अपने-अपने युद्ध (13)

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दयानंद पांडेयनीला लंबी छुट्टी पर चली गई। पर अचानक महीने भर में ही छुट्टियां कैंसिल कर वह वापस आ गई। क्या तो, वह लीव विदआउट पे हो रही थी। लगातार बच्चे पैदा करने में छुट्टियां पहले ही खत्म हो चुकी थीं। और घर वालों को उसकी तनख्वाह की आदत पड़ गई थी। सो उसे वापस डयूटी पर आना पड़ा। इस बीच अपने हसबैंड को राजी कर वह कापर टी भी लगवा चुकी थी।

"तो अब तो हमसे मिल लो।"

"नहीं।"

"क्यों?"

"'टाइम कहां है?"

"लंच में।"

"यह कैसे हो पाएगा?"

"तो किसी दिन छुट्टी मार दो!"

"नहीं।"

"अब इसमें क्या दिक्कत है?"

"है न!"

"क्या?"

"अब क्या बताऊं?"

"बताओ नहीं, मिलो।"

"अच्छा!"

"तो कब मिलोगी?"

"बताऊंगी!"

"कैसे?"

"फोन करूंगी।"

पर वह फिर गायब!

एक दिन संजय ने उसे फोन किया, "तुम्हारा फोन तो आता रह गया?"

"अब क्या बताऊं?"

"क्यों?"

"मैं नहीं मिल सकती?"

"हद है।"

"असल में मेरे हसबैंड शक्की हैं।"

"यह तो तुमने पहले नहीं बताया।"

"अब क्या बताती!"

"क्या बेवकूफी है?"

"असल में जब से कापर टी लगवाया है तबसे ज्यादा शक्की हो गए हैं।"

"यह सब मैं कुछ नहीं जानता। तुम किसी भी तरह हमसे मिलो। अब रहा नहीं जाता।"

"पर मैं नहीं मिल सकता।"

"क्यों?"

"मेरे हसबैंड दफ्तर में जब तब मुझे चेक करने आ जाते हैं। आप समझा करिए।"

"बड़ा दुष्ट है साला।"

"क्या कह रहे हैं आप।"

"कुछ नहीं, कुछ नही। बस एक बार दस मिनट के लिए सही तुम समय निकालो।"

"अच्छा बताऊंगी।"

पर महीनों बीत गए नीला ने कुछ नहीं बताया।

संजय ने उसे एक दिन फिर घेरा और कहा, "आखिर कब समय निकालोगी, और कब बताओगी?"

"आप समझा कीजिए।"

"यह तो कोई बात नहीं हुई।"

"मैं खुद भी आपसे मिलना चाहती हूं।"

"गुड!" वह खुश होता हुआ बोला "अब तक तो चेंज का मन तुम्हारा भी करने लगा होगा?"

"हां, पर संभव नहीं है।"

"क्यों?"

"मेरे हसबैंड इधर बहुत शक्की हो गए हैं। देवर तक से बात करने में उन्हें शक हो जाता है।"

"लगता है उसे अपने पौरुष पर विश्वास नहीं है।"

"अब मैं क्या बताऊं?"

"अच्छा तुम मिलो तो मैं बताता हूं।"

"मैं नहीं मिल सकती। बिलकुल नहीं।"

"ऐसा भी क्या है कि दस मिनट के लिए भी नहीं मिल सकती?"

"ऐसा ही है।"

"क्या तुम्हारे हसबैंड को मुझ पर शक है?"

"नहीं तो!"

"फिर क्या बात है?"

"बताना जरूरी है?"

"हां।"

"मेरे हसबैंड ने मुझे कसम दिलाई कि अगर ऐसा वैसा कुछ किया या कुछ सुनाई भी दिया गलत या सही तो मेरा मरा मुंह देखोगी।" कह कर वह फोन पर फफक कर रोने लगी।

"ऐसी बात थी तो तुम्हें पहले बताना चाहिए था। और इस कीमत पर मैं कभी तुमसे नहीं मिलना चाहूंगा। यह तुम्हें बहुत पहले बताना चाहिए था। मैं कभी तुमसे नहीं कहता।" संजय सकते में आ गया। उसे ऐसी उम्मीद तो कतई नहीं थी।

"आप प्लीस माइंड मत करिएगा।" वह बोली।

"नहीं बिलकुल नहीं। बल्कि आई एम वेरी सॉरी। तुम मुझे माफ करना।" कह कर संजय ने फोन रख दिया।

इसके बाद भी नीला संजय के घर अपने हसबैंड के साथ कई बार आई। पर संजय ने उसकी ओर से बिलकुल चुप्पी साध ली थी।

उसने देखा, नीला को यह अच्छा लगा था।

नीला!

और अब चेतना!

चेतना संजय की उम्मीद से उलट कोई एक महीने बाद हाजिर हो गई। बेहिसाब बदहवास! पर बोली कुछ नहीं। संजय ही बोला, "कहिए मीरा जी कैसे राह भूल गईं?"

"नहीं इधर से गुजर रही थी। सोचा आपसे भी मिलती चलूं।"

"जेहे नसीब!"

"क्या?"

"कुछ नहीं।" संजय समझ गया कि चेतना जेहे नसीब का मतलब नहीं समझ पाई।

"नहीं, कुछ नसीब जैसा कह रहे थे आप।"

"अरे यही कि मेरी खुशकिस्मती जो "आप" आईं।"

"ओह!"

"तो तुम क्या समझी थी?"

"आप कब क्या कह बैठें। कुछ ठिकाना है?"

"बिलकुल है।"

वह चुप रही।

"कहीं चलें?"

"चलिए।"

"कहां चलें?"

"जहां आप चाहें।"

चेतना का "जहां आप चाहें?" कहना संजय को उत्साहित कर गया। पूछा, "पिक्चर?"

"पिक्चर नहीं देखती मैं।"

"तो?"

"वैसे ही कहीं चल कर बैठते हैं।"

"ठीक है।" कह कर संजय चेतना को लेकर चिड़िया घर चला गया। चिड़िया घर में थोड़ी देर बैठते ही चेतना उकता गई। बोली, "कोई जगह नहीं मिली थी आपको?"

"क्यों?"

"बस यहां से चलिए?"

"कहां?"

"कहीं भी। पर यहां नहीं।" कहती हुई वह उठ खड़ी हुई।

"दिलकुशा चलें।"

"चलिए।"

"यहां चिड़िया घर में तुम्हें क्या दिक्कत हो रही थी?" रास्ते में संजय ने चेतना से पूछा।

"देख नहीं रहे थे। वहां कितनी फेमिली थीं।"

"तो?"

"कोई जान पहचान का मिल जाता। आपके साथ देख लेता तो?"

"ओह!" संजय समझ गया था कि अब चेतना उससे दूर नहीं है।

दिलकुशा दोनों पहुंच तो गए। पर बैठने की कोई कायदे की जगह नहीं मिली। बेंचों पर धूप थी और खंडररों में घुसने लायक नहीं था। भीतर गंदगी थी और बाहर खेलते हुए बच्चे।

फिर भी दोनों दिलकुशा के खंडहरों के बाहर टूटी दीवार पर बैठ गए। चेतना पहले तो बे-सिर पैर की बतियाती रही। इस बीच संजय ने उसकी बगल में आकर बैठने को दो-तीन बार कहा। पर वह नहीं मानी। बल्की छिटक कर और दूर हो गई। बहुत कहने पर बोली, "ठीक हूं यही।"

बावजूद इसके संजय ने देखा कि वहां खेलते हुए लड़के खेलते-खेलते संजय और चेतना के इर्द-गिर्द आ गए और वहीं पास ही खेलने लगे। खेलते-खेलते वह सब बीच-बीच में अजीब सी, ललचाई सी नजरों से चेतना को देखते रहते। और चेतना फूल, जंगल और पेड़ों के बारे में बेवजह बोलती जा रही थी। उस कि संजय उससे प्यार, इसरार और सेक्स की बातें करना चाहता था। वह उसे बढ़ कर चूम लेना चाहता था। पर एक तो चेतना फूलों, पड़ों और पत्तों में उलझी हुई थी और दूसरे, खेलते हुए बच्चे लगातार वहीं मंडरा रहे थे। संजय उकता गया। बोला, "तुमने भी क्या जगह चुनी है?" हुंह दिलकुशा!

"क्यों ठीक तो है। कितना शांत-शांत।"

"क्या बेवकूफी की बात करती हो।"

"क्या मतलब है आपका?"

"कुछ नहीं। चलो तुम कोई गाना सुनाओ।"

"गाना?"

"हां।"

"पर मेरा मूड नहीं है।"

"क्यों?"

"बस कह दिया कि मूड नहीं है।" वह उखड़ने लगी।

"तो चलें?"

"कहां?"

"कहीं भी। पर यहां से चलो।"

"नहीं। यहीं बैठिए। मुझे अच्छा लग रहा है। प्लीज।"

"तो गाना सुनाओ।"

"नहीं, प्लीज ये बच्चे क्या सोचेंगे?"

"क्या सोचेंगे? गाना कोई चोरी तो नहीं।"

"फिर भी आज नहीं गाऊंगी।"

"क्यों भला?"

"इसके पहले जब दिलकुशा आया था तो यहीं, बिलकुल यहीं," संजय जगह दिखाते हुए बोला, "क्लासिकल जुगलबंदी रात भर सुन कर गया था। गिरिजा देवी का गायन और पंडित हनुमान मिश्र की सारंगी। और गाते-गाते गिरिजा देवी इतनी विभोर हो गईं कि पंडित जी से कहा कि छोड़िए यह सारंगी और गाइए आप भी।"

"तो गाया उन्होंने?"

"हां। और ऐसी जमी जुगलबंदी कि पूछो मत। उनकी गायकी का जो रस बरसा, उसमें श्रोता इतना भींज गए कि रात ढाई बज गए और कोई उठने का नाम नहीं ले। संगत करने वाले कलाकार थक गए, पंडित हनुमान मिश्र हाथ जोड़ने लगे, पर श्रोता "नहीं-नहीं, अभी नहीं" बोलते रहे और गिरिजा देवी भी गायकी की कसक कूतती बड़े इसरार से पंडित जी को मना लेतीं। इस मनाने में गिरिजा देवी की लोच, खटका, खनक, और मस्ती भरा पंडित जी से इसरार का अंदाज देखने लायक था। 'अमवा बउरलैं पिया नाहीं-अइलैं हो रामा' चइता की गायकी में जो दोनों की लय थी, एक अजीब सा सुरूर भर गई थी। सुनकर मन बउरा गया। और कई बार तो लगा कि पंडित जी सारंगी बजाने से अच्छा गाते हैं। बल्कि वह दो टुकड़ों में गिरिजा देवी पर बुरी तरह भारी पड़ गए। जिसे गिरिजा देवी ने अपनी ठिठोली से, मुसकान से जैसे तैसे कंपलीट किया। और जब गिरिजा देवी की ठिठोलियां काफी चढ़ गईं तो पंडित हनुमान मिश्र बोले, "जब यह बनारस में गाना सीख रही थीं तो हमारे सामने लड़की थीं!" पंडित जी का कहने का अंदाज इतना रसीला था कि गिरिजा देवी इस उमर में भी किसी षोडषी की तरह लजा कर हंस पड़ीं। और समां मदमस्त हो गया। इस तरह पंडित जी ने गिरिजा देवी की ठिठोली जैसे छांट कर रख दी। बिलकुल किसी माली की तरह। गोया वह गिरिजा देवी की ठिठोली नहीं, किसी पौधे की बेतरतीब पत्तियां छांट रहे हों। पर गिरिजा देवी भी हार मानने वाली नहीं थीं। 'सेजिया चढ़त डर लागे' गुहार कर जैसे उन्होंने पंडित जी को ललकार दिया पर पंडित जी ने जब 'लागे-लागे डर लागे' कह कर तान ली तो एक बार लगा कि गिरिजा देवी अब संभल नहीं पाएंगी। लेकिन गिरिजा देवी ने पंडित जी के पूरे सुर को आधे सुर में नरमी और पन से बांधा कि वह लाजवाब हो गए। हालांकि पिछली रात जसराज आ गए थे, उनकी गायकी की गूंज, गूंज की याद इस दिलकुशा के खंडहरों में वैसे ही तिर रही थी। पर यह जुगलबंदी तो अनूठी थी। अप्रितम, और लाजवाब। गिरिजा देवी के गायन और पंडित हनुमार मिश्र के सारंगी वादन की जुगलबंदी नहीं, दोनों के गायन की जुगलबंदी। सेजिया चढ़त डर लागे की पौन घंटे की गायकी खत्म होते ही पंडित जी उठ खड़े हुए। गिरिजा देवी को इंगित किया और बोले, "अब तो मेरा हार्ट फेल हो जाएगा!" कहते हुए वह मंच से उतर कर श्रोताओं के बीच आकर बैठ गए। पर गिरिजा देवी का गायन चल रहा था। लेकिन दोनों की जुगलबंदी में जो रस और गंध गमका था, जो मन लहका और बहका था, वह महक अब नहीं रह गई थी, शायद मर गई थी। संजय यह सब बताते मुग्ध था और उसने देखा, चेतना भी मंत्रमुग्ध, एकटक उसकी ओर देखती हुई सुन रही थी।

"आपने तो पूरी जुगलबंदी का दृश्य ही परोस दिया।"

"सच?"

"बिलकुल।"

"तो अब तो गा दो।"

"अच्छा कोशिश करती हूं। क्लासिकल टुकड़े तो नहीं गा सकती। पर एक फिल्मी गीत सुना दूं?"

"हां जानता हूं तुम फिल्मी ही गाती हो। सुनाओ।"

"कहां गिरिजा देवी और कहां मैं?" वह सकुचाती हुई बोली।

"तो क्या हुआ? यह फर्क भी तो है कि कहां उतने सारे सुधी श्रोता और कहां मुझ जैसा मूढ़ अकेला श्रोता।" सुन कर वह पहली बार हंसी। और गाने लगी, "तुम नाचो रस बरसे!"

"तुम नाचो रस बरसे" चेतना ने सुर तो ठीक ही पकड़ा था। पर पहले ही अंतरे में उसका गला रूंध गया। वह रोने लगी। फूट-फूट कर। ऐसे जैसे कोई पका हुआ फोड़ा फूट कर बह चला हो, जैसे कोई हरहराती नदी बांध तोड़कर निकली हो, जैसे कोई हरा पेड़ बढ़ई की आरी से कट कर औंधा गिर पड़े, ऐसे ही वह बेसुध होकर रोने लगी। रोते-रोते सुबुकने लगी। सुबुकते-सुबुकते हिचकियां लेने लगी।

कोई आधा घंटा लग गया उसे सामान्य होने में। जब वह सामान्य हुई तो संजय ने पूछा, "अचानक रोने क्यों लगी! बात क्या है?"

"बस ऐसे ही।" वह उदास स्वर में बोली।

"फिर भी?"

"क्या करेंगे जान कर?"

"कुछ नहीं। पर जब कोई बात मन को दुखी करे उसे किसी और से कह देने से मन का बोझ कुछ हलका हो जाता है। इसीलिए कह रहा हूं कि अगर मुझ पर जरा भी यकीन हो तो कह डालो अपने मन का बोझ। कह लेने से मन हलका हो जाएगा।"

"कह लेने भर से अगर किसी के मन का बोझ हलका हो जाता तो दुनिया में कोई दुखी नहीं होता। सभी कह-कह कर मन का बोझ उतार कर खुश रहते।" वह फिर सुबुकने लगी थी।

"सही है। पर कह लेने से सचमुच पूरा न सही, थोड़ा ही सही, मन हलका हो जाता है।"

वह चुप रही।

"बताओ न क्या बात है?"

"कुछ नहीं। बस, सुकेश की याद आ गई थी।" वह फिर जोर-जोर से सुबुकने लगी, "उसे यह गाना बहुत अच्छा लगता था।"

"यह सुकेश कौन है?"

"मैं सुकेश से प्यार करती हूं।"

"प्यार करना तो बुरी बात तो नहीं है। अच्छी बात है। प्यार करना और उसे पाना सबकी किस्मत में नहीं होता। और फिर प्यार तो पूजा है।" कहते हुए संजय ने उसे नूर लखनवी का वह मशहूर शेर, "मैं तो चुपचाप तेरी याद में बैठा था, घर के लोग कहते हैं सारा घर महकता था।" सुनाया और कहा कि, "तुम बड़ी खुशकिस्मत हो।"

"नहीं, ऐसा नहीं है।" कहते हुए वह तिलमिलाई।

"क्यों?"

"क्योंकि सुकेश ने अब किसी और से शादी कर ली है।" वह डिप्रेस हो रही थी।

"कब?"

"पिछले हफ्ते।" बताते-बताते उसकी आवाज फिर रूंध गई।

"क्यों?" पूछते हुए संजय ने सिगरेट सुलगा ली थी।

"इधर मैंने उससे बोलना बंद कर दिया था। पर क्या पता था कि वह किसी और से शादी कर लेगा?" उसकी रूलाई रुक नहीं रही थी।

"बोलना क्यों बंद कर दिया था?"

"यह तो हम लोगों के बीच अक्सर होता था।"

"क्यों?"

"यूं ही छोटी-छोटी बात पर।"

"आप ही बताइए कि जिसको मैं तन-मन-धन से चाहती थी। उससे कुछ दिनों का बोलना बंद कर देना भी कोई मायने रखता था क्या?"

"मैं क्या कह सकता हूं?"

"मैंने बोलना ही तो बस बंद किया था। उसे मनाती तो मैं फिर भी थी।"

"करता क्या है सुकेश?"

"आर्टिस्ट है।"

"ड्रामा आर्टिस्ट?"

"नहीं।"

"तो?"

"चित्र बनाने वाला आर्टिस्ट।"

"नौकरी कहां करता है?"

"टी.वी. में।"

"क्या मतलब?"

"इसमें मतलब की क्या बात है?"

"मतलब यह कि टेलीविजन में चित्रकार की क्या जरूरत?"

"क्यों नहीं है। ग्राफिक्स का काम है। नाम लिखना, डिजाइन करना।"

"अच्छा-अच्छा।"

"आप इतना भी नहीं जानते?"

"जानता हूं। पर समझ नहीं पाया।"

"आप भी बस!" चेतना अब तक सहज होने लगी थी।

"कब से जानती हो सुकेश को। मलतब तुम लोगों के प्यार की उम्र कितने दिनों की है?"

"अब कहां हमसे प्यार करता है वह?"

"फिर भी कुछ तो उम्र होगी।"

"हां, यही कोई तीन-साढ़े तीन साल।"

"मिले कैसे थे, पहली बार?"

"एक सहेली के मार्फत। बस यूं ही रूटीन।"

"बात आगे कैसे बढ़ी?"

"मैंने तो बढ़ाई नहीं। वही आगे पीछे होने लगा। बाद में घर भी आने लगा। टी.वी. का ग्लैमर तो उसका था ही मैं भी उसके चक्कर में आ गई। नीच, कमीना, कुत्ता कहीं का।"

"इतनी घृणा हो गई उससे। इसका मतलब तुम प्यार भी बहुत करती थी। उससे।"

वह चुप रही।

"क्यों है न?" संजय ने उसे कुरेदा।

"हां, करती थी।" वह झिझकी, "अब भी करती हूं। शायद हमेशा करती रहूंगी पर सिर्फ मेरे प्यार करने से क्या होता है। उसने तो मुझसे प्यार नहीं किया।" वह भावुक होती जा रही थी "उसको अगर किसी से शादी करनी ही थी तो कर लेता। पर कम से कम मुझे बताता तो।"

"तुम करने देती उसे शादी? अगर तुम्हें बता कर करता?"

"क्यों नहीं। अगर उसकी खुशी इसी में थी तो मैं यह भी करती। एक नहीं दस शादियां करता वह। पर मुझसे पूछ कर करता। मैं कभी मना नहीं करती। उसकी खुशी में मेरी खुशी थी।"

"बहुत बड़ा दिल है तुम्हारा!"

"पर सुकेश ने तो यह नहीं समझा।" वह किसी मछली की तरह छटपटा रही थी।

"पर तुम्हारा दिल जब इतना बड़ा है तो झगड़ा किस बात पर हो गया?"

"बताना जरूरी है?" वह खीझी।

"इसीलिए पूछ रहा हूं। क्योंकि जो तुम कर रही हो कि सुकेश एक नहीं दस शादियां करता पर तुमसे पूछ कर करता तो तुम मान जाती। मुझे नहीं लगता। क्योंकि यह बात सिर्फ नारी मनोविज्ञान से परे हैं बल्कि मानव स्वभाव से भी विपरीत है।"

"जो भी हो पर मेरे साथ तो ऐसे ही है। मैं तो ऐसे ही सोचतू हूं।"

"तुम झूठ बोलती हो।"

"क्या?" वह चौंकी।

"यही कि तुमसे पूछ कर सुकेश दस शादियां करता और तुम करने देती।"

"बिलकुल करने देती।"

"बिलकुल झूठ। सुकेश की एक शादी तो तुमसे हजम हो नहीं रही। बिना पानी की मछली की तरह छटपटाती घूम रही हो। अगर वह दस कर लेता तो क्या करती?"

"जी नहीं, पूछ कर करता, दस नहीं दस हजार भी तो मैं खुश रहीती।"

"अच्छा। तो तुमसे पूछता और तुम शादी करने देती?"

"हां। और नहीं तो क्या?"

"तुम फिर झूठ बोल रही हो। हमसे ही नहीं अपने आप से भी।"

"नहीं, मैं झूठ नहीं बोल रही।"

"तो बार-बार यह रट क्यों लगाई हुई हो कि वह तुमसे पूछ कर ही शादी करता। वह तुमसे पूछता औ तुम हां कर देती?"

"बिलकुल।" वह उत्तेजित होकर बोलने लगी, "उसे अपने बेटे की तरह सजा कर, दुल्हा बना कर भेजती शादी करने।"

"मतलब यह कि वह शादी तो करता पर तुम्हारे पल्लू में बंध कर, यह कहो ना।"

"हां बिलकुल यह!" वह चिढ़ कर बोली।

"बस इसीलिए उसने तुम्हें नहीं बताया।"

"क्या?"

"हां। इसीलिए।" संजय जैसे चेतना के अहंकार को पटक कर रख देना चाहता था, "अब मैं समझ गया कि तुम सुकेश से प्यार नहीं करती थी। सिर्फ उसे पल्लू से बांधे रखना चाहती थी।"

"यह कैसे कह सकते हैं आप।"

"ऐसे कि प्यार में स्वार्थ नहीं होता। रत्ती भर भी नहीं। पर तुम्हारे प्यार में स्वार्थ था।"

"कौन सा स्वार्थ?"

"सुकेश को पल्लू से बांधे रखने का स्वार्थ। और यही तुमसे गलती हो गई।"

"कैसे?"

"वो ऐसे कि औरत को पाने से पहले पुरुष चाहे उसके लाख फेरे लगाए पर औरत को पाने के बाद भी वह उसके इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहे, जरूरी नहीं है। कुछ अपवादों को छोड़ दो तो पुरुष मानसिकता यही है। मानव स्वभाव यही है।" संजय ने उसे समझाते हुए बोला, "मेरा खयाल हो तुम यहीं चूक कर बैठी। तुमसे गलगी यहीं हो गई।" वह रुका और बोला, "तुम बुरा मत मानना पर जैसा कि तुम थोड़ी देर पहले बता रही थी कि तुम तन-मन-धन से उसे चाहती थी तो मैं समझता हूं तुम दोनों के बीच देह संबंध भी रहे होंगे? और उसके बाद से जाहिर है तुम उम्मीद करती रही होगी कि वह उसी तरह तुम्हारे इर्द गिर्द नाचता रहे। और उसने ऐसा किया नहीं होगा। तुम्हारी ओर से उदास रहने लगा होगा। और तुम उसे पल्लू से बांधने की फिराक में। गांठ यहीं पड़ी होगी, तुम दोनों के संबंधों में। अंतत: देह संबंध ही तुम दोनों के मिलने और बिछड़ने का सबब बन गया होगा। देह संबंध!"

देह संबंध शब्द पर संजय ने जरा ज्यादा जोर दिया पर चेतना चुप रही। और पैर की अंगुलियों से दीवार की ईंटे कुरेदने लगी।

"बोलो न? देह संबंध थे कि नहीं तुम्हारे। "वह किसी दरोगा की तरह तफतीश कर रहा था।

"हां।" वह सिर झुकाए ही धीरे से बोली।

"रेगुलर या कैजुअली?"

"आप हमें गलत मत समझिए।"

"मैं गलत कहां समझ रहा हूं। मैं देह संबंध नहीं मानता। यह तो एक जरूरत है। ठीक भोजन, हवा और पानी की तरह। एक बायलाजिकल जरूरत।"

"वो तो ठीक है।" कहते हुए उसने सिर झटके से ऊपर उठाया और बोली, "हमने यह सब शादी के बाद किया।" वह बोली ऐसे जैसे संजय को तमाचा मार रही हो।

"कब शादी की तुम लोगों ने?"

"मिलने के कुछ दिनों बाद ही।"

"घर वालों की मर्जी से?"

"नहीं।"

"तो फिर?"

"मंदिर में।"

"तुम्हारे घर वाले साथ थे?"

"नहीं।"

"और सुकेश के?"

"नहीं।" वह खीझ भी रही थी और उदास भी हो रही थी।

"तो?"

"मनकामेश्वर मंदिर में वही ले गया था। वहीं शादी की थी।"

"और कोई साथ था?"

"नहीं।"

"तो शादी की इतनी जल्दी क्या थी?"

"मुझे नहीं, उसे थी।"

"क्यों?"

"वह मेरे साथ सोना चाहता था। और मैंने साफ कह दिया था कि बिना शादी के नहीं।"

"तो तुम अपने घर वालों को बता सकती थी। मना सकती थी शादी के लिए।"

"वह समय देता तब न?" वह उदास होती हुई बोली, "उसके पास तो जैसे टाइम ही नहीं था। बोला आज मंदिर में कर लेते हैं फिर घर वालों की मर्जी से बैंड बाजे के साथ भी बाद में करेंगे।"

"फिर?"

"बैंड बाजा तो बजवाया उसने पर मेरे लिए नहीं, किसी और से शादी कर ली।" वह फिर रोने लग पड़ी थी, "जब कि मंदिर में हमारी शादी की बात सुकेश के घर वाले भी जानते थे। उसके भईया-भाभी तो मुझे घर की बहू की ही तरह मानते थे।"

"और तुम्हारे घर वाले?"

"सिर्फ इतना जानते थे कि सुकेश मुझसे शादी करना चाहता है।"

"वो कैसे? तुमने बताया था क्या?"

"नहीं।"

"तो?"

"वह बेरोक टोक मेरे घर आता जाता था। मैं भी उसके घर जाती रहती थी।"

"फिर उसने तुमसे बैंड बाजे वाली शादी क्यों नहीं की?"

"पता नहीं।"

"तुमने उससे कभी कहा नहीं।"

"मैं तो हरदम कहती रहती थी। पर वही बार-बार "करेंगे-करेंगे" कह-कह कर टालता रहता था।"

"फिर?"

"फिर क्या? अब सब कुछ तो बता दिया आपको?" कह कर वह बुरी तरह रोने लग गई।

"तुम्हारे पास मंदिर वाली शादी के फोटो हैं क्या?"

"खिंचवाई ही नहीं थी।"

"वह पंडित गवाही दे देगा? जिसने शादी करवाई थी।"

"पता नहीं कौन पंडित था, मुझे तो यह भी याद नहीं।"

"तब तो उस पर कोई दबाव भी नहीं डाला जा सकता। बिना किसी सुबूत के, गवाह के कुछ हो भी तो नहीं सकता?"

"मुझे यह सब नहीं करना।" वह जैसे चेतावनी देती हुई बोली, "तो फिर गवाह या सुबूत की क्या जरूरत है?"

"चलो फिर बात ही खत्म हो गई।"

पर बात सचमुच खत्म नहीं हुई थी। अलबत्ता सांझ घिर आई थी। खेलते हुए बच्चे चेतना को देख-देख कर, थक कर वहां से जा चुके थे। कहीं कोई नहीं था। था तो सिर्फ दिलकुशा का खंडहर, झाड़ियां, अपने आप में खोए हुए पेड़, थोड़ी दूर पर सांझ में सोते हुए घर, अपने नीड़ को वापस लौटते हुए झुंड को झुंड पक्षी, संजय और चेतना। माहौल तो अच्छा था। पर संजय ने देखा चेतना अभी भी सुबुक रही थी। धीमे-धीमे। वैसे ही जैसे आकाश में पक्षियों में झुंड धीमे-धीमे उड़ रहे थे। वह चाहता तो बढ़ कर चेतना को चूम सकता था, उसे चुप कराने के बहाने उसकी पीठ, उसके बाल सहला सकता था, उसे बांहों में भर सकता था, वह तो इतनी बेसुध थी कि वह कुछ भी कर सकता था। पर सारा खयाल ही उसे सिरे से सतही और नीचता पूर्ण लगा। उसने एक बार चेतना को गौर से देखा वह घुटनों में सिर घुसाए सुबकती जा रही थी।

संजय को उस पर बरबस दया आ गई। एक अजीब सी सहानुभूति उसके प्रति उमड़ आई। एक ठंडी सी सांस उसने छोड़ी, भारी कदमों से चलता हुआ वह चेतना के पास पहुंचा उसकी पीठ पर धीरे से हाथ रखा तो वह चौंक पड़ी। झटके से सिर ऊपर उठाया। बोली, "क्या है?"

"कुछ नहीं। अब यहां से चलें?" संजय ने पूछा तो चेतना की जान में जान आई, "मन तो अभी नहीं हो रहा है।"

"सांझ घिर आई है। अंधेरा छाने वाला है। देखो मच्छर काटने लगे हैं।" मच्छर मारते हुए संजय बोला।

"तो क्या हुआ।" वह इसरार करती हुई बोली, "थोड़ी देर और नहीं बैठ सकते?"

"क्यों नहीं?" कहते हुए संजय चेतना के पास बैठ गया। बैठ तो वह गया पर सोचने लगा कि या तो चेतना उठ कर दूर छिटक जाएगी या फिर उससे दूर बैठने के लिए कहेगी। पर उसने ऐसा कुछ नहीं किया, कुछ नहीं कहा। तो संजय का मन उसके प्रति एक बार फिर डोला। पर चेतना के दुख से एक बार फिर संजय का मन विवश हो गया। और खुद को धिक्कारने लगा।

"आप ठीक कह रहे थे कि दुख कह लेने से हलका हो जाता है।"

"दुख ही नहीं मन भी हलका हो जाता है।"

"हां, यही बात कहना चाह रही थी, मेरा मन हलका हो गया है।" वह अपने बाल ठीक करती हुई बोली, "नहीं, जब से सुकेश की शादी की बात सुनी है तब से बहुत ही अन-इजी फील कर रही थी।"

अपने सूखे आंसुओं को गाल से छुड़ाती हुई वह बोली, "अब जाके थोड़ी इजी फील हो रहा है।" वह रुकी और बोली, "नही, लगता था कि कितना बड़ा पत्थर मन पर पड़ गया है। लग रहा था जैसे अब जी नहीं पाऊंगी। आत्महत्या कर लूंगी।" वह भावुक हुई ऐसे बोले जा रही थी कि सामने की पगडंडी से जा रहे आदमी ठिठक कर उसे अजीब नजर से घूरने लगे। उनका घूरना देखकर चेतना झट से उठ खड़ी हुई। बोली, "अभी थोड़ा और रुकना चाहती थी। यहां की शांति देख कर अच्छा लग रहा था। पर अब लोग जाने क्या समझ लें। इसलिए चलिए।"

"चलो।" कह कर संजय भी उठ खड़ा हुआ, "मैं तो तुमसे कब का कह रहा था चलने को।"

"हां, तभी मान लेना चाहिए था।" अपने खुल गए बाल बांध कर चिमटी लगाती हुई वह बोली।

"खैर चलो, तुम्हारा मन तो कुछ हलका हुआ।"

"हां, हुआ तो।" कहते हुए वह आगे बढ़ी।

"मैं तुमसे उसी दिन कह रहा था कि तुम प्यार में मार खाई हुई हो।" संजय स्कूटर स्टार्ट करते हुए बोला।

"किस दिन?"

"जिस दिन तुमने रजनीगंधा वाला गाना सुनाया था।"

"कैसे जान गए थे आप?"

"तुम्हारे गाने के अंदाज और लय से।"

"पर मैं तो हमेशा ऐसे ही गाती हूं। वह गीत ही ऐसा है।"

"हां, पर मुझे ऐसा लगा। खास कर "अधिकार तुम्हारा" शब्द जिस तरह तुम उच्चार रही थी। जिस तनाव में तुम उसे गा रही थी, उसमें दर्द छिपा था। उससे ही लग गया था।"

"पर तब तो मुझे पता ही नहीं था कि सुकेश की शादी हो गई है। और तब तो उसकी शादी सचमुच हुई भी नहीं थी।"

"पर झगड़ा तो तुम्हारा चल रहा था?"

"हां। यह जरूर था। पर फिर भी कैसे भाप गए आप?"

"बस यही तो बात है!" संजय ने जैसे खुद को दाद दी।

"अब चलेंगे भी?" चेतना ने टोका।

"क्यों डर लग रहा है?"

"हां।"

"किससे? मुझसे?"

"नहीं।"

"फिर?"

"अंधेरे से।"

"अंधेरे से क्यों?"

"इसलिए कि अंधेरे में मुझे डर लगता है। बस, अब आगे और मत पूछिएगा कि अंधेरे से क्यों डर लगता है। क्योंकि आप तो जवाब हो या सवाल हर जगह से सवाल निकाल लेते हैं।"

"अच्छा चलो। अब मुझसे भी प्रेस जाना है। आज कहीं गया भी नहीं। लगता है आज किसी उड़ते से मसले पर जलेबी बनानी पड़ेगी?"

"आप अखबार में काम करते हैं कि हलवाई की दुकान में?"

"है तो दुकान ही पर, अखबार की दुकान!"

"तो ये जलेबी बनानी पड़ेगी क्यों बोल रहे थे।"

"तुम नहीं समझोगी।"

"क्यों नहीं समझूंगी?"

"पर यह तो ट्रेड सीक्रेट है। नहीं बताऊंगा।" संजय मजाक के मूड में आ गया।

"मैं आपको अपने दिल का राजदार बना सकती हूं और आप अखबार की जलेबी नहीं बता सकते।"

"अखबार की बातें न जानो तो ही अच्छा। सब कुछ जान जाओगी तो घिन आएगी।"

"सब कुछ न सही, जलेबी वाली बात तो बता ही दीजिए।" चेतना जिद पर अड़ गई थी।

"असल में क्या है कि हम लोग जब कोई ठीक-ठाक खबर नहीं होती और फिर भी नौकरी करने के लिए अखबार का पेट भरने की बात आती है तो शब्दों का एक जाल सा बुनते हैं जिसका इन टोटल कई मतलब नहीं होता, कोई अर्थ, कोई ध्वनि, कोई मकसद नहीं होता पर पढ़ने में लोगों को मजा सा आ जाता है, उसी को जलेबी बनाना कहते हैं।" वह बोला, "कुछ लोग इस जलेबी को और सतह पर ला देते हैं और कह देते हैं, क्या लंतरानी मारी है।"

"यह तो धोखा है जनता के साथ।"

"जनता नहीं, पाठकों के साथ। अपने साथ।"

"पाठक जनता नहीं क्या। आप पत्रकार लोग भी नेताओं की तरह जनता को छलते हैं।"

"नेताओं से कहीं ज्यादा छलते है जनता को पत्रकार।" संजय हकीकत बयानी पर उतर आया।

"वो कैसे?"

"ऐसे कि नेताओं पर से जनता का विश्वास उठ गया है। जानते हैं लोग कि नेता छल रहा है। पर सारी गिरावट के बावजूद लोग अखबारों पर भरोसा करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे बाजार में बिकने वाली दवाओं पर करते हैं। देश में ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है जो हर छपे अक्षर को सच मानते ही नहीं, पूरा श्रद्धा के साथ सच मानते हैं। और उनके साथ हम लोग छल करते हैं, सच की चादर ओढ़ कर सच की चादर बिछा कर, एक खोखला सच उनके दिल दिमाग पर तान कर।"

"क्यों करते हैं ऐसा आप लोग?"

"आप लोग?" संजय तंज करता हुआ बोला, "हम लोग तो छोटे-छोटे पुरजे मात्र हैं। नियंता लोग तो और हैं। जो कदम-कदम पर छल की बिसात बिछाए बैठे हैं।"

"नियंता लोग कौन हैं?"

"पूंजीपति साले!" संजय जैसे फूट रहा था, "बड़े-बड़े उद्योगपति। यही अखबारों के मालिक हैं। ये जो बेचना चाहते हैं, जो कूड़ा कचरा जनता को परोसना चाहते हैं वह सब कुछ सच का बाना पहना छपवाते हैं, बेचते हैं। ये पूंजीपति कोई देश हित में, समाज हित में अखबार नहीं छापते, बेचते। अखबार जब मिशन था तब था, अब तो उद्योग है। और उद्योगपति किसी के नहीं होते। वह तो सिर्फ अपने हितों को पोसते हैं, अपनी तिजोरी भरते हैं, अखबार की आड़ में पोलिटिसियनों और ब्यूरोक्रेटों को डील करते हैं। इस तरह समूचे देश को अपने पैर की जूती बनाए फिरते हैं। पर जनता कहां जानती है यह सब?" संजय अपने को रोकते हुए बोला, "अब ज्यादा नहीं बोलवाओ। नहीं, तुम्हारा दुनिया पर से यकीन उठ जाएगा। और मैं आज जलेबी भी नहीं बना पाऊंगा।" बोलते-बोलते वह चेतना की ओर मुड़ा और बोला, "सच बताऊं इस पत्रकारिता के पेशे में आकर पछताता हूं। पर अफसोस कि अब वापस भी नहीं हो सकता। किसी और नौकरी की उम्र नहीं रही। कोई और काम करने लायक नहीं रहा, कर ही नहीं सकता अब तो विवशता है इस पेशे को ढोते रहने की। ठीक वैसे ही जैसे मेहतरानी मैले की बालटी सिर पर ढोते रहने को अभिशप्त हो। मेहतरानी को तो फिर किसी न किसी दिन इस काम से बिलकुल छुट्टी मिल जाएगी। लगभग मिल भी चुकी है। क्योंकि समाज बदल रहा है, सुविधाएं और दृष्टि बदल रही है। पर पत्रकारिता और इसकी अभिशप्तता नहीं बदलने वाली। कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगता है। इस तंत्र में तो कभी नहीं। आगे की राम जाने। पर अभी और बिलकुल अभी तो कतई नहीं।"

"अजीब बात है। मैं तो आप प्रोफेशन को बड़ा पाक साफ जानती थी। समझती थी पत्रकार देश की रीढ़ हैं। और आप लोगों की जो ग्लैमरस जिंदगी है उससे तो सच कहूं रश्क होता था।"

"नहीं, मैं यह नहीं कह रहा कि पत्रकारिता ऐज ऐ प्रोफेशन गंदी चीज है। पत्रकारिता का प्रोफेशन तो सचमुच जो तुम कह रही हो कि पाक साफ वैसा ही है, देश की रीढ़ भी होते हैं पत्रकार, यह भी सच है। और सिद्धांतत: अपने देश में यह सब कुछ है भी। चौथा स्तंभ माना जाता है प्रेस को। पर यह सब बातें जो तुम्हारे दिमाग में हैं वह सब तब की बातें हैं जब पत्रकारिता मिशन थी। पर अब पत्रकारिता मिशन नहीं व्यवसाय है। व्यवसायीकरण के वह सारे दबाव पत्रकारिता पर तारी हैं। जो किसी व्यवसाय पर हो सकते हैं। और पूंजीपति जाहिर सी बात है कि कोई भी चीज बनता है, बाजार में उतारता है तो अपने मुनाफे के लिए। समाज को उसका क्या-नफा नुकसान होता है यह सोचना उसका काम नहीं है। उसका काम अपना मुनाफा सोचना है सिर्फ अपना मुनाफा। तो वह गलत क्या सोचता है?" संजय कंधे उचकाते हुए बोला, "त्रासदी यह है चेतना कि अखबार भी पूंजीपतियों के मुनाफे में कैद हो गए हैं। और यह जो तुम्हारी जनता है कि चेत नहीं रही है।" वह व्यंग्य करता हुआ बोला, "आखिर चेते भी कैसे तुम्हारी जनता। जनता को जागरूक करने, उसे चेताने की जिम्मेदारी भी अखबारों के कंधे पर है!"

"हद हो गई। इस तरह देश कहां जाएगा?"

"यह तो मुझे अभी नहीं पता। और जाएगा भी तो ज्यादा से ज्यादा रसातल। पर अब टाइम बिलकुल नहीं है सो यह बंदा अब अपने अखबार के दफ्तर जरूर जाएगा।" संजय चेतना को सड़क के एक ओर छोड़ता हुआ बोला, "मायूस मत होओ। यह बहस अगली मुलाकातों में भी जारी रह सकती है। क्योंकि यह कभी खत्म न होने वाली बहस है।"

"ठीकह है" चेतना बोली, "पर आज तो चलती हूं।"

"ओ के.।"

"दफ्तर आकर संजय ने पहले तो टेलीप्रिंटर पर नजर डाली। पर वहां कुछ काम का नहीं था। जनरल डेस्क पर मगजमारी की। पर वहां से भी कुछ छापने लायक नहीं मिला। थक हार कर वह अपनी सीट पर आ गया। और जिस मसले पर वह जाने कितनी बार लिख चुका था वही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के बदले जाने की खबर पर एक नया एंगिल खोंसते हुए, "सूत्रों के मुताबिक," "समझा जाता है" "बताया जाता है" "पता चला है" वगैरह-वगैरह जैसी भरमाने वाली और निरर्थक शब्दावालियों के घालमेल से आधे घंटे में ही स्टोरी लिख कर संपादक को थमा आया। स्टोरी देखते ही संपादक बोला, "गुड! आज की बाटम यही बनाते हैं।" और जैसे एहसान जताते हुए बोला,"बाई लाईन भी दे देता हूं।"

"अरे नहीं!" कहता हुआ संजय संपादक के कमरे से फूट लिया। यह सोच कर कि कहीं खुद उसकी मुंह से न निकल जाए कि, "टोटल जलेबी है, बाई लाईन क्या दीजिएगा!"

वापस अपनी सीट पर आकर उसने सिगरेट सुलगा ली।

"बच्चा-बच्चा राम का, क्या प्रबंध है शाम का।" उच्चारता हुआ राकेश संजय की सीट से गुजरता हुआ बोला, "अभी तक यहां बैठे-बैठे सिगरेट फूंक रहे हो। क्या आज अभी तक कहीं इंतजाम नहीं हुआ?"

"क्यों? मेरा क्या है, तुम अपना बताओ।"

"भई अपनी तो इन दिनों चांदी है। सुबह ब्रेकफास्ट, दिन को बीयर वाला लंच और रात की काकटेली डिनर वाली सारी प्रेस कांफ्रेंस अपने ही को एसाइन हो रही हैं।"

"तो आज रात को काकटेली डिनर कहां है?" संजय मुसकुराते हुए बोला।

"क्लार्क!" राकेश सटाक से बोला।

"पर क्लार्क होटल वाला एसाइनमेंट तो मुझे दिया गया है?"

"तो क्या फर्क पड़ता है बॉस। तुम भी चलना, हम भी चलेंगे।"

"नहीं, यार। एक अखबार से दो-दो! नहीं-नहीं। तुम चले जाना मैं नहीं जाऊंगा।"

"बड़े भारी कार्टून हो। डग्गे वाली काकटेली डिनरों में देखते नहीं हो और अखबारों का पूरा का पूरा ब्यूरो ही पहुंच जाता है। और तुम दो ही में भुड़कने लगते हो।" राकेश बोला।

"फिर भी संकोच होता है।"

"संकोच को मारो गोली। चल के भरपेट दारू और मुर्गा काटो। हमें भी काटने दो। और कौन साले महात्मा गांधी की प्रेस कांफ्रेंस है जो तुम नैतिकता बघार रहे हो। इंडस्ट्रियलिस्ट की प्रेस कांफ्रेंस है। कोई झांटू सी गिफ्ट देगा और लाखों की पब्लिसिटी बटोर लेगा। तो ऐसे सालों से क्या रियायत, कैसी नैतिकता? चल के स्कॉच पियो, मुर्गा खाओ, डग्गा लो, ऐश करो।" कहता हुआ राकेश निकल गया। संजय बड़ी देर तक सोचता रहा कि वह काकटेली डिनर वाली प्रेस कांफ्रेंस में जाए कि नहीं। रही बात खबर की तो उसकी तो विज्ञप्ति दूसरे दिन आ ही जाती। संजय अंतत: क्लार्क होटल चला गया। राकेश उवाच का पालन करते हुए उसने भरपेट स्कॉस पी, मुर्गा खाया, डग्गा लेकर,  झूमता-झामता घर पहुंचा तो रात के बारह बजे थे।

"दूसरी शाम चेतना के साथ वह शहीद स्मारक पर गोमती नदी के किनारे एक बेंच पर बैठा था। चेतना आज उसे अजनबी सी लग रही थी। उसने गौर किया कि वह आज हलका सा मेकअप भी किए हुए थी। वह कोई फिल्मी गाना गुनगुना रही थी। जाने गाने की शोखी थी, उसके मेकअप का सुरूर था कि रात की स्कॉच की खुमारी जो अभी तक टूटी नहीं थी, संजय ने बढ़ कर चेतना को अचानक चूम लिया। संजय के चूमते ही वह उठ कर खड़ी हो गई। बोली, "यह क्या हरकत है?"

"मैं समझा नहीं।" संजय अनजान बन गया।

"बड़े भोले बन रहे हैं?" वह अभी भी नाराज थी।

"क्या मतलब?"

"मतलब यह है कि आपने मुझे चूमा क्यों?"

"क्या कोई अपराध कर दिया है?"

"हां अपराध है।"

"चूमना अपराध नहीं है।"

"चूमना अपराध नहीं है। पर जबरदस्ती चूमना गलत है। अपराध है।"

"मैंने जबरदस्ती नहीं की।"

"तो क्या मैंने कहा कि मुझे चूम लीजिए।"

"नहीं।"

"तो जबरदस्ती नहीं हुई?"

"क्या कोई लड़की किसी से कहती है कि आओ मुझे चूमो। कि तुम मुझसे कहती?"

"तो क्या मैं आपको ऐसी लगती हूं कि आप सरेआम मेरे साथ जो चाहे हरकत करें?" वह हाथ जोड़ते हुए बोली, "माफ करिए मैं "वैसी" नहीं हूं।"

"मैंने कब कहा कि तुम "वैसी" हो।"

"तो आपने चूमा क्यों?"

"यूं ही।"

"यह क्या बात हुई?"

"अच्छा चलो बात खत्म हुई।"

"बात खत्म नहीं हुई।"

"तो?"

"आइंदा नोट कर लीजिए, मेरे साथ अब दोबारा ऐसी हरकत मत कीजिएगा।"

"क्यों?" संजय की आंखों में शरारत थी और इसरार भी।

"अब बता दिया आपको। और आपने ने फिर दुबारा ऐसा कुछ किया तो न आप सो बोलूंगी, न फिर कभी मिलूंगी।"

"अच्छा?"

"हां, मजाक मत समझिएगा।"

"तो लो!" कह कर संजय ने उसे पकड़ कर भरपूर चूम लिया। इस चूमा चाटी में चेतना के बालों क क्लिप संजय की आंखों में धंसते-धंसते बची। क्योंकि चेतना बराबर प्रतिरोध दर्ज करती रही। पर संजय पर जैसे उसे चूमने का भूत सवार था।

यह सब कुछ क्षण में ही घटित हो गया। चेतना गुस्से ले लाल हो गई। पैर पटकती हुई वह वहां से चल पड़ी। संजय चुपचाप बेंच पर बैठा रहा। उसने गौर किया कि नदी में नाव पर बैठे कुछ लोग यह सारा नजारा देख रहे थे। पीछे से दो बुढ़े भी इधर ही नजर गडा़ए हुए थे। हार कर संजय भी चेतना के पीछे-पीछे "सुनो तो सही, सुनो तो सही" कहता हुआ चल पड़ा। पर चेतना ने संजय की एक नहीं सुनी। खट-खट, खट-खट सीढ़ियां चढ़ती गई। सीढ़िया उतरते-उतरते सड़क पर संजय ने उसे घेर लिया, "यहां तमाशा करने की जरूरत नहीं है। चुपचाप मेरे साथ चलो।"

"तमाशा मैं नहीं आप कर रहे हैं। आप शादीशुदा हैं। परिवार वाले हैं। आपको शर्म आनी चाहिए। और अब मैं आपके साथ यहां नहीं बैठूंगी।"

"मैं बैठने के लिए नहीं साथ चलने के लिए कह रहा हूं। आगे चल कर फिर भले कहीं चली जाना। अकेली। पर यहां से साथ चलो। तमाशा मत बनो।" संजय उसे मनाते हुए बोला, "लोग जाने क्या तुम्हारे बारे में सोचें, इस तरह अकेले जाने से।"

"सोचा करें। मुझे उसकी परवाह नहीं।" वह तमकी।

"अच्छा ठीक है। आओ थोड़ी दूर साथ चल अकेली कर चली जाना।"

"चेतना मान गई।" और स्कूटर पर बैठती हुई बोली, "कालीबाड़ी चलिए।"

"यह कालीबाड़ी कहां है?"

"यह सब फालतू बातें जानते हैं। और कालीबाड़ी नहीं जानते?"

"नहीं जानता, तभी तो कह रहा हूं।"

"अच्छा चलिए।"

"संजय समझ गया कि चेतना टाइम टेकिंग लड़की है। लाइन पर आएगी तो, पर जरा देर से। संजय को यही नहीं सुहाता था। जाने क्यों लड़कियों को मनाने में, ज्यादा टाइम खर्च करना वह बेहयाई मानता था। यही बेहयाई वह नहीं पे कर पाता था। पर चेतना के मामले में वह जरा बेहयाई से लगा रहा। क्योंकि वह देख रहा था कि सिर्फ वही नहीं चेतना भी उसके पीछे लगी पड़ी थी। कायदे से जब पहली बार रजनीश कथा के ही मार्फत सही सीधे-सीधे सेक्स की बात संजय ने उठाई तभी उसे बुरा मान जाना चाहिए था। पर वह बुरा मानने के बजाय मीरा बनने लगी। चलिए कोई बात नहीं। बातचीत, बहस मानकर टाल गई। पर जब शहीद स्मारक पर चूम लिया। विरोध के बावजूद एक नहीं, दो-दो बार चूम लिया। तब तो वह पिंड छोड़ या छुड़ा सकती थी। पर नहीं, वह फिर भी मिलती रही। और अक्सर खुद ही आती और कहती, "कहीं चलिए।"

"कहां चलें?" स्कूटर स्टार्ट करता हुआ संजय पूछता।

"कहीं भी। जहां आप चाहें।" ऐसा अक्सर जब वह करने लगी तो एक दिन नींबू पार्क में उसका हाथ थामते हुए संजय ने चेतना से कहा, "तुम बुरा न मानो तो एक बात कहूं।" यह संजय का पेट डायलाग था। जो किसी लड़की के साथ सोने के लिए सीधा प्रस्ताव रखने की भूमिका में इस्तेमाल करता। जरा भी समझदार लड़की उसके इस कहने का अर्थ, उसकी ध्वनि, इस ध्वनि से उपजते संकोच और आंखों से टपक रही वासना का संकेत समझ जाती। कुछ सती सावित्री टाइप लड़कियां संजय के इस डायलाग को समूचा पी जातीं और कोई जवाब देने के बजाय कन्नी काट कर निकल जातीं। फिर कभी मिलने से कतरातीं। तो कुछ "क्या कहना चाहते हैं?" जैसे सवाल आंखों में आग डाल कर पूछ बैठतीं। पर धीरे-धीरे लाइन पर आ जातीं। कुछ नहीं भी आतीं। कुछ कहती, "कहिए।" कुछ कहतीं, "बुरा मानने वाली बात कहना ही क्यों चाहते हैं?" और बुरा मानते-मानते भी वह संजय के वश में हो जातीं। पर दिल्ली में यह तरीका ज्यादा मुफीद पड़ता था। लखनऊ में वह आलोक की तरह कभी पिटा तो नहीं पर एकाध बार पिटते-पिटते जरूर बचा। पर लड़कियां उसकी कमजोरी बन चुकी थीं। वह इस आदत से बाज नहीं आता। फिर जब लड़कियां खुद ही उसकी ओर लार टपकाती चली आतीं तो वह उन्हें मना नहीं कर पाता था। ऐसे ही जब एक बड़े नेता की बेटी उसके गले पड़ गई तो वह चाहते हुए भी "नहीं" नहीं कह पाया। पर वह जल्दी ही संजय से ऊब गई कि संजय उससे ऊब गया। वह कुछ समझता कि उसकी शादी तय हो गई। शादी तय होते ही संजय को कुछ गुंडों ने एक दिन घेर लिया और धमकाते हुए कहा कि, "पढ़े-लिखे आदमी हो। उसका चक्कर छोड़ दो।" पर उसने जब शादी का कार्ड भिजवाया तो वह गए बिना भी नहीं रह पाया। गया वह रीना की शादी में।

हां, रीना ही नाम था उसका।

संजय को याद है एक दिन जब वह निढाल हो गया तब भी वह उसकी बांहों में कसमसाती रही और, "एक बार और-बार और" फुसफुसाती रही।

"तुम शादी क्यों नहीं कर लेती?"

"तुम कर लो न?" रीना बोली।

"मुझसे शादी करोगी? मैं गरीब आदमी।"

"हां ये प्राब्लम तो है।" वह रुकी, छाती पर सवार होती हुई बोली, "पापा भी किसी आई.ए.एस. से शादी करना चाहते हैं।"

"तब बताओ!"

"पर तुम हां करो तो सही। मैं पापा को मना लूंगी।"

"पर तुम्हारे खर्चे, तुम्हारे नखरे, मेरी औकात से तो बाहर हैं।"

"क्यों?"

"जो तुम्हारा चार दिन का खर्चा है वो मेरे महीने भर की तनख्वाह है।"

"क्या फिल्मी सीन लिखने बैठ गए।" वह चिकोटती हुई बोली, "पापा इतना दे देंगे कि तुम्हें इसकी फिकर करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।"

"पर मेरा जमीर!"

"मेरे साथ इस तरह चोरी छुपे सोने में तुम्हारा जमीर नहीं मरता?" वह दांत भींचती हुई बोली, "मिडिल क्लास मेंटालिटी।" फिर वह बेतहाशा चूमते हुए बोली, "यह मेंटालिटी छोड़ दो।" वह उचकती हुई बोली, "मेरे गोद में बैठ जाओ।"

"सिंबालिक वे में तमाचा मार रही हो, सीधे मारो न।" संजय उसके बाल खींचता हुआ बोला।

"ओह, यू स्टुपिड!" कराहती हुई वह बोली, "कहा न यह मेंटालिटी छोड़ दो। बी प्रैक्टिकल।" कह कर वह संजय की छातियों पर हाथ फेरने लगीं। संजय उसके जादू में आ गया। पर गोद में फिर भी नहीं बैठा। हां, सिर उसकी गोद में जरूर रख दिया। वह संजय के बालों को सहलाती हुई बोली, "देखो जब मुझसे तुम्हारी शादी हो जाएगी तो पापा तुम्हें ऐसे रिपोर्टर ही थोड़े रहने देंगे। हो सकता है तुम्हें एडीटर लगवा दें।"

"क्या बेवकूफी की बात करती हो?"

"देखो तुम्हारी प्रेस लाइन की कुछ बातें मैं भी जानती हूं।"

"क्या जानती हो?" वह जैसे गुर्राया।

"इसमें फेड अप होने की क्या बात है। हकीकत यही है कि जर्नलिस्ट पोलिटिसियंस के तलवे चाटकर ही कायदे के जर्नलिस्ट बन पाते हैं।"

"माइंड योर लैंग्वेज रीना। माइंड योर लैंग्वेज!" संजय उसकी छातियों के निप्पल दबाता हुआ बोला।

"उस्स!" कह कर वह उसे काटने को झुकी तो उसने उसके होंठ हाथों में ले लिए, "ऐसी ही तकलीफ मुझे भी हुई।"

"पर मैंने यह तुम्हारे लिए तो कहा नहीं।"

"फिर?"

"तुम कायदे के जर्नलिस्ट हो क्या?" वह आंखों में शरारत डाल कर बोली।

"तो तुम क्या समझती हो। संसद में मेरी खबरों पर यों ही हंगामा होता है। तुम्हारे पिता जैसे पोलिटिसियंस यूं ही भाव देते हैं।"

"जिंदगी भर बेवकूफ ही रहोगे।"

"ह्वाट यू मीन?"

"कब तक खुशफहमी में रहोगे तुम संजय?" तुम क्या समझते हो मैं इतना भी नहीं जानती।

"क्या जानती हो?"

"देखो मेरी राय में," वह रुकी और बोली, "जरूरी नहीं तुम भी इत्तफाक करो मेरी बात से!" वह बोलती गई, "मेरी राय में और मैं समझती हूं दुनिया की राय में भी कायदे का जर्नलिस्ट वह जो हवाई जहाज से चले, अपनी ए.सी. कार हो, बंगला हो, नौकर चाकर हो।" बोलते बोलते वह ऐंठी, "कायदे का जर्नलिस्ट वह है जो साल में छ: बार विदेश यात्राएं करे, कम से कम संसद कवर करे। यह नहीं कि संसद में हंगामा कराने वाली खबरें लिखे।" और संजय को वह भिगोती हुई बोली, "कायदे का जर्नलिस्ट वह नहीं है जो दिन रात कलम घिसे, कायदे का जर्नलिस्ट वह है जिसकी कलम उसकी जेब में रहे, हाथ में नहीं।" कह कर वह जैसे खुश हो गई।

"वाह क्या बात है! तुम तो जर्नलिस्टों की पूरी जन्म कुंडली जानती हो!" वह उसकी जांघ पर उंगलिया फिराते हुए बोला।

"मैं और भी बहुत कुछ जानती हूं।" वह जांघ चादर से ढंकती हुई बोली।

"पर कैसे?"

"पापा के पास क्या कम जर्नलिस्ट आते हैं," वह इतराई, "एंड फार योर काइंड इनफार्मेशन तुम्हारे एक्सप्रेस ग्रुप में चार महीने मैं भी अप्रेंटिस रही हूं। और वो जो सोनू वालिया जिसकी मांसलता, मादकता, आंखों और अभिनय की आह रिव्यू में पिछले हफ्ते तुमने टपकाई थी वह भी मेरे साथ ही अप्रेंटिस थी!" कह कर वह संजय को ऐसे देखने लगी गोया लाल किला जीत लिया हो।

"क्या उमर है तुम्हारी?" संजय हैरान होते हुए बोला।

"क्यों हो गई न सीनियर यहां भी तुमसे"

"अप्रेंटिस सीनियर नहीं होते।" संजय बोला। पर वह जैसे सफाई पर उतर आई, "उम्र में ही सीनियर सही पर तुमसे बहुत ज्यादा नहीं। दो चार साल बस।" फिर वह जैसे अपनी बढ़ी उम्र की सफाई देने पर उतर आई, "पर क्या फर्क पड़ता है। सुनील दत्त नरगिस से चौदह साल छोटे थे। आदित्य पंचोली जरीना वहाब से कोई दस बारह साल छोटा है।"

"और डिंपल राजेश खन्ना से अठारह साल, सायरा बानो दिलीप कुमार से बाइस साल छोटी हैं।" संजय जैसे काउंटर करता हुआ बोला।

"ओह, तो तुम्हें लड़की नहीं गुड़िया चाहिए।" वह मटकती हुई बोली।

"जी नहीं बुढ़िया!" संजय ने उसे चिढ़ाया तो वह विलख कर रोने लगी, "मैं तुम्हें बुढ़िया लगती हूं?" वह रुकी और बिफरी, "जरा सा मुंह क्या लगा लिया, मुझे बुढ़िया कहने की हिम्मत हो गई तुम्हारी?"

"मुंह नहीं लगाया तुमने मुझे।"

"तो?"

"देह लगाया है। पूरा-पूरा। बिलकुल साबुन की बट्टी की तरह।" संजय ने उसे फिर चिढ़ाया।

"यू चीट!" कह कर वह उस पर टूट पड़ी, "तब तो कहते थे, एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानिएगा! बड़े मासूम बनते थे।" वह उसके बाल नोचने लगी, "और आज ये हिम्मत कि जो मुंह में आता है बक जाते हो।" वह जैसे रोने लगी।

"सॉरी, मेरा ये मतलब नहीं था।"

"तो?" वह बिसूरती हुई बोली।

"मैं तो मजाक कर रहा था।"

"ओह, श्योर!"

"एक्जेक्टली!"

"यू नॉटी!" कह कर वह उस पर जैसे सवार हो गई, "तो आज तुम्हें कच्चा खा जाऊंगी।"

"रुको तो सही, रुको तो सही।" संजह कहता रहा पर वह भला कहां मानने वाली थी। और जब शांत हुई तो फिर से शादी की बात पर वापस आ गई।

"हमारी तुम्हारी शादी नहीं निभ पाएगी।" संजय बोला।

"क्यों?"

''मैं ठहरा लोवर मिडिल क्लास, तुम ठहरी अपर क्लास। अंततः मैं न तो कार्टून बन कर जीना चाहता हूं, न ही बेचारा बन कर तुम्हारी चाकरी करता हुआ जीना चाहता हूं।''

.....जारी....

 

उपन्यास 'अपने-अपने युद्ध' के लेखक दयानंद पांडेय हैं. उपन्यास और लेखक के बारे में ज्यादा जानने के लिए दयानंद की उपर लगी तस्वीर पर क्लिक करें. पार्ट (14) कुछ दिनों बाद.


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