अपने-अपने युद्ध (11)

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उपन्यासएक बार राजेश खन्ना नाइट दिखाने की तल्ख ने उसे पेशकश की। वह खुशी-खुशी मान गई। तल्ख ने राजेश खन्ना नाइट में दो मिले कार्डों में से एक उसे दिया। दोनों पर सीट नंबर थे। दोनों ही सीटें साथ की थीं। तल्ख मगन था टेलीफोन आपरेटर को कार्ड देकर कि बगल में बैठेगी। पर सुरेंद्र मोहन तल्ख की बदकिस्मती देखिए, उस शाम टेलीफोन आपरेटर की रिलीवर ने छुट्टी की अप्लीकेशन भेज दी। सो उस टेलीफोन आपरेटर को ओवरटाइम और राजेश खन्ना नाइट में से एक चुनना था। उसने ओवरटाइम चुना। फिर अचानक उसे लगा कि राजेश खन्ना नाइट का कार्ड वह बेवजह क्यों खराब करे, क्यों न किसी को दे दे। और देने के नाम पर उसे मिला भी तो आलोक। आलोक से टेलीफोन आपरेटर हंस कर बोली, 'कहिए तो आज आपकी रात रंगीन करा दूं?' आलोक भी लस गया- नेकी और पूछ-पूछ? पर जब रात रंगीन करने के नाम पर उसने उसे राजेश खन्ना नाइट का कार्ड थमा दिया तो आलोक मायूस हो गया।

बोला, "शुक्रिया! चला जाऊंगा।" पर तल्ख की बदकिस्मती यहीं खत्म नहीं हुई। आलोक को भी अचानक एक खबर में उलझ जाना पड़ा। जिसमें आधी रात भी हो सकती थी। इसी खयाल में उससे सुजानपुरिया टकरा गया।

"क्या हाल हैं सुजानपुरिया जी?" आलोक ने पूछा।

"कुछ नहीं ड्यूटी खत्म। घर जा रिया हूं।"

"कहीं और तो नहीं?"

"ना भइया अब नहीं।" कह कर वह कान पकड़ने लगे।

सुजानपुरिया ताजा ताजा जी.बी. रोड पर पूरी तनख्वाह गंवा आए थे। हुआ यह था कि सुजानपुरिया के बीवी बच्चे आगरा गए हुए थे। सो उनको कुछ "चेंज" की सूझी। जिस-तिस से वह, "कहां मिलेगी," "कोई जुगाड़ कराओ," "कुछ चक्कर चलाओ," जैसी बाते करते थे। एक प्रूफ रीडर ने एक दिन उनसे कह दिया, "क्या मुंह बाए हर दम भुखाए घूमते रहते हैं। माल जेब में डालिए और गांधी बाबा रोड निकल जाइए। न हाय, न किच-किच।"

"गांधी बाबा रोड?" सुजानपुरिया की जिज्ञासा बढ़ गई थी।

"अरे वही जी.बी. रोड। उसका असली नाम गांधी बाबा रोड है।"

सुजानपुरिया ने उस प्रूफ रीडर से जी.बी. रोड का पूरा खाका लोकेशन ले लिया। पहली तारीख को तनख्वाह मिली। उन्होंने अजमेरी गेट की बस पकड़ी और पहुंच गए जी.बी. रोड।

सुजानपुरिया को रंडियों के पास जाने का तजुर्बा पहले से था। आगरा में कई बार जा चुके थे। सो जानते थे कि रंडियां जामा तलाशी से सारा पैसा निकलवा लेती हैं। सो वह पूरे एहतियात के साथ पहुंचे। फुटकर सौ रुपए दो जेबों में रखा और बाकी तनख्वाह पैरों के मोजों में ठूंस कर छुपा ली। गए छांटा बीना और यहां भी सबसे सस्ती औरत तय की। जब मौका हाथ आया तो वह पायजामा उतार कर खड़े हो गए। पर जूता पहने रहे। उस औरत ने इन्हें डांटा, "जूते भी उतारो।"

"नहीं जूते नहीं।" कहते हुए सुजानपुरिया ने हाथ जोड़ लिए। औरत तड़ गई। उसने बड़ी फुर्ती से इनका जूता उतार कर मोजा टटोल लिया। बोली, "बड़ी बदबू आ रही है। इसे भी उतार देते है।" सुजानपुरिया का सारा मजा खराब हो गया। वह उस औरत के पैरों पर गिर पड़े। बड़ी मिन्नत की, "नहीं मोजे नहीं।" पर उनके दोनों मोजे उसने निकाल कर पैसे ब्लाउज में खोंस लिए। सुजानपुरिया गिड़गिड़ाते रहे। पर उसने उनकी एक न सुनी और कमरे से बाहर कर दिया। सुजानपुरिया बिना कुछ किए धरे बेरंग तनख्वाह गंवा कर बाहर हो गए। अब तक कई औरतों ने उन्हें घेर लिया था। कोई गुदगुदा रही थी, कोई चुटकी काट रही थी तो कोई टीप मार रही थी। सुजानपुरिया रोने लगे। पैसे मांगने लगे। सभी औरतों के पैर पड़-पड़ के गिड़गिड़ाएं, "बहन जी ऐसा मत करिए।" पर बहन जी लोगों ने सुजानपुरिया को हड़का लिया। सुजानपुरिया चीखते चिल्लाते रहे, "बहन जी ऐसा मत करिए। बहन जी मेरे पैसे दे दीजिए।" पर कोई फायदा नहीं हुआ। सुजानपुरिया अंतत: हार गए और जान गए कि अब पैसा वापस नहीं मिलने वाला तो उन्होंने एक कोशिश और की "तो फिर बहन जी कर लेने दीजिए।" "कर लेने दीजिए" सुनना था कि औरतों ने सुजानपुरिया को सीढ़ियों पर ढकेल दिया और कहा कि, "बहन जी बोलता है और करेगा भी। भाग भड़ुए साले।"

सुजानपुरिया ने फिर भी बड़ी मिन्नतें की सीढ़ियों पर खड़े-खड़े। पर न उन्हें करने को मिला, न पैसा ही मिला। बहुत रोने-पीटने पर उनका पायजामा, जूता और घर वापस जाने के लिए पांच रुपए उन्हें मिल पाए। सुजानपुरिया रोते पीटते उसी रात दफ्तर आए। सारा किस्सा सुनाया। एक रिपोर्टर, एक सब एडीटर उन्हें साथ लेकर अजमेरी गेट थाने गए। पुलिस अखबार वालों के नाम पर मदद करने को न सिर्फ तैयार हुई बल्कि इंस्पेक्टर ने तुरंत एक सब इंस्पेक्टर, दो सिपाही भी साथ भेजे। पर अफसोस कि कई कोठों की सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते सुजानपुरिया यही नहीं शिनाख्त कर पाए कि वह गए कहां थे और लुटे कहां थे? दो घंटे की मशक्कत के बाद थक हार कर सब लोग वापस आ गए। सुजानपुरिया ने फिर कुछ उधार, कुछ एडवांस लेकर महीना गुजारा।

आलोक यही सोच कर उन्हें चिढ़ा बैठा, "कहीं और तो नहीं?" और जब सुजानपुरिया, "ना भइया, अब नहीं" कह कर कान पकड़ने लगे तो आलोक ने सोचा कि क्यों न राजेश खन्ना नाइट का पास सुजानपुरिया को थमा दे।

"राजेश खन्ना नाइट देखेंगे?" आलोक ने सुजानपुरिया से पूछा।

"कब?" सुजानपुरिया अफनाए।

"आज ही।"

"आज ही?"

"हां, आज ही। जाना हो तो बताइए।"

"इंतजाम हो जाएगा क्या, इंतजाम हो गया है।" कहते हुए आलोक ने सुजानपुरिया को राजेश खन्ना नाइट का पास थमा दिया। सुजानपुरिया पास पाते ही खिल उठे। जाने के लिए बस नंबर, बस स्टैंड की जानकारी ले वह बड़ी फुर्ती से निकल गए। जाते-जाते बोले, "आज तो मजा आ गया।"

सुजानपुरिया पहुंचे तो हाल के बाहर सुरेंद्र मोहन तल्ख बड़ी बेचैनी से टहलता नजर आया। सुजानपुरिया ने उन्हें लपक कर नमस्कार किया। पर तल्ख ने सुजानपुरिया को कोई तबज्जो नहीं दी, न कोई जवाब दिया नमस्कार का। सिगरेट फूंकते हुए वह दूसरी ओर देखने लगा। सुजानपुरिया भी उसकी परवाह किए बिना पायजामा उठा कर दूसरे हाथ से बंद कालर की बटन टटोली और हाल में घुस गए। अंदर कार्यक्रम चालू था। बड़ी मुश्किल से वह अपनी सीट ढूंढ पाए। क्योंकि तब हाल में अंधेरा था। पर स्टेज की लाइट से वह ढूंढते ढूंढते अपनी सीट पर बैठ गए। पूरा हाल भरा था। पर उनके बगल की सीट खाली थी। कोई आधे घंटे बाद अंधेरे में ही तल्ख आया और उस खाली सीट पर बैठ गया। सुजानपुरिया ने उसे देखा तो पर तन कर कंधा उचका कर वह कार्यक्रम देखने में मशगूल हो गए पर तल्ख से बोले नहीं। थोड़ी देर बाद तल्ख ने सुजानपुरिया के हाथ की उंगुलियों को धीरे से छुआ। सुजानपुरिया ने सोचा यूं ही छू गया होगा। पर जब तल्ख ने छूते-छूते हलके-हलके दबाना शुरू किया तो सुजानपुरिया बिदक गए और कर्कश आवाज में कुछ ऐसे बोले जैसे खौलता पानी, "ये क्या कर रिया है?"

सुनते ही तल्ख छटक कर खड़ा हो गया, "तुम यहां कैसे आ गए?"

"पास है मेरे पास।" अकड़ते हुए सुजानपुरिया तल्ख को सफाई देते हुए जेब से पास निकाल कर दिखाने लगा।

"पर तुम्हें ये पास मिला कैसे?" तल्ख अपना आपा खो बैठा था।

"तुमसे मतलब?" कह कर सुजानपुरिया ने तल्ख का दिमाग बिलकुल ही खराब कर दिया। तल्ख तुरंत उठ गया और पैर पटकते हुए हाल से बाहर चला गया।

दूसरे दिन तल्ख ने उस टेलीफोन आपरेटर की ऐसी तैसी कर डाली। उसको रंडी, छिनार जैसे सारे विशेषण सरेआम दे डाले। और कहा, "क्यों नहीं आ सकती थी मेरे साथ राजेश खन्ना नाइट देखने?"

"सुनिए तो तल्ख साहब!"

"क्या सुनूं?" तल्ख कुछ सुनना नहीं, कहना ही चाहता था, "मैंने देखा है होटलों में लोगों के साथ तुम्हें जाते। और कई बार देखा है। फिर मेरे साथ बैठने में, देखने में क्या दिक्कत थी और जो बड़ी सती सावित्री बनती है तो बन, पर उस चूतिए सुजानपुरिया को क्यों पास दे दिया? मारा साले ने सारा मजा खराब कर दिया। जायका बिगाड़ दिया।" तल्ख हांफने लगा था, "क्या लगता है सुजानपुरिया तेरा?"

"पर मैंने सुजानपुरिया को पास नहीं दिया।" वह बिफरी।

"तो मेरा दिया पास उसके पास कैसे पहुंचा?"

"पता नहीं। पर मुझे ओवर टाइम मिल गया था तो पास आलोक को दे दिया था कि क्यों खराब करूं पास।"

"ओवर टाइम मिल गया था कि कोई ग्राहक?"

"देखिए तल्ख साहब तमीज से बात करिए।"

"क्यों क्या कर लेगी? आलोक से कह देगी। क्या कर लेगा वह लौंडा मेरा!"

"देखिए तल्ख साहब!" वह रूआंसी हो गई।

"क्या देखूं कि आज कल आलोक से साथ रातें गुजार रही हो? काल गर्ल साली।"

"तल्ख साहब आप प्लीज यहां से जाइए।" कहते-कहते वह फफक कर रो पड़ी।

तल्ख चला गया।

बाद में कुछ लोगों के उकसाने पर टेलीफोन आपरेटर तल्ख की बदतमीजी की लिखित शिकायत लेकर संपादक के पास चली गई। संपादक ने तल्ख को तुरंत बुलवाया और बहुत डांटा। कहा कि अपनी उम्र पर शर्म कीजिए और इस महिला को अपनी बेटी, बहन जो कह पाइए, कह कर माफी मांगिए। तल्ख कसमसाया तो बहुत। पर कोई और चारा भी नहीं था। उसने एक बार सोचा कि माफी मांगने के बजाय इस्तीफा लिख दे। लेकिन इस बुढ़ौती में कहां नौकरी ढूंढता फिरेगा भला? तल्ख ने "माफ कर दीजिए गलती हो गई।" कहा और जाने लगा।

संपादक ने उसे टोका कि, "ऐसे नहीं। मैंने कहा था कि बहन या, बेटी कह कर माफी मांगिए।" तो तल्ख की जबान जैसे रूंध गई। बोला, "बहन जी, माफ कर दीजिए।"

तल्ख दिन भर अनमना बैठा सिगरेट फूंकता रहा। शाम को जाते समय चपरासी को छुट्टी की अर्जी लिख कर देता गया। और फिर हफ्ते भर नहीं आया। उधर इत्तफाक ही था कि टेलीफोन आपरेटर भी हफ्ते भर की छुट्टी पर चली गई।

राजेश खन्ना नाइट और सुजानपुरिया, तल्ख तथा टेलीफोन आपरेटर दोनों को भारी पड़ गए थे। पर आलोक को गपियाने के लिए एक नया किस्सा मिल गया था। दृश्य-दर-दृश्य वह लोगों को मिर्च मसाला लगा कर यह किस्सा सुनाता और कहता, "तल्ख भी साला बहन चोद हो गया। अपनी जमात में आ गया। बहन जी माफ कर दीजिए। बुड्ढा साला!" कह कर वह हंसने लगता, "चूतिया राजेश खन्ना नाइट दिखा रहा था। अरे, सीधे "आफर" करता जैसे मैं करता हूं। आखिर मकसद तो वही था, "सेक्स!"

चेतना के साथ संजय का मकसद भी साफ था- सेक्स! जिसकी गंध ने कोई ओछी हरकत करके देने के बजाय सीधी बातचीत में दे दी थी। उसने सोच लिया कि अव्वल तो चेतना अब उससे मिलेगी नहीं। और दूसरे जो मिलेगी तो वह सीधा-सीधा प्रस्ताव रख देगा। जैसे दिल्ली में नीला के साथ रख दिया था।

नीला!

उन दिनों वह फिल्म समीक्षाएं भी लिखा करता था। तब वी.सी.आर. या केबिल का इतना जोर नहीं था। टीवी चैनल नहीं थे। पिक्चरें सिनेमा हाल में ही देखनी पड़ती थीं। वह टाइपिस्ट उसकी फिल्म समीक्षाएं टाइप किया करती थी। वह जब उसके पास जाता तो वह झट से मुसकुरा पड़ती। एकाध बार उसने कहा भी, "संजय जी हमको पिक्चर दिखा दीजिए।" पर वह टाल गया। उसने सोचा वह पास मांगना चाहती होगी। शक्ल सूरत में भी वह कोई खास नहीं थी कि संजय उससे लाइनबाजी करता। दुबली-पतली, सांवली सी काया थी उसकी। सो वह उसे "क्लिक" नहीं करती थी और फिर संजय उन दिनों खाली भी नहीं था। दूरदर्शन की एक कैजुअल एनाउंसर के साथ उसकी उन दिनों लाइनबाजी चल रही थी। पर उसने हर बार सिनेमा दिखाने की बात कहनी शुरू की तो संजय ने उससे पूछ लिया, "कितने लोग जाएंगे देखने?"

"क्या?" वह चौंकी।

"मतलब आपके परिवार में जितने लोग हों लोगों का पास ला दूं। शो और तारीख भी बता दीजिए।"

"संडे को मैटनी रख लीजिए। छुट्टी भी रहेगी!" कहती हुई वह अर्थपूर्ण हंसी, हंसी। पर संजय ने इसकी नोटिस नहीं ली।

"पर कितने लोग?"

"पांच ले लीजिए।" कहते हुए वह टाइप करने लगी। दूसरे दिन संजय ने उसे पांच फ्री पास लाकर दे दिया और बता दिया, "इस पर कोई पैसा नहीं देना पड़ेगा।"

"क्यों आप साथ नहीं रहेंगे?" उसने बेधड़क पूछा तो संजय शरमा गया बोला, "पास पांच ही हैं न।"

"पर हमने तो आप को भी गिन कर पांच बताया था। हम तो चार ही लोग हैं।"

"फिर भी सॉरी!" कहते हुए संजय ने उसे बताया, "संडे को आपकी छुट्टी है, मेरी नहीं। मुझे तो खबर लिखनी ही है। और संडे को साइंटिस्टों का एक सेमिनार है प्रदूषण पर। उसे कवर करना है।"

"फिर भी कोशिश कीजिएगा।"

"अच्छा देखेंगे।" कह तो दिया संजय ने। पर संडे को वह नीला नाम की उस टाइपिस्ट के साथ सिनेमा देखने नहीं जा पाया।

मंडे को दफ्तर में जब नीला मिली तो संजय ने उससे औपचारिकतावश पूछ लिया कि, "पिक्चर कैसी थी?"

"पिक्चर तो अच्छी थी पर मजा नहीं आया।"

"क्यों?"

"आप जो नहीं थे?" वह इठलाई, "मैं तो आपके साथ पिक्चर देखना चाहती थी।" सुनकर संजय हकबका गया।

वह समझ गया कि अभी लड़कियों को वह टपाता था पर अबकी यह लड़की उसे टपाने में लग गई है।

वह बोला, "तो ऐसी बात है?"

"और नहीं तो क्या?" वह फिर इठलाई और खिस्स से हंस पड़ी।

"तो ठीक है। कल मंगल है और मेरा आफ है। कल पिक्चर देख लें?"

"पर मेरी तो छुट्टी नहीं है।"

"कोई बात नहीं इवनिंग शो देख लेते हैं।"

"इवनिंग शो?"

"क्यों? क्या बात है?"

"घर जाने में देर हो जाएगी।" कहते हुए वह चिंतित सी हुई पर बोली, "खैर कोई बात नहीं मैं मैनेज कर लूंगी।"

"तो कल शाम यहीं दफ्तर से ले लूं?"

"नहीं-नहीं। यहां ठीक नहीं रहेगा।" वह टालती हुई बोली।

"तो फिर?"

"आप जहां कहिए मैं वहीं पहुंट जाऊंगी।" फिर उसने खुद ही तय किया कि, "दरियागंज में गोलचा टाकीज पर ही सवा पांच बजे मिलते हैं।"

"पर पिक्टर तो साढ़े छ: बजे शुरू होगी?"

"पर मेरी छुट्टी तो पांच बजे हो जाएगी। दफ्तर में बैठने से अच्छा आपके साथ बैठूंगा।"

"तो ठीक है।" संजय बोला।

दूसरे दिन संजय शाम पांच बजे ही गोलचा पर पहुंच गया। नीला भी सवा पांच से पहले आ गई। आज वह और दिनों की अपेक्षा बन ठन कर आई थी, कलफ लगी साड़ी पहन कर।

"अभी तो काफी टाइम है पिक्चर में।" संजय ने अब तक तय कर लिया था कि पिक्चर देखने में वक्त खराब करने से कोई फायदा नहीं। खास कर तब जब लड़की खुद ही तैयार दिखती हो। सो उसने तुरंत तीन प्रस्ताव रख दिया, "कहीं और चलें, काफी पिएं, कि अपने घर चलें?"

"कहां रहते हैं आप?"

"गोल मार्केट में।"

"किधर है ये?"

"कनॉट प्लेस के पीछे।"

"अच्छा अच्छा।" कहते वह बोली, "अपना है?" संजय ने बताया, "नहीं किराए का।" फिर उसने पूछा, "कौन-कौन है आपके घर में?"

"फिलहाल अकेला हूं।" सुनकर वह एक अर्थपूर्ण मुसकान फेंक कर रह गई। पर बोली कुछ नहीं। उसकी चुप्पी तोड़ते हुए संजय फिर बोला, "तो कहां चलें?"

"आपके घर ही चलते हैं।"

"ओ.के.।" संजय खुश हो कर बोला।

घर पहुंच कर संजय ने उसे चाय बना कर पिलाई। फिर बेडरूम में नीला को ले जाकर एक कुर्सी पर बिठा दिया। और खुद भी एक कुर्सी लेकर उसकी बगल में बैठ गया। बड़ी देर तक दोनों फिल्म, दफ्तर की पालिटिक्स और इधर-उधर की बातें करते रहे। इस बीच संजय ने तीन चार बार जानबूझकर अपना पैर उसके पैर से सटाने की कोशिश की। पर जताया यही कि यह अनायास हो गया है। पर जब-जब उसने नीला का पैर अपने पैर की अंगुलियों से छूने की कोशिश की तब-तब उसने अपना पैर धीरे से पीछे खिसका लिया। पर न तो विरोध किया, न ही मुंह से कुछ कहा। पर पैर हटाने के थोड़ी देर बाद अपना पैर फिर वहीं रख देती। और संजय फिर पैर की अंगुलियों से उसे टटोलने लगता। यह अंगुलियों का खेल खेलते-खेलते जब सवा घंटे से भी ज्यादा हो गया तो संजय के मन में आया कि वह उठे और नीला को बांहों में भर ले। पर यह हरकत उसे ओछी लगी। सो उसने ऐसा नहीं किया और तय किया कि क्यों न सीधा प्रस्ताव रख कर पूछ ले। और नीला से कहा, "अगर  बुरा न मानो तो एक बात कहूं?"

"कहिए।" वह गंभीर होती हुई बोली।

"नहीं, बुरा मान जाओगी।"

"बुरा मानने वाली बात होगी तो जरूर मानूंगी।"

"तब रहने दो।"

"पर बात क्या है?"

"अब जाने दो।"

"क्यों ऐसी क्या बात है?"

"कहा न बुरा मान जाओगी।"

"कौन सी बात है जो मैं बुरा मान जाऊंगी?"

"बुरा मानने वाली भी बात है और नहीं भी।"

"तो कह डालिए।"

"पहले वादा करो कि बुरा नहीं मानोगी।"

"चलिए, नहीं बुरा मानूंगी।" कहते हुए वह इठलाई।

"मैं तुम्हारे साथ सोना चाहता हूं।" वह अटका, "मतलब तुम्हारी देह।" वह फिर अटका, "मतलब सेक्स!"

कह कर संजय चुप हो गया। ऐसे जैसे उसने कोई अपराध कर दिया हो। नीला भी चुप रही। उसके चेहरे पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी।

"आखिर बुरा मान गई?" थोड़ी देर बाद संजय बोला।

"कौन सी बात बुरा मान गई?" नीला ने अपने पैर की अंगुलियों से फर्श कुरेदते हुए पूछा।

"वही सेक्स वाली।"

"बस! यही कहने के लिए तबसे बैठे थे?"

"नहीं मैं....मैं...."

"और यह कहने में इतनी देर लगा दी?" नीला अब संजय की आंखों में आंखें डाल ऐसे झांक रही थी जैसे उसे लील जाना चाहती हो। पूरा का पूरा।

"तो उधर क्या बैठी हो, इधर आओ!" कुर्सी से बिस्तर पर जाते हुए उसने नीला को भी कुर्सी पर से उठा लिया। दोनों बांहों से उठाते हुए संजय ने नीला को चूम लिया। और बिस्तर तक आते आते चुंबनों की बौछार कर दी। नीला को बिस्तर पर लिटाते-लिटाते वह उस पर पूरा का पूरा लद गया। वह फुसफुसाई, "पर आज ही यह सब नहीं प्लीज!"

"क्यों?" वह भी फुसफुसाया।

"आज मन नहीं है। फिर कभी!" पर संजय अब कहां रुकने वाला था। अब तक वह उसके ब्लाउज के हुक खोलने में लग गया था।

"अच्छा, ऊपर से जरा उतर जाइए। प्लीज!" संजय उसके बगल में होते हुए उसे अपनी ओर भींच कर जब एक हाथ से उसकी ब्रा के हुक खोलते हुए साड़ी पेटीकोट पार करते हुए दूसरे हाथ से उसके नितंबों को सहला रहा था तो वह कहने लगी, "साड़ी खराब हो रही है।" वह किसी भालू की तरह उसे दबोचते जा रहा था पर बोला, "तो साड़ी उतार दो ना।"

"आप छोड़िए तो सही।" पर संजय तो जैसे अफनाया हुआ था। उसने उसका गाल काटना चाहा। पर नीला ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया, "नहीं। काटिएगा नहीं।"

"अच्छा तो साड़ी उतारो।" संजय बुरी तरह उत्तेजित था, "जल्दी, जल्दी।"

"पर मैं तो कह रही थी, आज मान जाते!"

"क्या बेवकूफी है? जल्दी उतारो।" कह कर संजय खुद उसकी कलफ लगी साड़ी खोलने लगा तो वह फिर फुसफुसाई, "प्लीज।"

"चुप्प!" संजय फुसफुसाया। तो वह उठ कर साड़ी उतारती हुए बोली, "मैं फिर रिक्वेस्ट कर रही हूं कि आज नहीं।"

"अच्छा ठीक है। आज नहीं। पर साड़ी तो उतारो। वह नहीं तो बाकी बात तो हो सकती है?"

"हां ये ठीक है।" नीला अभी बोल ही रही थी कि काल बेल बजी। घंटी की आवाज सुनते ही वह घबरा गई। और संजय का सारा नशा, सारी उत्तेजना टूट गई। पर उसने नीला से कहा, "घबराओ नहीं। तुम यहीं रहों। मैं अभी देख के आता हूं।" बाहर दरवाजा खोला तो धोबी कपड़े लेकर आया था जो उसने सुबह उसे प्रेस करने को दिया था। उसने कपड़े लिए और धोबी से कहा, "पैसे बाद में लेना।" और भड़ से दरवाजा बंद कर दिया। वापस आया तो देखा कमरे से नीला गायह थी। वह हैरत में पड़ गया। कहां गायब हो गई? अभी संजय सोच ही रहा था कि नीला की आवाज आई, "कौन था?"

"धोबी। पर तुम हो कहां?"

"यहां।" कहते हुए वह दरवाजे के पीछे से निकली। उसने देखा वह आल्मारी और दरवाजे के बीच छुपी थी।

उसकी साड़ी, पीठ और बाहों पर चूने लग गए थे और जाले भी। उसने देखा, वह सचमुच डर गई थी।

"अच्छा आओ। और साड़ी उतार दो।"

"प्लीज!"

"अब और मूड आफ मत करो।" कह कर संजय ने पैंट कमीज उतारते हुए नीला को बिस्तर में खींच लिया। नीला ने साड़ी उतार दी थी।

"अब ये कौन उतारेगा?" वह नीला से उसका ब्लाउज दिखाते हुए बोला।

"आप भी बस! मानेंगे नहीं।"

"खुद उतार लो तो अच्छा है, नहीं कोई हुक टूट गया तो तुम्ही को मुश्किल होगी।" कह कर वह ब्लाउज के हुक खोलने लगा तो वह बोली, "रहने दीजिए।"

उसने ब्लाउज उतार दिया। ब्रा नहीं उतारा तो संजय उसकी हुक खोलता हुआ बोला, "चलो इसमें हुक टूटने का खतरा नहीं है। इसे मैं ही उतार देता हूं।"

"सब कुछ उतार देना जरूरी है?"

"और नहीं तो क्या?" संजय फिर उत्तेजित हो गया। ब्रा उतार कर जब वह पेंटी पर आ गया तो नीला फिर "प्लीज-प्लीज, नहीं-नहीं" पर आ गई। पर संजय कहां मानने वाला था। पेटीकोट उतारने के बाद संजय ने पाया कि "आज नहीं, आज नहीं फिर कभी।" की रट लगाने वाली नीला तो उसे रोक रही थी पर खुद पानी-पानी हो रही थी। अब संजय उसपर सवार हो गया तो वह रह-रह पैर सिकोड़ने लगी।

"क्या नाटक लगा रखा है?" कह कर संजय ने उसके दोनों पैर कस-कस के फैला कर झटके से ऊपर उठा दिए तो वह, "हाय मम्मी" कह कर चीख पड़ी। पर संजय की उत्तेजना में उसकी चीख दब कर रह गई।

संजय जब हांफता हुआ निढाल हुआ तो फोन की घंटी बज रही थी। उसे बड़ा बुरा लगा। बड़ी देर तक घंटी बजती रही पर उसने रिसीवर नहीं उठाया। घंटी अपने आप बंद हो गई। फोन की घंटी बंद हो गई तो नीला उसके सीने में सिमटते हुए बोली, "यह क्या कर दिया आपने?" अभी वह कुछ बोलता, कि घंटी बजने लगी। हार कर उसने फोन उठाया तो फोन पर एक एम. पी. साबह थे। एक खबर ब्रीफ करना चाहते थे। संजय ने फोन पर "हूं" "हां" कर एम.पी. से छुट्टी ले ली और फोन काट कर रिसीवर भी आफ कर दिया। क्योंकि इस समय वह कोई घंटी वंटी सुनने के मूड में नहीं था। न ही किसी की बात सुनने के मूड में। पर नीला लगातार रह-रह कर "यह क्या कर दिया आपने?" फुसफुसाती रही। आखिर जब आजिज होकर उसने नीला से कहा, "अब चुप भी करोगी, प्लीज!"

"और जो कहीं कुछ गड़बड़ हो गया तो?"

"क्या मतलब?"

"आपने जो किया उससे कहीं गड़बड़ हो गया तो मैं क्या करूंगी? कैसे मुंह दिखाऊंगी किसी को?"

"घबराओ नहीं। एक बार में कुछ नहीं होता। होता भी है तो सिर्फ हिंदी फिल्मों में। हकीकत में नहीं।"

"फिर भी अगर चार आने का तीन ले लिए होते हो अच्छा रहता।" उसका इशारा निरोध की तरफ था।

"अच्छा ठीक है। अगली बार से ले लेंगे।" कह कर अब वह उठना चाहता था। पर नीला उससे चिपटती जा रही थी। उसने घड़ी देख कर बताया कि, "साढ़े आठ बज गए हैं।" पर वह अनसुना कर गई। और तब तक संजय से चिपटी रही जब तक वह उस पर फिर सवार नहीं हो गया। हांफते-हांफते संजय जब उसे पेट के बल उंकड़ कर पीछे से शुरू हो गया तो वह बोली, "अब यह क्या कर रहे हैं?"

"बस चुपचाप रहो।" संजय ने कहा तो बावजूद घुटना दुखने के वह न सिर्फ चुप रही, बल्कि कोआपरेट भी करती रही। बाद में वह बोली, "बड़े एक्सपर्ट हैं आप? क्या-क्या जानते हैं? कहां से सीखा?" जैसे सवालों पर वह आ गई। जाहिर है इस स्टाइल से वह पहली बार परिचित हुई थी, इसीलिए कुछ-कुछ चकित भी थी और खुश भी।

फिर अक्सर हर दूसरी, तीसरी शाम वह संजय के साथ उसके घर में बिताने लगी। और बिना दो तीन बार के वह जाती नहीं थी। चाहे जितना टाइम लग जाए। एक दिन संजय के सीने से चिपकी, उसके बालों को सहलाती हुई बोली, आप जात-पात में विश्वास करते हैं।

"नहीं, बिलकुल नहीं।"

"और आपके घर वाले?"

"मिला जुला रुख है। क्यों?"

"नहीं बस वैसे ही।"

"फिर भी?"

"नहीं कोई बात नहीं।" कह कर वह साड़ी बांधने लगी। साड़ी बांध कर बालों में कंघी करते हुए बोली, "आप की बात मैंने मानी। मेरी एक बात आप भी मान जाइए।"

"बोलो।"

"नहीं, पहले वादा करिए कि मान जाएंगे।"

"चलो, वादा!"

"बिलकुल पक्का!"कहते हुए उसने पीछे से बांहों में भर लिया।

"आप मुझसे शादी कर लीजिए।"

"शादी?" संजय की पकड़ उस पर ढीली पड़ गई।

"देखिए आपने पक्का वादा किया है।"

संजय चुप रहा।

"बोल क्यों नहीं रहे?" वह पलटी और संजय का चेहरा अपने दोनों हाथों में लेती हुई बोली, "बोलिए करेंगे न मुझसे शादी? देखिए आपने पक्का वादा किया है।"

"पर मेरी शादी तो हो गई है। मेरा एक बेटा भी है।" संजय सफाई देते हुए बोला। तो वह जैसे आसमान से गिर पड़ी।

"पर आपने पहले कभी नहीं बताया?" वह बिलकुल हिल गई थी।

"तुमने पूछा ही नहीं।" संजय भी उसकी उदासी से उदास हो रहा था।

"फिर भी आप बता सकते थे।"

"पर इससे क्या फर्क पड़ता है?"

"आपको न सही। हमको तो पड़ता है।" वह ऐसे बोल रही थी जैसे उसके सपनों का गुब्बारा किसी ने जबरिया फोड़ दिया हो।

"ऐसा मत कहो।" कह कर संजय उसे चूमने लगा।

"पर आपकी मिसेज हैं कहां?"

"मायके गई हुई हैं।"

"क्यों?"

"बाथरूम में गिर कर उसका बायां पैर टूट गया था। प्लास्टर के बाद उसकी देख रेख कौन करता यहां। उसका भाई आकर ले गया।"

"कब तक वापस आएंगी आपकी मिसेज?"

"क्या पता?"

"आप मिलने नहीं जाते?"

"अरे कोई दिल्ली में तो हैं नहीं। कि जब मन आए पहुंच जाऊं?"

"अच्छा-अच्छा।" कह कर वह जाने लगी।

"चलो तुम्हें छोड़ दूं।"

"नहीं मैं चली जाऊंगी।"

"चला चलता हूं।"

"नहीं प्लीज!"

इसके बाद वह तीन चार दिनों तक दफ्तर नहीं आई। संजय को उसके घर का पता भी नहीं मालूम था। दफ्तर में पता मालूम करने में वह हिचक गया। आखिर किससे पूछे कि वह कहां रहती है? पता नहीं कौन क्या सोचे।

कोई हफ्ते भर बाद वह दफ्तर में दिखी। उसने जाकर उसे "हलो" किया। तो वह ऐसे पेश आई जैसे उसे जानती ही न हो। संजय को बड़ी तकलीफ हुई। उस वक्त तो वह चला गया। पर थोड़ी देर बाद फिर उसके पास पहुंच गया। फुसफुसाया, "शाम को घर आओगी?"

"क्या?"

"घर!"

"आऊंगी।" संक्षिप्त सा बोल कर वह अपने काम में लग गई।

शाम को वह संजय के घर आई तो खुश थी। पर जाने क्या हुआ कि फफक कर रोने लगी।

"क्या बात हो गई है?" संजय उसे अपनी बाहों में भरता हुआ बोला। पर नीला कुछ नहीं बोली। संजय इस बीच उसके एक-एक करके कपड़े उतारता रहा पर वह सुबकती रही। संजय जब निढाल हुआ तब भी वह रह-रह कर सुबक रही थी। लगातार सुबकती रही थी। आज वह पहली बार के बाद ही कपड़े पहनने लगी।

"आज बात क्या है?" संजय ने पूछा।

"कुछ नहीं।" वह अब भी सुबक रही थी। सीढ़ियां उतरते समय भी वह सुबक रही थी।

दूसरे दिन उसने बताया कि उसकी मम्मी को कुछ शक हो गया है। उसके घर देर से पहुंचने को लेकर भी घर में हंगामा हुआ। मम्मी और भाई दोनों ने उसे मिल कर बहुत मारा था। मार के निशान होंठों पर, मुंह, हाथ और पैर पर भी थे। इसलिए निशान छूटने तक उसे छुट्टी लेनी पड़ी।

"तो जल्दी चली जाया करो न!"

"बात जल्दी जाने भर की नहीं है।"

"फिर क्या है?"

"शक!"

"कैसा शक?"

"मम्मी कहती हैं, अब तू लड़की नहीं लगती। तेरी देह बदल रही है।"

"अब इसका क्या किया जा सकता है?"

"क्यों नहीं किया जा सकता?"

"क्या?"

"आप मुझसे शादी कर लीजिए।"

"पर मैंने तुम्हें बताया कि मेरी शादी हो चुकी है।"

"तो दूसरी भी तो कर सकते हैं?"

"ना!"

"क्यों?"

"अच्छा चलो इस पर फिर कभी सोचेंगे।"

नीला की शामें फिर संजय के साथ रंगीन होने लगीं। शनिवार की शाम वह काफी देर तक संजय की बांहों में पड़ी रही। बोली, "आज जाने का मन नहीं कर रहा।"

"तो मत जाओ।"

"नहीं जाना तो पड़ेगा।" वह रुकी और बोली, "कल तो संडे है। कल आप क्या कर रहे हैं?"

"कुछ खास नहीं।"

"तो कल छुट्टी ले लीजिए। कल दिन भर मैं आपके साथ रहना चाहती हूं।"

"ठीक है। ले लेता हूं कल छुट्टी।"

दूसरे दिन नीला सुबह-सुबह आ धमकी। तब आठ बज रहे थे। पर उसकी सारी योजना पर पानी फिर गया था। संजय की बीवी रात ही आ गई थी। संजय की बीवी को देखते ही नीला को जैसे डंक मार गया। उसका चेहरा बिलकुल फीका पड़ गया और संजय ने नोट किया कि उसका व्यवहार भी असहज, एब्नार्मल हो गया था। वह संजय के घर की एक-एक चीज ऐसे घूर रही थी जैसे वह सब उसका ही है और किसी ने उससे वह जबरिया छीन लिया हो। चाय की प्याली भी पीते-पीते उसने ऐसे छलकाई कि उसकी साड़ी भींग गई।

संजय समझ गया कि अब कुछ अनर्थ होने वाला है। क्योंकि नीला तो एब्नार्मल हो ही रही थी, संजय ने देखा कि उसकी पत्नी भी नीला के व्यवहार से कुछ शंकालु नजरों से उसे घूरने लगी थी।

"घबराओ नहीं वह छूट जाएगा।" संजय बोला तो पत्नी ने पूछा, "कौन छूट जाएगा?" नीला भी अचकचा कर कुछ कहने ही जा रही थी कि संजय फिर बोल पड़ा, "इसका भाई। कल रात मुहल्ले के कुछ लोगों के झगड़े में पुलिस ले गई।" संजय ने जोड़ा, "तभी तो बेचारी सुबह-सुबह आई है।" उसकी ओर लापरवाही से देखते हुए वह बोला, "लगता है रात भर सोई भी नहीं है।"

"हां, हां।" हड़बड़ा कर बोलती हुई नीला जैसे जान में जान आ गई।

"घबराओ नहीं, अभी चलते हैं जरा नहा धो लें।" संजय ने नीला को इशारे से ढाढस दिया।

"पर घटना रात की है। यह अभी आ रही हैं। आपको कैसे पता पड़ा कि इनका भाई बंद है?" संजय की पत्नी फिर शंकालु हुई।

"अरे भाई इसने रात को फोन करके बताया था।"

"पर रात तो मैं आ गई थी। कब फोन आया इनका?"

"तुम्हारे आने से पहले।" संजय ने जैसे सफाई दी, "रात हमने पुलिस कमिश्नर से भी बात की थी पर उन्हें थाने का इंस्पेक्टर नहीं मिल पाया था। अब उनकी बात हो गई होगी सो जाते हैं, छुड़वा देते हैं।"

"पर जब बात हो गई होगी और वह छूट ही गया होगा तो आपको जाने की क्या जरूरत है?"

"तुम्हारे पैर का प्लास्टर तो कट गया है पर तुम्हारे दिमाग पर भी कोई प्लास्टर लगा हो तो उसे कटवा डालो।"

"क्या मतलब?"

"ये औरत होकर अकेले थाने कैसे जाएंगी?"

"कोई और नहीं है इनके घर में?"

"जी नहीं, एक बूढ़ी मां हैं और एक ही भाई।"

"तो वह भाई जाए न?"

"अरे वही तो बंद है।"

"ओह!" कह कर वह किचेन की ओर दौड़ी, "लगता है दूध उबल रहा है।"

जलते दूध की महक सचमुच आ रही थी।

तो क्या नीला की आर्द्र और डरी आंखों में भी कुछ ऐसा उबल रहा था जिसकी गंध संजय की बीवी के नथुनों में किचन में उबलते, जलते दूध की गंध की तरह फड़क रही थी और वह सवाल पर सवाल ऐसे फेंके जा रही थी जैसे कपिलदेव का बाउंसर।

उस दिन संजय ने किसी तरह से बीवी से छुटकारा लिया और नीला को लेकर निकल पड़ा। घर से निकलते ही नीला बोली, "सोचा था आज दिन भर आपके साथ इनज्वाय करेंगे पर क्या बताएं?"

"घबराओ नहीं। फिर भी इनज्वाय करेंगे।"

"कैसे?"

"चलो तो सही।"

"संजय ने पहाड़गंज के एक सस्ते से होटल में कमरा लिया। दरवाजा बंद कर नीला को बाहों में भरे ही था कि कोई दरवाजा नॉक कर रहा था। उसने खोला तो देखा होटल का कोई कर्मचारी खड़ा था।"

"क्या बात है?" संजय ने उसे डपटा।

"सामान कहां है?"

"सामान वामान कहां है। जरा समझा करो।" संजय नरम हुआ।

"तो साहब डबल चार्ज पड़ेगा। बोलो दोगे?"

"चलो तुम्हारे मैनेजर से बात करते हैं।" संजय भड़क रहा था।

"चलो कर लो।"

"तुम चलो मैं अभी आता हूं।" कह कर संजय कमरे का दरवाजा अंदर से बंद करने लगा तो वह कर्मचारी अड़ कर खड़ा हो गया। बोला, दरवाजा अभी मत बंद करो।

"क्यों?"

"पहले डबल पेमेंट कर दो।"

"क्या बदतमीजी है?" कहते हुए संजय मैनेजर के पास पहुंचा और कर्मचारी की शिकायत की।

"वह ठीक बोल रहा है।" मैनेजर उसकी शिकायत खारिज करते हुए बोला, "तुम नहीं जानते। अभी पुलिस रेड पड़ जाएगा तो हम क्या करेंगे?"

"अच्छा चलो, पुलिस आई तो हम संभाल लेंगे। पुलिस कुछ नहीं करेगी।"

"ऐसे ही सभी बोलते हैं। पर पुलिस के आगे कभी किसी की नहीं चलती।"

"पर मेरी चलेगी।"

"कुछ नहीं चलेगी। तुमको भी पुलिस बंद कर देगी, हमको भी और तुम्हारे साथ आई उस लड़की को भी।"

"पर हमारा विश्वास तो करो।"

"कुछ नहीं। हम तो सिर्फ पैसे पर विश्वास करते हैं। और पुलिस भी पैसा ही मानती है सिफारिश-सोर्स नहीं।"

"तो नहीं मानेंगे आप?" संजय ने आखिरी बार कोशिश की।

"नहीं साहब!"

"लूटते हैं साले!" कहता हुआ संजय नीला को लेकर होटल से बाहर आ गया।

"अब कहां चल रहे हैं?" नीला बिलकुल नर्वस हो रही थी।

"कहां चलें, तुम बताओ?"

"हम क्या बताएं।"

"गांधी समाधि चलें?"

"चलिए।"

उस रोज दिन भर गांधी समाधि के पीछे झाड़ की आड़ में और जोड़ो की तरह संजय नीला भी एक दूसरे से चिपकते रहे, एक दूसरे को चूमते रहे। जब कोई आता दिखता तो छिटक जाते। नीला हरदम आशंकित रहती, "कोई आ रहा है।" और दूसरे ही क्षण फिर चिपक जाती।

कुछ दिनों तक दोनों ऐसे ही किसी न किसी सार्वजनिक स्थान, निर्जन सड़क, गांधी समाधि, शांति वन की झाड़ियों में मिलते और चिपकते रहते। वह पीछे वाली स्टाइल बड़े काम आती। वह किसी भी निर्जन सड़क पर पेड़ के पीछे स्कूटर पर झुक कर खड़ी हो जाती और काम बन जाता। और दिल्ली में ऐसी निर्जन सड़कें ढेर थीं। बस थोड़ी हिम्मत चाहिए थी। जो नीला में थी। एक दिन दफ्तर की कैंटीन में गप्प गोष्ठी चल रही थी। अचानक सुरेश आया और बोला, "संजय की तो अब खैर नहीं है।" वह बहुत गंभीर था।

"पर हुआ क्या?" आलोक ने पूछा।

"अरे, ये आजकल लगातार एड्स के साथ देखे जा रहे हैं।" उसने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा, "रिपोर्टिंग पर तो इनके असर पड़ ही चुका है। अब यह देह से भी कब बीमार होते हैं, यही देखना है।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" संजय ने पूछा।

"मतलब साफ है।" सुरेश बोला।

"माजरा क्या है?" आलोक ने संजय के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।

"पता नहीं - हमें तो कुछ समझ नहीं आ रहा।"

"मर जाऊं इस मासूमियत पर।" सुरेश ने टांट किया।

"तो तुम्हीं बता दो। खामखा रहस्य बुनने से क्या फायदा?"

"नीला!" सुरेश ने चुटकी ली।

"अच्छा, अच्छा! तो आजकल उस घाट पर पानी तुम्हीं पी रहे हो।" आलोक मेज थपथपाते हुए बोला, "वही मैं कहूं। क्योंकि वह तो कभी खाली रह ही नहीं सकती।"

"अच्छा, यह बताओ अभी शादी का प्रस्ताव उसने किया कि नहीं?" सुरेश अब ब्यौरों में आ रहा था।

"वह तो हर लड़की कर देती है।" संजय मायूस होकर बोला।

"बड़ा तजुर्बा है।" वह रूका और बोला "अच्छा वह प्रिगनेंट अभी हुई कि नहीं?"

"क्या मतलब?"

"मतलब कि एबार्शन के लिए पैसे मांगे कि नहीं?"

"क्या बदतमीजी है?" संजय भड़का।

"अच्छा मांग लेगी।" आलोक बोला, "सुना है सरकुलेशन मैनेजर से दो हजार मांगे थे। उसकी बीवी को खबर लग गई। बेचारे की ठुकाई हो गई।"

"ठोंकेगा तो ठुकाई तो होगी!" आलोक उसे एलर्ट करता हुआ बोला, "बुरे काम के लिए बुरी नहीं है पर जाने झूठ है कि सच, वह चपरासी से लेकर जनरल मैनेजर तक के साथ रपट चुकी है।"

संजय को बड़ा बुरा लगा यह सब सुन कर। वह उठ कर चलने लगा तो सुरेश बोला, "बुरा मत मानना। दोस्त हूं। एक सलाह ले लो। हो सके तो निरोध का इस्तेमाल कर लिया करो। क्योंकि वह तो एक चलती फिरती एड्स की दुकान है।"

क्या सचमुच नीला ऐसी है?

संजय तीन चार दिनों तक यही सोचता रहा और नीला से मिलने से बचता रहा।

तो क्या वह नीला से प्यार करने लगा था?

नहीं ऐसी बात तो नहीं थी। इस हद तक तो वह कभी गया भी नहीं। नीला और उसके बीच सिर्फ देह थी, प्यार नहीं। क्योंकि ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह नीला को देखने के लिए बेकरार हुआ हो। एक क्षण के लिए भी नहीं। और शायद नीली भी नहीं। वह दोनों सिर्फ देह जी रहे थे और शायद मन से, पूरे मनोयोग से। वह मिलते और मौका पाते ही एक दूसरे पर टूट पड़ते।

तो क्या सिर्फ देह की भूख ही दोनों को जोड़ती थी?

नीला को तो समझ में आता था।

पर संजय?

नीला तो शादी की उम्र पार कर रही थी। और शादी हो न हो, देह की अपनी जरूरत, अपनी भूख तो होती ही है। आखिर शादी के इंतजार में कब तक वह अपनी देह, अपनी इच्छा भस्म करती रहती। और वह पाता कि दिल्ली में कोई साठ प्रतिशत लड़कियां शादी की उम्र पार करती, नौकरियां करती जिंदगी गुजार रही थीं। कुछेक प्रतिशत को छोड़ कर ज्यादातर किसी न किसी के साथ "अटैच्ड" ही हो जाती थीं। कोई मन से, कोई देह से, कोई देह-मन दोनों से तो कोई मन-देह दोनों से। संजय इस हालत पर बात-बात में मजबूर का एक शेर भी कोड करता, "पूछा कली से कुछ कंवारपन की सुनाओ हजार संभली खुशबू बिखर जाती है।" और कहता है, "परवीन बाबी तो कहती है कि चौदह साल के बाद अगर कोई लड़की यह कहती है कि मैं कुआंरी हूं तो वह झूठ बोलती है।" पर वह खुद अपनी सोच को जब तब सही करार देता और कहता असल समस्या तो दहेज की है। अगर दहेज के भूखे भेड़िये अपने मुंह और पेट पर लगाम चढ़ा लें तो ये बेचारी लड़कियां इस तरह देह जीने को विवश नहीं होती। और फिर वह अचानक दहेज, दांपत्य का बिखराव, कभी पूरी न पड़ पाने वाली आर्थिक जरूरतों को लड़की के फिसलने के मुख्य कारणों में गिना जाता। वह पाता कि दिल्ली में ज्यादातर मध्यवर्गीय, निम्न मध्यवर्गीय खास कर पंजाबी परिवारों की लड़कियां इंटर, बी.ए. करते न करते सरकारी, गैर सरकारी नौकरियों में जबरिया लगा दी जाती कि जुटाओ अपना दहेज, पांच साल, सात साल, दस साल जो भी लगे। और इस फेर में लड़की कहां-कहां से गुजर जाए, इसकी परवाह अमूमन नहीं होती थी।

तो क्या नीला भी इसी विसंगति की उपज है?

क्या पता?

वह फिर भी कतराता रहा। पर लाख कतराने के बावजूद एक शाम वह टकरा गई। बातचीत के लिए उसने एक मशहूर फिल्मी गीत का एक मिसरा इस्तेमाल किया, "बदले-बदले से मेरे सरकार नजर आते हैं।"

"सच!"

"और नहीं तो क्या?" नीला ने एक मादक मुसकान फेंकी।

"तुम बदली होगी। मैं तो नहीं बदला।"

"सच?" नीला ने उसका सवाल दुहरा दिया था।

"बिलकुल!" संजय ने उसका जवाब नहीं दुहराया।

"चलिए खुशी हुई।" वह उसके स्कूटर के पीछे की सीट को छूती हुई बोली, "आइए कहीं काफी पीते हैं।"

"चलो।"

काफी पीने के बाद दोनों घूमते घामते आखिर फिर देह के मकसद पर आ गए। और फिर वही पुराना रूटीन! ऐसी ही एक शाम वह बोली, "कल मेरे घर आ जाइए।"

"क्यों?"

"बस यों ही।"

"कोई खास बात?"

"नहीं। ऐसी कोई बात नहीं।"

"अच्छा चलो आऊंगा। पर पता तो बताओ।"

उसने गांधी नगर का पता दिया।

"कब आऊं?"

"कल। कह तो रही हूं।"

"अरे, किस समय?"

"दोपहर बाद।"

"कल आफिस नहीं आओगी?"

"नहीं। छुट्टी ले रखी है।"

दयानंद पांडेय"ठीक है।"


इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए दयानंद पांडेय की बगल में लगी तस्वीर पर क्लिक करें. पार्ट (12) कुछ दिनों बाद.

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