अपने-अपने युद्ध (1)

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उपन्यासवह तब भी फ्रीलांसर था जब देवेंद्र से बारह बरस पहले मिला था। और आज जब फिर देवेंद्र से मिल रहा था तो फ्रीलांसिंग भुगत रहा था। फर्क बस यही था कि तब वह दिल्ली में मिला था और अब की लखनऊ में मिल रहा था। .....और देवेद्र?

देवेंद्र तो तब भी फ्रीलांसर थे, अब भी फ्रीलांसर। और शायद आगे भी फ्रीलांसर रहेंगे ही नहीं, फ्रीलांसिंग ही करेंगे। शायद आजीवन। रंगकर्म और पत्रकारिता का यह फर्क है। तो जब वह नाटक के मध्यांतर में लगभग सकुचाते हुए मिला देवेंद्र से कि, ‘‘मैं संजय!’’ तो वह हलके से मुसकुराए। संजय को लगा कि शायद देवेंद्र ने पहचाना नहीं। तो कह भी दिया, ‘‘शायद आप ने पहचाना नहीं।’’ तो देवेंद्र हाथ मिलाते हुए बोले, ‘‘अरे, दिल्ली में हम मिले थे।’’ सुन कर संजय खुश हुआ। बोला, ‘‘हमने सोचा, क्या पता आप भूल गए हों।’’ तो देवेंद्र अपनी गंभीरता की खोल से जरा और बाहर निकले, ‘‘आपने मेरे बारे में लिखा था। गोल मार्केट में रहते थे आप। कैसे भूल जाऊंगा।’’

अब गंभीर होने की संजय की बारी थी, ‘‘बड़ी अच्छी याददाश्त है आपकी। नहीं, लिखता तो मैं जाने कितनों के बारे में हूं पर लोग इतने बरस बाद छोड़िए, छपने के दूसरे दिन से याद करना तो दूर, पहचानना ही भूल जाते हैं। कन्नी काट कर, बगल से कौन कहे, सामने से ही बड़ी बेशर्मी से निकल जाते हैं।’’

देवेंद्र हलका-सा मुस्कुराए। तब तक उन्हें और भी कई लोग घेर चुके थे। इसी बीच नाटक की घंटी बजी और एक अभिनेता आकर देवेंद्र से पूछने लगा, ‘‘शुरू करें?’’ देवेंद्र बिलकुल निर्देशकीय अंदाज और आवाज में सिर हिलाकर बोले, ‘‘हूं।’’ फिर संजय ने उनसे पूछा, ‘‘ठहरे कहां हैं। कल कैसे भेंट होगी?’’ देवेंद्र बोले, ‘‘ठहरा तो अप्सरा होटल में हूं। पर कल दिन दस से बारह यहीं रिहर्सल करेंगे। यहीं मिलते हैं।’’ संजय चाहता था कि कह दे ‘‘ठीक है।’’ पर कुछ कहा नहीं। कहते-कहते रह गया। अचानक उसे याद आया कि ग्यारह बजे उसने अपनी महिला मित्र चेतना को टाइम दे रखा है। बोला, ‘‘तो ठीक है कल शाम को ही मिलते हैं।’’ सिर्फ कहानियां निर्देशित करने वाले देवेंद्र का सहज न रहना, खोल से बाहर न आना संजय को खल गया। शायद इसलिए कि सचमुच ही दूसरी प्रस्तुति ढीली थी, उसके लिए ठीक-ठीक तय कर पाना मुश्किल था। पर यह तो तय था कि इसके पहले वाली कहानी की प्रस्तुति काफी सशक्त थी। हालांकि दोनों कहानियां भुवनेश्वर की ही थीं। फिर भी पहली कहानी का कथ्य और प्रस्तुति दोनों ही कसे हुए थे। अभिनय की आंच भी पुरजोर थी। हालांकि कहानी के नायक का किरदार निभाने वाला लगातार तो नहीं पर लगभग हर तीसरे संवाद में मनोहर सिंह ‘‘बन’’ जाता था। आंगिक में कम पर वाचन में तो समूचा ही। मनोहर सिंह उस पर पूरी तरह हावी थे। हालांकि पूरे नाटक में उस के प्रिय कवि-लेखक की बेटी हेमा जो नायिका की भूमिका निभा रही थी, सब पर भारी थी। कहानी थी ही स्त्री-पुरुष संबंधों की सुलगन, थकन और जेहन के जद्दोजहद की। पर हेमा का अभिनय जिस तरह देह के द्वंद्व और मन के अंतरद्वद्व को परोस रहा था, वह अप्रतिम था, अद्वितीय था।

यह कहानी जब ख़त्म हुई तो मध्यांतर में संजय भागा-भागा मंच के पीछे चला गया, देवेंद्र की तलाश में। पर देवेंद्र के बजाय वह ‘‘मनोहर सिंह’’ मिल गया तो संजय आदत के मुताबिक उससे लगभग पूछते हुए बोला, ‘‘अगर आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं?’’

‘‘बिलकुल !’’ वह बोला।

‘‘आप सचमुच बुरा मत मानिएगा,’’ दुहराते हुए संजय बोला, ‘‘आपको नहीं लगता कि मनोहर सिंह आप में बुरी तरह तरह गूंजते हैं ?’’

‘‘हो सकता है।’’

‘‘हो सकता है नहीं, है। और मैं समझता हूं कम से कम सत्तर प्रतिशत।’’

‘‘हां, पहले भी कुछ लोगों ने ऐसा कहा है। पर मैं इसे गुड सेंस में मानता हूं। अगर ऐसा है।’’ उसने कंधे उचकाए ‘‘क्रेडिट है !’’

‘‘आप का शुभ नाम जानूं ?’’

‘‘हां, वागीश।’’

‘‘ओह तो आप हेमा के पति हैं।’’ झिझकते हुए संजय बोला, ‘‘और जाहिर है एनएसडियन भी होंगे ?’’

‘‘हां।’’

‘‘तो रेपेट्री में भी रहे होंगे ?’’

‘‘हां।’’

‘‘तभी मनोहर सिंह आप में गूंजते हैं।’’

‘‘हां, वह मेरे माडल हैं। उन के साथ रेपेट्री में सात-आठ साल काम किया है।’’

‘‘कब थे रेपेट्री में आप ?’’

‘‘अस्सी इक्यासी में।’’

‘‘तब तो मैं भी दिल्ली में था,’’ संजय चहकते हुए बोला, ‘‘और तभी मनोहर सिंह को गिरीश कनार्ड के ‘‘तुगलक’’ में अल्काजी के निर्देशन में देखा था। इसके पहले उन के बारे में सुनता ही था। हां, ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म में भी देखा था। पर मिला ‘‘तुगलक’’ में ही था। सुरेका सीकरी भी थीं।’’

‘‘रेपेट्री का कोई और प्रोडक्शन नहीं देखा आपने ?’’

‘‘नहीं, देखा तो था।’’ संजय बोला, ‘‘घासीराम कोतवाल देखा।’’

‘‘पर घासीराम कोतवाल तो रेपेट्री ने तब किया ही नहीं।’’

‘‘नहीं भाई, मेघदूत में देखा था। मुझे अच्छी तरह याद है। डॉ॰ लक्ष्मीनारायण लाल के साथ देखा था।’’

‘‘ऊहूं।’’ वागीश ने सिर हिलाया।

‘‘हां, हां आप ठीक कह रहे हैं। एन॰ एस॰ डी॰ सेकेंडियर वालों ने किया था।’’ बात लंबी खिंच गई थी। और संजय देवेंद्र से मिलने को आतुर था। आगे बढ़ा तो हेमा आती दिखी। उसके चाचा विजय ने मिलवाया, ‘‘ये संजय हैं। पहले हमारे ही अख़बार में थे। दिल्ली में भी थे। तुम जानती होगी।’’ सुन कर हेमा अचकचाई तो संजय ने याद दिलाया, ‘‘जब आप एन॰ एस॰ डी॰ में पढ़ती थीं। हास्टल में विभा आप के बगल में रहती थी। वानी इरफाना, शरद, उपेंद्र सूद वगैरह थे। तो मैं आता था....’’ बात बीच में ही काटते हुए हेमा बोली, ‘‘हां, हां याद आया।’’ जाने उसे सचमुच याद आ गया था कि याद आने का अभिनय कर रही थी। संजय को लगा जैसे अभिनय कर रही थी। आखिर दस-बारह बरस बीत गए थे, तब से अब में। संजय अब थोड़ा सा मुटा भी गया था। और फिर उसे याद आया कि जब वह एन॰ एस॰ डी॰ पर फीचर लिखने के सिलसिले में गया तो वहां के बारे में संजय लिखे, हेमा नहीं चाहती थी। उसने कभी स्पष्ट रूप से तो यह नहीं कहा पर उसके हाव भाव से संजय को ऐसा ही लगा था। फिर तब हेमा अभिनय सीख रही थी, पक्की नहीं थी, सो तब संजय को उसकी मंशा जानने में दिक्कत नहीं हुई।

हेमा क्यों नहीं चाहती थी कि संजय एन॰ एस॰ डी॰ के बारे में लिखे? एन॰ एस॰ डी॰ मतलब दिल्ली का नेशनल स्कूल आफ ड्रामा।

कारण दो थे।

एक तो शायद यह कि जिस पत्रिका के लिए संजय एन॰ एस॰ डी॰ पर फीचर तैयार कर रहा था, उस पत्रिका के संपादक पद से उसके पिता जल्दी ही हटाए गए थे और अब जो संपादक थे, उसके पिता को वह भाते नहीं थे। दूसरे यह कि एन॰ एस॰ डी॰ में उन दिनों अराजकता पनपने लगी थी। दूरदराज से रंगकर्म पढ़ने आने वाले छात्र आत्महत्या पर आमादा हो गए थे।

क्यों कर रहे थे आत्महत्या?

संजय इस पर ख़ास तौर से फोकस करना चाहता था। इस फोकस करने के बाबत उसने कुछ एनएसडियनों से दोस्ती गांठी। इस दोस्ती के बहाने धीरे-धीरे मंडी हाउस का कीड़ा उसमें बैठने लगा।

हालांकि अंततः मंडी हाउस का कीड़ा वह फिर भी नहीं बन पाया। बावजूद तमाम कोशिशों और चाहत के।

तो सवाल यह था कि एनएसडिएन आत्महत्या क्यों कर रहे थे? देश की तमाम समस्याओं के मद्देनजर यह कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं थी। पर तब जाने क्या था कि संजय इस समस्या को लेकर लगभग झूल गया था।

कि आज उसे सोच कर अपने इस बचपने पर हंसी आती है।

सचमुच संजय के लिए वो दिन मंडी हाउस ओढ़ने-बिछाने के दिन थे। और वह मंडी हाउस ही ओढ़ने-बिछाने लगा। ‘‘लंच’’ और ‘‘डिनर’’ भी वह एनएसडियनों के साथ करने लगा। दो तीन ‘‘जोड़ों’’ के बीच अकेला घसीटता हुआ वह बंगाली मार्केट घूमने लगा। एनएसडियनों की कैंटीन साधते-साधते वह लड़कियों के हास्टल में भी घुस गया तो उसे लगा कि अब पहली बाजी वह मार ले गया। लड़कियों के हास्टल में घुसना जैसा कि संजय समझता था, मुश्किल होगा, सचमुच जरा भी मुश्किल नहीं था। क्योंकि एन॰ एस॰ डी॰ का ‘‘कल्ट’’ ही कुछ ऐसा था कि कोई बिना ‘‘जोड़े’’ के रह ही नहीं सकता था। एकाध जो बिना जोड़े के थे वह या तो ‘‘क्रेक’’ डिक्लेयर हो जाते थे या अछूतों सा बरताव होता था उनके साथ। तो विवशता कहिए या अराजकता, चाहे लड़का हो या लड़की, जोड़ा बनाना ही पड़ता था। बिना जोड़े के गुजारा ही नहीं था एन॰ एस॰ डी॰ में।

यह देख और महसूस कर बहुत अच्छा लगा संजय को। तब संजय भी इत्तफाक से कुंवारा था। पर इस मामले में जरा संकोची था।

और वह आज भी पछताता है कि क्यों था संकोची तब ?

वह सचमुच संकोची था और थोड़ा बेशऊर भी। लड़कियों को देखने का सलीका तो उसे आ गया पर उन्हें ‘‘कनविंस’’ करने का न तो उसे शऊर था, न समय था, न ही साथ-साथ लगे रहने का बेहयाई वाला माद्दा। और यह लड़कियां? चाहे कहीं की हों, कोई हों, दो चीज तो मांगती ही मांगती हैं। एक तो समय, दूसरे बेहयाई। तीसरे, फूंकने को भरपूर पैसा भी हो तो क्या बात है। यह ध्रुव सत्य है। चाहे जितनी क्रांति हो जाए, मूल्य बदल जाएं, समय और इतिहास बदल जाएं पर यह सत्य नहीं बदलने वाला। ‘‘ध्रुव सत्य’’ जो ठहरा !

तो संजय को दो, क्या इन तीनों सत्य के सांचे की सोच से भी घिन आती थी। कि, ‘‘पटती है लड़की, पटाने वाला चाहिए’’ वाला चलन उसे नहीं सुहाता था। बल्कि वह तो मेंटल हारमनी तलाशता था।

वह आज भी तलाशता है।

वह मानता था कि कम से कम बंगाली मार्केट में घूमने वाली लड़कियां, मंडी हाउस के ‘‘कल्ट’’ में समाई लड़कियां, और नहीं तो कम से कम रंगकर्म पढ़ने वाली एन॰ एस॰ डी॰ की लड़कियां तो इस मेंटल हारमनी को समझती ही होंगी। और ‘‘उसे’’ भी।

दिल्ली नया-नया गया था न ! पर काफी तलाश के बाद भी संजय को ऐसी कोई लड़की जब नहीं मिली, मतलब जब किसी भी लड़की ने उसे अपने को ‘‘आफर’’ नहीं किया तो वह जैसे नींद से जागा। वह समझ गया कि सेंट से महकती, मंडी हाउस में इतराती हाथ में हाथ डाले, पुरुष देह से लगभग चिपट कर चलती-बैठती लड़कियां उसकी कुंडली में नहीं लिखी हैं। पर इसी बीच एक दिन विभा मिली। तब तक उसका ‘‘जोड़ा’’ नहीं बन पाया था। वह तो बहुत बाद में पता चला कि वह बिछड़ी हुई कबूतरी थी। विभा को तो अब तक शायद संजय की याद भी नहीं होगी। देखे, तो भी शायद न पहचाने। आखिर हेमा ने भी तो नहीं पहचाना था। हो सकता है संजय भी अब विभा को न पहचाने। हो सकता है क्या बिलकुल हो सकता है। खै़र ! तो विभा उन दिनों अकेली ही घूमा करती थी। लखनऊ से गई थी। लखनऊ में वह कई नाटक कर चुकी थी। साथ ही भारतेंदु नाट्य अकादमी की डिग्री भी। संजय जब उसे पहली बार हास्टल में मिला तो वह बड़ी उदास सी थी। और कहीं जा रही थी। वह हास्टल के बूढ़े चौकीदार को बड़ी आत्मीयता से अपने कमरे की देख-रेख की जिम्मेदारी डाल रही थी। हालांकि कमरे में उसकी रूममेट सोई हुई थी। फिर भी विभा चौकीदार से कह रही थी, ‘‘आप तो इसकी लापरवाही जानते ही हैं।’’

‘‘हां बिटिया। पर तुम निश्चिंचत रहो।’’ कहते हुए चौकीदार ने तसल्ली दी।

विभा लखनऊ की थी, मतलब यू॰ पी॰ की। और संजय को तब दिल्ली में यू॰ पी॰ के नाम पर मेरठ, हापुड़ का भी कोई मिल जाता था तो उससे अनायास आत्मीयता सी हो जाती थी। इस आत्मीयता में कई बार उसे दिक्कतें भी पेश आईं पर वह इससे कभी उबर नहीं पाया। हालांकि कई बार ऐसा भी होता था कि अगला आदमी उसे वही आत्मीयता नहीं भी परोसता तो भी संजय से वह आत्मीयता का राग नहीं छूटता। वह आलापता ही रहता। चाहे वह ब्यूरोक्रेट हो, पॉलिटिशियन, रिक्शेवाला, मजदूर या किसी भी तबके का। एक बार उसने अपनी इस कमजोरी का हवाला अपने एक जर्मनी पलट पत्रकार मित्र को दिया जो मध्य प्रदेश के थे तो वह बोले, ‘‘आप यह कह रहे हैं। अभी आप हिंदुस्तान से कहीं बाहर चले जाइए तो जो दिल्ली में जिस बदकती पंजाबियत या खदबदाती हरियाणवी से आप चिढ़ते रहते हैं, वही वहां भली लगेगी। और जो यह लुंगी उठाए मद्रासी यहां कार्टून जान पड़ते हैं वहां बिलकुल अपने हो जाते हैं। यहां तक कि पाकिस्तानी भी वहां सगे हो जाते हैं। बल्कि कहूं कि समूचे एशियाई अपने हो जाते हैं।

फिर संजय जब इसके संक्षिप्त ब्योरे में उतर गया कि कैसे जब वह गांव से शहर में आया और उसे अपनी तहसील का जो कोई मिल जाता था तो अपना सा लगता था। और जो गांव जवार का जो कोई मिल जाए तो क्या कहने। और ऐसे ही जब वह अपने शहर से दिल्ली आया तो जिस मेरठ की बोली से वह यू॰ पी॰ में चिढ़ता था, दिल्ली में यू॰ पी॰ के नाम पर वह भी अच्छे लगने लगे। और जो कोई पूर्वांचल मतलब पूर्वी उत्तर प्रदेश का हो तो फिर तो वह उसके गले ही पड़ जाता। पूछने लग जाता कि, ‘‘भोजपुरी बोलते हैं कि नहीं?’’ और फिर, ‘‘कहां घर है? का करीले? कब से बाड़ीं इहां?’’ जैसे सवालों का सिलसिला थमता ही नहीं था। पर ज्यादातर लोग भोजपुरी न बोल पाने का स्वांग करते तो संजय उन्हें धिक्कारता। ख़ूब धिक्कारता। तो उनमें से कुछ तो भोजपुरी पर उतर आते पर जो फिर भी ढिठाई करते, ‘‘का बताएं प्रैक्टिस नहीं रहा। समझ लेते हैं, बोल नहीं पाते।’’ जैसे जुमले उछालते, संजय उन्हें ‘‘शर्म शर्म,’’ सरीखी कुछ और खुराकें खिलाता और कहता, ‘‘सिंधियों को देखो, सिंध छोड़ दिया पर सिंधी नहीं छोड़ी। और ये दो दिन से दिल्ली क्या आ गए अपनी बोली भूल गए। कल थोड़ी और तरक्की कर लेंगे तो अपनी मां को भी भूल जाएंगे। क्या तो वह अनपढ़ गंवार है, फिगर ठीक नहीं है। और परसों जो विदेश चले गए तो अपना देश भूल जाएंगे। क्या तो पिछड़ा है।’’ वगैरह-वगैरह जब संजय सुनाता तो ज्यादातर भोजपुरी क्षेत्र से आए लोग और बिदक जाते और उससे कतराते रहते। पर संजय को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

वह तो चालू रहता।

पर विभा के साथ संजय भोजपुरी पर चालू नहीं हुआ। हां, इतना एहतियात के तौर पर जरूर कर लिया कि विभा से उस का जिला पूछ लिया। और जब उसने लखनऊ बता कर पिंड छुड़ाना चाहा तो संजय उसके पीछे पड़ा भी नहीं। उसे जाने दिया। और तभी हेमा अशोक के साथ आती दिखी। कंधे पर झोला लटकाए। संजय ने यहां और समय ख़राब करने के बजाय हेमा से औपचारिकता वश हालचाल पूछ चलता बना। बाहर आकर उसने देखा, विभा आटो रोकने के चक्कर में पड़ी थी। पर उसने उधर ध्यान देने के बजाय सोचा कि क्यों न बंगाली मार्केट चल कर मिठाई खाए। फिर उसने सोचा कि उधर से ही अजय अलका के घर भी हो लेगा। फिर जाने क्या हुआ कि वह अचानक बस स्टॉप की ओर मुड़ गया। पर यह सोचना अभी बाकी था कि वह कहां जाए। आई॰ टी॰ ओ॰, कनॉट प्लेस कि प्रेस क्लब? पर तब तक उसे शास्त्री भवन की ओर जाने वाली बस दिख गई और वह दौड़ा, फिर लटक कर चढ़ गया। और सोचा कि प्रेस क्लब चल कर पहले बियर पिएगा फिर कुछ खा कर थोड़ा उठंगेगा। फिर जो टाइम मिलेगा तो वापसी में अजय-अलका के घर। इस तरह मिठाई मुल्तवी होते हुए भी मुल्तवी नहीं हुई थी।

दयानंद पांडेयतो क्या यह विभा का नशा था? कि बीयर पीने का सुरूर? वह कुछ भी तय नहीं कर पा रहा था। पर वह यह अब तक जान गया था कि आज अजय-अलका के यहां जाना जरूर पड़ेगा।


इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए लेखक दयानंद पांडेय की तस्वीर पर क्लिक करें। पार्ट (2) पढ़ने के लिए अगले शनिवार का इंतजार करें।


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