अपने-अपने युद्ध (6)

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निर्विकार भाव से उसने चुटकुला शुरू किया, “बीच लड़ाई में सिख रिजीमेंट का कमांडर अपनी सिख बटालियन से बिछड़ गया। खोजते-खोजते वह बंगाल रेजीमेंट से जा मिला। उधर बंगाल रेजीमेंट से भी उसका कमांडर बिछड़ गया था तो तय हुआ कि सिख रेजीमेंट का कमांडर बंगाल रेजीमेंट की कमान संभाल ले। और लड़ाई में अमूमन कमांडर बटालियन के पीछे रहता है। और आगे की पोजीशन पूछता हुआ जरूरी आदेश देता रहता है। यहां भी यही हुआ।

सिख रेजीमेंट का कमांडर पीछे से लगातार दुश्मन की पोजीशन पूछता था। “बंगाल रेजीमेंट के जवान लगातार दुश्मन की पोजीशन बताते और पूछ लेते, “पलाबो?” सिख रेजीमेंट के कमांडर को बंगाली नहीं आती थी। सो उसने मन ही मन सोचा कि हो न हो 'पलाबो' का मतलब फायरिंग से हो। सो जब जवान बताते, “दोसमन दोसमन एक हजार मीटर! पलाबो?” तो कमांडर बोलता, “नो पलाबो।” दोसमन दोसमन पांच सौ मीटर पलाबो?” जवान बताते और कमांडर कहता, “नो पलाबो।” सिलसिला चलता रहा। अंतत: जवानों ने जब कहा कि “दोसमन सो मीटर पलाबो?” तो कमांडर बोला, “यस पलाबो !” और कमांडर का “यस पलाबो !” बोलना था कि सारे के सारे जवान पीछे की ओर भाग लिए। 'पलाबो' बंगला का शब्द है और 'पलाबो' मतलब भाग लेना। तो उन जवानों की योजना ही शुरू से भाग लेने की थी।” चुटकुला सुनते ही अलका खिलखिला कर हंस पड़ी बोली, “मजा आ गया।” वह बिलकुल अजय की तरह बोली।

“मजा क्या खाक आ गया?” संजय ने अलका से कहा कि, “अपने देश में ज्यादातर पढ़ी लिखी औरतों का भी यही हाल है कि 'पलाबो'।”

“नहीं मैं नहीं मानती।” अलका बिलकुल किसी फिलासफर की तरह बोली। और गंभीर हो गई।

“अब देवी जी आप मानिए न मानिए। कोई जबरदस्ती तो नहीं। पर दरअसल हकीकत यही है कि औरतें चीजों को फेस करने के बजाय, जाने क्यों भाग लेने में ही भलाई समझती हैं।”             

“नो। बिलकुल नही।”

“कैसे नहीं?” संजय बोला, “आप अपने ही को ले लीजिए। दिल्ली आईं कथक सीखने के लिए। और नृत्य के एक ठेकेदार को नहीं झेल सकीं। न झुक सकीं, न लड़ सकीं। 'पलाबो' कर गईं।”

“संजय ! क्या ले बैठे?” वह रुआंसी सी हुई और बोली, “आप भी !”

“नहीं, अपने देश की महिलाओं का इतिहास ही यही रहा। रानी पद्मावती का ही किस्सा ले लीजिए।” संजय अब चालू हो गया था, “बीस हजार रानियों के साथ जौहर व्रत लिया और चिता में कूद कर जल मरीं।” संजय खीझ रहा था, “अरे मरना ही था तो जल कर क्यों? लड़ कर क्यों नहीं मर सकती थी? और हो सकता था लड़ कर मरती नहीं तो मार देती उस आक्रमणकारी को।”

“वीर रस में आने की जरूरत नहीं है प्रभु ! आधे सुर में भी काम चल सकता है।” कहते हुए अलका बोली, “औरतों पर आपेक्ष लगाना और बात है, परिस्थितियों को जानना और बात है।” कहकर अलका जरा रुकी और बोली, “पर मैं अभी डिबेट के मूड में नहीं हूं। फिर कभी।”

“फिर कभी क्या, कभी नहीं। हरदम 'पलाबो'।” वह अलका को एक बार फिर भरपूर नजरों से देखता हुआ बोला, “शायद इसीलिए लोहिया ने औरतों को दलित कहा है।”

“यह लोहिया कौन है?” अलका बिसूरती हुई पूछ बैठी, “जो औरतों को दलित कहता है।” सुनकर संजय ने माथा पीट लिया और हाथ जोड़ते हुए कहा, “आप मार्क्स को जान सकती हैं माओ, लेनिन और मैक्सिम गोर्की को जान सकती हैं। उनकी किताबें पढ़ सकती हैं। पर लोहिया का नाम भी नहीं जान सकती। धन्य हैं आप नृत्यांगना जी। धन्य हैं।” कह कर संजय ने अलका से आज्ञा मांगते हुए कहा, “तो मैं अब चलूं?”

“नहीं रुकिए। अजय आते होंगे।”

“नहीं अब चलूंगा।” कहकर संजय चलने लगा तो अलका बोली, “अबकी रक्षा बंधन पर आप मुझसे राखी बंधवा लीजिए।”

“क्या मतलब।” संजय भड़का।

“नहीं, आदमी तो आप अच्छे हैं, पूरा विश्वास भी है आप पर। लेकिन कभी-कभी देखती हूं कि आप भी पुरुष मानसिकता से संचालित होने लगते हैं तो ठीक नहीं लगता।” सुन कर संजय लजा गया। बोलो, “सॉरी।”

“नहीं कोई बात नहीं। प्लीज, आप माइंड नहीं करिएगा।”

“अरे नहीं, नहीं।” कहता हुआ संजय बाहर आ गया। बाहर क्या आ गया, उसे लगा जैसे वह भहरा गया। सोचने लगा कि कोई औरत लोहिया को जाने न जाने, पुरुष की आंखों में छुपे अर्थ जरूर जान जाती है। फर्क यही है कि कहीं चुप रहती और कहीं कह देती है।

और लोहिया? गांधी? लोहिया और गांधी? कि गांधी और लोहिया? लोहिया ने तो औरतों की स्थिति के बारे में लिखा, पर अपनी “औरतों” के बारे में कहीं लिखा नहीं। इलाहाबाद की उन श्रीमती पूर्णिमा बनर्जी के बारे में भी नहीं। जिनसे कहते हैं कि उनका विवाह होते-होते रह गया था ! हालांकि लोहिया के प्रति आकर्षित स्त्रियों की संख्या अच्छी खासी थी। फिर भी वह 'अविवाहित' रहे। तब जब कि वह सुंदरता के तलबगार थे। सुंदरता के रसिक पुजारी! हां, गांधी ने अपनी पत्नी, अपने सेक्स के बारे में टाफी-टोकन जैसा ही सही, जरूर लिखा। फिर उसने सोचा कि क्या गांधी भी एकाधिक औरतों के फेर में पड़े होंगे? हो सकता है पड़े हों। फिर वह अचानक रजनीश पर आ गया और जैसे अपने आप से ही कहने लगा कि रजनीश जैसा विद्वान और स्पष्ट वक्ता होना कितना कठिन है। इस सदी का इतना बड़ा विद्वान दार्शनिक। पर अफसोस कि उसे ठीक से पहचाना नहीं गया। और मन ही मन उसने उच्चारा कि एक बार गांधी होना आसान है, लोहिया होना आसान है, मार्क्स-लेनिन और माओ होना आसान है पर रजनीश होना आसान नहीं है। ठीक उसी तर्ज पर जैसे रजनीश कहते हैं कि एक बार बुद्ध और महावीर होना आसान है, पर मीरा होना आसान नहीं है। और फिर रजनीश की यह स्थापना कि मीरा तो एक शराब है, एक नशा है। यह कहना भी आसान है क्या किसी के लिए? गांधी ने राम के बारे में बहुत कहा, लोहिया ने राम, कृष्ण पर खूब लिखा, राधा और मीरा के बारे में ज्यादा नहीं जिक्र भर का लिखा। पर गांधी? गांधी मीरा को गा सकते थे, मीरा पर लिखना उनके वश का नहीं था। पर लोहिया ने मीरा की भक्ति को एक नया आयाम दिया। द्रौपदी के साथ मीरा का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए नारी के तीन रूप बताए- भोग्या, सती और सहचरी। कहा कि मीरा फैंटेसी में कृष्ण को जीती है और द्रौपदी साक्ष्य में। और सच भी है कि द्रौपदी की ओर कृष्ण का झुकाव ज्यादा है। मीरा के बारे में रजनीश जैसा लोहिया या गांधी क्यों नहीं कह पाए? ठीक है कि तीनों का कैनवस, तीनों का सोच और एप्रोच अलग-अलग थी। पर और भी कई मामलों पर रजनीश जितना बेलाग, बेलौस और बेहतरीन अंदाज से बातों को क्यों नहीं कह पाए लोहिया? क्यों नहीं कह पाए गांधी? और शायद इसीलिए वह अपने कहानीकार दोस्तों से कहता भी रहता है कि कहानी कहने की कला अगर सीखनी हो तो रजनीश से सीखो।

सहसा उसने सोचा कि “गांधी, लोहिया, जयप्रकाश” पर तो बहुत लिखा गया है और तय किया कि “गांधी, लोहिया और रजनीश” पर एक तुलनात्मक किताब न सही, एक लेख तो वह लिखेगा ही। फिर उसने सोचा कि कौन इसे पढ़ेगा? और हर बार की तरह उसने फिर सोचा कि क्या वह इस विषय पर जैसे सोच रहा है, वैसे ही लिख भी सकेगा? बिलकुल शास्त्रीय ढंग से क्यों, सर्रे से क्यों नहीं? कहीं ज्यादा शास्त्रीय हो जाए और संपादक के ही सिर से ऊपर निकल जाए तो? पर वह मूल सवाल पर फिर आ गया कि क्या वह अपने इस लेख “गांधी, लोहिया और रजनीश” में तीनों के साथ निष्पक्षता बरत पाएगा? फिर उसने जैसे खुद को ही जवाब दिया, क्यों नहीं? क्योंकि वह तो तीनों का भक्त है, गांधी का भी, लोहिया का भी, और रजनीश का भी।

फिर उसने जैसे अपने आप को कटघरे में खड़ा कर लिया और पूछा कि क्या सचमुच वह इन तीनों के साथ निष्पक्ष रह पाएगा? और फिर जवाब दिया कि, हां। पर सवाल फिर उठा कि वह तो रजनीश का कायल है। और अभी-अभी कुछ देर पहले खुद ही कह रहा था कि एक बार गांधी और लोहिया होना आसान है रजनीश होना आसान नहीं है। फिर उसने एक वाक्य और जोड़ा कि क्या रजनीश भी एक शराब नहीं हैं। और खुद से ही पूछा कि तो फिर अगर रजनीश शराब हैं तो गांधी और लोहिया क्या स्नैक्स हैं? जो शराब के साथ चुगे जा सकें? नहीं। उसने अपने आप को धिक्कारा ! कि गांधी और लोहिया के बारे में उसे ऐसा नीच खयाल आया कैसे?पर उसके भीतर से कही आवाज आई कि बेटा बेवकूफी ही में सही बात तूने मार्के की कही है कि रजनीश एक शराब है और गांधी, लोहिया स्नैक्स। सच, स्थिति यही है कि गांधी, लोहिया स्नैक्स की तरह हर जगह फिट हो जाते हैं पर रजनीश शराब की तरह ज्यादातर छुप-छुपा के शुमार हैं।

पर यह तो उथली सोच है। उसने अपने मन को समझाया कि ऐसी स्थापनाए उसे कही का नहीं छोड़ेंगी। और उसने तय किया कि गांधी नेता, लोहिया विचारक और रजनीश दार्शनिक। पर यह प्रतिमान भी उसे बासी जान पड़ा और खुद से ही फिर कहा कि बेटा, अगर यही सब कुछ लिखना है तो मत लिखो। इससे बेहतर तो वह तुम्हारी शराब और स्नैक्स वाली एप्रोच है।

उसने तय किया कि कोई हंसे, चाहे उसका मजाक उड़ाए पर वह लिखेगा जरूर “गांधी, लोहिया और रजनीश !” दो सवाल फिर संजय के मन में लगभग दौड़ कर घुस आए। एक तो लेख के शिर्षक को लेकर कि बार-बार गांधी का ही नाम पहले क्यों वह लेता है कि “गांधी, लोहिया और रजनीश !” “लोहिया, रजनीश और गांधी” या फिर “रजनीश, गांधी और लोहिया” या “लोहिय, गांधी और रजनीश” वगैरह-वगैरह जैसा कुछ क्यों नहीं। पर यह सवाल उसे आगे कि बेवजह ही उसने उठा दिया। इस सवाल में कोई वजन नहीं था। पर दुसरा सवाल उसकी इस समूची सोच पर पानी फेरे जा रहा था। सवाल यह था कि क्या रजनीश पर निरपेक्ष ढंग से कलम चला भी सकेगा?

जब-तब, जिस-तिस लड़की या महिला को देख कर चूमने की हसरत जाग जाए, उसके साथ सोने की ललक मन ही मन अंकुआ जाय, और तो और राह चलती जिस-तिस महिला, लड़की को दुर्घटना होने की हद तक मुड़-मुड़ कर देखने की जिसकी आदत हो, डी.टी.सी. की बसों में महिलाओं के साथ रगड़ घिस्स और किसी लड़की के स्पर्श भर के लिए बेकल रहना, पीछे से सट कर खड़े हो जाने जैसी ओछी हरकतों तक से बाज नहीं आते आप, सपनों में जॉघिया खराब कर डालें, यानी कि हर समय महिला रोग में मरते रहेंगे आपर और लिखेंगे रजनीश पर ! उसका वश चलता तो इस सवाल के साथ अपने आप को चांटा मार लेता। पर नहीं वह पान की दुकान में बाहर जल रही रस्सी से सिगरेट सुलगाने लगा।

बाहर सिगरेट सुलग रही थी और भीतर वह खुद सुलग रहा था। झुलस रहा था उसके लेख का शीर्षक “गांधी, लोहिया और रजनीश !” उसने एक बार अपने को तसल्ली दी। माथे के बाल सहलाते हुए अपने मन को समझाया कि इस मामले में अपने को अपराधी समझने की कोई जरूरत नहीं और कि यह सब कुआरेपन की समस्या है। और अभी-अभी तो उसने टीनएज की दीवार फांदी है तो इस जवानी में लड़कियों के बारे में वह नहीं सोचेगा तो कौन सोचेगा? जिस-तिस लड़की को चूमने या उसके साथ सोने के सपने वह नहीं देखेगा तो क्या उसका बाप देखेगा? डी.टी.सी. की बसों में महिलाओं के साथ अगर आंख मूंद कर थोड़ी बहुत बेशरमी वह कर लेता है तो यह भी कोई ऐसा अपराध नहीं है जिस पर वह अपने आप को जेल में बैठा ले। ज्यादा से  ज्यादा इस बेशरमी पर लगाम लगा ले। बस ! रही बात सपने में जॉघिया खराब कर लेने की तो इसका भी इलाज है कि ढूंढ-ढांढ कर किसी पेटीकोट वाली इंतजाम कर ले और अपनी जॉघिया की बजाय किसी का पेटीकोट खराब करे।

फिर उसने सोचा कि जरूरी तो नहीं है कि किसी पर लिखने के लिए उसको जीवन में उतार भी लिया जाए। अब जो वह भ्रष्ट या फ्राड लोगों के खिलाफ तमाम लिखता रहता है तो ऐसा तो नहीं है कि उनके बारे में लिखने से पहले उनके ही जैसा हो जाता है। तो क्या जरूरी है कि रजनीश वगैरह पर लिखने के लिए उनके दर्शन को पूरी तरह जिंदगी में उतार ही लिया जाए? माना कि समूचा रजनीश दर्शन इसी पर मुन:सर करता है कि चाहे सेक्स हो या पानी उसको संपूर्णता में पाए बिना या उससे अघाए बिना आप उसके बारे में एथारिटी नही हो सकते है। तो फिर गांधी और लोहिया के बीच विचारों का ही तो वह भक्त है। उनको भी जीवन में वह पूरी तरह कहां उतार पाया है।

या उनको भी उसने पूरा-पूरा पढ़ा या गुना कहां है? और आखिर लेखन के लिए, अपनी बात कहने के लिए यह जरूरी भी नहीं। फिर उसने तय किया कि बहुत सोच चुका इस मसले पर। अब और नहीं सोचेगा। और अब सीधे लिखेगा, “गांधी, लोहिया और रजनीश।”


दयानंद पांडेयइस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए लेखक दयानंद पांडेय की तस्वीर पर क्लिक करें। पार्ट (7) पढ़ने के लिए कुछ दिनों का इंतजार करें।

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