मेरी पत्नी और भेड़िया

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बनारसीदास (1640 ई.) की ‘अर्धकथानक’ से भी शुरू करें, तो हिंदी में आत्मकथालेखन की गति बहुत मंद मानी जाएगी। महात्मा गाँधी, नेहरू आदि की बहुचर्चित आत्मकथाएँ भी मूलतः हिंदीइतर भाषाओं में लिखी गईं। कुल मिला कर, राहुल सांकृत्यायन, उगर, बच्चन जैसे ही कुछेक साहित्यकार इस विधा की स्वतंत्र सृजनात्मक महत्ता समझ पाए। विगत दो दशकों के दरमियान, मोहनदास नैमिशराय, ओमप्रकाश वाल्मीकि, श्यौराज सिंह बेचैन, बेबी हालदार आदि, हाशिये से बाहर के कई हिंदी लेखकों की आत्मकथाएँ सामने आई हैं और चर्चा के केंद्र में रही हैं।

इस सिलसिले का नवीनतम हस्तक्षेप है, प्रखर दलित चिंतक, लेखक डॉ. धर्मवीर की वृहदाकार आत्मकथा- मेरी पत्नी और भेड़िया। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब की कीमत 1500 रुपये है। सृजनात्मक लेखन और शोधपरक आलोचना में समान रूप से सक्रिय डॉ. धर्मवीर की लेखन यात्रा उनके अन्य समान धर्माओं से किंचित भिन्न मानी जाएगी। अन्य लेखक जबकि सीधे दलित चेतना से परेरित होकर साहित्यक्षेत्र में आए, धर्मवीर ने विधिवत शुरुआत की। उन्होंने पहले वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु परभाकर पर संस्मरणात्मक पुस्तक लिखी, ‘कम्पिला’, ‘हीरामन’ जैसे परबन्ध काव्य रचे, नारीचेतना के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज ‘सीमंतनी उपदेश’ को विस्मृति के गर्भ से उबारा और फिर इस दरमियान निरंतर अध्ययनमनन के जरिये अपनी दलित अस्मिता पर भी सान च़ाते रहे। इस दृष्टि से कबीर, परेमचंद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल से संदर्भित उनका काम खासा विचारोत्तेजक माना जाएगा। उनके विश्लेषणों से असहमत तो हुआ जा सकता है, लेकिन उन्हें आया-गया नहीं किया जा सकता। कह सकते हैं कि डॉ. धर्मवीर ने विगत 25 वर्षों के दौरान अपने लेखन से दलित चेतना को उसकी समग्रता में नयी अर्थवत्ता परदान की है। इसी परिपरेक्ष्य में उनकी आत्मकथा मेरी पत्नी और भेड़िया को भी देखा जाएगा।

एक हजार से अधिक पृष्ठों में फैली धर्मवीर की आत्मकथा का घटनाफलक पश्चिमी उत्तर परदेश के एक ग्रामांचल से दिल्ली तक फैला है और उसमें दलित चेतना उत्तम पुरुष एकवचन सर्वनाम के साथ अंर्तग्रंथित है। चूंकि यह आत्मकथा है, स्वाभाविक है कि इसके केंद्र में लेखक तो होगा ही, उसका परिवेश, पितृपरम्परा, जीवनसंघर्ष, पारिवारिक जीवन से जुड़ी विडम्बनाएं-वेदनाएँ, लेकिन इस सबके साथसाथ बीसवीं सदी की हिंदी पट्टी की वर्णआधारित समाजसंरचना और उसमें हाशिये पर के समाज का जीवनयथार्थ अपूर्व पारदर्शिता के साथ इस कृति का केंद्रीय पाठ बना है। इसके फोकस में एक ओर जहाँ लेखक के निजी पारिवारिक जीवन के विघटन से जुड़ी त्रासदी है, वहीं वे सामंतीपूँजीवादी कुरूपताएँ भी हैं, जिन्होंने अपने आखेटों को भी काफी दूर तक अपने रंग में रँग लिया है। स्वयं लेखक का पारिवारिक जीवन भी जिनकी चपेट में आने से नहीं बच सका।

धर्मवीर की इस आत्मकथा में अनेक चरित्र हैं, अनेक प्रसंग हैं, जो पाठक की संवेदना को छूते हैं, झंझोड़ते हैं और समाज व जीवन से जुड़े बुनियादी परश्नों पर सोचने को विवश करते हैं। यहाँ निजी जीवन का अवलोकन-आकलन करते हुए जहाँ महाकाव्यात्मक विस्तार वाला एक सघन औपन्यासिक ढांचा खड़ा किया गया है, वहीं वर्णआधारित भारतीय समाजसंरचना के नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, विधिविधान कानून की विशद समीक्षा भी की गई है और रेखांकित किया गया है कि एक अर्धसामंती, अर्धपूँजीवादी अधिरचना किस तरह दलित उपेक्षित तबके पर भी अपने परभाव छोड़ती है और उसमें लुम्पेन मानसिकता संक्रमित करती है।

लेखक का कनिष्ठ भाई महीपाल और पत्नी रमेश उसी लुम्पेन मानसिकता से ग्रस्त यहाँ पाठकों को नजर आएंगे। निश्चय ही, इस आत्मकथा के केंद्र में लेखक का अपना जीवन है, किंतु उस जीवन में रचे-बसे दर्जनों व्यक्ति एक के बाद एक इस तरह पाठक के सामने आते जाते हैं कि विविधताओं से भरे समूचे भारतीय समाज का एक ऐसा आईना उदघाटित होता है जो अनेक स्तरों पर हमारी संवेदना को झकझोरता है। डॉ. धर्मवीर का यह आत्मवृत्त दलितलेखन में एक नया अध्याय तो जोड़ता ही है, हिंदी के सकल आत्मकथा साहित्य में भी एक सार्थक हस्तक्षेप करता है। कह सकते हैं कि यह अत्यंत संवेदनशील और विचारोत्तेजक पाठ स्वयं में एक युगांतरकारी इतिहास अध्याय है।


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