जीवन मोड़नेवाली किताब

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यह किताब युवा मित्र नरेंद्रपाल जी ने दी, कहते हैं, एक सांस में पढ़ना या हाथ में लिया, तो खत्‍म कर छोड़ना, कुछ वैसा ही हुआ। अफसोस भी कि इतनी मशहूर किताब अब तक नहीं पढ़ी। वर्ष 1997 में यह छपी, मेरे हाथ जो संस्‍करण है, वह जनवरी 2006 का है। उस पर दर्ज है कि 11 मिलियन (1.1 करोड़) यह छप चुकी है। यानी 1997 से जनवरी 2006 (लगभग नौ वर्षों में) के बीच एक करोड़ 10 लाख यह छपी। भारत में भी जगह-जगह उपलब्‍ध है। पुस्‍तक का नाम है 'ट्यूजडेज विद मौरी' (मंगलवार मौरी के साथ), लेखक हैं, मिच एलबाम। यह किताब, संस्‍मरण व प्रेरणा से जुड़ी है, लगभग 200 पेजों की छोटी पुस्‍तक। भारतीय कीमत 250 रुपए। अमेरिका में छपी है।

मशहूर प्रकाशक रैंडम हाउस (न्‍यूयार्क) की इकाई ने इसे प्रकाशित किया है। लेखक मिच, अमेरिका के मशहूर खेल पत्रकार है। मौरी, उनके अध्‍यापक थे, पुस्‍तक कवर पर, नाम के ऊपर दर्ज है, जिसका हिंदी आशय है, बेस्‍ट सेलर किताब, जिसने लाखों का जीवन बदल दिया। पुस्‍तक नाम के नीचे लिखा है, एक बूढा इंसान, एक युवा और जीवन के सबसे महत्‍वपूर्ण पाठ, अत्‍यंत मार्मिक, प्रेरक व प्रभावित करने वाली किताब। सही घटना पर आधारित। मौरी प्राध्‍यापक है। मिच उनके छात्र। मौरी, भिन्‍न अध्‍यापक रहे, सो छात्रों से उनका रिश्‍ता अलग रहा, उन्‍हें पढ़ते, भारतीय गुरुकुलों के पढे़ वृतांत या पढ़ाने वाले ऋषितुल्‍य अध्‍यापक बरबस स्‍मृति में उभरते हैं। मौरी के छात्र, मिच पढ़-लिख कर सफल हो जाते हैं। मौरी से जहां वह पढे़, वहां से बहुत दूर उनका कार्यक्षेत्र हो जाता है। अमेरिका के एक छोर पर मौरी, तो दूसरी छोर पर मिच, अपनी सफल दुनिया में रम जाते हैं, अति व्‍यस्‍त, भागदौड़ और काम के दबाव से घिरे। विश्‍वविद्यालय के दिन, मौरी जैसे अध्‍यापक और मित्र पीछे छूट जाते हैं। स्‍मृतियों में जो प्राय: हर एक के जीवन में होता है, पुरानी चीजें पीछें धुंधली या विस्‍मृति के गर्भ में निरंतर वर्तमान की चुनौतियों से घिरे रहना, भविष्‍य के लिए सपने बुनना और जीवन के अतृप्‍त सपनों के ख्‍याल, यही तो इंसान के जीवन का गणित है। मृग मरीचिका जैसी।

मिच आरंभ में ही घटनाक्रम बताते है।

1979, बसंत के दिन। ब्रांडिस विश्‍वविद्यालय (मैसेच्‍युटस अमेरिका) में मिच के छात्र जीवन का अंतिम दिन। वह अपने प्रिय अध्‍यापक मौरी स्‍वार्त्‍तज से विदा लेते हैं। अपने मां-बाप को उनसे मिलाते हैं। मौरी, गले लगाते हैं, मिच को पूछते हैं, भूलोगे तो नहीं? प्रोफेसर मौरी, मिच के मां-बाप से कहते हैं, आपका बेटा स्‍पेशल (अलग, विशिष्‍ट) है।

इस तरह मिच छात्र जीवन छोड़कर, जीवन में प्रवेश करते हैं। आरंभ में वह विफल होते हैं। गायक बनना चाहते हैं, न्‍यूयार्क में बरसों भाग्‍य आजमाते हैं, ठोकरें खाते हैं, पर पहचान नहीं बनती, न आय होती है, फिर पत्रकारिता में डिग्री लेते हैं, फ्लोरिडा चले जाते हैं। वहां एक अखबार में खेल पत्रकार की नौकरी मिलती है। धीरे-धीरे वह देश  में मशहूर खेल स्‍तंभकार-पत्रकार के रूप में कामयाब-स्‍थापित होते हैं। मिच का जीवन बदल जाता है। हर चीज उधार और रेंट (किराए) पर लेकर जीवन चलाने वाले मिच, अब खरीद-फरोख्‍त की भौतिक दुनिया में शामिल हो जाते हैं। पहाड़ी पर सुंदर घर। तरह-तरह की कारों की भरमार, शेयरों में निवेश, भागदौड़, अति व्‍यस्‍तता। चुस्‍त रहने के लिए कसरत-तैरना। कल्‍पना से परे अप्रत्‍याशित पैसे की आमद। जेनी नामक खूबसूरत युवती से प्‍यार। विवाह। जीवन, कल्‍पना से भी सुंदर। पर भागमभाग और व्‍यस्‍तता अलग। मिच कहते हैं कि उपलब्धियां पाने, सपने साकार करने में डूब गया था। इसी भौतिक सफलता से वह जीवन आंकने लगे। पर कभी-कभी अपने प्रिय प्रोफेसर मौरी की याद आती। 'मानवीय होना', दूसरे से जीवंत आत्‍मीय संबंध-सरोकार रखना जैसी उनकी बातें स्‍मृति में कौंधती। भौतिक सुख, ऐश्‍वर्य और भोग के चरम पर अतीत की बातें उभरती। मिच कहते हैं, विश्‍वविद्यालय से संपर्क टूट चुका था। विश्‍वविद्यालय के वे साथी, सपने विस्‍मृत हो चुके थे, जिन्‍हें न भूलने की कसमें विद्यार्थी जीवन में खाई थी। पुराने पते, फोन नंबर, पहला प्‍यार सब अतीत के गर्भ में दफन थे। बीती बातें। बिसरी बातें।

तभी मार्च 1995 में एक मशहूर टीवी चैनल में उसके प्रख्‍यात संचालक का एक प्रोग्राम आया। प्रोफेसर मौरी पर। लगभग 16 वर्षों तक मिच अपने प्रिय प्रोफेसर को एक टीवी कार्यक्रम में देख रहे थे। प्रोफेसर मौरी, व्‍हीलचेर में बैठे थे। पैर तोपे हुए। दोनों पैर 'डेड' (सुन्‍न) हो चुके थे। अब वह कभी चल नहीं सकते थे। 1994 की गरमी में प्रोफेसर मौरी को पता चला कि उन्‍हें असाध्‍य रोग (एएलएस) हो चुका है। लाइलाज। डाक्‍टरों ने उन्‍हें बहुत कम वक्‍त दिया। यह रोग मोमबत्‍ती की तरह है। जैसे-जैसे मोमबत्‍ती जलती है, मोम पिघलता है। उसी तरह यह रोग नसों को, शिराओं को हड्डियों को जलाता जाता है। चूर करता, भूसा बनाता। इस तरह अंग सुन्‍न हो जाते हैं, फिर डेड। पैरों से शुरू होकर यह सिर तक पसरता है। रोग की सूचना पाकर प्रोफेसर मौरी स्‍तब्‍ध हो जाते हैं। उस क्षण उन्‍हें लगता है कि यह दुनिया मेरे लिए ठहर गई, उजड़ गई जैसी लगती है। पर सब कुछ सामान्‍य है, दूसरों के लिए। अंतत: वह तय करते हैं, जो समय भी जीवन ने उन्‍हें बख्‍शा है, उसका वह सर्वश्रेष्‍ठ उपयोग करेंगे, जीवन और मौत के बीच के अंतिम पुल पर शानदार तरीके से जीने का उनका फैसला था।

पीड़ा के साथ, असह्य वेदना के बीच, अपनी ही सुन्‍न पड़ते-मरते अंगों के साथ, छीजती आवाज, शरीर पर खत्‍म होता नियंत्रण, पर शानदार आत्‍मबल-संकल्‍प। बिना डिप्रेस हुए या बिना दया या याचना का पात्र बने। न दैन्‍यं, न पलायनम् का मानस। मौत से जीवंतता से मुठभेड़। मौत की गोद में बैठे प्रोफेसर मौरी का यह संकल्‍प ही लोगों-समाज के लिए उत्‍सुकता का विषय बनता है। यह टीवी पर दिखाया जाता है। दूर बैठै मिच यह देखकर हिल जाते हैं। मिच, जिनका जीवन भागमभाग-व्‍यस्‍तता का पर्याय बन गया था। एक सफल मीडियामैन या पत्रकार होने के कारण, वह मुहावरे में कहते भी हैं, 'मैं पांच चीजें साथ-साथ करने का अभ्‍यस्‍त हो गया था।' पर 16 वर्षों बाद यह दृश्‍य देखकर सन्‍न हो गया। मिच प्रोफेसर मौरी से मिलने गए। लंबे अंतराल के बाद, दोनों के मिलने का दृश्‍य मार्मिक है।

प्रो. मौरी के जीवन के दिन गिने-चुने हैं। मिच हर मंगलवार को उनसे मिलने का तय करते हैं। इसलिए पुस्‍तक का नाम है 'ट्यूजडेज विद मौरी'। यह तय होता है कि दोनों जीवन के किन-किन पहलुओं पर संवाद या बातचीत करेंगे? मृत्‍यु की दहलीज पर बैठे एक दृष्टिवान प्रोफेसर, कैसे जीवन के अनेक जटिल प्रसंगों को देखता है, उसका प्रिय छात्र उससे जीवन के अनेक अनजाने पहलुओं पर सवाल करता है, दोनों के बीच यह बातचीत ही पुस्‍तक का विषय (कंटेंट) है। इस शिक्षक-छात्र, संवाद में परीक्षा नहीं है, जीवन के मूल सवालों से दरस-परस है। मरने के एकाध दिन पहले तक। संवाद की पुस्‍तक। पर संवाद ऐसे जो इस संसार में रमे हरेक को पढ़ना-गुनना-जानना चाहिए। चौदह मंगलवार दोनों के बीच संवाद होते हैं। चौदहवें मंगलवार के अध्‍याय का नाम है, 'वी से गुड बाइ' (हम अलविदा कहते है)। पहले मंगलवार को संसार क्‍या है, पर बातचीत, फिर क्रमश: आत्‍मदुख, पश्‍चाताप, मृत्‍यु, परिवार, भावनाएं, बूढे़ होने का भय, धन-संपदा, प्रेम, विवाह, हमारी संस्‍कृति, क्षमा, श्रेष्‍ठ दिन, विषयों पर संवाद होता है। मिच के लिखने की कला मन छूनेवाली है। पृष्‍ठभूमि में वह कालेज के दिनों की याद करते हैं। तबके अपने प्रोफेसर का प्रसंग सुनाते हैं। फिर यह संवाद। हर विषय पर यह बातचीत छोटी ही है, पर एक-एक शब्‍द मन को स्‍पर्श  करते हैं, बेचैन करते हैं, जीवन क्‍यों, कैसे और किसलिए पर मंथन।

मृत्‍युशय्या पर हैं प्रो. मौरी। वह कहते हैं। आप जानते हैं कि यह संसार नश्‍वर है। आप मरने के लिए ही पैदा हुए हैं। इसलिए हर-क्षण आपको तैयार रहना चाहिए। यह पढ़ते हुए कबीर याद आते हैं। जब वह कहते है, कल करना है, उसे आज ही कर लो, पता नहीं कब मौत आ जाए? यक्ष-युधिष्ठिर संवाद भी स्‍मरण हो आता है। यक्ष पूछता है, जीवन का सबसे बड़ा आश्‍चर्य क्‍या है? युधिष्ठिर कहते, हम रोज कंधों पर शव लेकर श्मशान जाते हैं, पर यह नहीं सोचते कि मेरा भी यही हश्र  होना है। प्रो मौरी कहते हैं, एक बार आप मरना सीख लें, तब आप जीने की कला भी जान जाएंगे। फिर वह एक बौद्ध प्रसंग सुनाते हैं। रोज एक छोटी चिड़िया इस धर्म के अनुयायियों के कंधे पर बैठती है। फिर बोलती है, 'आज का यह दिन ही, कहीं वह अंतिम दिन तो नहीं है? क्‍या मैं इसके लिए तैयार हूं, जो भी मुझे इस अंतिम पहर करना है, मैं कर रहा हूं? जैसा इंसान बनना चाहता हूं, वैसा बना हूं।'

यह एक प्रतीक या संकेत कथा है, पर कितना अर्थपूर्ण, संसार का हर इंसान, रोज अपने कंधे पर बैठी इस छोटी (प्रतीक) चिड़िया से यह संवाद सुने-गुने तो कितना बड़ा परिवर्तन हो सकता हैं? भौतिक संपदा को ही जीवन मानने वाले अमरीकी समाज को प्रो. मौरी आध्‍यात्मिक विकास की बात बताते हैं। प्रकृति, पेड़-पौधों, संबंधों और ब्रह्मांड का उल्‍लेख करते हैं। वह कहते हैं बिना परिवार के हम पंखविहीन या पंख नुचे चिड़िया की तरह हैं। जहां टूटते परिवार-बिखरते परिवार से सामाजिक संकट बढ़ा है, उस देश में प्रो. मौरी परिवार का महत्‍व बताते हैं, तो भारतीय समाज याद आता है। वह कहते हैं, बेचैन इंसान को 'मनी, फेम, वर्क' (पैसा, ख्‍याति और काम) सुख-चैन नहीं दे सकते। वह इंसान के 'डिटैच' (तटस्‍थ) होकर जीने की बात कहते हैं, तो गीता के अंश याद आते हैं। फिर डर, भय, घृणा, खुशी, संतोष और द्वेष पर नि:संग होकर चर्चा करते हैं।

यह पुस्‍तक पढ़ते हुए जगह-जगह नचिकेता-यम संवाद याद आता है। दशकों पहले देखी 'मिली', 'आनंद', 'सफर' और 'सत्‍यकाम' जैसी फिल्‍में भी स्‍मृति पटल पर उभरती हैं, लगता है यह पुस्‍तक हर इंसान पढे़ तो वह पाखंड, पाप और छल-छदम से खुद को अलग करेगा, क्‍योंकि जीवन का आईना दिखाती है यह किताब। सचमुच एक प्राध्‍यापक कितना बड़ा परिवर्तन कर सकता है, यह पुस्‍तक इसका प्रमाण है। पश्चिम के जिस संसार को हम भौतिक, आत्‍मकेंद्रित, भोगग्रस्‍त, बिखरते मानवीय संबंधों और हरिवंशटूटते परिवारों की दुनिया के रूप में देखते हैं, उसी समाज में यह किताब करोड़ों में बिकी। भारत का जो समाज, पश्चिम के रास्‍ते है, क्‍या वह भी इससे सीखेगा?   


लेखक हरिवंश देश के प्रमुख हिंदी अखबारों में से एक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. नई किताबों पर उनका नियमित कालम प्रभात खबर में 'शब्द संसार' नामक स्तंभ में प्रकाशित होता है. वहीं से साभार लेकर इस आलेख को भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित किया जा रहा है. हरिवंश जी से संपर्क के लिए This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it का सहारा ले सकते हैं.


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