रक्षा रिपोर्टिंग पर हिन्दी में किताब- 'प्रतिरक्षा पत्रकारिता'

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रक्षा विषयों और खासतौर पर रक्षा पत्रकारिता पर हिन्दी में पुस्तकों के अभाव को देखते हुए छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी, रायपुर ने 'प्रतिरक्षा पत्रकारिता' नामक एक किताब का प्रकाशन किया है। इसके लेखक शिव अनुराग पटैरया हैं। किताब की भूमिका में पत्रकार और छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी के संचालक रमेश नैयर ने लिखा है- 'प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग हिन्दी पत्रकारिता की एक नई शाखा है, जो इधर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाती है। हिन्दी प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग का इतिहास भले ही महाभारत काल से तलाश लिया जाए और महाभारत के महासमर का आंखों देखा हाल बयान करने वाले संजय को प्रथम समर-संवाददाता बता दिया जाए, परंतु आधुनिक हिंदी पत्रकारिता में प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग का क्षेत्र खाली-खाली सा दिखाई देता रहा है।

सन्‌ 1947 के अंत में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर किए गए आक्रमण की रिपोर्टिंग कुछ अंग्रेजी अखबारों और ऑल इंडिया रेडियो द्वारा सरकारी एजेंसियों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर की गई। पाकिस्तान द्वारा 1965 में किए गए आक्रमण और दोनों देशों के बीच हुए युद्ध की रिपोर्टिग अंग्रेजी के साथ ही हिन्दी एवं अन्य भाषाई समाचार-पत्रों और समाचार एजेंसियों द्वारा कुछ विस्तार से की गई। फिर 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और उसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान द्वारा पूरब और पश्चिम में एक साथ भारत के विरूद्ध मोर्चे खोल दिए जाने पर पहली बार भारतीय मीडिया ने समरक्षेत्र के बहुत निकट पहुंचकर घटनाक्रम की रिपोर्टिंग की। उस दौरान पत्रकारों ने कुछ जोखिम उठाकर युद्ध-क्षेत्र के जीवंत वृतांत  प्रस्तुत किए।

"धर्मयुग" के संपादक धर्मवीर भारती और साहित्य, पत्रकारिता एवं राजनीति में समान रूप से सक्रिय विष्णुकांत शास्त्री ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का आंखों देखा जो विस्तृत विवरण सिलसलेवार प्रकाशित किया, वह हिंदी में परिपक्व "प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग का उत्कृष्ठ उदाहरण था! परंतु तब भी भारतीय पत्रकारिता में प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग की स्वतंत्र शाखा विकसित नहीं हो पाई थी। स्थितियां अब तेजी से बदल रही हैं। कारगिल युद्ध के बाद से भारतीय मीडिया में "प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग" का महत्व समझा जाने लगा है। पत्रकार एवं संस्कृतिकर्मी शालीना चतुर्वेदी द्वारा संकलित जानकारी के अनुसार कारगिल युद्ध में मेजर पुरूषोत्तम चौबे ने दोहरी भूमिका निभाई थी। हथियारों से लैस वह युद्ध क्षेत्र में डटे ही थे, उसके साथ ही समर-रिपोर्टिंग का दायित्व भी वह समय-समय पर संभालते रहे। पत्रकार मित्रों की जान बचाते हुए ही मेजर चौबे ने शहादत दी थी। इसी प्रकार कर्नल जौली ने भी पत्रकारिता का विधिवत् प्रशिक्षण लिया। मेरा ऐसे कुछ सेनाधिकारियों से परिचय रहा है, जो सेना से सेवानिवृत्ति लेकर पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हुए और प्रतिरक्षा विशेषज्ञ के रूप में नाम भी कमाया।'

29 अध्यायों में बटी श्री पटैरया की पुस्तक में भारतीय महाद्वीप के संदर्भ में भारत की सुरक्षा चिंताओं को रेखांकित करते हुए, देश की सामरिक शक्ति तीनों सेनाओं थल, जल और नभ की न केवल सार्मथ्य की व्याख्या की गई है, बल्कि अतीत में हुए युद्धों का सिलसिलेवार विवरण भी दिया गया है। यह पुस्तक केवल प्रतिरक्षा पत्रकारिता के छात्रों के लिए ही उपयोगी नहीं है बल्कि उन लोगों को भी पसंद आएगी, जो भारतीय उपमहाद्वीप के रक्षा संदर्भों को अपनी भाषा में पढ़ना चाहते है।


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