अपने-अपने युद्ध (14)

E-mail Print PDF

"तुम मिडिल क्लास!" वह उसका हाथ थाम कर बोली, "इससे क्यों नहीं उबर पाते।" वह रुकी, "आज तक हम भी वही थे जो तुम हो। पापा अगर मिनिस्टर नहीं रहे होते तो हम भी वहीं थे, जहां तुम हो। हमारे भी वही संस्कार हैं जो संस्कार तुम्हारे हैं।" वह जैसे फैल गई, "और तुम भी छलांग मार सकते हो। जरूरी है मिडिल क्लास के खूंटे से किसी गाय की तरह बंधे रहो?"

"नहीं मुझे यह छलांग मंजूर नहीं है।"

"यह कहो न कि मुझसे शादी मंजूर नहीं है।"

"नहीं, कहो तो शादी अभी कर लूं। इसी वक्त। पर बात यह नहीं है।"

"तो क्या है?"

"मैं पैरासाइट बनकर नहीं जीना चाहता।" उसने जोड़ा, "स्वाभिमान की कीमत पर तो कतई नहीं।"

"कौन खा रहा है तुम्हारा स्वाभिमान?" वह जैसे मरहम लगाती हुई बोली, "तुम मुझे समझने की कोशिश क्यों नहीं करते।"

"क्या समझूं? कैसे समझूं? चलो देह संबंध की बात और है पर शादी!"

"हां, शादी!"

"शादी असंभव है!"

"चलो जब तुमने यह सोच ही लिया है तो कोई बात नहीं।" वह उसका चेहरा हाथ में लेती हुई बोली, "तुम्हारे मन में जब इतना कांपलेक्स था तो मेरे पास आना ही नहीं था। क्या अधिकार था तुम्हें मेरे साथ इस तरह खेलने का?"

"मैं तुम्हारी जिंदगी में कोई पहला पुरुष तो नहीं हूं।"

"तुम कहना क्या चाहते हो?"

"यही कि देह संबंध का मतलब किसी से खेलना नहीं है। हां, अगर तुम्हारे साथ जबरदस्ती करता, तुम्हारा शोषण करता, तुम्हें अंधेरे में रखता, तुमसे झुठे वादे करता तो खेलता। और ऐसा मैंने कुछ भी नहीं किया तुम्हारे साथ!"

"किया तो है। खेले तो हो!"

"क्या किया है। किससे खेला हूं?"

"मेरे मन के साथ, मेरी देह के साथ, मेरी भावनाओं के साथ।"

"गलत। खेला नहीं, जिया है, भोग है, तुम्हारे मन को, तुम्हारी देह को, तुम्हारी भावना को। और तुम्हारी मर्जी से। तुमसे पूछ कर। हर बार तुम्हारी सहमति से। तुमने जब मना किया तो मान भी गया हूं। कभी जबरदस्ती की हो तुम्हारे साथ, मुझे याद नहीं। तुमने जरूर यह कभी-कभार किया है। फिर कैसे कह रही हो कि तुम्हारी देह, तुम्हारे मन, तुम्हारी भावना के साथ खेला।"

"पहल मैंने की थी कि तुमने?"

"एक्जेक्टली मैंने।"

"तो?"

"मैं इसे क्या समझूं?"

"तुम नारी स्वातंत्र्य की बात जरूर करते हो पर नारी मन को नहीं समझते।"

"समझता हूं। इसीलिए!"

"खाक समझते हो।"

"यही तो तुम्हारे सात दिक्कत है।"

"तुम क्यों नहीं समझते, मैं तुम्हें प्यार करने लगी हूं। पहले तुम्हारे लिखे को पसंद करती थी, अब..."

"तुम्हारी देह को। संजय उसकी बात पूरी करता हुआ बोला।"

"हां, तुम्हारी देह भी शामिल है उसमें, तुम्हारा मन भी शामिल है, तुम्हारी ईमानदारी, तुम्हारी निश्छलता, तुम्हें...तुम्हें इन टोटल चाहती हूं।"

"नहीं, तुम झूठ बोलती हो।"

"सच कह रही हूं।"

"तो कहो ने तुम्हारे मिडल क्लास कांपलेक्स को, तुम्हारी मिडल क्लास मुफलिसी को, तुम्हारी मिडल क्लास नौकरी, मेंटालिटी वगैरह-वगैरह से भी प्यार करती हूं।" कहते-कहते संजय तल्ख हो गया।

"नहीं।" वह नरमी से बोली, "क्यों झूठ बोलूं। मैं तुम्हारी इन चीजों से चिढ़ती हूं।" वह भावुक हो गई, छाती से चिपट गई, "पर मैं तुम्हें चाहती हूं।"

"ओह रीना!" संजय उसकी भावुकता के वशीभूत उसे बांहों में भरता हुआ बोला, "जानता हूं।"

"फिर?"

"आज इस बात को यही मुल्तवी कर दें तो?"

"जैसा तुम्हारा हुक्म।" कहते हुए रीना ने उसे चूम लिया, बोली, "पर एक बात बताओ कि कहीं ऐसा तो नहीं तुम पोलिटिसियंस से चिढ़ते हो इसलिए?"

"पोलिटिसियंस से चिढ़ता हूं पर उनकी बेटियों से नहीं।" कहते हुए संजय ने रीना की नाक पर चिकोटी काटी और कहा कि, "मेरा फिर मन हो रहा है और अब बहस मत करो प्लीज।" कह कर वह उसे मथने, मसलने लगा।

"भालू कहीं के।" वह बुदबुदाई। पंडारा रोड के उस बंगले में रीना ने उसे रात भर सोने नहीं दिया। रात भर वह कुछ न कुछ करती रही। कुछ न कुछ बतियाती रही। शादी जबरदस्ती नहीं करेगी, यह भी जताती रही। अपनी अखबारी जिंदगी के चारों महीने का लेखा-जोखा बताती रही। संजय यह जान कर हैरत मे था कि रीना उस चार महीने में अप्रेंटिस की हैसियत के बावजूद अखबारी जिंदगी के लगभग सारे स्याह-सफेद से वाकिफ हो गई थी। न सिर्फ वाकिफ हो गई थी, एनालिसिस भी उसकी गौरतलब थी।

वह कहने लगी, "ये मीनिंगफुल जर्नलिज्म की वकालत करने वाले लोग भीतर से कितने खोखले, बेशर्म और मीनिंगलेस जर्नलिज्म करते थे उसे देख कर घिन आती थी।" कहते-कहते वह पूछ बैठी, "ये डेस्क रिपोर्टिंग वालों का झगड़ा हरदम क्यों होता रहता है मैं तो सब समझ नहीं पाई। तुम बताओ क्यों होता है?"

"बड़ी लंबी बहस है।"

"फिर भी।"

"छोड़ो भी क्या फायदा है।"

"नुकसान क्या है?"

"है।"

"इसलिए कि तुम रिपोर्टर हो?"

"इसलिए कि तुम्हारे साथ इस मुलाकात का समय बेवकूफी के बहस में नहीं गुजारना चाहता।"

"तुम बेवकूफी की बात कर रहे हो।" वह बोलती गई, "जैसे झुग्गी वाली औरतें पानी के लिए या किसी भी छोटी मोटी बाले के लिए झौं-झौं करके लड़ती रहती हैं, ठीक वैसे ही ये डेस्क वाले रिपोर्टरों से उलझ पड़ते थे और रिपोर्टर्स, डेस्क वालों से। गलाकाट लड़ाई ऐसे होती थी जैसे वह एक अखबार के जर्नलिस्ट न हों। लड़ते ऐसे थे जैसे हिंदुस्तान-पाकिस्तान।"

"झुग्गी वालों को जानती हो तुम?"

"हां, पापा जब मिनिस्टर थे तब उनके साथ दो-चार बार झुग्गी बस्तियों में गई हूं।"

"बस!"

"और नहीं तो क्या?" वह उसके हिप पर पैर फेंकती हुई बोली, "तुम क्या समझते हो वहां रहने गई थी। तुम तो बस!"

"हां, तुम वहां कैसे रहती।" वह जांघो की ओर इशारा करते हुए बोला, "वहां रह जाती तो यहां कौन रहता?"

"तुम्हें हर वक्त सेक्स ही क्यों सूझता रहता है।"

"इसलिए कि तुम सेक्सी हो।" वह उसकी जांघों पर जांघ रखता हुआ बुदबुदाया, "सेक्स ही जीवन है।" और उसे चूम लिया।

"तुम तो सरकारी स्लोगन की तरह बोल रहे हो।"

"कौन सा स्लोगन?"

"जल ही जीवन है।"

"बिलकुल ठीक पकड़ा तुमने।" सुनते ही रीना ने हड़बड़ा कर उसकी जांघों से बीच से हाथ हटा लिया। उसकी इस हड़बड़ाहट पर संजय हंस पड़ा, "तुमने हाथ क्यों हटा लिया। मैं तो स्लोगन "जल ही जीनव" पर कमेंट कर रहा था कि तुमने ठीक पकड़ा है।" वह उसे गुदगुदाता हुआ, हाथ खींचता हुआ बोला, "वैसे वो भी ठीक था।" उसे खींच कर अपनी देह से सटाता हुआ बोला, "आखिर भोजन पानी के बाद आदमी को क्यो सूझता है?" उसने जैसे सवाल किया और खुद ही जवाब दिया, "सेक्स ही तो सूझता है।" उसने जोड़ा, "सेक्स न होता हो हम तुम न होते। कमसे कम इस समय यहां तो नहीं होते। यह सृष्टी ही नहीं होती।" वह जैसे दार्शनिक हुआ जा रहा था, "पर जाने क्यों सेक्स को लोगों ने इतना सतही, बुरा, चोरी और लुका छिपी का खेल बना दिया है। पाप बना दिया है।"

"तो तुम क्या चाहते हो सरेआम सड़क पर ही सेक्स की इजाजत दे दी जाए। परदा, लिहाज कुछ भी न रह जाए।"

"यह किसने कहा!"

"तो?"

"खाना तो तुम चोरी छुपे नहीं खाती?"

"नहीं।"

"सड़क पर खाती हो?"

"नहीं।"

"तो क्या खाना खाकर पाप करती हो, चोरी करती हो?"

"नहीं।"

"तो सेक्स के बाबत भी ऐसा क्यों नहीं सोचती?"

"पर खाना तो लोगों के सामने खा सकते हैं, सेक्स नहीं हो सकता सबके सामने।"

"किसने कहा सब के सामने। परदा, लिहाज करने को किस ने मना किया। पर पाप तो न समझो। पिता के सामने मत करो ठीक। पर पिता के आगे, सबके आगे इसके लिए सिर झुकाओ यह ठीक नहीं है। सेक्स चोरी नहीं है, पाप नहीं है। सेक्स एक आदिम जरूरत है। एक नैसर्गिक जरूरत।" वह बोलता रहा, "जिस दिन सेक्स को लोग सामान्य अर्थ में लेने लगेंगे बिलकुल भोजन और पानी की तरह, देखना, ज्यादातर समस्याएं, ज्यादातर अपराध पृथ्वी से खुद-ब-खुद खत्म हो जाएंगे। क्योंकि ज्यादातर अपराध और जटिलताएं सेक्स, दमित सेक्स की उपज हैं। क्योंकि सेक्स एक टैबू बन कर रह गया है हमारे समाज में। हम हर क्षण जीते हैं पर सार्वजनिक जीवन में हर क्षण सेक्स को धकियाते रहते हैं।"

"शाबास!" वह अपनी हिप खुजलाती हुई बोली, "अलका बताती तो थी कि तुम रजनीश के दीवाने हो, पर रजनीश दर्शन बघारते भी हो यह नहीं बताया था।"

"वह क्या बताती!" संजय करवट बदलते हुए बोला, "जरा सा भर आंख देख क्या लिया राखी बांधने पर आमादा हो गई।"

"अच्छा! यह तो उसने नहीं बताया। पर बताओ राखी बंधवाई क्या तुमने?" चुहुलबाजी करती वह बोली।

"हद हो गई। इतनी नैतिकता तो मुझमें है।"

"तो बंधवा ली?"

"सवाल ही खड़ा नहीं होता!"

"क्यों?"

"राखी की पवित्रता कैसे तोड़ता भला?" वह बोला, "जब उसे एक बार ही सही देह की नजर से देख लिया तो यह तो अपने साथ छल होता।"

"तो क्या अलका के साथ भी तुम्हारा लफड़ा चला?" उसकी जिज्ञासा जागी।

"नहीं।"

"क्यों?"

"वह मेरे दोस्त की बीवी थी आखिर। और इतनी नैतिकता तो मुझमें हमेशा शेष रहेगी।"

"ओह! लक्की।" वह बोली, "पर रजनीश तो फिर यहां फेल हो गए।"

"कैसे?"

"तुमने अलका को चाह कर भी जो नहीं गहा।"

"कहा न नैतिकता।" वह बोला, "ऐसा भी नहीं था। चाहता तो गह सकता था। पर कहा न फिर वही नैतिकता।"

"पर रजनीश के सेक्स दर्शन में नैतिकता का बखान तो है नहीं।"

"तुमने रजनीश को पढ़ा है?"

"हां, थोड़ा बहुत।"

"तभी!" वह रुका और बोला, "अच्छा रजनीश ने यह कहां लिखा कि सेक्स में नैतिकता नहीं बरतनी चाहिए।"

"मैंने यह तो कहीं नहीं पढ़ा। पर यह भी कहां लिखा है कि सेक्स में नैतिकता बरतनी चाहिए।"

"पता नहीं।" वह रीना के तर्क से लाजवाब होता हुआ बोला, "देखो कायदे से सेक्स न तो नैतिक होता है न अनैतिक। सेक्स सिर्फ सेक्स होता है। और जो आफर खुद अलका का होता तो मैं नहीं, नहीं कहता।" वह उसके बालों में अंगुलियां फिराता हुआ बोला, "जैसे तुम्हें नहीं, नहीं कहा।"

"बड़े मुंहफट हो।"

"बट कम आन द प्वाइंट कि सेक्स में नैतिकता बरतनी चाहिए। मैंने भी अक्षरशः यह कहीं नहीं पढ़ा। पर रजनीश का सारा दर्शन ही संभोग से समाधी का है।" संभोग यानी सम-भोग, वह उसकी छातियां मसलता हुआ बोला, "जो यहां भोग रहे हैं।"

"स्टाप योर नानसेंस।" वह कुढ़ती हुई बोली।

"क्या मतलब?"

"सम-भोग का दर्शन बखान रहे हो। और मुझे पीड़ा भी दे रहे हो।" वह उसकी ओर मुड़ी, "कितनी बार कहा कि कसके मत दबाया करो दुखता है।"

"सॉरी!" वह बोला, "दबाया तो अनायास ही था पर रेफरेंस अच्छा मिल गया। अलका के साथ सेक्स संबंध मैं कायम करता तो शायद उसे पीड़ा होती। उसे तो भर आंख देख लेना ही पीड़ा दे गया था। फिर सम-भोग कैसे हो सकता था भला?"

"चलो मान गई रजनीश बाबा!"

"मैं रजनीश नहीं, संजय हूं।" उसने रीना के गाल पर चिकोटी काटी।

"उफ! तुम्हारी यह आदत कब जाएगी?"

"जब तुम चाहो!" कहते हुए वह उसकी देह पर चढ़ गया।

"तुम्हारा पेट जल्दी से नहीं भरता?"

"किस चीज से?"

"सेक्स से।"

"पेट सेक्स से नहीं, भोजन और पानी से भरता है।"

"आई मीन दिल नहीं भरता?"

"किससे?"

"सेक्स से?"

"गाना नहीं सुना है अभी न जाओ छोड़ के, कि दिल अभी भरा नहीं।"

"यह तो मुहम्मद रफी ने गाया है देवानंद के लिए, तुम्हारे लिए नहीं।"

"यह तुम्हें किसने बताया?" बुदबुदाता हुआ वह हांफने लगा। थोड़ी देर बाद फिर बुदबुदाया, "मतलबवा एक है नैनन पुकार का।" उसकी देह पर से उतरते हुए वह धीरे से बोला, "मुकेश ने यह तो मेरे लिए गाया है।"

"तुम भी!" कह कर रीना हंसी और तकिए में मुंह धंसा लिया। थोड़ी देर बाद संजय उठा, बाथरूम गया, आकर पानी पिया और आकर रीना जो चादर ओढ़ कर पेट के बल लेटी हुई थी, चादर हटा कर उसकी पीठ पर लंबा लेट गया।

"तुम भी अजीब शै हो।" तकिए पर सिर मोड़ती हुई बोली, "कहां से ट्रेनिंग ली?"

"किस चीज की?"

"इसी चीज की।"

"किस चीज की।"

"अरे, यही।" वह फुसफुसाई।

"क्या यही।" वह बुदबुदाया। वह समझ तो गया था। पर उससे स्पष्ट कहलवाना चाहता था।

"क्या रजनीश आश्रम हो आए हो?"

"नहीं तो।"

"फिर कहां से ट्रेनिंग ली?"

"क्या इसकी भी ट्रेनिंग ली जाती है?" कहते हुए वह उसके बालों से खेलने लगा।

"क्या पता?"

"तुमने ली है क्या?" संजय फुसफुसाया।

"ली तो नहीं थी, पर आजकल ले रही हूं।"

"किससे?" उसने छेड़ा।

"है एक आदमी!"

"क्या मतलब?"

"कोई और भी है इस समय तुम्हारी जिंदगी में?" वह जैसे चौंका।

"बस!" वह खुश होती हुई बोली, "इतने में ही रजनीश दर्शन धूल चाट गया?"

"नहीं तो, नहीं तो!" संजय जैसे सफाई पर उतर गया। वह रीना की देह पर से भी उतर औंधा लेट गया।

"सारा सेक्स दर्शन एक क्षण में भहरा गया?" वह संजय को चिकोटती हुई बोली, "एक छोट सा छेद नहीं बर्दाश्त कर पाया तुम्हारा सेक्स दर्शन। तिस पर कहते हो सम-भोग।" कहती हुई वह उसकी पीठ पर लद गई। बोली, "तुम्हारा दोष नहीं, पुरुष मानसिकता का "प्रताप" है यह। जो औरत को एकाधिकार की वस्तु मानता रहता है। पुरुष जिस-तिस औरत के साथ सोए तो वह "सम-भोग" है। पर स्त्री जो कहीं गलती से भी किसी और के बारे में सोच ले तो, और न भी सोचे तो भी, वह "सम-भोग" नष्ट हो जाता है। ऐसा क्यों होता है? वह जैसे चिरौरी करती हुई बोली, "सच-सच बताना संजय। ठीक वैसा ही सच जैसा महाभारत में धृतराष्ट्र को संजय ने सच-सच बताया था। ठीक वैसा ही सच संजय! वैसा ही सच!"

संजय निरुत्तर था।

"बोलो संजय!"

"ऐसा नहीं है।" वह कुछ रीना के सवाल के बोझ से, कुछ रीना की देह के बोझ से कसमसाता हुआ बोला, "ऐसा नहीं है।"

"ऐसा नहीं तो कैसा है?"

"सच बताऊं।"

"बिलकुल सच!" वह बोली, "और तुम अब यह मत पूछना कि बुरा तो नहीं मानोगी। सच मानो मैं बुरा नहीं मानूंगी। बुरा मानने की बात भी नहीं है। यह तो जस्ट ए डिवेट!"

"तो सुनो।" संजय रीना को अपने ऊपर से हटाता हुआ बोला, "मेरे पास उस संजय सी दिव्य दृष्टि तो नहीं है पर एक सोच है, एक समझ है एक साधारण सी दृष्टि है उसके हिसाब से पुरुष मानसिकता एक सच हा, सम-भोग दूसरा सच!" अब की उसने न तो रीना के गाल में चिकोटी काटी, न छाती मसली, न जांघ में चिकोटी काटी बल्कि उसने एक हाथ उसकी हिप पर थपथपाया दूसरे हाथ से उसके बालों को सहलाया और बोला, "पर सारा सच यह है कि पुरुष मानसिकता का सच एक हद के बाद छद्म है, छद्म सच है, शीशे में देखने वाला सच है, शीशे के पार का सच नहीं है, शीशा टूटने के बाद का सच नहीं है।" संजय बोलता गया, "एक गढ़ा हुआ सच है पुरुष मानसिकता, जिसको आज कल सुविधा के तौर पर ह्मूमन बीइंग मान लिया गया है, बना लिया गया है। पर सम-भोग का सच पार ब्रह्म है, अलौकिक और अनूठा। पुरुष मानसिकता का सच शायद कोई ऐसा समय आए जिसमें वह भस्म हो जाए। पर संभोग का सच तो अमिट है, अतुलनीय है, चाहे जितना समय आए-जाए, सृष्टियां बदल जाएं पर सम-भोग का सच नहीं बदलेगा, कभी नहीं बदलेगा।" उसने जोड़ा, "और सम-भोग कोई सिर्फ सेक्स ही नहीं है। सम-भोग बराबर का आनंद। चाहे वह जिस भी क्रिया में हो। सम-भोग का विस्तार बहुत है। पर एक सच यह भी है कि हमारे यहां सम-भोग को सिर्फ देह और उसके भोग से जोड़ कर उसका सतहीकरण कर लिया गया है। बस दिक्कत यही है। सतहीकरण की दिक्कत।"

"तो तुम सचमुच संभोग को उसके विराट अर्थ में मानते हो?"

"आफकोर्स!"

"सच!"

"फिलहाल तो यही सच है। आगे की राम जानें।"

"कि रजनीश जानें?"

"नहीं, अभी जो मैंने कहा वह रजनीश के किसी प्रवचन का अंश नहीं है। रजनीश से अनुप्रेरित बात हो सकती है। पर सोच समूची मेरी है।"

"क्या मतलब?"

"तो अब पूरा भाष्य समझाना पड़ेगा तुम्हें?" कहते हुए उसका हाथ शरारतन संजय की जांघों के बीच पहुंच गया तो संजय छिटक गया।

"अच्छा, अच्छा।" कहते हुए संजय बोला, "मैंने कहा न सेक्स ही जीवन है।" अब की संजय का हाथ रीना की जांघों के बीच पहुंच गया। जिसे रीना ने दोनों जांघों में हलके से दबा लिया और बोली, "सेक्स और पत्रकारिता, पत्रकारिता और सेक्स। इसके अलावा भी तुम्हें कुछ आता है?"

"जिसको सेक्स की समझ हो, पत्रकारिता की समझ हो, समझो वह दुनिया जानता है।"

"कैसे?"

"सेक्स दुनिया का सबसे बड़ा सच है।" उसने रीना की कमर पर हाथ फिराते हुए पूछा, "यह तो मानती हो?"

"माना।" अभिनेत्री फरीदा जलाल की तरह गालों में गड्ढ़ा डाल कर, आंखों में शरारत भरकर जबान पर कैंची रख कर वह फुदकती हुई बोली "माना।"

"तो जैसे सेक्स दुनिया का सबसे बड़ा सच है वैसे ही पत्रकारिता दुनिया का सबसे मासूम झूठ।"

वह हंसा, "अब इसके बाद जानने को रह क्या जाता है?" वह विस्तार में आ गय, "जैसे सेक्स के बना सृष्टि नहीं संवरती, जैसे सेक्स के बिना जीवन नहीं चलता, सेक्स के बिना कोई घोटाला, कोई कांड नहीं होता वैसे ही दुनिया की कोई भी छोटी बड़ी घटना हो, घोटाला हो, सेक्स हो, खेल हो, व्यापार हो, फिल्म हो, राजनीति हो, कूटनीति और अपराध हो पत्रकारिता के ही कंधे पर बैठ कर देश दुनिया में उसे पहुंचाना होता है।" संजय बिलकुल मजाक के मूड में था।

"तुम तो खेलने लगे।" वह मायूस सी बोली।

"झूठ, बिलकुल झूठ।" वह राजेश खन्ना स्टाइल में बोला, "अभी-अभी तो आऊट हुआ हूं। विश्वास न हो तो 'इनसे' पूछ लो।"

"क्या डबल मीनिंग वाले डॉयलाग बोलने लगते हो।" वह बोली, "मजा खराब हो जाता है।" वह जैसे नींद से जागी, "अच्छा सेक्स का सच बहुत हो गया अब पत्रकारिता के कुछ सच भी बता दो।"

"प्रश्न करो!" वह बिलकुल मजाक के मूड में था।

"प्रश्न पुराना है गुरुदेव!" वह भी मूड में आ गई।

"क्या?"

"वही जिज्ञासा कि डेस्क और रिपोर्टिंग के लोग भारत-पाकिस्तान की तरह क्यों लड़ते हैं?"

"क्या बेवकूफी का सवाल ले बैठी। वह भी बासी।"

फिर भी जिज्ञासा तो जिज्ञासा!

"अच्छा बताओ भारत-पाकिस्तान के बीच क्या झगड़ा है?"

"मेरी समझ से तो कुछ नहीं। बस इगो का झगड़ा है?"

"करेक्ट!" संजय बोला, "तुमने ठीक पकड़ा।"

"क्या?" वह चुटकी काटते हुए बोली, "फिर डबल मीनिंग?"

"हद है!" संजय बोला, "मुझ पर आरोप लगाती हो और खुद हरदम सेक्स ही सोचती रहती हो, वही करती रहती हो तो मैं क्या करूं?" वह उसका हाथ पकड़ता हुआ बोला, "हटाओ नहीं, अच्छी आदत है। मुझे भी अच्छा लगता है।"

"स्टुपिड!" वह उसका बाल नोचते हुए बोली, "तो बार-बार प्वाइंट आऊट करने की क्या जरूरत है।"

"मैं तुम्हारा भारत-पाकिस्तान के बीच इगो वाला प्वाइंट पकड़ने को प्वाइंट आउट कर रहा था।" उसके हाथों से अपने बालों को छुड़ाता हुआ बोला, "एंड डोंट बी सिली, लेट मी कंपलीट! इन फैक्ट डेस्क और रिपोर्टिंग क्य है? अखबार की दोनों दो भुजाएं हैं। पर जो इगो प्राब्लम भारत-पाकिस्तान के बीच है, जो एक पट्टीदारी की लड़ाई है, मुझे ऐसा लगता है कि अखबारों में डेस्क और रिपोर्टिंग के बीच भी जो झगड़ा है, वह यही इगो प्राब्लम है, यही पट्टीदारी है। एक कुंठा है जिसके तहत दोनों एक दूसरे से सुपीरियर मानते हैं और दिलचस्प यह कि दोनों एक दूसरे को गधा समझते हैं।" संजय रुका और बोला, "बाई द वे चार महीने सही, तुम डेस्क पर थी कि रिपोर्टिंग में?"

"बट नेचुरल डेस्क!"

"तब तो तुमने यह भी देखा होगा कि अंततः इस लड़ाई में डेस्क ही जीतता रहता है।" वह बोलता रहा, "इसलिए नहीं कि डेस्क कोई सुप्रीमो होता है। बल्कि इसलिए कि बाई नेचर डेस्क पर जिम्मेदारियां ज्यादा होती हैं। पूरे अखबार की जिम्मेदारी डेस्क की ही होती है। अखबार ठीक छपा डेस्क की क्रेडिट, खराब छपा, कहीं कुछ गलत छपा तो डेस्क की रिस्पांसिबिलिटी। दूसरे कौन सी खबर कहां जाएगी, कितनी जाएगी यानी डमी, पूरा डिसप्ले डेस्क को ही तय करना होता है। यहां तक तो ठीक है। पर सिद्धांततः। व्यावहारिक पक्ष यह कि अमूमन डेस्क अपनी रिस्पांसिबिलिटी की आड़ में रिपोर्टरों से पर्सनल हो जाती है। रिपोर्टर से कोई सिफारिश या काम कराने को कहा, रिपोर्टर नहीं किया, नहीं करवा पाया तो उसकी "सेवा" शुरू। उसकी खबरें कट पिट कर गलत जगह पेस्ट होने लगती हैं, या कोयरी लग कर संपादक की मेज पर पहुंच जाती हैं; बाद में भले छप जाए, पर उस दिन तो वह खबर रुक ही गई न! रिपोर्टर की सबसे बड़ी कमजोरी है बाई लाइन। मतलब कोई अच्छी खबर हो तो उसके साथ उसका नाम छपे। पर यहां भी डेस्क की मेहरबानी पर ही बाई लाइन मिलती है। इसलिए तुमने देखा होगा बड़ा से बड़ा रिपोर्टर जो बाहर फिल्ड में तो बड़ा तोप बना फिरता है, तीसमार खां बनता है, डेस्क पर आते ही खाली कारतूस बन जाता है, किसी पालतू कबूतर की तरह गुटर गूं करने लगता है। क्योंकि रिपोर्टर की कोर डेस्क से हमेशा दबी रहती है। एक प्राब्लम यह भी है कि ग्रेड, फेसेल्टी सब कुछ एक होते हुए भी डेस्क वाले जर्नलिस्ट और रिपोर्टिंग वाले जर्नलिस्ट की सामाजिक हैसियत में काफी फर्क रहता है। कभी-कभी आर्थिक भी। फिल्ड में रहने के नाते रिपोर्टिंग के लोगों को दस लोग जानने लगते हैं, वह चार काम भी कर लेता है, कुछ तो दलाली पर भी उतर जाते हैं। उधर डेस्क के लोगों को कंपरेटिवली कम लोग जानते हैं। वह छोटा-मोटा काम करानें में भी असफल रहते हैं। तो फ्रस्ट्रेशन भी डेस्क वालों को खाए रहता है कि मेहनत हम करें और मजा यह लूटें। यह कुंठा भी कम नहीं होती।" संजय बोला, "पत्रकारिता की यह सब बड़ी पुरानी समस्याएं हैं। प्राचीनतम शब्द ज्यादा ठीक है। डेस्क अपने को सुपीरियर समझता है, रिपोर्टिंग वाले अपने को सुपीरियर समझते हैं। डेस्क वालों का तर्क है कि हम न हों तो अखबार न निकले। वे जब-तब कहते ही रहते हैं कि लगा दो चार रिपोर्टरों को एक दिन डेस्क डयूटी पर, अखबार निकल नहीं पाएगा। तो रिपोर्टिंग वाले कहते हैं, भिड़ा दो हफ्ते भर के लिए सारी डेस्क को रिपोर्टिंग में, छठी का दूध न याद आ जाए तो कहना, नौकरी छोड़ के भाग जाएंगे और पूरे देश की डेस्क लग गई रिपोर्टिंग में तो अखबार ही नहीं निकल पाएंगे। क्योंक डेस्क वाले कोई खबर ही नहीं भेज पाएंगे तो छपेगा क्या?" संजय बोला, "ऐसे ढेर सारे तर्क, वितर्क और कुतर्क हैं जिनका कोई पार नहीं है। और यह लड़ाई न कभी खत्म हुई है, न किभी खत्म होगी। और यह कोई अकेले दिल्ली के किसी एक अखबार किसी एक भाषा की नहीं, सभी भाषाओं सभी अखबारों को देशव्यापी समस्या है।" वह बोला, "यह कभी खत्म न होने वाली लड़ाई है। डेस्क वाले रिपोर्टरों को और रिपोर्टस डेस्क वालों को गधा साबित करने का मौका भले न चूकें। पर एक नंगा सच यह भी है कि एक रिपोर्टरों की कोर हमेशा डेस्क वालों के हाथ में रहेगी।" वह चद्दर ओढ़ता हुआ बोला, "अब मेरे ही अखबार का मामला ले लो। जो समाचार संपादक है, महाजाहिल। अव्वल तो उसे खबर से कोई खास सरोकार नहीं रहता। उसकी सारी दिलचस्पी स्टोर से साबून, फाइल, कागज वगैरह मंगाने में रहती है। न्यूज को आर्डिनेटर तो उसे न्यूज एडीटर स्टोर खुलेआम कहता फिरता है। हफ्ते भर का एक डयूटी चार्ट बनाने में उसे चार दिन लग जाते हैं। जो बमुश्किल आधे घंटे का काम है। पर वही न्यूज एडीटर स्टोर कभी कभार रिपोर्टरों की खबर पास करने का काम पा जाता है तो पहला काम वह दांत किचकिचा कर रिपोर्टर का नाम यानी बाई लाइन काटने का करता है। नाम काट कर वह इस तरह खुश होता है जैसे कोई खुजली खुजा कर। फिर दूसरा काम वह यह करता है कि लाल पेन लेकर पूरी खराब रंग डालता है। रंगने के नाम पर भी करता यह है कि अगर कोई फिगर शब्दों में लिखा है तो उसे काट कर अंकों में लिखेगा, या फिर अंकों में लिखा है तो उसे काट कर शब्दों में कर देगा। पानी लिखा है तो उसे काट कर जल कर देगा। जल लिखा है तो उसे काट कर पानी कर देगा। पूरी खबर में वह ऐसा ही कुछ काट पीट मचाएगा और अंत में रिपोर्टर को बुलाएगा, उसे लाल रंगी उसकी खबर दिखाएगा, सीना फुलाते हुए जताएगा कि उसकी बाई लाइन काट दी गई है और फिर कहेगा, हेडिंग लगाइए। सजेस्टिव हेडिंग। हेडिंग लगाने तक में उसे पसीने आते हैं। पर जब कभी एकाध हेडिंग वह लगा लेगा, दूसरे दिन, दिन भर बैठा अपनी लगाई हेंडिंग को मंत्रमुग्ध निहारता रहेगा। जिस तिस को बताता रहेगा, मैंने हेडिंग लगाई है। फोन कर-कर के लोगों को बताता रहेगा कि फला हेडिंग मैंने लगाई है। अब उस उल्लू के पट्ठे से कौन बताए कि अगर अपनी लिखी हेडिंग छपी देख कर उसे इतनी खुशी होती है तो जिसने वह खबर लिखी है, उसके साथ अगर उसका नाम भी छपे तो उसे कितनी खुशी होगी।"

"हां, मुझे भी अक्सर यही लगता था कि रिपोर्टरों को डेस्क वाले बिलकुल दरिद्रों की तरह ट्रीट करते थे।"

"रिपोर्टरों की भी गलती है। साले ज्यादा पढ़ते लिखते नहीं हैं। इसलिए डेस्क वाले दौड़ाए रहते हैं।"

"तुम तो ऐसे कर रहे हो जैसे डेस्क वाले बड़ा लिखते-पढ़ते है।?"

"अब काबुल में भी तो गधे होते हैं।" संजय बोला, "सच कहो तो जर्नलिस्टों में ज्यादातर गधे ही भर्ती हैं। पढ़े लिखे कम लोग हैं।"

"चलो तुमने माना तो। नहीं, यही मैं कहती तो बुरा मान जाते तुम!"

"चलो बहुत घिसाई हो गई। अब सो लेने दो जरा देर।"

"तुम फिर डबल मीनिंग पर आ गए?"

"क्या कह दिया भई?"

"ये "घिसाई" क्या है?"

"ओफ मैं तो बातचीत के लिए घिसाई बोल रहा था।" वह हंसा, "पर तुम्हारा दोष नहीं है। रजनीश का वह सन्यासी और कपड़े वाला किस्सा पढ़ा है न तुमने?"

"हां, पढ़ा है। तो?"

"तो यही कि 'वस्त्र' के बारे में कोई बातचीत नहीं। पर मैं क्या करूं जब तुम्हारे दिमाग में 'वस्त्र' ही घूम रहा है।" रीना को छेड़ते हुए संजय बोला, "वस्त्र जो ज्यादा घूम रहा हो तो बोलो वस्त्र उतार दूं?"

"नहीं!" वह जोर देकर बोली।

"क्यों?"

"तुम्हारी तरह कोई जानवर नहीं हूं। कि जब देखो तब वही।"

"तो देवी जी, फार योर काइंड इनफार्मेशन यह काम हरदम जानवर नहीं, आदमी करते रहते हैं जब-तब। जानवरों का तो कोई मौसम, कोई वक्त तय रहता है, प्रकृति की ओर से। यह जब-तब की छूट आदमियों को ही रहती है। अब कहिए तो 'वस्त्र' के बारे में बातचीत शुरू करूं?"

"नहीं!" वह फिर जोर देकर बोली और चादर को अपने चारों ओर कस कर लपेट लिया। बोली, "पता नहीं क्या करते हो, जलन हो रही है।"

"कहां?" वह मजाक में बोला।

"तुम्हारे मुंह में।" वह खीझ कर बोली।

"डॉक्टर तो नहीं दिखाना पड़ेगा?"

"क्या पता?" कह कर संजय की छाती से चिपटती हुई बोली, "क्यों तंग करते रहते हो?"

"एक जोक सुनोगी?"

"सुनाओ।" वह बोली, "पर घिसा पिटा न हो।"

"नहीं, नहीं बिलकुल नया है। सेक्स और पत्रकारिता फील्ड का।"

"इंटरेस्टिंग।" वह बोली, "मींज नानवेज।" कह कर वह चहकी, "अलका से तुम्हारे कुझ नानवेज जोक सुन चुकी हूं।"

"अलका को तो कभी नानवेज जोक सुनाया नहीं, जरूर अजय के मार्फत....! बाई द वे अलका ने तुम्हें और क्या-क्या सुनाया है?"

"बोर मत करो। बाद में अलका और अपने डिटेल ले लेना। अभी तो तुम वह ताजा जोक सुनाओ।"

"कौन सा?"

"वही।"

"वही, मींस?" उसने भूलने का नाटक करना चाहा।

"सेक्स और पत्रकारिता के फील्ड का।"

"अच्छा, अच्छा। बहुत मुख्तसर सा है और तुम्हें मैं जानता हूं, बड़े में लुफ्त आता है।"

वह उसकी हिप में चिकोटी काटता हुआ बोला।

"शैतानी नहीं। अच्छे बच्चों की तरह जोक सुनाओ।" वह उसकी हाथ हटाती हुई बोली, "फटाफट।"

"तो सुनो।" एक हिंदी पत्रिका के नामी संपादक एक अंग्रेजी अखबार की नामी विशेष संवाददाता से संभोग के बाद बोले, "आज मेरी सेंचुरी पूरी हो गई।"

"मतलब?"

"मतलब यह बालिके कि संपादक जी उन विशेष संवाददाता महोदया समेत सौ महिलाओं को भोगने का रिकार्ड बना गए थे।"

"इंटरेस्टिंग! फिर तो यह सुन कर मोहतरमा नाराज हो गई होंगी।"

"इसीलिए कहा गया है कि जोक के बीच में नहीं बोलना चाहिए।"

"आल राइट!"

तो जब संपादक जी ने बहुत विह्हव होकर उन विशेष संवाददाता मोहतरमा को अपनी सेंचुरी बताई और बड़ी मासूमियत से पूछा, "तुम्हारा स्कोर क्या है?" मोहतरमा ने ठंडी सांस छोड़ी। बोलीं, "कुछ याद नहीं।" संपादक जी की जिज्ञासा हुई, नहीं माने। पूछा, "फिर भी?" मोहतरमा जी बोलीं "जब सेंचुरी बनाई थी, तबसे गिनना छोड़ दिया।"

"मजा आया?" जोक सुनकर संजय ने रीना से पूछा।

"बोर भी नहीं हुई। पर जोक है कि सच?"

"लगता तो सच ही है।" वह बोला, "बुरा मत मानो तो तुमसे एक बात पूछूं?"

"अब क्या बाकी है जो बुरा मानूंगी? पूछो।" वह झटके से बोली।

"पूछूं?"

"सचमुच बुरा नहीं मानोगी?"

"नहीं मानूंगी। कह तो दिया।"

"तो बताओगी, तुम्हारा स्कोर क्या है?"

"तुम शैतानी से बाज नहीं आओगे?" कहते हुए वह उसके ऊपर चढ़ गई।

"मैंने स्कोर पूछा था, बैटिंग करने को नहीं कहा था।"

"अभी बताती हूं स्कोर।" कह कर वह स्टार्ट हो गई।

"पर अबकी वह सिर्फ उधम मचा कर ही रह गई। संजय अभी उसकी गुदाज देह का आनंद ले ही रहा था कि वह उचक कर बिस्तर से उतरी और खड़ी हो गई, माई गाड चार बज गए।" घड़ी देखती, गाऊन पहनती हुई बोली, "अब तुम जाने की तैयारी करो।"

"क्यों?"

"पापा आज सुबह की फ्लाइट से आने वाले हैं।" वह घबराती हुई बोली, "अगर वह जान गए कि रात तुम यहीं रहे हो तो मुश्किल हो जाएगी।"

"क्यों, क्या खा जाएंगे?"

"बहस नहीं, जल्दी से कपड़े पहनो और निकल लो।"

"हां, भई, रात गई-बात गई।"

"तुम हर बात को निगेटिव एप्रोच से ही क्यों देखते थे।" कहते हुए वह खूंटी से उसकी टी शर्ट और कुर्सी पर से पैंट बिस्तर पर फेंकती हुई बोली, "बी क्विक।"

"अच्छा अगर सर्वेंटस ने बता दिया?"

"उन्हें क्या मालूम कि तुम रात यहां रहे हो?"

"क्यों रात आते समय देखा तो था।"

"ओफ, इस डिटेल्स में मत पड़ो। इट्स माई हेडेक। बट नाऊ यू प्लीज गो।"

"फिर कब मिलोगी?" पैंट पहनते हुए उसने पूछा।

"आई विल कांटेक्ट यू।" वह बालों में क्लिप लगाती हुई बोली, "बट यू डोंट।"

"तुम्हारी यहा अदा दुखी करती है।"

"इसीलिए शादी के लिए कहती हूं।"

"रह-रह कर तुम भी क्या रिकार्ड बजा देती हो।" वह उसकी हिप पर हाथ मारते हुए बोला, "वो जो तुम्हें आज कल ट्रेनिंग दे रहा है उससे क्यों नहीं कर लेती।"

"कौन सी ट्रेनिंग? कौन दे रहा है ट्रेनिंग?"

"तुम्हीं तो रात बता रही थी।"

"क्या?"

"क्या कई चीजों की ट्रेनिंग ले रही हो आज कल?"

"ओह!" वह फिर फरीदा जलाल की तरह शरारती हंसी हंसी। बोली, "तो तुम्हारी भी यही राय है!"

"हां, कर लो।" वह पैरों में जूते की जिप बंद करते हुए बोला।

"तो पक्का रहा।" कहती हुई वह बोली, "पापा से बात करूं?" वह खुश हो गई थी।

"शादी का कार्ड हमें भी भेजना।"

"पर क्यों?"

"अच्छा तो शादी में बुलाओगी भी नहीं?" वह कंधे उचकाता हुआ बोला, "होता है, होता है!"

"बुलाऊंगी तो पर कार्ड देकर नहीं।" वह उछल कर उसके गले से लटक कर झूल गई, "क्योंकि वो ट्रेनिंग मास्टर तुम ही हो।"

"क्यों फिल्मी स्टाइल का सतही सस्पेंस क्रिएट करती रहती हो?" वह उसे बिस्तर पर पकड़ कर बैठाता हुआ बोला, "आखिर क्या है ऐसा जो तुम मुझ पर इतना मेहरबान होना चाहती हो?"

"बस, पढ़ चुकी कसीदा!" वह उठा और बोला, "अब चलूं?"

"अभी चले जाना।" कहती हुई उसे पास की बेंत वाली कुर्सी पर बिठा कर खुद उसकी गोद में बैठती हुई बोली, "तुम्हारी तरह मुझमें वो एक्सप्रेशन पावर नहीं है। जिससे ठीक-ठीक शब्दों में अपनी बात कह सकूं।" वह संजय के बालों में उंगलियां उलझाती हुई बोली, "बस कुछ ऐसा है तुममें। नहीं, मेरे इर्द गिर्द घूमने वालों की कमी नहीं है। पर मैं किसी को लिफ्ट नहीं देता हूं।"

"ऐसा!" वह लापरवाही से बोला।

"ऐसा!" वह भी उसी लापरवाही से बोली, "रही बात पोलिटिसियंस से तुम्हारी एलर्जी की तो तुम्हें मालूम है नैय्यर जैसे लोग भी राजनीति को गाली राजनीति की बैसाखी पर ही खड़े होकर देते हैं?" वह टेंस होती हुई बोली, "यू नो नैय्यर की तरक्की का राज क्या है?"

"क्या है?"

"उनके ससुर।" वह जैसे राज खोलती हुई बोली, "जो पंजाब गवर्मेंट में मिनिस्टर रहे हैं।" वह जैसे संजय को टेंस कर देना चाहती थी, "जिस देश में आदमी की पहली लड़ाई भी रोटी दाल हो और आखिरी लड़ाई भी रोटी दाल। वहां का आदमी कैरियर क्या खाक बनाएगा? वह भी पत्रकारिता में, बनियों की चाकरी करके?"

"खूब! मेरा डायलाग, मुझी को सुना रही हो?"

"कोई कॉपीराइट है इस डायलाग पर तु्म्हारा? यह तो एक नंगी सच्चाई है, जिसे कोई भी बयान कर सकता है।"

"सचमुच?"

"बिलकुल।"

"तो नंगी सच्चाई यह है कि अपने देश में कोई एक भी पत्रकार नहीं है।" वह बोला, "मैं तो कहता हूं कि कोई एक पत्रकार तुम्हें मिले तो मुझे भी बताना!"

"क्या?" वह जैसे चौंक पड़ी।

"हां। क्योंकि पत्रकारिता के नाम पर अब सिर्फ दो प्रजातियां मुझे दिखती हैं। एक पूंजीपतियों के चाकरों की जिनमें हमारे जैसे लोग शुमार होते हैं।"

"और दूसरी?"

"दूसरी प्रजाति है भड़वों और दलालों की। बस! जो पूंजीपतियों से लगायत राजनीतिज्ञों और अफसरों के आगे दुम हिलाते, तलवे चाटते फिरते हैं।" वह तमतमाता हुआ बोला, "और ये राजनीतिज्ञ, ये अफसर इन्हें कुत्तों से ज्यादा अहमियत नहीं देते।" वह बोलता रहा, "ज्यादा से ज्यादा कोई अल्सीसियन ब्रांड का कुत्ता होता है तो कोई गली वाला! बस ब्रीड का फर्क होता है।" वह बोला, "किसी 'कुत्ते' के आगे वह पुचकार कर सुविधाओं की हड्डी फेंक देते हैं तो किसी के आगे हिकारत से। पर यह तय है कि इन राजनीतिज्ञों, अफसरों के आगे इन सो काल्ड पत्रकारों की हैसियत एक कुत्ते से ज्यादा नहीं है।" उसने फिर से जोड़ा हथौड़ा मार कर कील को पूरी तरह ठोंक देना चाहता हो, "क्या नेता, क्या अभिनेता सब पत्रकारों को कुत्ता समझते हैं। कु्त्ते से ज्यादा कुछ नहीं। वह अपनी सुविधा और जरूरत के ही मुताबिक ही 'पत्रकार' को कोई खबर या सुविधा देते हैं।"

"बड़ी तल्खी है तुममें अपने पेशे को लेकर!" वह ऊबती हुई बोली।

"पेशा है न क्या करें?" उसने 'पेशा' शब्द पर ज्यादा जोर दिया और बोला, "अभिशप्त हैं अशवत्थामा की तरह इस पेशे को झेलने के लिए क्या करें?" वह बोला, "नहीं तुम भी जानती हो कि पढ़ने-लिखने वालों के इस पेशे में पढ़ने-लिखने वालों की कितनी कदर है और दलालों भड़ओं की कितनी?" उसने जोड़ा "अखबार मालिकों को भी अब एडीटर या रिपोर्टर नहीं पी.आर.ओ. चाहिए होता है। नाम भर एडीटर, रिपोर्टर का होता है!"

"हां, डिवैल्यूवेशन तो हुआ है!" वह बोली।

"मैं नहीं कह रहा कि यह अवमूल्यन सिर्फ पत्रकारिता में हुआ है। हो तो हर हलके में रहा है। पर जितना यहां हुआ है इतना कहीं और नहीं!"

"ये तो है!"

"अब क्या करोगी यह इस देश का दुर्भाग्य ही है कोई सांसद संसद में अपनी परफार्मेंस के बूते वोट नहीं पाता। वोट पाता है तो जोड़-तोड़ से गुण-दोष से नहीं। कोई बहुत काबिल मंत्री है और कहे कि मैंने देश के लिए यह-यह और ऐसी-ऐसी योजनाएं बनाईं, यह-यह किया तो मुझे वोट दो! तो कोई वोट नहीं देगा उसे। क्योंकि वोट तो अब हिंदू, मुसलमान, पिछड़ों और दलितों के खाने में बंट गया है!" वह कहने लगा, "तो देश में सही मायने में कोई एक नेता नहीं है!" वह बोला, "नेता ही क्यों मैं तो कहता हूं देश में कोई एक जज नहीं है, कोई एक वकील नहीं है! कोई एक डॉक्टर, कोई एक शिक्षक नहीं है! तो अगर देश में कोई पत्रकार नहीं है तो हम क्या कर सकते हैं! क्योंकि सब कुछ तो गुण-दोष के बजाय जोड़-तोड़ में फिट हो गया है।"

"तो क्या अब तुम सबको सुधार लोगे?" वह बोली, "नहीं न!"

"बिलकुल नहीं।" वह बोला, "और बंद कमरे में इस एकालाप से तो कतई नहीं।"

"चलो यह सब किसी सेमिनार के लिए संभाल कर रखो। काम आएगा!"

"तुम्हारी ऊब को मैं समझ सकता हूं। पर सारी चीजें सब सेमिनारों से तय नहीं होने वाली न नपुसंक अखबारों से।" वह बोला, "इसके लिए तो सिस्टम को ही तोड़ना होगा!"

"तो तोड़ो!"

"पर दिक्कत यह है कि सिस्टम टूटता दिखाई नहीं देता और मेरे जैसे इक्का दुक्का सिस्टम तोड़ने जो चलते भी हैं तो सिस्टम उन्हें तोड़ देता है। मान लिया गया है कि सिस्टम नहीं, सिस्टम तोड़ने वाल व्यक्ति ही टूटेगा!"

"यह तो है। पर कुछ क्रांति आगे की मुलाकातों के लिए छोड़ो।" कह कर वह मुसकुराई।

"ओ.के.!" वह उसे गोद में उठाता हुआ बोला, "अब चलूं? नहीं, तुम्हारे पापा आ जाएंगे।" कह कर वह खड़ा हुआ तो वह उसे पीछे से पकड़ कर लिपट गई। उसकी बड़ी-बड़ी छातियां जैसे उसकी पीठ को कुचल देना चाहती थीं। थोड़ी देर वह दोनों ऐसे खड़े रहे। फिर संजय ने उसका हाथ छुड़ाया, उसे आगे किया और पीछे से खुद लिपट कर खड़ा हो गया। जांघों, से उसके भारी हो रहे नितंबों को रगड़ते हुए, पीछे से ही उसे चूमते हुए बोला, "अच्छी सी रात गुजारने के लिए शुक्रिया।" कह कर जब वह कमरे के दरवाजे पर आ गया तो रीना दौड़ कर फिर चिपट गई और उसे बेतहाशा चूमने लगी। संजय भी उसे चूमने लगा। इस चूमा चाटी में उसका फैंसी झुमका संजय की नाकों में खरोंच लगा गया। संजय खीझ गया, कितनी बार कहा यह सब मत पहना करो।" वह झल्लाता हुआ बोला, "मेरे जाने के बाद भी पहन सकती हो।" तब तक वह ड्रेसिंग टेबिल से कोई क्रीम ट्यूब निकाल कर उसकी नाक पर मलने लगी। क्रीम मल कर वह सेंट स्प्रे करने लगी। बोली, "तुम्हारी सिगरेट और पसीने की गंध मेही देह में जैसे चिपक गई हैं।" वह सेंट उस पर भी स्प्रे करती हुई बोली, "कितनी बार कहा है मेरे पास आया करो तो सिगरेट सुलगा कर नहीं, बुझा कर आया करो।"

"अब चलूं?" वह दरवाजा खोलते हुए बोला, "तुम्हारे कुत्ते तो बंधे होंगे?"

"रुको, एक मिनट मैं चेक कर लेती हूं।"

"हां, नहीं कहीं साले दौड़ा लें तो सुबह-सुबह मुसीबत!"

"संजय पैर नीचे कर बिस्तर पर लेट गया। जरा देर बाद वह गाउन की बेल्ट बांधती हुई आई। बोली, "खुले थे, पर मैंने बांध दिया है। पर तुम दबे पांव जाना माली जाग गया है।" फिर जब संजय चलने लगा तो बोला, "जरा झुमके और बालों की चिमटियां निकालो।"

"क्यों?"

"निकालो तो सही।" उसके झुमके निकालते ही वह उसे आहिस्ता-आहिस्ता चूमने लगा। रीना ने भी उसका माथा धीरे से चूम लिया। संजय चल ही रहा था कि वह बुदबुदाई, "मेर प्रपोजल पर मन करे तो एक बार फिर गौर करना।"

"ठीक है सोचूंगा। पर तुम एक बात अच्छी तरह नोट कर लो।" वह जरा सख्ती से बोला।

"क्या?"

"मैं नैय्यर नहीं हूं।" वह पूरी सख्ती से बोला, और बाहर आ गया।

दयानंद पांडेयबहुत दिनों बाद वह ऐसी सुबह देख रहा था। पौ फटती सुबह। रीना के देह की मादक गंध, उसके सेंट की गमक, सड़क के दोनों ओर के बंगलों में लगे फूलों की दिल को बहका देने वाली सुगंध भी तिर रही थी इस सुबह में।

सड़क पर आकर संजय ने सिगरेट सुलगा ली थी।

पंडारा रोड पर।

...जारी...

उपन्यास 'अपने-अपने युद्ध' के लेखक दयानंद पांडेय हैं. उपन्यास और लेखक के बारे में ज्यादा जानने के लिए दयानंद की तस्वीर पर क्लिक करें. पार्ट (15) कुछ दिनों बाद.


AddThis