'दयानंद पांडेय एक पागल पोर्नोग्राफर है'

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अपने-अपने युद्धSir, The so called masterpiece of DAYANAND / DANDACHAND is a cheap stuff. Can he ask his son or daughter to read it aloud in his presence? Certinly not. In his explanation he talked of TATALITY (SAMAGRATA). He quoted ancient literaure also. He fogot to say about porn sites like YOUPORN,  PORNTUBE,  and many others in his ZABAB HAZIR HAI to justify himself.

YASHWANTJI, we, all, have differant opinion about you and b4m. PLEASE do not play into the hands of a mad pornograoher. Remove all the 13 parts and related comments.He has contributed some good items to your portal.I have read those  including the write up about 81 year old scholar ARVIND KUMAR.Even then,your decision to publish it is not justified.NOW IT IS UPTO YOU TO MAKE YOUR PORTAL HEAVEN OR HELL  /  SSCHOOL OR BROTHEL.

Thanks.

SAVITA

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प्रिय सविता जी,

आप की चिट्ठी मिली है, क्रोध में नहाई हुई।

आपको बताऊं कि यह उपन्यास दस साल पहले छप चुका है। और काफ़ी आरोप प्रत्यारोप हो चुके हैं। वह सब भी आप पढ ही चुकी होंगी। न पढी हों तो पढ लें। उसमें एक बात कही थी मैंने कि अश्लीलता से बचने का एक सबसे सरल तरीका है कि उसे न पढ़ा जाए। पर आपतो न सिर्फ़ पढ़ रही हैं बल्कि पढ़ कर मुझे कुछ पोर्न साइटों का पता भी दे रही हैं। अजब अंतर्विरोध है भाई आपका। असल में बताऊं आपको कि 'अपने-अपने युद्ध' की कुल कथा यह है कि जो पढ़ता है, वह बात करता है और जो नहीं पढ़ पाता, वह पछताता है।

दस साल पुराना यह उपन्यास अपनी कथा भूमि के लिए आज भी प्रासंगिक है। और कथाभूमि सेक्स नहीं, मीडिया का नरक और न्यायपालिका की अप्रासंगिकता, सामाजिक न्याय का छल वगैरह है। पर कुछ लोगों को सिर्फ़ सेक्स ही दिखता है। तो मैं क्या कर सकता हूं भला? हां, मैं यह ज़रूर स्वीकार करता हूं कि 'अपने-अपने युद्ध' शुचिता पसंद या कहूं कि सती सावित्री-सती अनुसुइया-पतिव्रता टाइप लोगों के लिए नहीं है। पर आप तो शायद उनमें से भी नहीं हैं। आप तो उन पोर्न ऐड्रेसेज़ के बारे में भी जानती हैं जिनकी जानकारी मुझे भी नहीं है। और कि, मेरी उसमें कोई दिलचस्पी भी नहीं है।

बहरहाल, आपने चिट्ठी लिखी आप का आभारी हूं। आप का क्रोध सर आंखों पर।

आपका,

दयानंद पांडेय

लेखक

'अपने-अपने युद्ध'


आदरणीय यशवन्तजी

आज पहली बार बी4एम पर दयानन्द पान्डे के उपन्यास का पार्ट12 व 13 पढा। अश्लील प्रसंगों पर आपसे फोन पर बात हुई। आपके कहने पर अन्य भागों को भी देखा। सुश्री श्वेता व राजमणि सिंह के कमेन्ट पर लेखक का जबाब भी देखा। दयानन्द की बेशर्मी पर खेद हुआ। इसे प्रकाशित करके आप अपने पोर्टल की गरिमा नष्ट कर रहे हैं। बाजार में ऐसी किताबों की भरमार है। इसी प्रकार वेश्याओं की भी कमी नहीं है। यह तो दुनिया है। मेरी प्रतिक्रिया केवल आपके पोर्टल की लोकप्रियता के कारण है, जिसे लोग मन्दिर या स्कूल समझतें हों, वहां रण्डियां अंग प्रदर्शन करें तो ठीक नहीं लगता।  

आपका शुभचिन्तक

डा. हरीराम त्रिपाठी

लखनऊ


प्रिय हरिराम जी,

नमस्कार

आपकी चिट्ठी मिली। आप की भावना पढ़ी। आपके ऐतराज सर आंखों पर। सबका अपना-अपना नज़रिया है। आप थोड़ा कुएं से बाहर निकलेंगे तो तस्वीर थोड़ी और साफ होगी। मेरा फिर यह कहना है कि उपन्यास में जीवन है, समग्र जीवन। समग्रता में पढेंगे तो अश्लील नहीं लगेगा, वरन आप को अपना आरोप ही अश्लील लगेगा। थोड़ा दिमाग के खिड़की दरवाज़े खोलिए न !

आपका,

दयानंद पांडेय


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