अपने-अपने युद्ध (16)

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दयानंद पांडेयइतना बेबस उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था और इस तरह "गंगा जी धीरे बहो" नहीं गुनगुनाता था। गुनगुनाते-गुनगुनाते उसे अपने शहर की यूनिवर्सिटी रोड की याद आ गई। उन दिनों वह अपने क्लास की एक लड़की के प्यार में पगलाया घूमता रहता था। और जब वह लड़की सड़क से गुजर जाती तो अपनी साइकिल के पैडिल मारता वह सोम ठाकुर का गीत, "जाओ पर संध्या के संग लौट आना तुम, सेज की शिकन संवारते न बीत जाए रात।" गुनगुनाता घूमता फिरता। उसने आज एक बार "जाओ पर संध्या के संग लौट आना तुम" भी गुनगुनाया पर इस समय उसे यह गीत गुनगुनाना बड़ा अटपटा लगा और तुरंत ही, "गंगा जी धीरे बहो" पर वापस लौट आया। विधान भवन के सामने से गुजरते हुए जैसे बेवजह तर्क पर उतर आया कि कैसी गंगा, और काहे की गंगा? यहां तो गोमती हैं, जो बहती ही नहीं। और जब बहती ही नहीं तो भंवर कहां से आएगा?

गोमती, जहां सड़ा पानी हिलोरें मारने के बजाय ठहरा हुआ पानी बन कर बदबू मारता है। जैसे दिल्ली में यमुना का पानी।  उसने सोचा सरोज जी और गोमती के बदबूदार पानी में आखिर फर्क क्या है? फिर उसने खुद को ही जवाब दिया कि भंवर से तो बचा जा सकता है पर बदबूदार पानी से? हरगिज नहीं। और फिर सरोज जी ही क्यों? समूची पत्रकारिता ही जब बदबूदार पानी हो गई हो तो क्या करें?

"तह के ऊपर हाल वही जो तह के नीचे हाल / मछली बच कर जाए कहां जब जल ही सारा जाल।" पाकिस्तानी शायर आली का यह मशहूर दोहा उसे आज की पत्रकारिता का हाल बयान करने के लिए बड़ा मौजू लगा।

पत्रकारिता का चाहे जो हाल हो पर फिलहाल तो उसे सरोज जी से निपटना था, श्याम सिंह सरोज से। उसने सोचा कि अगर वह उनसे नहीं निपटा तो सरोज जी तो उसे निपटा ही देंगे।

सरोज जी मतलब श्याम सिंह सरोज अजीब व्यक्तित्व के मालिक थे। देखने में सीधे सादे, निरीह पर भीतर से उतने ही धूर्त, कुटिल और काइयां। आप समझें कि आपने उन्हें "बना" दिया पर बाद में पता चलता उन्होंने आपको जड़ से ही काट कर रख दिया। पत्रकारों में कवि, कवियों में पत्रकार। अपने अखबार में वह आदि पुरुष माने जाते थे। क्योंकि अखबार शुरू होने के दिन से ही वह थे। जाने कितने लोग आए और चले गए। रिटायर हो गए, मर गए पर सरोज जी के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अखबार के मालिकों की तीसरी पीढ़ी काम संभालने लग गई थी पर सरोज जी जस के तस थे। चूंकि वह हाई स्कूल भी पास नहीं थे सो उनकी उम्र का कोई हिसाब नहीं था। उनके अखबार में पत्रकारों के रिटायरमेंट की उम्र पहले साठ वर्ष थी, फिर घटा कर अट्ठावन वर्ष कर दी गई। पर सरोज जी की उम्र की कोई थाह नहीं थी। सो वह रिटायर नहीं हुए थे। लोग कहते दादा की उम्र सालों से चालीस साल पर ठहरी हुई है। उस अखबार में सरोज जी के मुकाबले फूल सिंह चपरासी भर था। अखबार के पहले दिन से ही काम वह भी करता था पर चूंकि वह चपरासी था, इसलिए वह आदि पुरुष नहीं कहलाता। पर उसका दावा था कि वह सरोज जी से भी सीनियर है। वह कहता, "मैं चार साल सीनियर हूं। जब दस बरस का लौंडा था तबसे हियां पानी पिलाय रहा हूं। और यहां हिंदी अखबार नहीं छपता था, सिर्फ अंग्रेजी वाला ही छपता रहा, तबसे ही हूं।" पढ़ाई लिखाई का कोई सर्टिफिकेट फूल सिंह के पास भी नहीं था सो उसकी उम्र भी ठहरी हुई थी। सरोज जी, और फूल सिंह के रिटायरमेंट की जब भी बात आती फूल सिंह कहता, "जब सरोज जी आए तब अधेड़ थे और मैं लौंडा, पहिले सरोज जी को रिटायर करो।"

सरोज जी को रिटायर करने के लिए कंपनी ने बाकायदा डायरेक्टर बोर्ड की मीटिंग कर एक नियम बनाया कि चालीस वर्ष तक काम करने के बाद कर्मचारी रिटायर कर दिया जाएगा। माना गया कि बालिग होने के उम्र अठारह वर्ष है और बालिग होने से पहले कोई नौकरी नहीं कर सकता। तो चालीस साल बाद कर्मचारी अट्ठावन वर्ष का हो जाएगा और उसे रिटायर कर दिया जाएगा। फिर सरोज जी तो दो अखबारों में नौकरी करने के बाद इस अखबार में आए थे। उन्हें नौकरी करते हुए भी चालीस वर्ष से ज्यादा हो गए थे। बोर्ड से नियम पास करा लेने के बाद भी सरोज जी को रिटायरमेंट का कागज देने के लिए प्रबंधकों को बाकायदा रणनीति बनानी पड़ी। एम.डी. और जी.एम. शहर छोड़कर "टूर" पर निकल गए और टाइम आफिस के एक घाघ किस्म के बाबू को उन्हें कागज देने की जिम्मेदारी सौंप गए। सरोज जी रात जब दफ्तर से निकलने ही वाले थे तो वह बाबू उनके रिटायरमेंट के कागज लेकर उनकी केबिन में पहुंचा। सरोज जी में कुछ "ऐसा वैसा" सूंघ लेने की क्षमता कुत्तों से भी ज्यादा थी। उन्हें अंग्रेजी ठीक से नहीं आती थी पर अंग्रेजी अखबार के रिपोर्टरों के सामने बैठ कर टाइप करती उनकी उंगलियां देख कर ही वह खबर सूंघ लेते थे। तो उस बाबू को रात आठ बजे अपनी केबिन में घुसते देख कर ही वह भड़क उठे, "क्या बात है?" वह "जी-जी" ही बोला था कि सरोज जी पूरी ताकत से भड़के, "बाहर चलो, अभी खबर लिख रहा हूं।" वह बाबू "जी-जी" करता केबिन के बाहर आ गया। पर वह भी एक घाघ था। केबिन के ठीक बाहर ही कुर्सी लगा कर बैठ गया। सरोज जी परेशान। चपरासी को बुलाया। पानी मंगवाया। पानी पिया। चपरासी के आने-जाने के बहाने केबिन के खुलते, बंद होते दरवाजे से वह उस बाबू को बैठे देख चुके थे। उनकी परेशानी और बढ़ गई। वह बाबू को डांट कर भले कह दिए थे, "बाहर चलो, अभी खबर लिख रहा हूं।" पर खबर तो वह कबकी लिख चुके थे और अब उस बाबू को "बाहर चलो" कहकर खुद बाहर जाने को तड़फड़ा रहे थे। बिलकुल किसी तोते की तरह जो नया-नया पिंजरे में बंद हुआ हो। रात के आठ बजे से नौ बज गए। पर न तो सरोज जी केबिन से बाहर आए, न वह टाइम आफिस का बाबू वहां से हिला। संजय लगातार देख रहा था। अंतत: जब सवा नौ बज गए तो सरोज जी ने चपरासी से फिर पानी मंगवाया और उससे कहा कि "टाइम बाबू से पूछो, वह यहां क्यों बैठा है?" चपरासी ने वापस आकर सरोज जी को बताया कि, "वह कोई कागज देना चाहता है।"

"कागज तुम ले लो। और कह दो वह यहां से जाए।"

"हमने यही कहा साहब, पर ऊ कहता है, कागज जरूरी है, आप को ही देगा।" चपरासी ने बताया।

"अच्छा ठीक है तुम जाओ।" कह कर सरोज जी केबिन में बंद हो गए। सरोज जी केबिन में थे और बाबू बाहर। दोनों ही नहीं हिल रहे थे।

रात के दस बज गए।

सरोज जी केबिन से निकले ही थे कि बाबू उनके पीछे पड़ गया, "यह रिसीव कर लीजिए।"

"हुईं!" सरोज जी चौंके और गरजे, "तुम्हारी ये हिम्मत। अब तुम हमको कागज रिसीव करवाओगे?"

"यह ऐसा वैसा कागज नहीं है दादा!"

"तो?"

"आपका पर्सनल है।" बाबू रिरियाया।

''हुईं'' वह चकित होते हुए बोले, "काव कहि रहे हो।" और उसे वापस केबिन में बुलाते हुए बोले, "भीतर आओ, भीतर आओ। बाहर काहें खड़े हो।" सरोज जी अब नरम पड़ गए थे। भीतर गए, कागज देखा। कागज देखते ही सरोज जी फिर भड़के, "ई काव है?"

"आप ही देख लें सर!" बाबू उनके रिटायरमेंट के कागज की दूसरी प्रति दिखाते हुए बोला, "और इस पर रिसिवंग दे दें।"

"न हम कुछ लेंगे न रिसीव करेंगे।" सरोज जी उस पर बिगड़े, "अभी हम जी.एम. से बात करते हैं।"

"जी.एम. साहब तो हैं नहीं बाहर गए हैं।" बाबू ने बताया।

"तो एम.डी. को फोन करता हूं।"

"वो भी नहीं है। बाहर गए हैं सर!" बाबू ने सूचित किया।

"सब बाहर गए हैं तो तुमहू बाहर जाओ। हम नाहीं लेंगे।"

"पर देना तो सर आपको आज ही है।" बाबू फिर बोला, "हमें आदेश है कि आपको हर हाल में आज ही रिसीव करवा दिया जाए।"

"हम नहीं करेंगे रिसीव।" सरोज जी फिर बिगड़े।

"पर सर!"

"अब तुम्हीं बताओ, हम अब कइसे रिटायर होइ जाएं।" सरोज जी फिर नरम पड़ गए, "अबहिन परसों तो बात भई है एम.डी. से कि हम रिटायर नाहीं होब।" सरोज जी अब हताश हो रहे थे, "ऊ खुदै हमसे कहिन दादा आप हमेशा आते रहिए। आपकी नौकरी जिंदगी भर की है।"

"तो आने को आप कल भी आइएगा।" बाबू ने जोड़ा, "आप सचमुच रिटायर थोड़े ही किए जा रहे हैं। यह तो सिर्फ कागजी कार्रवाही है। बस! आप कागज भर ले लीजिए।"

"रिटायर नाहीं हो रहे हैं हम न?" सरोज जी ने बाबू से कहा, "फिर कागज क्यों देइ रहे हौ।"

"कागज तो हम देंगे सर!" बाबू बोला, "कागज अपनी जगह है और आप की सेवा अपनी जगह।"

"अच्छा जाओ कल लइ लेब।" सरोज जी बाबू को टालते हुए बोले।

"सर, कागज ले लीजिए।" वह रुका और हचकते हुए बोला, "नहीं तो....!"

"नहीं तो?" सरोज जी घबराए।

"आज अखबार में छपने चला जाएगा, बतौर नोटिस।"

"हुईं!" कह कर सरोज जी हांफने लगे, "जिंदगी भर की सेवा का इ फल दिया है लाला ने?" वह हांफते हुए बोले, "लइ आओ।" और उन्होंने रिटायरमेंट का कागज रिसीव कर लिया और बोले, "अब तो नहीं छपेगा?"

"नहीं सर!" कहता हुआ बाबू चला गया।

संजय ने समझा अब सरोज जी कल से दफ्तर नहीं आएंगे। पर वह दूसरे दिन सुबह मीटिंग में हमेशा की तरह मौजूद मिले। ऐसे जैसे कल रात कुछ हुआ ही न हो। हालांकि उनके "रिटायर हो जाने" की खबर सारे शहर में हो गई थी। उनसे मीटिंग में इशारों-इशारों में पूछा भी गया पर वह टाल गए। त्रिपाठी ने मीटिंग से उठ कर, एकाउंट्स में जाकर एक बूढ़े की आवाज बना कर सरोज जी को फोन किया और रिटायरमेंट के बाबत पूछा तब भी सरोज जी सहज रहे। बोले, "कुछ नहीं, अफवाह है। हम तो हरदम की तरह दफ्तर आए हैं। और हरदम आएंगे।" वह हंसते हुए बोले, "हमारे बिना ई अखबार चल पाएगा भला?" और फोन रख दिया।

इस तरह सरोज जी के तमाम किस्सों में उनके रिटायरमेंट का भी एक किस्सा जुड़ गया। हालांकि बाद में पता चला कि तबके जमाने में छ हजार रुपए महीना पाने वाले सरोज जी अब एक हजार रुपए के बाउचर पेमेंट पर आ गए थे। पर लिखते विशेष प्रतिनिधि ही थे। त्रिपाठी ने उन्हें कई बार टोका भी कि, "दादा यह तो अपमान है आपका।" तो सरोज जी एक दिन नाराज हो गए, "काव अपमान है?" वह हांफते हुए बोले, "आप लोग काव चाहते हैं, घर जाकर बैठ जाऊं?"

नहीं दादा। त्रिपाठी ने चमचई की, "आप के बिना अखबार चल पाएगा भला?"

"तो?"

"हम तो पैसे की बात कर रहे थे दादा।" त्रिपाठी मक्खन लगाते हुए बोला, "इतने कम पैसे में?" बोलते-बोलते वह रुका, "एक हजार से ज्यादा तो अप्रेंटिस भी पाता है।"

"हुईं!" सरोज जी चौंके।

"अच्छा दादा, आपकी ग्रेच्युटी वगैरह मिल गई?" संजय ने पूछा।

"नहीं तो।" सरोज जी बोले, "जी.एम. ने कहा है जिस दिन घर बैठने का मन करे ले लीजिएगा।"

"कोई एक लाख रुपए तो बनेंगे ही दादा!" त्रिपाठी कूद पड़ा।

"का पता प्यारे, हमने तो जोड़ा नहीं।" सरोज जी बिलकुल नरम पड़ गए, "तुम लोग जोड़ो।"

"ठीक-ठीक तो एकांउट्स वाले बताएंगे।" त्रिपाठी बोला, "पर मोटा-माटी तो एक लाख से ऊपर ही जाएगा।"

"अच्छा!" सरोज जी की आंखे फैल गईं।

"फिर तो दादा आप बहुत बड़े बेवकूफ हो।" त्रिपाठी सरोज जी को मात देते हुए बोला।

"काव अंट शंट बकि रहे हो।" सरोज जी नाराज होते हुए बोले।

"अंट शंट नहीं दादा।" त्रपाठी सरोज जी की नब्ज पकड़ते हुए बोला, "सच-सच बोल रहा हूं कि लाला आपको लंबा बेवकूफ बना रहा है।"

"कैसे?" सरोज जी की आंखे फिर फैल गईं।

"आप के एक लाख रुपए जो अभी नहीं मिले हैं बाजार दर से उसका सूद दो हजार रुपए मोटा मोटी हो जाएगा। और लाला आपके ही पैसे के सूद से एक हजार आपको दे रहा है और एक हजार अपनी जेब में डाल रहा है। आप ही के पैसे से आपको तनख्वाह भी दे रहा है, आप से काम भी ले रहा है, और आप पर एहसान भी लाद रहा है।" त्रिपाठी ने पूरा गणित सरोज जी को समझाया तो उनकी आंखे और चौड़ी हो गईं और बोले, "तो ई बात है प्यारे!" हम आज ही अपना हिसाब मांग लेते हैं। और वह उठ कर खड़े हो गए।

मीटिंग बर्खास्त हो गई थी।

सरोज जी सचमुच अपना हिसाब लेने जनरल मैनेजर के पास चले गए। जहां उनकी बड़ी किरकिरी हुई। उन्हें साफ बता दिया गया कि हिसाब लेने के बाद कंपनी को उनकी सेवाओं की एक दिन की भी जरूरत नहीं रहेगी। सो सरोज जी ने एकाउंट्स से हिसाब नहीं लिया। पर त्रिपाठी का हिसाब लगाने में वह जरूर लग गए। वह रिपोर्टर्स मीटिंग में जब तब त्रिपाठी पर बेवजह बिगड़ जाते। और खोज-खोज कर उसकी खामियां निकालते, उसे खराब से खराब एसाइनमेंट पर भेजते। असल में सरोज जी को किसी ने समझा दिया था कि त्रिपाठी हिसाब के लिए उन्हें उकसा कर उनकी छुट्टी कराना चाहता था। और सरोज जी के मूढ़ दिमाग में यह बात गहरे घुस गई। और चमचई, मक्खनबाजी में सिद्धहस्त त्रिपाठी की सारी कलाओं पर पानी फेरते हुए सरोज जी उसका हिसाब लेने पर नहा धोकर जुट गए। दफ्तर में एक कहावत थी कि सांप का काटा आदमी एक बार जी सकता है पर सरोज जी का काटा आदमी मर के भी छुट्टी नहीं पाता। वह उसे फिर भी मारते रहते हैं। पर सरोज जी एक शै थे तो त्रिपाठी दूसरी शै। खेल सरोज जी जरूर रहे थे पर बिसात त्रिपाठी ने ही बिछाई थी। त्रिपाठी के पास चमचई की इतनी कलाएं, इतनी उक्तियां थीं कि अच्छे-अच्छे अकड़ओं को वह वश में कर लेता था। सरोज जी सांप नाथ थे तो त्रिपाठी नागनाथ। बल्कि कई बार तो इच्छाधारी नाग कहने को जी हो जाता। वह जिसको जैसे चाहता, वैसे नचाता, वैसे टहलाता, बैठाता और बोलवाता। सरोज जी किसी के भी वश में नहीं आते, त्रिपाठी के वश में फौरन आ जाते। त्रिपाठी ऐसा झुक कर, हाथ जोड़ कर बोलता कि अच्छे-अच्छे उसके वश में क्या, सम्मोहन में बध जाते। लोग जानते थे कि त्रिपाठी कैसा है, क्या है, पर उसके सामने सभी विवश हो जाते और ऐसी लंगड़ी मारता, इतनी शराफत और नफासत से मारता कि आदमी का पैर टूट जाए फिर भी उसे शुक्रिया कहता जाए। दरअसल सरोज जी और त्रिपाठी दोनों एक ही नाव के दो सवार थे। दोनों की सोच, सनक और एप्रोच लगभग एक थी। बस स्टाइल जुदा-जुदा थी। सरोज जी एक शराब फैक्ट्री के मालिक की दलाली करते-करते पत्रकारिता में आ पहुंचे थे तो त्रिपाठी ट्रक पर क्लिनरगिरी और फिर टेलीफोन आपरेटरी करते-करते रिपोर्टिरी तक आ पहुंचा था। ट्रक पर ड्राइवर की जी हुजूरी कर-कर उसकी आंख में धूल झोंकने का जो रियाज त्रिपाठी ने किया था उसे अब वह जिंदगी का दस्तूर बना चुका था। टेलीफोन आपरेटरी में उसने नफासत की चाशनी घोलनी भी सीख ली। जिससे उसकी शराफत का रंग पक्का हो जाता और लोग उसकी बातों में आ जाते।

पर सरोज जी अबकी उसके किसी दांव में फंसने को तैयार नहीं थे। एक दिन मीटिंग में सरोज जी त्रिपाठी पर बुरी तरह बिगड़े और हांफने लगे। सरोज जी जब भी किसी पर नाराज होते तो हांफने लगते और आप कह कर संबोधित करते तो वह डर जाता। क्योंकि इस आप का मतलब सरोज जी के नाराज होने की भूमिका होती थी। और सरोज जी जिस भी किसी पर नाराज होते, वह कोई हो उसका कुछ न कुछ नुकसान सरोज जी जरूर कर या करवा देते। यह उनकी खास खासियत थी। तो उस दिन सरोज त्रिपाठी पर बिगड़ते हुए हांफने लगे। बोले "आप चाहते क्या हैं?"

"क्या बात है दादा!" त्रिपाठी ने बड़ी विनम्रता से मक्खन चुपड़ कर यह संवाद फेंका।

"बात पूछते हैं?" सरोज जी गरजे, "आपने आज कल कहीं उठना बैठना मुश्किल कर दिया है।"

"क्यों क्या हो गया दादा?" त्रिपाठी हाथ जोड़ कर बोला।

"ई अमीनाबाद में जो पटरी दुकान लगा रखी है आपने," वह हांफे, "आपने तो अखबार की नाक ही कटवा दी है।"

"नहीं दादा! पटरी दुकानदारों की मांग जेनुइन है।" त्रिपाठी उसी विनम्रता से बोला, "उनको दुकान के लिए जगह तो चाहिए।"

"खाक जेनुइन है।" सरोज जी फिर बिगड़े, "किसी दुकान पर बैठना मुश्किल हो गया है।"

"तो आप बैठते ही क्यों हैं किसी दुकान पर?" त्रिपाठी की विनम्रता मेनटेन थी, "आपको यह शोभा नहीं देता।"

"हमको यह शोभा नहीं देता।" सरोज जी ने त्रिपाठी का कहा उसी की तरह नकल करके दोहराया और उसको खा जाने वाली नजरों से घूरा, "और आपको पटरी दुकानदारों से पैसे लेना शोभा देता है?"

"क्या कह रहे हैं दादा आप?"

"मैं ठीक कह रहा हूं।" सरोज जी ने जोड़ा, "मेरे पास सुबूत है।"

"मेरे पास भी सुबूत है कि आप अमीनाबाद के बड़े दुकानदारों से पैसा लेते हैं।" त्रिपाठी की विनम्रता अब उसकी जीभ से उतर रही थी, "और नियमित लेते हैं।"

"अब आप हम पर आरोप लगाएंगे?" सरोज जी अब बुरी तरह हांफ रहे थे। ऐसे जैसे कोई कुत्ता बहुत दूर दौड़ कर आया हो और हांफ रहा हो। वह बोले, "यह झूठ है।"

"तो वह भी झूठ है।" त्रिपाठी की विनम्रता वापस उसकी जीभ पर आ गई थी। त्रिपाठी-सरोज संवाद के दौरान दिलचस्प यह रहा कि मीटिंग में बैठे बाकी रिपोर्टरों में से कोई भी कुछ नहीं बोला।

संजय के लिए तो जैसे यह एक अनुभव था। हिला देने वाला अनुभव। कि एक ठीक ठाक अखबार के दो पत्रकार इस स्तर पर भी जा सकते हैं भला? पर जैसे काफी नहीं था। आदत से मजबूर त्रिपाठी मीटिंग से निकलते ही सरोज के बारे में जो भी कुछ कह सकता था, एक अभियान के तहत कहना शुरू कर दिया। कि सरोज जी एक भी सामान नहीं खरीदते। राशन, दूध, घी, कपड़ा, साबुन पेस्ट तक कहां, कहां से उनके घर मुफ्त आता है पूरी फेहरिस्त वह परोसने लगा और बताने लगा कि बुढ़वा एक नर्स से भी फंसा पड़ा है। त्रिपाठी यह सारे ब्यौरे अपने मोहक और रहस्यमय अंदाज में परोसता और कहता कि, "यह बुड्ढा खुद ही घूम-घूम शहर भर में अखबार की नाक कटवाता फिरता है और दूसरों को हड़काता रहता है कि तुमने अखबार की नाक कटवा दी।" इस सबका असर यह हुआ कि सरोज जी ने दूसरे रोज त्रिपाठी को एक ऐतिहासिक एसानमेंट सौंपा। वह बड़े प्यार से बोले, "त्रिपाठी जी आप मेहनती आदमी हैं। और यह काम आप ही कर सकते हैं।"

"आज्ञा दीजिए दादा!" त्रिपाठी भी मक्खन लपेट कर बोला।

"क्या है कि शहर की एक बहुत बड़ी समस्या है मेनहोल का खुला रहना।" सरोज जी त्रिपाठी को समझाते हुए बोले, "इस पर आप कुछ करिए!"

"बिलकुल दादा!" त्रिपाठी हाथ जोड़ कर विनम्रता पूर्वक बोला, "यह बहुत बड़ी समस्या है। और वह भी राजधानी में। यह तो हद है दादा।" उसने जोडा़, "आज ही देखता हूं।" कह कर त्रिपाठी ने हाथ जोड़ लिए।

"तो इसमें क्या करेंगे आप?" सरोज जी ने बिलकुल बाल सुलभ जिज्ञासा जताई।

"बस अभी निकलता हूं। और महापालिका वालों को दुरुस्त करता हूं।" त्रिपाठी उठता हुआ हाथ जोडे़ बोला।

"बैठ जाइए।" सरोज ने त्रिपाठी को तरेरा, "मैं जानता था आप यही करेंगे।"

"तो फिर दादा?" त्रिपाठी बैठ गया।

"मैं चाहता हूं कि आप इस पर इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट लिखें।" सरोज जी बड़ी गंभीरता से बोले।

"दादा, इनवेस्टिगेटिव  तो संजय जी ही करते हैं।" त्रिपाठी पूरी तन्मयता और विनम्रता से बोला।

"मैं चाहता हूं कि यह आप ही करें।" सरोज जी बोले, "यह संजय के मान का नहीं है। ई अभी पूरा लखनऊ नहीं जानते तो काव देखेंगे, काव लिखेंगे।"

"हम बता देंगे दादा! और लखनऊ भी इस बहाने ये देख लेंगे।" त्रिपाठी पूरी आदर से बोला।

"नहीं, हम चाहते हैं कि यह रिपोर्ट आप ही लिखें।" सरोज जी आदेशात्म लहजे में बोले, "और इसके लिए महापालिका आप न जाएं, बल्कि मुहल्ला-मुहल्ला घूम कर सर्वे करें कि कितने मेनहोल खुले हैं, उनकी गिनती करें जितने दिन लगे, लगा लें। और फिर रिपोर्ट लिखें। आप चाहें तो इस बीच दफ्तर भी न आएं। और पूरे मनोयोग से लग जाएं।"

"अच्छी बात है दादा!" हाथ जोड़ता हुआ त्रिपाठी बोला और उठने लगा।

"आप समझ गए न सब?" सरोज जी ने पूछा।

"बिलकुल दादा!"

"श्योर!" सरोज जी जैसे आश्वस्त हो लेना चाहते थे कि पासा ठीक पड़ा है कि नहीं।

"श्योर दादा!" त्रिपाठी की बिसात फिर बिछ गई थी। संजय समझ गया। इस खेल में भी सरोज जी की मात पक्की है।

"तो कब से?" सरोज जी ने पूछा।

"आज ही से।" त्रिपाठी बोला, "बल्कि अभी से।"

"गुड!" सरोज जी विजयी भाव से बोले, "बस लग जाओ प्यारे!" उन्होंने जोड़ा, "बहुत अच्छी स्टोरी बनेगी!"

"सब्जेक्ट ही बहुत अच्छा है!" त्रिपाठी फिर बड़ी विनम्रता से बोला।

सरोज-त्रिपाठी का यह संवाद सुन कर संजय का दिमाग घूम गया। उसने सोचा कि किन कंजड़ों के बीच आकर फंस गया वह।

थोड़ी देर बाद उसने देखा त्रिपाठी जनरल डेस्क पर बैठा एक हाथ से सर टेके दूसरे हाथ से दाढ़ी नोच रहा है। मनोहर उसकी यह दशा देख कर पूछ बैठा, "क्या हो गया पंडित जी?"

"पूछिए मत।" त्रिपाठी सरोज जी को गाली देते हुए बोला, "साले बुड्ढे ने आज फंसा ही दिया।"

"क्यों क्या कर दिया?"

"कितने मेनहोल लखनऊ शहर में खुले हैं, आप बता सकते हैं?" त्रिपाठी बिफरा।

"अपने मुहल्ले का बता सकता हूं। अपने आने-जाने के रास्ते का बता सकता हूं।" मनोहर ने मजाक किया, "क्यों मेनहोल में कूदने की तैयारी है?"

"फिलहाल तो लगता है, यही करना पड़ेगा।"

"बात भी बताएंगे पंडित जी कि पहेलियां ही बुझाते रहेंगे।" मनोहर अब गंभीर हो गया था।

"बात यह थी कि शहर में कितने मेनहोल खुले हैं सर्वे करके, इसकी गिनती करके, "इनवेस्टिगेटिव" रिपोर्ट लिखनी है।"

"बस!" मनोहर कुर्सी खींच कर बैठता हुआ बोला, "तो फिर पंडित जी आज से आपकी मौज है।"

"यहां नौकरी की पड़ी है और आपको मौज की पड़ी है।" त्रिपाठी बोला, "दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा है। बॉस कुछ आप ही बताइए।"

"बता तो रहा हूं।" मनोहर चहका।

"मजाक छोड़िए।"

"मजाक नहीं, वेरी सिरियसली।" मनोहर बोला, "हरामीपने की एसाइनमेंट के साथ हरामीपने वाला ट्रीटमेंट करिए।" उसने चुटकी बजाई, "वेरी सिंपल। महापालिका से आंकड़ा लीजिए कि कितने मेनहोल हैं। जितने मेनहोल हों उनमें से सिक्सटी, या सेवेंटी परसेंट खोल डालिए, और इतने खुले ही रहते हैं, खास-खास मुहल्लों, रास्तों के नाम खोंसिए। इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट तैयार! और हफ्ते भर सर्वे करिए सिनेमाहालों में। आपकी तो बस मौज ही मौज!"

"मान गए भई।" कह कर त्रिपाठी उठ गया।

"चाय भी नहीं पिलाएंगे। मनोहर बोला, आखिर इतनी बढ़िया सलाह दी है।"

"अगले हफ्ते।" कह कर त्रिपाठी निकला तो सचमुच अगले हफ्ते ही आया।

वह रोज सिनेमा देखता, या इधर-उधर घूमता, शराब पीता और शाम को ही सरोज जी को फोन कर देता और किसी दूर के मुहल्ले का नाम बताता और कहता आज इसी इलाके में हूं। साथ ही आंकड़ा भी बता देता कि इतने मेनहोलों में से इतने मेनहोल खुले हैं, इतने चोक है, पब्लिक परेशान है, इतनी दुर्घटनाएं हुई हैं वगैरह-वगैरह। इधर से सरोज जी कहते, "बस लगे रहो प्यारे!"

यही सिलसिला जब रोज का हो गया तो एक दिन सरोज की समझ में आ गया कि त्रिपाठी उन्हें बना रहा है।

वह बोले, "आप ऐसा करिए कि दफ्तर आ जाइए। अभी।"

"पर अभी कई महत्वपूर्ण इलाके बाकी है दादा!" त्रिपाठी ने मक्खन लपेट कर कहा, "वहां की गिनती अभी बाकी है।"

"आप गिनती छोड़िए और आफिस आइए। तुरंत!"

"पर मैं बहुत दूर से बोल रहा हूं, चौक इलाके में ठाकुरगंज से।"

"आप जिस भी इलाके से बोल रहे हों, अभी आइए तुरंत हमें रिपोर्ट कीजिए।" कह कर सरोज जी ने फोन रख दिया, और चपरासी बुला कर समझा दिया कि, "त्रिपाठी ज्यों आएं, उन्हें अंदर भेजो।"

सरोज जी बड़ी देर तक त्रिपाठी को पूछवाते रहे, पर त्रिपाठी नहीं आया। काफी देर बाद त्रिपाठी बिलकुल लुटा-पिटा सा दफ्तर में दाखिल हुआ। चपरासी ने उसे बता दिया कि सरोज जी कई बार पूछ चुके हैं और कहा है कि तुरंत अंदर भेज दो।

"अच्छा ठीक है पहले पानी पिलाओ।" कहता हुआ त्रिपाठी कुर्सी में ऐसे धंसा जैसे कितने दिन का थका हुआ हो।

"आ गए प्यारे!" बातचीत सुन कर सरोज जी केबिन से खुद बाहर निकल आए, "कितने मेनहोल खुले हैं?" सुन कर त्रिपाठी ने अपनी जेब से नोट बुक निकाली और बता दिया कि इतने हजार कुल मेनहोल हैं, इसमें से इतने हजार का सर्वे किया जिनमें से इतने हजार खुले हैं, इतने सौ चोक हैं, इतनी दुर्घटनाएं हुई हैं। वह पूरी फेहरिस्त खोल कर बैठ गया।

"गुड!" सरोज जी त्रिपाठी की पीठ ठोंकते हुए बोले, "बस अब लिखी डालो प्यारे।" उन्होंने जोड़ा, "आज की बाटम लीड यही रहेगी।"

"कुछ फोटो-वोटो भी तो करवा लो दादा।" त्रिपाठी टालता हुआ बोला।

"फोटो हो गई है, बस तुम लिख डालो।"

"तो दादा, लिख तो अब आप लो।" त्रिपाठी अपने पांव खुद दबाता हुआ बोला, "मैं तो बहुत थक गया हूं। हां, आंकड़े और मुहल्ले आप नोट कर लीजिए।"

"हूं?" एक लंबी सांस खींची सरोज ने, "तो कल लिख लाना।"

"कल की तो दादा, दे दीजिए छुट्टी। कल आराम करूंगा। बहुत थक गया हूं। अबकी साप्ताहिक अवकाश भी तो नहीं लिया इस मेनहोल के चक्कर में।" कह कर उसने सरोज जी से भी लंबी सांस छोड़ी। और कहा, "दादा इसको अब आप ही लिख लो।"

"अब आपकी लंतरानी हम लिखें!" सरोज हांफने लगे, "जाइए आराम करिए।" और वह अपनी केबिन में घुस गए। त्रिपाठी उठ कर मंद-मंद मुसकुराता अभी चल ही रहा था कि अंग्रेजी वाला एक रिपोर्टर आकर त्रिपाठी को धर बैठा, "बॉस वो मेनहोल वाले आंकड़े हमें भी दे दीजिए और डिटेल्स भी।"

"तो आपको भी यही एसाइन हुआ है?" त्रिपाठी उसकी जेब से सिगरेट निकालता हुआ मुसकुराया।

"नहीं, हमें यूं ही पता चला तो।"

"अच्छा-अच्छा।" त्रिपाठी खेलने के मूड में आ गया। बड़ी विनम्रता से बोला, "हमने आंकड़े और डिटेल्स सरोज जी को दे दिए हैं, खबर वही लिख रहे हैं, उन्हीं के पास चले जाइए।"

"मेनी-मेनी थैंक्स!" कह कर वह अंग्रेजी अखबार का रिपोर्टर सरोज जी की केबिन में घुस गया। उसने सरोज जी से खुले मेनहोल के आंकड़े मांगे। सरोज जी और चिढ़ गए। वह गरजे, "चले जाइए यहां से!" और वह बेचारा उलटे पांव उनकी केबिन से बाहर आ गया। इस तरह सरोज जी के किस्सों में एक मेनहोल का यह किस्सा भी जुड़ गया।

संजय जब नया-नया लखनऊ आया था तो सबसे पहले सरोज जी से ही पाला पड़ा। जिस दिन उसने ज्वाइन किया, संपादक की केबिन में बैठे पहली नजर में वह उसे भडुआ सरीखे लगे थे। खद्दर के सलीकेदार गरम कपड़ों में बैठे बड़े देर तक वह संजय की जी हुजूरी में लगे रहे। तब संजय को पता नहीं था कि यह सरोज जी हैं, इस अखबार में विशेष प्रतिनिधि और रिपोर्टरों के इंचार्ज। इत्तफाक ही था कि संपादक को उसी रोज इलाहाबाद कि बनारस यूनिवर्सिटी के किसी सेमिनार में जाना था। शाम को आई.ए. एस. वर्सेज पी.सी.एस. पर संजय ने उस पहले दिन पहली खबर लिखी और मजबूरन सरोज जी को दी। सरोज जी ने खबर देखी। बोले, "गुड! पहिले ही दिन बड़ी बढ़िया खबर मारि लाए।" पर दूसरे दिन उसने देखा अखबार में वह खबर छपी ही नहीं थी। दूसरी शाम संपादक के वापस आने पर उसने यह बात बताई। तो संपादक ने सरोज जी से कहा, "इनकी खबर रुकनी नहीं चाहिए।"

"आज ही दे देते हैं!" कह कर सरोज जी खिसक लिए! पर खबर उन्होंने नहीं दी तो नहीं दी। संपादक ने भी कहा, "जाने दीजिए।" पर सरोज जी तब से संजय की चमचई में लग गए। उन दिनों संजय प्रेस क्लब में ठहरा हुआ था। यह जानकर सरोज जी ने बड़ी चिंता जताई। बोले, "हम आपको मकान दिलवाते हैं। फर्स्ट क्लास, वो भी सरकारी।" वह संजय को लेकर यहां वहां लोगों से मिलवाने लगे। मुख्यमंत्री के यहां भी सरोज जी उसे ले गए। मुख्यमंत्री के यहां सरोज जी जब लगातार संजय की तारीफ करते रहे और रह-रह याद दिलाते रहे कि दिल्ली से आए हैं। "बहुत काबिल बहुत तेज।" जैसे अलंकरण भी लगाते रहे। और जब बहुत हो गया तो मुख्यमंत्री ने कहा, "मैं जानता हूं सरोज जी।" इसके बाद संजय को सरोज जी के बारे में पता चला कि सरोज जी त्रिपाठी से आपरेट हो रहे थे और भीतर ही भीतर उसे काटने में लगे थे। त्रिपाठी ने सरोज जी को समझा दिया था, "संजय कंपनी के चेयरमैन यानि मालिक का आदमी है और इसे गिराया नहीं दादा तो आप की कांग्रेस बीट, आपका रुतबा और कुर्सी खा जाएगा।" त्रिपाठी ने सरोज जी को बता दिया था कि, "आखिर इसे दिल्ली से लाया ही इसीलिए गया है कि आपको काटा जा सके।"

सरोज जी के साथ एक बड़ी कमजोरी यह थी कि उनसे चाहे जो बीट ले ली जाए पर कांग्रेस नहीं। कांग्रेस को कवर करके वह खुद को सत्ता में बैठा हुआ पाते थे। और उनको लगता था कि एक न एक दिन वह एम.एल.सी. जरूर बन जाएंगे। उनकी जिंदगी के दो सपने बाकी रह गए थे, एक संपादक बनने का सपना, दूसरा एम.एल.सी. बनने का सपना। और इसकी खातिर कोई इनके मुंह पर थूक भी दे तो भी वह उसे पोंछ कर फिर से तरो ताजा खड़े मिलते। तो कांग्रेस बीट उनकी विवशता, उनकी जरूरत, उनका सपना थी। वह उनसे कोई छीन ले, उन्हें किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं था, मंजूर नहीं था। जाने यह उनकी विवशता थी, आदत थी, नियति थी, वह संजय के खिलाफ पहले ही दिन से साजिश में शामिल हो गए थे। पर साथ ही वह यह भ्रम भी जीते रहते कि संजय चेयरमैन का आदमी है सो सलीके से पेश आते। जिस दिन सरोज जी संजय को मुख्यमंत्री से मिलवा कर लाए, पूरे दफ्तर में इसकी चर्चा फैल गई। क्योंकि सरोज जी के चरित्र से यह परे था। कहा जाता है कि वह किसी के कटे पर पेशाब भी नहीं करने वाले आदमी थे। जैसे कि एक बार एक प्रेस कर्मचारी उनके घर के पास किसी विवाद में पड़ा गया तो उसने अपने को प्रेस का बताया और तसदीक के लिए सरोज जी का नाम ले लिया कि चाहें तो उनसे पूछ लें। उसे सरोज जी के घर ले जाया गया। पर सरोज जी ने उसे पहचानने से साफ इंकार कर दिया। नतीजतन उस कर्मचारी पर शामत आ गई। उसकी बड़ी पिटाई हुई जबकि सरोज जी उसे बहुत अच्छी तरह जानते थे। ऐसे ही एक बार एक दादा किस्म के रिपोर्टर मिश्रा ने सरोज जी से कुछ कहासुनी के बाद उन्हें सीढ़ियों पर से ढकेल दिया तो विनय ने मिश्रा से टोका टाकी की। मिश्रा ने विनय को पीट दिया। विनय ने शिकायत की। जांच शुरू हुई। जांच के दौरान विनय ने बताया कि मिश्रा ने सरोज जी को सीढ़ियों से ढकेल दिया था, सरोज जी की धोती खुल गई, मुंह फूट गया। सरोज जी चूंकि बुजुर्ग हैं, उनकी मदद करना उसका फर्ज था सो उसने मिश्रा को टोका। टोकने पर मिश्रा ने उसकी पिटाई कर दी। साक्ष्य के लिए सरोज जी बुलाए गए। सरोज जी ने बयान दिया कि उनको किसी ने कभी सीढ़ियों पर से ढकेला ही नहीं। रही बात मुंह फूटने की तो वह घर में बाथरूम में फिसल कर गिर गए थे। विनय खिसिया कर रह गया। सरोज जी दरअसल थे ही बड़े विचित्र जीव। एक बार मनोहर, प्रकाश और संजय शाम को दफ्तर के बाहर गेट पर बैठे सड़क पर आती जाती औरतों को घूर रहे थे। मनोहर बोला, "अगर इन औरतों की देह पर कोई केमिकल लगा कर जांच की जाय तो सबसे ज्यादा संजय की आंख के निशान मिलेंगे।" प्रकाश ने पूछा, "कैसे?"

"देख नहीं रहे हो कि कोई औरत आ रही है तो जहां तक इसकी आंख का कैमरा पहुंचता है, वहीं से यह उस औरत को रिसीव करता है और जहां तक इसकी आंख का कैमरा पहुंचता है, पलट कर पूरा लांग शाट लेते हुए उसे सी आफ करके ही छोड़ता है।" मनोहर अभी बतिया ही रहा था कि सरोज जी आते दिख गए। प्रकाश बोला, "लो संजय, एक नई चीज रिसीव करो।" संजय ने सरोज जी को देखा और कहा, "क्या बेवकूफी की बात करते हो।" फिर भी तीनों सरोज जी की ही ओर देखने लगे। सरोज जी हरदम पैदल ही सारा लखनऊ धांग मारते थे। उस दिन भी पैदल ही खड़बड़-खड़बड़ चले आ रहे थे। बिलकुल किसी खच्चर की तरह। जब तक करीब आ गए तो तीनों ने एक साथ सरोज जी को नमस्कार किया। पर सरोज जी उन तीनों के नमस्कार की परवाह किए बगैर आगे बढ़ गए। ऐसे जैसे उन्होंने उन तीनों को देखा ही न हो। वह कुछ दूर आगे बढ़े ही थे कि अचानक एक आदमी दूसरी तरफ से बड़ी तेजी से हाथ उठाए आया और पलट कर सरोज जी की पीठ पर कस कर हाथ मारा। सरोज जी पर उसका प्रहार इतना जबरदस्त था कि सरोज जी लड़खड़ा गए, लगा कि वह गिर जाएंगे। मनोहर, प्रकाश और संजय तीनों सरोज जी के तरफ दौड़े। पर दृश्य फिर दंग करने वाला था, सरोज जी ने पलट कर पीछे देखा ही नहीं, वह ऐसे आगे बढ़ गए, जैसे उनके साथ कुछ घटा ही नहीं, जबकि उनके पीछे तब तक ठीक-ठाक भीड़ इकट्ठी हो गई थी। सड़क पर जो जहां था, दौड़ कर आया। मनोहर चिल्लाया भी, "सरोज जी!" पर सरोज जी उसे भी अनसुना कर दफ्तर के गेट में घुस गए। बाद में पता चला कि सरोज जी की पीठ पर मारने वाला एक पागल किस्म का आदमी था, जो जब तब किसी न किसी को मार देता था। एक पान वाले ने यह बताया तो मनोहर उबल पड़ा, "पर सरोज जी को तो यह बात नहीं मालूम कि वह पागल है, और कि पागल ने ही मारा है। हम लोग तो उनके लिए दौड़ कर गए। पर उन्होंने पलट कर देखा तक नहीं।" मनोहर बड़ी देर तक नाराज रहा। उसकी नाराजगी इस पर थी कि सरोज जी के चक्कर में अभी-अभी सुलगाई सिगरेट भी उसे फेंकनी पड़ी थी।

खैर, उस दिन जब सरोज जी संजय को मुख्यमंत्री से मिलवा कर आए तो पूरे दफ्तर में यह चर्चा पूरे शबाब पर थी। हर कोई संजय से यही पूछता रहा, "सुना है सरोज जी मुख्यमंत्री से मिलवा लाए?" सुन-सुन कर संजय के कान पक गए। सिर्फ मनोहर ने सवाल बदला। बोला, "मुख्यमंत्री ने तुमको केला खिलाया कि नहीं?"

"क्या मतलब?" संजय बिदका।

"इसमें नाराज होने की क्या बात है?" मनोहर ने जोड़ा, "सरोज जी को तो मुख्यमंत्री केला खिलाते हैं।"

"आप लोग भी!" संजय बिफरा, "मैं प्रधानमंत्री से मिल चुका हूं।" वह बोला, "तो फिर मुख्यमंत्री से मिलना कौन सी बड़ी बात है, मैं अकेले भी मिल सकता था, गलती हुई जो सरोज जी के साथ चला गया।" उसने जोड़ा, "बाई द वे मुख्यमंत्री मुझे दिल्ली से ही जानते हैं। मैं पहले भी उनसे कई बार मिल चुका हूं। वह कोई टैबू नहीं हैं।"

"मैंने कब कहा टैबू हैं और कि तुम मिल नहीं सकते।" मनोहर खेलने के मूड में था, "मैंने तो सिर्फ यह पूछा कि मुख्यमंत्री ने तुम्हें भी केला खिलाया कि नहीं?"

"यह केले की क्या कहानी है?" संजय बोला, "जरा बताइए तो सही।" वह अब सहज हो रहा था।

"बताइए पंडित जी। इनको सरोज जी को मुख्यमंत्री द्वारा केले खिलाने की कहानी सुनाइए।" मनोहर ने वहीं बैठे त्रिपाठी से कहा। और अपने आगे रखी खबरें जांचने लगा।

"यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है।" त्रिपाठी बोला, "छपी हुई है, बकलम सरोज जी। चाहो तो पुरानी फाइल निकाल कर देख सकते हो।" त्रिपाठी नमक मिर्च लगा कर चालू हो गया, "हुआ यह कि पिछले चुनाव में सरोज जी मुख्यमंत्री के साथ हेलीकाप्टर में उनके चुनाव क्षेत्र की रिपोर्ट करने गए। अब चूंकि उन्हें रिपोर्ट में चुनावी गणित बताने से ज्यादा जरूरी लगा कि वह मुख्यमंत्री के साथ हेलीकाप्टर में गए, यह बताएं।" सो उन्होंने आधी रिपोर्ट में हेलीकाप्टर वर्णन किया। उसमें यह भी जिक्र किया कि वह मुख्यमंत्री के बगलगीर थे। मुख्यमंत्री जब केला खाने लगे तो सरोज जी से अनुरोध किया कि "ले लीजिए।"

"नहीं। आप खाइए।" सरोज जी ने कहा।

"ले लीजिए।" मुख्यमंत्री उवाच।

"नहीं, आप।" कह कर सरोज जी सकुचाए।

"ले लीजिए सरोज जी।" मुख्यमंत्री का फिर अनुरोध।

"नहीं।" सरोज जी फिर सकुचाए।

"अब ले भी लीजिए सरोज जी।" इस तरह मुख्यमंत्री ने जब बहुत जोर दिया तो सरोज जी पिघल गए और जैसा कि उन्होंने रिपोर्ट में लिखा, "और मैंने केला ले लिया।" त्रिपाठी सारा वाकया बताते हुए बोला, "अक्षरश: सत्य है।" उसने जोड़ा, "सरोज जी ने जो अपनी रिपोर्ट में लिखा है।"

"अब तुम बताओ कि मुख्यमंत्री ने तुम्हें भी केला खिलाया कि नहीं?" मनोहर खबरे जांचता हुआ बोला।

"मैं कोई हेलीकाप्टर में तो मुख्यमंत्री से मिला नहीं?" संजय भी खेल में शामिल होता हुआ बोला। और उठ कर वहां से चलने लगा। बोला, "जब हेलीकाप्टर में मिलूंगा तो खा लूंगा।"

"मुख्यमंत्री का केला!" त्रिपाठी डबल मीनिंग डायलाग पर आ गया। पर संजय ने उसे टोका नहीं। अलबत्ता उसे रीना की याद आ गई जो अक्सर उसे टोकती रहती, "डबल मीनिंग नहीं!" संजय अभी सोच ही रहा था कि त्रिपाठी फिर बोला, "केला खा लेना तो बताना जरूर। चुपचाप गोल मत कर जाना।"

"क्या?" मनोहर ने टोका।

"वही मुख्यमंत्री का केला!" त्रिपाठी मनोहर से आंख मारता हुआ बोला।

संजय को बार-बार त्रिपाठी का "मुख्यमंत्री का केला" कहना बुरा लगा पर वह उलझने के बजाय वहां से चुपचाप चल दिया। चलते-चलते उसने सोचा कि त्रिपाठी या तो बहुत बढ़ा चढ़ा कर सरोज जी की रिपोर्ट और "मुख्यमंत्री का केला" बखान रहा है या फिर सरोज जी ने रिपोर्ट ही बहुत बढ़ा चढ़ा कर लिखी होगी। अब त्रिपाठी और सरोज जी दोनों ही चूंकि एक ही डाल के पत्ते थे, एक ही मानसिकता, एक ही सोच और एक ही सिक्के के दो पहलू थे, इसलिए दोनों में से कौन अति पर है यह तय कर पाना संजय को मुश्किल लगा। साथ ही उसने सोचा की सरोज जी तो कुछ भी कर सकते हैं। कभी भी, कुछ भी। सारी कल्पनाओं, परिकल्पनाओं और परंपराओं को धूल चटा सकते हैं।

संजय को लखनऊ आए अभी गिनती के कुछ ही दिन हुए थे। सरोज जी ने जबसे उसकी पहले ही दिन, पहली खबर रोकी थी, बेवजह ही, तब ही से वह उनके प्रति पूर्वाग्रही हो गया था। वह उनको एक बेवकूफ से ज्यादा कुछ नहीं समझता था। इस बात का वह सरोज जी को पूरी कोशिश करके एहसास भी दिला देता था और बार-बार। उसके व्यवहार में क्षण-क्षण सरोज जी के प्रति उपेक्षा उपजती रहती। वह ऐंठा-ऐंठा सा पेश आता उनसे। जाहिर है सरोज जी को यह सब हरगिज नहीं सुहाता था। संजय के सामने यदा-कदा वह भी अकड़ जाते। संजय फिर भी उनकी परवाह नहीं करता। सरोज जी ने संपादक से उसकी शिकायत भी की तो संपादक ने उनसे कह दिया कि, "कोई काम करने वाला आदमी आता है तो उसके भी पीछे मत पड़ा करिए सरोज जी।" सरोज जी को यह बात लग गई। पहले तो वह ऐंठे। पर फिर उनके मन में संजय के प्रति जाने कहां से स्नेह उमड़ आया। दरअसल सरोज की खूबी कहिए या खामी वह यही थी कि वह कब आप पर कृपालु हो जाएं और कब कुपित कुछ ठिकाना नहीं होता था। पता चला कि सबुह वह आप पर ढेर सारा स्नेह उडेल दें और उसी शाम वह आप पर बरस पड़ें, सरेआम आपको बेइज्जत कर दें। यह अंतराल सुबह से शाम के बजाय पांच मिनट का भी हो सकता था। फोटोग्राफर सुनील कहता भी था कि, "दादा को तो चढ़ने के लिए हर हफ्ते एक आदमी चाहिए। बिना इसके उनकी भांग हजम नहीं होती।" सुनील चूंकि स्ट्रिंगर फोटोग्राफर था इसलिए सरोज जी को सबसे गरीब वही मिलता और अक्सर वह अपनी भांग उसी पर बरस कर हजम करते। वह सुनील से कभी चांदनी रात में गोमती नदी की फोटो तो कभी सावन में नाचते मोर की फोटो मांगते ही रहते जो वह कभी दे नहीं पाया। सुनील जो एक पूर्व विधायक का बेटा था और सरोज जी के ही जिले का रहने वाला था। सो सरोज जी अपने जिले का होने के नाते उस पर कभी तो स्नेह बरसाते तो कभी कुपित होकर उसकी ऐसी तैसी कर डालते। कह देते, "अब आप ऐसे नहीं चल पाएंगे हियां।" लगभग ऐसे उस रोज संजय से वह बोले, "आइए आज आपको हम दिखाएं कि लखनऊ में हमारी कितनी प्रतिष्ठा है!" उनके इस कहने में स्नेह भी था और कोप भी। स्नेह इस बात के लिए था कि "आइए आप लखनऊ में हमारी प्रतिष्ठा देखिए" और कोप इस बात के लिए था कि "तुम हमें कुछ समझते क्यों नहीं हो?"

संजय को लखनऊ आए चूंकि गिनती के ही कुछ दिन हुए थे। और सरोज जी का व्यवहार घटते बढ़ते चंद्रमा की तरह लगातार उन्हें पहेली बनाता जा रहा था इसलिए सहसा उनका यह आमंत्रण पाकर वह उलझन में पड़ गया कि वह क्या करे? पूछा, "बात क्या है सरोज जी?" सरोज जी को संजय की यह बात भी बहुत बुरी लगती थी कि वह उन्हें "सरोज जी" क्यों कहता है? और सबकी तरह, "दादा" क्यों नहीं कहता? पर सरोज जी आज यह सारी शिकायत जैसे भूल जाना चाहते थे। कुर्सी में धंसे बैठे, गर्दन धंसाए बोले, "एक सम्मान समारोह है, वहीं आपको ले चलना चाहता हूं।"

"आपका है?" पूछते हुए संजय ने अपने शब्दों में थोड़ी सी मिठास घोली और बोला, "बधाई हो।"

"नहीं।" सरोज जी थोड़ा मायूस हुए, मुसकुराए, खिसियाते हुए बोले, "मुझे अध्यक्षता करनी है।" कह कर उन्होंने जेब से एक कार्ड निकाला और संजय की ओर बढ़ा दिया। संजय ने कार्ड देखा और मेज पर रखते हुए कहा, "सरोज जी आपको इस समारोह में नहीं जाना चाहिए।"

"क्यों?" सरोज जी अचकचा गए।

"आप वहां जाकर अपनी बेइज्जती करवाएंगे।" संजय ने साफ तौर पर कह दिया।

"अइसा काव हो गया?" सरोज जी जिज्ञासा में मुंह बाकर बोले। लगा जैसे उनके प्राण निकल जाएंगे।

"आप इस व्यक्ति को जानते हैं जिसका सम्मान हो रहा है?" संजय ने पूछा।

"हां।" सरोज जी हड़बड़ाए, "कवि है।"

"कवि नहीं है वह, यही तो बात है।" संजय बोला, "कविता के नाम पर कलंक है यह।"

"हुईं!" सरोज जी चौंक पड़े। बोले, "आप कइसे जानते हैं?"

"यह जो महेंद्र मधुकर है, हमारे जिले का ही है।" संजय बोला, "इसलिए जानता हूं और अच्छी तरह जानता हूं।"

"तो इ कवि नहीं है?"

"बिलकुल नहीं है।"

"पर हमको तो कविता की अपनी किताब दई गया है।" सरोज जी ने आंखें चौड़ी कर यह बात ऐसे कहीं जैसे कोई पानी की थाह लेने के लिए उसमें कंकड़ फेंके।

"हां, दे गया होगा।" संजय बोला, "चार कविताओं में गोता मार कर कविता निकाल लेने में महारथ है उसे।"

"मतलब कविता लिखता है?" सरोज जी खुश होते हुए बोले, "अऊर ई गोतामारी तो बहुत कवि करते हैं। बड़े-बड़े कवि, महाकवि करते हैं।"

"हां, पर वह महाकवि लोग अंग्रेजी में गोतामारी करते हैं। पर यह तो हिंदी में ही गोतामारी करता है। कभी-कभी तो पूरी की पूरी कविता ही कुछ शब्दों के हेर फेर के साथ पार कर लेता है।" संजय बोला, "बात यहीं तक हो तो गनीमत हो। पर यह मधुकर तो कवि सम्मेलनों में आप मंच पर बैठे रहिए, आपके सामने ही आपकी कविता पढ़ डालेगा, खूब वाहवाही लूटेगा और वापस आकर आपके पांव छू लेगा कह देगा कि भाई साहब क्षमा कीजिएगा जरूरत पड़ गई थी। और कभी-कभी तो आपकी कविता आप ही को समर्पित कर पढ़ डालेगा।"

"हुईं।" सरोज जी बिदके, "बड़ा रागिया है।"

"और आप उसके सम्मान समारोह में अध्यक्षता करने जा रहे हैं।" संजय ने जोड़ा, "वह कविताओं की चोरी तो करता ही है, निजी जिंदगी भी उसकी छल, कपट, धूर्तई और नीचता से सनी पड़ी है।"

"संजय जी आपको चलना तो पड़ेगा एह समारोह में।" सरोज जी बड़े आग्रह के साथ बोले, "ई समारोह में खाली महेंद्र मधुकर का सम्मान भर नाहीं है। एहमां शहर के अऊर भी बहुत लोगों का सम्मान होना है।" उन्होंने जोड़ा, "सिर्फ एक आदमी के गड़बड़ होने भर से पूरा समारोह तो गड़बड़ नहीं हो जाएगा।"

"तो आप जाएंगे इस समारोह में?"

"जाना तो पड़ेगा।" सरोज जी बोले, "सब अपने शिष्य हैं। बड़े आग्रह से बुलाए गए हैं। नहीं जाएंगे तो उनका दिल टूट जाएगा।" कह कर वह कार्ड उठा कर दिखाने लगे, "अब नाम भी हमारा छाप दिया हे। हम नहीं जाएंगे तो बेचारे उदास हो जाएंगे। फिर ऐन वक्त पर कहां ढूंढेंगे अध्यक्ष?" कह कर सरोज जी ने आंखे गज भर फैला दीं, "अब जाना तो पड़ेगा।"

"आप जाइए, पर मैं नहीं चलूंगा।" संजय खिन्न होकर बोला।

"नहीं संजय जी, आपको भी चलना पड़ेगा।" कह कर सरोज ने उसका हाथ थाम लिया। संजय विवश हो गया। आदत और रवायत के खिलाफ सरोज ने रिक्शा रोका, संजय से

"पहले आप, पहले आप" कह कर रिक्शे पर बिठाया, खुद बैठे और लाल बारादरी जो समारोह स्थल था, बताकर रिक्शे वाले से बोले, "चलो।"

रिक्शा चल पड़ा।

रास्ते भर दोनों चुप रहे। सरोज जी मारे खुशी के और संजय मारे खिन्नता के।

खिन्न था वह महेंद्र मधुकर के सम्मान समारोह में जाते हुए। मधुकर जो सिरे से फ्राड था। संजय ने महेंद्र मधुकर को पहली बार अपने शहर के एक रेस्टोरेंट में देखा था। तब वह पढता था, तभी एक लड़की से प्यार में मुब्तिला उसे कविता से भी मुहब्बत हो गई थी। वह कविताएं तो लिखने ही लगा था, बातचीत भी वह कविताओं, शेर और मुक्तकों में करता था। कविताओं का जुनून सा सवार था उस पर उन दिनों। वह इमर्जेंसी के दिन थे। इमर्जेंसी के दिनों में आलम यह था कि कवि अपनी घुटन और हताशा साफ-साफ बयान करने के बजाय प्रेम कविताओं की शरण लेते थे। इमर्जेंसी की ज्यादतियों को बिंबों में बांधकर वह प्रेमिका की ज्यादतियों ढालते और प्रतीकात्मक विरोध दर्ज करते। यह जैसे उन दिनों की कविताओं की परंपरा हो गई थी। कवि, प्रेमिका की आंखों में प्यार, उपेक्षा, उदासी, खुशी देखने के बजाय उसकी आखों के अंगार, अहंकार और फट पड़ने वाला आसमान देखते और आह भरते हुए उसे ऐसे दुत्कारते जैसे व्यवस्था को, इमर्जेंसी को ललकार रहे हो। पर सब कुछ बिंबों, प्रतीकों में। साफ-साफ कुछ भी नहीं। उन दिनों विशुद्ध प्रेम कविताएं लिखने वालों की भी इस चक्कर में दुर्गति हो जाती। जैसे एक बार संजय की खुद की दुर्गति हो गई। आकाशवाणी द्वारा आयोजित एक स्टूडियो गोष्टी में जब उसने एक लंबी प्रेम कविता की पांच-सात पंक्तियां ही पढ़ी "आंखें/तुम्हारी आंखें/उदास, सूनी बेचैन और बिमार आंखें/जिनमें मैं/एक छोटी सी, उजली सी/खुशी की एक किरन तलाशना चाहता हूं/सिर्फ अपने लिए।" यह पंक्तियां सुनते ही रिकार्डिंग करने वाले अधिकारी ने तुरंत रिकार्डिंग रोक दी। बोला, "यह उदास सूनी, बेचैन बीमार आंखें नहीं चलेंगी।"

"क्यों?" संजय ने पूछा।

"क्योंकि इसमें इमर्जेंसी की आलोचना है।" अधिकारी बोला, "कोई खुशी की कविता हो वह पढ़िए। इसको रहने दीजिए। यह नहीं चलेगी। बिलकुल नहीं।"

"पर इस कविता का इमर्जेंसी से क्या लेना देना? यह तो विशुद्ध प्रेम कविता है!" संजय हैरान होता हुआ बोला। कुछ और साथी कवियों ने संजय की पैरवी की। पर वह अधिकारी नहीं माना। कहने लगा, "दूसरी कविता पढ़िए।"

"पर मेरे पास दूसरी कविता नहीं है।" संजय खीझ कर बोला।

"तो इसी कविता से वह उदास, सूनी, बेचैन जैसे शब्द हटा दीजिए।" वह अधिकारी बोला।

"यह तो नहीं हो सकता।" संजय ने साफ-साफ अधिकारी से कहा।

"क्यों?"

"क्योंकि कविता की ध्वनि उसका मकसद, उसकी बुनावट, शिल्प और उसकी आत्मा मर जाएगी। क्योंकि इस कविता में आगे और भी ऐसे शब्द आएंगे।" संजय बिफरता हुआ बोला, "कहां-कहां और क्या-क्या बदलूंगा?"

"कुछ भी हो।" वह अधिकारी बोला, "यह कविता नहीं चलेगी। मैं अपनी नौकरी खतरे में नहीं डाल सकता।" बात जब नौकरी की आ गई तो संजय चुप हो गया। वह घर जाकर अपनी कविताओं की कापी उठा लाया और उसमें से दो तीन छोटी-छोटी कविताएं उस अधिकारी को दिखाता हुआ बोला, "इनसे तो नौकरी नहीं जाएगी आपकी?"

"नहीं।" कविताएं देखता हुआ वह अधिकारी बोला, "अच्छी है। इन्हें कहीं छपने के लिए भेज दीजिए।"

"छप चुकी हैं धर्मयुग में।" बताते हुए संजय चहका।

"तब तो यह भी नहीं चलेंगी।"

"क्यों?" संजय उबल पड़ा, "अब क्या हो गया?"

"छपी हुई भी नहीं चलेंगी।"

"ओफ!" कह कर संजय ने सिर पकड़ लिया। बोला, "तो फिर मुझे आज्ञा दीजिए। क्योंकि इस कापी में लिखी लगभग सारी कविताएं कहीं न कहीं छपी हुई हैं।" वह अधिकारी अंतत: मान गया कि, "कोई भी कविता पढ़ दीजिए। बस इमर्जेंसी का विरोध नहीं।" उस दिन उसने देखा कि बाकी तीन कवियों में से दो ने परिवार नियोजन, पेड़ लगाने जैसे नारों पर "कविताएं" गा-गा कर पढ़ीं और तीसरे ने कइन, गौरेया, फूल, पत्ते जैसी बिंब विधान वाली कविताएं पढ़ीं।

सचमुच उन दिनों कविताओं की तो छोड़िए सार्वजनिक जगहों, चाय या पान की दुकानों पर इमर्जेंसी या सरकार के खिलाफ कुछ कहना, या कोई भी उत्तेजित करने वाली बात करना गुनाह क्या अपराध माना जाता था। उन तनाव और घुटन भरे दिनों में यह महेंद्र मधुकर उस रोज रेस्टोरेंट में सिगरेट फूंकता एक के एक खौलते हुए शेर सरेआम सबको सुना रहा था। उसके शेर सुनने वालों की संख्या दो से चार, चार से दस, दस से बीस होती जा रही थी। वह शेर भी गजब के पढ़ रहा था और बिलकुल झूमके, "कैसे-कैसे मंजर सामने आने गले हैं/ गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं/अब तो इस तालाब का पानी बदल दो/ये कंमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।" शेर बिलकुल ताजा हवा के झरोंके की मानिंद थे। संजय और उसके साथी महेंद्र मधुकर की बेंच के पास जाकर खड़े हो गए। वह शेर पढ़े जा रहा था, "सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए/मेरे सीने में हो या तेरे सीने में सही हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।"

संजय और उसका साथी राय, मधुकर से बड़ा प्रभावित हुए। और उससे बड़ी गर्मजोशी से मिले। राय ने कहा, "बड़ी हिम्मत का काम है इस तरह खुलेआम ऐसे शेर पढ़ना। हम लोग आपको बधाई देना चाहते हैं।" कहते हुए राय ने पूछा, "यह शेर बाई द वे हैं किसके?"

"ये खुद ही मशहूर कवि हैं।" मधुकर के पास बैठा एक मरियल सा व्यक्ति उसकी तारीफ करता हुआ बोला। "खाकसार को महेंद्र मधुकर कहते हैं।" वह राय की ओर हाथ बढ़ाते हुए बोला, "आप साहबान की तारीफ?"

"हम लोग छात्र हैं। यूनिवर्सिटी में हैं।" कहते हुए राय ने फिर पूछा, "यह शेर किसके हैं?"

मैं अपने ही पढ़ता हूं। सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए मधुकर ने बोला, "दूसरों के शेर पढ़ना मेरी आदत नहीं। अपनी तौहीन समझता हूं।"

"तो आपको डबल बधाई।" राय मधुकर से दुबारा हाथ मिलाते हुए बोला, "एक इतना जिंदा, धड़कता हुआ शेर लिखने के लिए, दूसरे इस तरह इसे सरेआम सुनाने के लिए।" राय ने जोड़ा, "इसके लिए बड़ा भारी कलेजा होना चाहिए। बधाई, बहुत-बहुत बधाई।"

"शुक्रिया।" दोनों हाथ जोड़कर माथे से लगाते हुए मधुकर बोला, "यहां तो खून से लिखते हैं, और आवाम की धड़कन बन जाती हैं।" उसने जोड़ा, "आवाम जो चाहती है उससे दो कदम आगे की हम सोचते हैं, खून पसीना जलाते हैं तब जाकर कहीं एक रचना कागज पर शक्ल अख्तियार करती है। हम उसे खून पसीने से सींचते हैं, अपने आपको निचोड़ डालते हैं तब कहीं जाकर आप सबकी "वाह-वाह" मिलती है।" कह कर उसने माथे पर आया पसीना रूमाल से पोंछा और लगे हाथ उसने तीन शेर और सुना दिए, "आहों में जो पाया है गीतों में दिया है/इसपर भी सुना है कि जमाने को गिला है/हम फूल हैं औरों के लिए हैं खुशबू/अपने लिए ले दे के बस इक दाग मिला है।" सुनाते हुए वह बोला, "शेर सुनिएगा कि, जो साज से निकली है वह धुन सबने सुनी है/ जो तार पे गुजरी है, वो किस दिल को पता है।" सुना कर वह अभी कुछ बोलता कि एक मजनूनुमा बूढ़ा झूमा। बोला, "यह तो फिल्मी गाना है। तलत महमूद ने गाया है।"

"हां, पर लिखा साहिर लुधियानवी ने है।" मधुकर ने तुरंत पैंतरा बदल लिया, "और क्या लिखा है साहब कि, जो तार पे गुजरी है वो किस दिल को पाता है?" वह बोला, "तो साहब, यह हम कवियों का दिल ही जानता है कि कहां-कहां से गुजर कर, क्या-क्या जी कर लिखना पड़ता है।" रूमाल से पसीना पोंछते हुए वह बोला, "फिर भी हमें दाग मिलता है, क्योंकि हम फूल हैं। और फूल कि नियति है सबको खुशबू देना। और अपने हिस्से दाग लेना।"

"अच्छा परिभाषित किया है आपने।" संजय बोला, "और आपके कहने का अंदाज भी खूब है।"

"आप नौजवानों से मिल कर खुशी हुई।" कहते हुए उसने सिगरेट का लंबा कश खींचा और उतना ही लंबा धुआं भी फेंका। बोला, "कभी घर पर मिलिए।" उसने अपना पता भी लिख कर दिया। और कहा कि, "कभी आए जरूर खुशी होगी।"

"हमलोग भी कविताएं लिखते हैं।" राय शर्माते हुए बोला।

"तो इसमें शर्माने की क्या बात है?" मधुकर बोला, "कभी किसी कवि गोष्ठी या सम्मेलन में नहीं दिखे आप लोग?" मधुकर उन दोनों को खारिज करता हुआ बोला।

"पर हमारी कविताएं छपी हैं।" कह कर संजय ने कुछ पत्रिकाओं के नाम गिना दिए।

"गुड!" मधुकर बोला, "पर सिर्फ छपने भर से तो काम नहीं चलेगा।" सिगरेट का धुंआ फेंकता हुआ वह बोला, "जनता के बीच आना पड़ेगा। नहीं तो बंद कमरे में कविता लिखने और छप जाने का क्या मतलब है?" वहा बोला, "परसों डॉक्टर साहब के यहां कवि गोष्ठी है। अरे वही होम्योपैथी वाले, उन्हीं के यहां, आप लोग आइए।"

उस गोष्ठी में राय और संजय बड़ी तैयारी से गए। मधुकर ने उन दोनों का वहां उपस्थित कवियों से परिचय कराया। पर संजय ने गौर किया कि किसी ने भी उन दोनों की नोटिस नहीं ली। गोष्ठी क्या थी चू-चू का मुरब्बा थी। दो तीन को छोड़ कर किसी ने कभी कायदे की कोई कविता नहीं पढ़ी। दो तीन कवि तो सरस्वती वंदना में ही लगे रहे। कोई अमराइयों तो कोई गोइयां, सइयां के गीत गाता रहा। संजय ऊब सा गया। संजय और राय ने भी दो-दो कविताएं पढ़ी। यूनिवर्सिटी के एक अध्यापक ने, "बहुत सुंदर, बहुत सुंदर" कहा। पर बाकी "अच्छा प्रयास है।" कह कर चुप हो गए। मधुकर के कविता पढ़ने की जब बारी आई तो राय ने उससे रेस्टोरेंट वाले शेर पढ़ने का अनुरोध किया। कहा कि, "मधुकर जी वही सुनाइए।" पर मधुकर टाल गया। बोला, "जनता के बीच जनता की बात, कवियों के बीच कवियों की बात।" कहते हुए खानाबदोशी पर कविता पढ़ने लगा। गोष्ठी में संजय और राय को बिलकुल मजा नहीं आया। कम से कम जिस तैयारी से वह दोनों गए थे, उस हिसाब से तो बिलकुल नहीं। हां, खाने-पीने की व्यवस्था उन्हें अच्छी लगी।

बाद में मधुकर उन दोनों को कवि सम्मेलनों में भी बुलवाने लगा। कवि सम्मेलनों से पैसा भी मिलता। जो उन दोनों की जेब खर्च के काम आता। कुछ दिनों बाद संजय ने सारिका में वही शेर दुष्यंत कुमार के नाम से छपे देखे जो मधुकर ने उस दिन रेस्टोरेंट में सुनाए थे और खूब दाद बटोरी थी। संजय ने राय को वह पत्रिका दिखाई तो वह बोला, "यह तो साला पक्का चोर निकला।" राय बोला, "चलो आज उसके यहां चलते हैं, उस दिन साले को दाद ही थी, आज खाज दे देते हैं।"

वह दोनों उस शाम मधुकर के यहां वह पत्रिका लेकर पहुंचे तो उसने बड़ी आवभगत की। कुछ देर लिए दोनों उससे असली बात करने से टालते रहे। पर राय ज्यादा देर नहीं टाल पाया। पत्रिका दिखाते हुए बोला, "मधुकर जी आपकी गजले इसमें छपी हैं। पर?"

"पर दुष्यंत कुमार के नाम से छपी हैं।" मधुकर बोला, "वह गजलें हैं ही दुष्यंत की।" उसने सिगरेट का धुआं छोड़ा, "क्या लिखता है, कलेजा निकाल लेता है।"

"पर उस दिन तो आप अपने शेर बता रहे थे।"

"कब कहा कि वह शेर मेरे लिखे हैं?" वह बोला, "हां!" माथे पर हाथ फिराते हुए वह कहने लगा, "वह शेर अब हम सबके हैं, सबकी धड़कन हैं। कोई भी उन्हें पढ़ सकता है, सुना सकता है, क्योंकि हम सब उसी दौर से गुजर रहे हैं, उसी तकलीफ, उसी घुटन, संत्रास और सांघातिक तनाव से गुजर रहे हैं, जिससे वह शेर गुजर रहे हैं। दुष्यंत की आवाज हम सकबी आवाज है।"

"पर मधुकर जी यह तो चोरी है।" राय ने जोर देकर कहा।

"क्या हमने अपने नाम से छपवा लिया?" मुधकर बोला, "शेर पढ़ना चोरी नहीं है। और ये खौलते हुए शेर पढ़ना, सार्वजनिक तौर पर पढ़ना वो भी आज के दौर में आसान है क्या? है किसी का जिगरा, है किसी में हिम्मत? शेर दुष्यंत का सही पर उसे पढ़ कर मैंने लोगों को झिंझोड़ा, यह क्या कम है?" कहते हुए वह बोला, "लो सिगरेट पियो।" और उसने सिगरेट की डिबिया दोनों की ओर बढ़ा दिया।

"नहीं, मैं सिगरेट नहीं पीता।" संजय हाथ जोड़ते हुए बोला।

"सिगरेट नहीं पिएंगे, शराब नहीं पिएंगे और कविता लिखेंगे?" वह आंख मटकाता हुआ बोला, "यह तो नहीं हो पाएगा।" उसने जोड़ा, "मीर, गालिब फिराक फैज सबने पी। बिना पिए का गुजारा नहीं हुआ।"

"हम लोग पीने नहीं, आपकी चोरी की चर्चा करने आए हैं।" राय बोला, "आपको कवि कहलाने का हक नहीं है।"

"तो अब आप हमें कवि होने का सर्टिफिकेट देंगे?" मधुकर उबला, "मैं चोर हूं! अरे कौन साला चोर नहीं है?" वह पसीना पोंछता हुआ बोला, "यें पंत, निराला, अज्ञेय किस-किस को चोर कहेंगे आप? इन लोगों ने सीधे-सीधे बायरन, इलियट, मिल्टन और जापानी हाइकूज पार कर दी हैं और मशहूर हो गए। जाने कहां-कहां डुबकी मार-मार कर, पानी-पी-पी कर हिंदी साहित्याकाश में एक से एक कवि, महाकवि दुकान लगाए बैठे हैं। आप लोग, जिनको हमने ही पैदा किया, हमने ही शहर में लोगों से मिलाया, वही लोग आज हमें कठघरे में खडा़ कर चोर बताना चाहते हैं?"

"नहीं बात यह नहीं है।" संजय बोला।

"तो क्या बात है?" मधुकर बोला, "टेक इट इजी।"

बाद में पता चला कि मधुकर की कारस्तानी शहर के अमूमन सभी कवि जानते थे। इसलिए हर कोई उससे कटता रहता था। पर चूंकि शहर के तकरीबन सारे सरकारी कवि सम्मेलनों का संयोजक, संचालक वह ही होता था सो उससे बिलकुल कट कर भी कोई नहीं रह पाता। डी.एम., कमिश्नर सबको पटाने में वह माहिर था। उन दिनों वह एक अनियतकालिक पत्रिका भी निकालता था सो छपने की लालसा भी कई नए पुराने कवियों को उसके पास घसीट ले जाती। फिर भी ढेर सारे लोग उसे नापसंद करते, उसकी आदतों, हरकतों और चार सौ बीसी के कारण। पत्रिका के विज्ञापन के लिए फोन कर वह कमिश्नर, डी.एम., विधायक, मंत्री कुछ भी बन जाता। खुद ही अला फला बनकर वह खुद ही की सिफारिश कर लेता। राय ने उसे एक बार टोका तो मधुकर कहने लगा, "किसे लूटता हूं? पूंजीपतियों को ही न?" वह बोला, "वह साले जनता को लूटते हैं, मैं उन्हें लूट लेता हूं, अपना हिस्सा ले लेता हूं। साहित्य के लिए खर्च करता हूं। कोई महल, अटारी तो खड़ा नहीं कर रहा?" कह कर वह सिगरेट के धुएं में खो जाता।

महेंद्र मधुकर रेलवे में क्लर्क था। पर बाहर वह अपने को अधिकारी ही बताता। और दफ्तर महीने में ज्यादा से ज्यादा दस दिन जाता। संजय पूछा, "काम कैसे चलता है?"

"चल जाता है। मधुकर लापरवाही से बोला।"

"फिर भी?"

"अरे पचास रुपए आजू, पचास रुपए बाजू की सीट वालों को दे देता हूं। साले, अपना काम बाद में करते हैं, मेरा काम पहले निपटा देते हैं। बस! और जाता हूं तो सालों को नाश्ता करा देता हूं, बॉस को कवि सम्मेलनों की वयस्तता बता कर, दो चार कविताएं सुना देता हूं।"

सचमुच संजय देखता, मधुकर हफ्तों कमरे में सोया रहता, अचानक शहर में निकलता और बताता कि, "अटैची उठी हुई थई।" और चार छह दूर दराज के शहरों के नाम गिनाते हुए कहता, "कवि सम्मेलन से आ रहा हूं।" जबकि वह कहीं नहीं गया होता। हकीकत में कवि सम्मेलनों में जाने के लिए हरदम बेताब रहता और बेशर्मी पर उतर आता। जिन-जिन कवियों को अपने संयोजकत्व वाले कवि सम्मेलनों में बुलाता उन्हें पलट कर चिट्ठी लिखता कि "अब आप मुझे बुलवाइए।" किसी-किसी को वो लिखता, "अगर आपको दस बार मैं बुलाता हूं को कम से कम तीन या चार बार आप भी हमको बुलवाइए।" इस पर भी बात नहीं जमती तो वह लिख देता, "तो अब आपको बुलाने के लिए हमें सोचना पड़ेगा।" और दिलचस्प यह कि ज्यादातर जगह उसकी दाल गल जाती। बाद में तो वह कवियों के तय पारिश्रमिक में से अपना कमीशन भी काटने लगा। कभी-कभी आधा से ज्यादा काट लेता। कई संकोची कवि सब कुछ जानते हुए भी चुप रहते। तो एकाध कवि अगर मुंह खोल भी देते तो वह कहता, "मालूम है आपका रेट क्या है और बाकी कवि सम्मेलनों में आप कितना पाते हैं? और उससे तो यह ज्यादा ही है।"

लोकल कवियों को वह मार्ग व्यय भी नहीं देता। कहता, "अभी टूटे नहीं है, बाद में ले लीजिएगा। कहीं भाग थोड़े ही जा रहा हूं"। और फिर उसका वह "बाद में" कभी नहीं आता। एकाध बेहया कवि फिर भी पीछा नहीं छोड़ते तो वह कहता, "ठीक है अगली बार से आप मत आइएगा।" वह कहता, "एक तो इनको मंच दो दूसरे ये सूदखोर की तरह पीछे पड़ जाएंगे। माफ करो भाई।"

कवि सम्मेलनों के मंच पर भी वह कवियों को अलग-अलग ढंग से पेश करता। वह जिसको चाहता उसकी तारीफ के पुल बांध देता, उसे राई से पहाड़ बता देता, नहीं हूट करवा देता। श्रोताओं में पांच सात हूटर वह हमेशा "तैयार" रखता। उसके पैसा मार लेने की आदत से कुछ कवि बहुत परेशान रहते। जैसे कि शेखर! शेखर भी रेलवे में क्लर्क था और कई बार मधुकर की काट वही बनता। पर उसे सलीका नहीं आता। और बड़ी जल्दी एक्सपोज हो जाता। पर मधुकर के स्तर पर आकर काटना वही जानता। जैसे कि एक बार कवि सम्मेलन में वह एक निरीह टाइप के कवि को लेकर पीछे श्रोताओं में पहुंच गया। बोला, "कवियों को चाय पिलाने भर का पैसा नहीं है। आप लोग कुछ चंदा दीजिए तो कवियों को चाय नसीब हो।" और पैसा वसूल लाया। उस सरकारी कवि सम्मेलन का संयोजक मधुकर था। उसकी बदनामी भी हुई और खिंचाई भी। बाद में शेखर अक्सर ऐसा करने लगा। तो मधुकर माइक पर ही एनाउंस कर देता कि कोई चंदा मांगने जाए तो उसे पकड़ कर मंच पर लाइए। इससे कवि सम्मेलन की शालीनता खत्म हो जाती। राय ने एक बार मधुकर से कहा कि, "शेखर को बुलाते ही क्यों हैं?" तो मधुकर धुआं उड़ाते हुए बोला, "वह साला भी तो दस कवि सम्मेलनों में बुलाता है।" उसने जोड़ा, "और शेखर साला इतना काइयां है कि न बुलाऊं तो भी आ जाएगा और मंच पर सीना फुला कर बैठ जाएगा। अब भगा तो सकता नहीं। आखिर सार्वजनिक मंच होता है।" ...जारी...

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