अपने-अपने युद्ध (17)

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दयानंद पांडेयशेखर ही क्या मधुकर भी कई बार बिन बुलाए कवि सम्मेलनों ही क्या मुशायरों तक में पहुंच जाता। बस उन्हें सूचना होनी चाहिए कि कहां कवि सम्मेलन या मुशायरा है। दोनों ही के पास रेलवे का पास होता था। दोनों ही घर बार और नौकरी की चिंता से मुक्त रहते। कभी भी, कहीं भी जा सकते थे। दोनों रेलवे स्टेशन भी तड़े रहते। और जो कवि कहीं जा रहा होता तो उससे चिपक जाते। भले वह कवि सम्मेलन की बजाय कहीं और जा रहा हो। ज्यादातर कवि, कवि सम्मेलनों में जाना वैसे भी नहीं छुपाते थे।

कहीं से बुलावा आ जाता तो दस जगह बताए बिना, निमंत्रण पत्र दिखाए बिना उन्हें नींद नहीं आती थी। एक जगह बुलाए जाते, दस जगह जाना बताते। ऐसे ही एक बार शेखर रेलवे स्टेशन पर टहल रहा था। लखनऊ जाने वाली गाड़ी में पयाम दिख गया। शेखर समझ गया पयाम कहीं जा रहा है। धड़ उसके पास जा बैठा। बोला, "तो तुम लखनऊ चल रहे हो?"

"हां, उमर साहब की मेहरबानी है। और फिर लखनऊ का मुशायरा कौन छोड़ता है।" पयाम बोला।

"चलो सफर अब तनहा नहीं कटेगा।" शेखर बोला, "मैं भी वहीं चल रहा हूं।"

"जेहे नसीब!" कह कर पयाम ने आदाब बजाया।

"यार तुमको सुने बहुत दिन हो गए?" शेखर बोला, "कुछ नया हो तो सुनाओ।"

"हां, हां। शौक से।" पयाम चहका। और ताबड़तोड़ दो गजले सुना दीं।

"वाह खुब। बड़ी प्यारी गजलें हैं।" शेखर बोला, "जरा नोट करवा दो। मेरी एक शागिर्द रेडियो पर गाती है उसे गाने के लिए दे दूंगा।" पयाम ने दोनों गलजें खुशी-खुशी लिखवा दीं। अब अलग बात है कि पयाम को शायरी से वास्ता था पर गजल वह खुद कह नहीं पाता था। एक मुस्लिम मियां हलकी फुलकी गजलें दे दिया करते। पयाम का काम उसी से चल जाता। बाकायदा तरन्नुम में जब वह गजल पढ़ते तो यह कभी नहीं लगता कि उन्होंने नहीं लिखी होगी। और पयाम ही क्यों, ऐसे कई लोग थे संजय के उस शहर में, जिन्हें गजलें लिखने के बजाय तरन्नुम से पढ़ने में कहीं ज्यादा महारत हासिल थी। एक बार तो संजय दंग रह गया। एक ही रात एक जगह कवि सम्मेलन भी था और दूसरी जगह एक नशिस्त भी थी। दोनों ही जगह जाना था। कवि सम्मेलन के बाद वह जब "क्यों इशारों से बात करते हो, साफ कह दो कि हम तुम्हारे हैं" गुनगुनाता हुआ पहुंचा तो देखा कि यही गजल वहां एक दूसरे शायर साहबान पढ़ रहे थे। जबकि कवि सम्मेलन में एक दूसरे शायर यही गजल झूम कर पढ़ कर उसी के साथ नशिस्त में पहुंच रहे थे। नशिस्त जब खत्म हुई तो संजय ने हमदम से पूछा, "यह क्या माजरा है?" हमदम बोला, "जाने दो। क्या फायदा?" और जब संजय, "यह क्या माजरा है?" के एक ही मिसरे पर बड़ी देर तक लगा रहा तो अज्ञात बोला, "इन बेचारों की क्या गलती?"

"तो?"

"गलती तो उस्ताद की है जिसने एक ही गजल दोनों को दे दी।" लारी बोला।

"तुम्हें भी तो नहीं दे दी यही गजल उस्ताद ने?" अज्ञात ने चुटकी ली।

"क्या बकते हो?" कहता हुआ लारी वहां से खिसक गया।

बाद में अज्ञात कहने लगा, "आपको क्या लगता है दिन भर दर्जीगिरी, काज-बटन या जुलाहागिरी करने के बाद शाम को यह सब गजल भी लिख डालेंगे।" "क्यों, कबीर दोहा लिख सकते थे जुलाहागिरी करके तो कोई गजल क्यों नहीं लिख सकता? रैदास जूते सीकर भजन गा सकते हैं तो ये गजल क्यों नहीं गा सकते?" संजय बोला, "पर यह तो हद है। हम समझते थे हमारे यहां मधुकर, शेखर ही हैं। पर यहां तो पूरा का पूरा कुनबा ही। हद है।"

"बात यहीं तक हो तो गनीमत। अभी तो सवाल यह है कि उस्ताद ने भी कहां से मारके दी होगी?" हमदम बोला, "और यह मारा-मारी उर्दू में इतनी ज्यादा है कि मत पूछो। कोफ्त हो जाती है कभी-कभी।"

तो खैर उस बार शेखर ने पयाम की दोनों गजलें नोट कीं और लखनऊ के रेलवे स्टेशन से पयाम से विदा ली और कहा कि, "इंशा अल्ला मुशायरे में फिर मिलेंगे।"

"ठीक जनाब।" कह कर पयाम चल दिया।

रात को मुशायरे में पयाम समय से पहुंच गया और शेखर को ढूंढने लगा। पर शेखर नदारद। मुशायरा शुरू हो गया पर शेखर फिर भी नदारद। बीच मुशायरे में शेखर दिखा। मंच पर पहुंचा। दो चार लोगों से जबरदस्ती हाथ मिलाया, आदाब किया और ठीक-ठाक जगह देख कर बैठ गया। बैठे-बैठे एक परची पर मुशायरे के कनवीनर को चिट्ठी लिखी, "उमर भाई आदाब, लखनऊ एक काम के सिलसिले में आना हुआ था। वापस जा रहा था कि पता चला कि मुशायरा है और आप हुए हैं सो आप को सलाम करने आ गया। ठीक समझिए तो मुझे भी पढ़वा दीजिए। कुछ खर्चा बर्चा दिलवा दीजिएगा। और जरा जल्दी पढ़वा दीजिए। अभी रात की गाड़ी से ही वापस जाना है। रिजर्वेशन हो गया है।" उमर भाई संकोच में पड़ गए। न चाहते हुए भी उन्होंने तुरंत शेखर का नाम एनाउंस कर दिया। शेखर ने माइक संभाला और ताबड़तोड़ दो गजले पढ़ दीं। वह गजलें जो पयाम ने ट्रेन में सुनाई थीं। पयाम की तो हवा खराब हो गई। शेखर मुशायरे के बाद में गया। पर पयाम ने तुरंत चप्पल उठाई और खिसक लिया क्योंकि तीसरी गजल उसके पास थी नहीं। और जो दो थीं, वह शेखर पढ़ गया था। वापस जाकर पयाम मुस्लिम मियां से उलझ गया कि, "शेखर की गजलें क्यों दी हमें पढ़ने को?" मुस्लिम मियां के होश उड़ गए। बोले, "तो क्या वह दीवान उसके पास भी है क्या?"

"कौन सा दीवान?"

"जिसमें से गजल निकाल कर तुम्हें दी थी।"

"तो आपने गजल दी ही चोरी की थी।" कहता हुआ पयाम निकल गया, "मां चुदाएं आप और आपकी शायरी। मुझे नहीं बनना शायर!" बाद में पयाम छुटभैया नेता बन गया। और शेखर एक दिन ए.सी. में सफर करता हुआ टिकट चेकिंग में पकड़ा गया तो चेकिंग कर्मचारियों पर वह अंग्रेजी में डपट पड़ा। कहा कि, "मैं रेल मंत्री का पी.ए. हूं। तुम लोगों की हिम्मत कैसे हुई मुझे चेक करने की।" कर्मचारी सकते में आ गए। ऊपर के अधिकारियों को खबर दी कि रेलमंत्री के पी.ए. ट्रेन में हैं। अधिकारी उसकी आवभगत में पहुंचे। और शेखर की कलई खुल गई। वह जेल गया और उसकी नौकरी भी गई।

शहर के लोगों में तब यही चरचा थी कि देर सबेर मधुकर भी जेल जाएगा। पर मधुकर को ठीक से जानने वाले लोग जानते थे कि वह जेल जाने वाली नहीं जेल भिजवाने वाली चीज है। मौका बेमौका वह थाने के दरोगा तक के सम्मान में कवि गोष्ठी करवा डालता। दरोगा का सम्मान करवाता, छोटे-छोटे लोगों पर रौब डालता। विज्ञापन बटोरता, लेखक सम्मेलन करवाता, चंदा बटोरता, सरकार और प्रशासन से अनुदान लेता। मधुकर कवि सम्मेलनी कवियों और पत्रिकाओं में छपने वाले कवियों के बीच अजीब तालमेल बनाए रखता। कवि सम्मेलनों में जाता तो बाकी कवियों को हड़काता "साहित्य का आदमी हूं, खाली मंचीय नहीं।" और सिर्फ लिखने छपने वाले कवियों से कहता, "जनता से सीधा रिश्ता रखता हूं, छोटी-मोटी पत्रिकाओं के चंद छपे पन्नों का मोहताज नहीं हूं।" वह खुद पत्रिका निकालता ही था और जैसे कवियों से कहता कि "तुम हमें बुलाओ, हम तुम्हें बुलाएं" वैसे ही लघु पत्रिकाओं के संपादकों को उसी बेशर्मी से लिखता, "हम तुम्हें छापते हैं, तुम हमें छापो।" और मजा यह कि यहां भी वह ज्यादातर जगहों पर कामयाब रहता।

मधुकर कई बार जैसे कवि सम्मेलनों में वहीं बैठे कवियों की कविताएं पढ़ जाता था और पलट कर उस कवि से कह देता, "क्षमा कीजिए जरूरत पड़ गई थी।" उसी तरह वह छपने के लिए भी यहां, वहां कविताएं मार लेता। कई बार वह उर्दू की हिंदी, हिंदी की उर्दू भी कर डालता और किसी को पता भी नहीं पड़ता। कई बार वह नए कवियों की कविताएं भी ठीक करने के बहाने पार कर देता। उस नए कवि से कहता, "किसी काम की नहीं है तुम्हारी कविता।" और वही कविता कुछ दिन बाद थोड़े से रद्दोबदल के बाद में महेंद्र मधुकर नाम से छपी मिलती। कोई कवि अगर टोक देता, "कि यह तो मेरी ही कविता है।"

''तुम्हारी कविता कहां है?'' वह खीझता।

"पर बात तो वही है।"

"हो सकता है तुम्हारी वह बात कहीं जेहन में रह गई हो। और इस कविता में आ गई हो।" कह कर वह उसे टाल देता। अपनी पत्रिका में नए कवियों द्वारा भेजी गई ठीक-ठाक कविताएं भी वह जब तब पार कर दूसरी पत्रिकाओं में अपने नाम से छपवा डालता। कविताओं की पैरोडी भी वह बखूबी लिख डालता। बीच-बीच में उसको यह भी इलहाम होता रहता कि महाकवि होने के लिए "होमो सेक्सुअल" होना भी जरूरी है। फिराक निराला की वह गिनती कराता। और अपने होमो होने के किस्से भी जब-तब फैलाता रहता। वह कब किसके लिए क्या कह दे, कुछ पता नहीं होता। पिनक में जब वह आता तो शहर का ऐसा कोई कवि नहीं होता जिसको वह अपने "मार लेने" वाली सूची में दर्ज करने से छोड़ देता। कभी न कभी, किसी न किसी मौके पर वह हर किसी की मार चुका होता। चाहे वह बूढ़ा हो, जवान हो इससे उसको कोई फर्क नहीं पड़ता। कई बार इस फेर में वह बेइज्जत होता, पिट जाता पर आदत से लाचार वह फिर सबकी गिनती गिना जाता। कभी-कभी उसकी सूची शहर के हदें पार कर बंबई तक पहुंच जातीं और वह सुजीत कुमार से लगायत ऋषि कपूर तक के नाम गिना जाता। क्या तो तब वह उन्हें हिंदी सिखाता था। एक बार उसने हमदम, राय और संजय को भी "मार लेने" की फेहरिस्त में किसी से गिना दिया। हमदम बेचारा तो उदास हो गया। पर राय और संजय मधुकर पर सवार हो गए। बोले, "लो आज मेरी मारो। नहीं तो साले तुम्हारी गांड़ तोड़ दूंगा।"

"क्या कह रहे हैं! क्या कह रहे हैं आप लोग?" मधुकर हांफने लगा, "किसी ने बहका दिया है आप लोगों को।" कह कर वह माफी मांगने लगा। कहने लगा, "कवियों के साथ इस तरह का आचरण राम-राम!" हाथ जोड़ कर बोला, "पाप है पाप।"

"आइंदा हम लोगों के बारे में अगर कोई लूज टाक की तो हाथ पैर तोड़ के सड़क पर फेंक देंगे।" राय बोला, "बात यूनिवर्सिटी के लड़कों से कहने भर की देर है।"

"नहीं, नहीं।" वह बोला, "ऐसी कोई बात ही नहीं होगी।"

मधुकर ऐसी हरकतें फिर भी करता रहता, बेइज्जत होता रहता, पर वह अपनी आदत से बाज नहीं आता। वह रह-रह चोंगा भी बदलता रहता। कभी वह हिंदूवादी हो जाता, कभी कम्युनिस्ट बन जाता। जब जैसे मौका देखता चोंगा बदल लेता।

शहर के "प्रगतिशीलों" से वह हरदम सावधान रहता। और कहता रहता, "आप हमें यूं ही नहीं खारिज कर सकते।" इसी खारिज न होने की धुन में वह यकायक जनवादी बन गया। और शहर में जनवादी लेखक सम्मेलन आयोजित कर बैठा। कहानी से उसका कोई सरोकार नहीं था पर शहर के जनवादी हो चले क्योंकि को काटने की गरज से इस जनवादी लेखक सम्मेलन में उसने कहानी को ही केंद्रित किया। और बाहर के कई कहानी लेखकों और संपादकों को चिट्ठी लिख डाली। इत्तफाक से कई लोग आ गए। जिनमें दो-तीन नामी कहानीकार भी थे।

उसने बाहर से बुलाए लेखकों को आने-जाने का किराया, ठहरने आदि का आश्वासन दिया था। ज्यादा लोगों के आने से उसका बजट बिगड़ गया। उसको बिलकुल ही उम्मीद नहीं थी कि इतने सारे लोग आ जाएंगे। उसने सोचा था कि इस आयोजन के चंदे से कुछ बचा भी लेंगे। पर अब उसकी योजना पर पानी फिर गया था। वह बकबकाने लगा, "ये साले जनवादी बिलकुल भूखे ही होते हैं। जिसको देखो वही मुंह उठाए चला आ रहा है। जैसे और कोई काम ही नहीं सालों को।" एक लेखक ने सुन लिया तो मधुकर पर बिगड़ गया और सीधा अटैची उठा कर वापस हो गया। सम्मेलन खत्म होते न होते मधुकर सिर पर हाथ रख कर बैठ गया। क्या तो उसका रुपया चोरी हो गया है। कितना रुपया चोरी हुआ है, कब हुआ, ऐसी किसी बात का हिसाब मधुकर के पास नहीं था। उसके पास जैसे एक ही संवाद बाकी रह गया था, "रुपया चोरी हो गया।" जनवादी लेखकों की समझ में आ गया कि अपने ही किराए से वापस जाना है। ज्यादातर चले भी गए। पर कुछ तंबू गाड़ कर सो गए कि जब किराया मिलेगा, तभी जाएंगे। विवश होकर मधुकर को उन लेखकों को किराया देना पड़ा। किराया नहीं देता तो उनके रहने खाने का बिल देना पड़ता।

"आखिर किसने रुपया चुरा लिया?" संजय ने मधुकर से पूछा

"आपने ही चुराया होगा।" मधुकर बउराया।

"क्या कहना चाहते हैं आप?"

"आप ही और राय इस कमरे में बहुत आ जा रहे थे।"

"इसका क्या मतलब हुआ, हम लोगों ने रुपया चुरा लिया?" राय गरजा।

"नहीं मेरे बाप, रुपया मैंने ही चुरा लिया।" वह हाथ जोड़ता हुआ बोला, "अब आप लोग जाइए।"

"हद है।" कहता हुआ संजय मधुकर के कमरे से बड़बड़ाता हुआ निकला, "बड़ा गंदा आदमी है। लेखकों को किराया न देना पड़े इसलिए साला किसी को भी चोर कह देगा।"

"ऐसे गंदे आदमी की बात का क्या बुरा मानना।" हमदम बोला, "कौन इसकी बात का विश्वास करता है। सब जानते है कि मामला क्या है।"

"फिर भी।" कह कर राय उदास हो गया।

पर मधुकर था ही ऐसा। वह किसी को कभी भी कुछ भी कह सकता था। अपनी लड़की की शादी में भी वह ऐसे ही बोल गया था। हुआ यह कि वहां भी बाराती ज्यादा हो गए और कैंपा कोला की बोतलें कम पड़ गईं। उसने फौरन एक आदमी को और बोतलें लाने के लिए दौड़ाया और खुद बारातियों को संभालने में लग गया। पर बाराती कोई लेखक कवि तो थे नहीं, वह कहां मानने वाले, नहीं माने। मधुकर आजिज आ कर बोला, "एक छोटे से सुख की इतनी बड़ी सजा मिलेगी, नहीं जानता था।" समझने वाले समझ गए  पर एक करुण रस के कवि की समझ में नहीं आया। बोले, "आपकी बात समझ में नहीं आई। सुख, सजा। क्या मतलब?"

"महाकवि जी, इतना भी नहीं समझे?" मधुकर बोला, "न बीवी के साथ सोता, न संभोग करता, न यह बेटी जनमती, न उसकी शादी होती, न मैं सजा भुगतता!" और मधुकर यह सब जोर-जोर से कहता रहा। कई लोग यह बात सुन कर सकते में आ गए, कई लोग शर्मा गए तो कई लोग बात टाल कर वहां से खिसक लिए। पर मधुकर चालू था, "एक छोटे से सुख की इतनी बड़ी सजा?" वह बोलता ही जा रहा था, "इतनी बड़ी कीमत?"

उस जनवादी लेखक सम्मेलन समाप्ति के दो दिन बाद मधुकर संजय के घर गया। बोला, "आप तो बुरा मान गए। अरे, वह तो नाटक था। ऐसा न करता तो वह जनवादी साले पिंड नहीं छोड़ते, चूस जाते साले पूरा का पूरा हमको।"

संजय काफी देर चुपचाप मधुकर की बातें सुनता रहा। और जब बहुत हो गया तो मधुकर से बोला, "अब बंद करिए अपनी नौटंकी। और चुपचाप यहां से दफा हो जाइए।" उसने जोड़ा, "आइंदा मेरे मुंह मत लगिएगा।"

"आप समझिए तो, आप समझिए तो।" कहता हुआ वह चला गया।

संजय फिर उससे कभी नहीं बोला। मधुकर ने दो तीन बार कवि सम्मेलनों के निमंत्रण भी भेजे पर वह फिर कभी उसके कवि सम्मेलनों में नहीं गया। बल्कि जिस कवि सम्मेलन में वह जाता, संजय वहां नहीं जाता। ऐसे ही एक बार एक कवि सम्मेलन में एक कवि को श्रोता अचानक "चोर-चोर" कहने लगे तो भी वह कवि महोदय कुछ समझ नहीं पाए और चुपचाप कविता पढ़ते रहे। पर जब "चोर-चोर" ज्यादा हो गया तब उन्होंने कविता पढ़ना बंद किया और श्रोताओं से पूछा कि, "आप चोर-चोर क्यों कह रहे हैं?"

"क्योंकि आप चोरी की कविता पढ़ रहे हैं।" श्रोताओं की ओर से किसी ने जवाब दिया।

"पर आप कैसे कह सकते हैं कि मैं चोरी की कविता पढ़ रहा हूं?" कवि ने जोड़ा, "आपको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि यह कविता मेरी है और मेरे नाम से छपी हुई कविता है।" पर कवि महोदय की इस सफाई का श्रोताओं पर कोई असर नहीं हुआ। तो उक्त कवि ने कहा कि, "आप साबित कर दीजिए कि यह मेरी कविता नहीं है तो मैं मंच से नीचे आ जाऊंगा। और फिर कभी कवि सम्मेलन के मंच पर जिंदगी में नहीं चढ़ूंगा।"

"पिछले साल एक कवि आए थे, उन्होंने यह कविता सुनाई थी और आप की अपेक्षा बहुत अच्छी तरह सुनाई थी।" श्रोताओं में से एक व्यक्ति बोला।

"ओ हो!" कह कर संजय ने माइक संभाल लिया और श्रोताओं से पूछा, "कहीं उन कवि का नाम महेंद्र मधुकर तो नहीं?"

"हां-हां महेंद्र मधुकर ही नाम था उनका।" श्रोता बोले।

"आप लोगों की याददाश्त बहुत अच्छी है।" संजय बोला, "और इससे यह भी साबित होता है कि कविता के प्रति आप लोग काफी गंभीर हैं तभी आपको यह कविता साल भर बाद भी याद है। पर विश्वास मानिए यह कविता मंच पर खड़े इसी कवि की है। रही बात पिछले साल यही कविता पढ़ जाने वाले कवि की तो किसी पर व्यक्तिगत लांछन लगाना इस मंच से अच्छा नहीं लगता, मर्यादा टूटती है। बाकी आप सुधी श्रोता खुद ही समझदार हैं।" संजय कह कर बैठ गया। श्रोता समझ गए थे और "वही चोर था, वही चोर था" उच्चारने लगे।

मधुकर उन दिनों बड़ा परेशान रहता। पहली बार उसको अपने कवि होने के अस्तित्व को बचाए रखने की चिंता सताने लगी थी। कवि सम्मेलनों, पत्रिकाओं हर जगह से वह खारिज होता जा रहा था। ऐसे में उसे एक नई चाल सूझी। शहर में हैंड कंपोजिंग पर टेबलायड साइज में छपने वाले साप्ताहिक अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों को उसने साधना शुरू किया। गाल पर हाथ रखे अपने फोटो का डबल कालम ब्लाक उसने अपने पैसे से बनवाया। और उन साप्ताहिक अखबारों में ब्लाक लगवा कर अपने फोटो सहित कविताएं छपवा कर सो पचास कापी उन अखबारों की लेकर यहां वहां बांटता फिरता। इन पत्रकारों को वह शराब की दावत पर बुलाता। वह एक बोतल देशी शराब की चार बोतल बना कर अंग्रेजी की बोतलों में भरता और इन नौसिखिया पत्रकारों को उसी से नशा आ जाता।

कुछ दिन बाद अलीगढ़ के जनवादी लेखक सम्मेलन में संजय ने मधुकर को देखा पर वह बोला नहीं। मौका देख कर मधुकर उसके पास आया और बुदबुदाया, "शहर का झगड़ा शहर में। यहां कुछ नहीं होना चाहिए।" हाथ जोड़ता हुआ वह बोला, "अपने शहर की बेइज्जती नहीं होनी चाहिए।" पर संजय कुछ नहीं बोला। पर मधुकर यहां भी अपनी आदत से बाज नहीं आया। तारादत्त निर्विरोध की एक गजल तोड़ मरोड़ कर कवि गोष्ठी में पढ़ गया। और उसकी बड़ी थू-थू हुई घबरा कर वह नीरज के यहां पहुंच गया और उसने, "शराब पिलाइए" कहने लगा। नीरज ने भी उसे उलटे पांव वापस किया। अंतत: सम्मेलन खत्म होने से पहले ही उसने ट्रेन पकड़ ली।

वापस आकर उसने अपनी कविता की किताब छपवाने की धुन लग गई। वह कहता था, "जब तक हाथ में किताब न आ जाए, तब तक कोई हमें नहीं मानेगा। बस एक किताब आ जाए तो एक-एक से निपट लूंगा।" और सचमुच उसने चंदा बटोर कर "अपनी" एक "कविता की किताब" छपवा ली। किताब का छपना था कि उस पर चोरी के आरोप लगने चौतरफा शुरू हो गए। पर उसको इसकी फिक्र नहीं थी। यह सब तो उसके लिए पुरानी बात हो गई थी। नई बात यह थी कि अब उसके हाथ में अपनी किताब थी, उसकी फोटो भी उसमें छपी थी। जिस-तिस को वह बुला कर अपनी किताब भेंट करता और कहता, "सहयोग राशि पांच रुपए दे दीजिए।" वह हर किसी से कहता, "आप से किताब के दाम तो ले नहीं सकता, आप मित्र आदमी हैं पर प्रोडक्शन कास्ट तो निकालनी ही पड़ेगी।" ज्यादातर लोग यह पांच रुपए की सहयोग राशि संकोचवश दे देते। पर कुछ घाघ किस्म के लोग किताब उलट-पलट कर देखते और उन्हें लगता कि पांच रुपए का सौदा महंगा है, वह पांच रुपए देने से इंकार कर देते। कहते, "अगर फ्री में दे दीजिए तो ठीक है।" पर तब तक मधुकर उस घाघ के हाथ से किताब छीन लेता और उस पर लिखा, "प्रिय फला को सप्रेम भेंट" भी उसके सामने किचकिचा कर काट देता। आफिसों के सामने वह वेतन बंटने की पहली तारीख को किताब लेकर खड़ा हो जाता। और सो पचास कापी बेच ही डालता।

मधुकर की किस्मत अब जैसे उसकी राह देख रही थी। उन्हीं दिनों शहर में जो नया कमिश्नर आया वह "कवि" भी था। मधुकर को यह बात पता चल गई। अपनी कविता की किताब और अपनी पत्रिका लेकर उससे मिलने पहुंच गया। कमिश्नर भी भुखाया कवि था। मधुकर ने उसकी कविता की भूखी नब्ज छू ली। जगह-जगह कमिश्नर के सम्मान में वह कवि गोष्ठी, कवि सम्मेलन करवाने लगा। मामला चूंकि कमिश्नर का था सो जिला प्रशासन का पूरा अमला लग जाता। धीरे-धीरे मधुकर ने कमिश्नर की कविताओं की किताब छापने का जिम्मा ले लिया। कमिश्नर की एक किताब छपी, दूसरी छपी, तीसरी छपी और चौथी किताब के साथ-साथ मधुकर ने अपनी भी दो किताबें छाप लीं। और कोई भी किताब दस हजार से नीचे नहीं छपी। हालत यह थी कि तब समूची कमिश्नरी के लेखपाल तक कविता प्रेमी हो गए। और वह कविता की किताब खरीद रहे थे, किताब बेंच रहे थे। यह सारा माजरा दिल्ली की एक पत्रिका में जब छपा और सीधे-सीधे कमिश्नर को रिपोर्ट में हिट करते हुए सवाल उठाया गया कि आज के दौर में जब बड़े से बड़े कवि का भी कविता संग्रह दो हजार से ज्यादा कोई प्रकाशक नहीं छापता और अव्वल तो कविता संग्रह की कोई नहीं छापना चाहता तो कमिश्नर साहब की कविता पुस्तकों की दस-दस हजार प्रतियां कैसे बिक जा रही हैं? रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि कमिश्नर अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं और उनके एक हम पियाला हम निवाला दोस्त इस सबका बेजां फायदा उठा रहे हैं।

मधुकर यह रिपोर्ट पढ़ कर इस बात पर नहीं नाराज हुआ कि यह रिपोर्ट क्यों छपी? उसकी नाराजगी इस बात को लेकर थी कि पूरी रिपोर्ट में उसका जिक्र तो था पर कहीं उसका नाम क्यों नहीं आया। उसे लगा कि उसे कमिश्नर से दूर करने की साजिश है। और उसने तुरंत पत्रिका के संपादक को चिट्ठी लिखी कि कमिश्नर का वह हम पियाला हम निवाला दोस्त कोई और नहीं मैं ही हूं। और रही कविता संग्रहों के दस हजार की संख्या में छपने और बिकने की बात तो हम लोगों की कविताओं में इतनी ऊर्जा है कि लोग खरीद रहे हैं और पढ़ रहे हैं। चिट्ठी छपी तो वह उस पत्रिका को लोगों को दिखाता फिरता और बताता कि, "देखो कमिश्नर मेरे दोस्त हैं।" और इसको भी उसने कैश किया।

पर इस सबके बावजूद महेंद्र मधुकर की चिंताओं का अंत नहीं था। उसकी नई चिंता अब पुरस्कृत होने की थी, सम्मानित होने की थी। उसने बड़ी दौड़ धूप की, बड़ा हाथ पांव मारा कि कम से कम उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सबसे छोटा दो तीन हजार रुपए वाला पुरस्कार ही मिल जाए। पर वह हर बार असफल हो जाता। उलटे यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक टाइप कवि, आलोचक यह पुरस्कार मार ले जाते। वह इस पर भी बड़बड़ाता और पछताता कि वह भी क्यों न यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक हुआ? वह बड़बड़ाता, "ये विश्वविद्यालयी कविता एक दिन मर जाएगी। जिंदा रहेगी तो सिर्फ मेरी कविता।"

मधुकर की यह सारी बातें संजय के दिमाग में सिनेमा के किसी रील की तरह दौड़ गईं। रिक्शा धीरे-धीरे लाल बारादरी पहुंच गया था। सरोज जी रिक्शेवाले को डपट कर बोले, "रुको, हईं रुको।" तब जाकर कहीं संजय उसकी सिनेमा के रील से अलग हुआ। सरोज जी रिक्शे से उतरे, संजय भी उतरा। उतर कर रिक्शेवाले को पैसे देने लगा तो सरोज जी ने उसे रोक दिया। बोले, "आप क्यों दे रहे हैं, आयोजक देंगे।" कह कर उन्होंने लगभग चिल्ला कर एक आयोजक टाइप के व्यक्ति को बुलाया और कहा कि, "रिक्शे के पइसे दइ दीजिए।" उसने विनम्रता से सिर झुकाया और बोला, "एक मिनट में आया।" कह कर वह बारादरी के भीतर गया। और लौटा तो मधुकर उसके साथ था। मधुकर ने सरोज जी को देखा, रिक्शा देखा और जेब से पैसा निकाल कर दिया। अब तक उसने संजय को भी देख लिया था। उसके चेहरे पर घबराहट की रेखाएं फैल गईं। उसने उस गुलाबी मौसम में भी रूमाल से पसीना पोंछना शुरू कर दिया। पर संजय ने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। सरोज जी के पीछे-पीछे चल दिया। मधुकर दौड़ कर सरोज जी की अगवानी में आया।

बारादरी के ऊपर हाल में सम्मान समारोह आयोजित था। हाल बहुत ही छोटा था। बमुश्किल पच्चीस तीस कुर्सियों की जगह थी, और इतनी कुर्सियां लग भी गईं थीं। पहुंचने वालों में आयोजकों में सी तीन चार लोगों के अलावा सरोज जी पहले व्यक्ति थे। जिनके साथ संजय नत्थी था। आयोजकों में से मधुकर को छोड़ कर कोई भी उसे नहीं पहचानता था। हां, मधुकर भी यहां आयोजक ही था, अपने सम्मान समारोह के बावजूद। इंतजाम में लगा बझा मधुकर अचानक परेशान हो गया था। उसके चमचे उसकी परेशानी देख परेशान हो गए थे पर परेशानी का सबब वह नहीं जा पा रहे थे। मधुकर को सरोज जी के इतनी जल्दी आ जाने की उम्मीद नहीं थी। और साथ में संजय के आने की तो कल्पना तक नहीं थी उसे। सरोज जी की अगवानी में लगा मधुकर सरोज जी को किसी सामान्य कुर्सी पर बिठाने लगा। पर सरोज जी ने जैसे उसका निवेदन सुना ही नहीं कि, "यहां बैठिए।" सरोज जी ने मन ही मन मंच पर रखी खास अतिथियों की कुर्सी में से बीच की कुर्सी तजवीज की जो जाहिर तौर पर समारोह के अध्यक्ष की होनी चाहिए, और उसी पर जाकर धप्प से बैठ गए।

"अच्छा-अच्छा" कह कर मधुकर मुड़ा तो उसने देखा कि जिस कुर्सी पर वह सरोज जी को बिठाना चाह रहा था उस पर संजय बैठ गया था। वह तमतमाया संजय के पास आया और उसे घूरने लगा। शकल ऐसे बनाई जैसे वह पूछना चाहता हो कि, "तुमको यहां किसने बुलाया?" वह शायद यह पूछना भी चाहता था कि तब तक सरोज जी शायद माजरा समझ गए थे या कि औपचारिकतावश बोले, "यह संजय जी हैं, हमारे वरिष्ठ सहयोगी हैं, अऊर हम इन्हें लइ आए हैं हियां।"

"मैं इन्हें जानता हूं।" मधुकर बोला, "एक समय बड़ी उष्मा और ऊर्जा होती थी इनकी कविता में।" उसने जोड़ा, "बड़े होनहार कवि थे पर जाने क्यों आज कल लिखना छोड़ दिया है।" मधुकर फीकी मुस्कान बिखेरता हुआ बोला, "कि फिर शुरू कर दिया?"

संजय चुप रहा।

पर मधुकर चुप नहीं रहा। बोला, "कविताएं लिखना।"

संजय फिर भी चुप रहा।

मधुकर उसकी बगल की कुर्सी पर बैठ गया। पसीना पोंछता हुआ बुदबुदाया, "शहर का झगड़ा शहर में।" और जैसे उसने हिदायत दी, "यहां अपने शहर की बेइज्जती नहीं होनी चाहिए।"

संजय कुछ बोला नहीं। न ही मधुकर की ओर उसने देखा।

पर मधुकर जैसे आश्वस्त हो लेना चाहता था। बोला, "आप तो दिल्ली में थे। लखनऊ कबसे आ गए?" उसके स्वर में अतिशय विनम्रता टपक रही थी। संजय की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं पाकर वह उठ खड़ा हुआ। बोला, "कुछ भी हो अपने शहर की बेइज्जती नहीं होनी चाहिए।"

फिर वह माइक वगैरह के इंतजाम और चमचों को निर्देश देने में लग गया।

यहां मधुकर का जाल बट्टा काफी तीखा और चौकस था। उसका यह सम्मान समारोह पूरी तरह प्रायोजित तो था ही, प्रायोजक भी वह खुद ही था। छोटी और घटिया बुद्धि ही सही पर इसका इस्तेमाल उसने बखूबी किया था। पूरी योजना इतनी नियोजित थी कि यह समारोह प्रायोजित है इसकी गंध भी किसी को लगती नजर नहीं आ रही थी। संजय तो खैर सब समझ गया था। क्योंकि मधुकर एक बार ऐसा पहले शहर में भी कर चुका था। तब उसने सम्मान समारोह के बजाय अपनी किताब पर बहसनुमा गोष्ठी आयोजित करवाई थी। इसके लिए उसने एक संस्था गठित की। तीन चार नए कवि टाइप लड़कों को पकड़ कर उनको पदाधिकारी बना दिया। सो वह सब पूरे उत्साह से जुट गए। शहर भर के अनजाने साहित्यकारों को बटोरा। संस्था चूंकि नई थी मधुकर का लेबिल नहीं था, सो ज्यादातर लोग आ गए। पर आकर पछताए। अब चूंकि आ गए थे सो विवशता थी बैठने की। बैठ गए। और बोलने की बात हुई तो बोले भी। जैसी कि मधुकर की आदत थी कि किसी समारोह में वह होता जैसे-तैसे संचालक बनकर माइक वह थाम ही लेता। ऐसा उसने अपनी किताब वाली गोष्ठी में नहीं किया। बिलकुल निरपेक्ष बना बैठा रहा। पर जब उसने देखा कि कई लोग उसे धोने में लग गए। उसे कवि मानने और उसकी कविताओं को कविता मानने से इंकार करने लगे। कुछ ऐसे भी "होशियार" लोग थे जो यह कह कर निकलने लगे कि किताब यहीं देखने को मिली, पढ़ी नहीं है सो कुछ बोलना उचित नहीं हैं पर जब दो तीन लोग बार बार "कहीं से प्रेरित कविताएं" की स्थापना देने लग गए और एक आलोचक ने साफ कह दिया कि यह किताब कविताओं की हेरा फेरी की किताब है तब मधुकर से नहीं रहा गया। उछल कर माइक थाम लिया। और जिससे जो बुलवाना चाहा वही बुलवाया और बाकी लोगों को यह कह कर चुप करा दिया कि "कुछ लोग पूर्वाग्रहवश व्यक्तिगत रूप से मुझे बदनाम करने की सायास कोशिश कर रहे हैं। वह लोग इस गोष्ठी को उखाड़ने की नियत बना कर आए हैं। पर हम उनकी इस मंशा को कामयाब नहीं होने देंगे।" बात फिर भी नहीं बनी तो उसने चाय समोसे का जलपान शुरू करवा दिया। और दुनाकदारों को वहीं सबके सामने पेमेंट कर गोष्ठी के समापन की घोषणा खुद ही कर दी थी। सब लोग संस्था वालों को गाली देते हुए चले गए। तो एक आलोचक ने कहा, "उन बेचारे लड़कों का क्या कसूर, इसने उनका इस्तेमाल कर लिया।"

मधुकर ने यहां लखनऊ में भी वही सब किया था पर बड़े जतन और यत्न से। विद्रोही नाम के एक लड़के से एक संस्था गठित करवाई। अपने सम्मान की योजना बनाई। सम्मान समारोह में भीड़ कैसे जुटे? इसके लिए उसने लखनऊ के छोटे और मझोले कवियों, कलाकारों, रंगकर्मियों, पत्रकारों और नेताओं की भी एक सूची बनाई और इसमें से करीब पैंतीस, चालीस लोगों को सम्मानित करने के लिए नाम तय कर लिया। और सूची में शामिल पुरस्कृत लोगों से ही एक सौ इक्यावन, एक सौ एक, इक्यावन या इक्कीस रुपए सहयोग के नाम पर मांग लिया। जिसने यह सहयोग नहीं दिया उसका नाम काट दिया। और जिसने जैसा सहयोग दिया उसके लिए वैसा ही पुरस्कार, शील्ड, कप या फीता तय कर दिया। सम्मान और पुरस्कार के भुखाए यह लोग इसी से खुश थे। इस तरह धीरे-धीरे लाल बारादरी का यह छोटा सा हाल भर गया।

हाल तो भर गया पर समारोह के अध्यक्ष सरोज जी को छोड़ कर बाकी विशिष्ट अतिथि, उदघाटनकर्ता वगैरह अभी तक नहीं आए थे। मधुकर ने अतिथियों का इंतजाम भी अपनी ओर से बहुत ही पुख्ता किया था। हिंदी के नाम पर हर जगह पहुंच जाने वाले एक कैबिनेट स्तर के खाद्य मंत्री वासुदेव सिंह समारोह के मुख्य अतिथि और उदघाटनकर्ता के रूप में आमंत्रित थे। हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष सुमन जी और एक सांध्य अखबार के संपादक विशिष्ट अतिथि थे। लखनऊ के तब सबसे ज्यादा प्रसार संख्या वाले अखबार के सरोज जी समारोह के अध्यक्ष पहले ही से नामित थे। न सिर्फ नामित थे, समारोह में सबसे पहले पहुंच कर अध्यक्ष की कुर्सी पर आसीन भी थे। संजय ने देखा सरोज जी जबसे कुर्सी पर बैठे तबसे वह सिर झुका कर ही बैठे थे। और करीब एक घंटे से वह ऐसे सिर झुकाए बैठे थे जैसे किसी तपस्या में लीन हों। संजय बैठे-बैठे ऊब गया था। कि तभी हाल में जैसे हलचल सी हुई।

पता चला सांध्य अखबार के संपादक जी विशिष्ट अतिथि की हैसियत से पधार गए थे। सुनहरे बटनों वाला कुर्ता जाकेट पहने वह संपादक कम व्यापारी ज्यादा लग रहे थे। उनकी देह से सेंट ऐसे गमक रहा था, उनके हाव-भाव और मुसकुराने का अंदाज ऐसा था जैसे वह किसी सम्मान समारोह में नहीं, वहां मुजरा सुनने आए हों। इन संपादक महोदय को संजय पहले से जानता था। पहले ये संपादक महोदय दिल्ली में एक हिंदी समाचार एजेंसी में जनरल मैनेजर और संपादक थे। हिंदी समाचार एजेंसी बंद करवा कर अब वह लखनऊ में सांध्य अखबार के संपादक का दायित्व निभाने आ गए थे। महिलाओं पर हमेशा लार गिराने तथा संस्थानों को बंद कराने के लिए मशहूर यह संपादक महोदय भी पत्रकारिता जगत के मधुकर थे। इसलिए उन्हें यहां मुद्रा में देख कर संजय को जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ। मधुकर की अगुवानी में अभी यह संपादक महोदय कुर्सी पर बैठे ही थे कि हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष सुमन जी भी आ गए। मधुकर लपक कर उनकी अगुवानी में लग गया। उसके चेहरे की चमक अचानक बढ़ गई थी। अब जब सुमन जी आए तो सरोज जी फिर भी सिर झुकाए तपस्वी मुद्रा में लीन थे, हर किसी से बेखबर। पर जब सुमन जी मंच के पास पहुंचे तो मधुकर ने सरोज जी को लगभग झिंझोड़ा। ऐसे जैसे वह नींद में हो। सरोज जी ने सिर उठाया, मंद-मंद मुसकुराए और चुप ही चुप जैसे पूछा कि "बात क्या है?"

"सरोज जी जरा सा इस कुर्सी पर आ जाइए।" हाथ जोड़ते हुए मधुकर धीरे से बोला। जवाब में सरोज जी ने खा जाने वाली नजरों से देखा पर बोले कुछ नहीं, न ही अपनी कुर्सी पर से उठे। संजय ने देखा, मधुकर का जैसे धैर्य चुक रहा था। उसने रूमाल से माथा पोंछा और फिर पूरी विनम्रता से हाथ जाड़ कर बोला, "सरोज जी प्लीज।" अबकी उसकी आवाज का वाल्यूम बढ़ गया। सरोज जी ने उसे फिर खा जाने वाली नजरों से देखा। संजय को लगा जैसे वह उसे कच्चा चबा जाएंगे। पर उन्होंने कुर्सी छोड़ी नहीं, उसी को उठा कर एक कुर्सी के बराबर खिसक गए। दरअसल सरोज जी इस बात से डर गए थे कि सुमन जी के आ जाने से कहीं उनकी अध्यक्षता तो खतरे में नहीं पड़ गई? ऐसा उन्होंने बाद में बताया। बहरहाल, मधुकर ने भी सरोज जी को अजीब नजरों से घूरा और पलट कर विद्रोही जो उस समारोह का घोषित "संयोजक" था, को ऐसा डपटा कि उसे वह बस झापड़ मार देगा। पर मारा नहीं, बोला, "कैसे-कैसे बेहूदे लोगों को बुला लिया !" कह कर उसने विद्रोही को आदेश दिया कि, "सरोज जी के बगल में कुर्सी पड़ी है उसे उठा लाओ।" विद्रोही थोड़ी झिझका तो मधुकर फिर डपटा, "कह रहा हूं कुर्सी उठा लाओ।" सींकिया काठी का विद्रोही जिसके अंग-अंग से विद्रोह फूट रहा था उसको यह सब अपमानित करने वाला लगा। वह मधुकर से तो कुछ नहीं बोला। पर लपक कर उसने अपने दूसरे चेले से कह कर सरोज जी के बगल वाली कुर्सी उठवा ली। सरोज जी की बगल वाली कुर्सी जब उठी तो सरोज जी ने मधुकर और विद्रोही को ऐसे देखा जैसे वह दोनों मिलकर उनकी दुनिया उजाड़ देना चाहते हों। वह जैसे अनाथ हो गए हों। सरोज जी की यह दशा और "प्रतिष्ठा" संजय को भी अच्छी नहीं लग रही थी। उसने देखा सरोज जी सचमुच बहुत लाचार लग रहे थे पर संजय की ओर देखने से भी कतरा रहे थे।

संजय मधुकर की विवशता भी देख रहा था। लाल बारादरी का वह हाल वास्तव में इतना छोटा था कि आने जाने की जगह छोड़ने के बाद चार कुर्सियां ही मंच पर लग पाई थीं। मधुकर को अंदाजा कतई नहीं था कि आमंत्रित चारों विशिष्ट अतिथियों में से चारों के चारों आ जाएंगे। उसको दो-एक के ही आने की उम्मीद थी। पर चार में से तीन आ चुके थे। और चौथे अतिथि मंत्री जी थे। मंत्री जी के भी आने की सूचना आ गई थी। पुलिस वाले अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद थे। एक इंस्पेक्टर ने आकर बता दिया था कि वायरलेस पर संदेश आ गया है कि मंत्री जी घर से निकल चुके हैं। रास्ते में हैं। और कि बस यहां पहुंचने ही वाले हैं। विद्रोही माइक पर इस बात की घोषणा भी बार-बार कर रहा था। तो तीन विशिष्ट आ चुके थे। चौथे मंत्री जी आ रहे थे। और मंच पर कुर्सी थी सिर्फ चार। मधुकर की सारी परेशानी यही थी। क्योंकि अतिथियों के साथ मंच पर वह खुद भी बैठना चाहता था। उसका वश चलता तो सरोज जो को मंच से उतार देता। क्योंकि चारों विशिष्ट अतिथियों में न सिर्फ सबसे गरीब, निरीह और कम जोर बल्कि बेकार भी उसे सरोज जी ही लग रहे थे। पर कहीं वह नाराज होकर समारोह की गरिमा नष्ट न कर दें इसी चिंतावश उन्हें मंच से उतारने के बजाय मंच पर एक पांचवी कुर्सी लगवाने की जुगत में मधुकर लगा हुआ था। इसी जुगत में, रणनीति में उसने एक दूसरे चमचे को बुलाया और निर्देश दिया कि सरोज जी को थोड़ा किनारे खिसकाओ। उसने जाकर बिना किसी मुरौव्वत के सरोज जी की कुर्सी किनारे खिसकवा दी। और मधुकर ने अपनी पांचवीं कुर्सी मंच पर न सिर्फ रखवा ली, बगल की कुर्सी भी मंत्री जी के लिए खाली रखवा ली। ताकि वह फोटो में मंत्री जी के बगल में नजर आए। पर मंत्री जी के आने में लगातार विलंब होता जा रहा था। इस विलंब से एक व्यक्ति को छोड़ कर समारोह में उपस्थित सभी उकता रहे थे। पर विद्रोही माइक पकड़ कर लगातार अपने ही को स्थापित करने में डटा पड़ा था। वह माइक पर जैसे जूझ गया था। संजय ने देखा, मधुकर को विद्रोही की यह अदा बिलकुल ही अच्छी नहीं लग रही थी। और वह रह-रह कर बैठे-बैठे पीछे से विद्रोही का कुरता पकड़ कर खींच लेता। कुरता खींच कर मधुकर जैसे उसे संकेत दे रहा था कि, "अपना यह प्रलाप बंद करो।" मधुकर और विद्रोही का यह प्रसंग मंच और मंच से नीचे सभी देख रहे थे। पर विद्रोही न यह सब देख रहा था,  न समझ रहा था, उलटे जब बहुत हो गया तो वह माइक उठा कर दो कदम आगे बढ़ गया। इस तरह मधुकर की पहुंच से बाहर होकर वह अपने को स्थापित करने में जी जान से जुट गया।

मधुकर कुढ़ कर रह गया।

संजय यह सब देख-देख कर उकता सा गया था। वह वहां से खिसक लेने की सोच ही रहा था कि मंत्री जी आ गए। सभी उठ खड़े हुए। पर संजय बैठा रहा। सब लोग बैठ गए। सरोज जी की छटपटाहट अब देखने लायक थी। मंत्री जी की बगल में बैठने को हालांकि हर कोई लालायित था। सुमन, संपादक जी, सरोज जी और मधुकर खुद। पर सबसे ज्यादा छटपटाहट सरोज जी के चेहरे पर थी। सरोज जी अपनी कुर्सी से उठे भी। उधर लपके भी। पर तब तक मंत्री जी को मधुकर अपनी बगल में आसीन करा चुका था। इस अफरा-तफरी में सुमन जी भी पिछड़ गए और मंत्री जी की दूसरी बगल वाली कुर्सी में संपादक जी फिट हो गए। तब जब कि अभी तक सुमन जी उसी कुर्सी पर बैठे हुए थे। वह मन मार कर संपादक जी की पुरानी कुर्सी पर बैठे। सरोज जी के बगलगीर बन कर। पर इस पूरे उठा पटक में सबसे ज्यादा नुकसान में सरोज जी ही रहे। उनकी कुर्सी अब बिलकुल हाशिए पर खिसक क्या खिसका दी गई थी। और जरा संभल कर नहीं बैठते सरोज जी तो नीचे भी लुढ़क सकते थे। पर सरोज जी जरा नहीं पूरा संभल कर बैठ गए थे। क्योंकि अब समारोह के अध्यक्ष का नाम घोषित होने का समय आ गया था। और जैसा कि तय था सरोज जी सचमुच अध्यक्ष घोषित कर दिए गए। सरोज जी अपना छोटा सा सीना फुला कर जो जीता व ही सिकंदर का भाव चेहरे पर चिपका कर ऐसे बैठे जैसे उनके आगे वहां सभी बौने हों। माल्यार्पण शुरू हो गया था। मंत्री जी से माल्यार्पण शुरू होकर मधुकर से होते हुए सबसे आखिर में माला सरोज जी तक पहुंची तो शायद उन्हें अपनी हीनता का एक बार फिर एहसास हुआ। माला भी उन्हें अपेक्षतया छोटी ही मिली। पर मिली, इस भर से उन्होंने संतोष कर लिया। माला पहनते ही सबने माला उतार दी थी। पर सरोज जी ने माला आखिर तक नहीं उतारी। वह पहने रहे। अब हालत यह थी एक तरफ समारोह के अध्यक्ष सरोज जी थे, माला पहने हुए। दूसरी तरफ समारोह का संचालक विद्रोही था, माइक लिए हुए। दोनों में जैसे मुकाबला हो रहा था कि कौन ज्यादा "ठेंठ" है। कौन ज्यादा "ढींठ" और "हया प्रूफ" है। जाहिर है कि सरोज जी ही अंतत: सफल साबित हुए। क्योंकि विद्रोही विद्रोही पर उतर आया कि कुछ भी हो जाए माइक नहीं छोड़ेंगे। तभी मधुकर अपनी सीट पर से उठा और पीछे से उसके कान में बोला, "अब मुझे आमंत्रित करो" तो जैसे विद्रोही तुरंत कुछ समझ नहीं पाया और मंत्री जी के स्वागत में अपना कवितामय भाषण बीच में ही छोड़ कर बोल पड़ा, "आदरणीय मधुकर जी का आदेश है कि अब मुझे आमंत्रित करो तो मैं अब उन्हें सादर आमंत्रित करता हूं।" सुन कर सब के सब हंसने लगे। और विद्रोही बिना कुछ समझे कि लोग क्यों हंस रहे हैं टिप से खुद भी हंस पड़ा। पर माइक उसने नहीं छोड़ा और बोला, "हां तो मैं कह रहा था" वह अभी यह बोल ही रहा था कि मधुकर, "सब कुछ तुम्हीं बोल डालोगे तो मैं क्या बोलूंगा" कहते हुए घसीट कर उससे माइक छीनता हुआ शुरू हो गया, "प्रात: स्मरणीय...." और फिर जितने विशेषण, अलंकरण उसे याद आए वह बड़ी देर तक बोलता रहा, "हिंदी के धूमकेतु, हिंदी के वो, हिंदी के ये" और सब सारे विशेषण, अलंकरण वह दो-दो, तीन-तीन बार मंत्री जी के सम्मान में बोल चुका पर उनका नाम उसकी जबान पर फिर भी नहीं आ पाया तो माइक पर हाथ लगाकर, सिर झुका कर वह मंत्री जी से ही पूछ बैठा, "क्षमा कीजिएगा, आपका नाम क्या है?" पूछा मधुकर ने धीरे से था पर माइक जरा ज्यादा सेंसिटिव था उसने यह सवाल सबको सुना दिया। मंत्री जी का काला-काला चेहरा तमतमा कर सुर्ख हो गया। मारे गुस्से के वह लाल हुए जा रहे थे कि इसी बीच संपादक ने इलायची चबाते हुए उनका नाम उच्चार दिया, "वासुदेव सिंह जी!" तो मधुकर ऐसा उछला जैसे गावसकर ने सिक्सर मारा हो, "हां, तो वासुदेव सिंह जी!" कह कर वह फिर उनके यशोगान में लग गया। पर मंत्री जी को अब कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। वह दो तीन बार उठने को उद्धत हुए पर बैठ-बैठ गए। पर उनके बैठने का रंग उड़ गया था। ढंग बदल गया था। पर मधुकर उनकी वंदना में मुक्तक पर मुक्तक पढ़े जा रहा था। अंतत: जब बहुत हो गया तो मंत्री जी मधुकर की बीच "वंदना" में बोल पड़े, "मेरे पास ज्यादा समय नहीं है, मुझे जाना है।" कहते हुए वह उठ खड़े हुए, "अब मुझे आज्ञा दीजिए!" मधुकर की जैसे हवा सरक गई। वह हकबका गया। पर धैर्य उसका कायम था। हाथ जोड़कर बोला, "पर कृपा करके पुरस्कार वितरण करते जाइए।"

"बहुत विद्वान लोग बैठे हैं।" मंत्री जी ने संपादक और सुमन जी को इंगित किया, "पुरस्कार वितरण आप लोगों से करा लीजिए।"

"बस ज्यादा नहीं दस मिनट का समय और दे दें।" मधुकर हाथ जोड़ता हुआ बोला।

"अब इन लोगों का मन रख लीजिए।" संपादक ने भी विनती की। मंत्री जी मान गए। पर मधुकर की जाहिलियत से समारोह का रंग उतर चुका था।

पुरस्कार वितरण शुरू हुआ। सबसे पहले उस समारोह का सबसे बड़ा पुरस्कार महेंद्र को मिला-मुक्ति बोध पुरस्कार। उसने अपने लिए एक शील्ड बनवा रखी थी और दो हजार एक रुपए का एक बैंक ड्राफ्ट। बैंक ड्राफ्ट वह जेब से निकाल कर विद्रोही को दे रहा था कि वह मंत्री जी को दे दे उसे देने के लिए। इस तरह जो भद हुई वह तो हुई ही पर जो नहीं जानता था वह भी जान गया कि पुरस्कार समारोह पूरा का पूरा न सिर्फ प्रायोजित है बल्कि खुद के लिए खुद के द्वारा आयोजित है। खैर, धड़, धड़ पैंतीस-चालीस लोगों के नाम विद्रोही ने कुछ इस तरह पुकारे जैसे वह लोग किसी बच्चे की तरह मेले में खो गए हों और माइक पर एनाउंसमेंट किया जा रहा हो कि उनके अभिभावक आकर उन्हें ले जाएं। खैर, पुरस्कारों के अभिभावक आ-आ कर अपने-अपने पैसे की शील्ड, कप और फीता मय प्रमाण-पत्र को ले गए। पुरस्कार वितरण के बाद यह हुआ कि सभी विशिष्ट अतिथि दो-दो शब्द बोल दें। संपादक जी का नंबर पहले आया वह मौके की नजाकत देखते हुए पारंपरिक शब्दावली को दुहरा कर सभी पुरस्कृत लोगों को बधाई देकर दो मिनट में ही बैठ गए। सुमन जी जैसा वक्ता भी जो घंटे दो घंटे से कम बोलना नहीं जानता था बस बधाई देकर एक दो बार बाल झटक कर ऐसे बैठ गए जैसे इस समारोह में आकर उसने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। ऐसी शर्मिंदगी सुमन जी के चेहरे पर संजय ने कभी नहीं देखी थी। मंत्री जी ने भी अपना नंबर आने पर सबको बहुत-बहुत बधाई दी, आयोजकों को धन्यवाद कहा और समारोह से अचानक चल पड़े। मंत्री जी क्या चले, सभी उनके पीछे चल पड़े। आखिर में मंच पर सिर्फ सरोज जी बैठे रह गए। शायद अपने अध्यक्षीय भाषण की बारी जोहते हुए। और दर्शकों में संजय बैठा रह गया था सरोज जी को जोहते हुए। इतना होने पर भी सरोज जी सिर धंसाए बैठे हुए थे। उनके इस धैर्य को देख कर दंग ही हुआ जा सकता था। और वह बड़ी देर तक इस तरह बैठे-बैठे जोहते रहे कि अध्यक्षीय भाषण तो उनका होगा ही। लोग लौट कर आएंगे ही। पर लौट कर कौन आने वाला था, यह संजय जानता था। वही मधुकर, विद्रोही और उसके दो तीन चेले, चमचे। यही आए भी। सरोज जी से विद्रोही ने कहा, "अच्छा दादा, आशीर्वाद देने के लिए आप आए, बहुत-बहुत शुक्रिया।"

सरोज जी चुप।

"अच्छा दादा चला जाए।" थोड़ी देर रुक कर जब विद्रोही बोला तो सरोज जी उठ खड़े हुए। वह उठे ऐसे जैसे कोई उनका सारा कुछ लूट ले गया हो। वह खड़बड़-खड़बड़ चल कर नीचे आए। विद्रोही उन्हें नीचे तक छोड़ने आया। नीचे आने के बाद वह नमस्कार कर जाने लगा तो सरोज जी का धैर्य जैसे चुक गया, उनकी अपमान कथा जैसे पूरी हो गई। वह चिल्लाए, "रिक्शा पर तो बइबाइ देव!"

"हां दादा, बुलाते हैं रिक्शा।" विद्रोही ने जोड़ा, "चिल्लाते क्यों हैं?" कह कर उसने अपने दूसरे चेले से रिक्शा लाने को कहा। बड़ी देर बाद वह एक खटारा सा रिक्शा लेकर आया। सरोज जी रिक्शे पर बैठ गए। और संजय से खीझते हुए बोले, "आप भी बैठ जाइए।" संजय भी जब रिक्शे पर बैठ गया और रिक्शा वाला चलने लगा तो सरोज जी फिर चीखे, "रुको।"

"का बात है?" रिक्शा वाला भी उसी टोन में चीखा।

"जवन तुमका बुलाइ लाए हैं, उनसे आपन पइसा भी मांग लेव।"

"तब उतरौ तुम, हम जाते हैं।" रिक्शे वाले ने घुड़पा।

"अच्छा, अच्छा तुम चलो। पैसा हम देंगे।" संजय बोला।

"बड़ा बेशर्म हैं सब।" सरोज जी बोले, "आप ठीक ही कहि रहे थे कि आदमी ठीक नहीं है।" उन्होंने जोड़ा, "बताइए भला कहीं अध्यक्षीय भाषण के बिना भी समारोह होता है?" लगा जैसे वह अभी रो पड़ेंगे। पर उसने देखा, माला उनके गले में अभी भी पड़ी हुई थी।

"मैं तो पहले ही आप से कह रहा था कि मत चलिए।" संजय बोला।

"हां, आपका कहना मान लेना चाहिए था।" सरोज जी कहने लगे, "कोई साहित्यिक संस्कार था ही नहीं उसमें।" कह कर उन्होंने माला गले से निकाल कर कुरते की जेब में रखी। और वह रिक्शे पर बैठे-बैठे जैसे सो गए। संजय भी चुप रहा। रिक्शा खटर-पटर चलता रहा।

पर दूसरे दिन सरोज जी जैसे सारा अपमान पी गए थे। उन्होंने संजय को अपनी केबिन में बुलाया और कहा कि, "कल के समारोह की रिपोर्ट बना दीजिए।"

"कौन सा समारोह?" संजय अचकचा गया।

"वही कल का पुरस्कार समारोह, सम्मान समारोह।" सरोज जी सहज होकर बोले। पर संजय असहज हो गया। और बिना बोले वह सरोज जी को घूरने लगा।

"साहित्यिक समारोह था। भूल जाएइ बाकी सब कुछ।" सरोज जी बोले, "दो पैरा ही बना दीजिए।" वह रुके, "बोले, आखिर मंत्री आए थे। खबर तो है ही।"

"पर मैंने तो कुछ भी नोट भी नहीं किया।" संजय टालते हुए बोला।

"यह कार्ड ले लीडिए। और याददाश्त के आधार पर बना दीजिए।" सरोज जी अनुरोध के लहजे में बोले।

"बना तो दूंगा।" वह बोला, "पर जो-जो घटा था सब कुछ जस का तस!" संजय उत्तेजित हो गया।

"अरे नहीं। वह सब नहीं।" सरोज जी बोले, "बस एक औपचारिक सी खबर बना दीजिए।"

"मैं नहीं बनाऊंगा।" संजय सख्त होकर बोला, "चाहे आप बुरा मानिए चाहे भला।" उसने जोड़ा, "फिर आपका इतना अपमान हुआ। तब भी आप खबर बनाने को कह रहे हैं। पर मैं एक लाइन नहीं लिखूंगा।" कह कर

संजय उनकी केबिन से बाहर निकल आया।

रात को वह जब दफ्तर से चलने लगा तो सरोज जी ने फिर उसे बुलाया। वह उनकी केबिन में पहुंचा तो सरोज जी बोले, "वह बेचारे सब फिर आए थे। गलती के लिए माफी मांग रहे थे। मेरे पैर गिर पड़े।" वह जैसे संजय को टटोलते हुए बोले, "मैंने माफ कर दिया।"

"पर मैं खबर नहीं लिखूंगा।" संजय बोला।

"ठीक है, मैं ही आपकी ओर से लिख देता हूं।" कह कर सरोज जी लिखने में लग गए।

संजय घर चला गया।

दूसरे दिन संजय अखबार में उस पुरस्कार समारोह की लंबी चौड़ी रिपोर्ट देख कर चकित रह गया। रिपोर्ट सरोज जी के अध्यक्षीय भाषण से शुरू हुई थी, और उनका अध्यक्षीण भाषण भी काफी लंबा था, बाकी रिपोर्ट भी बिलकुल "हरी-हरी" थी। हेडिंग भी सरोज जी के अध्यक्षीण भाषण पर ही थी।

दफ्तर आकर वह सरोज से भिड़ गया, "यह सब क्या है सरोज जी।"

सरोज जी कुछ नहीं बोले।

"पर आपका तो वहां अध्यक्षीय भाषण भी नहीं हुआ था। इतना अपमानित किया गया आपको वहां और आप फिर भी?"

"जो बात वहां नहीं कह पाए, वह यहां अखबार में कह दी।" सरोज जी सहज भाव से बोले, "वहां सिर्फ पैंतीस चालीस लोग सुनते, यहां हजारों लोग पढ़ेंगे। मतलब जो अपनी बात लोगों तक पहुंचाने से है।" कह कर सरोज जी बोले, "मुझे एक इस्टोरी लिखनी है। अब आप जाइए।"

शाम को उस सांध्य अखबार के संपादक जी सरोज जी से भी दो कदम आगे निकल गए। सांध्य अखबार में चार कालम की उस पुरस्कार समारोह की बड़ी सी फोटो छपी थी। जिसमें मंत्री जी मधुकर को शील्ड दे रहे थे और संपादक जी मंत्री जी को निहार रहे थे। पूरे फोटो में मंत्री जी और मधुकर गौड़ थे, संपादक जी, फ्लैश हो रहे थे। फोटो के साथ छपी खबर में यहां संपादक जी का भारी भरकम वक्तव्य था और खबर की हेडिंग भी संपादक जी के वक्तव्य से ही लगाई गई थी। बाद में हमदम ने बताया कि मधुकर ने इस पुरस्कार समारोह की बड़ी-बड़ी रिपोर्टेंमय फोटो के अपने शहर के अखबारों में भी छपवाईं।

मधुकर और उस सांध्य अखबार के संपादक का मामला तो फिर भी समझ में आता था। पर सरोज जी तो बाकायदा अपमानित हुए थे। सम्मान सहित अपमानित।

पर बाद में उसने देखा सरोज जी के लिए जलील या अपमानित होना जैसे कोई क्रिया ही नहीं थी। हर हाल में उनको अपना मकसद साधने भर से मतलब रहता। और वह साध लेते। येन-केन-प्रकारेण।

ऐसे ही एक बार लखनऊ के राशन दुकानदारों ने प्रेस कांफ्रेंस की। इस प्रेस कांफ्रेंस की प्रेरण भी एक नामी पत्रिका के ब्यूरो प्रमुख ने दी जो खुद भी मूलत: राशन दुकानदार थे। राशन की दुकान करते-करते वह सब इंस्पेक्टर नियुक्त हुए। दरोगा कहलाने लगे। दरोगागिरी से बर्खास्त हुए तो वह फिर से राशन दुकानदार हो गए। राशन दुकानदारों की यूनियन बनाई। पदाधिकारी बन गए। और जब-तब अखबारों में विज्ञप्तियां छपवाने जाने लगे। विज्ञप्तियां छपवाते-छपवाते उन्हें भी पत्रकार बनने की धुन समाई। और फिर वह पत्रकार हो गए। बाहर के एक दैनिक के संवाददाता बन गए। साथ ही सत्यकथाएं लिखते रहे। और फिर धीरे-धीरे वह एक पत्रिका के ब्यूरो चीफ हो गए। पर पुराना यानी मूल धंधा राशन दुकानदारी, उन्होंने नहीं छोड़ी। तो उन्हीं ब्यूरो चीफ महोदय ने राशन दुकानदारों को सलाह दी कि प्रेस कांफ्रेंस करिए। और बड़े पत्रकारों को बुलवाइए। वह पत्रकार जो मुख्यमंत्री को कवर करते हैं। बात मुख्यमंत्री तक भी जाएगी और खबर भी उम्दा छपेगी, काम बन जाएगा। बस पत्रकारों को प्रेस कांफ्रेंस में बढ़िया लंच और शानदार गिफ्ट देने या इंतजाम कर डालिए। राशन दुकानदार मान गए। मुख्यमंत्री कवर करने वाले पत्रकारों को जो ज्यादातर ब्यूरो चीफ या स्पेशल क्रासपांडेंट ही थे, गुपचुप सूचित कर दिया गया कि प्रेस कांफ्रेंस है और डग्गे का इंतजाम है। डग्गा मतलब गिफ्ट! बात चूंकि डग्गे की थी सो पत्रकारों में इस प्रेस कांफ्रेंस की खबर आग की तरह फैली। पर गुपचुप-गुपचुप। खबर संजय तक भी आई। खाद्य और रसद संजय की बीट में भी था। पर महत्वपूर्ण उसे भी डग्गा ही लगा। उसने दफ्तर में पूरी छानबीन और दरियाफ्त की। इस कांफ्रेंस की औपचारिक चिट्ठी जो संपादक के नाम से आनी चाहिए था, नहीं आई थी। संपादक तो क्या मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति से औपचारिक अनुमति भी नहीं थी इस प्रेस कांफ्रेंस की। फिर भी उसने सरोज जी से भी दो तीन बार दरियाफ्त किया और बताया कि राशन दुकानदारों की कोई प्रेस कांफ्रेंस है। सरोज जी हर बार टाल गए। और जब बहुत हो गया तो बिगड़ गए। बोले, "कहीं कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं है। आप अपना काम कीजिए।" पर संजय भी हार मानने वाला नहीं था। प्रेस कांफ्रेंस की खबर पक्की थी। सो उसने संपादक को इसकी सूचना दी और पहुंच गया प्रेस कांफ्रेंस में। वहां पहुंचा जरा देर से। प्रेस कांफ्रेंस शुरू हो चुकी थी। वहां उपस्थित कई पत्रकारों को देखकर संजय मुसकुराया। इन पत्रकारों में मद्रास से प्रकाशित हिंदू तक के विशेष संवाददाता मौजूद थे जिन्हें इस खबर से कोई वास्ता नहीं था। हिंदू ही क्यों कई बाहरी अखबारों और पत्रिकाओं के संवाददाताओं की उपस्थिति संजय को मजा दे गई। वह चारों ओर नजर दौड़ कर बैठ गया। सरोज जी भी उपस्थित थे। संजय को देखते ही सरोज जी हकबका कर असहज हो गए। अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे तीन-चार बार ऐंठे। उनका ऐंठना देखकर संजय को और मजा आ गया। सरोज जी को अब सब कुछ बेकार और अर्थहीन लग रहा था। ऐंठते-ऐंठते वह अचानक उठकर खड़े हो गए। लोगों ने टोका तो वह हड़बड़ाते हुए बोले, "अब मैं जा रहा हूं।"

"रुकिए दादा, रुकिए दादा।" कहते हुए एक पदाधिकारी उठकर उन्हें रोकने लगा, "बस दस मिनट और।"

सरोज जी बैठ गए। बोले, "पर जल्दी कीजिए।"

संजय माजरा समझ गया कि सरोज जी उसे देख कर ही बिदक रहे हैं। बाकी पत्रकार भी मुसकुराए। संजय ने सरोज जी की खातिर वहां से खिसक लेने में ही भलाई समझी। और अब वह उठ खड़ा हुआ। तो वह पदाधिकारी उसके पास भी "भाई साहब रुक जाइए" कहता हुआ पहुंच आया। हाथ जोड़ते हुए बोला, "दस मिनट और।"

"मैं जा कहां रहा हूं।" संजय झूठ बोला, "मैं तो बस पेशाब करने जा रहा हूं।"

"अच्छा-अच्छा।" कह कर वह पदाधिकारी निश्चिंत हो गया।

सभी दिग्गज पत्रकारों को छोड़कर संजय होटल से बाहर निकल कर हजरतगंज में एक जगह स्कूटर खड़ी कर उस पर बैठ गया और आती जाती लड़कियों को निहारने लगा। गुनगुनी धूप में बैठ कर सुंदर लड़कियों को देखने का मजी ही कुछ और है। कोई पौने घंटे तक आंखें सेंकने के बाद वह वापस होटल पहुंचा। प्रेस कांफ्रेंस खत्म हो चुकी थी। दिग्गज पत्रकार जा चुके थे। उसे देखते ही एक राशन दुकानदार चहका, "बड़ी देर तक पेशाब किया भाई साहब।"

"पेशाब क्या सरोज जी की परेशानी दूर करने चले गए थे।" एक दूसरा राशन दुकानदार बोला, "क्यों संजय जी?"

संजय कुछ बोला नहीं। मुसकुरा कर रह गया। खाना खाकर जब वह चलने लगा तो उसे भी डग्गा यानी गिफ्ट दिया गया। एक पोलिथिन थैले में लिपटा हुआ। रास्ते में आकर उसने देखा चीनी थी। एक दुकान पर ले जाकर तौलवाया तो उस चीनी का वेट ढाई किलो निकला। वह हंसा कि ढाई किलो चीनी की गिफ्ट के लिए ये दिग्गज पत्रकार दो कौड़ी के राशन दुकानदारों की प्रेस कांफ्रेंस में परेड कर गए। वह ढाई किलो चीनी लिए एनेक्सी सचिवालय पहुंचा। उसने सोचा प्रेस रूम में इसी बात की चर्चा हो रही होगी। पर प्रेस रूम में सन्नाटा था। तीन पत्रकार थे, जो उस प्रेस कांफ्रेंस से लौटे थे, उन्हें संजय ने छेड़ा भी कि, "ढाई किलो चीनी के खातिर आप लोगों ने आज पत्रकारिता की ऐसी तैसी करवा दी।" पर तीनों कुछ नहीं बोले और बासी अखबारों में सिर घुसाए रहे। पर संजय भी हार मानने वाला नहीं था। उसने प्रेस रूम से ही फोन कर-कर के अपने दोस्त पत्रकारों को यह ढाई किलो चीनी के डग्गे की खबर परोस दी। अब पूरे शहर के पत्रकारों में ढाई किलो चीनी की चर्चा थी।

शाम को जब संजय दफ्तर पहुंचा तो सरोज जी पहले ही से भन्नाए बैठे थे। उसे देखते ही बिगड़ पड़े। और राशन दुकानदारों का प्रेस नोट देते हुए बोले, "ई खबर बना डालिए।"

"मैं क्यों बनाऊं?" संजय ने मुंह पिचका कर कहा, "ढाई किलो चीनी का डग्गा लेने मैं तो गया नहीं था, आप गए थे, आप ही बनाइए।" सुनकर सरोज जी भकुआ गए। बड़ी सी ठंडी सांस भरी। बोले, "हां, बड़ी बेइज्जती कर दी ससुरों ने।" और वह उदास हो गए।

"कायदे से यह खबर जानी ही नहीं चाहिए।" संजय बोला।

"हां, देखते हैं।" कह कर सरोज जी अपनी केबिन में घुस गए। उसने देखा दूसरे दिन सुबह अखबार में सरोज जी ने विशेष प्रतिनिधि लाइन से ही वह खबर लिखी थी। चार कालम का डिस्प्ले मिला था। पर दूसरे किसी भी अखबार में यह खबर नहीं छपी थी।

सो एनेक्सी के प्रेस रूम में बैठ कर सभी पत्रकारों ने सरोज जी की जम कर थू-थू की। कि इस बेइज्जती के बाद भी सरोज जी ने खबर क्यों लिखी?

पर सरोज जी पर कोई असर नहीं था।

इस वाकये से संजय को दिल्ली की एक घटना याद आ गई। कुछ पत्रकार नहा धोकर एक मंत्री जी के पीछे पड़ गए थे। जब तक उनके खिलाफ खबर छपती रहती। मंत्री जी आजिज आ गए। एक बार जब वह विदेश गए तो वापस आकर पत्रकारों को अलग-अलग सूट का कपड़ा गिफ्ट दिया। और हर किसी से कहा कि खास आपके ही लिए यह लाए हैं। मंत्री जी पत्रकारों की पॉकेट की भी थाह जानते थे सो साथ ही एक टेलरिंग शाप का पता भी एक पर्ची के साथ देते गए कि, "आप चाहें तो यह दर्जी मुफ्त सिल देगा। अपना आदमी है।"

इसके कुछ दिन बाद मंत्री जी ने इन सभी पत्रकारों को एक रात डिनर पर बुला लिया। सभी पत्रकार वही नया सूट पहन कर पहुंचे। मंत्री जी के घर पहुंच कर पता चला कि सभी पत्रकार एक ही रंग के सूट में उपस्थित थे। गोया वह भोज में नहीं, किसी स्कूल में पढ़ने आए हों। एक ही ड्रेस में। हुआ यह था कि मंत्री ने एक ही थान से सभी पत्रकारों को सूट का कपड़ा जानबूझ कर गिफ्ट किया था। पत्रकार बिदके तो बहुत पर उनकी कलई एक दूसरे पर खुल चुकी थी। और पत्रकार की कलई कहीं भी खुले, पर वह यह हरगिज नहीं चाहता कि उसकी कलई किसी दूसरे पत्रकार के सामने खुले।

बहरहाल, मंत्री जी के खिलाफ खबरें छपनी बंद हो गईं।

जाने उस प्रेस कांफ्रेंस का फ्रस्ट्रेशन था या कुछ और उसी हफ्ते एक काकटेली प्रेस कांफ्रेंस में सरोज जी जरूरत से ज्यादा पी गए। हरदम भांग में टुन्न रहने वाले सरोज जी उस दिन शराब में इतने धुत्त हो गए कि उन्हें कुछ भी खयाल नहीं रहा। खाते समय वह डोंगे में ही दोनों हाथों से शुरू हो गए। एकाध बार लड़खड़ाए भी वह पर फिर भी नहीं संभले। अतत: स्थिति यह हो गई कि जहां खड़े वह डोंगे को ही प्लेट बनाए दोनों हाथों से किसी बच्चे की तरह खाने में लगे थे, वहां से सभी लोग हट कर एक तरफ हो गए। जब कि अमूमन सभी पिए हुए थे। और पी रहे थे। प्रेस काफ्रेंस के आयोजकों ने आखिरकार उन्हें संभालने की कोशिश की। पर उन्हीं जूठे हाथों से एक व्यक्ति की टाई पकड़ कर झूल गए। होटल से बाहर निकलते समय वह शीशे के फाटक में घुसने के बजाय शीशे की दीवार से भिंड़ गए। गनीमत कि शीशा नहीं टूटा और वह हाथ ऐसे हिलाते हुए पीछे हटे जैसे गोया कोहरा साफ कर रहे हों। खैर दरबान ने पकड़ कर उन्हें बाहर किया। बाहर आयोजकों ने उन्हें संभाला। उन्हें घर पहुंचाने खातिर कार का फाटक खोल कर एक व्यक्ति खड़ा हो गया। कार का फाटक खुलते ही सरोज जी कार में घुसने की बजाय कार का फाटक पकड़ कर सड़क पर धम्म से बैठ गए और बोले, "चलौ!"

जिमखाना क्लब में एक दवा कंपनी की प्रेस कांफ्रेंस में सरोज जी की यह नौटंकी आकाशवाणी का संवाददाता एम. लाल संजय से बतिया ही रहा था कि हेरल्ड के न्यूज एडीटर चौहान ने ठीक वही हरकत यहां शुरू कर दी थी। वह भी दोनों हाथों को डोंगे में डाल कर मुर्गे की लेग पीस ढूंढ़ रहा था और चिल्ला रहा था, "सारी टांगें साले बीन ले गए।" चौहान की इस हरकत से सबका नशा टूट रहा था। वार्ता का द्विवेदी बोला, "ऐसे लोगों को बुला कौन लेता है?"

"कौन साला कमेंट कर रहा है?" चिल्लाते हुए चौहान ने डोंगा पलट कर नीचे गिरा दिया। और बोला, "खुद को एसाइन करता हूं और चला आता हूं। है कोई रोकने वाला?"

कहते हुए वह लड़खड़ाया। और पलट कर खटाखट दो पेग पी गया। ऐसे, जैसे पानी पी रहा हो। जिमखाना क्लब में उस समय एक्सट्रा कंस्ट्रक्शन के लिए नींव खुदी हुई थी और पानी भी रिमझिम-रिमझिम बरस रहा था। मौसम खुशनुमा हो गया था। पर चौहान ने उस मौसम का रंग खराब कर रखा था। एम.लाल बड़बड़ाया भी, "उसी दिन सरोज ने मजा खराब किया आज यह चौहान साला मजा खराब करने पर लगा हुआ है।" अभी एम.लाल खीझ ही रहा था कि पता चला चौहान खुदी हुई नींव के गढ्डे में गिर गया। पता चला वह पेशाब करने गया और पेशाब करते-करते फिसल कर नींव के गढ्‍डे में लुढ़क गया। खैर किसी तरह क्लब के बेयरों ने खींच-खांच कर उसे बाहर किया। पीली मिट्टी से सना पुता चौहान फिर हाल में घुस आया। गिरने पड़ने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा था। उलटे वह अब पूरे फार्म में था। चर्म रोग से एक तो वैसे ही उसकी पूरी देह सफेद नजर आती दूसरे वह सफेद पैंट पहनता था। पर इस समय उसकी सफेद पैंट और सफेद देह पीली मिट्टी में सन कर अजीब सा कोलाज गढ़ रही थी। चौहान का यह रंग रूप देख कर बाकी पत्रकार भी जाने लगे। पर वह झूमता रहा। अचानक द्विवेदी से आयोजकों में से एक ने कह दिया कि, "इनको भी लेते जाइए।" तो द्विवेदी उस पर बिगड़ गया, "मैं क्यों ले जाऊं?" फिर लाल ने चौहान के घर का पता आयोजकों को दिया और कहा कि, "इसे खुद पहुंचाने मत जाइएगा, नहीं इसकी बीवी आप लोगों को दौड़ा लेगी।"

"फिर कैसे जाएंगे यह?" आयोजक घबराया।

"कुछ नहीं रिक्शे पर बैठा दीजिएगा। रिक्शे वाले को पैसा दे दीजिएगा। ये घर पहुंच जाएंगे।" कह कर लाल संजय के साथ बाहर आ गया।

उन्हीं दिनों लखनऊ से बंबई की उड़ान शुरू होने जा रही थी। पहली उड़ान में पत्रकारों को ले जाने की बात हुई। संपादक ने संजय को इसके लिए एसाइन किया। अब सरोज जी परेशान। संजय को इस एसाइनमेंट से काटने की उन्होंने चौतरफा कोशिश की। और संयोग से प्रेस क्लब में उन्हीं दिनों संजय का एक पत्रकार से झगड़ा हो गया। सरोज जी को यह बात पता चली। उन्होंने फौरन इस खबर को हवा दी और संपादक से कहा कि, संजय को भेजना ठीक नहीं है। यह वहां जाकर कोई लौंडपना कर देगा तो अखबार की नाक कट जाएगी।

उन्होंने जोड़ा, "कोई सीजंड आदमी जाना चाहिए।"

संपादक ने एक दूसरे रिपोर्टर को एसाइन कर दिया जिसके पिता बांग्लादेश एंबेसी में रह चुके थे। और वह पीता भी नहीं था। पर सरोज जी उसको भी काटने में लग गए। कहने लगे, "और अखबारों से सीनियर-सीनियर जा रहे हैं।" और अंतत: सरोज जी खुद ही गए। पर बंबई में भी उन्होंने काफी शराब पी और खूब उत्पात मचाया। गिर पड़ गए।

लखनऊ आकर उनकी बड़ी छींछालेदर हुई।

सरोज जी ने इस तरह लगातार छींछालेदर को धोने के लिए योग पर एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने पंडित जवाहर लाल नेहरू से अपनी मुलाकात का जिक्र किया। पूरे लेख में उन्होंने यह एहसास कराया कि वह कितने सीनियर पत्रकार हैं और कि नेहरू के जमाने से हैं। पर नेहरू से भेंट का ऐसा वर्णन उन्होंने लिखा कि सीनियर का मान पाने के बजाए उलटे वह मजाक बन गए। उन्होंने लिखा कि तब पंत जी मुख्यमंत्री थे और नेहरू जी लखनऊ आए हुए थे। वह पंत जी के घर ठहरे हुए थे। कुछ पत्रकार नेहरू जी से मिलने पंत जी के घर सुबह-सुबह पहुंच गए। पत्रकार पहुत देर तक बैठे रहे पर नेहरू जी बाहर नहीं आए। पता चला कि वह बाथरूम में हैं। पर जब बहुत देर हो गई तो पत्रकारों को जिज्ञासा हुई कि आखिर नेहरू जी बाथरूम में इतनी देर तक कर क्या रहे हैं? सो पत्रकारों ने यह पता लगाने का काम सरोज जी के जिम्मे छोड़ा। सरोज जी ने कुर्सी लगा कर बाथरूम की खिड़की से अंदर झांका तो देखा कि नेहरू जी तौलिया पहने शीर्षासन कर रहे हैं। यह जिक्र करते हुए सरोज जी नेहरू की सेहत का राज शीर्षासन बताया और यह भी जोड़ा कि मेरी सेतह का राज भी शीर्षासन ही है। और जब कभी मैं भी बाहर जाता हूं तो समय निकाल कर बाथरूम में शीर्षासन जरूर कर लेता हूं।

इस लेख से तीन चार मौलिक प्रश्न उठ गए और सरोज जी फिर मजाक के विषय बन गए। पहला सवाल यह उठा कि क्या सरोज जी शुरू से उठल्लू और बेवकूफ श्रेणी के पत्रकार थे? आखिर बाथरूम में झांकने का काम उन्हीं को क्यों सौंपा गया? दूसरे यह कि नेहरू तब प्रधानमंत्री थे। उन्हें बाथरूम में चुपके से शीर्षासन करने की क्या जरूरत थी? उनके लिए जगह की कमी तो थी नहीं। तीसरे, उन्हें प्रोटोकाल के हिसाब से मुख्यमंत्री निवास के बजाय राजभवन में ठहरना चाहिए। चौथे, यह कि अगर मित्रवत वह पंत जी के यहां ठहर भी गए तो क्या सुरक्षा व्यवस्था इतनी लचर थी कि कोई भी ऐरा गैरा उनके बाथरूम में झांक सकता था। तथा पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि अगर नेहरू जी सिर्फ तौलिया लपेट कर शीर्षासन कर रहे थे तो सरोज जी ने उनका क्या देखा होगा? जाहिर है शीर्षासन में तौलिया पलट कर पेट पीठ पर आ गई होगी। तो ऐसे में सरोज जी ने नेहरू जी का क्या देखा होगा।? सरोज जी के पास इन और ऐसे अन्य सवालों का कोई जवाब नहीं था।

वह निरुत्तर थे।

बाद में जो एक सवाल उठा वह और ज्यादा मौलिक था कि, सरोज जी की यह उलटबासियां आखिर छप कैसे जाती हैं? आखिर उन्हें पास कौन करता है। जो पास करता है, वह क्या उनका लिखा काटने की हिम्मत नहीं रखता या कि पढ़ता नहीं है?

"एक्जेक्टली, नहीं पढ़ा जाता सरोज जी का लिखा।" जवाब मनोहर ने दिया, "क्योंकि कनखजूरे जैसी बड़ी-बड़ी

अस्पष्ट लिखावट कुछेक पुराने कंपोजिटरों को छोड़ कर कोई नहीं पढ़ पाता। मैटर पास करने वाला वह चाहे एडीटर हो या सब एडीटर सरोज जी से कंटेंट पूछ कर सिर्फ हेडिंग लगा देता है। अंदर कंटेंट में डिटेल्स क्या है वह या तो सरोज जी जानते हैं या फिर बाद में वह कंपोजिटर जानता है। अब वह कंपोजिटर खबर रोके तो रुके नहीं छप जाने के बाद कोई क्या कर सकता है?"

"पर प्रुफ के बाद तो देखा जा सकता है। प्रुफ से भी एडिट किया जा सकता है।"

"इतनी फुर्सत किसे है?" मनोहर बोला, "और अब तो सरोज जी लिखते भी बहुत कम हैं। वह ज्यादातर एजेंसी की खबरों पर ही विशेष प्रतिनिधि लिख कर दे देते हैं। और कभी-कभी तो डेस्क पर ही आकर कह देते हैं कि फला-फला खबर आएगी उस पर विशेष प्रतिनिधि लगा देना।" मनोहर प्रेस क्लब में बैठा सरोज जी की बखिया उधेड़ता जा रहा था। मनोहर इस समय चौथे पेग पर था और बता रहा था कि, "एक समय हिंदुस्तान समाचार न्यूज एजेंसी का एक रिपोर्टर रामनाथ के लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर तब के डायनामाइट कांड के ही रो जार्ज फर्नाडीज की गिरफ्तारी की एक लंबी चौड़ी स्टोरी जारी कर दी। सरोज जी ने टप से उसे टेलीप्रिंटर पर से फाड़ा, उतारा, "बड़ी फर्स्ट क्लास इस्टोरी है" कहकर डेस्क पर दिया और सीढ़ियां उतर गए। बाद में रात में एजेंसी ने फर्नांडीज की गिरफ्तारी वाली स्टोरी को रिग्रेट कर लिया। और फ्लैश भेज दिया कि उस स्टोरी को न लें क्योंकि बाद में जांचने पर पाया गया कि ऐसी कोई घटना घटी ही नहीं। डेस्क वाले भी एक जाहिल। उन्होंने खबर भेजने वाले रजिस्टर से जांचा और देखा कि उस न्यूज एजेंसी की कोई खबर गई ही नहीं थी। सो नाइट शिफ्ट का इंचार्ज बोला, "जब खबर गई ही नहीं तो रोकना किसको है?" और इस तरह दूसरे दिन जार्ज फर्नांडीज की गिरफ्तारी की खबर सरोज जी की बाइलाइन के साथ बैनर बन कर छप गई। जब कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था।" मनोहर बोला, "दूसरे दिन सरोज जी और अखबार की वो थू-थू हुई कि पूछो मत।"

पर सरोज जी की यह एजेंसी वाली खबरें ज्यों की त्यों छापने वाली आदत फिर भी नहीं गई।

सरोज जी कवि सम्मेलनों, कवि गोष्ठियों की अध्यक्षता अक्सर ही करते रहते थे। आयोजकों को दोहरा लाभ होता था। एक तो स्थाई अध्यक्षता करने वाला सरोज जी का "व्यक्तित्व" मिल जाता था, दूसरे बिना किसी कोशिश के अखबार में खबर छप जाती थी। वह भी ठीक-ठाक डिस्प्ले के साथ। पर अब वह उम्र के इस पड़ाव पर जब सपने टूटते हुए देखते तो उसे जगह-जगह अपने सम्मान समारोह आयोजित करवा कर पूरा करने की कोशिश करने लगे थे। अब तक उनके सपने दो से तीन की संख्या धारण कर चुके थे। एक एम.एल.सी. दूसरा संपादक, तीसरा हिंदी संस्थान का लखटकिया पुरस्कार। पर तीनों ही उनके हाथ से फिसलते जा रहे थे। नौकरी से रिटायर होकर एक हजार रुपए के विशेष प्रतिनिधि का पद उन्हें अब बहुत नहीं भाता था। पर वह जैसे अभिशप्त थे इसे ढोने के लिए। ऐसे में छोटे-मोटे उनके सम्मान समारोह उनके सपनों को जैसे सांस दे देते। कई बार उनका सम्मान अकेले होता उन्हें फीका-फीका सा लगता। समारोह भी सिर्फ अखबार में ही सफल होता। वास्तव में तो वह मातम समारोह हो जाता। इससे बचने के लिए सरोज जी अकसर आयोजकों को साथ ही दो तीन और व्यक्तितत्वों का सम्मान करने के लिए प्रेरित करते। पर तब वह खुद उपेक्षित हो जाते। और अकसर उन्हें छोटी या बची माला ही नसीब होती। इससे भी वह बहुत दुखी रहते। दफ्तर आते और माला मेज पर निकाल कर रख देते। और जिस-तिस को पकड़ कर सम्मान समारोह का बखान बताते रहते।

एक बार सरोज जी बड़ी सी माला पहने रात के नौ बजे दफ्तर आ गए। और जो भी कोई दफ्तर में मौजूद था उसके सामने से वह गुजरे जरूर। कोई पंद्रह किलोमीटर दूर से वह माला पहन कर आए थे। माला पहने ही प्रेस में भी बेवजह ही वह चक्कर मार आए। ऐसे जैसे पानीपत की लड़ाई जीत कर आए हों। उनकी चाल में बच्चों सी ललक और चेहरे पर विजेता की मुसकान थी। वह माला पहने बड़ी देर तक इधर से उधर मंडराते रहे। और अंतत: नमाइश बन बैठे। अब हर कोई सरोज जी की माला देखने लगा था। फिर उस रात माला पहने ही वह घर गए।

अंग्रेजी वाले अखबार के संपादक से रहा नहीं गया। बोले, "लगता है आज यह सोते समय भी माला नहीं उतारेंगे।"

"उतारेंगे?" त्रिपाठी बोला, "मुझे तो डर है कहीं कल भी न यह माला पहन कर वह दफ्तर आ जायें। आखिर नाप से बड़ी जो मिली है।" उसने जोड़ा, "माला।"

"हो सकता है।" संपादक कंधे उचका कर बोले, "सरोज जी ऐसा भी कर सकते हैं!"

पर दूसरे दिन सरोज जी माला पहन कर दफ्तर नहीं आए। शायद इसलिए कि माला वाली उनकी फोटो अखबार में छप गई थी। फिर भी मीटिंग में वह फोटोग्राफर पर बरस पड़े कि, "माला की पूरी लेंथ में फोटो क्यों नहीं खींची?" और वह सफाई दे रहा था, "खींची तो थी दादा, पर डेस्क वालों ने काट दी।"

"डेस्क वालों ने काट दी।" चिढ़ाते हुए सरोज जी ने उसकी बात दुहराई। दूसरी ओर त्रिपाठी "वो नहीं आई आज सरोज जी के साथ" कहता घूमता रहा। लोग पूछते, "कौन नहीं आई?" त्रिपाठी बोलता, "माला!" लोग हंसने लगते। ....जारी....

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