अपने-अपने युद्ध (12)

E-mail Print PDF

दूसरे दिन कोई दो बजे वह जब गांधी नगर की उस तंग गली में पहुंचा तो नीला का मकान ढूंढ़ने में बड़ी परेशानी हुई। तब तक होजरी का कारोबार वहां इतना नहीं फैला था। नीला के मकान पर जब वह पहुंचा तो उसने देखा वह छत की खिड़की से चुपचाप ऊपर आने का इशारा कर रही थी और स्कूटर वहीं कहीं खड़ी कर देने को भी वह इशारों में समझा रही थी। संजय ने ऐसा ही किया। संजय ने पाया कि गली से भी ज्यादा तंग नीला के घर की सीढ़ियां हैं। सीढ़ियां चढ़ कर ज्यों ही वह ऊपर उसके कमरे में पहुंचा, वह उस पर एकदम भुखाई हुई शेरनी की तरह टूट पड़ी। वह कुछ कहने को हुआ पर उसके होंठ उसके होंठों को बंद कर चुके थे। संजय को एक बार लगा कि यह तो आज उलटा हो गया। एक महिला पुरुष के साथ बलात्कार पर आमादा थी। पर सच यही है कि पुरुष के साथ बलात्कार हो नहीं सकता क्योंकि टांग उठा कर शुरू हो जाना वाला खेल इस गेम में होता नहीं। बल्कि संजय तो आज तक यह भी नहीं समझ पाया कि कोई पुरुष भी स्त्री की बिना सहमति के बलात्कार कैसे कर लेता है। स्त्री की, डर से ही सही, स्वार्थ, लालच या किसी और कारण से ही सही परोक्ष या अपरोक्ष उसकी सहमति तो होती ही होगी, तभी पुरुष उसके साथ पशुवत व्यवहार करता होगा। नहीं स्त्री चीखती, चिल्लाती रहे और जाहिर है उसके हाथ पांव बंधे हों तो भी कैसे लोग स्त्री देह पर बलात्कार की इबारत लिख देते हैं, संजय यह भी नहीं समझ पाता।

हां, यह स्थिति तो हो सकती है कि स्त्री मानसिक रूप से, मन से तैयार न हो पर देह उस बलात्कारी के हवाले कर दे, डर या लालच से तो चाहे संभव है। नहीं बात बेबात ही डिस्टर्ब हो जाने वाला पुरुष, टेलीफोन की घंटी, कालबेल या किसी आहट भर से ही शिथिल हो जाने वाला उसका पुरुष अंग आखिर लाख विरोध के बावजूद कैसे बलात्कार कर लेता है, संजय की समझ से हमेशा परे रहा है। वैसे ही आज नीला की उस पर चढ़ाई उसे पहले तो बेअसर जान पड़ी। पर नीला पर तो जैसे भूत सवार था। उसने संजय को भी उत्तेजित कर लिया।

थोड़ी देर बाद उसने पूछा, "घर में कोई नहीं है क्या?" तो अबकी उसने होंठों के बजाय उंगलियां उसके होंठों पर रख दी। संजय ने देखा, कमरे का दरवाजा खुला हुआ है। वह फुसफुसाया, "कम से कम दरवाजा तो बंद कर दो। तो नीला ने बिन बोले सिर हिला कर मना कर दिया। और इशारे से बताया परदा तो है। वह इस बीच चुपचाप काफी बना कर लाई और ढेर सारे बिस्किट, भुने काजू। खाने पीने के बाद फिर संजय से चिपट गई। और अचानक वह मुख मैथुन पर उतर आई।"

चार बजते-बजते उसने संजय को चार राउंड चूस लिया था।

फिर अक्सर वह संजय को दिन में घर बुलाने लगी। और खुद छुट्टी ले लेती। पर उसके देह का ज्वार फिर भी नहीं थमता।

नीला की मां टीचर थीं। पिता का निधन हो चुका था। बड़ी बहन की शादी हो चुकी थी। छोटा भाई फैक्ट्री में था। सो घर में कोई नहीं रहता था। मकान अपना था और नीचे का सारा हिस्सा किराए पर था। नीचे उन किराएदारों तक बात न पहुंचे, इसलिए न वह बोलती, न बोलने देती। पर एक दिन क्या हुआ कि नीला संजय जूझे पड़े थे कि एक छोटा लड़का, "आंटी-आंटी" करता आ धमका। नीला बड़ी फुर्ती से चद्दर लपेट बिस्तर से कूद पड़ी और संजय पर दूसरा वाला गद्दा पलट दिया। बोली, "भइया अभी जाओ, मैं जरा नहाने जा रही हूं।"

"अच्छा आंटी!" कह कर लड़का भागता हुआ नीचे चला गया।

अब निर्जन अंधेरी सड़कों की जगह नीला के घर ने ले ली थी। कोई दो महीने बाद उसने संजय को फोन किया, "जरूरी बात करनी है"

"बोलो"

"फोन पर ही?"

"हां, क्यों क्या हुआ?"

"मिलिए तो बताऊ।"

"बोल तो दफ्तर से ही रही हो?"

"हां।"

"तो मेरे पास आ जाओ।"

"नहीं।"

"तो फोन पर ही बताओ न!"

"कैसे बताऊं?"

"क्यों?"

"कुछ समझ में नहीं आ रहा क्या करूं?"

"दिक्कत क्या है?"

"मिलिए तो बताऊं।"

"फोन पर ही बता दो न!"

"क्या बताऊं।"

"जो बताना चाहती हो।"

"असल में कुछ गड़बड़ हो गई है।"

"क्या?"

"नहीं फोन पर नहीं बता सकती। फिर कल ही बताऊंगी।"

"गांधी समाधि पहुंचें?"

"ठीक पांच बजे।"

"ओ. के.।"

उस शाम पहले तो वह चिपट-चिपट कर रोई फिर बोली, "मैं प्रिगनेंट हूं।"

"क्या?"

"हां।"

संजय चुप हो गया। उसे सुरेश और आलोक की बातें याद आ गईं।

"आप चुप क्यों हो गए?"

"तो कल डॉक्टर के यहां चलें?" नीला उसके बाल सहलाती हुई बोली।

"क्या करने?"

"दिखाना तो पड़ेगा?"

"पहले कनफर्म तो होने दो।"

"तो आप क्या चाहते हैं मैं उलटियां करने लगूं। घर-दफ्तर सब लोग जान जाएं तब डॉक्टर के यहां चलेंगे?"

"नहीं ऐसी बात नहीं है।"

"फिर?"

"तुम जैसा चाहो।"

"तो ठीक है। कल दो हजार रुपए का इंतजाम कर लीजिएगा।"

"क्या मतलब?" संजय सुलगता हुआ बोला।

"डॉक्टर की फीस।"

"इतनी?"

"जी हां, एबार्शन में इतना तो लग ही जाएगा?"

"पर एबार्शन की जरूरत क्या है?" संजय घाघ बनते हुए बोला।

"तो किसकी जरूरत है?"

"तुम प्रिगनेंट हो तो बच्चा पैदा भी कर सकती हो।"

"अनाथालय में पलने के लिए। अपनी थू-थू कराने के लिए।"

"नहीं। तुम बच्चा पैदा करो। मैं अपना नाम दूंगा।"

"शादी के नाम पर बीवी का भूत खड़ा हो जाता है। और बच्चे को नाम देंगे!" वह बिफरी।

"मैं सच कह रहा हूं।" संजय तौल-तौल कर बोल रहा था।

"तो चलिए शादी कर लेते हैं।"

"अभी कैसे?" संजय हकबका गया।

"आप सभी मर्द एक जैसे ही होते है।"

"कितने मर्दों का तजुर्बा है?" संजय अब बेहयाई पर आमादा था।

"क्या मतलब है आपका? कहना क्या चाहते हैं?"

"मैं नहीं दफ्तर वाले कहते हैं।"

"ओह!" वह उसे अगियाई आंखों से देखती हुई बोली, "कितना जहर भरा है आपके दिमाग में?"

"हो सकता है।"

"आप इतने गिरे हुए हैं। मैं नहीं जानती थी।"

"अब तो जान लिया।"

"आज क्या हो गया है आपको?" वह फिर बिफरी, "प्लीज आप मुझे समझने की कोशिश करिए।"

संजय चुप ही रहा।

"मैं जानती हूं आप औरों जैसे नहीं हैं। आप सबसे अलग हैं।"

"तो?"

"आप यकीन मानिए, मैं सच कह रही हूं।" वह रुकी, "और मेरे पेट में आपका ही बच्चा है।" कह कर वह संजय के गले से लिपट गई और सुबकने लगी।

"मैं भी तो अपनाने को तैयार हूं। अपना नाम देने को तैयार हूं।" संजय ने उसे ढाढस बंधाते हुए, उसे बाहों में भर कर कहा।

"पर यह संभव कैसे है?"

"क्यों नही है संभव?"

"आपका अपना परिवार है।"

"तो क्या हुआ?"

"और यह दकियानूसी दुनिया?"

"मैं सबको देख लूंगा।"

"पर मैं नहीं देख सकती।"

"ठीक है, कल देखते हैं।"

"देखते हैं का क्या मतलब?" वह बोली, "डॉक्टर के यहां चलना ही चलना है। मैं और रिस्क नहीं ले सकती।"

"रिस्क क्या है?"

"रिस्क तो है ही। मैं पहले ही रिस्क नहीं ले रही थी।" वह ताना देती हुई बोली, "मैं हमेशा ही निरोध के लिए कहती। पर जनाब को मजा ही नहीं आता था।" वह फिर सुबकने लगी, "अब तकलीफ तो मैं भुगतूंगी।" वह सुबकती जा रही थी।

"अच्छा-अच्छा चुप हो जाओ। कल ही डॉक्टर के यहां चलते हैं। पर नर्सिंग होम के बजाय किसी सरकारी अस्पताल में।"

"नहीं सरकारी अस्पताल नहीं। वहां कुछ भी सीक्रेट नहीं रहता।" उसने फौरन विरोध किया।

"सीक्रेसी की क्या जरूरत है?"

"मुझे है।"

"अच्छा किसी दूर के अस्पताल में चलते हैं।"

"नर्सिंग होम जाने में क्या दिक्कत है?"

"अभी इतने पैसे नहीं हैं मेरे पास।"

"अभी मैं इंतजाम कर लूंगी, आप बाद में दे दीजिएगा।"

"नहीं।'' वह चीखा।

"आपको हो क्या गया है?"

"कुछ नहीं।" लज्जित होते हुए उसने हाथ जोड़ लिए।

दूसरे दिन वह दोनों दूर दराज के एक फेमली प्लैनिंग वाले अस्पताल में पहुंचे। वहां ज्यादा नहीं तो तीन औरतें ही थीं। एक दाई किस्म की औरत से नीला ने जाने क्या बातचीत की और वापस आकर संजय से बोली, "चलिए यहां से।"

"क्यों?""

"उनको पति के दस्तख्त भी चाहिए फार्म पर।"

"तो?"

"पति मैं कहां से लाऊं?"

"मैं दस्तख्त कर देता हूं।"

"पर मैं तो आपको जीजा बता चुकी हूं उससे। और बता दिया है कि पति बाहर हैं।"

"फिर क्या! चलो!" कह कर संजय ने लंबी सी सांस भरी।

तीसरे दिन वह दोनों फिर एक दूसरे सरकारी अस्पताल पहुंचे। कोई पांच मिनट ही हुए होंगे कि नीला एकदम से हड़बड़ा गई, "प्लीज तुरंत चलिए।"

"बात क्या हुई?"

"बहस बाद में।" वह अफनाई, "तुरंत चलिए।"

"हुआ क्या था?" अस्पताल से बाहर आकर थोड़ी दूर निकल आने के बाद संजय ने पूछा।

"मेरे मुहल्ले की एक औरत दिख गई थी।"

"अच्छा-अच्छा।"

इतना कुछ होने के बाद वापसी में भरी दोपहरी में घना पेड़ और सुनसान देख कर संजय ने स्कूटर रोक दिया।

"क्या है?" नीला मुसकुराते हुए बोली।

"कुछ नहीं पेशाब करना है।"

"सिर्फ पेशाब?"

"तुम बड़ी बदमाश हो।" कहते हुए उसने नीला का गाल ऐंठ दिया।

"क्या करते हैं आप?" हाथ हटाते हुए बोली, "यही सब अच्छा नहीं लगता।"

"सच?"

"नहीं अच्छा तो लगता है।" कहते हुए वह लजाई पर अचानक साड़ी उठा कर जांघ पर बना नीला निशान दिखाने लगी, "पर इन काले नीले निशानों से डर लगता है।"

"यह कैसे हो गया?" संजय ने पूछा।

"ओ-हो-हो।" वह मटकी, "कितने मासूम बन गए हैं। जैसे कुछ जानते ही नहीं!"

"मतलब?"

"जो यहां वहां चिकोटी काटते रहते हैं आप। उन चिकोटियों का सर्टिफिकेट हैं ये निशान।" वह रुकी और बाल ठीक करती हुई बोली, ''जांघों और चेस्ट पर तो कोई देखता नहीं पर चेहरे पर जरा भी कुछ हो जाता है तो लोग घूरने लगते हैं और मां तो जैसा जीना हराम कर देती हैं।'' वह पैर हिलाती हुई बोली, "इसलिए बता देती हूं, हां!"

कहते हुए वह खुद संजय के बालों को दोनों हाथों से ऐंठने लगी।

"क्या कर रही हो?"

"क्यों मैं नहीं कर सकती क्या?" वह इतराई, "क्या यह सब करने का कॉपीराइट सिर्फ पुरुषों के ही पास रहना चाहिए।"

"क्या बदतमीजी है।" कहते हुए संजय ने जब उसके गाल काटने चाहे तो वह छिटक कर खड़ी हो गई। तभी एक कार और डी.टी.सी. बस सड़क से गुजरी तो वह सहम सी गई। फिर वह बड़ी देर तक उकताई बैठी रही। संजय के बहुत खींचने खांचने पर वह जैसे-तैसे मान पाई।

फिर कुछ ऐसा हुआ कि संजय को हफ्ते भर के लिए अचानक गांव जाना पड़ गया।

वापस आया तो दफ्तर की चिट्ठियों में उसे एक ऐसी चिट्ठी मिली जिस पर न किसी का नाम पता था, न दस्तखत। सिर्फ दो लाइन की टाइप की हुई चिट्ठी, "आपने यह अच्छा नहीं किया। आप माफ करने लायक भी नहीं हैं।"

संजय पहले तो कुछ समझा नहीं। पर दूसरे ही क्षण वह समझ गया कि चिट्ठी नीला की है। पर टाइप का फेस उसकी टाइप मशीन का नहीं था। लिफाफे पर डाकघर की मुहर भी साफ नहीं थी। जिससे पता लग सके कि कहां से पोस्ट की गई होगी यह चिट्ठी। और यह पता करने के लिए पोस्ट आफिस जाना भी उसे ठीक नहीं लगा।

वह सीधे नीला की सीट पर गया। वह नहीं थी।

तीन दिन बाद वह मिली। बिलकुल बिलबिलाई हुई। मरा हुआ सा चेहरा। संजय उसके पीछे हो लिया, "सुनो तो।" वह फुसफुसाया।

"मुझे कुछ नहीं सुनना।" वह जोर से बोली। और पैर पटकती आगे बढ़ गई। संजय निराश सा, उदास और हताश सा अपनी सीट पर जाकर बैठ गया।

वह फिर सोचने लगा क्या वह नीला से प्यार करने लगा है? पर अंतत: वह इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि यह प्यार नहीं, लगाव है। देह का ही सही, नेह है। आखिर इतने दिन साथ जुड़े रहने को, वह उसकी तरह एक झटके से कैसे तोड़ सकता है। वह बजाय खबर लिखने के यही सब सोचता रहा। कि तभी न्यूज एडीटर ने उसकी मेज पर आकर पूछा, "अंतर्कथा तैयार हो गई?"

"नहीं, अभी एक दो वर्जन लेना बाकी है। मिलते ही लिखना शुरू कर दूंगा।" वह झूठ बोल गया। सच यह था कि सभी वर्जन उसे मिल चुके थे पर लिखने का उसका मन नहीं हो रहा था। न्यूज एडीटर ने घड़ी देखी, "पर तुम कब लिखोगे, कंपोज कब होगा? ऐसे तो आज खबर जा नहीं पाएगी। और तुम लिखोगे भी पचनारा। जल्दी करो। जल्दी" कह कर वह चला गया। पर वह तो लिख नहीं पा रहा था। कलम उठा कर ज्यों वह डेटलाइन लिखता, झल्लाती हुई नीला उसके सामने खड़ी हो जाती, "मुझे कुछ नहीं सुनना।" और जब ऐसा कई बार हो चुका तो उसने सारे कागज मरोड़ कर बास्केट में फेंके और, "तो मुझे भी कुछ नहीं लिखना।" बुदबुदाता हुआ उठ खड़ा हुआ।

"क्यों पागल हो रिया है। नहीं लिखना है तो मत लिखो।" सुजानपुरिया उसका बुदबुदाना सुन कर सलाह देने लगा।

"आप जाकर चुपचाप अपना बाजार भाव बनाइए सुजानपुरिया जी।" संजय ने हड़काया, "और आप रिपोर्टर्स रूम में इस समय क्या कर रहे हैं?"

"नाराज क्यों हो रिया है? जा रिया हूं।" कालर बंद करते हुए सुजानपुरिया चला गया।

संजय कैंटीन में आकर बैठ गया। और चुपचाप सिगरेट सुलगा ली।

"यह तो ऐसे उदास बैठा है जैसे इसने ही एबॉर्सन करवाया हो।" उमेश चाय सुड़कते हुए बोला।

संजय कुछ नहीं बोला। सिर्फ उमेश को घूर कर रह गया।

"नहीं-नहीं डांट खाके आ रिया है।" सुजानपुरिया यहां भी आ गया था, "डबल डांट।"

"क्या मतलब?" सुरेश बोला।

"किससे किससे? उमेश ने पूछा।"

"दोनों एन.एन. ने।" सुजानपुरिया अभी बोल ही रहा था कि संजय ने उसे घूरा और वह चुप हो गया।

"दोनों एन.एन.? मैं समझा नहीं। जरा ठीक से खुलासा करिए सुजानपुरिया जी। नाड़ा खोल के।" सुरेश मूड में था।

"अब मैं क्या बोलूं। वो तो गुस्सा हो रिया है।" कहते हुए सुजानपुरिया ने आंख मटकाई।

"डरते क्यों हैं सुजानपुरिया जी। कोई खा थोड़े ही जाएगा। हम लोग हैं न! बेधड़क बोलिए।" सुरेश ने ताव खिलाया।

"मैंने देखा तो नहीं पर चरचा है कि नीला ने संजय को लंबी झाड़ पिलाई। पर न्यूज एडीटर को तो मैंने ही डांटते देखा।" सुजानपुरिया ऐसे बोल रहा था जैसे संजय से कोई बदला ले रहा हो।

"नहीं सुजानपुरिया जी आप झूठ बोल रहे हैं।" सुरेश बोला।

"क्या?"

"यही कि संजय नीला या एन.ई. की डांट बर्दाश्त कर सकता है!" सुरेश फिर बोला।

"और अव्वल तो एन.ई. या नीला दोनों ही इसे डांटने की स्थिति में नहीं है।"

यह बहस अभी जारी थी कि संजय बिन बोले सिगरेट फूंकते हुए कैंटीन से बाहर आ गया। सीट पर आकर जैसे तैसे खबर घसीटी, न्यूज एडीटर को थमाया। और सीधा नीला के घर जा पहुंचा।

तब रात के काई नौ बजे थे।

नीला संजय को अचानक देख कर चौंकी पर तुरंत ही सहज हो गई। निरीह से भाई और गाय सी मां से परिचय कराया और मुसकुराने की कोशिश करती हुई बोली, "कहिए कैसे आना हुआ?"

"नहीं, कोई खास बात नहीं। इधर आया था तो सोचा तुम्हारे यहां भी हो लूं।"

"अच्छा-अच्छा।" कहते हुए नीला ने आंखों ही आंखों में संकेत दे दिया कि कोई ऐसी वैसी बात वह न करे।

"बेटा तुम्हारे बड़े गुन गाती है यह। आज तुम्हें देख भी लिया।" नीला की मां बोली।

"ऐसा क्या कर दिया भाई, जो तुम तारीफ कर गई।" उसने तंज किया, "मैं तारीफ के लायक तो नहीं हूं।"

नीला कुछ बोली नहीं पर आंखों से ऐसा घूरा कि संजय हिल गया। और इसी हड़बड़ाहट में वह चलने के लिए उठ खड़ा हुआ।

"खाना खा कर जाओ बेटा।" नीला की मां बड़े प्यार से बोली।

"नहीं, फिर कभी।"

"अच्छा कम से कम काफी तो पी लीजिए।"

"हां, हां।" कहते हुए संजय बैठ गया।

"आपका नाम तो अक्सर अखबार में छपा देखता हूं। पर आपको भी आज देख लिया।" नीला का भाई बोला।

"आप लोगों से मिल कर मुझे भी बड़ी खुशी हुई।" काफी खत्म करते हुए संजय ने बोला, "खास कर इस बात से कि दिल्ली में रह कर भी आप सबकी बोली खराब नहीं हुई।" नहीं, "आ जा, ले-ले, बैठ जा, खा-ले, परे हट जैसी बोली से मजा खराब हो जाता है।" बोलते-बोलते वह रूका, "अच्छा तो अब आज्ञा दीजिए।"

संजय जब सीढ़ियां उतरने लगा तो नीला की मां बोली, "संभल के बेटा!" नीला भी बोली, "अगली बार भाभी को लेकर आइएगा।"

"हां, बेटा।" नीला की मां बेटी के सुर में सुर मिला कर बोली।

"अच्छा।" कह कर संजय नीला के घर से चला तो आया पर रास्ते भर, "भाभी को लेकर आइएगा।" उसके कानों में चुभता रहा। "भाभी!" मतलब मैं भइया हो गया!

क्या हो गया है नीला को!

पर दूसरे दिन जब वह मिली तो सामान्य थी। शाम को पालिका बाजार के ऊपर घास पर बैठे आइसक्रीम खाते हुए सारे गिले शिकवे दोनों ने दूर किए। भाभी वाली बात पर उसका कहना था, "आखिर मां के सामने भला और क्या कहती?"

"तो अब आइंदा मत कहना।"

"ठीक है।"

फिर वह मुख्य मसले पर आई। नीला समझी थी कि पैसे देने के डर से वह गायब हो गया था और कि जब इतनी छोटी सी जिम्मेदारी से वह कतरा गया था तो अगर वह बिन ब्याही बच्चा जनती तो वह इतनी बड़ी जिम्मेदारी कैसे निभाता? आखिर उसने एबार्शन करवा लिया था। वह इस ब्यौरे में भी गई कि उसे इस एबार्शन में कितनी तकलीफ उठानी पड़ी। और कोई शक न करे इसलिए दफ्तर भी आती रही। बल्कि ठीक एबार्शन के दीन भी वह दफ्तर आई। ब्लीडिंग हो रही थी, डबल पैड बांध रखा था, चक्कर आ रहा था, काम नहीं किया जा रहा था, जैसे ब्यौरे भी उसने दिए।

संजय ने भी अपने मन का पाप उससे कह डाला। बता दिया सुरेश, उमेश और आलोक के ताने। यह भी बताया कि गांव वह जानबूझ कर नहीं गया था। उसका जाना जरूरी ही था वगैरह वगैरह। उसने यह भी कहा कि, "तुम्हारी देह के कष्ट में तो मैं भागीदार नहीं हो सकता पर पैसे जितने भी खर्च हुए हैं, इंतजाम करके सारे के सारे दूंगा।"

"नहीं इस मद में आप से एक पैसा स्वीकार नहीं है। और न दीजिएगा। आपको कसम है मेरी। और भगवान के लिए इन सब बातों की चर्चा आप कहीं मत करिएगा।"

"क्या तुम मुझे इतना सतही और घटिया समझती हो?"

"नहीं। समझती तो नहीं। पर पुरूष का क्या ठिकाना। यही सोच कर कह दिया। आप माइंड मत करिएगा प्लीज।"

"नहीं, नहीं।" कहते हुए उसने उसका पैर अपने पैर से छू दिया।

"नहीं, यहां कोई शैतानी नहीं।" कहते हुए उसने अपने फैलाए पैर समेट लिए।

"कुछ और खाओगी?"

"नहीं।" वह अपनी चोटी ठीक करती हुई बोली, "यह बताइए उमेश भी यह सब कह रहा था?"

"छोड़ो उस साले नपुंसक की बात।" कहते हुए संजय बिफरा, "वह क्या बोलेगा।" और जब बात-बात में कई बार संजय ने उमेश को नपुंसक, इंपोटेट उच्चारा तो नीला बोली, "उसको नपुंसक क्यों कह रहे हैं?"

"मैं क्या सभी कहते हैं?"

"मतलब?"

"यही कि साले की स्तंभन शक्ति गायब है। मतलब औरत के काबिल नहीं है।"

"नहीं, वह नपुंसक नहीं है।"

"क्या?" संजय चौंका।

"हां, मैं जानती हूं।"

"कैसे?"

"यूनिवर्सिटी में हम लोग साथ पढ़ते थे। हमसे शादी का वादा किया उसने। और मुझे खराब करके रख दिया।"

"फिर शादी क्यों नहीं की उसने?"

"बहुत घटिया और गंदा आदमी है वह?"

"वो तो है।"

"एक बार मुझसे कहने लगा कि अगर बिना शादी के तुम मेरे साथ लेट सकती हो तो किसी और के साथ भी नहीं लेटती हो इसकी क्या गारंटी है? मैं भला क्या गारंटी देती। कहती रही कि ऐसा नहीं है। पर वह नहीं माना। और एक दूसरी लड़की के साथ घूमने लगा।"

उस दिन वह नीला को उसके घर छोड़ने पहली बार गया। वह अपने घर से थोड़ी दूर पहले ही उतर गई। बोली, "संभल कर जाइएगा।"

गांधी नगर के पास जमुना नदी के पुराने लोहे वाले पुल पर तब कि दिनों में सुबह लालकिले की तरफ आने और शाम को गांधी नगर वापस जाने में भारी भीड़ होती थी। और कभी-कभी घंटों ट्रैफिक जाम हो जाता। ट्रैफिक जाम से बचने के लिए संजय नीला को आई.टी.ओ. पुल से पुश्ते की तरफ से गांधी नगर पहुंचाने लगा।

पुश्ते पर उन दिनों-दिन में ही न के बराबर ट्रैफिक होती। शाम को तो बिलकुल नहीं। इक्का दुक्का कोई सवारी निकल जाती। संजय और नीला के देह लीला की नई स्थली बन गई यह पुश्ते की राह।

पुश्ता, संजय और नीला!

पर ज्यादा दिनों यह नहीं चला। अचानक एक दिन वह बताने लगी, "अब आपसे जुदाई के दिन करीब आ गए हैं।" वह भावुक हो रही थी। बहुत ज्यादा।

"क्यों?"

"मेरी शादी की बात चल रही है।"

"कहां?"

"यहीं दिल्ली में ही।"

"मैं तो तमसे पहले ही कहता था, तुम्हें शादी कर लेनी चाहिए। मुबारक हो!"

"लड़के वाले देख गए हैं। पसंद भी कर गए हैं।" वह सुबकने लगी थी।

"अरे, यह तो खुशी की बात है। इसमें रोने की क्या जरूरत है?" कहते हुए संजय ने उसे बांहो में भरा और चूम लिया।

नीला चुप रही। सुबकती रही।

एक दिन उसने शादी का कार्ड दिया। बोली, "आपसे एक बार ठीक से मिलना चाहती हूं।"

"जब कहो।"

"ठीक है, बताऊंगी।"

कोई हफ्ते भर बाद उसका फोन आया। किसी पब्लिक बूथ से बोल रही थी, "आज ही, और अभी मिल सकेंगे आप?"

"हां, क्यों नहीं?"

"पर पूरी फुर्सत से आइएगा। छुट्टी वुट्टी लेकर।"

"क्यों?"

"कहा तो था कि एक बार से ठीक से मिलना चाहती हूं।"

"अच्छा-अच्छा। पर आज शाम को यू.पी. के चीफ मिनिस्टर की प्रेस कांफ्रेंस है।"

"जरूरी है कि आप ही कवर करें।"

"हां यू.पी. मेरी बीट है।"

"पर कोई और भी तो कर सकता है। प्लीज, देखिए मैं फिर नहीं मिल पाऊंगी।"

"क्यो?"

"कल से मेरा घर से निकलना बिलकुल बंद।"

"ओह!"

"ओह, ओह मत कीजिए। छुट्टी लीजिए और आ जाइए।"

"ठीक है।"

"हां, सुनिए। कहीं कमरा नहीं अरेंरज हो जाएगा?"

"अब तुरंत-तुरंत कहां हो पाएगा।"

"अच्छा आप छुट्टी लीजिए और जंतर-मंतर पर मिलिए ठीक सवा बारह बजे।"

"ओ.के.।"

जंतर मंतर से वह वेस्ट पटेल नगर ले गई। वहां उसकी सहेली थी, उसके हसबैंड आसिफ गए थे और बच्चे स्कूल। और खुद वह उन दोनों को छोड़ कर, "अभी आती हूं।" कह कर निकल गई।

जैसी कि संजय को उम्मीद थी कि नीला अब उस पर टूट पड़ेगी, वैसा नहीं हुआ। वह उससे चिपट कर रोने लगी। वह रोती रही और संजय उसके कपड़े उतारता रहा। पर जब उसका अंतिम वस्त्र पैंटी उतारने लगा तो वह बोली, "अब यह सब रहने दीजिए!"

पर संजय नहीं माना और, "एक बार बस, एक बार प्लीज।" कह कर स्टार्ट हो गया।

थोड़ी देर बाद संजय बोला, "शादी के बाद भी मिलोगी न?"

"क्या मालूम?"

"फिर भी?"

"अब ससुराल का जैसा माहौल होगा देखूंगी। पर आप अपनी ओर से मिलने की कोशिश मत करिएगा। कोई सूरत निकलेगी तो मैं खुद ही मिल लूंगी।"

"ठीक है। यही ठीक रहेगा।"

इसके बाद वह बड़ी देर तक उससे चिपटी रही, "पर आप मुझे मत भूलिएगा।" वह यह बार-बार बुदबुदाती रही।

नीला अपनी शादी के एक महीने बाद आफिस आई। खूब सजी संवरी, बनी ठनी, ठुमक-ठुमक करती हुई। पायल छमकाती हुई। ऐसे जैसे वह पुरानी वाली नीला नहीं हो।

सचमुच यह नीला वह नीला नहीं थी।

तो कौन थी यह?

संजय यह जानने की बिलकुल कोशिश नहीं की। वादे के मुताबिक उसने कोई पहल नहीं की। उसकी पहल का इंतजार किया। ऐसा भी नहीं कि नीला, संजय से बोली नहीं हो इस बीच। वह अपने पति जिसको वह बार बार "मेरे हसबैंड, मेरे हसबैंड" कहती रहती उस हसबैंड को लेकर संजय के घर भी कई बार आई। एक बेटी की मां बन गई। पर संजय उसकी पहल का इंतजार करता रहा जो नहीं हुआ।

होना ही नहीं था।

एक दिन उसने नीला को फोन किया और कहा कि, "मिल नहीं सकती मुझसे?"

"क्यों नहीं? अभी आती हूं।"

"ऐसे नहीं अकेले में।"

"नहीं यह तो नहीं हो सकता।"

"क्यों?"

"मैं प्रिगनेंट हूं।"

"फिर तो और मजा आएगा। तुम्हें मालूम नहीं प्रिगनेंसी के दौरान सेक्स का मजा बढ़ जाता है?"

"नहीं।"

"तो मिलो तो मजा चखाऊं!"

"नहीं, अभी नहीं।" वह बड़ी बेरूखी से बोली।

"तो फिर?"

"ठीक है मैं फिर बताऊंगी।"

नीला का दूसरा बच्चा बेटा हुआ। अब वह तीसरे बार प्रिगनेंट थी। संजय ने उसे एक दिन घेर लिया तो उसने बताया, "मैं फिर प्रिगनेंट हूं।"

"पर तुम औरत हो कि मशीन?" कि हर साल एक माडल निकालती जा रही हो?

"चाहती तो मैं भी नहीं हूं पर ससुराल की मर्जी से चलना पड़ता है।" वह दुखी होती हुई बोली।

"हद है। बेटी और एक बेटा तुम्हारे हो ही गया है। अब कौन सा सन कांपलेक्स है?"

"उन्हें एक बेटा और चाहिए।"

"बड़ा जाहिल है तुम्हारा पति।"

"नहीं मेरे हसबैंड नहीं, मेरी सास और जेठानी।"

"तो इतने सारे बच्चे और आफिस। कैसे निभाओगी?"

"मैं खुद परेशान हूं। पर क्या बताऊं?" कहती हुई वह चलने लगी। बोली, "जरा देर से पहुंचो तो सास चिल्लाने लगती हैं।"

"मैं छोड़ दूं।"

"नहीं।" कह कर वह तेजी से भागी कि कही संजय सचमुच उसे स्कूटर पर न बैठा ले।

नीला के तीसरा बच्चा बेटी हुई। सास ने बड़े ताने दिए। पर अबकी नीला ने स्पष्ट मना कर दिया कि वह "अब और बच्चा पैदा नहीं करेगी।"

"क्यों?" सास ने पूछा।

"नौकरी और बच्चा दोनों एक साथ नहीं हो पाएगा।"

"नौकरी छोड़ दो।" सास गरजी।

नीला ने संजय को फोन पर यह सब कुछ बताया और पूछा कि, "क्या करूं?"

"नौकरी तो हरगिज मत छोड़ना।" संजय ने उसे सलाह दी।

"पर घर में तो जैसे आग लगी हुई है।"

"ऐसा करो तुम कुछ दिनों के लिए छुट्टी ले लो। मन करें तो लंबी छुट्टी।"

"लंबी छुट्टी कहां मिलेगी?"

"मैं जी.एम. से रिक्वेस्ट करके स्वीकृत करा दूंगा। पर तुम नौकरी मत छोड़ना। आज की तारीख में नौकरी औरत का सबसे बड़ा हथियार है।"

"हां, ये तो है।"

"और फिर दुबारा ठीक-ठाक नौकरी मिल जाय कोई जरूरी नहीं।" तुम खुद सोचो कि अगर तुम नौकरी में नहीं होती तो क्या तुम्हारे ससुराल वाले तुम पर और जुल्म नहीं ढाते?"

"ये तो है।"

"अच्छा ये बताओ तुम्हें कहीं मारते तो नहीं हैं सब?"

"नहीं। नीला संक्षिप्त सा बोली।"

"सच-सच बताओ।"

"हां, कभी-कभी।"

"कौन?"

"सास!"

"और हसबैंड?"

"नहीं।"

"सच बोल रही हो?"

"हां।"

"नहीं तुम सच नहीं बोल रही हो।"

"अब आपसे क्या छुपाऊं। कभी-कभी वह भी।"

"हद है।" संजय बड़बड़ाता रहा, "सोचो अगर तुम नौकरी में नहीं रहोगी तब क्या होगा? इसलिए मेरी मानो, छुट्टी ले लो। और पति तुम्हारा दिखने में सीधा दिखता है। उससे कहो परिवार निजोयन के उपाय अपनाए।"

"कहा तो मैंने भी। पर आपकी तरह वह भी नहीं मानते।"

"क्या मतलब?"

"कंडोम से उन्हें भी मजा नहीं आता।"

"तो ठीक है। कापर टी लगवा लो। गोलियां ले लो।"

"गोलियां सास खाने नहीं देंगी। वह हरदम तलाशी लेती रहती हैं, मेरे कमरे, बिस्तर, ट्रंक सबका।"

"तो चुपचाप कापर टी लगवा लो।"

"देखिए," वह बोली, "पर मेरी छुट्टी स्वीकृत करवा दीजिएगा।"

दयानंद पांडेय"करवा दूंगा।"

....जारी....


इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में जानने के लिए दयानंद पांडेय की बगल में लगी तस्वीर पर क्लिक करें. पार्ट (13) कुछ दिनों बाद.

AddThis