15 पत्रकार : आंखों देखी : दहशत के 60 घंटे

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लोकार्पण : बाएं से- भुवेन्द्र त्यागी, वाई.पी. सिंह, आभा सिंह, विश्वनाथ सचदेव, शचीन्द्र त्रिपाठी

मृत्युंजर बोस व प्रशांत सावंत (सकाल टाइम्स), रेशमा शिवडेकर (महाराष्ट्र टाइम्स), सुनील मेहरोत्रा (नवभारत टाइम्स), श्रीराम वेर्णेकर व उमा कदम (टाइम्स ऑफ इंडिया), जयप्रकाश सिंह व ललित छाजेड (आईबीएन 7), सचिन चौधरी (इंडिया टीवी), सरोजिनी श्रीहर्ष (सहारा समय), सुबोध मिश्रा (स्टार न्यूज), विवेक कुमार भट्ट व राजू इनामदार (आज तक) और विद्या मिश्रा (हैडलाइंस टुडे)।

गिनाए गए ये नाम हैं हिंदी, अंग्रेजी और मराठी के पत्रकारों के। कुछ प्रिंट तो कुछ इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार। इन पत्रकारों ने पिछले साल मुंबई पर आतंकी हमले के दौरान मौके पर मौजूद रहकर, जान जोखिम में डालकर रिपोर्टिंग की। इन पत्रकारों ने अपने अनुभवों को अलग से लिखा है। इनके लिखे को 'नवभारत टाइम्स' के मुख्य उपसंपादक भुवेंद्र त्यागी ने संपादित कर एक जगह संजोया। इन 15 पत्रकारों के 26/11 के कवरेज की आंखों देखी को संयोजित कर जो नाम दिया गया है, वह भी है 'आंखों देखी'।  'आंखों देखी' के प्रस्तावना लेखक संजय सिंह (रेजिडेंड एडिटर, न्यूज एक्स) हैं।

'आंखों देखी' के संपादन-संयोजन के साथ-साथ भुवेंद्र त्यागी ने 26/11 के बारे में एक अन्य किताब में काफी कुछ बयान किया है। नाम है 'दहशत के 60 घंटे'। इस किताब में भुवेन्द्र त्यागी ने 26/11 के आतंकी हमले की पूरी दास्तान 14 अध्यायों ....सबसे बड़ा हमला, सीएसटी और कामा पर कहर, दो टैक्सियों के धमाके, ताज की त्रासदी, ट्राइडेंट की टीस, नरीमन हाउस के जख्म, आंखों में आंसू और सीने में गम, फिर गर्व से सिर उठाया, गौरवशाली अतीत, शौर्य को सलाम, जो शहीद हुए, कहर का सफर, कहां हुई चूक तथा बाद में जो हुआ... में कही हैं। इसमें 29 अगस्त, 2009 तक का घटनाक्रम है।

वाईपी सिंह बोले- राम प्रधान कमेटी ने 26/11 के हमलों की अधूरी जांच की : भुवेन्द्र त्यागी की 26/11 पर लिखी दोनों पुस्तकों 'दहशत के साठ घंटे' और 'आंखों देखी' का विमोचन समारोह का आयोजन किया गया मुम्बई के केसी कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज के ऑडिटोरियम में। इस समारोह के मुख्य अतिथि थे पूर्व आईपीएस अफसर वाईपी सिंह। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि 26 नवम्बर, 2008 के आतंकी हमले के बाद जिस राम प्रधान कमेटी का गठन किया गया था, उसने बुलेट प्रूफ जैकेट मामले में कोई जांच नहीं की। मुम्बई पुलिस का एक आला अफसर शहीद होता है और उसके शरीर से गोली लगी बुलेटप्रूफ जैकेट उतार ली जाती है। इसकी जांच करने के लिए एक कमेटी गठित होती है और वह मामले को दरकिनार कर देती है। सरकारें हमेशा से लोगों को झांसा देती हैं।

श्री सिंह के मुताबिक जिस राज्य के पुलिस महानिदेशक को हाईकोर्ट गैर-कानूनी तरीके से पद पर बने रहने के आरोप में पदच्युत करती है, उस राज्य की सुरक्षा व्यवस्था की क्या चर्चा करें? इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए इंडियन पोस्टल सर्विस की अधिकारी और लीड इंडिया कांटेस्ट की फाइनलिस्ट आभा सिंह ने कहा कि साठ घंटे तक चले आतंक के इस कृत्य के पीछे व्यवस्था में कहीं न कहीं अव्यवस्था छिपी है। उन्होंने यह मुद्दा उठाया कि ताकतवर सरकारी तंत्र ऐसे हालात में इतना असहाय क्यों नजर आता है।

लोकार्पण समारोह में मौजूद लोग

लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए 'नवभारत टाइम्स' के संपादक शचीन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकारों को आम होते हुए भी खास बनना पड़ता है। उन्हें जरूरत होती है आम आदमी से एक कदम आगे बढ़कर सोचने की। समारोह के अध्यक्ष 'नवनीत' के संपादक वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ सचदेव ने नवोदित पत्रकारों का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि 'आंखों देखी' में तो 15 पत्रकारों का काम है, कौन जाने अभी 15 हजार पत्रकार इस तरह का काम कर रहे होंगे। उन्होंने कहा कि हाल के चुनाव में मीडिया ने रिपोर्टिंग की बहुत घृणित मिसाल पेश की है, लेकिन इस किताब में 15 पत्रकारों के 26/11 के ओजस्वी अनुभव पढ़कर लगता है कि पत्रकारिता का भविष्य आशाजनक है। समारोह का संचालन वरिष्ठ गजलकार और फिल्म गीतकार देवमणि पांडे ने किया। सौम्य प्रकाशन की निदेशक रीना त्यागी ने आभार व्यक्त किया।


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