इस पोर्टल को अश्लीलता से मुक्त रखिए

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आदरणीय यशवंत जी, आपके द्वारा संचालित भड़ास4मीडिया मात्र एक वेबसाइट नहीं है, पत्रकारिता की अपनी आवाज है. इसके सुपरहिट होने का कारण इससे मिलने वाली जानकारियां हैं. इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं. लेकिन आप ने उपन्यास 'अपने-अपने युद्ध' का जो अश्लील सिलसिला शुरू किया है, वो चिंताजनक है. इस पर कुछ मित्र पहले भी चिंता जता चुके हैं. और आप भी महज दयानंद पाण्डेय की टिप्पणी प्रकाशित कर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सके हैं. दयानंद जी के जवाब के बाद तो उनसे उम्मीद करना ही व्यर्थ है. साहित्य और अश्लीलता में महीन-सा फर्क होता है, जिसका भेद करना जरूरी होता है.

और फिर काम और सम्भोग को जो साहित्य में स्थान मिला है, उसमें फूहड़पन और अश्लीलता नहीं है. उनके उपन्यास के लिए उन्हें मुबारकबाद लेकिन बी4एम इसके लिए सही स्थान प्रतीत नहीं होता है. इसके लिए मैं हिंदी ब्लॉग जगत का उदाहरण पेश करना चाहता हूँ. अति विस्तृत ब्लॉग जगत में आपको एक भी अश्लील ब्लॉग नहीं मिलेगा. वैसा भी नहीं, जिसे दयानंद पाण्डेय अश्लील नहीं, साहित्य कहते हैं. हैरानी तो इस बात की है की दयानंद जी ने अपने बचाब में जो उदाहरण पेश किये हैं, वह तो दंग कर देने वाले हैं.अभिज्ञान शाकुंतलम में कालिदास की कृति का जो उदाहरण पेश किया है और जो अंश उनके उपन्यास में हैं उनमें तो जमीन आसमान का अंतर है. सीता वाले हिस्से में तो जबरन रुख मोड़ने का प्रयास किया गया है. महोदय, इस उपन्यास में तो इस हद तक अश्लीलता है की अश्लील चुटकुले भी शरमा जाएँ. आपसे प्रार्थना है की अबिलम्ब इस अश्लील प्रकाशन को रोकें. इससे अच्छा सन्देश नहीं जायेगा. हाँ, यदि प्रकाशन जारी रहेगा तो सिर्फ आपकी विश्वसनीयता पर ही फर्क पड़ेगा. भड़ास पर लोग सेक्स पढने नहीं आते. उन्हें कुछ और चाहिए. शेष आपकी इच्छा. वैसे भी हम अल्पविकसित बुद्धि के लोग आपकी गूढ़ बातों को समझने में अक्षम हैं.

आभार सहित,

सुनील डोगरा

उप संपादक, पंजाब केसरी, दिल्ली.

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यशवंत जी, मैं श्वेता जी और राजमणि की इस बात से सहमत हूँ इस पोर्टल को अश्लीलता से मुक्त रखना चाहिए. मैंने दिसम्बर २००८ में आपको इस बाबत पत्र लिखा था पर वो पोर्टल पर नहीं आया लेकिन मुझे इस बात की तसल्ली है इसके बाद मुझे अश्लीलता नहीं दिखी. लम्बे समय बाद दयानंद पांडे की अपने-अपने युद्ध के सन्दर्भ में ऐसी बातें दिखी जिनके बिना भी काम चल सकता था. मैंने पहले भी लिखा था आपका ये पोर्टल मेरा बेटा भी मेरे साथ देखता है बहुत से लोग हैं जिनके घर में महिलाएं भी अपने परिवार वालों के साथ इसे पढ़ती हैं. सोचिये ऐसे समय कैसा लगता होगा?  कृपया ऐसी सामग्री आ भी जाये तो उसे एडिट कर लिया करें. अश्लीलता को बढावा न दें तो बेहतर होगा. कुछ लोग गालियाँ बककर या अश्लील बातें कर अपना बड़प्पन साबित करना चाहतें  हैं क्या वे अपने बेटे-बेटियों के साथ इसे पढ़ सकेंगे. कुछ ज्यादा लिख गया हूँ तो क्षमा करेंगे.

सत्यनारायण पाठक

जगदलपुर.(बस्तर) छत्तीसगढ़

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Yaswant Jee, Namaskar, Sir I again requist to u please remove article. yaswant jee aapse niwedan hai ki kirpya aap article ko remove kar den kyoki article ke mutabik har aadmi apni patni par sak karega wo bhi no1 web portal par lekh ko read kar ke. ye bilkul galat (wrong) hai yaswant gee aapne kya article ko read kiya tha. aapke no1 webportal ki india ke village, town, distt, state,capital and international readership hai. so pls remove. Again I requist to u please remove article.

Rajmani Singh

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आदरणीय यशवंत जी, आप बधाई के पात्र हैं. कृपया इस उपन्यास को हटाना नहीं और 'अपने-अपने युद्ध' को अश्लील कहने वालों से यह पूछें की मीडिया या बाहर सड़कों पर जो अश्लीलता दिखती है उसके खिलाफ वो कुछ नहीं कहते करते.  वेबसाइट पर तो केवल वे लोग जो रूचि रखते हैं, पढ़ लेंगे. जब पहला भाग ही गन्दा था तो सारा पढ़ा क्यों?  दयानन्द पांडे जी को बधाई, उपन्यास पहले अगर मिला होता तो कुछ और रहस्य देता. आपने तो 82 से 88 तक की यादे ताजा करा दी. चटकारा हर कोई लेना चाहता है और यह भी चाहता है सी-सी करते कोई देखे नहीं. कुछ और लिखें, थिएटर या टेलिविज़न पर तो कृपया बता दें. बहुत भरा पिटारा है.

राकेश 

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आदरणीय यशवंत जी, नमस्कार, पहले जो जवाब भेजा था, वह जल्दबाजी में लिखा था। उसे संशोधित करके भेज रहा हूं। कृपया इसे ही जारी करें। -दयानंद पांडेय

मुज़रिम हाज़िर है!

हे पाठक मित्रों, आप का मुज़रिम, आप का गुनहगार हाज़िर है। यह यशवंत जी की भलमनसाहत है कि उन्होंने श्वेता रश्मि और राजमणि सिंह जी का नाराजगी भरा पत्र मेरी तरफ़ बढा दिया। नंगई का, अश्लीलता का आरोप मुझ पर है तो ज़ाहिर है जवाब भी मुझे ही देना होगा। कुछ बातें मैं पहले ही साफ कर दूं। थिएटर, पत्रकारिता और न्यायपालिका पर आधारित उपन्यास 'अपने-अपने युद्ध' उस दौर में लिखा गया था जब मैं अपने आस-पास की दुनिया से सख्त नाराज़ था। खुद एक रिपोर्टर होने के नाते अखबारनवीसी की दुनिया बहुत करीब से देखी-भोगी थी। और यकीन मानिए, इस कहानी में जितनी अश्लीलता आप मित्रों को दिख रही है, उससे कहीं अधिक अश्लीलता मैंने अपने इर्द-गिर्द महसूस की। आप कह सकते हैं कि मैंने अपने पत्रकारीय जीवन में एक नंगे यथार्थ को भोगा है और उसे कलमबंद करने की हिम्मत जुटाई। अदालत में जज के चैंबर से लेकर संपादक के केबिन तक, मैंने पूरे सिस्टम में एक खास तरह का नंगापन देखा। अगर मैं वह सब लिख देता तो बेशक मैं  भी लोकप्रिय लेखकों में शुमार हो गया होता। कहीं ज़्यादा मशहूर होता। इस उपन्यास को लेकर मुझ पर अश्लीलता के ये आरोप नए नहीं हैं। इस उपन्यास पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में मुझ पर मुकदमा भी चल चुका है। अखबारों- पत्रिकाओं में बहुत कुछ छप चुका है। और अब कई साल बाद सोचता हूं तो पाता हूं कि कसूर मेरा ही था, है। मुझे कोई हक नहीं था कि मैं अपने अंदर की कुंठाओं और ज़माने के प्रति अपनी नाराज़गी को एक उपन्यास की शक्ल देता॥

उपन्यास के ज़रिए पत्रकारिता से ले कर थिएटर और विधानसभा से ले कर न्याय्पालिका तक जिन गंभीर सवालों को मैं उठाना चाहता था, उठाया भी, पर अश्लीलता की आड में उन की हत्या कर दी गई। मैं तो सिर्फ़ आइना लेकर खड़ा था और मुझ पर पत्थरों की बारिश शुरू हो गई। तब भी, अब भी। श्वेता रश्मि और राजमणि सिंह जैसे निहायत शरीफ़ लोग अगर इस तरह के नंगे यथार्थ को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो ज़ाहिर है कि यह दुनिया उन के लिए नहीं है। हाल के महीनों में जो खबरें सामने आई हैं, उससे मैं यह भी नहीं कह सकता कि आशाराम बापू जैसे संतों के आश्रम भी उन के लिए सब से मह्फ़ूज़ जगह है।

साहित्य में अश्लीलता पर बहस बहुत पुरानी है। यह तय करना बेहद मुश्किल है कि क्या अश्लील है और श्लील। एक समाज में जो चीज़ अश्लील समझी जाती, वह दूसरे समाज में एक्दम शालीन कही जा सकती है। यह जो एस.एम.एस. पर नान वेज़ जोक्स का ज़खीरा है, उस से कौन अपरिचित है भला? श्वेता जी और राजमणि जी क्या इस सच से भी अपरिचित नहीं हैं? भाई जो इतने शरीफ़ और नादान हैं तो मुझे फिर माफ़ करें। अभी 'अपने-अपने युद्ध' के जिस हिस्से पर यह दोनों लोग आहत हुए हैं, वह एक नानवेज़ लतीफ़ा ही तो है! खैर!

ऐसे तो हमारे लोकगीतों और लोक परंपराओं में कई जगह गज़ब की अश्लीलता है। मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखता हूं। हमारे यहां शादी व्याह में आंगन में आई बारात को भोजन के समय दरवाज़े के पीछे से छुप कर घूंघट में महिलाएं लोक गीतों के माध्यम से जैसी गालियां गाती हैं उसे राजमणि जी घोर अश्लील कह सकते हैं। श्वेता रश्मि जी तो खुद महुआ चैनल की प्रोडयूसर हैं। पता नहीं उन के कार्यक्रम भौजी नंबर वन को बनाने में उन की क्या भूमिका है। इस कार्यक्रम में भौजियों की भाव-भंगिमा और उनके शरीर के कुछ विशेश अंगों का विस्फोटक प्रदर्शन एक खास तरह की भदेस अश्लीलता का दर्शन कराता है। लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में यह कार्यक्रम मशहूर है क्योंकि उन का समाज इसमें रस लेता है और ऐसे शो की स्वीकृति देता है। पर मेट्रो के दर्शकों को यह कार्यक्रम अश्लील लग सकता है। फ़र्क सिर्फ़ हमारे सामाजिक परिवेश का है।

एक मुहावरा हमारे यहां खूब चलता है--का वर्शा जब कृशि सुखाने ! वास्तव में यह तुलसीदास रचित रामचरित मानस की एक चौपाई का अंश है। एक वाटिका में राम और लक्छमन घूम रहे हैं। उधर सीता भी अपनी सखियों के साथ उसी वाटिका में घूम रही हैं, खूब बन-ठन कर। वह चाहती हैं कि राम उन के रूप को देखें और सराहें। वह इस के लिए आकुल और लगभग व्याकुल हैं। पर राम हैं कि देख ही नहीं रहे हैं। सीता की तमाम चेश्टा के बावजूद। वह इस की शिकायत और रोना अपनी सखियों से करती भी हैं, आजिज आ कर। तो सखियां समझाती हुई कहती हैं कि अब तो राम तुम्हारे हैं ही जीवन भर के लिए। जीवन भर देखेंगे ही, इस में इतना परेशान होने की क्या ज़रूरत है? तो सीता सखियों से अपना भड़ास निकालती हुई कहती हैं---का वर्शा जब कृशि सुखाने !

यह तब है जब तुलसी के राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। और फिर मानस में श्रृंगार के एक से एक वर्णन हैं। केशव, बिहारी आदि की तो बात ही और है। वाणभट्ट की कादंबरी में कटि प्रदेश क जैसा वर्णन है कि पूछिए मत। भवभूति के यहां भी एक से एक वर्णन हैं। हिंदुस्तान में शिवलिंग आदि काल से उपासना गृहों में पूजनीय स्थान रखता है। श्रद्धालु महिलाएं शिवलिंग को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर अपना माथा उस से स्पर्श कराती हैं। यही शिवलिंग पश्चिमी समाज के लोगों के लिए अश्लीलता का प्रतीक है।

कालिदास ने शिव-पार्वती की रति क्रीड़ा का विस्तृत, सजीव और सुंदर वर्णन किया है। कालिदास ने  शंकर की तपस्या में लीन पार्वती का वर्णन किया है। वह लिखते हैं---- पार्वती शिव जी की तपस्या में लीन हैं। कि अचानक ओस की एक बूंद उन के सिर पर आ कर गिर जाती है। लेकिन उन के केश इतने कोमल हैं कि ओस की बूंद छटक कर उन के कपोल पर आ गिरती है। कपोल भी इतने सुकोमल हैं कि ओस की बूंद छटक कर उन के स्तन पर गिर जाती है। और स्तन इतने कठोर हैं कि ओस की बूंद टूट कर बिखर जाती है, धराशाई हो जाती है। कालिदास के लेखन को उनके समय में भी अश्लील कहा गया। प्राचीन संस्कृत साहित्य से लेकर मध्ययुगीन काव्य परंपरा है। डीएच लारेंस के 'लेडीज़ चैटरलीज़ लवर' पर अश्लीलता के लंबे मुकदमे चले। अदालत ने भी इस उपन्यास को अश्लील माना लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि साहित्य में ऐसे गुनाह माफ़ हैं। ब्लादिमीर नाबकोव की विश्व विख्यात कृति 'लोलिता' पर भी मुकदमा चला। लेकिन दुनिया भर के सुधि पाठकों ने उन्हें भी माफ़ कर दिया।

आधुनिक समकालीन लेखकों में खुशवंत सिंह, अरूंधति राय, पंकज मिश्रा, रजकमल झा हिंदी में डा. द्वारका प्रसाद, मनोहर श्याम जोशी, कृश्न बलदेव वैद्य उर्दू में मंटो, इस्मत चुगताई आदि की लंबी फ़ेहरिश्त है। मैं कालिदास, लारेंस या ब्लादिमीर जैसे महान रचनाकारों से अपनी तुलना नहीं कर रहा हूं। मैं सिर्फ़ उन की तरह अपने गुनाह कबूल कर रहा हूं।

साहित्यिक अश्लीलता से बचने का सब से बेहतर उपाय यह हो सकता है कि उसे न पढ़ा जाए। यह एक तरह की ऐसी सेंसरशिप है जो पाठक को अपने उपर खुद लगनी होती है। श्वेता जी ने ठीक कहा इस तरह की सामग्री एक विशेष वर्ग को ही पसंद हो सकती है। लेकिन यथार्थवादी पाठकों का एक बड़ा वर्ग है जो काल्पनिक परी कथाओं की दुनिया से ऊब चुका है। मेरी कथा का नायक संजय और उसका सहयोगी चरित्र अजय शेक्सपियर के डायलाग्स सुनाता है। दुष्यंत कुमार की शायरी पर बात करता है। वह सेक्स पर भी बात करता है, नानवेज़ लतीफ़े सुनाता है और ऐसा करते वक्त वह ठेठ युवा भी बन जाता है। उसकी आंखों के सामने ब्लू फ़िल्मों के कुछ उत्तेजक दृश्यों के टुकडे़ होते हैं, जवानी के दिनों की कुछ संचित कुंठाएं होती हैं और इसे प्रकट करने के लिए उस के पास कुछ प्रचलित शब्दावलियां हैं--तो बस कबड्डी-कबड्डी। गया और आया। उसके पास दिल्ली के खुशवंत सिंह जैसे खूबसूरत शब्द नहीं जो वह कहे--- मैं दाखिल होते ही खारिज़ हो गया!

खैर इसे जाने दें। असल बात मैं कहना चाहता हूं कि अश्लीलता देखनी हो तो अपने चैनलों और अखबारों से शुरू कीजिए। जहां पचासों लोगों को बिना नोटिस दिए मंदी के नाम पर नौकरी से निकाल दिया जाता है। पूंजीपति जैसे चाह रहे हैं आप को लूट रहे हैं। हर जगह एम आर पी है लेकिन किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य। आखिर क्यों? कार के दाम घट रहे हैं, ट्रैक्टर महंगे हो रहे हैं। मोबाइल सस्ता हो रहा और खाद-बीज मंहगे हो रहे हैं। एक प्रधानमंत्री जब पहली बार शपथ लेता है तो भूसा आंटे के दाम में बिकने लगता है। वही जब दूसरी बार शपथ लेता है तो दाल काजू-बादाम के भाव बिकने लगती है।

तो मित्रों अश्लीलता यहां है, अपने अपने युद्ध में नहीं। वैसे भी आप इस के छोटे- छोटे हिस्से पढ रहे हैं। जब इसे समग्रता में पढेंगे तो यह उपन्यास आप को जीवन लगेगा। हां, अगर हमारा जीवन ही अश्लील हो गया हो तो समाज का दर्पण कहे जाने वाले साहित्य में आप देखेंगे क्या?

आपका,

दयानंद पांडेय

लेखक

'अपने-अपने युद्ध'


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