भारत को भगत सिंह वाली आज़ादी अभी नहीं मिली

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पुस्तक का अनावरण करते भारत भारद्वाज, प्रो॰ चमन लाल, विभूति नारायण राय, हिंमाशु जोशी, साथ में खड़े हैं लेखक प्रेमचंद सहजवाला.

भगत सिंह पर चर्चा और प्रेमचंद सहजवाला की पुस्तक का लोकार्पण : हिन्द-युग्म ने गाँधी शांति प्रतिष्ठान सभागार में प्रेमचंद सहजवाला द्वारा लिखित पुस्तक 'भगत सिंहः इतिहास के कुछ और पन्ने' का विमोचन-कार्यक्रम आयोजित किया। पुस्तक का विमोचन प्रसिद्ध साहित्यकार और महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायाण राय ने किया। इस कार्यक्रम में भगत सिंह विषय के घोषित विशेषज्ञ प्रो. चमन लाल, वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी और वरिष्ठ आलोचक भारत भारद्वाज ने 'बदलते दौर में युवा चेतना और भगत सिंह की परम्परा' विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में अपने-अपने विचार रखे। उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया से पहली ऐसी पुस्तक है जो किसी खास विषय पर केन्द्रित है और पहले ब्लॉग पर सिलसिलेवार ढंग से प्रकाशित है।

इस पुस्तक के सभी 13 अध्याय पहले हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हैं, जिनमें भगत सिंह के जीवन, जीवन दर्शन और गाँधी के साथ इनके मतांतर को रेखाकिंत किया गया है। प्रेमचंद सहजवाला ने इसे पुस्तक रूप देने से पहले सभी अध्यायों को संशोधित और परिवर्धित भी किया है। प्रेमचंद सहजवाला ने बताया कि उन्होंने किस तरह से भगत सिंह पर कलम चलाने का विचार बनाया। प्रेमचंद ने कहा कि 1990 में भारत में हुए कई राजनैतिक-धार्मिक और साम्प्रादायिक उथल-पुथल ने उन्हें कथा-कहानियों से अलग भारतीय इतिहास को परखने के लिए प्रेरित किया। प्राचीन भारतीय इतिहास से होते-होते ये आधुनिक भारतीय इतिहास तक पहुँचे और गाँधी-नेहरू-भगत सिंह की शौर्यगाथा में उलझ गये और यह खँगालने की कोशिश करने लगे कि भगत सिंह आखिर क्या हैं!

हिन्द-युग्म ने विमोचन कार्यक्रम के साथ 'बदलते दौर में युवा चेतना और भगत सिंह की परम्परा' विषय पर एक गोष्ठी भी आयोजित किया था, जिसमें जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केन्द्र के अध्यक्ष और भगत सिंह से संबंधित कई पुस्तकों और दस्तावेज़ों के संपादक प्रो. चमन लाल, मशहूर कथाकर हिमांशु जोशी, पुस्तक-वार्ता के संपादक और वरिष्ठ आलोचक भारत भारद्वाज और इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विभूति नारायण राय अपने-अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किये गये थे।

इस विषय पर सबसे पहले हिमांशु जोशी ने अपने विचार रखे। हिमांशु जी ने बताया कि आज़ादी हमें तीन तरह से मिल सकती थीं- गाँधी जी के तरीके से, दूसरा भगत सिंह-चंद्रशेखर आज़ाद का और तीसरा सैन्य विद्रोह यानी सुभाष चंद्र बोस से। ये तीनों शक्तियाँ मिली और भारत आज़ाद हो गया। इन्होंने आगे कहा कि भगत सिंह केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे बल्कि एक क्रांतिदर्शी थे। भारत भारद्वाज ने इस बात का खुलासा किया कि एक बलिदानी ने भगत सिंह के लिए अपनी कुर्बानी दी। भगत सिंह के खिलाफ इकबालिया गवाही देने वाले फणीन्द्रनाथ घोष को मारने वाले बैकुंठ शुक्ल को फाँसी दी गई थी।

मुख्य अतिथि विभूति नारायण ने कहा कि भगत सिंह होना एक खास तरह का सपना देखना है। भगत सिंह केवल उत्साही, भावुक या देशभक्त किस्म के युवा नहीं थे, बल्कि भगत सिंह एक दर्शन, एक विचार का नाम है। सहजवाला जी ने इस पुस्तक को लिखकर हिन्दी में एक कमी को पूरा किया है। सहजवाला जी ने बहुत से किताबों में बिखरे पड़े तथ्यों और बातों को एक जिल्द में समेटा है। इसके बाद कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो॰ चमन लाल को संचालक प्रमोद कुमार तिवारी जी ने आवाज़ दी। प्रो॰ चमन लाल ने लगभग 55 मिनटों में अपनी बात रखी। चमन लाल ने कहा कि भगत सिंह के जीवन के अनेक पहलू हैं, जिनपर हम घंटों बात कर सकते हैं।

इनके वक्तव्य की कुछ मुख्य बातें-

  1. भगत सिंह ने 5 साल से लेकर साढ़े 23 साल की उम्र तक (लगभग 18 वर्ष तक) पूरी तरह से सजग और चैतन्य इंसान की तरह जिया।

  2. भगतसिंह का ताल्लुक पूरी तरह से वहाँ से रहा है जो आज पाकिस्तान में है।

  3. 1922 में जिस चंद्रशेखर आज़ाद ने 'महात्मा गाँधी की जय' कह-कह कर अपनी पीठ पर 30 बेंत खाये थे और ऊफ तक नहीं की थी, भगत सिंह के साथ सत्याग्रह आंदोलन से इसलिए नाता तोड़ लिया था क्योंकि गाँधी जी ने 22 पुलिस वालों की मौत से अचानक अपना आंदोलन वापिस ले लिया था।

  4. भगत सिंह के लिए देश का मतलब देश की मिट्टी से, इसके शहर-गाँव से नहीं था, बल्कि देश की जनता से था। इसीलिए भगत सिंह मानते थे कि देश पर चाहे कालों का राज रहे या गोरों का, जब तक यह व्यवस्था नहीं बदलेगी तब तक भारत की हालत में सुधार नहीं होगा। भगत सिंह पहले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनमें सबसे पहले सामाजिक चेतना जागी थी। इनसे पहले के क्रांतिकारी 'भारत माता की जय' तक सीमित थी।

  5. गाँधी जी का रास्ता अंग्रेजों को बहुत अच्छा लगता था, क्योंकि गाँधी जी अंग्रेजों के शोषण को खत्म करने के लिए कोई कोशिश नहीं कर रहे थे। अंग्रेज़ों को मालूम था कि यदि भगत सिंह ज़िंदा रहा, या भगत सिंह का विचार ज़िंदा रहा तो यहाँ की जनता हमसे शोषण का हिसाब माँगेंगी। इसीलिए अंग्रेजों ने भारत को विभाजन का रास्ता का दिखाया। विभाजन का फायदा अंग्रेजों को हुआ, अमेरिका को हुआ। विभाजन का जिम्मेदार जिन्ना नहीं था। विभाजन का जिम्मेदार ब्रिटिश थी। यह अंग्रेज़ों की चाल थी। जिन्ना को अकेले दोष देना एक अंधराष्ट्रभक्त है। नेहरू, पटेल सभी जिम्मेदार थे। गाँधी कुछ हद जिम्मेदार इसलिए भी हैं क्योंकि इन्होंने उस समय कुछ नहीं बोला जब उन्हें बोलना चाहिए था। गाँधी यदि पटेल-नेहरू की सत्तालोलुपता को समझकर विभाजन को रोक लेते तो आज जितने महान हैं, उससे अधिक महान होते।

  6. भगत सिंह ने एक महान काम यह भी किया कि सबकुछ अपनी डायरी में लिखकर रखा। जिससे आज भगत सिंह के वास्तविक दस्तावेज और असलियत हमारे सामने है। भगत ने फाँसी से मरने से पहले भी लिखा कि मेरे मरने के बाद क्या करना है। भगत सिंह पहला ऐसा क्रांतिकारी था, जो कहता था कि देश को आज़ाद होने के लिए मेरा मरना ज़रूरी है। भगत सिंह ने अपनी फाँसी खुद चुनी थी।

  7. भगत सिंह 'बम-बारूद' के खिलाफ थे। वे कहते थे कि यदि पुलिस जनता पर प्रहार नहीं करेगी, तो जनता पर भी उन पर पत्थर नहीं फेंकेगी, पुलिस-स्टेशन को बम से नहीं उड़ायेगी। वॉयलेंस की शुरूआत हमेशा पुलिस/स्टेट/ब्रिटिश करती थी।

  8. गाँधी जी और भगत सिंह की आज़ादी का फर्क यह है कि 1861 में अंग्रेज़ों का बना क़ानून आज भी हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में लागू है। भगत सिंह वाली आज़ादी हमें मिली होती तो कोई भी स्वाभिमानी देश कॉलोनियल क़ानून 1 दिन भी लागू नहीं रहने देता। 15 अगस्त 1947 से 1 दिन भी आगे भी ये कानून नहीं चलते।

  9. हिन्दुस्तान में सबसे अधिक किताबें भगत सिंह पर लिखी गई हैं। 350 से अधिक किताबें जिनकी सूची मैं बना रहा हूँ, इनमें से पौने 200 से भी अधिक किताबें हिन्दी में है। भारत की लगभग हर भाषा में भगत सिंह के ऊपर किताबें हैं। हिन्दुस्तान में गाँधी और नेहरू को छोड़कर शायद ही कोई और नेशनल लीडर हो, जिनपर भारत की हर भाषा में किताबें हों।

  10. सिंधी के मशहूर कवि शेख़ हयाज़ ने भगत सिंह पर सिंधी में काव्य-नाटक लिखा।

  11. अंग्रेज़ों ने सबसे अधिक किताबें भगत सिंह पर बैन की।

इसके बाद आनंदम् संस्था के प्रमुख जगदीश रावतानी ने सभी अतिथियों और श्रोताओं का धन्यवाद किया। मंच का संचालन युवा कवि प्रमोद कुमार तिवारी ने किया। कार्यक्रम में अल्का सिंहा, युवा कवयित्री सुनीता चोटिया, हिन्द-युग्म के संपादक शैलेश भारतवासी, वरिष्ठ कवि मुनव्वर सरहदी, वरिष्ठ शायर मनमोहन तालिब, परिचय-संस्था की प्रमुख उर्मिल सत्यभूषण, इस कार्यक्रम के संयोजक और युवा कवि रामजी यादव, कवि-लेखक रंजीत वर्मा, कामरेड पीके साही, सपर-प्रमख राकेश कुमार सिंह, कवयित्री ममता किरण इत्यादि उपस्थित थे।


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