अपने-अपने युद्ध (7)

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संजय अब तक बस से उतर कर अपने घर वाले बस स्टाप पर आ गया था। उसने बस स्टाप वाली पान की गुमटी से सिगरेट की डब्बी खरीदी और एक माचिस भी। हालांकि रस्सी यहां भी जल रही थी। पर पता नहीं क्यों रस्सी से सिगरेट सुलगाने में उसका मजा खराब हो जाता था। माचिस की जलती तीली से सिगरेट सुलगने का जो मजा है वह रस्सी से सुलगाने में कहां है? बल्कि सिगरेट सुलगाने से पहले अपनी सुलग जाती है पर जाने क्यों दिल्ली में तब उसने देखा लगभग हर जगह जलती रस्सी मिलती। हालांकि कहीं-कहीं बिजली के स्विच भी तब शुरू हो गए थे। वह तो और बुरा लगता। सिगरेट! सुलगती सुलगती सिगरेट!! और वह!!! संजय को याद है, पहले पारिवारिक संस्कार के चलते सिगरेट से उसे कितनी घिन थी।

उसने सोचा ही नहीं था कि वह जिंदगी में कभी सिगरेट पी भी सकता है। बहुत बचाया उसने अपने को सिगरेट से। दोस्तों, सहपाठियों की मनुहार, इसरार और जबरदस्ती को लगभग ढकेलता हुआ। पर एक बार एक पुरानी फिल्म 'ममता' में जब उसने अशोक कुमार को तनाव के क्षणों में बार-बार सिगरेट सुलगाते देखा तो उसे मजा आ गया। उसने सोचा कि वह सिगरेट पिए न पिए, एक बार होंठो में दबा कर सुलगाएगा जरूर। 'ममता' फिल्म में सुचित्रा सेन का मोहक अंदाज, दिलकश गीत और अशोक कुमार का सिगरेट सुलगाना, वह आज भी नहीं भूला। जैसे कि विमल रॉय की 'देवदास' फिल्म में दिलीप कुमार का संवाद कि “कौन कमबख्त बर्दाश्त करने के लिए पीता है।” 'महल' सहित और कई फिल्मों में अशोक कुमार ने लगभग वैसे ही तनाव के क्षणों में सिगरेट सुलगाई थी। पर संजय को जाने क्यों 'ममता' फिल्म का ही अशोक कुमार का वह अंदाज भा गया था। हालांकि इस 'ममता' फिल्म में अशोक कुमार बाद में सिगरेट छोड़ पाइप पर आ गए थे। और संजय ने सोचा कि अगर वह सिगरेट पीने लगा तो पाइप भी जरूर पिएगा। बिलकुल अशोक कुमार की तरह।

और सचमुच जब वह फिल्म देख कर हाल से निकला तो उसने तुरंत एक सस्ती सी प्लेन सिगरेट खरीदी। दियासलाई ली। सिगरेट होठों में दबाई। पर चार-पांच तीलियां फूंक चुकने के बाद भी जब वह सिगरेट नहीं सुलगा पाया तो पान वाला भुनभुनाया। होता यह था कि सिगरेट सुलगाते समय वह हड़बड़ी में मुंह से सांस लेने लगता और सिगरेट सुलगने की बजाय तीली बुझ जाती थी। वह तीली पर तीली जब इसी तरह बरबाद करने लगा और पान वाले की भुनभुनाहट बढ़ती गई तो उसने एक दियासलाई भी खरीद ली। पान वाला मुसकुराया, “एक सिगरेट और पूरी माचिस!” और सचमुच जब सिगरेट जैसे-तैसे सुलगी तो उस माचिस की आधी से अधिक तीलियां स्वाहा हो चुकी थीं और सिगरेट की तंबाकू मुंह में घुस कर जबान को बेमजा कर रही थी। सिगरेट उसे पीनी तो थी नहीं, सो सुलगाते ही फेंक दी और पूरी ताकत भर थूका। चाय कि दुकान से पानी लेकर कुल्ला किया। तब जाकर जान में जान आई। फिर महीनों उसके जेहन से सिगरेट गायब रही। बीच जैनेंद्र कुमार के उपन्यास पर आधारित फिल्म 'त्यागपत्र' में उसने प्रताप शर्मा को तनाव भरे क्षणों में जब सिगरेट सुलगाते देखा तो उसे लगा कि अब उसे सिगरेट पीनी ही चाहिए।

और वह सिगरेट पीने लगा। हालांकि उन्हीं दिनों एक रिसर्च आई थी जिसमें शायद बताया गया था कि एक सिगरेट पीने से आदमी की पांच मिनट उम्र कम होती है। सिगरेट के पैकटों पर भी “स्वास्थ्य के लिए खतरनाक” छपने लगा था। संजय ने भी 'हंगरियन डाइजेस्ट' में एक हंगरियन लेखक गीजा हेगेड्स का एक सिगरेट से पांच मिनट उम्र कम होने पर एक बड़ा दिलचस्प लेख पढ़ा। इस लेख में गीजा ने अपने किशोर वय से तंबाकू, सिगरेट और पाइप पीने का हिसाब लगाया था। जिस बेहिसाबी से सिगरेट उन्होंने पी थी उस हिसाब से कोई पच्चीस-तीस साल उनकी उम्र कम हो जानी चाहिए थी। लेख लिखते समय वह सत्तर वर्ष के थे। उनका कहना था, “फिर जियूंगा किसलिए?” फिर उन्होंने तर्क दिए थे कि सिगरेट से ही क्यों? होटल में बेयरा अभद्रता कर दे, आफिस में बॉस या चपरासी अभद्रता कर दे, आपको मिलेट्री में भरती हो जाना पड़े, सड़क पर मोटरों का धुआं, रोज आलू खाने जैसे बहुतेरी चीजें, उन्होंने सोदाहरण गिना दी थीं, जो सिगरेट से कहीं ज्यादा उम्र कम करने वाली उन्होंने बताई थीं। फिर अंत में गीजा सिगरेट पैकटों पर “इंज्यूरियस टू हेल्थ” पर आ गए थे। उनका तर्क था कि अगर आप किसी लड़की से प्यार करते हों और अचानक एक दिन उसके सारे कपड़े उतार डालें और फिर उसकी देह पर लिखा देखें “इंज्यूरियस टू हेल्थ” तो क्या आप रुक जाएंगे? उसे प्यार नहीं करेंगे? और मैं सिगरेट से प्यार करता हूं। सिगरेट बिना जी नहीं सकता। मैं सिगरेट बिना जिंदगी की कल्पना नहीं कर सकता। सिगरेट मेरी जान है। “ऐसे” ही कुछ शब्दों में उन्होंने लेख-समाप्त किया था। संजय को गीजा के ये तर्क इतने भा गए थे कि जब तब वह लोगों से बात-चीत में बताता रहता। उन दिनों संजय कविताएं लिखता था और एक लड़की के प्रेम में मुल्तिला था। पागलपन की हद तक। तबके दिनों का एक फिल्मी गाना “उल्फत में जमाने की हर रस्म को ठुकराओ” वह गुनगुनाता और सिगरेट। चुपके-चुपके।

यह बेहद तनाव भरे दिन थे। सिगरेट पीने से उसका तनाव हरगिज नहीं छंटता था, बल्कि और बढ़ता था। ऐसे रिसर्च भी बाद में आए कि सिगरेट पीने से तनाव बढ़ता है। पर संजय को दरअसल मजा सिगरेट पीने में नहीं, सिगरेट सुलगाने में आता था। उसे लगता था जैसे वह सिगरेट नहीं, खुद को सुलगा रहा है, जमाने की रस्म को पलीता लगा रहा है। उसे तब क्या पता था कि वह खुद को झुलसा रहा है। पलीते पर खुद बैठा हुआ है। तो वह कविता, प्रेम, तनाव और सिगरेट के दिन थे। कवि गोष्ठियों में बैठा-बैठा वह पैकेट पर पैकेट सिगरेट सुलगा डालता था। एक बार जब उसके दोस्त शायर हमदम ने बताया कि वह तीन साढ़े तीन घंटे की गोष्ठी में बीस सिगरेट फूंक गया है। तो उसे ताज्जुब नहीं चिढ़ हुई। उसने हमदम को डपटा, “तो जनाब मेरी सिगरेट गिन रहे थे।”

हमदम उसकी डपट पर सकपका गया और बोला, “नहीं साहब आप बीस सिगरेट और फूंकिए। पर मुझे आपकी सेहत की भी चिंता है।”

“क्यों मेरी सेहत को क्या हुआ ?”

“कुछ नहीं। बस आप सिगरेट फूंकिए।” कहते हुए हमदम ने दो पैकेट सिगरेट और उसकी ओर बढ़ा दिए।

“दियासलाई भी!” बड़ी बेहयाई से संजय ने कहा और तीली जला कर सिगरेट सुलगाने लगा।

हमदम को बिसूरता देख लारी, जो खुद बड़ी सिगरेटें फूंकता रहता था, बोला, “फिक्र मत करो हमदम, ये साला बहुत होशियार है। सिगरेट का धुआं भीतर नहीं ले रहा। देख नहीं रहे, धुआं तो मुंह से ही बाहर फेंक दे रहा है। मुंह से भीतर जाएगा धुआं तब तो फेफड़ा हलाक होगा।”

फिर वह संजय से मुखातिब हुआ, “साले, जब सिगरेट पीने नहीं आती तो क्यों उसकी मैया फक करते हो ?”

“अबे तुमसे किसने कहा कि मैं सिगरेट पीता हूं?” संजय बिफरा।

“तो?”

“मैं तो सिगरेट सिर्फ सुलगाता हूं। और खुद को सुलगते हुए पाता हुं।” संजय भावुक हो रहा था।

“अहा ! क्या बात कह दी। मुकर्रर!”

कहते हुए लारी ने संजय को बाहों में भर लिया। बोला, “जाओ हमदम, तुम नहीं समझोगे।”

और इसी के बाद हमदम ने एक गजल लिखी। जिसका मतला इतना खूबसूरत था कि संजय को आज भी याद है, ‘सर्द लहू है क्या मुसकाऊं-सोच रहा हूं अब बिक जाऊं।’

सुनते ही संजय ने बोला, “बशीर बद्र की छुट्टी।”

पर अफसोस कि हमदम बशीर बद्र की छुट्टी करने के बजाय धीरे-धीरे खुद शायरी से छुट्टी पाने की राह लग गया। अपनी जूनियर इंजीनियरी की नौकरी, पट्टीदारी के मुकदमों, पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझा हमदम शायरी तो नहीं भूला पर चकरघिन्नी बन कर रह गया। शायर के नाम पर लोकल कवि सम्मेलनों और मुशायरों से शुऱुआती तीन चार लोगों में एक नाम उसका भी रहने लगा। वह भी इसलिए कि उसका तरन्नुम अच्छा था। वह कभी कभार तहत में पढ़ने की कोशिश करता भी तो हूट होने लगता। तो दो-तीन शेर ही तहत में पढ़ता और तरन्नुम में शुरू हो जाता। इस हूटिंग के डर से मुशायरों में नज्म करता तो यहां भी टोक दिया जाता, “नहीं, हमदम भाई तरन्नुम में।” वह बेबस हो जाता। बल्कि कवि सम्मेलनों का एक संचालक तो उसे लगभग आदेश देता कि, “फला गजल पढ़िए।” हमदम रिरियाता भी कि, “एक नई गजल कही है” पर संचालक फुंफकारता, “नहीं आप रहने दीजिए। कवि सम्मेलन अभी से नहीं उखाड़ना है। जो कह रहा हूं वही पढ़िए।” और बेचारा वही पुराना रिकार्ड, “मतला अर्ज है,” कह कर बजा देता।

हमदम के साथ एक त्रासदी यह भी थी कि कवि सम्मेलनों या गोष्ठियों में बतौर उर्दू शायर उसका तवारूफ करवाया जाता जब कि नशिस्तों या मुशायरों में हिंदी वाला कहलाया जाता। बाद में उर्दू वालों की इस तंगदिली से अजिज आ कर बाकायदा, “एक हिंदी गजल पेश है।” कहते-कहते वह भी जब-तब सिगरेट सुलगाने लगा। लोगों ने हमदम में एक फर्क और नोट किया। पहले वह मौलानाओं की तरह सिर पर रोएंदार टोपी लगाता था। अब उसके सर से टोपी उतर गई थी। और जैसे उसकी भरपाई में वह टाई बांधने लगा था। टोपी से टाई ! मतलब आसमान से गिर कर खजूर पर। संजय हालांकि उम्र में हमदम से बहुत छोटा था और यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। पर जब हमदम ने सिगरेट सुलगानी शुरू की तब संजय शराबियों की संगत में आ चुका था। पर कैजुअली।

तब यह था कि शराब कैजुअली थी और कविता रेगुलरली। अब यह था कि शराब रेगुलरली थी और कविता कैजुअली! और ऐसा संजय ही नहीं, उसके बहुतेरे साथियों के साथ हो गया था। बल्कि कुछ के साथ तो यह भी हो गया था कि शराब ही शराब जिंदगी थी, कविता तो खंडहर थी, अवशेष थी, मन में कहीं कविता की सिर्फ याद शेष थी। जिंदगी की यह त्रासदी भी संजय के लिए भयावह थी। बहुत भयावह! भयावह ही है दिल्ली की सड़कों से गुजरना। सड़क पार करते समय डी.टी.सी की बस से कुचलते-कुचलते बचा संजय। मौत से बच कर उसने एक सिगरेट सड़क पार करते समय फिर सुलगा ली। और खुद सुलगता रहा। ठीक ऐसे ही एक रात कवि सम्मेलन के बाद वेद नाम के एक कवि ने संजय से कहा था, “क्यों शराब में अपने भीतर के कवि को मार रहे हो?” तो सुलगता हुआ संजय उस पर बरस पड़ा था, “मेरे कवि को शराब नहीं, तुम जैसे भड़वे और गलेबाज मार रहे हैं। जो साले कविता के नाम पर सिर्फ चुटकुलेबाजी, भड़ैती और रही-सही गले बाजी कर रहे हैं। और वही चार ठो चुटकुला, चार ठो गोइयां, सइयां और गोरी, गांव वाला गीत लेकर पूरा देश घूम डाल रहे हैं।”

किसी तरह कुछ लोगों ने संजय को जैसे तैसे चुप कराया। और वह बेचारा वेद “मैंने मां को देखा है, मां का प्यार नहीं देखा।” जैसे गीत फटे गले से गाने वाला, सिर पर पांव रख कर जाने कहां भाग गया। सुबह जब संजय सोकर उठा तो कवियों में अजीब कोहराम मचा हुआ था। पता चला आयोजक-संयोजक कवियों को बिना “पत्रम-पुष्पम्” दिए फरार हो गए हैं और एक कवि जो  नौवों रस की कविता पढ़ने में “सिद्ध” थे, अपने समूचे रौद्र रूप में उपस्थित थे। सांप की मानिंद फुंफकार रहे थे, “तो निकालो स्कूल का मेज कुर्सी। यही बेच कर हम कवि अपना पैसा वसूल लेंगे। पर बिना पैसा लिए हरगिज नहीं जाएंगे।” एक वीर रस के कवि तो अभी से रोने लगे थे, “मुझे तो मात्र मार्ग व्यय पर बुलाया था। और वापस जाने भर का पैसा नहीं है।”

कवि सम्मेलनों में यह और ऐसी ही तमाम नौटंकियों से आजिज आ गया था संजय। वह उठा। नहाया-धोया। बस स्टेशन चल दिया। एक कवि को जिम्मा दे दिया कि, “पैसा मिले तो मेरा भी वसूल लेना।” फिर संजय ने कवि सम्मेलनों में जाना लगभग ठप्प कर दिया। वैसे भी कवि सम्मेलनों में उसके जैसे कवियों की जरूरत नहीं होती थी। फिलर की तरह कब खड़े हुए, कब बैठ गए किसी तरह से एकाध “बहुत अच्छा” “सुंदर” या “क्या बात कही है” जैसे इक्का-दुक्का दाद कभी-कभार मिल जाती थी तो पता चलता था कि कोई तो कविता सुन रहा है, या सुनने का अभिनय ही सही कर तो रहा है। नहीं तो अमूमन होता यही था कि जब कोई नई कविता वाला कवि गलती से माइक पर संचालक बुला लेता तो मंच पर आसीन कवि बड़ी खामोशी से चाय पीने में तल्लीन हो जाते और “होशियार” श्रोता पेशाब करने निकल जाते। उधर आयोजक फुसफुसाते, “किसको बुला लिया?” पर ज्यादातर चालू संचालक इन नई कविता वाले कवियों को साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने वाले जैसे वगैरह-वगैरह जुमलों में कैद कर पेश करते तो श्रद्धावश लोग झेल लेते। किसी तरह।

घर आकर संजय ने सुलगती सिगरेट ऐसे झाड़ी जैसे वह सिगरेट की राख नहीं, कविता की आग झाड़ रहा हो जो कलेजे में कील बन कर मन में कहीं दफन है। कमरे में पहुंच कर पहले उसने थैला खूंटी से लटकाया, चद्दर झाड़ी, झाड़ कर बिछाया और गुटुर मुटुर गठरी की तरह चद्दर ओढ़ कर लेट गया। थक गया था वह। पर इस थकान में भी वह सोच रहा था “गांधी, लोहिया औऱ रजनीश।” वह सोच रहा था कि बुद्ध, महावीर और मीरा, तीनों के बीच जो एक कारुणिक संस्पर्श था, क्या वही संस्पर्श गांधी, लोहिया और रजनीश में भी है? फिर उसने खुद को ही जवाब दिया, संस्पर्श तो है पर कारुणिक नहीं, चेतना का संस्पर्श। तीनों ही चेतना से लैस हैं। एक राजनीतिक चेतना का नायक, दूसरा जन चेतना का नायक और तीसरा मन चेतना का नायक! संजय को सूत्र मिल गया था और स्थापना भी। बस बाकी रह गया था तो सिर्फ लिखना। पर वह एन.एस.डी. की रिपोर्ट का क्या करे? उसने सोचा निदेशक तो आज मिल गए थे पर आत्महत्या वाले मामले पर सिवाय भावुक अभिनय करने के वह कुछ खास बता नहीं पाए। दयानंद पांडेयन ही वह पूछ पाया। निदेशक की भावुकता के आगे वह खुद भी भावुक हो गया। पर ऐसे भावुक होकर रिपोर्टिंग तो नहीं ही होती!


इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए लेखक दयानंद पांडेय की तस्वीर पर क्लिक करें। पार्ट (8) पढ़ने के लिए कुछ दिनों का इंतजार करें।


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