अपने-अपने युद्ध (3)

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भाग-2 से आगे : खैर, अजय अलका को लेकर बाहर आया। बाहर आकर अलका ने अपने घुंघरू उतारे। और दूसरे दिन उसने कथक नृत्य को तो नहीं पर कथक केंद्र को अलविदा कहने की सोची। अजय को उसने रोते-रोते यह बात बताई। जो अजय को भी नहीं भाई। अजय ने उसे ढांढस बंधाया और कहा कि महाराज कोई ठेकेदार तो नहीं है कथक नृत्य का। और यह कथक केंद्र उसके बाप का नहीं है। फिर भी अलका तीन दिन तक नहीं गई कथक पढ़ने-सीखने। कमरे ही में गुमसुम पड़ी लेटी रहती। चौथे दिन सुबह-सुबह अजय उससे हॉस्टल में मिलने आया। उसने फिर हौसला बंधाया। अलका कथक केंद्र जाने लगी। कथक केंद्र क्या जाने लगी, अजय से भेंट बढ़ने-बढ़ाने लगी। यह एन. एस. डी. में शायद पहली बार हो रहा था कि कोई लड़का एन. एस. डी. में इतर लड़की के साथ जोड़ा बनाकर घूम रहा था। नहीं ऐसे तो कुछ मामले जरूर थे जिनमें एन. एस. डी. के बाहर का नाम पर एन. एस. डी. रेपेट्री के साथ खास कर किसी लड़की  ने जोड़ा  एडॉप्ट किया हो। पर इससे कहीं और नहीं।

अजय को इधर एन. एस. डी. में और उधर अलका को कथक केंद्र में यह आपत्ति एक नहीं कई बार मजाक-मजाक में झेलनी पड़ी। पर शायद लोकेंद्र त्रिवेदी ही नाम था उस लड़के का। उसने एक दिन अचानक ही यह आपत्ति खारिज कर दी कि, ''एन. एस. डी. से बाहर अजय ने पेंग जरूर मारी है पर है कैम्पस के भीतर ही। यानी बहावलपुर हाउस के भीतर सो अबजेक्शन ओवर रूल।'' कहते हुए उसने दिया सलाई की डब्बी कैरम की गोटी की तरह ऐसे उछाली कि वह गिलास में घुस गई। यह खेल उन दिनों एनएसडियनों के बीच आम था।

अलका-अजय अब दो जिस्म और एक जान थे। इत्तफाक से दोनों यू.पी. के थे। तो यह लगाव भी काम आया। पर दोनों विजातीय थे। सो दोनों ने अचानक जब शादी की ठान ली तो जाहिर है कि दोनों के परिवार वालों ने विरोध किया। पर विरोध को भाड़ में डाल कर शादी कर डाली उन्होंने। अलका-अजय से अब वह अजय-अलका हो गए थे। अब तक अजय एन. एस. डी. से एन. एस. डी. रेपेट्री आ गया था। अलका ने कथक केंद्र बीच में ही छोड़ दिया। जाहिर है कि महाराज जी ही अंततः कारण बने। पर अलका को कभी इसका पछतावा नहीं हुआ। बल्कि कभी-कभी तो वह इस घटना को अपने लिए शुभ भी मानती। कहती, '' नहीं अजय कैसे मिलते।''

संजय जब अलका-अजय से मिला तब तक अजय एन. एस. डी. रेपेट्री भी छोड़-छाड़ बिजनेस के जुगाड़ में लग गया था। एक लैंब्रेटा स्कूटर सेकेंड हैंड लेकर उसी पर दौड़ता रहता था। नाटक-वाटक उसके लिए अब उतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया था। एन. एस. डी. की डिग्री उसे बेमानी जान पड़ती। और अंततः अलका ही की तरह वह भी एन. एस. डी. और नाटक को ''यों ही'' मानने के बावजूद महत्वपूर्ण इसलिए मानता था कि इसी वजह से उसे अलका मिली थी।

अलका-अजय ने, ओह सारी, अजय-अलका ने शादी भले ही पारिवारिक विरोध के बावजूद की थी। पर अब दोनों परिवारों की स्वीकृति की मुहर भी लग गई थी और दोनों पक्षों का बाकायदा आना-जाना शुरू हो गया था। अजय को बिजनेस के लिए उसके पिता ने ही उकसाया था और कुछ हजार रुपए भी इस खातिर उसे दिए थे।

एक रोज संजय अचानक ही अजय-अलका के घर पहुंचा तो दोनों कहीं गए हुए थे। पर उसी समय अजय के पिता भी पहुंचे हुए थे। छूटते ही संजय से बोले, ''तुम भी नाटक करते हो?'' उनके पूछने का ढंग कुछ अजीब-सा था। ऐसे जैसे वह पूछ रहे हों, '' तुम भी चोरी करते हो?''

पर जब संजय ने लगभग उसी अंदाज में कि, ''क्या तुम भी चोर हो?'' कहा कि, ''नहीं।'' और बड़ी कठोरता से दुहराया,''नहीं, बिलकुल नहीं।'' तो उसके पिता थोड़ा सहज हुए और बताया कि वह अजय के पिता हैं। तो संजय ने उन्हें आदर और विनयपूर्वक नमस्कार किया।

वह बहुत खुश हुए।

फिर बात ही बात में जब उन्होंने जाना कि संजय पत्रकार है तो वह कुछ अनमने से हुए और जब यह जाना कि वह नाटकों आदि की समीक्षाएं भी लिखता है तो फिर से संजय से उखड़ गए। जिस संजय के लिहाज और संस्कार की वह थोड़ी देर पहले तारीफ करते नहीं अघा रहे थे उसी संजय में उन्हें अब अवगुण ही अवगुण दिखने लगे थे। वह धाराप्रवाह चालू हो गए थे,''आजकल के छोकरों का दिमाग ही खराब है। काम-धंधा छोड़कर नौटंकी में चले जाते हैं।'' वह हांफने लगे थे, '' और तुम पेपर वाले इन छोकरों का छोकरियों के साथ फोटू छाप-छाप, तारीफ छापछूप कर और दिमाग खराब कर देते हो। जानते हो, इस नौटंकी और अखबार में छपी फोटू से कहीं जिंदगी की गाड़ा चलती है।'' वगैरह-वगैरह वह गालियों के संपुट के साथ बड़ी देर तक उच्चारते रहे थे। फिर जब वह थककर चुप हो गए तो संजय उनसे लगभग विनयपूर्वक आज्ञा मांगते हुए चला तो वह फिर फूट पड़े, '' नौटंकी वालों के साथ रहते-रहते तुमको भी एक्टिंग आ गई है। मैं इतना भला बुरा तबसे बके जा रहा हूं और तुम फिर भी चरण चांपू अंदाज में इजाजत मांग रहे हो।''

''नहीं मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगा। और फिर आप बुजुर्ग हैं। अजय के पिता हैं। मैं ऐक्टिंग क्यों करूंगा। आती भी नहीं मुझे।'' संजय बोला तो वह फिर सामान्य हो गए। बोले, ''ऐक्टिंग नहीं आती तो ऐक्टरों के बारे में लिखना छोड़ दो। बहुतों का भला होगा।'' संजय हंसते हुए चल पड़ा। फिर उसने सोचा अजय रंगकर्म कैसे निबाहता है?

और आज प्रेस क्लब जाते हुए अजय के पिता की यह बात सोच कर फिर हंसी आ रही थी कि ऐक्टिंग से छोकरे बरबाद होते हैं। फिर उसने खुद सोचा, क्या ऐक्टिंग से भी छोकरे बरबाद होते हैं? बिलकुल पाकीजा फिल्म के उस संवाद की तर्ज पर कि ''अफसोस कि लोग दूध से भी जल जाते हैं।'' फिर अचानक उसने सोचा कि ऐक्टिंग करने वाले छोकरे  बरबाद होते हैं कि नहीं, इसपर वह बाद में सोचेगा। फिलहाल तो उसे यह सोचना है कि ऐक्टिंग सीखने वाले छोकरे आत्महत्या क्यों करते हैं? वह भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में। कभी पेड़ पर फांसी लगाकर, कभी छत के पंखे से फांसी लगाकर। तो कुछ नाखून ही उंगली से निकाल कर काम चला लेते हैं। और आत्महत्या पर विराम लगा देते हैं।

तो क्या यह एन. एस. डी. के डायरेक्टर पद से इब्राहिम अल्काजी के चले जाने का गैप था, या कारंत की निदेशकीय क्षमता का हास था। या कि कारंत और अल्काजी के बारी-बारी चले जाने की छटपटाहट की आंच थी, अनुशासन की, प्रशासन की नपुंसकता की थाह लेते समय की चाल थी, या एनएसडियनों की टूटती महत्वाकांक्षाओं का विराम थीं ये आत्महत्याएं ? या नये निदेशकों की अक्षमताओं और अनुभवहीनता का नतीजा?

कुछ ऐसा वैसा ही सोचते, सिगरेट फूंकते जब दूसरे दिन वह एन. एस. डी. की कैंटीन में पहुंचा तो विभा वहा दियासलाई की डब्बी कैरम की गोटी की तरह उछाल कर गिलास में गोल करने वाला खेल खेलती हुई चाय पीती जा रही थी। आज वह खुश भी थी। उसने संजय को विश भी किया और नमस्कार भी। बोली, ''चाय पिएंगे?''

''नहीं, मैं चाय नहीं पीता।''

''अजीब बात है सिगरेट पीते हैं और चाय नहीं।'' और कंधे उचकाती हुई बोली, ''कुछ और मंगाऊं क्या?''

''नो थैंक्यू। शाम को कभी।''

''तो वह शाम कभी नहीं आने वाली।'' कहती हुई वह इतराई और उठ खड़ी हुई। संजय ने टोका तो वह बोली, ''डायलॉग्स याद करने हैं और रूम रिहर्सल भी।''

संजय आज विभा का खुश मूड देखते हुए कल की तरह फिर से उसे मिस नहीं करना चाहता था। सिगरेट जो वह कैजुअली पीता था, फूंकते-झाड़ते उसके साथ-साथ हो लिय़ा।

चलते-चलते विभा बोली, ''सुना है आप एन. एस. डी. पर फीचर लिख रहे हैं?''

''हां।''

''क्या-क्या फोकस कर रहे हैं?''

''फोकस क्या प्रॉब्लम फीचर है। मेनली सुसाइड।''

''क्या मतलब?'' कहते हुए विभा लगभग बिदकी।

''कुछ मदद करेंगी?''

''मतलब?''

''कुछ जानकारी....।''

''सॉरी। मुझे माफ करिए। इस बारे में मैं कुछ मदद नहीं कर सकती आपकी।''

''देखिए आप लखनऊ की हैं....।''

''तो?'' उसने अजीब-सी नजरों से घूरा और बोली, ''आप को ऐक्टिंग, नाटक स्क्रिप्ट वगैरह के बारे में, यहां की पढ़ाई-लिखाई, रिहर्सल एटसेक्ट्रा आई मीन एकेडमिक प्वाइंट्स, डिटेल्स जानना हो तो जरूर बताऊंगी। फालतू बातें नहीं बताऊंगी।''

''आप के साथी मर रहे हैं। और आप इसे फालतू बता रही हैं।''

''हां।'' कह कर वह चलते-चलते रूक गई। बोली, ''मेरे लिए यह फिर भी फालतू है। मैं यहां पढ़ने आई हूं। एन. एस. डी. की पॉलिटिक्स डील करने नहीं।''

''पर मुश्किल क्या है?''

''मुश्किल यह है कि मैंने आपको गंभीर किस्म का पत्रकार मानने की भूल की। आपकी कुछ रिपोर्टे और समीक्षाएं पढ़ी हैं मैंने। पर आप मनोहर कहानियां ब्रांड रिपोर्टिंग भी करते हैं, यह नहीं जानती थी। कहते-कहते वह चलने को हुई और बोली, ''गु़डबाई कहें?''

संजय के साथ एक दिक्कत यह भी हमेशा से रही कि अगर उससे कोई जरा भी तिरछा होकर बोलता था उससे वह और तिरछा होकर कट जाता था। चाहे वह लड़की ही क्यों न हो, चाहे वह संपादक ही क्यों न हो। उसका बाप ही क्यों न हो। सो, जब विभा ने उससे कहा कि, ''गुडबाई कहें?'' तो हालांकि उसके इस कहने में भी मिठास तिर रही थी पर संजय फिर भी फैल गया और ''यस, गुड बाई''  कहने की जगह, ''हां, गुडबाई।'' कहकर फौरन पलटा और सिगरेट फेंकते हुए ऐसे चल दिया, गोया उसने सिगरेट नहीं विभा को फेंका हो और उसे रौंदता हुआ चला जा रहा हो। जाहिर है विभा को ऐसी उम्मीद नहीं थी।

''सुनिए।'' वह जैसे बुदबुदाई।

पर संजय-चिल्लाया, ''फिर कभी।'' लगभग कैंटीन वाले अंदाज में। पर उसकी बोली इतनी कर्कश थी कि दो तीन एनएसडियन जो उधर से गुजर रहे थे अचकचा कर ठिठके और उसे घूरने लगे।

विभा सकपका गई। और कमरे में भाग गई। संजय ने ऐसा रास्ता मुड़ते हुए कनखियों से देखा। संजय फिर एन. एस. डी. नहीं गया। चार-पांच दिन हो गए तो उस पत्रिका के संपादक ने उसे फोन पर टोका कि, ''एन. एस. डी. वाली रिपोर्ट तुमने अभी तक नहीं दी?''

संजय को बड़ा बुरा लगा।

दूसरे ही क्षण वह खुद फोन घुमाने लगा। उसने सोचा अब वह टेलीफोनिक रिपोर्टिंग क्यों न कर डाले। उसने फटाफट एन. एस. डी. के चेयरमैन, डायरेक्टर समेत दो तीन लेक्चरर्स को फोन मिलाए। पर कोई भी फोन पर तुरंत नहीं मिला। लेकिन वह फोन पर जूझता रहा। आखिर थोड़ी देर बाद डायरेक्टर मिले और एक दिन बाद का समय देते हुए कहा कि, ''आप समझ सकते हैं फोन पर डिसकसन ठीक नहीं है। इत्मीनान से मिलिए।''

संजय को निदेशक का इस तरह बतियाना अच्छा लगा। निदेशक शाह जो खुद भी एक अच्छे अभिनेता, निर्देशक तो थे ही कुछ नाटक भी लिखे थे उन्होंने। मिले भी वह बड़े प्यार और अपनेपन से। आधे घंटे की तय मुलाकात बतियाते-बतियाते कब दो घंटे से भी ज्यादा में तब्दील हो गई। दोनों ही को पता नहीं चला। बिलकुल नहीं।

शाह बड़ी देर तक स्कूल की योजनाओं, परियोजनाओं, सिस्टम, इतिहास, तकनीक, रंगकर्मियों की विवशता, बेरोजगारी, दर्शकों की घटती समस्या, अल्काजी, शंभु मित्रा और कभी-कभार निवर्तमान निदेशक कारंत के बारे में बड़े मन और  पन से बतियाते रहे। संजय उनकी बातों में इतना उलझ गया कि मेन प्वाइंट छात्रों की आत्महत्या का सवाल बावजूद बड़ी कोशिश के वह बातचीत में शुमार नहीं कर पा रहा था।

तो क्या विभा का मनोहर कहानियां वाला तंज उसे तबाह किए हुए था? या कुछ और था? या कि शाह के वाचन से वशीभूत वह आत्महत्या वाले सवाल को बाहर लाने के बजाय भीतर ढकेलता जा रहा था? आखिर क्या था? शायद यह सब कुछ था-गड्डमड्ड। पर तभी अनायास ही सवाल छात्रों की समस्याओं पर आ गया था तो शाह तौल-तौल कर कहने लगे कि, ''मैं खुद चूंकि इस स्कूल का कभी छात्र रह चुका हूं। पढ़ाया भी यहां। चिल्ड्रन एकेडमी के बावजूद जिंदगी यहां गुजारी है, सो छात्रों की समस्याओं से भी खूब वाकिफ हूं। और आप देखिएगा, जल्दी ही कोई समस्या नहीं रहा जाएगी। बिलकुल नहीं। बस बजट इतना कम है कि क्या बताऊं?''  वह कह ही रहे थे कि संजय पूछ ही बैठा,''पर आप के छात्र आत्महत्या क्यों करते जा रहे हैं?''

शाह बिलकुल अचकचा गए। उन्होंने जैसे इस सवाल की उम्मीद नहीं की थी। शायद इसीलिए अकादमिक बातों को ही वह अनवरत फैलाते जा रहे थे। लेकिन आत्महत्या के सवाल पर वह सचमुच जैसे हिल से गए थे, ''हमारे तो बच्चे हैं ये।'' शाह जैसे छटपटा रहे थे। और संजय ने नोट किया कि उनकी इस छटपटाहट में अभिनय नहीं कातरता थी, असहायता थी, और वह कठुआ से गए थे। साथ ही दहल भी। वह भाववेश में संजय के और करीब आ गए। और, ''ये मेरे ही बच्चे हैं। मैं इनके बीच बैठ रहा हूं। उन्हें सुन रहा हूं, समझ रहा हूं वन बाई वन।'' जैसी भावुकता भरी बातें करते-करते अचानक जैसे उनका निदेशक पद जाग बैठा, ''देखिए मुझे अभी दो महीने ही हुए हैं यह जिम्मेदारी संभाले। और यह आत्महत्याएं हमारे कार्यकाल में नहीं हुईं।'' वह जरा रूके और संजय के करीब से हटते हुए कुर्सी पीछे की ओर खींच ली और बोले, '' फिर भी मै देखता हूं। आई विल डू माई बेस्ट।'' कह कर उन्होने भी चाहा कि अब वह फूट ले। पर इसी बीच दुबारा काफी आ गई थी। और ''नहीं-नहीं'' कहते हुए भी उसे काफी पीने के लिए ऱुकना पड़ा। इस काफी का फायदा यह हुआ कि आत्महत्या प्रकरण से गंभीर और कसैले हुए माहौल को औपचारिक बातचीत ने कुछ सहज किया। इतना कि निदेशक महोदय उसे बाहर तक छोड़ने आए। हां, जो व्यक्ति उसे बाहर तक छोड़ने आया था, वह शाह नहीं, निदेशक ही आया था।

यह आत्महत्या प्रसंग की त्रासदी थी।

दयानंद पांडेय.... जारी ....


इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए लेखक दयानंद पांडेय की तस्वीर पर क्लिक करें। पार्ट (4) पढ़ने के लिए अगले हफ्ते का इंतजार करें।


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