अपने-अपने युद्ध (4)

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भाग-3 से आगे : संजय बाहर आया तो उसने देखा कि कुछ एनएसडियन निदेशक के कमरे के बाहर जमघट लगाए पड़े थे और संजय को देखते ही वह सब के सब खिन्नता से भर उठे। पता लगा कि वह सभी कोई एक घंटे से वहां खड़े थे और निदेशक से मिलने का उनका एप्वाइंटमेंट था। सो उनकी खिन्नता संजय की समझ में आई। उसने उन सब से माफी मांगी तो वह सब बड़ी हिकारत से बोले, 'जाइए-जाइए।' और इस भीड़ में वानी और उपेंद्र भी थे। सो संजय को थोड़ी तकलीफ हुई। उसने दुबारा, 'सॉरी, वेरी सॉरी' कहा और बहावलपुर हाऊस से बाहर आ गया। बाहर निकलते-निकलते उसने फिर पलट कर रिपोर्ट का मरा सा शीर्षक भी सोचा 'बहावलपुर हाऊस के भीतर का सच' साथ ही उसने सोचा कि शीर्षक तय करने वाला वह साला कौन होता है?

सोचते-सोचते उसका मन इतना कसैला हुआ कि बस स्टाप जाने के बजाय बगल से गुजर रहे आटो को रोक कर बैठ गया। पहले तो उसने आटो वाले से आई.टी.ओ. चलने को कहा पर गोल चक्कर तक आते-आते बोला, 'नहीं, यहीं बंगाली मार्केट।' आटो का ड्राइवर, जो सरदार था भुनभुनाया। और एक भद्दी-सी गाली बकी। तो संजय ने उसे डपटा, 'गाली क्यों बक रहे हो?' तो वह ख़ालिस पंजाबी लहजे में बोला, 'तेरे को थोड़े दे रहा, अपने नसीब को दे रहा। नसीब ही खोट्टा है जी अपना।' भुनभुनाया संजय भी अपने आप पर कि दो कदम की दूरी के लिए आटो लेने की क्या जरूरत थी। ख़ामख़ा पैसा बरबाद करने के लिए।

अलका-अजय के यहां जब वह पहुंचा तो अजय नहीं था। पर अलका थी। गजरा बांधे, इत्र लगाए चहकी, 'भीतर आ जाइए। अजय अभी आते ही होंगे।' वह भीतर जा कर सोफे के बजाय मोढ़े पर बैठ गया। अलका ने काफी के लिए पूछा तो संजय ने मना कर दिया। जब दुबारा उसने काफी की रट लगाई तो बोला, 'नहीं अभी पी कर आ रहा हूं।' तो भी अलका नहीं मानी शिकंजी बना लाई। शिकंजी पीते हुए संजय चहकती अलका से पूछ ही बैठा, 'आज कोई ख़ास बात है क्या?'

'नहीं तो !' कहते हुए उसने चोटी से लटकता गजरा हाथों में ले लिया।

'नहीं, कुछ तो बात है।'

'नहीं, कुछ ख़ास नहीं।' कहते हुए वह तनिक सकुचाई।

'ख़ास न सही। यूं ही सही?'

'आप तो बस पीछे ही पड़ जाते हैं।' कहते हुए वह उठी तो कलफ लगी उसकी साड़ी फड़फड़ा उठी। अलका की साड़ी का रंग, उस पर कलफ, गजरा फिर इत्र और इस सबसे ऊपर उसकी मोहकता- सब मिलजुल कर ऐसा कोलाज रच रहे थे कि सब कुछ सामान्य नहीं लग रहा था। हालांकि अलका की मोहकता में हरदम सौम्यता झलकती थी, उसकी सुंदरता में सादगी समाई रहती और चाल में सलीका, आज भी यह सब कुछ था पर इस सबके साथ हाशिए पर ही सही भावुक-सी, कामुक-सी शोखी भी आज अलका के अंगों से ऐसे फूट रही थी कि नीरज का लिखा वह फिल्मी गीत संजय की जुबान पर आ गया तो उसने अपनी आंखों में इसरार भरा और अलका से कहा, 'आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन ! गीत तो आपने सुना ही होगा?'

अलका को संजय से ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी तो चिहुंकते हुए बोली, 'क्या?' और लजा गई। बोली, 'असल में हम और अजय आज ही के दिन मिले थे।'

'तो आज मैरिज यूनिवर्सरी है?'

'नहीं, नहीं।' वह इठलाई, 'मतलब पहली बार मिले थे।'

'अच्छा-अच्छा।' कहते हुए संजय ने आंखें चौड़ी कीं और होंठ गोल।

'पर आप प्लीज' अजय से इसका जिक्र मत करिएगा।'

'क्यों? आज तो बीयर क्या, काकटेल उसकी ओर से।'

'नहीं, आज यह सब नहीं। और देखिए फिर कह रही हूं कि अजय से इसका जिक्र नहीं करेंगे आप।' अलका आदेशात्मक लहजमें बोली।

'पर क्यों?' संजय उदासी का रंग जमाते हुए बुदबुदाया।

'वो इसलिए कि देखना चाहती हूं कि अजय को भी यह दिन याद है कि नहीं।'

'ओह ! तो मुझे फूटना चाहिए।'

'क्यों?' वह अचकचाई।

'अरे भाई महाराज जी वाला हश्र मुझे याद है।'

'धत्, आप भी क्या बात ले बैठे। और आप वैसे थोड़े ही हैं।' कहते हुए जैसे वह अपने आप को निश्चिंत कर रही थी।

'हूं तो नहीं। क्योंकि मुझे नृत्य नहीं आता। और कथक की मुद्राएं तो बिलकुल नहीं। पर यह मत भूलिए अलका जी कि मैं भी पुरुष हूं। और पुरुष की मानसिकता कोई बदल नहीं सकता।' कहते हुए संजय गंभीर होने लगा। वह आगे अभी और पुरुष मानसिकता पर अलका को ज्ञान देना चाहता था, पर अलका ने ही ब्रेक लगा दिया, 'बस-बस ! अजय नहीं हैं सो आप अपनी रजनीशी फिलासफी पर विराम लगाइए। क्योंकि मैं इस पुरुष मानसिकता वाली बहस में उलझ कर मूड नहीं ऑफ करना चाहती।'

'आखिर महिला मनोविज्ञान काम कर गया न ! और कर गई पलाबो।'

'ये पलाबो क्या है।' वह जरा खीझी।

'पलाबो !' वह बोला, 'क्या है कि एक चुटकुला है।'

'तो इसे सुनाइए। कि मूड साफ हो। सारा मूड आफ कर दिया।'

'हद हो गई। मैं आप की सुंदरता की तारीफ कर रहा हूं। और आप का मूड फिर भी आफ हो रहा है। तो मैं तो चलूंगा।' कहते हुए संजय उठने लगा तो अलका लगभग नृत्य मुद्रा में आ गई। जैसे शिव का तांडव करने जा रही हो। पर दूसरे क्षण जाने क्या हुआ कि उसने बड़ी नरमी से संजय का हाथ पकड़ कर उसे बिठा दिया और बोली, 'यस पलाबो!'

उसके स्पर्श में इतनी मादकता थी कि संजय का मन हुआ कि वह अलका को पकड़ कर चूम ले। पर उसे अजय का ख़याल आ गया। नैतिकता का ख़याल आ गया। एक पुरानी कहावत याद आ गई कि 'डायन भी सात घर छोड़ देती है।' हालांकि अलका भी उसकी दोस्त थी। पर अजय भी दोस्त था। और संजय इतनी नैतिकता तो निभाना जानता था। हालांकि वह देह संबंधों के मामले में ऊपरी तौर पर इस तरह की नैतिकता का मापदंड नहीं स्वीकारता था और रजनीश दर्शन का कायल था पर भीतरी और पारिवारिक संस्कार फिर भी आड़े आ जाते थे। यहां भी आ गया। फिर उसने सोचा कि अलका आज उसे सुंदर लग रही है और अगर उसे चूमने की उसकी इच्छा इतनी ही प्रबल है तो अभी जब अजय आ जाएगा तो वह अजय से कह देगा कि भई आज अलका बहुत ही सुंदर लग रही है और मैं उसे चूमना चाहता हूं। बिलकुल नैसर्गिक सौंदर्य की तरह। और वह यह जानता था कि अजय सहर्ष उसे चूमने देगा, मना नहीं करेगा। सपने में भी नहीं।

पर क्या अलका भी इस तरह उसे चूमने देगी?

संजय ने सोचा। उसने इस पर भी सोचा कि क्या जैसाकि वह अभी जैसे सोच रहा है, वैसे ही निश्छल हो कर अजय से सचमुच यह कह सकेगा कि 'मैं अलका को चूमना चाहता हूं।' और कि क्या सब कुछ वैसे ही हो जाए जैसा कि वह सोच रहा है तो इस बात की क्या गारंटी है कि कल को उसकी इच्छा अलका के साथ सोने की न हो जाए? परसों कहे कि, 'चलो तुम हटो, कहीं और जा कर रहो। अब यहां मैं अलका के साथ रहना चाहता हूं।'

क्या पता?

कुछ भी हो सकता है। और सहसा संजय को अपने पर, अपनी इस सोच पर इतनी शर्म आई कि उसे लगा कि फिलहाल तो उसे कहीं चिल्लू भर पानी ढूंढ़ना चाहिए और उसमें डूब मरना चाहिए। वह यह सब सोच ही रहा था कि अलका पहले उदास होकर फिर बिंदास होकर बोली, 'यस-यस पलाबो।' और सोफे से उठ कर दूसरा मोढ़ा लेकर संजय के एकदम सामने आ कर बैठ गई। व्यंग्य के लहजे में बोली 'लेबिल बराबर कर दिया है। अब तो कोई दिक्कत नहीं है।' वह बेफिक्र-सी हंसती हुई फिर उच्चारने लगी 'यस-यस पलाबो।' उसने दुहराया, और जरा जोर से 'ओह यस !' बिलकुल ठसके के साथ। उसके हाथों में उस के बालों में गुंथा गजरा फिर खेलने लगा था। और वह रह-रह कर, 'यस-यस पलाबो', 'ओह यस' जैसे शब्द उच्चारती हुई कहती जा रही थी, 'अब तो लेबिल में आ गए हैं भई।'

'लेबिल' और 'ओह यस',  'ओह यस' कह-कह वह जैसे संजय का मन सुलगाए दे रही थी। मन के भीतर ही भीतर उसकी नैतिकता की दीवार रह-रह ढह रही थी, रह-रह गिर रही थी बतर्ज दुष्यंत कुमार, 'मैं इधर से बन रहा हूं, मैं इधर से ढह रहा हूं।'

'लेबिल' में तो ऐसी कोई बात नहीं थी। अक्सर संजय और अजय पीते-पीते चौथे-पांचवें पेग के बाद इस 'लेबिल' पर आ जाते थे। संजय कभी अजय से कहता कि, 'तुम्हारी कम है,' तो कभी अजय संजय से कहता, 'तुम्हारी कम है।' तो 'लेबिल' में लाने की बात चल पड़ती। और अंतत: 'लेबिल' दोनों गिलासों को मिला कर अलका तय करती। क्योंकि दोनों एक-दूसरे से कहते, 'तुम्हें चढ़ गई है, तुम साले बदमाशी कर रहे हो।' और एक बार तो अजय ने हद ही कर दी। उसने चीख़ कर कहा, 'अलका ! तू संजय का फेवर कर रही है।' सुन कर संजय तो चौंका ही आम तौर पर बातचीत में अंगरेजी नहीं बोलने वाली अलका भी चीख़ पड़ी, 'व्हाट यू मीन?' तो अजय आधे सुर पर आ गया, 'जरा तुम भी आधा सुर कम कर लो और लेबिल में आ जाओ।' कह कर वह हंसा, 'संजय के गिलास में कम है और तुम लेबिल में बता रही हो।'

अलका फिर भी नहीं मानी और कहती रही कि 'लेबिल में है !' लेकिन अजय भी नहीं मानने वाला था। उसने चम्मच मंगवाई और चम्मच-चम्मच ह्विस्की नपवाई। सचमुच संजय के गिलास में चार कि पांच चम्मच ह्विस्की कम निकली। और अजय ने घूरते हुए अलका की ओर देखा और बोला, 'यस मैडम?'

अलका जैसे सफाई देने पर उतर आई। कहने लगी, 'वो तो इसलिए कि मैं जानती हूं इनको दूर जाना है। सही सलामत घर पहुंच जाएं और क्या?' वह बिफरी, 'तो इसमें फेवर क्या हो गया?'

संजय ने देखा, जरा-सी बातचीत दोनों में झगड़े में बदल रही थी। उसने पहले सोचा कि अब फूट ले। लेकिन जाने क्या हुआ कि बोल पड़ा, 'तुम लोगों की चिक-चिक से मेरा सारा नशा काफूर हो गया। अब एक पटियाला और बनाते हैं।' 

फिर तो उस दिन जो पटियाला पैग चला तो रात के दो बज गए। और वह दोनों तभी उठे जब बोतल ने दगा दे दिया। मतलब पूरी डेढ़ बोतल दोनों ने डाकर ली थी।

'तो चलते हैं भई।' कह कर संजय उठा और दरवाजे पर पहुंचते-पहुंचते लुढ़क कर गिर गया। अलका ने उसे दौड़ कर उठाया और बुदबुदाई, 'इतनी पीने की क्या जरूरत थी?' वह जैसे नाराज थी। संजय लाख नशे के बावजूद बड़ा शर्मिंदा हुआ अपने इस लुढ़कने पर। वह जल्दी से जल्दी भाग लेना चाहता था वहां से। पर पैर थे कि भागना ही नहीं चाहते थे। या कि शायद चाह कर भी भाग नहीं पा रहे थे। जो भी हो वह थोड़ी दूर ही चला कि पीछे से अजय, 'संजय-संजय' पुकारता मिला। संजय रुक कर वहीं सड़क पर बैठ गया। पालथी मार कर। अजय हांफता हुआ आया और वह भी वहीं पालथी मार कर बैठ गया। संजय कुछ नशे में, कुछ भावुकता में बोला, 'क्या बात है डियर?'

'तुझे अकेले नहीं जाने दूंगा। तुम्हारी हालत ठीक नहीं है। मैं पहुंचा आता हूं। उठ!' अजय बांह पकड़ कर संजय को उठाने लगा।

'नहीं मैं चला जाऊंगा।'

'मैं छोड़ आता हूं। तू एक मिनट घर चल।'

'एक पेग और नहीं मिल सकती कहीं से?' वह वापस अजय के घर जा कर बोला, 'बस एक पेग !' कहते हुए वह फिर ढप से फर्श पर ही बैठ गया। अब तक अलका पूरी तरह बोर हो गई थी। और अजय उससे लैंबरेटा की चाबी पूछ रहा था, 'कहां है, बता तो सही।' और अलका का कहना था कि एक तो छोड़ने मत जाओ। दूसरे जो जाओ तो स्कूटर से कतई नहीं। नहीं दोनों मर जाओगे। पर अजय नहीं मान रहा था। अचानक अलका धम-धम करती संजय के पास आई और जाहिर है धम-धम करती हुई किसी नृत्य मुद्रा में नहीं आई और धम-धम स्टाइल में ही बुदबुदाई और बौराई हुई, 'तुम तो कुंवारे हो पर मुझे क्यों विधवा बनाने पर तुले हो?' सुनते ही जैसे सांप सूंघ गया संजय को। और उसने मुगले आजम के पृथ्वीराज कपूर स्टाईल में ऐलान कर दिया कि 'वह अजय के साथ नहीं जाएगा। और जाएगा भी तो स्कूटर से कतई नहीं।' अजय पर इस ऐलान का असर पड़ा। और उसने पायज़ामा उतार कर जींस पहनते हुए हवाई चप्पल उतार कर कोल्हापुरी पहनी और बाहर आ गया। दरवाजा बंद करते हुए अलका ने कहा, 'संजय तुम यहीं क्यों नहीं सो जाते? इस तरह जाने से तो अच्छा ही था !' पर संजय अलका की बात अनसुनी करते हुए अजय से पूछ रहा था, 'एक पेग कहीं से और नहीं मिल सकती।' कहते हुए वह लगभग लहरा रहा था और बोल रहा था, 'प्लीज" ! एक पेग !' उसके एक-एक शब्द में नशा था। और अजय बोले जा रहा था, 'मिलेगा डियर, मिलेगा एक नहीं दो पेग।'

'जाओ, अब तुम दोनों लेबिल में हो।' कहते हुए अलका ने भड़भड़ा कर दरवाज़ा बंद कर लिया। हालांकि उस रात तुरंत वहां कोई सवारी नहीं मिलने के कारण वह दोनों कहीं गए नहीं। पास ही सड़क पर एक बिजली के खंभे से पीठ टिका-टिका कर दोनों बैठे सिगरेट फूंकते रहे और नाटक, शायरी, सेक्स, बचपन और अंतत: अपनी-अपनी बेचारगी बतियाते-बतियाते दोनों ने वहीं सुबह कर दी थी।

दयानंद पांडेय...जारी...


इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए लेखक दयानंद पांडेय की तस्वीर पर क्लिक करें। पार्ट (5) पढ़ने के लिए अगले हफ्ते का इंतजार करें।


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