बी4एम पर अश्लीलता फैलाना बंद करिए

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यशवंत जी, मैं आपके पोर्टल को लम्बे समय से पढ़ती आ रही हूं. भड़ास4मीडिया पर हम मीडिया से जुड़ी हर खबर को एक ही पल में जान जाते हैं. निरंतर अपने आसपास होने वाली घटना के प्रति सजग हैं और जानते हैं कि कहां पर क्या घटित हो रहा है. मीडिया फ़ील्ड से जुड़ा हर व्यक्ति दिन भर में एक बार भड़ास4मीडिया ज़रूर खोलता है और खबरों को समझता है. आपके पोर्टल पर इंटरव्यू अच्छे आते हैं. ख़बरें अच्छी होती हैं. आप लोगों के साथ उनकी लड़ाई में शामिल होते हैं. उन्हें लड़ने का ज़ज़्बा मिलता है. 

यह एक बढ़िया शुरुआत है पत्रकारों के लिए, जो दूरदराज और बड़े शहरों से आते हैं. पर मुझे पोर्टल पर दयानंद जी की किताब 'अपने-अपने युद्घ' की कुछ सामग्री देख कर बड़ी निराशा हुई. आप यह मत सोचना की मैं उनके खिलाफ लिख रही हूं, पर मुझे लिखना पड़ रहा है क्योंकि इस तरह की सामग्री एक विशेष वर्ग की पसंद हो सकती है, पर हर किसी की नहीं, मुझे बड़ी निराशा हुई. इस तरह का साहित्य हर कोई पसंद नहीं करता. आप देखिये, शब्दों का अर्थ, सेक्स का खुलापअन और भोंडापन, यह आप को उचित लगता है पोर्टल पर? हमें अगर इसकी जगह किसी अच्छे साहित्य की सामग्री पढ़ने को मिले तो बड़ी ख़ुशी होगी क्योंकि वह आज कल स्टॉल्स पर उपलब्ध नहीं है. लेकिन इस तरह के उपन्यास के शब्द या भाव हर जगह मिल जाता है. बस इतना ही कहना है. उम्मीद है कि आने वाले दिनों मे कुछ और अच्छा देखने को मिलेगा.

श्वेता रश्मि

प्रोड्यूसर इनपुट, महुआ न्यूज़

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यशवंत जी, नमस्कार. अपने-अपने युद्ध उपन्यास के कई भागों को पढ़ा. बहुत गंदा उपन्यास आपने अपनी साफ-सुथरी वेबसाइट पर प्रकाशित करना शुरू किया है. भड़ास4मीडिया पर इस उपन्यास का प्रकाशन बंद करिए. प्रकाशित भागों को हटा लीजिए. प्लीज रिमूव अपने-अपने युद्ध. यह बहुत गंदा है. पत्रकारों और अन्य के लिए भड़ास4मीडिया बहुत पावरफुल लिंक है. इसलिए इस उपन्यास के अब तक प्रकाशित हिस्सों को हटा दीजिए.

आपका

राजमणि सिंह

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श्वेता जी और राजमणि जी

आप दोनों की शिकायतों को अपने-अपने युद्ध के लेखक और वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय के पास भेज दिया गया है। उनका जवाब भी प्रकाशित किया जाएगा। जहां तक मुझे पता है, समकालीन पत्रकारिता और समाज पर यथार्थवादी नजरिए से लिखा गया उपन्यास 'अपने-अपने युद्ध' पर विवाद इसके प्रकाशन से ही है। तब भी कई लोगों ने इस पर आपत्ति की थी और इसके खिलाफ कोर्ट चले गए थे। दरअसल, यह उपन्यास टुकड़ों में एक-एक कर प्रकाशित किया जा रहा है, इसलिए कई पार्ट अश्लील लग सकते हैं लेकिन संपूर्ण उपन्यास को पढ़ने के बाद आप पाएंगे कि यह वो हकीकत है जो हमारे आसपास बिखरी हुई है। इसमें सेक्स, समाज, साहित्य, पत्रकारिता, जीवन, संगीत.... सब कुछ है। आप दोनों की शिकायत के बाद उम्मीद करता हूं कि दयानंद पांडेय जी अपना पक्ष जरूर रखेंगे। अगर उनके पक्ष से आप संतुष्ट नहीं हुए और कुछ कहना चाहेंगे तो आपका स्वागत है। 

आभार के साथ

यशवंत सिंह

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