अपने-अपने युद्ध (2)

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भाग-1 से आगे : बेचारा अजय ! एनएसडी में जब उसने दाखिला लिया तो घर में चौतरफा विरोध हुआ। वह नाटकों में एक्टिंग पहले भी करता था और तब घर वालों का ऐतराज तो था पर विरोध-जैसा विरोध नहीं। लेकिन जब एनएसडी में दाखिला लेने चला तो घर में जैसे कुहराम मच गया। पर अजय तो जैसे लंगोट बांध कर तैयार था। एक अजीब सा रोमेंटिसिज्म उसके सिर पर सवार था। और उसने एनएसडी में दाखिला आखिरकार ले लिया। यह वह दिन थे, जब एनएसडियनों के पंख जहां तहां उड़ और पसर रहे थे। तब यह ढेर सारे टीवी चैनल नहीं थे। फिर दूरदर्शन के डैने भी बड़े छोटे थे और फिल्मों में ओम शिवपुरी तक झण्डा गाड़ रहे थे। यह समानांतर फिल्मों के दिन थे। नसीर, राजबब्बर, कुलभूषण, रंजीत, रैना को एनएसडियन अजीब उत्साह से उच्चारते हुए अपने को भी उन्हीं के साथ पाते थे। पर सचमुच सभी के भाग्य में तो वह रूपहला परदा पैबंद बन कर ही सही नहीं लिखा था। अजय के भाग्य में भी नहीं लिखा था।

अजय जब एनएसडी आया था तो यह सोच कर कि वह अभिनय के नए प्रतिमान से तहलका मचा देगा। पर जब दूसरे साल उसे क्राफ्ट में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए चुना गया तो वह अवाक रह गया। बहुत हाथ पांव मारने पर उसे निर्देशन में डाला गया। पर वह हार मानने वाला नहीं था। निदेशक को उसने कनविंस किया। वह मान गए और वह अनिभय में फिर आ गया। पर बाद में उसे क्या लगा, उसके बैच मेट से लेकर लेक्चरर्स तक यह एहसास कराने लगे कि एक्टिंग के जर्म्स उसमें हैं ही नहीं। वह बेकार ही वक्त जाया कर रहा है।

अजय का पहला सपना यहीं टूटा।

अजय ने उन दिनों पहली बार दाढ़ी ब़ढ़ानी शुरू की। दाढ़ी बढ़ा लेने से एक बात यह हुई कि लोग कहने लगे कि अजय के मुखाभिनय में भारी फर्क आ गया है। अब वही लोग जो कहते थे कि अभिनय अजय के बूते की बात नहीं, वही लोग अब कहने लग गए कि अजय नसीर की नकल करता है। पर बकौल अजय वह नसीर की नकल नहीं करता था। उसके मुखाभिनय में कोई फर्क भी नहीं आया था। अभिनय की वही रेखाएं वह अब भी ग़ता था। फर्क बस यही था कि उसके चेहरे पर दाढ़ी जम गई थी। दाढ़ी शायद उसका नया सपना था। उन्हीं दिनों मोहन राकेश के ‘'आषाढ़ का एक दिन' में जब अजय ने क्राफ्ट और अभिनय दोनों ही जिम्मेदारी एक साथ निभाई तो निर्देशक फ्रिट्ज वेनविट्ज ने उसे गले लगा लिया। फिर तो वह उनका प्रिय हो गया। इतना कि उसे लगने लगा कि उसको अभिनेता नहीं, निर्देशक ही होना चाहिए। अजय की उधेड़बुन ब़ढ़ती जा रही थी। वह ठीकठीक तय नहीं कर पा रहा था कि क्या बने, अभिनेता कि निर्देशक, कि क्राफ्टस में ही वापस हो ले। हालांकि अब कुछ भी संभव नहीं था। यही वह दिन थे जब वह चरस भी पीने लगा था।

एक रोज एनएसडी के सामने वाले लॉन में बैठा वह सुट्टा लगा रहा था कि अचानक कथक केंद्र के भीतर से एक लड़की के जोरजोर से बोलने की आवाज सुनाई दी। पर यह आवाज रहरह कर रुक जाती थी या कि आते-आते ठहर जाती थी। चरस अभी उस पर असर नहीं कर पाई थी या कि शायद असर अभी आधा अधूरा था। चरस का उसे ठीकठीक याद नहीं। पर वह एकाएक उठ पड़ा और लगभग दौड़ते हुए कथक केंद्र में घुस गया। उस लड़की की आवाज में अजीब-सी कातरता और विवशता समाई हुई थी कि अजय अचानक हिंसक हो उठा। कथक केंद्र के महाराज जी को उसने मारा तो नहीं पर जोर से धक्का दिया और वह फर्श पर गिर पड़े। जांघिया पहने महाराज मुंह के बल फर्श पर ऐसे गिरे थे कि मुंह से खून गिरने लगा। इस तरह महाराज जी के भुजपाश से वह लड़की छिटक कर दीवार से ऐसे जा भिंड़ी कि उसकी रूलाई उसके घुंघरुओं की झंकार में झनझना कर रह गई। उसकी आंख से आंसू ऐसे लुढ़के कि अजय को बेगम अख़्तर की गायकी याद आ गई।’’ हालांकि यह गायकी यहां मौजू नहीं थी। पर उसे सूझा यही। 

यह अलका थी।

हुआ यह था कि अलका का कथक केंद्र में पहला साल था सो महाराज जी उस पर कुछ ज्यादा कृपालु हो गए। उनको उसमें अप्रतिम प्रतिभा दिखाई देने लगी। सो उसे उन्होंने अपने शिष्यत्व में रख लिया। शिष्या तो अलका बन गई पर महाराज जी की सेवा’’ करने में वह आनाकानी करने लगी। और महाराज की अदा यह थी कि बिना सेवा’’ कराए वह सिखाते नहीं थे। सेवा’ और सीखने’’ में जो अंतद्वरंद्व चला तो वह खिंचता ही गया। अक्सर महाराज जी उसे शाम को अकेले बुलाते। कुछ ख़ास सिखाने के लिए। पर छोटे शहर की अलका पहुंचती तो किसी न किसी सहेली को लेकर। महाराज जी जो कथक नृत्य के पुरोधा थे, कई-कई पुरस्कारों, प्रशस्तियों से विभूषित थे, उनके ‘आशीर्वाद’’ के बिना कथक में किसी को ‘‘एंट्री’’ नहीं मिलती थी, कोई कलाकार नहीं बन सकता था और कम से कम उनके कथक केंद्र की डिगरी तो नहीं पा सकता था। उन्हीं महाराज जी की आंखों में कौंध गई थी वह अलका नाम की कन्या। और ऐसा कभी हुआ नहीं कि कथक केंद्र की कन्या उनकी आंखों में समाए तो उनकी बांहों में समाए बिना, जांघों पर बैठे बिना रह जाए। तो जो कन्या उनकी आंखों को कौंधती थी, उनकी नसों में उमंग भरती थी, उनकी आहों में रमती थी, उसे वह शिष्या’’ बनाने की जिज्ञासा बड़े ही शाकाहारी ढंग से प्रगट करते थे। और भला किस कन्या में यह हसरत न हो। इतने बड़े गुरु महाराज की शिष्या बनने की उसमें चाह न हो। तो वह उसे अकेले बुलाते। पहले पैर दबवाते, पैर दबवाते-दबवाते कन्या का हाथ दबाते। यह दूसरा चरण था। तीसरे चरण में वह कन्या का हाथ अपनी जंघाओं के बीच धीरे से खींचते। और कन्या जो कुछ संकोच खाती तो उसे बड़े मनुहार से नृत्य की चकमक और जगमग दुनिया से नहलाते। ज्यादातर कन्याएं नहा जातीं और जो नहाने में अफनातीं तो उन्हें वह गंडा बांधने की ताबीज देते तो कुछ गंडे की गंध में आ जातीं और बिछ जातीं गुरु महाराज की ‘‘सेवा’’ में। कुछ फिर भी महाराज जी को अपने को अर्पित करने के बजाय अपना चप्पल या थप्पड़ अर्पित कर देती थीं।

अलका उन थोड़ी-सी कुछ कन्याओं में से ही एक थी।

अलका को जब महाराज जी ने शुरू में अकेले आने का आमंत्रण दिया तो पहले तो वह टाल गई। पर आमंत्रण का दबाव जब ज्यादा ब़ढ़ गया तो उसे जाना ही पड़ा। पर गई वह सहेली के साथ। और जब भी कभी गई तो सहेली के साथ। सहेली के सामने ही उसने महाराज जी के पैर दबाए पर थोड़ी झिझक के साथ। हफ्ते भर उसकी झिझक और अपनी हिचक के साथ लड़ते रहे महाराज जी। अलका की सहेली उनको खटकती रही। तो एक दिन उन्होंने उसकी सहेली को बड़ी बेरूखी कहिए, बदतमीजी कहिए, के साथ उसे लगभग अपमानित करते हुए टरका दिया। अलका तब बाथरूम गई हुई थी। और जाहिर है कि नहाने नहीं गई थी। क्योंकि उसे तो महाराज जी नहलाने वाले थे।

दूसरे दिन अलका के साथ उसकी सहेली नहीं आई। अलका को अकेली आना पड़ा। महाराज जी को राहत मिली। और पैर दबवाते-दबवाते उन्होंने अलका का हाथ दबा दिया। हौले से। अलका इसे अनायास ही मान कर महाराज जी के पैर दबाते हुए शिष्या धर्म निभा ही रही थी कि उन्होंने फिर उसका हाथ दबाया। और भरपूर दबाया। अलका कुछ झिझकी। पर पैर दबाती रही। महाराज जी सोफे पर बड़ी-सी जांघिया पहने बैठे थे। उसने गौर किया कि महाराज की जांघिया आज कुछ ज्यादा ही ऊपर खिसकी हुई है। वह थोड़ा-सा घबराई। और इसी घबराहट में उसने महाराज जी की उंगलियां पुटकानी शुरू कर दी। पर महाराज जी ने ‘ऊंहूं’’ कहते हुए उसका हाथ ऊपर खींच लिया। बिलकुल निर्विकार भाव से। वह फिर से पांव दबाने लगी। बाहर शाम का अंधेरा गहरा हो चला था। अलका का मन थरथराने लगा था, कि तभी महाराज जी ने फिर उसका हाथ हौले से ऊपर खींचा। पर बिलकुल अन्यमनस्क ढंग से। वह महाराज जी का अर्थ अब समझ गई। क्योंकि महाराज जी उसका हाथ अपने पुरुष अंग की ओर खींचने की अनायास नहीं सायास कोशिश कर रहे थे। पर चेहरे की मुद्रा अनायास वाली ही थी। और अलका गुरु जी के भारी व्यक्तित्व के वशीभूत विरोध के बजाय संकोच बरत रही थी। और फिर वह सोच रही थी कि अगर उसने विरोध किया तो बदनामी उसी की होगी। वह लड़की जात ठहरी। महाराज जी का क्या, फिर उसे अचानक एक जासूसी किताब की याद आ गई। मोहनलाल भास्कर की संस्मरणात्मक जासूसी किताब- 'मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था'।’’ इस किताब में अलका ने यों तो कई रोचक किस्से पढ़े थे। पर इस समय उसे एक किस्सा तुरंत याद आ रहा था। पाकिस्तान के उस शहर का तो नाम याद नहीं आ रहा था अलका को। पर वह किस्सा मुख़्तसर यह था कि पाकिस्तान के किसी शहर में एक मौलवी साहब थे। झाड़ फूंक करते थे औरतों की अकेले में। किसिम-किसिम की औरतें उनकी शरण में पहुंचती थीं। मौलाना का जब किसी सुंदर स्त्री पर दिल आ जाता था तो झाड़ फूंक करते वह लगभग डांटते हुए बोलते थे, ‘नाड़ा खोल!’’ ज्यादातर औरतें मौलवी की डपट में आ कर अपना नाड़ा खोल बैठती थीं। और मौलवी साहब का काम आसान हो जाता था। औरतें बदनामी के डर से मौलवी के खिलाफ जुबान नहीं खोलती थीं। पर जब एकाध औरतें मौलवी की डपट के बावजूद‘नाड़ा खोलने पर ऐतराज करती हुई उन्हें भलाबुरा कहने पर आतीं तो मौलवी फौरन अपना पैतरा बदल लेते। कहते, कमबख़्त औरत ! नीयत तेरी ख़राब और इल्जाम हम पर लगाती है।’’ और वह वहीं दीवार पर लगी एक खूंटी दिखाते जिसमें एक नाड़ा बंधा रहता तो मौलवी साहब गरजते, ‘मैं तो उस खूंटी पर बंधे नाड़े को खोलने को कह रहा था। और तू कमबख़्त बदजात औरत मुझ पर तोहमत लगाने लग पड़ी। भाग कमबख़्त, तेरा इलाज अब अल्ला पाक के कर्म से हम नहीं कर सकते।’’ बेचारी मौलवी की मारी औरत पलट कर मौलवी के पैरों में गिरगिर कर गिड़गिड़ाने लगती। 

‘‘उफ !’’ अलका महाराज जी द्वारा बारबार हाथ दबाने और रह-रह कर खींचते रहने से बुदबुदाई। उसे लगा बाहर से भी कहीं ज्यादा अंधेरा उस कमरे में घिर आया है। और उसके मन में तो पूरी तरह घुप्प अंधेरा पसर गया। वह सोचती जा रही थी कि कैसे महाराज जी से पिंड छुड़ाए। कि तब तक महाराज जी ने उसका हाथ पूरी शक्ति से खींच कर जहां चाहते थे, जांघों के बीच रख दिया। और पैरों से उसके नितंबों को कुरेदा। अलका पूरी तरह अफनाई हुई खड़ी हुई कि पास के स्विच से लाइट जला दे। वह उठी। उठी ही थी कि महाराज जी जैसे किसी शिकारी की तरह उसे खींच कर बांहों में भींचने लगे। उनकी गोद में बैठे-बैठे ही उनकी सारी आनमान भुला कर अलका ने खींच कर उन्हें एक थप्पड़ मारा और उनसे छिटक कर अलग होती हुई लपक कर लाइट जला दी।

महाराज जी की कनपटी लाल हो गई थी। पर वह जैसे हार मानने वाले नहीं थे। लगभग नृत्य मुद्रा में उन्होंने फिर से अलका को पीछे से दबोच लिया। लाइट की परवाह नहीं की। यह भी नहीं सोचा कि खिड़कियां, दरवाजे सब खुले हैं। अपनी आनमान और उमर का भी ख़याल वह भूल बैठे। जैसे सुधबुध खो गई थी उनकी।

पर अलका गरजी। उनको धिक्कारा। चीख़-चीख़ कर धिक्कारा। शर्म-हया और उमर का पाठ पढ़ाते हुए अलका ने उन्हें फिर धकियाया। पर महाराज जी जैसे शिष्या से कुछ सीखने-सुनने को तैयार नहीं थे। वह तो बस अपना ही पाठ पढ़ाने की उतावली में अलका नामधारी कन्या को काबू करते हुए नृत्य की दूसरी मुद्रा धारण कर उसे फिर दबोच बैठे। अलका फिर चीख़ी। वह चिल्लाई, ‘दुष्ट-पापी, अधम-कुत्ते, हरामी !’’ जितने भी तरह के शब्द उसकी जुबान की डिक्शनरी में समा पाए, वह उचारती रही और चिल्लाती रही। पर महाराज जी हर अलंकार’’ सहज भाव से स्वीकार कर बार-बार नृत्य मुद्राएं बदल लेते थे। अद्भुत था उनका यह नर्तन जो अलका के अशिष्ट वाचन के बावजूद सहज रूप से जारी था। जब उन्हें अचानक अजय ने धकेला, तो भी वह अलका को दयानंद पांडेयलगभग दबोचे, बाहुपाश में लिए किसी नृत्य मुद्रा में ही थे।

....जारी...


इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए लेखक दयानंद पांडेय की तस्वीर पर क्लिक करें। पार्ट (3) पढ़ने के लिए अगले शनिवार का इंतजार करें। 


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