अपने-अपने युद्ध (5)

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भाग-4 से आगे : उस रात अजय बड़ी देर तक मैकवेथ के डायलाग्स सुनाता रहा कई-कई अंदाज में। डायलाग्स सुनते-सुनते संजय दुष्यंत कुमार के शेर सुनाने लग गया। फिर जाने कब फिल्मी गानों पर बात आ गई और दोनों गाने गुनगुनाने लगे। एक बार हेमंत के गाए किसी गीत पर झगड़ा हो गया कि साहिर ने लिखा है कि शैलेंन्द्र ने। झगड़ा निपट नहीं रहा था कि संजय ने फिर एक गीत छेड़ दिया, “न हम तुम्हें जाने न तुम हमें जानों मगर लगता है कुछ ऐसा, मेरा हमदम मिल गया।”  लेकिन इस गाने पर भी झगड़ा बना रहा कि फीमेल वायस सुमन कल्याणपुर की है कि लता मंगेशकर की? और बात सेक्स पर आ गई।

दोनों अपने-अपने किस्से बताने लगे। जाहिर है अजय के पास सेक्स का अनुभव ज्यादा था। एक अफसर की बीबी के बारे में बताने लगा। उसे ऐक्टिंग का शौक था। कैसे जब उसका हसबैंड बाहर टूर पर जाता था तो वह उसे बुलवा भेजती। और उस तीन चार घंटे में ही जब तक तीन चार बार सवार नहीं होता वह नहीं छोड़ती थी। चूस लेती थी साली पूरी तरह।

संजय इस पर बिदका, “बड़े चूतिया हो। तुम तीन चार घंटे मे तीन चार बार उस पर क्या चढ़ते थे लगता है जैसे एहसान करते थे। अरे मुझे कहते मैं एक घंटे में ही तीन चार बार चढ़ जाता।”

सुन कर अजय बोला, “बेटा जब शादी हो जाएगी तब समझेगा। अभी जवानी-जवानी एक घंटे में तीन चार बार जो करता है वह तीन चार दिन में एक बार हो जाएगा।”

पर संजय मानने को तैयार नहीं था। उसने अपना अनुभव बखाना कि, “आधे घंटे में ही वह तीन अटेंप्ट ले चुका है। और कम से कम ऐसा छ-सात चांस।”

अजय हंसा, “तो बस कबड्डी-कबड्डी। गवा और आवा।”

वह थोड़ा रुका और बोला, “वह कब की बात कर रहा है तू? पंद्रस-सोलह साल की उम्र की तो नहीं?”

“एक्जेक्टली।”

“हां, वही कहूं। तो अब करके दिखा।”

“कोई मिले तब न।”

“अच्छा तो इसीलिए एन.एस.डी. के फेरे मार रहा है?” घूरते हुए अजय हंसा।

“नहीं, नहीं वहां तो बस प्रोफेशनली।”

“तो ठीक है। नहीं मर जाएगा साले।” फिर जाने क्या उसे सूझी कि वह ब्लू फिल्मों के फ्रेमों के बारे में बतियाते-बतियाते बताने लगा कि वह दो तीन बार अलका को भी ब्लू फिल्में दिखा चुका है। घर पर ही वी.सी.आर. किराए पर लाकर। और वह बड़े डिटेल्ड ब्योरे में चला गया कि शुरू में अलका कैसे सुकुचाई। शुरू में तो उसने चद्दर से मुंह ढक लिया। फिर धीरे-धीरे देखने लगी। देखते-देखते अमल भी करने लगी। पहले “सक” नहीं करती थी अब “सकिंग” में मुझसे ज्यादा उसे मजा आता है। और तो और क्लाइमेक्स के क्षणों में ब्लू फिल्मों की औरतों की तरह वह बाकायदा “ओह यस ओह बस,” भी करती रहती है। बताते-बताते अजय कहने लगा, “सच डियर सेक्स लाइफ का मजा ही बढ़ गया है।”

“अच्छा !” संजय ने ठेका लगाया।

“पर यार, एक झंझट हो गई एक बार।”

“क्या?” संजय ने चकित होकर पूछा।

“एक दिन अलका पूछने लगी तुम्हारा छोटा क्यों है?”

“क्या मतलब”

“पेनिस।”

“अच्छा-अच्छा। तो सचमुच छोटा है तुम्हारा?”

“नहीं भाई।” वह जरा रुक कर पीठ खुजलाने लगा और बोलता रहा “पहले तो उसका सवाल सुन कर मैं भो चौंका। पर दूसरे ही क्षण ठिठोली सूझी और पूछ लिया कि कितना बड़ा-बड़ा झेल चुकी हो। तो वह लजा कर मुझसे लिपट गई और बोली, “धत्।”

“फिर क्या हुआ?” संजय ने उत्सुकतावश पूछा।

“होना क्या था। बहुत कुरेदने पर वह कसमें खाने लगी कि किसी का नहीं देखा, न ही ऐसा कोई अनुभव उसे है।” अजय अब जांघे खुजलाने लगा था, “तो मैंने डपट कर पूछा कि फिर तुम्हें कैसे पता चला कि मेरा छोटा है?”

वह रुका और संजय की निंदिवाई, अलसाई और नशाई आंखों में झांक कर कहा, “जानते हो उसने क्या जवाब दिया।”

“क्या?”

“वह एकदम मासूम हो गई और शरमाती सकुचाती हुई बोली, ब्लू फिल्मों से। उसने किसी हव्शी का देखा था।”

“ओह यस !” जोर से बोलते हुए संजय ने तब ठहाका लगाया था।

संजय के ठहाके के साथ ही पौ फट गई थी।

“बहुत दिनों बाद ऐसी सुबह देख रहा हूं।” संजय बोला तो अजय ने भी हामी भरी, “मैंने भी।”

चलते-चलते संजय ने अजय से ठिठोली की, “घबराओ नहीं। ऐसा होता है और इत्तफाक से बड़ा है।” कहते हुए वह मजाकिया हुआ, “जरूरत पड़े तो बोल देना। बंदा तैयार मिलेगा।”

अजय ने भी संजय की बात को मजाक में ही लिया, “भाग साले कबड्डी-कबड्डी। तेरी तो....।”

संजय ने मजाक जारी रखा और अजय से कहा “ज्यादा मायूस मत हो। ऐसा बहुतों के साथ होता है। ले इसी बात पर एक सरदार वाला चुटकुला सुन।”

“सुना क्या है?”

“सच।”

“हां, सुना डाल।” कहते हुए अजय ने बड़ी जोर से हवा खारिज की। गोवा कोई कपड़े का थान फाड़ रहा हो। संजय का मूड आफ हो गया। क्योंकि रात भर तो रह-रह कर अजय थान फाड़ ही रहा था, अब चलते-चलते भी उसने सुबह खराब कर दी थी। हालांकि रात भर तो रह-रह कर या तो अजय हवा खारिज कर मूड आफ करता था तो कभी आती-जाती रेलगाड़ियां। अजय तो खैर यहीं घर होने के नाते इन रेलगाड़ियों के आने-जाने का आदी था पर संजय को रह-रह कर वह आती जाती रेलगाड़ियां बहुत डिस्टर्व करती रही। इतना कि उसे अनायास ही एम.के. रैना के उस करेक्टर की याद आ गई जो उन्होंने रमेश बक्षी की कहानी वाली '27 डाऊन फिल्म' में किया था। जिसमें वह करेक्टर अपनी भैंस जैसी पगुराती बीवी से पिंड छुड़ाने की गरज से लगातार भागता रहा है और उसका सारा तनाव चलती रेलगाड़ी की गड़गड़ाहट में गूंजता रहा है। फिल्म का वह पूरा फ्रेम इतना बढ़िया बन पड़ा था कि सचमुच दर्शक भी उस तनाव की आंच उसी शिद्दत से महसूस कर सकता था। पर बंगाली मार्केट में रेल पटरी के पास की इस सुनसान सड़क पर आती-जाती रेलगाड़ियां तनाव नहीं मन में खीझ भर रही थीं। तिस पर अजय की रह-रह यह हवा खारिज करने की आदत! संजय सोचने लगा कि लोग इस बेशरमी से सबके सामने कैसे हवा निकाल लेते हैं? और अजय की यह आदत बेचारी अलका कैसे बर्दाश्त करती होगी? उसे अपने से ज्यादा अलका की परेशानी की चिंता हुई कि उसे इस कमबख्त के साथ रात-दिन गुजारना रहता है। दाढ़ी तो बेचारी झेल लेती होगी पर हवा निकालना? अभी संजय इस चिंता में दुबला हुआ ही जा रहा था कि अजय ने उसे टिपियाया, "अरे सरदार वाला किस्सा सुना न?"

"किस्सा नहीं चुटकुला! पर है नानवेज।"

"वही। वही। तो प्रोसीड !"

"तो सुन" कह कर उसे मन हुआ कि वह भी जोर से हवा निकाल दे। पर ऐसा वह नहीं कर सका। कर भी नहीं सकता था।

सो बोला, "एक सरदार जी की शादी हुई। विदाई के बाद सुबह दुलहन लेकर घर आए। घर में भीड़ बहुत थी पर बीवी से मिलने को बेताब सरदार जी ने युक्ति यह निकाली की बीवी को बाजार घुमा लाएं। बाजार में बीवी के हाथ में हाथ डाले घूम रह थे। एक जगह जरा उन्हें मजाक सूझा। पैंट की दोनों जेबें ब्लेड से काट डालीं। और सरदारनी से जेब में हाथ डालने को कहा। सरदारनी ने जेब में हाथ डाला तो जेब फटी थी तो सीधे "वही" हाथ में आ गया। सरदार जी को मजा आ गया। फिर सरदार जी को सरदारनी पर रौब गालिब करने की सूझी। उन्होंने शरमाते  हुए दूसरी जेब में डलवा दिया। और फिर वही "घटना" घटी। सरदार जी ने सरदारनी पर रौब जमाते हुए कहा, "देखो, दो-दो हैं।" सरदारनी शरमा कर चुन्नी होंठों में दाब ली। इस तरह सरदार जी ने सरदारनी पर रौब तो गालिब कर लिया। पर दूसरे ही क्षण उन्हें रात की चिंता सताने लगी। कि रात को वह सरदारनी को कहां से दो-दो दिखाएंगे?"

"फिर क्या हुआ?" अजय ने जम्हाई लेते हुए पूछा।

"साले, सुन तो सही। अब तेरा वाला मामला आ रहा है।"

"क्या मतलब?"

“पूरा चुटकुला सुनना हो तो सुन, नहीं मैं चलूं।” संजय ने अजय पर धौंस जमाई।

“नहीं-नहीं, सुना। अब नहीं बोलूंगा।”

“तो सरदार जी परेशान थे कि रात को कहां से दो-दो दिखाएंगे सरदारनी को। कि तब तक उनका दोस्त एक दूसरा सरदार बाजार में दिख गया। उसे उन्होंने बुलाया। उसने कुछ पैसा पहले ही से सरदार जी से उधार ले रखा था। सो सरदार जी के रौब में भाग-भागा आया। सरदार जी उस दूसरे सरदार को सरदारनी से थोड़ी दूर एक कोने में ले गए और उसे लगे हड़काने। वह हाथ पैर जोड़ने लगा। सरदार जी का काम हो गया था। सो वह उसे बख्श कर सरदारनी के पास आ गए। सरदारनी ने पूछा, “कि गल है?” सरदार जी ने बड़ी मासूमियत से सरदारनी को बताया, “अपना यार है। हमारे पास जो “दो” हैं उसके पास  “एक” भी नहीं है। सो एक मांग रहा था।”

तो सरदारनी ने पूछा, “तुमने क्या किया?”

सरदार जी बोले, “यार है मदद कर दी उसकी। एक उसको दे दिया।”

सरदारनी बोली, “बड़े रहमदिल हो जी आप।” और मुसकुरा कर चुन्नी फिर होंठो से दबा ली।”

कह कर संजय जरा रूका तो अजय कहने लगा, “इसमें चुटकुला क्या हुआ?”

“अबे अभी खत्म कहां हुआ?” संजय बोला।

“बड़ा लंबा हा?”

“हां। और चुपचाप सुन अब खत्म होने वाला है। बोलना नहीं।”

“हां, सुना भई।”

“तो सरदार जी का बिजनेस था।” वह रुका और बोला, “तेरी तरह।” और दोनों हंसे। फिर संजय बोला, “सरदार जी एक बार बिजनेस टूर पर गए। काफी दिन हो गए, लौटे नहीं। ऊपर से फोन कर-कर के सरदारनी को सताते रहते। सरदारनी को सरदार जी की तलब लगने लगी। इसी बीच एक दिन वह दूसरे सरदार जी जो पहले बाजार में मिल गए थे, इनके घर आए। सरदारनी को लगा मौका अच्छा है। और इनके पास भी जो है वो भी अपने सरदार जी का ही है। कोई हर्ज नहीं। सो वह दूसरे सरदार के साथ स्टार्ट हो गईं। अब दूसरे सरदार जी सरदारनी की सेवा में रोज आने लगे। कुछ दिन बाद सरदारनी के असली सरदार बिजनेज टूर से वापस आ गए। रात में सरदारनी से इधर-उधर की जब हांकने लगे तो सरदारनी से रहा नहीं गया।

वह सरदार से बोली, “जी तुम निरे बेवकूफ हो। बिजनेस क्या करोगे?”

सरदार जी भौंचक्के रह गए। बोले, “हुआ क्या?”

सरदारनी बोली, “तुमसे बड़ा बेवकूफ कौन होगा जी। तुम अपना बड़ा सामान तो दोस्त को दे देते हो और छोटे से अपना काम चलाते है।”

“ओह यस।” सुन कर अजय झूम गया। बोला, “मजा आ गया।”

“तो चलूं?” कि अभी एकाध बम बाकी है तुम्हारा?”

“नहीं-नहीं जाओ।” अजय झेंपते हुए बोला, “सुबह भी हो गई है।” सुबह सचमुच हो गई थी।

“ओह यस !” जब अलका फिर बोली तो संजय के मुंह से अनायास ही निकल गया, “ह्वाट?”

“यस पलाबो।” वह चहकी।

“अच्छा-अच्छा।” कह कर उसने कहा, “पहले एक शिकंजी और हो जाए?”

“हां, हां बिलकुल।” और अलका शिकंजी बनाने में लग गई।

संजय सोचने लगा कि अलका को हो क्या गया है। जो बार-बार “ओ यस, ओह यस,” उच्चार रही है बेझिझक और उसी ब्लू फिल्म वाले अंदाज में। क्या वह उसे आमंत्रण दे रही है? उसने सोचा। लेकिन उसको अपनी सोच पर एक बार फिर शर्म आई और घिन भी। उसने मन ही मन में कहा, नहीं अलका ऐसी नहीं है। चीप और चालू नहीं है। उसने सोचा। फिर यह भी सोचा कि क्या पता अजय का सचमुच “छोटा” हो, बहुत छोटा। हो सकता है। कुछ भी हो सकता है। पर अलका फिर भी ऐसी नहीं हो सकती।

“लीजिए”

“आयं।” संजय चिहुंका। अलका शिकंजी का गिलास लिए खड़ी थी। संजय ने गिलास ले लिया और अलका “ओह यस” या  “यस पलाबो” कहती कि संजय ने चुटकुला शुरू कर दिया, “मिलेट्री में सिख रेजीमेंट का नाम तो सुना ही होगा।” वह कह ही रहा था कि अलका पीछे मुड़ी और संजय की नजर उसके नितंबो पर अनायास ही पड़ गई। अब तो वह बिलकुल ही पीछे से ही पकड़ कर चूम लेना चाहता था पर अलका तब तक फिर पलट कर मोढ़े पर बैठने लगी। बैठती हुई बड़े बेमन से बोली, “सरदारों वाला चुटकुला है तो रहने दीजिए।” अजय को ही सुनाइएगा।”

“क्यों?” संजय की आखों में इसरार था।

“वैसे ही।”  वह झिझकती हुई बोली।

“नहीं-नहीं घबराइए नहीं। यह नानवेज नहीं है। और सरदारों वाला मिजाज भी नहीं है।”

संजय ललचाती नजरों से उसे देखते हुए बोला। वह यह तो समझ ही गया था कि अजय अलका को वह सरदार जी वाला चुटकुला सुना चुका है। और यह भी समझ गया था कि अजय ने यह भी बता रखा है कि संजय ने सुनाया है। इस बीच उसने देखा अलका कुछ असुरक्षित-सी महसूस करते हुए बार-बार पल्लू खींचती जा रही थी। उसका गजरा भी इस फेर में गड़बड़ाता जा रहा था। संजय समझ गया कि अलका उसकी ललचाई नजरों का अर्थ समझ गई है। सो अपनी गंभीरता की सर्द खोल में वापस आ गया।

दयानंद पांडेय


इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए लेखक दयानंद पांडेय की तस्वीर पर क्लिक करें। पार्ट (6) पढ़ने के लिए कुछ दिनों का इंतजार करें।


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