अपने-अपने युद्ध (15)

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दयानंद पांडेयतब वह दिल्ली में जंगपुरा एक्सटेंशन में रहता था। घर पहुंच कर संजय ने रगड़-रगड़ कर नहाया। पर रीना की देह गंध जैसे उसके अंग-अंग में समा गई थी, निकल ही नहीं रही थी। "रात भर कहां थे?" होंठ गोल करते हुए उसके ऊपर रहने वाले श्रीवास्तव ने पूछा। श्रीवास्तव भी एक न्यूज एजेंसी में रिपोर्टर था। वह कमरा उसी ने संजय को दिलवाया था। श्रीवास्तव भी अजीब चीज था। एक से एक बेढब काम करता रहता। जैसे बिना रेजर के, बिना शेविंग क्रीम के हाथ में ब्लेड लेकर शेव बना डालता। जाने कैसे? गंजे सिर वाले श्रीवास्तव का नाम बहुत कम लोग लेते थे। उसे "लाला, लाला" बोलते। तो संजय लाला का सवाल पीते हुए बोला, "लाला, आज जरा दफ्तर फोन कर देना। कह देना तबीयत ठीक नहीं है, आज नहीं आऊंगा।" कहते हुए संजय सोने के लिए बिस्तर की चादर ठीक करने लगा।

"पर रात थे कहां?" लाला का सवाल उसके होंठों से अभी छूटा नहीं था।

"बस! वैसे ही रतजगा हो गया।"

"पर थे कहां?" जैसे वह किसी रहस्य का पर्दाफाश कर देना चाहता था।

"कुछ नहीं, माडल टाऊन वाले अंचल के यहां रह गया था।" वह झूठ को सच बनाते हुए बोला, "गपियाते-गपियाते रात ज्यादा हो गई तो उसने कहा यहीं सो जाओ। सुबह चले जाना।"

"कौन अंचल? वही दिल्ली प्रेस वाला?"

"हां।"

"पर रात को तो वह तुमसे मिलने यहीं आया था।" लाला उस पर रौब मारते हुए बोला।

"हां, बता रहा था कि तुमने कोई थर्ड क्लास रम भी पिला दी थी।" संजय यूं ही अंधेरे में तीर मारता हुआ बोला। पर निशाना ठीक लग गया था।

"ओल्ड मंक भी अगर घटिया रम है तो बात ही खत्म!" कहता हुआ लाला मायूस सा कमरे से बाहर जाने लगा, "मैंने तो तुम्हारे लिए बड़ा इंतजाम किया। तुम्हारी भाभी ने चिकन भी बनाया था।"

"अच्छा!" संजय लाला का एहसान मानते हुए बोला, "कोई बात नहीं, मेरे हिस्से की बची तो होगी, इस समय खा लूंगा।"

"खाक बचेगी!" लाला झल्लाया, "वो साला अंचल बचने देता तब न! आधी बोतल ओल्ड मंक भी घसीट गया और चिकन की लेग पीसें भी।" वह हाथ नचाता हुआ बोला, "फिर भी घटिया रम बताया साले ने।"

"अरे नहीं, नहीं। वह तो बड़ा तारीफ कर रहा था।" संजय ने बात मोड़ते हुए कहा, "वो तो मैं ही जरा तुम्हें छेड़ने के लिए झूठ बोल गया।"

"तो रात कहां थे?" लाला ने जैसे म्यान से तलवार निकाल ली।

"अंचल के घर। और कहां?" संजय फिर भी अडिग रहा। लाला जब मायूस जाने लगा तो संजय उसे बुलाते हुए बोला, "लाला फोन जरूर कर देना। और, हां, एक इनायत और कर देना!"

"क्या?"

"भाभी से कह देना, दिन का मेरा खाना भी बना देंगी। अब होटल जाने में आलस लग रही है।"

"ठीक है।" लाला उसी मायूसी से बोला। और दरवाजा बंद करता हुआ चला गया।

दूसरे दिन संजय जब आफिस पहुंचा तो रिसेप्शनिस्ट ने बताया कि रीना कल दो बार आई थी। संजय ने सोचा कि रीना को फोन करे। पर उसका काशन "यू डोंट" याद आ गया। दफ्तर में एडीटर वैसे ही भन्नाया पड़ा था।

दो हफ्ते बीत गए। रीना का कहीं पता नहीं था। एक शाम उसका फोन आया। हालचाल पूछा तो बोली, "बाहर गई थी।" फिर, "दो दिन बाद भेंट होगी।" कह कर उसने फोन रख दिया। एक दिन बाद उसका फोन आया, "कल का दिन मेरे लिए खाली रखना।"

"मिलोगी कहां?"

"मैं फोन करके बताऊंगी। और हां, फार गाड शेक, कल सिगरेट मत पीना।" कह कर उसने फोन रख दिया।

दूसरे रोज उसका फोन आया, "ओबेराय होटल आ जाओ। तुरंत।"

"ओबेराय में कहां?"

"लॉबी में। और कहां।" वह बोली, "और हां, अगर लॉबी में न मिलूं तो हेयर ड्रेसर के पास आ जाना।"

"हेयर ड्रेसर?"

"भूल गए?" वह चहकी, "वही जिसका तुमने इंटरव्यू लिया था।"

"अच्छा-अच्छा हबीब।"

"हां। वही।" और "ओ.के." कह कर उसने फोन रख दिया।

हबीब! जो कहता था कि राह चलते भी अगर औरतों के बालों की स्टाइल उसे बेढंगी दिखती है तो उसका मन करता है उसे वह वहीं ठीक कर दे। वह कहता कि अगर कुदरत ने खूबसूरत घने और लंबे बाल दिए हैं तो उसके प्रति लापरवाही माफ नहीं की जा सकती। रीना को इंटरव्यू में छपी हबीब की बात क्लिक कर गई। और वह ओबेराय होटल में हबीब की शाप पर पहुंच गई। बन गई उसकी परमानेंट क्लाइंट। रीना के बाल थे भी घने, खूबसूरत और लंबे। जब वह कभी कभार जींस-टी शर्ट पहन कर निकलती तब जरूर उसके लंबे बाल उसका मजाक उड़ाते। एक बार संजय ने कहा कि, "थोड़े छोटे करवा लो।" तो वह बिदक गई, "क्यों?"

"तो जींस-टी शर्ट मत पहना करो।"

"क्यों?"

"क्यों क्या, पूरी कार्टून लगती हो।" संजय मुंह बिगाड़ते हुए बोला, "लंबी-लंबी काया, लंबे लंबे केश, जिस पर जींस-टी शर्ट और....।"

"और?"

"कुछ नहीं बुरा मान जाओगी।" पर वह बुरा मान गई थी।

"आज कह दिया, फिर कभी नहीं कहना।"

"क्या?"

"बाल कटवाने को।" वह रुआंसी हो गई थी।

"क्यों क्या बात हुई?"

"मेरी मां को मेरे बाल बहुत पसंद थे।" वह भावुक हो गई थी, "मां ने कहा था कि कभी कटवाना नहीं।"

"वेरी सॉरी!" संजय ने रीना को इतना भावुक पहले कभी नहीं देखा था। रीना मां-बाप की इकलौती थी। चार साल पहले उसकी मां कैंसर से मर गई थी। तबसे वह जब कभी भी मां की चर्चा करती तो रो पड़ती।

रीना के घने, लंबे बाल संजय को भी अच्छे लगते। खास कर जब वह शैंपू करके बाल खोले मिलती तो गजब का कहर ढाती। बड़े-बड़े काले-काले बालों और कजरारे नयनों के बीच उसके गोरे-गोरे गाल ऐसे लगते जैसे कोई सी-बिच। संजय सोचता क्या वह फिर से कविताएं लिखना शुरू कर दे?

आज ओबेराय होटल की लॉबी में चिकन की कलफ लगी बादामी साड़ी में बाल खोले रीना मिली तो संजय को वह बिलकुल किसी अप्सरा-सी लगी। लपक कर वह उसका हाथ थाम लेना चाहता था। उसके लहराते खुले बालों को प्यार कर लेना चाहता था। पर उसकी कजरारी नशीली आंखों के जादू भरे संकेत ने उसे रोक दिया।

"यहां कैसे?" संजय ने पूछा।

"आते ही डिटेल्स लेने शुरू कर दिए?" वह अपनी आंखों में जैसे ढेर सारा नशा उडेलती हुई बोली, "रिपोर्टिंग के लिए नहीं बुलाया यहां तुम्हें।" वह पल्लू संभालती हुई बोली, "आओ पहले कुछ खा पी लेते हैं।" उसने जोड़ा, "तुम बड़ा भुखाए दिखते हो।"

"हां, पर तुम्हारी भूख भी नहीं देखी जा रही।"

"डबल मीनिंग डायलाग से मुझे कोफ्त होती है! यू नो?" कहती हुई वह चलने लगी।

"देखो मैं चला जाऊंगा।" संजय तैश में आता हुआ बोला, "बार-बार तरह ह्यूमिलिएट मत किया करो।"

रीना कुछ बोली नहीं और हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई।

"चलो।" संजय पसीजते हुए बोला।

खाने के दौरान दोनों चुप रहे। यंत्रवत कमरे में आए। कमरे में भी देर तक दोनों चुप बैठे रहे। यह पहली बार हो रहा था कि दोनों कमरे में अकेले थे और अलग-अलग, चुप-चुप बैठे थे। रीना के खुले-खुले बाल, उसका रूठा-रूठा चेहरा, संजय को ऊब हो रही थी। आखिरकार संजय उठा, रीना के पास गया और खड़े-खड़े ही उसने रीना के बालों से खेलना शुरू किया। पर रीना कुछ नहीं बोली। उसे चूमा वह फिर कुछ नहीं बोली। उसने उसके ब्लाऊज में हाथ डाल दिया वह फिर भी चुप रही। धीरे-धीरे संजय ने उसकी साड़ी उतार दी, ब्लाउज उतार दिया, पेटीकोट पर उसने हलका सा प्रतिरोध जताया। पर जब ब्रा और पेंटी पर उसने हाथ लगाना चाहा तो उसने दोनों हाथों से उसका हाथ पकड़ लिया। हालांकि संजय अब बेसब्र हो रहा था, पर रीना पूरी की पूरी उदासीन थी। संजय ने उसे उठा कर खड़ा कर दिया। कमरे में लगे आइने में वह अपनी देह घूरने लगी। उसका भरा-भरा बदन देख कर संजय जैसे बउरा गया। पर रीना ने कोई रिस्पांस नहीं दिया। संजय "रूपदंभा बड़ी कृपण तो हो, अल्पव्यसना कसे वसन हो तुम" जैसी कविताएं भी पढ़ गया पर वह निश्चेष्ट खड़ी-खड़ी अपने आपको देखती रही। संजय उसे सिर से पांव तक अनवरत चूमता रहा, उसे बाहों में भरता रहा पर रीना तो जैसे बुत बनी खड़ी रही तो खड़ी रही। संजय ने आहिस्ता से उसके बांलों को कंधों पर से हटाया और गोद में उठाते हुए बिस्तर पर लिटा दिया। उसकी बाहों को सहलाते हुए, "ये तुम्हारी कोपलों सी नर्म बांहें और मेरे गुलमुहर से दिन" वाला गीत पढ़ा तो रीना के होंठ हलके से मुसकुरा कर रह गए। क्षण भर खातिर। पर वह बोली फिर भी नहीं। "इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं" और "गुलमुहर गर तुम्हारा नाम होता, मौसमे गुल को हंसाना भी हमारा काम होता" जैसे फिल्मी गीत भी उसकी देह को सहलाता हुआ संजय सुना गया। पर रीना के मन में, रीना की देह में कहीं कोई स्पंदन नहीं हुआ। "मैंने तुम्हें छुआ, और कुछ नहीं हुआ" कहने पर भी वह जब कुछ नहीं बोली, बर्फ की तरह ठंडी पड़ी रही तो संजय का धैर्य टूट गया। उसके भीतर का जानवर जैसे जाग गया। उसने लगभग जबरिया रीना की पैंटी उतारी, उसकी देह से ब्रा नोची, उसकी टांगे उठाई और हांफने लगा। रीना जैसा कि हमेशा करती थी, उसे दबोच लेती थी, उसकी पीठ दोनों बाहों से जकड़ लेती थी, सिर के बाल एक खास स्टाइल में सहलाने लगती थी, ऐसा कुछ भी नहीं किया उसने। हां, पर उसने विरोध भी नहीं किया। अलबत्ता जब वह हांफता-हांफता उसकी देह पर बेसुध होकर ढीला पड़ गया तो वह उसे अपनी देह पर से सरकाते हुए चिपट गई। चिपट कर सुबकने लगी। पर संजय कुछ नहीं बोला। थोड़ी देर बाद जैसे वह होश में आई तो उठ कर लिहाफ ओढ़ कर संजय से चिपट गई। पर अब वक्त संजय के उदासीन रहने का था। थोड़ी देर बाद रीना फुसफुसा रही थी, "संजय प्लीज, संजय प्लीज।" पर संजय लाख कोशिश के बावजूद उत्तेजित नहीं हो पा रहा था। उसका मन उचट गया था। और जब रीना ने उसे बहुत परेशान कर दिया तो वह उसे उलट कर उसकी पीठ पर लेट गया। वह फिर भी कसमसाती रही। रीना की पीठ पर लेटे-लेटे वह ऊब ही रहा था कि रीना की हिप कुछ अजीब ढंग से उछलने लगी। संजय सहसा उत्तेजित हो गया। फिर तो जैसे अनायास रीना की हिप और उठती गई और संजय बेकाबू होकर उस पर सवार हो गया। संजय के लिए इस तरह का यह पहला अनुभव था। संजय जब थक कर बिस्तर पर गिरा तो रीना उसे चूमते हुए बोली, "फैंटास्टिक!"

संजय ने देखा बिस्तर की चद्दर, गद्दा तकिया सब कुछ अस्त व्यस्त हो गया था। पर उसने नोट किया रीना सहज हो गई थी।

अब वह बोलने लगी थी।

"होटल का कमरा लेने की क्या जरूरत थी?" संजय ने पूछा।

"मैंने नहीं लिया।"

"तो?"

"मेरे पापा के दोस्त राजस्थान में मिनिस्टर हैं। उनकी फेमली आई है।" उसने जोड़ा, "वही लोग यहां ठहरे हुए हैं। मैं जानती थी वह लोग घूमने जाएंगे। साथ मुझे भी जाना था। मैंने प्रोग्राम तो बनाया पर ऐन वक्त पर दिमाग काम कर गया। मैंने कल ही तुमसे यहां मिलने का प्रोग्राम बना डाला। और जब सुबह आज वह लोग घूमने जाने लगे। मैंने अचानक तबीयत खराब होने का बहाना बनाया। रुक गई। और तुम्हें बुला लिया।" कहते-कहते जैसे उसने बात पूरी की, "एनीथिंग एल्स?"

ऐसे ही इस या उस बहाने मिलती रही संजय से। बीच-बीच में वह अपनी शादी का जिक्र करती। बताती कि लड़के वाले देखने आ रहे हैं। कभी बताती कि लड़के वालों ने हां कर दी है। एब बार उसने यह सूचना भी दी कि उसकी शादी तय हो गई है। और जैसे अल्टीमेटम देती हुई बोली, "अभी कोई बात नहीं बिगड़ी है। तुम हां कर दो तो मैं मना कर दूंगी।" वह यह और ऐसे कई किस्म के दबाव बनाती रहती। पर संजय हर बार या तो चुपचाप उसकी ऐसी सूचनाएं पी जाता या फिर, "क्या फायदा?" जैसे संक्षिप्त संवाद बोल कर बात टाल जाता। ऐसे ही एक बार वह बिलकुल चरम क्षणों में बुदबुदाई, "देख रही हूं तुम्हारे नसीब में मेरे लिए आह भरना ही लिखा है।"

"वो तो है।" संजय लापरवाही से बोला।

"तो क्या तुमने मेरे बच्चों का मामा बनने का फैसला कर लिया है?" वह जैसे संजय को बिच्छू की तरह डंक मारती हुई बोली, "मामा बनना ही चाहते हो तो मैं क्या कर सकती हूं।" उसने जोड़ा, "पर मुझे अच्छा नहीं लगेगा।"

"क्या बेवकूफी की बातें करती हो?" कहते हुए संजय ने बात टाल दी। पर इस वाकये के बाद वह रीना के बारे में गंभीरता से सोचने लगा।

शिद्दत से।

उन्हीं दिनों रमेश शर्मा की फिल्म "न्यू डेलही टाइम्स" की शूटिंग दिल्ली में हो रही थी। संजय ने उस शूटिंग पर सर्रे की शूटिंग रिपोर्ट लिखने के बजाय एक दिलचस्प रिपोर्ताज लिखा। साथ में फिल्म के हीरो शशी कपूर से एक बेलौस इंटरव्यू भी। इस इंटरव्यू में शशी कपूर ने बड़ी मासूमियत से उस बात का भी जिक्र किया था कि जब वह छोटे थे तो कैसे अपने पापाजी यानी पृथ्वी राज कपूर की एक हिरोइन को दिल दे बैठे थे। और संयोग देखिए कि शशी कपूर का एक बेटा भी छुटपन में ही उनकी एक हिरोइन से प्यार कर बैठा था। इस पूरे प्रसंग को जिस मन से, जिस मासूमियत और मुहब्बत से शशी कपूर ने बयान किया था, लगभग उसी मन और पन से संजय ने लिखा भी था। इंटरव्यू में शशी कपूर की फिल्मों पर, उनकी जिंदगी पर विस्तार से चर्चा थी। उन्होंने बताया था कि अपनी लगातार फ्लाप फिल्मों से वह एक समय बहुत परेशान हो गए थे। उन्हीं परेशानी के क्षणों में वह एक बार एस.डी. बर्मन से मिले। बर्मन दा ने उन्हें दिलासा दिलाया और कहा कि घबराओं नहीं, हम कुछ करेंगे। और उन्होंने किया। 'शर्मीली' में बर्मन दा ने जो संगीत दिया, उसने शशी कपूर के गिरते कैरियर को थाम लिया। "खिलते हैं गुल यहां, खिलके बिखरने को, मिलते हैं दिल यहां" गीत जो शशी कपूर पर फिल्माया गया था, शशी कपूर ने उसे अपने कैरियर का महत्वपूर्ण पड़ाव माना था। "जुनून" "36 चौरंगी लेन" और "कलयुग" जैसी उनकी महत्वपूर्ण फिल्मों की चर्चा भी संजय ने विस्तार से और कई शेड्स में की थी। संजय ने शशी की यह बात भी हाईलाइट की थी कि अब उन्हें अपनी बेटी की उम्र के बराबर की लड़कियों के साथ झाड़ियों के आगे पीछे गाना गाते दौरान खुद भी अच्छा नही लगता।

यह सब पढ़ कर रीना का दिमाग खराब हो गया। वह कहने लगी कि वह उसे भी क्यों नहीं साथ ले गया। उसने लगभग जिद पकड़ ली कि वह उसे शशी कपूर से अभी चल कर मिलवाए।

"क्या बंबई चलोगी?"

"क्यों?"

"क्योंकि शशी बंबई जा चुके हैं।" संजय ने उसे बताया, "चलो अगली बार जब वह आएंगे तो जरूर मिलवा दूंगा।"

"जाओ मैं तुमसे नहीं बोलती।" वह किसी छोटे बच्चे की तरह तुनक कर बोली।

"क्या शशी कपूर की हिरोइन बनने की तमन्ना है?" संजय ने उसे चिढ़ाया, "कि अब अगला प्रपोजल शशी कपूर को देना है?"

"तुमसे मतलब?" वह फिर तुनकी।

"नहीं, शशी कपूर को भी अगर अपने "स्कोर बोर्ड" में शुमार करने की तैयारी में हो तो बताओ, उन्हें फोन करके फौरन बुला दूं।" संजय रीना को छेड़ता हुआ बोला।

"फौरन बुला दूं!" उसकी बात दुहराती हुई वह मटकी, "शर्म भी नहीं आती यह कहते।" कहते हुए उसने संजय की बांह में जोर से काट लिया। संजय जोर से चिल्लाया और लपक कर उसने मुंह पर हाथ रख दिया और काटी हुई जगह पर फूंक मार-मार कर सहलाने लगी। बोली, "तुमने ऐसी बात की ही क्यों?" वह उसे घूरती हुई बोली, "तुम क्या मझे कैरेक्टरलेस समझते हो?"

"अच्छा चलो, तुम्हें ए.के. हंगल से मिलवा दूं।" संजय रीना को खुश करता हुआ बोला, "वह दिल्ली में अभी हैं।"

"मुझे नहीं मिलना।"

"क्यों?"

"बस, कह दिया कि नहीं मिलना!"

"पछताओगी।" संजय बोला, ''हंगल साहब से मिलना एक अनुभव से गुजरना है। वह स्टार नहीं न सही, पर अभिनेता जबरदस्त हैं। बिरले ही होते हैं ऐसे अभिनेता। और आदमी वह अपने अभिनेता से भी अच्छे हैं।''

"ठीक है।" वह उठती हुई बोली, "फिर कभी।" वह ठीक वैसे ही बोली जैसे लाइफबाय प्लस साबुन के विज्ञापन में पसीने की बदबू से उकताई लड़की बोलती है, "फिर कभी।" और जैसे दूसरे दृश्य में वह तरल और मादक बन जाती है कुछ-कुछ वही हाल रीना ने किया। वह संजय से लिपट गई।

मंडी हाउस के श्री राम सेंटर में एक ड्रामा फेस्टिवल के दौरान रीना जब संजय से पहली-पहली बार अलका के साथ मिली थी तो संजय ने उसे भर आंख देखा भी नहीं था। अलका की उपस्थिति मात्र से ही संजय की आंखें नत हो जाती थीं। तबसे जबसे अलका ने उसे पुरुष मानसिकता से संचालित होने वाला व्यक्ति बता कर राखी बांधने की मंशा जता दी थी।

उस रोज श्री राम सेंटर के गलियारे में रीना से बड़ा रूटीन सा परिचय इस तरह के संबंध में बदल जाएगा, संजय ने सोचा भी नहीं था। गिरीश कार्नाड लिखित हयबदन नाटक की समीक्षा में संजय ने स्त्री-पुरुष संबंधों को जो नाटक में इंगित और वर्णित था, उसकी एक नई व्याख्या, एक नया भाष्य भाखते हुए, उसे रेखांकित करते हुए कुछ दृष्टिगत बातें गौरतलब कराई थीं। रीना को वह सारी संभावनाएं और स्थापनाएं जो संजय ने बतौर बहस रेखांकित की थीं, इतनी भा गई थी कि दूसरे दिन वह संजय से ऐसे लपक कर मिली, जैसे वह उसे कितने वर्षों से मिलती रही हो। पर संजय को तो यह ठीक से याद नहीं था कि यह रीना वही रीना है जो कल मिली थी। अलका ने उसे छेड़ा, "क्या रजनीश सिर से उतर गए जो लड़कियों की नोटिस लेना भी श्रीमान भूल गए?" उसने जोड़ा, "कि कहीं समाधि अवस्था में तो नहीं पहुंच गए?" वह बोली, "अगर ऐसा है तो बड़ बुरा हुआ। क्या होगा देश का, क्या होगा बेचारे रजनीश का?" अलका लगातार चुटकी लेती जा रही थी। बात किसी तरह अजय ने संभाली, "क्यों परेशान करती हो बेचारे को।" पर रीना तो जैसे इन सारी चीजों से बेखबर अपनी ही धुन में थी, "पहली बार किसी प्ले की रिव्यू इस तरह पढ़ने को मिली। रिव्यू में इस तरह की इमैजिनेशंस, प्ले से भी आगे की बात करना आसान नहीं है।"

"पर यह तो अक्सर ऐसे ही रिव्यू लिखता है।" अजय ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, "शायद पढ़ा नहीं तुमने?"

"नहीं, रिव्यूज तो मैं अक्सर पढ़ती हूं।" रीना बोल रही थी, "पर हमेशा एक ही ढर्रा। कि स्टोरी सच एंड सच, फला-फला ने ठीक काम किया, फला-फला ने सो एंड सो। और कुछ ऐसी ही कील कांटे वाली बातें गोया रिव्यू नहीं किसी मशीन का नट बोल्ट कस रहे हों।" वह कंधे उचकाती हुई बोली, "बिलकुल रूटीन-रूटीन सी रिव्यू। बासी बासी बातें।" वह संजय की ओर मुखातिब होती हुई बोली, "पर आपकी रिव्यू ने तो सोचने पर मजबूर कर दिया।"

वह चहकी, "बाई गाड इस तरह की रिव्यू अब तक तो पढ़ने को नहीं मिली थी।"

"ज्यादा तारीफ मत करो।" अजय रीना से बोला, "इससे भी अच्छी रिव्यू भारद्वाज ने लिखी है।"

"आप अंग्रेजी अखबार पढ़ती हैं?" संजय ने रीना से पूछा।

"आफकोर्स!"

"तो अंग्रेजी अखबार पढ़ना बंद कर दीजिए।" संजय बोला, "अगर कचरा रिव्यू पढ़ने से बचना चाहती हों तो।"

"अच्छा?" रीना सोच में पड़ गई।

"क्योंकि एक प्रसिद्ध चित्रकार का कहना है कि सपने हमेशा मातृभाषा में आते हैं।" संजय ने जोड़ा, "और आप लाख कंधे उचकाएं, अंग्रेजी में गिटपिटाएं, मैं समझता हूं आपकी मां हिंदी बोलती होंगी। मतलब साफ है कि आप की मातृभाषा हिंदी होगी।" संजय ने कहा, "अगर हिंदी न सही, कोई और भाषा सही, जो भी हो, आप वह भाषा पढ़िए, बंगला, पंजाबी, असमी, तेलगु जो भी हो। वह पढ़िए।" उसने लगभग चेताते हुए कहा, "पर अंग्रेजी छोड़ दीजिए।"

"इसकी बातों में मत आना।" अजय बोला, "यह तो लोहियावादी है।"

"सवाल सिर्फ लोहियावादी का नहीं है यहां।" संजय तुनका, "सवाल मातृभाषा का है, सवाल हिंदी का है, सवाल अपनी भाषा के प्रति सम्मान का है, अपने आत्म सम्मान का है, सवाल अंग्रजी की गुलामी से छुट्टी पाने का है। क्योंकि अंग्रेजी में न तो कोई संभावना है, न कोई सपने हैं हमारे लिए।"

"अच्छा चलो, रीना पर तुम्हारी इन बातों का इंप्रेशन नहीं जमने वाला।" अजय संजय को खींचते हुए बोला, "नाटक की घंटी बज गई है।"

"सॉरी!" कहते हुए संजय ने सिगरेट सुलगा ली थी।

नाटक के बाद रीना फिर संजय की ओर लपकी। ऐसे हिलमिल के बात करने लगी कि संजय खुद भी मुश्किल में आ गया था। दो ही संक्षिप्त मुलाकातों में कोई सुंदर सी लड़की किसी फंटूश के गले पड़ जाए, यह उसके लिए पहला अनुभव था। फिल्मों में तो ऐसे फ्रेम उसने देखे थे, पर खुद के साथ यह फिल्मी फ्रेम घटित होते हुए वह पहली बार महसूस कर रहा था। उसके भीतर एक अजीब-सी हलचल, एक अजीब-सी गुदगुदी हो रही थी, अजीब-सी रासायनिक क्रिया हो रही थी, उसके भीतर ही भीतर। यह क्या हो रहा था।?

तुरंत-तुरंत कोई निष्कर्ष वह नहीं निकाल पा रहा था।

इस सबके बावजूद संजय फिर संजय था। रीना की मादक और उत्सुक उपस्थिति उसे बहका तो रही थी पर अलका की उपस्थिति उसे ऊहापोह में डाले हुए थी। वह एक अजीब से संकोच में सकुचाया, रीना के खिंचाव में भकुआया, किसी बंद दरवाजे जैसा चुप-चुप था पर रीना जैसे अपने भीतर बाहर की सारी बात, "यू नो, यू नो" कह-कह कर खोल कर रख देना चाहती थी। अजय जैसे संजय को चिढ़ाते हुए रीना से बोला, "बशीर बद्र का वह शेर सुना है कि, कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से। तो तुम इतना इसके गले में मत पड़ो।"

"स्साले।" संजय अजय को खींचता हआ उसके कान में धीरे-से बुदबुदाया, "मेरी लाइन काटता है।"

"तुम क्या गंदे आदमी का शेर लेकर बैठ गए?" अजय कुछ कहता, उससे पहले ही अलका अपना पुराना राग लेकर बैठ गई।

"क्यों प्रोग्रेसिव शायर हैं बशीर बद्र तो।" रीना बोली, "और उनके शेर भी एक से एक होते हैं।"

"जैसे बबर शेर।" संजय ने टांट कर रीना की बात पूरी की।

"एक्जेक्टली।" रीना चहकी।

"पर वो आदमी मुझे पसंद नहीं।" अलका बोली, "जो आदमी किसी औरत के लिए अपने बीवी-बच्चों को यतीम बना कर सड़क पर भीख मांगने के लिए छोड़ सकता है। वह आदमी, अच्छा आदमी कैसे हो सकता है।" वह बिफरी, "और जो अच्छा आदमी नहीं हो सकता है वह अच्छी शायरी कैसे कर सकता है, अच्छा शायर कैसे हो सकता है? प्रोग्रेसिव तो कतई नहीं।" उसने जोड़ा, "ऐसे लोगों का तो सोशली बायकाट होना चाहिए।"

"क्या अलका तुम भी?" अजय उसे गुरेरता हुआ बोला।

"देखो अलका, तुम चाहे जो कहो, बशीर बद्र का शायरी में जवाब है नहीं।" संजय भावुक होता हुआ बोला, "फिराक और फैज के बाद इतने बोलते हुए शेर, जिंदगी के बदलते हुए तेवर को शायरी में ढालने का काम जिस शऊर, संवेदनशीलता और शिद्दत से बशीर बद्र और हां, दुष्यंत कुमार ने किया है, मुझे कोई और नहीं दिखता।" संजय बोलता रहा, "रही बात निजी जिंदगी की, तो होगी कोई बात। क्या पता कहां और किस पक्ष से गलती हुई हो। और क्या पता, 'कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, वरना यूं कोई बेवफा नहीं होता।' जैसा शेर इन्हीं स्थितियों में लिखा गया हो।"

"जो भी हो, पर मैं ऐसे लोगों को माफ नहीं कर सकती।" अलका ने माहौल काफी गंभीर कर दिया था।

"अच्छा, मैं चलूं?" संजय बोला, "मुझे प्रेस भी जाना है।" अलका की ओर घूरते हुए उसने कहा, "यह बहस फिर कभी।"

"फिर कभी!" वह ऐंठी, "आप घर भी आते हो कभी?"

"आऊंगा, आऊंगा।" संजय चलने लगा।

"मैं छोड़ दूं आपको?" रीना फिर लपक कर बोली।

"नो थैंक्यू! मैं चला जाऊंगा।" संजय हाथ जोड़ते हुए बोला, "आप क्यों तकलीफ करती हैं।"

"नहीं, तकलीफ की कोई बात नहीं।" रीना बोली, "बहादुर शाह जफर मार्ग पर ही तो जाएंगे आप?"

"जाहिर है।"

"तो आइए।" रीना अपनी फिएट का फाटक खोलती हुई बोली, "दो मिनट में पहुंचाती हूं।"

"सुनो!" संजय रीना की कार में बैठने लगा तो अजय धीरे से उसके कान में फुसफुसाया, "फिसल मत जाना राजा जी!"

"चुप्प स्साले!" संजय बुदबुदाया और रीना से झटके से बोला, "चलिए!"

"ओह, श्योर।" कहते हुए रीना ने कार स्टार्ट कर दी।

रास्ते में भी संजय शर्माया-शर्माया कनखियों से रीना को देख लेता। रीना की मादक देह से बिलकुल सनका देने वाले सेंट की खुशबू आ रही थी। पर संजय का मन नहीं डोला। क्योंकि रीना, अलका की सहेली थी। और संजय के बारे में अलका की 'पुरुष मानसिकता' वाली साइक्लॉजिकली एनालिसिस संजय की सहज मानसिकता पर भी सांकल चढ़ाए खड़ी रहती। पर रीना पर कोई सांकल नहीं चढ़ी थी। वह इस छोटे से रास्ते में, "कहां रहते हैं, कहां के हैं, घर में कौन-कौन है, दिल्ली में कब से हैं?" जैसे ढेरों सवालों में लगी रही। चलते-चलते उसने अपने घर का पता बताया और कहा, "कभी फुर्सत से आइएगा। इट्स माइ प्लेजर।" और "बाय-बाय" कह कर चली गई।

पर वह नहीं गया। रीना के घर।

कुछ दिन बाद अलका का फोन आया। उसने घर बड़े आग्रह से बुलाया।

"बात क्या है?" पूछने पर वह बोली, "एक खुशी सेलीब्रेट करनी है।"

"क्या हो गया?" पूछा संजय ने।

"आना, खुद ही पता चल जाएगा।" कह कर उसने फोन रख दिया।

संजय उस शाम जल्दी से कामकाज निपटा कर जब अलका-अजय के घर पहुंचा तो देखा उपेंद्र सूद, वीना वगैरह एन.एस.डी.एन. तो थे ही रीना भी थी। पता चला टी.वी. से एक डांस कंसायनमेंट अलका को मिली थी, रीना के पापा के सौजन्य से, वही सेलीब्रेट हो रहा था।

संजय बहुत दिनों बाद अलका-अजय के घर आया था। पहुंचते ही उसने गिलास, बर्फ और बोतल मांगी। अजय पहले ही से शुरू था। बना बनाया पेग लेकर संजय को थमा दिया। संजय ने मना कर दिया, "जूठी नहीं पीऊंगा।"

"साले अभी शुरू भी नहीं हुआ। और चढ़ गई?" अजय बोला।

"देखो, मैं अपना पेग खुद बनाऊंगा।" संजय बोला, "एंड नो फरदर डिसकसन।"

"अंग्रेजी बोल रहा है लोहियाइट। दे दो भाई।" अजय उपेंद्र से बोला।

संजय अभी पहला पेग पर ही था और रीना पर बराबर ध्यान दिए था। पर शो यही कर रहा था कि उसने उसकी नोटिस नहीं ली है। अभी कुछ इधर उधर की हांक रहा था कि उपेंद्र पेशाब करने चला गया और अजय फ्रिज से पानी निकालने लगा। इसी बीच रीना संजय के पास आई। और लगभग सट कर बैठती हुई धीरे से बोली, "आप आए नहीं?" रुकी और बोली, "नाराज हैं क्या?"

"नहीं तो।" वह रीना की देह से सेंट सूंघता हुआ बोला, "सॉरी आ नहीं पाया।" उसने जोड़ा, "पर आऊंगा।"

"कब?" कहते हुए रीना उठने लगी।

"जल्दी ही।"

"मैं इंतजार करूंगी।" वह आंखों में अजीब-सा इसरार उडेलती हुई बोली, "बहुत-सी बातें करनी हैं।" कह कर वह वहां से उठ गई थी।

"क्या बातें हो रही थी?" अजय पानी की बोतल रखता हुआ बोला।

"कुछ नहीं बस यूं ही।"

"वही रिव्यू, वही फिसलन, वही फसाना?" अजय ऐसे बोल रहा था जैसे किसी नाटक का संवाद बोल रहा हो।

संजय अभी दूसरे पेग पर था कि उसने देखा रीना जा रही थी। उसने गौर किया रीना को उसकी यह मयकशी अच्छी नहीं लग रही थी। और वह जैसे उकता सी गई थी। उसे जाते देख संजय बोला, "जा रही हैं?"

"हां।" वह संक्षिप्त सा बोली।

"आज हमें घर नहीं छोड़ेंगी?"

"चलिए, अभी छोड़ देती हूं।" वह चहकी ऐसे जैसे उसकी ताजगी लौट आई हो।

"अभी नहीं, जरा देर रुकिए तो चलूं।"

"सॉरी, मुझे जल्दी घर पहुंचना है।"

"रीना तुम जाओ।" अलका किचन से हाथ पोंछती हुई आई, "इन शराबियों के चक्कर में मत पड़ो। नहीं तो रात भर तुम्हें घुमाते रहेंगे।"

"ओ.के.।" कहती हुई रीना अलका के घर से ऐसे भागी जैसे वह दंगाइयों से बच कर भाग रही हो।

दूसरे दिन सचमुच संजय भरी दुपहरिया में रीना के घर पहुंच गया, पंडारा रोड पर।

उसने बड़ी खातिरदारी की। खूब खिलाया पिलाया। अपने घर में भी वह मादक अदाएं बिखेरती रही।

अमूमन नौकर चाकर और एक बूढ़ी दाई के अलावा कोई उसके घर में नहीं होता था। उसके पिता कभी होते, कभी नहीं होते। ज्यादातर वह अपने राजनीतिक दौरों पर रहते। संजय जब-तब जाने लगा। उसने देखा रीना कभी-कभी जान बूझ कर आते-आते उससे सट जाती, पर अभिनय ऐसा करती जैसे वह अनायास ही छू गया हो। अनायास ही सही, संजय की देह में करंट सा दौड़ जाता। पर उसकी पूरी देह में जैसे जैसे तनाव भर जाता। उसका चेहरा बिगड़ जाता। पर मारे संकोच के वह चुप ही रहता। फिल्म, थिएटर, राजनीति, कला और दुनिया की तमाम बातें वह बतियाता रहता। पर उसके भीतर क्या घट रहा है, कौन सा ज्वालामुखी भीतर ही भीतर दहक रहा है, वह उसके बारे में नहीं बतिया पाता। वह सोचता, क्या पता रीना खुले दिमाग की लड़की है, खुद ही प्रपोज करे! पर ऐसा हो नहीं रहा था। हो यह रहा था कि जब कभी रीना की देह से वह छू जाता उसकी देह दहकने लगती। एक अजीब सी उथल-पुथल मच जाती, भीतर ही भीतर। ऐसे ही किसी क्षण में एकांत पाकर उसने रीना से कह दिया, "अगर बुरा न मानिए तो एक बात कहूं।" संजय ने यह बात इतने संकोच, इतनी शिद्दत और नरमी से कही थी कि रीना शायद उसकी बात का अर्थ समझ गई थी या क्या पता नहीं, पर मुंह से वह बोली कुछ नहीं, आंखों ही आंखों में सिर हिला कर होंठ गोल कर मानो पूछा कि, "क्या बात है?"

संजय चुप रहा। तो वह "ऊं" करके फुसफुसाई। संजय कहना चाहता था कि आपके साथ सोना चाहता हूं। पर उसके मुंह से जो अस्फुट सा कुछ निकला यह था, "आपको चूमना चाहता हूं।"

"बस!" कह कर उसने संजय को खुद ही इतने कस कर चूमा कि कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गया। फिर तो सहज ही वह सब कुछ घट गया जो संजय चाहता था। और इतना जल्दी घट गया कि वह कुछ समझ ही नहीं पाया। उसने पाया कि उससे ज्यादा तो रीना आतुर थी उसके साथ संभोग के लिए। पर नारी संकोच उसे विवश किए हुए था। और वह चाहती थी की पहल संजय की ओर से ही हो। ऐसा उसने बाद में बताया कि, "पर तुम वक्त इतना लंबा खींचते जा रहे थे कि उस दिन या किसी और दिन तुम नहीं प्रपोज करते तो मैं ही प्रपोज कर देती।" वह बोली, "तुम्हारी मासूमियत पर कभी तरस आता तो कभी गुस्सा।"

हां, वह दोनों आप-आप से अब तुम पर आ गए थे।

पर यहां चेतना अभी आप-आप पर ही थी। जाने यह लखनऊ की नफासत थी, उसका सलीका था या वह उससे खास दूरी बनाए रखना चाहती थी। चेतना के साथ-साथ लखनऊ में घूमते हुए संजय को एक दिक्कत यह महसूस होती कि लखनऊ दिल्ली नहीं था। दिल्ली में जहां-जहां को पहचानने वाले लोग नहीं मिलते। पर लखनऊ में कदम-कदम पर पहचानने वाले "भाई साहब, भाई साहब" कहने वाले मिल जाते। दिल्ली में भारी आबादी के बावजूद निर्जन और एकांत जगहों की लंबी फेहरिस्त थी। पर लखनऊ में निर्जन और एकांत जगहें थीं ही नहीं।

बुद्धा पार्क, नींबू पार्क, शहीद स्मारक, रेजीडेंसी, इमामबाड़ा से लगायत, चिड़ियाघर, कुकरैल तक वही भीड़ वही जान पहचान के चेहरे चहुं ओर घूमते मिल जाते। लखनऊ का छोटा शहर होना संजय को साल जाता। आखिर कहां बैठे वह चेतना को लेकर? उसे रह-रह दिल्ली, रीना, नीला और साधना की याद आ जाती। ऐसा भी नहीं था कि लखनऊ में इन जगहों पर जोड़े नहीं घूमते थे, बल्कि वह देखता चिड़ियाघर में तो सुबह-सुबह दस बजे ही स्कूली लड़कियां ड्रेस पहने ही अपने साथियों के साथ आ जातीं, दफ्तर जाने वाली लड़कियां दफ्तर बाद में जातीं, पहले वह अपने प्रेमी से मिलतीं। पर हर कोई उन्हें पहचानने वाला नहीं होता। क्योंकि उनकी पहचान नहीं थी। पर संजय का सार्वजनिक जीवन जीने की एक पहचान थी। पुलिस से लेकर, मिनिस्टर्स, तक उसे पहचानते थे। चेतना के साथ रास्ते चलते तो कोई बात नहीं थी, पर किसी ऐसी जगह वह उसके साथ बैठता तो झेंप आती। ऐसे ही एक दिन नींबू पार्क में बैठे-बैठे संजय ने सोचा कि वह अब और समय खराब करने के बजाय चेतना को सीधे प्रपोज कर दे। उसने आंखों में कुछ वैसा ही भाव भरा और बोला, "तुमसे एक बात करनी है।"

"पर मैं अब चलना चाहती हूं।"

"क्यों?"

"क्योंकि अंधेरा हो रहा है।"

"क्या अंधेरे से डर लगता है?"

"नहीं।"

"तो क्या मुझसे डर लग रहा है?"

"नहीं।"

"तो?"

"बस चलिए।"

"चलो।" संजय थोड़ा नाराज होता हुआ उठ खड़ा हुआ।

"नाराज क्यों हो रहे हैं?"

"क्यों, नाराज क्यों होऊंगा?"

"अच्छा बैठिए।" वह फिर से बैठती हुई बोली।

"नहीं, अब चलो।" संजय बैठा नहीं।

"कुछ कहना चाहते थे आप?"

"नहीं।"

"कुछ कहना तो चाहते थे आप।" वह मायूस होती हुई, मनाती हुई सी बोली।

"अब मूड खराब मत करो, चलो।" संजय का मूड सचमुच खराब हो रहा था।

वह उठ खड़ी हुई और पहली बार संजय के आगे-आगे चलने लगी। बाहर आकर वह स्कूटर पर नहीं बैठी। संजय ने कहा भी कि, "बैठो।"

"नहीं, मैं चली जाऊंगी।" उसने जोड़ा, "आप जाइए"

"ड्रामा मत करो, चलो बैठो।" थोड़ी-सा ना-नुकुर के बाद वह बैठ गई। पर रास्ते भर दोनों चुप रहे।

संजय उस शाम दफ्तर नहीं गया।

दूसरे दिन दफ्तर गया तो उसकी एक खबर पर हंगामा मचा हुआ था। वह खबर जो संजय एक दिन पहले दे गया था। खबर एक अधिकारी के बारे में थी। जाते ही रिपोर्टर्स मीटिंग में संजय की खबर ली गई कि, "यह खबर कैसे लिखी आपने?" पूछा सरोज जी ने।

"खबर थी इसलिए लिखी।"

"पर इस तरह की खबर छपने की परंपरा नहीं रही है हमारे अखबार में।" सरोज जी दहाड़े।

"खबर क्या होती है, आप जानते भी हैं?" संजय भी उखड़ गया। पर उसने गौर किया तो त्रिपाठी वहां बैठे-बैठे, मंद-मंद मुसकुरा रहा था। वह समझ गया यह सारी खुराफात त्रिपाठी की थी। सरोज जी को उसी ने "पंप" किया हुआ था। यह तो वह जान गया। पर सरोज जी के आगे वह घुटने टेकने को तैयार नहीं था। वह डटा रहा और दुबारा तिलमिलाया, "खबर की समझ भी है आपको?"

"नहीं।" उसने जोड़ा, "हमको क्या गरज पड़ी है।" वह तंज करते हुए बोला, "जिंदगी बीत गई आपकी और खबर नहीं समझ पाए अब तक तो, अब मैं क्या समझाऊंगा।"

"तो अब अइसी खबर नहीं छपेगी हमारे अखबार में।" सरोज जी का "हमारे" शब्द पर जोर ज्यादा था। सरोज जी को कभी इस तरह मोर्चा लेते नहीं देखा था संजय ने। पर आज उनका मोर्चा लेना संजय को विस्मय में डाल रहा था। तो उसने सोचा सरोज जी की भांग सुबह-सुबह बोलने लगी है। सरोज जी लगातार उच्चारते रहे, "हमारे अखबार में ऐसा नहीं छपेगा। ई सब अब नहीं चलेगा हियां।"

"क्या पहाड़ टूट पड़ा है?" संजय सरोज जी पर उबल पड़ा, "आखिर क्या गड़बड़ है उस खबर में।" वह रुका और सरोज जी को समझाते हुए बोला, "हफ्ते भर हो गया उस अधिकारी का ट्रांसफर हुए और उसे चार्ज नहीं दिया जा रहा है। क्योंकि अधिकारियों की एक लॉबी नहीं चाहती कि वह वहां चार्ज ले। वह लॉबी अपनी पसंद का कोई अधिकारी उसकी कुर्सी पर बैठाना चाहती है। और एक सीनियर आई.ए.एस. अफसर जो इन दिनों लंदन में है वह लंदन से ही इस लॉबी का नेतृत्व कर रहा है।" संजय फिर रुका और बोला, "बस यही तो है खबर में?" उसने जैसे पूछा, "तो इसमें गड़बड़ क्या है? गलत क्या है?"

"ये ठाकुर लॉबी का क्या मतलब है?" सरोज जी जैसे सुलग गए।

"अब ठाकुर लॉबी ऐसा कर रही है तो लिखने में क्या हर्ज है?"

"हर्ज है!" सरोज जी की आंखों में जैसे आग छलकने लगी, "आपका ई ब्राह्मणवाद नहीं चलेगा हियां।" सरोज जी बोलते-बोलते हांफने लगे, "अब ई सब नहीं चलेगा हमारे अखबार में।"

"देखिए सरोज जी, यहां सवाल ब्राह्मणवाद या ठाकुरवाद का नहीं, नियम और कानून का है।" उसने जोड़ा, "सरकार का एक आदेश है और उसका अनुपालन हफ्ते भर से नहीं हो रहा है तो यह खबर है।" संजय उत्तेजित हो गया, "रही बात ब्राह्मणवाद, ठाकुरवाद की तो यह सब घटिया और सतही बातें आप ही कह सकते हैं, मैं इन सब चीजों को नहीं मान पाता, न ही मुझे इस तरह की घटिया बातें पसंद हैं।"

"पर अब मैं यह सब नहीं होने दूंगा।" सरोज जी हांफते जा रहे थे, "देखता हूं कैसे लिखते हैं अइसी खबरें आप?"

"देखिए, आप हमसे ऐसी ऊटपटांग बातें मत करिए। खबर संपादक को मैंने दी थी, संपादक ने ही उसे पास किया है, आप संपादक से ही इस बारे में बात करिए तो बेहतर होगा।" संजय सरोज जी को इंगित करता हुआ बोला, "आज का जो एसाइनमेंट हो तो बताइए।"

"कुछ नहीं है।" सरोज जी तमतमाए।

संजय मीटिंग से उठ कर चला गया। उसका मूड बिलकुल आफ हो गया था। वह वापस घर जाकर सो गया। शाम को लोक लेखा समिति की रिपोर्ट पर एक खबर "ठीक-ठीक" करके वह दफ्तर पहुंचा तो जो खबर उसे मिली, सुनकर वह सन्न रह गया।

उसके पसंदीदा संपादक नरेंद्र जी का इस्तीफा हो गया था और सरोज जी कार्यवाहक संपादक बना दिए गए थे। आज सुबह सरोज जी का बार-बार यह कहना कि, "अब ई सब नहीं चलेगा हमारे अखबार में" का मर्म संजय की समझ में अब आ रहा था।

संजय का मन हुआ कि वह भी इस्तीफा दे दे। छोड़ दे लखनऊ चला जाए वापस दिल्ली।

वह दिल्ली, जिसका दंश उसे रह-रह डाहता है।

संजय ने अपनी सीट पर जा कर चपरासी से एक गिलास पानी मांगा। पानी पिया और एक लाइन का "निजी कारणों से इस्तीफा दे रहा हूं" लिखा और लेकर उठ खड़ा हुआ।

"ई काव कर रहे हो?" चपरासी ने संज की बांह पकड़ते हुए पूछा। संजय को चपरासी द्वारा अचानक इस तरह बांह पकड़ना बुरा लगा। वह उसकी ओर कुछ कहने के लिए पलटा, तो देखा चपरासी इमोशनल हो रहा था। अपनी मूंछे ठीक करता हुआ फिर बोला, "ई काव कर रहे हो?" संजय को उस चपरासी पर दया आ गई और उसने देखा कि वह चपरासी भी उसे दया भाव से देख रहा था। बल्कि कहीं ज्यादा कातर ढंग से। दया भाव से देखते-देखते क्षण ही भर में उसने संजय को जैसे काबू कर लिया और उसके हाथ से इस्तीफे वाला कागज खींच कर फाड़ते हुए बोला, "ई बेवकूफी कब्बो करिहो ना। हम बहुत पत्रकारों को देखे हैं हियां। अंग्रेजी को भी। बड़ों बड़ों की शेखी निकरते देखी है।" अपनी मूंछ ठीक करते हुए वह बोला, "मन जियादा खराब हो तो चुपचाप घर जाओ। दूइ चार रोज की छुट्टी ले लो। फिर आओ। पर ई बेवकूफी कब्बो नाई करिहो। नाहीं बड़ा पछितइहो।"

"ठीक है फूल सिंह।" कह कर संजय ने चपरासी के कंधे पर हाथ रख कर जैसे उसे दिलासा दिया कि वह इस्तीफा नहीं देगा। और जेब में सिगरेट तलाशने लगा जो जेब में नहीं थी।

"सिगरेट लावें का?" उसे सिगरेट ढूंढ़ते देख फूल सिंह ने पूछा। संजय चुप रहा तो फूल सिंह ने फिर दुहरा कर पूछा, "सिगरेट लावें का?"

"नाहीं फूल सिंह रहने दो।" संजय अपने बालों को दोनों हाथों भींचता हुआ बोला, "आज तो तुम अपनी बीड़ी ही पिला दो।"

"लेव पियो।" फूल सिंह खुश होते हुए ऐसे बोला जैसे उसने पानीपत की लड़ाई जीत ली हो। संजय की बीड़ी सुलगाता हुआ वह बोला, "तुम्हारे बीवी बच्चे हैं। एह तर गुस्सा में फइसला करिहो त का होई।" और जैसे वह खुद से ही पूछता हुआ बोला, "हयं?" उसने जोड़ा, "का करते भला?"

"दिल्ली चले जाएंगे।" संजय कुर्सी पर पीठ टिकाते हुए बोला।

"का हुआं तुरंत नौकरी धरी है, पलेट में सजा के?"

"क्यों?" संजय ने उससे कहा, "आखिर मैं दिल्ली से ही आया हूं।"

"एतने जो भली होती दिल्ली तो तुम आते काहें हुआं से?"

"हां, सो तो है।" कह कर संजय बीड़ी का कश लेने चला तो देखा कि बीड़ी बुझ गई है। बीड़ी फेंक कर जेब से पैसा निकाल कर फूल सिंह से संजय ने कहा, "जाओ सिगरेट ले ही आओ।"

"हम पहिलवै कहत रहे।"

कहता हुआ फूल सिंह चला गया। तो संजय ने सोचा कि एक चपरासी भी पत्रकारिता की विसंगतियों को किस तल्खी से समझता है। वह सोचने लगा कि अगर फूल सिंह ने अभी न रोका होता तो वह आज इस्तीफा तो दे ही देता। और जैसी कि सुबह सरोज जी के चिकचिक हुई तो इस्तीफा मंजूर भी हो जाता। तब भला वह क्या करता?

दिल्ली वापस जाता?

दिल्ली में ही कौन तुरंत नौकरी मिल जाती। बाद में भी मिलती कि नहीं, क्या पता? उसने सोचा। क्या दिल्ली में बेकार पत्रकारों की लंबी फौज नहीं है? और वह भी हिंदी में! वह खुद ही कहता फिरता रहता कि दिल्ली में हिंदी पत्रकारिता की स्थिति बिलकुल अछूतों जैसी है, हरिजनों जैसी है। जैसे हरिजनों को संवैधानिक आरक्षण तो है पर उनका फिर भी कल्याण नहीं है, ठीक वैसे ही हिंदी देश की राजभाषा तो है पर देश की राजधानी दिल्ली में हिंदी का कोई नामलेवा नहीं है। लोग या तो पंजाबी बोलते हैं या फिर अंग्रेजी। रही बात हिंदी पत्रकारिता की तो बस उसके भगवान ही मालिक हैं। वह जब यूनिवर्सिटी में पढ़ता था तो अपने छोटे से शहर में पत्रकारों को अंग्रेजी डिक्शनरियों में सिर खपाते देखता तो उसे उनसे घिन आती। पर दिल्ली में तो और बुरी हालत थी। काम हिंदी अखबार में करना, और अंग्रेजी जानना, अंग्रेजी से हिंदी में टीपने की कला जानना पहली शर्त होती। चलिए झेला। पर अंग्रेजी की जूठन चाटने से फुर्सत यही नहीं मिलती थी। दिक्कत तब होती जब दिल्ली में हिंदी पत्रकारों की जब तक क्या हरदम ही हेठी होती रहती। हालत यह कि दिल्ली में पोलिटिकल सर्किल हो या ब्यूरोक्रेटिक वह सबसे पहले फारेन प्रेस को तरहीज देते हैं और उनके ही सामने दुम हिलाते रहते हैं। टाइम, न्यूजवीक, आब्जर्वर, बी.बी.सी. हो या खलीज टाइम्स, उनकी दुम सिर्फ अपने जिक्र भर के लिए ही सही हिलती रहती है। फिर दूसरे नंबर पर टेलीविजन वाले यानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। भले चौखटा न दिखे पर कैमरे के सामने बैठकर "रिकार्डिंग" कराने का सुख ही कुछ और है। चैनलों की बाढ़ ने इस काम में ऐसा इजाफा किया है कि मत पूछिए। खैर इस तरह तीसरे नंबर पर आता है इंडियन प्रेस। और इंडियन प्रेस में भी जाहिर है कि अव्वल नंबर पर अंग्रेजी अखबार और उनके पत्रकार ही होते हैं। हिंदी अखबार और उनके पत्रकार अपना नंबर आते-आते इतनी दयनीय और कारुणिक स्थिति को प्राप्त हो जाते हैं कि कभी-कभी सोच कर भी रुलाई आ जाती है।

संजय को याद है कि एक बार इंदिरा गांधी की प्रेस कांफ्रेंस में बड़े जुगाड़, मान मनौव्वल और लगभग अपमानित होने की सारी प्रक्रियाओं से गुजरता हुआ वह पहुंचा और अपमानित होने की सारी कड़ियां लगभग भुलाता हुआ सीना तान कर जब वह अपनी निश्चित कुर्सी पर बैठा था तो एक अजीब से गुरूर से वह भर उठा था। पर जब प्रेस कांफ्रेंस शुरू हुई तो उसे अजीब सी हताशा महसूस हुई। उसके सीने में जलन होने लगी। हलक सूखने लगा। वह सारी प्रक्रिया ही इतनी अपमानजनक थी कि उसे एक बार लगा कि उसका दम घुट जाएगा। पर उसने जब अलग-बगल बैठे पत्रकारों पर नजर दौड़ाई तो देखा सब के सब सीना तान कर बैठे हैं। तो उसने भी पानी पीकर सूखते हलक को तर किया और सीना फुला कर बैठ गया। सबका नंबर आता रहा था। पर उसका नंबर नहीं आ रहा था। सभी सवाल पर सवाल किए जा रहे थे। दो सवाल संजय की सूची से पूछे जा चुके थे। हर सवाल के बाद वह सोचता अबकी अगर उसका नंबर आया तो फलां कविता पढ़ेगा। पर कवि सम्मेलनों में भी उसका नंबर जल्दी नहीं आता था। यहां भी नहीं आ रहा था। वैसे तो उसने ढेरों प्रेस कांफ्रेंस अटेंड की थी। और नेताओं को बात-बात में घेर लेता। पर यह पी.एम. की प्रेस कांफ्रेंस पहली बार थी। वह बैठा-बैठा इधर-उधर की बातें नोट करता रहा। और जब कोई पौन घंटे बाद उसके सवाल पूछने का नंबर आया तो वह जो बड़ी तैयारी से अंग्रेजी में सवाल लिख कर लाया था, उस सूची को दरकिनार कर गया। जैसे उसका स्वाभिमान भीतर से उस पर हमला कर बैठा, जैसे उसका हिंदी जीवी होना, उसे चाबुक सा मारता हुआ उसके भीतर हिलोरें मारने लगा, हिंदी उसकी जबान पर सारी रटी अंग्रेजी को जैसे लात मार कर चढ़ गई और उसने हिंदी में ही लगातार एक ही जगह दो सवाल पूछ डाले। सवाल पूछते समय उसकी नजरें सीधे इंदिरा गांधी पर टिकी थीं। उसने देखा कि इंदिरा गांधी को उसका हिंदी में सवाल पूछना नहीं सुहाया था और उन्होंने उसे हिकारत भरी नजरों से घूरते हुए सर्रे से अंग्रेजी में जवाब दे दिया था। दूसरे सवाल का जवाब भी जब वह अंग्रेजी में देने लगीं तो संजय की हिंदी, हिंदी स्वाभिमान उसके भीतर जैसे तूफान मचा गया, वह फिर से उठा और बड़ी विनम्रता से बोला "प्रधानमंत्री जी, मैंने सवाल हिंदी में किया था, जवाब भी हिंदी में दीजिए।" पर इंदिरा गांधी उसकी विनती पर गौर किए बिना अंग्रेजी में जवाब देती रहीं। संजय ने उन्हें फिर टोका कि, "हिंदी में।" और दो तीन बार टोका, "हिंदी में।" पर इंदिरा गांधी को जैसे यह सब कुछ सुनाई देते हुए भी सुनाई नहीं दे रहा था। वह उसे अनसुना करते हुए बोलती रहीं। पर इसी बीच दो तीन और हिंदी पत्रकारों का जमीर जाग गया। वह भी खड़े हो गए और "प्रधानमंत्री जी, हिंदी में" की विनती कर बैठे। तब कहीं जाकर इंदिरा गांधी ने बड़े-बड़े शीशों वाला चश्मा उतारा, उसकी कमानी होंठों से लगाई और हिंदी में बोलीं, "हिंदी में जवाब इसलिए नहीं दे रही हूं कि यहां फारेन प्रेस के लोग भी बैठे हैं।" बस वह चश्मा आंखों पर लगा फिर अंग्रेजी में चालू हो गईं। संजय ने देखा कि प्रधानमंत्री का सूचना सलाहकार उसे खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था। संजय बुरी तरह फ्यूज हो गया। वह भीतर ही भीतर सुलग कर रह गया। उसकी यह सुलगन शेयर करने के लिए सिगरेट भी उसके पास नहीं था। बाहर सिक्योरिटी वालों ने रखवा ली थी। माचिस सहित। वह पूरी प्रेस कांफ्रेंस में भस्म होता रहा, अफनाता रहा और पछताता रहा कि क्या करने वह यहां आ गया। हिंदी पत्रकारिता के बेमानी होने का पहला अहसास उसे तभी हुआ था।

प्रेस कांफ्रेंस खत्म होने के बाद भारी-भारी कदमों से वह उस एयरकंडीशंड हाल से भीतर ही भीतर खौलता हुआ निकल रहा था तो उसने गौर किया कि सोकाल्ड इंडियन प्रेस के लोग उसे ऐसे घूरते चले जा रहे थे जैसे उसने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। तो कुछ उसे देख कर ऐसे मंद-मंद मुसकुरा कर मजे ले रहे थे जैसे वह आदमी नहीं मदारी का बंदर हो। एक हिंदी पत्रकार ने उसका हाथ पकड़ते हुए चुटकी ली, "जब अंग्रेजी नहीं आती तो यहां आने की क्या जरूरत थी?" और कंधे उचकाता हुआ आगे बढ़ गया। एक अंग्रेजी अखबार का पत्रकार जो यू.पी. का था और संजय को जानता था सो उसने उसकी हालत पर सहानुभूति जताई, "बात तो तुमने ठीक कही थी पर कुछ वैसे ही जैसे किसी मुजरे की महफिल में कोई भजन की फरमाइश कर बैठे।" संजय के उदास मन को यह उपमा अच्छी लगी थी पर वह उदास इतना ज्यादा था कि तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाया। तभी उसने देखा, उसके ही संस्थान की वह अंग्रेजी पत्रकार जो उसके साथ ही आई थी, उसे देख नथूने फुला कर, गाल चिपका कर ऐसे आगे बढ़ गई जैसे किसी ने उसकी नाक काट ली हो। जैसे किसी ने उसका शील भंग कर दिया हो। संजय ने सोचा क्या हिंदी बोलना सचमुच इतना बड़ा अपराध है? वह यह सोच ही रहा था कि पीछे से कस कर किसी ने उसका कंधा दबाया। वह एक पल को डर गया कि शायद प्रधानमंत्री की सिक्योरिटी वाले पकड़ने आए हों। उसने पलट कर दहशत भरी नजरों से देखा। अपना ताम-झाम लिए मुसकुराते हुए बी.बी.सी. के मार्क टुली खड़े थे। अपनी ब्रिटिश लहजे वाली हिंदी में ही कंधे उचकाते हुए वह बोले, "हमको तो हिंदी आटी है।" मार्क टुली के "हमको तो हिंदी आटी है" कहने की लय ऐसी थी कि वह अपना हिंदी ज्ञान बताने के बहाने इंदिरा गांधी और उनकी अंग्रेजी को तमाचा मार रहे हों। और जैसे साड़ी वाली महिला से पूछ रहे हों कि, "बोलो, तमाचा भरपूर है कि नहीं?" मार्क टुली ने अपनी आवाज में और मिठास घोली पर कहने की लय को तल्ख किया और अचानक ठिठक कर खड़ी हो गई उस महिला से फिर बोले, "हमको तो हिंदी आटी है।"

"हमको भी हिंदी आती है।" वह महिला एकदम खिलखिला कर ऐसे बोली जैसे एकदम, अचानक किसी घुटन से उबर गई हो। पर मार्क टुली फिर बुदबुदाए "हमको तो हिंदी आटी है।" संजय को लगा जैसे उसे घर जाने की राह मिल गई हो। और उसने बढ़ कर मार्क टुली का हाथ पकड़ा और झुक कर चूम लिया। बिलकुल राजकपूर स्टाइल में।

संजय दफ्तर बाद में पहुंचा पर उसका हिंदी बोलने वाला किस्सा इस पुछल्ले के साथ कि अखबार की कैसे हेठी हुई, बहुत पहले पहुंच चुका था, सीन दर सीन। ऐसे-जैसे पूरी पटकथा हो। पांच मिनट की बात पचास मिनट के किस्से में ऐसे तब्दील हो गई थी जैसे आधी से अधिक प्रेस कांफ्रेंस में सिर्फ संजय और इंदिरा गांधी संवाद ही हुआ हो। सारा किस्सा सुन-सुन कर, जवाब दे-दे कर संजय का दिमाग पक गया था। बिलकुल किसी फोड़े की तरह। सिगरेट सुलगा कर वह अपनी सीट पर बैठा ही था कि संपादक का बुलावा आ गया। संपादक की केबिन में घुसना ही था कि वह शुरू हो गए, "यही सब करने गए थे? नहीं अंग्रेजी बोल पाए तो चुप ही रहे होते। इतनी छीछालेदार तो नहीं होती। प्राइम मिनिस्टर को नाराज करने का मतलब समझते हैं आप? आपकी जाहिलयत का बयान करने वाले कितने टेलीफोन आ चुके हैं। मालूम हैं? आप जाने हैं स्टाफ में कितने लोगों को नाराज करके आपको भेजा था, आपकी बीट नहीं थी, फिर भी?" कहते हुए संपादक ने एजेंसी से आए हुए तारों का पुलिंदा थामते हुए कहा, "ले जाइए। कम से कम प्रेस कांफ्रेंस संजीदगी से लिखिएगा।" उन्होंने जोड़ा, "इसमें हिंदी के तार भी हैं।" और ऐसे कि जैसे वह तमाचा मार रहे हों। संजय तारों का पुलिंदा लिए संपादक की केबिन से निकला तो उसे लगा जैसे उसका दिमाग फट जाएगा।

बाहर आकर उसने एजेंसी के तारों से एक रूटीन सी प्रेस कांफ्रेंस की खबर बनाई। और साथ ही अपनी नोट बुक निकाल कर प्रेस कांफ्रेंस की इनसाइड स्टोरी लिखी जिसमें इंदिरा गांधी के जवाबों का रंग और प्रेस कांफ्रेंस के कई-कई शेड्स और मूवमेंट्स के ब्यौरे बटोर कर उसने पूरी स्टोरी को एक इमोशनल टच दिया। साथ ही हिंदी वाले मसले पर मार्क टुली का जिक्र करते हुए एक बाक्स आइटम भी बनाया।

संपादक ने जब एक साथ तीन-तीन "स्टोरी" देखी तो फिर पसर गए। बोले, "क्या पूरे अखबार में प्रेस कांफ्रेंस छपेगा?"

"अब जो है आप देख लीजिएगा। जो न समझ में आए फेंक दीजिएगा।" कह कर संजय केबिन से बाहर आ गया। दूसरे दिन उसने देखा कि प्रेस कांफ्रेंस की मेन स्टोरी के साथ इनसाइड स्टोरी भी काट छांट के साथ छपी थी पर हिंदी वाला आइटम गायब था। जिक्र तक नहीं था। उसे तब और ज्यादा दुख हुआ जब उसने देखा कि उस यू.पी. वाले अंग्रेजी पत्रकार ने "क्वेश्चन इन हिंदी" करके एक बढ़ीया बाक्स आइटम लिखा था।

वह यह सब सोच ही रहा था कि लखनऊ में तो दिल्ली जैसा नहीं है। यहां जो लिखो वह छपता है। क्या हुआ जो यहां प्रधानमंत्री नहीं है। मुख्यमंत्री तो है और एक नहीं पचास सवाल पूछो, जवाब तो देता है। वह भी हिंदी में। यहां तो अंग्रेजी वाले जब हिंदी में सवाल पूछते हैं तो संजय को मन ही मन मजा आ जाता है। दिल्ली में जो कदम कदम पर हिंदी पत्रकारिता का नरक है वह नरक लखनऊ में सिर्फ डेस्क तक ही सीमित है। और उसको डेस्क से क्या लेना देना? उसने सोचा। फिर क्या रखा है दिल्ली में? फूल सिंह ने ठीक ही किया जो उसे इस्तीफा देने से रोक लिया। नहीं, दिल्ली में भी कहां है अब नौकरी? जिसने दिल्ली न देखी हो वह जाए दिल्ली। वह तो अपने हिस्से की दिल्ली भुगत आया है। और पत्रकारिता की ऐसी कौन सी चिरकुटई हो जो लखनऊ में है और दिल्ली में नहीं? सारी उलटबासियां, विसंगतियां, चमचई, चाकरी और धूर्तई हर ओर समायी हुई हैं। वह यह सब अभी सोच ही रहा था कि सरोज जी का बुलावा आ गया। सरोज जी अब उसके नए संपादक थे।

"किस चूतिए से पाला पड़ गया है।" बुदबुदाता हुआ वह संपादक की केबिन की ओर बढ़ गया। संपादक की केबिन में अभी भी नरेंद्र जी को बैठा देख कर वह चकित रह गया। नमस्कार करते हुए वह बोला, "तो क्या जो खबर उड़ी वह गलत है?"

"मेरे इस्तीफे की?" नरेंद्र जी बोले, "सही है।"

"तो फिर अभी तक आप बैठे हैं?"

"हां।" नरेंद्र जी बोले, "मैं तो जा रहा था पर सरोज जी ने कहा कि प्यारे, जरा काम धाम समझा दो तब जाना। एम.डी. ने भी रुकने को कहा।"

"तो आप रुक रहे हैं?" संजय चहका।

"नहीं, कल से नहीं आऊंगा। इस्तीफा तो दे दिया है।"

"पूंजीपतियों की नौकरी में तो यह सब होता ही रहता है।" संजय बोला, "फिर भी मेरे लिए कुछ हो तो बताइएगा।"

"बिलकुल।" नरेंद्र जी गर्मजोशी से बोले।

संपादक की केबिन से वह निकल ही रहा था कि सरोज जी भीतर जाते दिख गए। उसने उन्हें खबर थमाई तो वह उसे घूरने लगे। पर वह उनकी ओर देखे बिना ही निकल गया। घर जाते समय तक बड़ा उदास हो गया। रास्ते भर वह रमानाथ अवस्थी का गीत, "गंगा जी धीरे बहो, यमुना जी धीरे बहो, नाव फिर भंवर में है" गुनगुनाता रहा। उस अंधियारी रात में विधान सभा मार्ग से गुजरते हुए उसे वह सड़क ही नदी में तब्दील होती लगी और गुनगुनाता रहा, "गंगा जी धीरे बहो, नाव फिर भंवर में हैं"

वह जैसे बेबस हो गया था।

...जारी...

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