अपने-अपने युद्ध (10)

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दयानंद पांडेयचेतना और संजय अब अक्सर किसी न किसी बहाने मिलने लगे। ऐसा भी नहीं था कि जैसे दोनों के बीच प्यार अंकुआ रहा हो। पर बेवजह ही सही वह मिलने लगे थे। काफी दिनों तक वह सचमुच बेमतलब ही मिलते रहे। संजय को कई बार ऐसा लगा जैसे वह उसका हाथ चूम लेना चाहता है या फिर उसे चूम लेना चाहता है। पर जाने क्यों उसमें कभी यह इच्छा बहुत तीव्र ढंग से नहीं उठी। एक दिन उसे जाने क्या सूझा कि उसने चेतना से पूछा, "तुम्हें गाना गाने आता है?" पर चेतना कुछ बोली नहीं। फिर किसी दिन उसके बड़े इसरार पर एक पार्क के चबूतरे पर बैठ कर चेतना तीन, चार गाने सुना गई। सबके सब फिल्मी थे। आवाज उसकी बहुत अच्छी नहीं थी पर दर्द में डूबी हुई थी। उसने गाने भी इसी शेड के चुने थे। "रजनीगंधा" फिल्म का "यूं ही महके प्रीत पिया की मेरे अनुरागी जीवन में।" गीत जब वह गा रही थी तो संजय ने देखा उसकी आंखों की कोरें नम हो गई थीं। चलते समय संजय ने उसे कुरेदा भी, "लगता है प्यार में बहुत मार खाई हुई हो?" पर वह बहुत संक्षिप्त सा "नहीं" कह कर मुसकुराने लग पड़ी। संजय ने फिर उससे कहा, "अच्छा लाओ जरा तुम्हारा हाथ तो देखूं।" वैसे, संजय को हाथ देखने का क, ख, ग भी नहीं मालूम था।

उसने मन ही मन उसका हाथ अपने हाथ में लेने की तरकीब निकाली थी पर चेतना ने उसकी वह बात भी ठुकरा दी, और बोली, "आइए चलते हैं।"

"कुछ खाओगी?" अवध बाजार की ओर से गुजरते हुए उसने पूछा तो वह फिर संक्षिप्त सा, "नहीं।" बोलकर चुप हो गई।

"पर मैं तो खाऊंगा।" चेतना की आंखों में झांकता हुआ द्विअर्थी संवाद बोलता हुआ फिर बोला, "बहुत भूख लगी है।"

"आप खा लीजिए। पर मैं नहीं खाऊंगी।" पर संजय नहीं माना। दो डोसा मंगा लिया। और फिर बात ही बात में बिना रजनीश का नाम लिए वह रजनीश दर्शन पर उतर आया। डोसा खाने के बीच अपने कई रजनीश उवाच चेतना को सुना डाले। पर चेतना बिना कही कोई आपत्ति जताए "हूं" "हूं" "ना" जैसे संक्षिप्त उत्तर देती जा रही थी पर किसी बात पर आपत्ति नहीं जताई। जब कि कई बाते आपत्तिजनक भी थीं। लेकिन आपत्ति उसे आपत्तिजनक बातों के बजाय डोसा खाने पर हुई।

"पर अब तो आ गया है।" संजय ने जैसे उसकी खुशामद की। पर वह बोली, "दोनों आप खा लीजिए।" उसने सफाई दी, "मैं बाहर का कुछ नहीं खाती पीती।"

"पंडित मैं हूं कि तुम?" कह कर जब संजय ने बहुत जोर दिया तो किसी तरह वह डोसा चुगने लगी। संजय को आज जाने क्या हो गया था वह चेतना से सेक्स और देह की चर्चा पर बिना किसी प्रसंग के अचानक उतर आया। बिलकुल किसी दार्शनिक की तरह। संजय की यह दार्शनिकता भी उस पाकिस्तानी मौलवी की तरह "नाड़ा खोल" अंदाज में थी। वह इस बहाने चेतना का मन थाह लेना चाहता था। उसका मन थाहते-थाहते वह सीधे रजनीश के एक किस्से पर आ गया। कि एक संन्यासी था। सुबह-सुबह वह घर से बाहर निकलते ही तैयारी में था कि अचानक उसका एक बहुत पुराना संन्यासी मित्र आ गया। अब संन्यासी बड़े धर्म संकट मे पड़ गया। कि मित्र को छोड़े, कि जिन लोगों से आज मिलना तय है, उनसे मिलना छोड़े। अंतत: उसने मित्र से कहा कि, "तुम भी मेरे साथ चले चलो।"

"पर मेरे कपड़े मैले हो गए हैं। दूसरा है नहीं। और इसे धोने, सुखाने में समय लगेगा।"

"तुम इसकी चिंता छोड़ो। तुम बस नहा धो लो। मेरे पास एक नया वस्त्र है तुम उसे पहन लेना।"

उसका मित्र जब नहा धोकर तैयार हुआ तो उसने वह कपड़ा जो कहीं से उसे उपहार में मिला था मित्र को पहनने के लिए दे दिया। मित्र जब वह नया कपड़ा पहनकर उसके साथ चला तो संन्यासी उसे देख कर बड़ी मुश्किल में फंस गया। उसने देखा कि नये कपड़ों में वह उससे ज्यादा जम रहा है। कहीं भी जाएगा तो लोग उसके मित्र को ही देखेंगे, उसका क्या होगा?

रास्ते भर वह इसी उहापोह में रहा। पहली जगह जब वह गया तो उसने अपने मित्र का परिचय कराया और बताया कि, "रही बात कपड़ों की सो ये इनके नहीं मेरे हैं।" मित्र को यह सुनकर तकलीफ हुई। पर चुप रहा। लेकिन बाहर आकर उसने कहा, "यह कहने की क्या जरूरत थी कि कपड़े इनके नहीं मेरे हैं। ले लो अपने कपड़े। अब तुम्हारे साथ कहीं नहीं जाना।"

संन्यासी ने इस पर अपने संन्यासी मित्र से माफी मांगी। कहा कि, "क्या बताऊं गलती हो गई। पर अब आगे ऐसी बात नहीं होगी।"

मित्र मान गया और साथ चल पड़ा। दूसरी जगह पहुंच कर संन्यासी ने अपने मित्र का परिचय कराया और कहा, रही बात कपड़ों की सो वे मेरे नहीं इन्हीं के हैं। बाहर आकर मित्र ने संन्यासी को फिर लताड़ा। कि, "यह कहने की क्या जरूरत थी कि कपड़े मेरे नहीं इन्हीं के हैं।" संन्यासी ने फिर गलती स्वीकार की, मित्र से क्षमा मांगी और कहा कि अब हरगिज ऐसा नहीं होगा।

पर रास्ते भर संन्यासी के दिमाग में मित्र का पहना कपडा़ ही घूमता रहा। तीसरी जगह भी संन्यासी ने मित्र का परिचय कराया और कहा कि, "रही बात कपड़ो की सो उसके बारे में कोई बात चीत नहीं होगी।" मित्र फिर हैरान।

"तो असल में जैसे उस संन्यासी के दिमाग में हर वक्त कपड़ा ही घूम रहा था ठीक वैसे ही आदमी के दिमाग में सेक्स घूमता रहता है। पर वह उसे दबाता रहता है। और मौका मिलते ही सेक्स की बात करता रहता है।"

संजय ने यह रजनीश दर्शन चेतना पर थोपते हुए यह अंदाजना चाहा कि कहीं वह इस कथा का बुरा तो नहीं मान गई है? पर चेतना ने जब कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो संजय का माथा ठनका कि कहीं यह किस्सा चेतना के सिर के ऊपर तो नहीं गुजर गया। उसके पल्ले ही नहीं पड़ा?

इस बात को थाहने के लिए वह बड़ी देर तक सेक्स के इर्द गिर्द ही बाते करता रहा। पर कोई थाह नहीं मिली उसे। बात ही बात में वह मीरा और मीरा के भजनों पर आ गया। उसने चेतना से पूछा, "तुम क्या मीरा की भजनें भी गाती हो?"

"नहीं पर वह मेरी बहन है।"

"कौन बहन है?"

"मीरा!" वह बेचैन सी हुई। बोली, "मै मीरा जैसी जिंदगी जीना चाहती हूं।" वह रुकी और बोली, "और जो कुछ तभी से आप हमें बताए जा रहे हैं वह मीरा की जिंदगी में नहीं है।"

"क्या बेवकूफी की बात करती हो?" संजय सुलगता हुआ बोला, "मीरा की जिंदगी जीना इतना आसान समझती हो।"

"आसान तो नहीं है। पर मै जिऊंगी।" कह कर वह चली गई। संजय छटपटा कर रह गया।

कहीं यह लड़की पागल तो नहीं है? उसने सोचा। और कि बेवजह ही इस पर वह अपना समय खराब करता जा रहा है। रजनीश का भाष्य बेमतलब उससे भाखता रहा है।

मीरा!

मीरा मन जीती थी, देह नहीं। पर त्रासदी यह थी कि संजय इस चेतना रूपी "मीरा का मन नहीं उसकी देह जीना चाहता था, उसकी देह भोगना चाहता था। तो क्या वह राजा भोज की गति को प्राप्त होने की ओर उन्मुख था?"

कि उसे राधा बना कर कान्हा सा सुख लूटना चाहता था?

उसे कुछ भी पता नहीं था!

संजय ने सोचा कि शायद चेतना अब उससे नहीं मिले। उसने कुछ जल्दबाजी कर दी थी, इसका उसे थोड़ा मलाल तो था पर उसे इसका कोई बहुत पछतावा नहीं था। वह इस तरह मिलके ही क्या करती! यह सोचते ही अचानक उसे आलोक की याद आ गई। बरबस।

दिल्ली में जब उस नए-नए दैनिक में ढेर सारे नए-नए लोग इकट्ठा हो गए थे। और पूरे संपादकीय में सिर्फ एक लड़की थी। वह भी अप्रेंटिस। सो सब उसी पर रियाज मारते रहते। जब कि वहीं साथ के अंग्रेजी वाले दोनों दैनिकों में महिलाओं की भरमार थी। एक से एक माड, हसीन और दिलफेंक। दो तीन महिलाएं तो बाकायदा चेन स्मोकर थीं। इनमें भी एक अक्सर बुरी तरह पीकर कभी-कभार देर रात गए दफ्तर की सीढ़ियों पर यूं ही बैठी या उलटियां करती दिख जाती। चीफ सब थी। बाद में वह एक फोर्ट नाइटली में कोआर्डिनेटर होकर चली गई। और वही से एक कंप्यूटर विशेषज्ञ के साथ शादी कर लिया। जैसे फर्राटे से सिगरेट पीती थी उसी फर्राटे से काम भी करती थी। पेजमेकिंग में उसका जवाब नहीं था। लंबी, छरहरे बदन वाली वह चीफ सब जब लंबे-लंबे नाखूनों वाली, लंबी-लंबी उंगलियों में लंबी-सी सुलगती सिगरेट पकड़े जब लंबा सा कश खींच कर उससे भी लंबा धुआं फेंकती तो कई लोगों को अनायास ही लंबा कर देती। टेलीप्रिंटर के तार छांटते समय उसकी उंगलियों में दबी सिगरेट से हमेशा अंदेशा बना रहता कि कहीं खबरें जल न जाएं, कहीं आग न लग जाए। पर न खबरें जलती थीं, न आग लगती थी। अलबत्ता नए-नए आए लोगों के दिल जल जाते थे, आग लग जाती थी उनके मन में कहीं, यह सब देख कर। पर वह सिगरेट, शराब और सांस सब कुछ अंग्रेजी में लेती थी। जब वह रिजाइन कर फोर्ट नाइटली जाने लगी तो अपने फेयरवेल में वह इतना पी गई पी कर इतनी भावुक हो गई, भावुक होकर इतना सरल हो गई, और सरल होकर इतने शानों पर उसने सिर रखा कि संजय तो क्या आलोक भी ठीक से नहीं गिन पाया। हां, आलोक ने दूसरे दिन अपनी बड़बोली स्टाइल में खुलासा किया, "शानों की तो गिनती नहीं है, पर शानों पर उसके सिर रखते समय कितनों ने उसकी रानों को "टच" किया, कितनों ने उसकी हिप टच की और कितनों ने हाट किस, कितनों ने फ्लाई किस किया, उसका आंकड़ा मेरे पास जरूर है।"

"पर इसमें तुमने क्या-क्या किया?" संजय ने उससे पूछा।

"आकंड़ा इकट्ठा किया!" उमेश ने चुटकी ली।

"एक्जेक्टली यही किया।" उसने शेखी बघारी, "चौबीस कैरेट का खबरची जो ठहरा!"

"पर मैंने तो देखा कोई पौने ग्यारह बजे वह फ्लैट हो गई थी। और ग्यारह बजे बेसिन पर खड़ी उलटियां कर रही थी।" सुरेश ने अतिरिक्त जानकारी देने की कोशिश की।

"पर जब बेसिन पर खड़ी उलटियां कर रही थी तो उसकी पीठ कौन सहला रहा था?  मालूम है किसी को?" वह इठलाया, "मुझे मालूम है। और यह भी कि जब वह अचानक रोने लग गई तो कार में बिठा कर उसे कौन चिपटा-चिपटा कर बड़ी देर तक चुप कराता रहा। और जब वह कार से बाहर निकली तो उसकी अस्त व्यस्त साड़ी किसने ठीक की, ब्लाउज और ब्रा के हुक किसने लगाए।"

"क्या बोल रिया है?" सुजानपुरिया पायजामा खोंसते हुए आश्चर्य चकित आंखे फैला कर बड़ी जोर से बोले। ऐसे जैसे कोई अनहोनी हो गई हो।

"सुजानपुरिया जी आप चुप रहिए। देख रहें हैं "एडल्ट" बातचीत हो रही है।" आलोक ने कहा, "जब आपके लाइन की बात हो तब बोलिएगा।"

"ठीक है भइया।" कहते हुए सुजानपुरिया फिर से पायजामा खुंसियाते हुए सरक लिए, "अब तुम लौडों से कौन मुंह लगे।"

"क्या?"

"कुछ नहीं कुछ नहीं।" कहते हुए सुजानपुरिया एकदम ही गायब हो गए।

"और वह नंदा?" आलोक उचक कर मेज पर बैठता हुआ बोला, "न्यूज एडीटर ने उसकी हिप पर इतनी बार हाथ फेंके कि वह भी एक रिकार्ड है।"

"क्या यार मम्मी की बात करने लगे।"

"मम्मी? और साले जब वह शाम को बैडमिंटन खेलती है तो कटोरा जैसी आंखे फाड़ मुंह बाए खड़े रहते हो तब?"

"अच्छा उसकी बात कर रहे हो। मैं समझा सर्कुलेशन वाली नंदा।"

"क्या जायका खराब कर दिया। उसका जिक्र छेड़ कर।" अभी बैठकबाजी चल रही थी कि चपरासी ने संजय को आकर बताया कि उसका फोन आया है। वह जाने लगा तो आलोक ने कहा, "उसका हो तो हमें भी बुलाना। नहीं, जल्दी आना।"

"ओ.के.।" कह कर तो गया संजय। पर तुरंत वापस नहीं गया। थोड़ी देर बाद पता चला कि आलोक की किसी अंग्रेजी वाले से हाथापाई हो गई। मामला वही था। रात की पार्टी पर जुमलेबाजी। आलोक बैठा गपिया रहा था कि उस अंग्रेजी वाले ने आलोक पर तंज किया, "तुम साले मीन मेंटेलिटी हिंदी वाले।" इतना कहना था कि आलोक उस पर टूट पड़ा। आलोक का कहना था कि, "उसे जो कहना था, मुझे कहता। ये "हिंदी वाले" का क्या मतलब था उसका। मेरी मातृभाषा को गाली देगा और मैं उस दोगले अंग्रेजी की औलाद को छोड़ दूंगा?" वह बिफरा, "सवाल ही नहीं।"

असल में हुआ क्या था कि हिंदी प्रदेशों की राजधानियों, जिलों से दिल्ली गए आलोक जैसे लोगों के लिए दिल्ली की महिलाओं का इस हद तक खुलापन या तो विभोर कर देता था या फिर झकझोर देता था। सहजता से वह सब कुछ मान नहीं पाते थे। और चुंकि वह चीजें, वह सुख उनसे बहुत दूर था तो जुगुप्सा उपजनी स्वाभाविक ही थी। ऐसी ही जुगुप्साओं का शिकार था आलोक। आलोक जोशी। हरदम खुश रहने वाला पर बड़बोलेपन का शिकार। वह अपनी खबरों में भी बड़बोलापन बोए रहता था। भाषा जैसे उसकी गुलाम थी और इसकी लगभग दुरुपयोग करते हुए वह जाने कितने रिकार्ड बना चुका था। जैसे कि शुरू के कुछ दिनों तक वह लगातार एक चीज का शिकार रहा। जैसे ही कोई मरता वह फोन पर जूझ जाता और आनन-फानन ढेर सारे लोगों के बयानों से भरी एक भावुक रिपोर्ट लिख मारता। साथ ही कुछ सनसनीखेज बयान खोंस देता। भले ही दूसरे दिन कई लोगों के खंडन आ जाते। कि हमने तो ऐसा नहीं कहा था। या हमारी आपके संवाददाता के कोई बात नहीं हुई। जब खंडनों का तांता लगने लगा। तो आजिज कर कुछ दिनों तक उन खंडन वाली चिट्ठियों को डिस्पैच क्लर्क को मिला कर वह गायब करा देता। पर जब लोग दफ्तर खुद आने लग गए तो अंतत: उसने अपना विकास कर लिया। अब वह प्रतिक्रियाएं बटोरकर लिखने के बजाय संस्मरण लिखने लग गया। वह चाहे कोई महान हस्ती मरी हो या कोई माडल आत्महत्या कर गई हो या किसी जाने पहचाने आदमी या औरत की हत्या हो गई हो। आलोक जोशी फौरन  संस्मरण लिख मारता और उसमें यह जिक्र जरूर कर देता कि मरने के या आत्महत्या के पहले वह उससे मिला था। "वह बहुत खुश थी" या "उसके चेहरे पर आतंक की रेखाएं थी" "वह डरा हुआ था" जैसी बातें भी वह जरूर जोड़ देता।

एकाध बार ऐसा भी हुआ कि किसी चीफ सब ने उसके लिखे ऐसे अंश अगर काट दिए तो वह दूसरे दिन उससे भिड़ जाता कि, "क्यों काटा?"

"इसलिए कि वह सब अनर्गल था, झूठ था।"

"क्या मतलब? मतलब कि मैं झूठ लिखता हूं।" वह हांफने लगता, "कोई खंडन आया है आज तक?"

"मरे हुए लोग खंडन नहीं भेज सकते। नहीं जरूर आ जाता।"

"डफर!" वह गुर्राता, "खुद तो एक लाइन लिख नहीं सकते। काटने की भी तमीज नहीं। जो मन में आया काट दिया।" वह जोड़ता, "निकाल लिया अपना फ्रस्ट्रेशन!" और पैर पटकता वह चला जाता। धीरे-धीरे यह सब उसकी रोजमर्रा में शुमार हो गया।

संजय ने उन्हीं दिनों एन.एस.डी. पर लिखी वह रिपोर्ट अप टु डेट कर के छापने को दे दी थी। जो बड़ी होने के नाते उस पत्रिका में नहीं छप पाई थी। पर दैनिक मे जब पूरे पेज की वह रिपोर्ट छपी तो एन.एस.डी. के छात्र नाराज हो गए। दैनिक के कार्यालय पर बाकायदा तख्तियां लेकर वह प्रदर्शन पर उतर आए। रिपोर्ट में अल्काजी, कारंत और वर्तमान निदेशक की कार्यप्रणाली का फर्क, इनका गैप और अल्काजी की सालने वाली कमी के प्रोजेक्शन के साथ ही शराब, लड़कियां, ड्रग और आत्महत्या के गिनाए गए कारणों से एनएसडियन नाराज थे। इस प्रदर्शन की रिपोर्ट आलोक ने लिखी तो वह फिर प्रदर्शन करने आ धमके। आलोक बोला, "मैं इस प्रदर्शन का फिर रिपोर्ट चाहता हूं।" संपादक ने मना कर दिया। और सचमुच आलोक उनके बीच जाता तो पिट जाता। संजय यह सब देखकर पछताने लगा।। उसने सोचा कि वह चौधरी वाली रिपोर्ट भी अगर वह आज संभाल कर रखे रहता तो आज मजा आ जाता। हुआ यह था कि जब चौधरी वाला वह आइटम उस पत्रिका के संपादक ने छापने से मना कर दिया तो उसने वही सामग्री अंग्रेजी में ट्रांसलेट करवा कर कलकत्ता की एक अंग्रेजी पत्रिका में भेज दिया। क्यों कि वह यह जान गया था कि हिंदी में वह सामाग्री कभी नहीं छाप पाएगी। और दिल्ली में तो कतई नहीं। क्योंकि बागपत पास था। और किसे अपने दफ्तर में आग लगवानी थी?

पर दिलचस्प यह रहा कि अंग्रेजी में छपी वह चौधरी वाली सामाग्री एक दिन उसने उस हिंदी पत्रिका में भी छपी देखी। बिलकुल वही ब्यौरे, वही अंदाज। पर धार वह नहीं थी। फायरी लैंग्वेज कमनीयता के साथ परोसे गए ब्यौरे में मर गई थी। और मजा यह कि क्रेडिट साभार के बजाय विशेष संवाददाता की थी। उसने सोचा कि फोन कर उस संपादक से पूछे कि, "अंग्रेजी से उड़ा कर छापी गई सामाग्री डिफरमेटरी नहीं होती क्या?" पर वह टाल गया।

एन.एस.डी. वाली रिपोर्ट पर जब बवाल मचा तो एक दिन उस संपादक का फोन आया, "रिपोर्ट तो मैंने तुम्हें पहले ही बताया था कि अच्छी है। पर इस्तेमाल भी बढ़िया हुई है। भाषा भी तुम्हारी अच्छी है।"

लगभग उन्हीं दिनों जब उसने एक कुष्ठाश्रम पर लंबी रिपोर्ट लिखी और उसमें पर्दाफाश किया कि कैसे एक माफिया उस कुष्ठाश्रम और कुष्ठ रोगियों को चूस रहा है तो समाचार संपादक ने वह रिपोर्ट छापने से सिरे से मना कर दिया। उसके बहुत जोर देने पर समाचार संपादक ने कहा, "क्या फिर बवाल का इरादा है?"

"नहीं तो!"

"तो वह माफिया वाला हिस्सा काट दो।"

"लेकिन तब तो पूरी रिपोर्ट ही मर जाएगी!"

"मरने दो।" समाचार संपादक ने उसे घूरा, "तुम नहीं जानते वह कितने खतरनाक लोग हैं।" अंतत: संजय ने जब कोई चारा नहीं देखा तो समाचार संपादक से कह दिया, "जो काटना हो आप खुद काट लीजिए। मैं नहीं काट पाऊंगा।"

"फिर आलोक की तरह हल्ला मत मचाना कि रिपोर्ट की आत्मा ही मार डाली।"

"ठीक है।" उसने कह तो दिया। रिपोर्ट छप भी गई। पर उसकी आत्मा उसे रह-रह कचोटती रही। रात को सपने में वह कुष्ठ रोगी आ-आ कर उसके सामने खड़े हो जाते। वह परेशान हो गया। अंतत: उसने फिर से बल्कि और फायरी लैंग्वेज में वह कुष्ठाश्रम वाली रिपोर्ट लिखी। और कलकत्ता वाली हिंदी पत्रिका में भेज दिया।

"माफिया की गोद मे कुष्ठाश्रम" शीर्षक से छपी रिपोर्ट में काट छांट तो हो गई थी पर माफिया को भरपूर इंगित करने वाला हिस्सा आ गया था। रिपोर्ट क्या छपी, संजय का जीना मुश्किल हो गया। धमकियां उसे पहले भी कई बार मिल चुकी थीं पर अबकी सिर्फ धमकी भर नहीं थी। धमकियां कलकत्ता की उस पत्रिका तक पहुंची। मामला कोई खतरनाक मोड़ लेता कि चुनाव की घोषणा हो गई। वह माफिया चुनाव लड़ने में मशगूल हो गया। और जेल से ही वह चुनाव संचालन करने लगा। संजय उससे इंटरव्यू के लिए जब जेल मे मिला तो वह बिलकुल बदला हुआ था। उसके कारिंदों ने इशारों-इशारों में बताया भी कि, "यही है वह।" तो भी वह बड़ी संजीदगी से टाल गया। चलते समय जब संजय ने उसकी ओर से मिली धमकियों का जिक्र किया तो वह बिलकुल अनजान बन गया, "राम राम! यही सब हम करेंगे अब?" और दूसरे ही क्षण उसने बड़ी विनम्रता से धमकियों के लिए माफी मांग ली। तभी संजय ने सोचा कि यह माफिया सरगना अगर राजनीतिक में खुदा न खास्ता एंट्री पा गया तो बड़ा शातिर निकलेगा। संजय का सोचना सही निकला। हालांकि वह माफिया उस बार तो इंदिरा लहर के चक्कर में संसदीय चुनाव हार गया। पर अगली बार जेल से ही चुनाव लड़कर वह विधान सभा में जीत कर आ गया था। फिर बाद के दिनों में तो वह मंत्री भी बना।

तो जब माफिया ने कलकत्ता वाली पत्रिका का दफ्तर खून से रंग देने की धमकी दे दी और दिल्ली में संजय को आतंकित करने लगा तब फिर आलोक इसके विरोध की मुहिम में लग गया। बाद में बात आई गई होगी। एक दिन कैंटिन में बैठा वह हरदम की तरह गपिया रहा था। बात चली उस कन्या की जो उस दैनिक में इकलौती थी। वह लड़की उन दिनों सब सहयोगियों की आशिकी से आजिज हो गई थी। कुछ लोग उसे काम नहीं आता, वह जर्नलिज्म कर ही नहीं सकती जैसे जुमले बोल-बोल कर रूला देते। जब वह रोने लगती तो उसी में से कोई सांत्वना देने आ जाता। सांत्वना देते-देते उसकी पीठ सहलाने लगता, आंसू पोंछने के बहाने उसके गालों पर हाथ फेरने लगता। ऐसे में वह बिलकुल असहाय हो जाती। और बचने के लिए फला जी कहने के बजाय भाई साहब, भाई साहब, जैसे संबोधन को बचाव के लिए हथियार बनाती। और उस दैनिक में तब ज्यादातर लोगों की आंखों में शर्म का पानी था। "भाई साहब" कहते ही बेचारे किनारा कस लेते। पर कुछ फिर भी लगे रहते तो उन्हें वह "भइया-भइया" कहने लगती। फिर वह बेचारे भी कटने लगते उस लड़की से।

तो इस गप गोष्ठी में प्रसंग यही चल रहा था। बात ही बात में आलोक कहने लगा, "चूतिए हैं सब साले। कन्या साधने का गुन नहीं जानते।"

"पर जब वह भइया-भइया कहने लगती है तो फिर कोई रास्ता रह जाता है? भाई इतनी नैतिकता तो अपन में है।" ताजा-ताजा भइया बना उमेश बिलबिला रहा था।

"पर देखना वह मुझे भइया नहीं कहेगी। और मैं सक्सेस भी रहूंगा। इस साली को नाप के न दिखा दूं तो कहना।"

"और जो न नाप पाए तो?"

"जिंदगी में लाइन मारना छोड़ दूंगा।" वह तफसील में चला गया, "देखो भई अपनी तो एक ही लाइन है। कि कोई लड़की अगर आपसे हरदम हंस-हंस कर बात करे। चाय पीने, कहीं साथ-साथ घूमने और सिनेमा जैसे आफर मान ले तो समझिए कि आपको वह नापसंद नहीं करती। बस उसे आप की पहल का इंतजार होता है। और मैं उनमें से नहीं हूं कि दो-दो, तीन-तीन साल या फिर पूरी जिंदगी सिर्फ घूमने या साथ चाय पीने, सिनेमा देखने में गुजार दूं। भई मैं दो चार मुलाकातों के बाद सीधा-सीधा प्रस्ताव रख देता हूं कि साथ सोना हो तो बोलो। नहीं ऐसे ही सिर्फ घूमने घमाने से समय खराब करना हो तो गुड बाई।

"बिलकुल खुल्लमखुल्ला?" सुजानपुरिया जाने कहां से आ टपका था और बिस्मित होता हुआ बोला!

"तो क्या!" आलोक चिढ़ता हुआ बोला, "मैं उनमें से नहीं हूं जो साले साल, दो साल सिर्फ लड़की का हाथ छूने भर में ही गंवा देते हैं। यहां तो बस सीधा-सीधा मेन प्वाइंट!"

"और जो लड़की बुरा मान गई तो?"

"मान जाए साली। अपनी बला से। जब वह अपने काम ही नहीं आ सकती तो उसे खुश रखने से ही क्या फायदा?"

"यह तो साला सिर्फ बकचोदी करता है।" आलोक को इंगित करते हुए उमेश ने सुजानपुरिया से कहा, "श्रीमान जी, कहीं आप इसका फार्मूला ट्राई मत कर लीजिएगा, नहीं ऐसी धुलाई होगी कि पायजामे का नाड़ा नहीं मिलेगा। यह दिल्ली है आगरा नहीं।"

"तो क्या हमको बिलकुल चूतिया समझ रिया है?" कहते हुए गर्दन भीतर धंसाते हुए सुजानपुरिया पायजामा उठा कर वहीं धप्प से बैठ गया, "मैं तो भइया जगह देख कर हाथ डालता हूं।"

"बड़े छुपे रूस्तम हैं आप तो। पर हाथ डाल कर काम चलाते हैं आप सुजानपुरिया जी! छी-छी। यही गड़बड़ है।" कहते हुए आलोक वहां से उठने लगा तो सुजानपुरिया ने उसे रोक लिया। कहा कि, "भइया तुमसे एक काम है।"

"भइया कहने का इंफेक्शन आपको भी लग गया।"

"तुमको तो मजाक सूझ रिया है। पर जरा मामला गंभीर है।"

"अच्छा, बताइए क्या बात है?"

"तुम तो भइया दिल्ली में पहले ही से हो। सब जानते हो यहां का हाल। हमको कुछ मालूम नहीं हियां के बारे में।"

"भूमिका मत बांधिए। सीधे प्वाइंट पर आइए।"

"सर्दी आ रही है। गरम कपड़ा बनवाना था।"

"बजट क्या है?"

"बजट तो कुछ नहीं बनाया है। पर कुछ खर्चा काट कूट कर बनवाना तो है ही। सुना है यहां जाड़ा बहुत पड़ता है। और हमको जाड़ा लगता बहुत है।"

"स्वेटर बिनवाना है, रिडिमेड लेना है, कोट या सूट सिलवाना है। पहले यह तय कर लीजिए। नहीं, वह मकान वाला किस्सा मत दुहरा दीजिएगा जैसे डेढ़ सौ रुपए में आप साऊथ डेलही में कमरा ढूंढ रहे थे।" आलोक कुछ-कुछ खीझता हुआ बोला।

"जो हो, दाद देनी पड़ेगी सुजानपुरिया की। कि भले जमुनापार जरा उजाड़ में ही सही पर लिया कमरा तो डेढ़ सौ रुपए में।" उमेश बोला।

"वो भी बिजली पानी सहित।" सुजानपुरिया उचकते हुए बोला।

"फिर ठीक है। तीन सौ में आपको सिलाई सहित सूट मिल जाएगा।" आलोक सर्रे से बोला।

"कहां भइया!" सुजानपुरिया उचक कर खड़े हो गए, "कल ही दिलवाये दो।" पर तुरंत सवाल भी कर बैठे, "मजबूत तो होगा। चल जाएगा दो चार साल?"

"बिलकुल।" मजबूत इतना कि बड़े होकर आपके बच्चे भी पहनेंगे।

"फिर कल्है चलइ चलौ।" सुजानपुरिया उत्साहित हो गए थे।

"कल क्या आज ही चले चलिए।"

"नहीं, आज नहीं।"

"क्यों?"

"कल पैसा लेकर आएंगे तब।"

"आएंगे क्या सीधे लालकिला के पिछवाड़े चले जाइएगा। वहीं मिल जाएगा। बस दिक्कत यही है आपके नाप का मिलेगा कि नहीं?"

"धत्। हुआं तो हम होइ आए हैं। वो तो पुराना-पुराना है।"

"तो क्या हुआ। ड्राई क्लीन करवा लीजिएगा। दूसरा क्या जानेगा कि आप ने पुराना खरीदा कि नया।"

"पर सुना है एड्स हो जाता है। ना भाई ना।" कहते हुए सुजानपुरिया पायजामा खोंसते, कमीज की कालर का बटन बंद करते खिसक लिए।

बाद के दिनों में सुजानपुरिया ने गरम कपड़े के बाबत दफ्तर के छोटे-बड़े लगभग सभी से कंसल्ट किया। जाड़ा आ गया पर गरम कपड़ा नहीं बना। लेकिन अचानक एक दिन वह रूई वाला जाकेटनुमा लिहाफ पहने दिखे। बड़े खुश। आलोक ने देखते ही उन्हें टोका, "तो सुजानपुरिया जी आप की समस्या साल्व हो गई?"

"और नहीं तो क्या। पर तुम तो एड्स दिला रिया था और लूट अलग से रिया था।" वह जाकेट दिखाते हुए आलोक से कहने लगा, "यह देखो तीस रुपए में। सिर्फ तीस रुपए में। एकदम नया। और तू हमें तीन सौ रुपए में एड्स दिला रहा था। रैकेटियर कहीं का।"

"क्या कहा?"

"रैकेटियर।" वह हाथ उठा कर बोले, "और हमीं नहीं यहां सभी तुम्हें रैकेटियर कहते हैं।" और सुजानपुरिया यह बात कुछ ऐसे रिदम में कह रहे थे जैसे, "हमीं नहीं सभी लाजवाब कहते हैं।" फर्क था तो सिर्फ मुहम्मद रफी की गायकी और सुजानपुरिया की झक्की स्टाइल का। पर वजन और लय बिलकुल वही।

आलोक अभी सुजानपुरिया से कैसे पिंड छुड़ाए यह सोच ही रहा था कि तब तक उमेश आ गया।

"कितने मे लिया सुजानपुरिया जी!" उसने उनका रूई वाला जाकेट छूकर देखते हुए पूछा।

"तीस रुपए में।" सुजानपुरिया ठसक में थे।

"सिर्फ तीस रुपए में?"

"और क्या?"

"अरे बस का टिकट भी तो लिया होगा?" उमेश जाकेट गौर से देखते हुए बोला।

"नहीं।"

"विद आऊट टिकट?"

"नहीं-नहीं। टिकट सुरेश ने लिया। उसी ने खरीदवाया जनपथ से आज।"

"फिर तो सेलीब्रेट करिए। ज्यादा कुछ नहीं, चाय से भी काम चल जाएगा।"

"अभी तक आलोक लूट रिया था। तीन सौ में एड्स दिला रिया था। अब तू लूटने आया है।"

"एक कप चाय में क्या लुट जाएंगे सुजानपुरिया जी!"

"बड़ा चूतिया है। तुझे एक कप पिलाऊंगा तो सभी हड्डे की तरह पीछे पड़ जाएंगे। किस-किसको पिलाऊंगा।" मेरा तो भट्ठा बैठ जाएगा। जाकेट से ज्यादा चाय में चला जाएगा। जाकेट से ज्यादा चाय में चला जाएगा।" सुजानपुरिया पूरे फार्म में थे, "जा अपना काम कर!"

आलोक के लिए वह दिन बड़ा भारी था। उससे एक बड़ी खबर छूट गई थी। सुबह-सुबह संपादक ने डांटा संपादक से छुट्टी मिली तो सुजानपुरिया सवार हो गए। और उस लड़की को भी जो नहीं कहना चाहिए था उसे उस दिन ही कह दिया था। हालां कि संपादक की डांट धोने की गरज से वह टाई वाई बांध कर आया था और रह-रह कर टाई की नॉट दिन भर टाइट करता रहा। टाई की नॉट तो टाइट रही दिन भर, पर उसका चेहरा फिर भी टाइट नहीं हो पाया। ढीला-ढीला वह घूमता, जेब में हाथ डाले कभी इस फोन, कभी उस फोन पर जूझता रहा।

शाम को वह उदास चेहरा लिए पर झूमती चाल से जब कैंटीन में घुसा तो सबकी नजरें उसी पर थीं। संजय ने उसे देखा, सिगरेट सुलगाई और उसे पुकारा, "आलोक इधर आओ।"

"बोलो।" वह आता हुआ बोला।

"सुना आज उसने तुमको भी भइया कह दिया?" संजय उससे खेलते हुए बोला।

"तो क्या हुआ?" आलोक ने हिकारत से पूछा।

"कुछ हुआ ही नहीं?" संजय जब यह आलोक से पूछ रहा था तो कैंटीन में मौजूद लोग आलोक का जवाब सुनने के लिए और पास खिसक आए। और जैसे अपने-अपने कान खड़े कर लिए।

"तुम लोग शायद एक बात मेरे बारे में नहीं जानते हो।" उसने सबको एक साथ घूरते हुए कहा, "मैं बहन चोद भी हूं। बहनचोद! समझे!" उसने टाई की नॉट ढीली की और बोला, "सिर्फ बकचोद नहीं। मैं फिर दुहरा रहा हूं, उसे नाप कर दिखाऊंगा।"

कैंटीन की भीड़ छट गई थी। पर संजय और आलोक बैठे रहे। बैठे-बैठे दुष्यंत कुमार की गजलों, अरुण साधू के उपन्यास बंबई दिनांक, पंजाब में भिंडरांवले की वह वहशतियाना हरकतों और डी.टी.सी. बसों की बदहाली तक के बारे में बतिया गए। जब काफी देर हो गई तो संजय उठ कर जाने लगा। आलोक उसे पकड़ कर बैठाने लगा तो संजय ने उससे कहा, "क्यों आज खबर नहीं लिखनी?"

"नहीं। आज झांट एक खबर नहीं लिखूंगा। देखता हूं कौन क्या उखाड़ता है।" आलोक सचमुच उखड़ा हुआ था।

"पर मुझे तो लिखनी है।" कह कर संजय जाने लगा तो आलोक भावुक होता हुआ बोला, "बैठो तो सही।"

"जल्दी बोलो!" वह उसकी भावुकता धोता हुआ बोला।

"क्या बोलें। साले, सुपरफास्ट हुए जा रहे हो।"

"फिर भी?"

"बताओ तुम्हें तकलीफ नहीं होती। कि सबसे ज्यादा एक्सक्लूसिव स्टोरिज फाइल करो। और एक दिन एक झांट सी खबर छूट जाए तो साले लौंडा़ काट कर हाथ में थमाने लगते हैं। सिंसियरिटी का पाठ पढ़ाने लगते हैं। बास्टर्ड! सरकुलेशन और साख समझाने लगते हैं।" आलोक उखड़ा-उखड़ा बोलता जा रहा था, "साले बनिये का कच्छा धोती-धोते-धोते संपादक बन गए तो दिमाग खराब हो गया है। अरे जाओ साले अइसे ही है तो सरकुलेशन मैनेजर हो जाओ, जनरल मैनेजर हो जाओ, कच्छे धोती से प्रमोशन पर पेटीकोट, पैंटी और ब्रा धोने को मिलेगा। हिप्पोक्रेट साले!"

"पर एडीटर तो यार तुम्हें मानता है।"  

"तभी न जब-तब मेरी मारता रहता है।"

"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है।" कह कर संजय चल दिया। आलोक ने उसे फिर टोका, "सुनो तो सही।"

"सॉरी, अभी नहीं। अब एक डढ़े घंटे बाद।" कहते हुए संजय जाने लगा तो आलोक बोला, "लगता है आज कोई लंबा थाम के आए हो।" कहते हुए उसने टांट किया, "बाटम है कि लीड?"

"अरे कुछ नहीं!" कह कर संजय चला गया पर आलोक बैठा रहा।

उन दिनों आलोक दफ्तर की एक टेलीफोन आपरेटर को भी नापने में लगा हुआ था। उस टेलीफोन आपरेटर के कई आशिक थे। जिनमें एक फिल्म क्रिटिक सुरेंद्र मोहन तल्ख भी था। तल्ख उर्दू पत्रकारिता करते-करते अचानक बुढ़ौती में हिंदी पत्रकारिता में समा गया था। अक्सर गलत हिंदी लिखता था पर रहता ऐंठा-ऐंठा। बेवजह ऐंठे रहना उसकी आदत में शुमार था। पर लड़कियों या महिलाओं को देखते ही वह पानी-पानी हो जाता। तब उसकी सारी अकड़ फड़फड़ा कर जाने कहा उड़ जाती थी। लगता ही नहीं था तब यह तल्ख वही तल्ख है। अक्सर वह लाल किले के पीछे वाली मार्केट या जामा मस्जिद वाली पुराने कपड़ो के मार्केट से खरीदी पैंट पहनता। ऐसे वाले सूट भी उसके पास तीन चार थे। पर सारे सूटों पर वह जाने क्यों हमेशा एक ही टाई बांधता था। शायद वह नई थी। पर सुर्ख लाल। उसकी कमीज की कालर और सूट के कोट की कालर, दोनों ही बड़ी-बड़ी कुत्ते की कानों की तरह लटकी होती। इन कालरों के बीच बंधी टाई को देखकर चपरासी की टिप्पणी, "रजिया फंस गई गुंडों में" सबको मजा देती। पर तल्ख इन सब चीजों से बेखबर अकड़ा, ऐंठा बैठा रहता।

इत्तफाक से उस इकलौती लड़की की सीट भी तल्ख के पास ही था। उससे मिलने जब-तब कोई न कोई लड़की मिलने आती रहती। और कई बार वह तीन-चार-पांच की संख्या में भी होतीं। तल्ख उन लड़कियों की फौरन गिनती करता चपरासी बुलाता और गिनती से दो चाय समोसा या सुहाल सहित मंगवा भेजता। उनके बीच चाय भिजवा कर तल्ख उनके पास जाकर खड़ा हो जाता। कहता, "मे आई ज्वाइन योर कंपनी?" और दूसरे ही क्षण कुर्सी खींच कर उनके बीच बैठ जाता। वह लड़की कई बार इस बाबत तल्ख से ऐतराज जताते-जताते थक गई, कई बार उन चायों के पैसे देने की कोशिश की, शिकायत की। सब बेकार। तल्ख इस तरह अक्सर उस लड़की और उसकी सेहिलियों के बीच बैठ उनका मन, मिजाज और माहौल तल्ख कर देता। पर इसका उसे इल्म नहीं रहता। उर्दू अखबारों की राय का छोटा सा पीस लिखने में उसे दो-दो, तीन-तीन लग जाते। तब जब कि वह इसमें युद्ध स्तर पर लगा रहता।

वह जब-तब उस लड़की को उर्दू सिखाने की भी पेशकश करता रहता। कहता, "मैं तुम्हें उर्दू, सिखा देता हूं तुम मुझे हिंदी सिखा दो।" लड़की कहती, "मैं अप्रेटिस! कैसे सिखा सकती हूं आपको हिंदी। और मुझे उर्दू सीखनी नहीं।" पर तल्ख फिर भी "मैं तुम्हें उर्दू, तुम मुझे हिंदी" की चरस बोए रहता। संपादक उसे अक्सर समझाता रहता कि बोलचाल की हिंदी लिखा करिए। हिंदी की आचार्य किशोरी दास वाजपेयी वाली वर्तनी भी उसके लिए दर्द बनी रहती। इस चक्कर में कई बार तल्ख कुछ का कुछ कर बैठता। जैसे कि एक फिल्मी लेख में यह जिक्र था कि शत्रुघ्न सिन्हा सीधे दिल्ली रवाना हो गए। तल्ख ने हेडिंग इस तरह लगाई, "शत्रुध्न सिंहा सीधा हुआ।" ऐसे कई गपड़ चौथ वह अक्सर करता रहता। लोग चिढ़ाते रहते। पर वह अकड़ा- ऐंठा दफ्तर में भी धूप का चश्मा लगाए जब तब सिगरेट फूंकता रहता। चिड़चिड़ाता रहता। तो उस टेलीफोन आपरेटर को भी जब तब वह चाय पिलाता रहता।


इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए दयानंद पांडेय की उपर लगी तस्वीर पर क्लिक करें. पार्ट (11) कुछ दिनों बाद.


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