल बजता, लेकन नम्बर देख वह नहीं उठाती। एक दिन वह त्रिभुवन जी के पास बैठ कर पेज पर चर्चा कर रही थी, तभी मदन आये। दरवाजे के पास से ही उसे बुलाया लेकिन उसने सुन कर अनसुनी कर दी। जब स्वाति उठ कर जा रही थी तभी मदन ने उसका हाथ पकड़ लिया। स्वाति ने कांपते हुए उसे छोड़ने का आग्रह किया। लेकिन मदन ने नहीं छोड़ा। बल्कि, उसे अपनी ओर खींचकर पकड़ा और धमकी भरे लहजे में कहा-'चुपचाप मेरी बात मानों, नहीं तो तुम्हारा वह हाल करूंगा कि तुम कहीं की नहीं रहोगी'। इस बीच अकचकाये त्रिभुवन जी ने उठकर मदन को रोकने की कोशिश की तो उसने साफ कहा-'सर ! मामला हमारा है, आप बीच में न पड़ें।' त्रिभुवन जी ने पुन: उसे चेताया कि यह दफ्तर है और आप गलत कर रहे हैं, स्वाति को छोड़िए। स्वाति ने अपने को मदन के चुंगल से छुड़ाया और रोते हुए डेस्क पर चली गई। मदन भी दांत पीसता चला गया।    

दूसरे दिन दफ्तर का माहौल गर्म था। स्वाति ने मदन के खिलाफ शिकायत कर दी थी। जांच प्रक्रिया शुरू हुई। त्रिभुवन जी के कमरे में घटना घटी थी। ऐसे में स्वाति ने उनका जिक्र कर दिया था। अलबत्ता उनसे भी पूछा गया। जो सच्चाई थी त्रिभुवन जी ने बता दी। स्थानीय स्तर पर मामले को दबाने की कोशिश हुई। स्वाति शिकायत की प्रति मुख्यालय दिल्ली और महिला आयोग के पास भेज चुकी थी। महिला आयोग ने कार्यवाही की जानकारी मांग ली। ऐसे में पूरी कार्यवाही की कॉपी दिल्ली भेजनी पड़ी। चीफ रिपोर्टर मदन को हटाने की कवायद होने लगी। लेकिन मदन ने अपनी पहुंच और जातीय समीकरण के बल पर नौकरी बचा ली। उसका तबादला रोहतास ब्यूरो में कर दिया गया। तीन माह के बाद स्वाति ने नौकरी ही छोड़ दी। स्वाति के जाते ही मदन ने अपना तबादला पुन: पटना करवा लिया। जबसे वह पटना आया था, त्रिभुवन जी को घेरने की फिराक में रहता था। सुनीता का इस्तेमाल कर त्रिभुवन जी से उसने बदला ले लिया था।

त्रिभुवन जी घर पहुंचे। कालबेल बजाया। आज पत्नी सुनयना ने 'आ रही हूं' कि आवाज लगाये बिना ही तुरंत दरवाजा खोला। पूछने की जरूरत महसूस नहीं की कि क्या हुआ। शांत त्रिभुवन जी को देखकर वह समझ गई थी। त्रिभुवन जी लकड़ी की बनी ईजीचेअर पर बैठ गए। मोटे फ्रेम के चश्में को पास के ही टेबुल पर रखा और आंखे बंद कर ईजीचेअर पर झूलने लगे। पानी लीजिये, सुनयना ने आवाज दी। बिना आंख खोले उन्होंने कहा-'टेबुल पर रख दो और चाय बना दो।' सुनयना थोड़ी ही देर में चाय बना लायी। टेबुल पर रखकर धीरे से कहा 'चाय'। त्रिभुवन जी ने आंखे खोली और पहले पानी पी, फिर चाय का प्याला उठाया। त्रिभुवन जी को वह पहली बार इस तरह से उदास देख रही थी। उसने धीरे से कहा-'अपने को कमजोर मत बनाइये। अभी तो लड़ाई लड़नी है।' त्रिभुवन जी ने कुछ नहीं कहा, बस एक टक उसे देखा। इस बीच त्रिभुवन जी की लड़की दिशा जो दिल्ली में एक महिलाओं की पत्रिका में सीनियर सब एडिटर थी और एक राष्ट्रीय अंग्रजी में रिपोर्टर बेटा स्वाधीन ने फोन पर त्रिभुवन जी से बात की। दोनों ने ही प्रेस कांउसिल में शिकायत करने की सलाह दी। त्रिभुवन जी ने हां-हूं में जवाब दिया।

अगले दिन सुबह पटना से प्रकाशित सभी अखबारों में त्रिभुवन जी को लेकर खबर छपी थी। सभी ने त्रिभुवन जी के योगदान की चर्चा की थी। साथ ही उन्हें हटाने के पीछे हुई राजनीति को भी कोसा। एक अखबार ने 'सत्य पर असत्य' की विजय बताते हुए पूरे घटनाक्रम को ही छाप दिया था। अखबार पढ़ते-पढ़ते कई फोन आ चुके थे। सभी संवेदना प्रकट करते हुए लड़ाई लड़ने की सलाह दे रहे थे। त्रिभुवनजी 'अच्छा, हां, देखते हैं, और हूं' में जवाब देते जाते। एक सप्ताह बाद सरोज और दीपक त्रिभुवन जी से मिलने घर पर आये। दोनों को अखबार से निकाल दिया गया था। उनका कसूर यह था कि उन्होंने त्रिभुवन जी का साथ दिया था। सुनयना को अब रहा नहीं गया। उसने त्रिभुवन जी से कहा कि भले ही आप सच के लिए न लड़ें लेकिन इन दोनों का क्या कसूर था ? इनके लिए आपको लड़ना होगा, सत्य के लिए लड़ना होगा, नहीं तो महिला उत्पीड़न के नाम पर गलत फायदा उठाने वालों का मनोबल ऊंचा होगा और महिला-सशक्तिकरण कमजोर होगा। खामोशी से बात सुन रहे त्रिभुवन जी ने अखबार पर से नजर हटाया और चश्में के भीतर से झांकते हुए सरोज को कहा-'टेबुल पर कागज कलम है, ले आओ।' सुनयना, सरोज व दीपक की आंखों में चमक आ गयी। तेजी से सरोज अंदर गई और कागज-कलम ले आयी।

त्रिभुवन जी बोलते गये और सरोज लिखती गई। प्रेस काउंसिल को भेजे जाने वाले आवेदन का ड्राफ्ट तैयार हो गया। दीपक ड्राफ्ट लेकर टाइप कराने चला गया। शाम को दीपक ने आरएमएस में जाकर स्पीड-पोस्ट से आवेदन भेज दिया। ठीक 20 दिन बाद त्रिभुवन जी के पास एक पत्र आया जिसमें अखबार के प्रबंधन से नये सिरे से जांच करवाने का आग्रह किया गया था। त्रिभुवन जी के आवेदन ने 'सत्य' के दफ्तर में खलबली मचा दी थी क्योंकि, उन्होंने सुनवाई के लिए प्रेस काउंसिल से हस्तक्षेप करते हुए खुद से जांच की मांग की थी जिसे काउंसिल ने स्वीकार कर लिया था। आखिर में सुनवाई का दिन भी आया। दिल्ली से प्रेस काउंसिल, राज्य महिला आयोग, अखबार प्रबंधन, संपादक और शहर के चर्चित पत्रकार-साहित्यकार राधेश्याम जी की अध्यक्षता में बोर्ड  गठित हुई। सुनवाई गेस्ट हाउस में सुबह 10 बजे शुरू हुई। एक-एक कर सभी लोग आये। त्रिभुवन जी के साथ सरोज और दीपक थे तो वहीं सुनीता के साथ मदन। करीब तीन घण्टे तक सुनवाई चली। सभी ने अपना अपना पक्ष रखा। त्रिभुवन जी और सुनीता को रुकने को कहा गया। अंदर फैसले पर गहन विचार-विमर्श  चल रहा था। सोफे पर बैठे त्रिभुवन जी इत्मिनान से प्रेमचंद की दलित कहानी का संग्रह पढ़ रहे थे। उन्होंने 'ठाकुर का कुआं' कहानी ज्योंही खत्म की, अंदर से बुलावा आया। कोने में मदन के साथ सिगरेट का कश ले रही सुनीता तेजी से अंदर गई। वहीं त्रिभुवन जी ने किताब सरोज को थमाया। धीरे से उठे और अंदर गये। फैसला आ चुका था। राधेश्याम जी ने अदब से त्रिभुवन जी को बैठने का आग्रह किया। फैसला त्रिभुवन जी के पक्ष में गया था। उन्हें वापस अखबार में रखने का फैसला सुनाया गया। साथ ही सरोज तथा दीपक को भी वापस काम पर रखते हुए सुनीता पर कार्रवाई की अनुशंसा की गई थी। फैसले से सुनीता अवाक् हो गई। उसने अपने पक्ष में फैसला करवाने के लिए पूरी ताकत लगा दी थी।

अगले दिन त्रिभुवन जी अपने पुराने अंदाज में दफ्तर गये। सभी ने उनका स्वागत किया। खुद दिनेश्वर जी उन्हें केबिन तक ले गये। उधर सुनीता का तबादला मुजफ्फरपुर कर दिया गया था। वह कोने में बैठ कर काम कर रही थी। मदन कहीं नजर नहीं आ रहा था। त्रिभुवन जी की वापसी से सबसे ज्यादा खुश रामदीन उनके टेबुल पर पानी का ग्लास रख वापस जा रहा था, तभी अपने फाउंटेन पेन से कुछ लिख रहे त्रिभुवन जी ने आवाज दी- 'रामदीन रूकना'। रामदीन ने कहा 'जी' और चूनौटी निकाली। खैनी निकाल कर बनाने लगा। त्रिभुवन जी जब दफ्तर आते थे, पानी देने के बाद रामदीन ही उन्हें खैनी देता था। आज वह बिना खैनी दिए जा रहा था। रामदीन की आंखों में आंसू आ गये थे। उसने खैनी बढ़ाया, खैनी लेते हुए त्रिभुवन जी ने उसे दो लिफाफा थमाया। एक संपादक और दूसरा प्रबंधक के नाम, कहा-'हाथ ही में देना।' रामदीन के जाने के बाद त्रिभुवन जी ने अपने झोले को कंधे पर रखा और केबिन से निकल कर पहले संपादकीय फिर रिपोर्टिंग विभाग के साथियों के पास पहुंचे। हालचाल पूछा। वे सुनीता से भी मिले। अभी नीचे मशीन रूम में लोगों से मिल ही रहे थे कि रामदीन आया उसने रुआंसा होते हुए हाथ जोड़ कर प्रणाम करते हुए कहा-'सर, आप जा रहे हैं.....।' त्रिभुवन जी उसकी ओर मुखातिब हुए, मुसकुराये और कहा- 'खैनी तो खिला दो रामदीन....।' भर्राइ आवाज में हां........हां  कहते हुए चूने को खैनी में मिलाया और हथेली पर मलने लगा। जंगल की आग की तरह त्रिभुवन जी द्वारा दिये गये इस्तीफे और सुनीता के तबादले को रद्द करने की खबर फैल चुकी थी। त्रिभुवन जी मेन गेट पार कर ही रहे थे कि पीछे से आवाज आई 'सर'.....। त्रिभुवन जी पीछे मुड़े, दरवाजे के पास के पिलर के पीछे सुनीता खड़ी थी। उन्होंने सुनीता से कहा 'हां' कहा.....। सुनीता त्रिभुवन जी के पास आई, उनके चरण छुये। आंखें में आंसू लिये भर्राइ आवाज में कहा- 'सॉरी सर'। त्रिभुवन जी ने उसे उठाया और कहा 'मन लगा कर काम करो', और वे दफ्तर से बाहर आ गये।


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