अपने-अपने युद्ध (8)

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दूसरे दिन वह फोन पर लगातार जूझा रहा। एन.एस.डी. के ट्रस्टी और चेयरमैन डॉ. सिंघवी जो उन दिनों सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील थे, से मिलने के लिए। तीन चार फोन के बाद बड़ी मुश्किल से वह फोन पर आए और उससे भी ज्यादा मुश्किल से वह तीन दिन बाद सिर्फ पांच से सात मिनट का समय देने पर राजी हुए। इतनी तो किसी मंत्री से भी आज तक संजय को मिलनें में दिक्कत पेश नहीं आई। गनीमत उसने आत्महत्या वाले इशू का जिक्र नहीं किया वरना यह निश्चित ही समय देने पर राजी नहीं होते। तीन रोज बाद तय समय से दस मिनट पहले ही डॉ. सिघवी के साऊथ एक्सटेंशन वाले मकान पर जब संजय पहुंचा तो देखा कुछ जूनियर वकील और कुछ मुवक्किल पहले ही से बैठे थे। उसने डॉ. सिंघवी के पी.ए. को बता दिया कि वह आ गया है। फिर जब वह सिंघवी से बात कर बाहर आया तो पाया कि पांच सात मिनट की जगह वह डॉ सिंघवी का पूरा-पूरा पैंतालिस मिनट खा गया है। डॉ सिंघवी पेशेवर वकील ठहरे। और संजय पेशेवर पत्रकार। पांच मिनट की तय मुलाकात को वह पैंतालिस मिनट में बदल तो ले गया।

पर बहुत घेरने पर भी सिंघवी ठीक से खुले नहीं। एकाधिक बार खुलते-खुलते रह गए। आंय-बांय-सांय- सिंघवी की यह पूरी बातचीत 'देखेंगे, सोचेंगे' जैसे टरकाऊ जवाबों से भरी पड़ी थी। “काम” की बात सिर्फ एक लाइन की थी कि “आत्महत्या के मद्देनजर जांच बैठाएंगे।” बिलकुल सरकारी किस्म का जवाब। जो संजय के काम का एकदम नहीं था। शुरू में तो चेयरमैन साहब ने एन.एस.डी. में छात्र आत्महत्या कर रहे हैं, तथ्य से ही अनभिज्ञता जाहिर की। बहुत कुरेदने पर वह 'पता करेंगे' पर आए और फिर “जरूरी हुआ तो जांच बिठाएंगे” जवाब पर आ गए।

यही हाल भारत सरकार में सांस्कृतिक कार्य विभाग की संयुक्त सचिव कपिला वात्स्यायन का भी रहा। संजय बोर हो गया। तिस पर सुप्रीम कोर्ट के वकील साहब ने संपादक को फोन करके शिकायत भी कर दी कि, “आपका रिपोर्टर आकर पांच मिनट के बजाय मेरे पैंतालिस मिनट खा गया। कहिए तो बिल भेज दूं। पचीस हजार का?”

कहिए तो बिल भेज दूं। पचीस हजार का?''संपादक ने जब यह शिकायत सर्द और सख्त आवाज में संजय को बताई तो वह और कुढ़ गया। फिर उसने एक सर्रे की रिपोर्ट लिख डाली जिसका लब्बोलबाब यह था कि एन.एस.डी. में छात्रों की आत्महत्या का मुख्य कारण वहां पढ़ाने वाले अध्यापकों की आपसी राजनीति थी जिसमें सबके सब निदेशक की कुर्सी पर बैठने के जुगाड़ में सनके हुए थे। दूसरे, निदेशक की कमजोर पकड़, हास्टल के एक-एक कमरे में कई-कई छात्रों का एक साथ रहना, लड़कियों जैसी कई और रूटीन सिलसिलों का जिक्र तो था ही। छात्रों, निदेशक, चेयरमैन से बातचीत, एन.एस.डी. का इतिहास, एन.एस.डी. का वर्तमान माहौल आदि पर तीन चार बाक्स आइटम भी संजय ने सर्रे से लिख कर संपादक को थमा दिया। रिपोर्ट में अल्काजी के निदेशक करते हुए एन.एस.डी. के स्वर्णिम काल, कारंत के रिजिम में एन.एस.डी. के बिखरने की कथा और अब एन.एस.डी. की ऐसी तैसी होने की कथा, भविष्य में बेकारी का भय आदि भी डिटेल्ड में संजय ने लिखा। और यह भी रेखांकित किया कि रंगकर्म पढ़ने वाले छात्र इतना तनाव क्यों जीते हैं?

संपादक ने सारी सामग्री पढ़ी। और कहा कि, ''स्टोरी तो बहुत अच्छी है पर इसे छापेंगे कहां? जगह कहां है इतनी? थोड़ी क्या चौथाई छोटी कर दो।'' सुन कर संजय का दिमाग खराब हो गया। उसने सहायक संपादक से कहा भी कि, "नार्थ एवेन्यू, साउथ एवेन्यू, सेंट्रल हाल, तुगलक रोड़, पंडारा, पटेल, जनपथ वगैरह मार्गों से रत्ती भर के लाए हुए सच में कुंटल भर का गप्प मिला कर लिखी रिपोर्टें ही आप लोगों को क्यों भाती है? मेरी समझ में आज तक नहीं आया।" और वह पैर पटकता हुए चौधरी चरण सिंह से इंटरव्यू लेने तुगलक रोड़ चल दिया। चौधरी के यहां गया तो तय समय के बावजूद उसे बाहर ही बैठा दिया गया। थोड़ी देर ऊबने के बाद वह चहलकदमी करने लगा। चलते-चलते वह चौधरी के कमरे की ओर बढ़ गया तो देखा चौधरी कुर्सी पर बैठे हैं। और नीचे एक तरफ मुलायम तो दूसरी तरफ मालवीय बैठे हैं। तो उसका दिमाग और खराब हुआ।

ज्यादा दिमाग खराब होता उसके पहले ही उसे बुलाया गया। वह इंटरव्यू ले ही रहा था कि चौधरी के चुनाव क्षेत्र बागपत से कुछ लोग आ गए। चौधरी उन सबसे मुखातिब हो गए। अजीब-अजीब सवाल थे उनके और अजीब मांगें। पर सब पर चमचई की चाशनी लिपटी हुई। इतनी कि संजय को उबकाई आने लगी। इसी बीच एक आदमी उठ कर खड़ा हो गया। बोला, "चौधरी मुझे कुछ नहीं तुम एक टेलीफोन दे दो। बस!" "तू टेलीफोन क्या करेगा?" चौधरी ने मुसकुरा कर पूछा।

"बड़े काम का है जी।" वह ठसक के साथ बोला, "पिछली बार जब मैं आया था तो देखा कि तुमने जो भी काम हुआ, टेलीफोन उठाया , कहा और काम हो गया। तो हमको भी टेलीफोन चाहिए-चाहिए। मैं भी टेलीफोन उठाऊंगा बोल दूंगा, खेत को पानी दो, खेत को खाद दो, गन्ने की पर्ची दो। सब काम बैठे-बैठे!" सुनते ही सबके सब उसके भोलेपन पर हंस पड़े। स्पष्ट था कि वह सहज ही बोल रहा था, व्यंग में नहीं। संजय ने चौधरी के इंटरव्यू के साथ ही इस घटना को भी बाक्स आइटम बना के खोंस दिया। एक बाक्स आइटम उसने और लिखा चौधरी की अक्खड़ई, जिद और मौका-परस्ती पर। जिसे संपादक ने देखते ही रिजेक्ट कर दिया। और कहा कि जानते हो, "वह प्रधानमंत्री रह चुके हैं। इससे उनकी छवि खराब होगी।" संजय ने प्रतिवाद भी किया, "पर है तो सच। और पाठकों को अपने नेता के बारे में जानने का हक है।" उसने सकुचाते हुए जोड़ा, "और पीस भी अच्छा बन पड़ा है।"

"अच्छा तो है। कवर स्टोरी लायक है। पर है टोटल डिफरमेटरी। मैं नहीं छाप सकता।"

बेचारी हिंदी पत्रकारिता! हुंह!

कभी-कभी उसे शरम आती इस पत्रकारिता पर और सोचता कि वह पत्रकारिता करता क्यों है? अभी यही आइटम जो कहीं टाइम, न्यूजवीक या देश के ही किसी अंग्रेजी अखबार, पत्रिका में छपा होता तो कोई डिफरमेशन नहीं होता और पचा लिया जाता हिंदी अखबरों, पत्रिकाओं में। अंग्रेजी अखबरों के जूठन पर पल रही हिंदी पत्रकारिता की दुर्गति उसे बहुत आहत करती। पर उसके सामने सिवाय खीझने के कोई चारा नहीं था। क्योंकि हिंदी पत्रकारिता के सारे घाघ और महारथी बिना अंग्रेजी का कचरा चाटे हिंदी पत्रकारिता का भविष्य अंधकारमय पाते। सो अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद। यही रही, यही है और शायद यही रहेगी हिंदी पत्रकारिता।

देश के बाहर की हदों से आने वाली खबरों का एक बार अनुवाद फिर भी समझ में आता है। पर देश में ही घट रही घटनाओं के लिए भी अंग्रेजी से अनुवाद पर शरम आती। चलिए अगर किस्सा दक्षिण भारत, आसाम वगैरह का है तो भी एक बार दिल कड़ा कर अंग्रेजी का थूक घोंट लिया पर ऐन दिल्ली में जब सीमापुरी की किसी झुग्गी बस्ती में आग लगती है तो उसकी रिपोर्ट भी पहले अंग्रेजी में लिखवा कर हिंदी में अनुवाद करवाने की हिंदी संपादकों की शेखी पर वह सनक उठता। क्या हिंदी रिपोर्टर इतने घटिया हैं? और यही काम जब एक लोहियावादी संपादक ने जो देश भर में हिंदी के हक की लड़ाई में अगवा बने फिरते थे, को करते संजय ने देखा तो बउरा गया। पर उसके हाथ में कुछ था नहीं। उसका मन करता कि ऐसे ढोंगी संपादकों, पत्रकारों को अंग्रेजी कतरनों की जूठन चाहिए-चाहिए थी। बिना अंग्रेजी कतरन के भाई लोग हिंदी फिल्मों के बारे में भी लिख नहीं पाते थे। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश की घटनाओं पर भी अंग्रेजी का उथला ही हिंदी अखबारों के संपादकीय पृष्ठों पर भी जब वह छपा पाता तो शर्म की सीमा टूट जाती। दिन भर वह उस अखबार के संपादक की ऐसी तैसी करता घूमता। पर होना क्या था? लोग उसे ही क्रेक बता देते। हिंदी पत्रकारिता की समूची दुनिया ही जब अंग्रेजी अनुवाद पर टिकी थी तो कोई कर भी क्या सकता था?

ऐसे में वह पराड़कर जैसे लोगों को सबसे बड़ा दोषी पाता। जो कि लोग खुशी-खुशी हिंदी पत्रकारिता के पिता मह बन कर मर गए। पर हिंदी पत्रकारिता को कुपोषण, दरिद्रता और हीनता के गलियारों में बेमौत मरने के लिए बिना रीढ़ के छोड़ गए। रीढ़ चूंकि नहीं है सो खड़ी भी कैसे होती भला हिंदी पत्रकारिता। रेंगती अभिशप्त अश्वत्थामा की  जिंदगी जीती हिंदी पत्रकारिता की विवशता वह दिल्ली ही आकर ठीक-ठाक जान पाया। पत्रकारिता के नाम पर एक तरफ दलाली करने वाले रिपोर्टरों की फौज थी तो दूसरी तरफ अंग्रेजी से हिंदी में उड़ाने वाले डेस्क वालों की फौज। दोनों ही फौज तलवा चाटने में प्रवीण! तीसरी तरफ नेताओं, उद्योगपतियों और दूतावासों को एक साथ साधने और सहलाने वाले संपादकों की टुकड़ी। संजय इनमें कहीं भी अपने को फिट नहीं पाता था। संजय जैसे मुट्ठी भर कुछ और पत्रकार भी थे। पर सब लाचार, नौकरी की विवशता में समाए हुए। उनकी हालत जरा सी रोटी के लालच में चूहेदानी में कैद उस चूहे सरीखी थी कि भीतर कैद और चूहेदानी से बाहर होते ही कुत्ते बिल्लियों द्वारा गट हो जाने का डर। सो सब चुप ही रहते। पर संजय अगिआता रहता, बकबकाता रहता। एक बार उसके बकबकाने को लेकर काफी हाउस में जैसे बहस चल पड़ी। अपने को वरिष्ठ मानने वाले पत्रकार ने कहा, "असंतुष्ट है।" इस पर संजय ने प्रतिवाद के अंदाज में कहा, "क्या?" तो वह फिर उसी तरह तौल-तौल कर बोले, "नहीं। नाराज होने की जरूरत नहीं। असंतुष्ट होना प्रगती की निशानी है।" उन्होंने जैसे उसे संतुष्ट करने की कोशिश की, "आप अगर अपनी वर्तमान स्थिति से असंतुष्ट हैं तो इसका मतलब बिलकुल साफ है कि आप आगे और बेहतरी चाहते हैं, तरक्की चाहते हैं।"

"पर मैं देख रहा हूं कि अगर इसी तरह यह प्रगति की राह पर चलता रहा तो मुझे डर है कि योगेश का कॉपी राइट यह छीन लेगा।" एक पी.आर.ओ. जो कभी कभार कहानियां लिख कर कहानीकार होने का दम भरता था बीच में मजा लेता हुआ बोला तो उस वरिष्ठ कम गरिष्ठ पत्रकार ने बड़ा संयत होकर पूछा, "योगेश का कॉपीराइट? मींस?"

"परेशानी!" पी.आर.ओ. उछल कर बोला, "अभी तक तो परेशानी का कॉपीराइट हम लोगों ने योगेश को ही दे रखा है। अब संजय उससे छिन ले तो बात और है।"

संजय डर गया। यह बातें सुन कर। वह योगेश की जिंदगी नही जीना चाहता था। दुबले पतले, सांवले चेहरे पर चेचक के दाग लिए योगेश खुद तो कहानीकार थे। पर अपने बच्चों को ठीक से पढ़ा नहीं पाए। उनके दो बेटे कंपोजिटर हो गए थे। और जवान बेटी शादी के इंतजार में एक प्राइवेट फर्म में दिहाड़ी पर टाइपिस्ट। योगेश खुद प्रकाशकों के यहां चक्कर काट-काट कभी प्रूफ तो कभी कॉपी एडिटिंग का काम जुगाड़ते रहते। और जब तब क्या अक्सर बात-बेबात झगड़ पड़ते! उनको देखते ही लगता वह आदमी नहीं परेशानी का ढांचा हों। उनके घर की हालत ऐसी थी कि जाकर अपराधबोध होता था। पर योगेश के स्वभाव में अक्खड़ई, स्वाभिमान और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हरदम लड़ते रहने, कभी न झुकने की प्रवृत्ति कूट-कूट कर भरी थी। घर में लंबी बीमारी भुगत रही पत्नी की दवा के लिए वह दिन रात प्रूफ पढ़ते जगते रहते। पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि उन्होंने किसी से कभी एक पैसा उधार मांगा हो। पैसा नहीं रहा तो दवा नहीं लाए। हफ्ते दस दिन बिना दवा के गुजर जाते। पर वह किसी के सामने अपनी विवशता, लाचारी नही उच्चारते। वह तो व्यवस्था, तंत्र और लोगों की मोनोपोली, टुच्चई और नपुंसकता से परेशान रहते। लोगों के तलुवे चाटने की कला से परेशान रहते। क्षण में कुछ, क्षण में कुछ जाने वाले मौकापरस्तों से परेशान रहते। वह बेवजह भी परेशान रहते। बात-बेबात परेशान हो जाते। क्योंकि वह सचमुच परेशान थे। काफी हाउस में इसीलिए  "परेशानी" का कॉपीराइट योगेश के पास सुरक्षित कर दिया गया था। हालां कि वहां आने वाला को न साला परेशान नहीं था।

पर सब साले अपनी परेशानी गांड़ में घुसा कर चेहरे पर मस्ती टांक, जबान में चाशनी घोल लेते थे। सबमें और योगेश में फर्क यह था कि योगेश परेशानी को गांड़ में घुसाने के बजाय चेहरे और जबान पर टांक कर घूमते थे। संजय ने उस दिन पक्के तौर पर सोच लिया कि कल से क्या अबसे और अभी से वह भी अपनी परेशानी, अपनी जद्दोजहद और सारी दिक्कत और सब बुद्धिजीवियों की तरह गांड़ में घुसेड़ कर घूमेगा। योगेश की जिंदगी वह नहीं जिएगा। नहीं जी सकता योगेश की जिंदगी। उसमें न तो इतना धैर्य है, न हिम्मत, न ही व्यवस्था को बदलने की हिमाकत। इसलिए  परेशानी का कॉपीराइट लेकर जीने के लिए यह पैदा नहीं हुआ है। यह सब कुछ जैसे अदृश्य सिनेमा रील की तरह एक झटके में संजय के दिमाग में घूम गया था। उसने सोचा उफ दिल्ली! और दिल्ली का दंश!

उधर भेड़िया का मंचन खत्म हो गया था। थोड़े से जो लोग नाटक देखने आए थे वापस जाने लगे। पहली कहानी की अपेक्षा यह भेड़िया कहानी कहीं ज्यादा बोझिल और प्रस्तुति ढीली थी। सो सब लोग अनमनस्क से थे। संजय भी देवेंन्द्र से यह कह कर कि, "अच्छा कल यहीं मिलते हैं!" कह कर चलने लगा।

"ठीक है।" कह कर देवेंन्द्र हलका सा मुसकुराए। उसे लगा जैसे कि देवेंन्द्र की किसी उम्मीद पर वह पानी फेर रहा था। शायद वह उम्मीद कर रहे थे कि संजय उनसे इंटरव्यू के लिए कहेगा। पर उसने नहीं कहा। कहता भी किस लिए? जब कि इन दिनों बेकारी भुगत रहा था और किसी अखबार में लिख नहीं रहा था। इसका अफसोस संजय को भी बेहद हुआ। कि वह देवेंन्द्र से इंटरव्यू तो नहीं ले रहा। उनके नाटकों की समीक्षा भी वह आज नहीं लिखेगा।

और वही हुआ जिसका कि उसे अंदेशा था। दूसरे दिन सुबह हेमा के चाचा विजय जिस अखबार में काम करते थे वहां समीक्षा छपी ही नहीं थी। संजय जानता था कि यही होगा। क्योंकि उसे वहां के लोगों की अतिशय क्षुद्रता के बारे में पता था। नाटक या उसके वजन से उन्हें कुछ लेना देना था नहीं। टारगेट तो यह रहा होगा कि विजय की भतीजी का नाटक है सो काटो। और विजय इतने संकोची कि न कुछ कर पाए होंगे, न कुछ कह पाए होंगे। एक अंग्रेजी अखबार में सिर्फ फोटो से काम चला दिया गया था। और एक हिंदी अखबार में "समीक्षा" देख उसने सिर पीट लिया। नाटक की समीक्षा तो खैर नदारत थी ही रिपोर्ट के नाम पर भी इतने मरे, इतने घायल अंदाज में। पहले पैरे में फला की ओर फला नाटक हुआ। दूसरे और तीसरे पैरे में नाटक की कहानी यह है। चौथे पैरे में फला का काम बहुत अच्छा था, फला फला का खराब। ध्वनि, प्रकाश उत्तम। निर्देशन कसा हुआ। समीक्षा खत्म! तिस पर निर्देशक देवेंन्द्र का नाम भी गलत छपा था। पढ़ कर उसे खीझ भी हुई और शरम भी आई। इसके सिवा वह कर भी क्या सकता था। दयानंद पांडेयअलबत्ता वह हमेशा की तरह सोच सकता था। और उसने सोचा कि यह गदहपचीसी समीक्षा न ही छपी होती तो अच्छा होता। और अखबार सिराहने रख यह चुपचाप आंखें मूंद लेट गया।


इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए लेखक दयानंद पांडेय की तस्वीर पर क्लिक करें। पार्ट (9) पढ़ने के लिए कुछ दिनों का इंतजार करें।


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