अपने-अपने युद्ध (18)

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दयानंद पांडेयकुछ दिन बाद लखनऊ महोत्सव में सरोज जी ने अपने सम्मान की योजना बनवाई। महोत्सव के कवि सम्मेलन का संयोजक विनय था। विनय कवि कम, कवि सम्मेलन संयोजक ज्यादा था। कविता ऐसे पढ़ता जैसे जिंदगी का निकृष्टतम कार्य कर रहा हो। कविताएं उसकी मधुकर की तरह स्मगलिंग वाली ही होतीं। पर मधुकर का कविता पाठ उसे असली कवि बना देता। पर विनय का कविता पाठ भी उसे स्मगलर ही साबित करता। अमूमन वह अपने ही द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों में हूट हो जाता।

पर इसका कभी मलाल नहीं होता। उसे तो बस कवि सम्मेलन से होने वाली आमदनी से सरोकार रहता। दरअसल विनय, मधुकर से बड़ा कमीशनखोर था। तो महोत्सव में विनय से कह कर सरोज जी ने अपने सम्मान की व्यवस्था कर ली। और सबको फोन कर-कर बताते रहे कि "मेरा सम्मान है, आइएगा जरूर।" सम्मान उनका गरिमापूर्ण हो इसके लिए उन्होंने  साथ में कुछ और महत्वपूर्ण लोगों का सम्मान निश्चित करवा लिया। जैसा कि डर था, सरोज जी के इस सम्मान समारोह मे भी वही हुआ। सम्मानित होने वाले और व्यक्तित्वों के आगे सरोज जी बौने हो गए। और चूंकि उनका खुद का सम्मान समारोह था इसलिए अध्यक्षता से भी वह हाथ धो बैठे थे। मंच पर उन्हें ठीक से बैठने की जगह भी नहीं मिली। और गजब यह हुआ कि सबका सम्मान हो गया, माला हो गई, शाल और मानपत्र हो गया पर सरोज जी का नाम ही भूल गए आयोजक। बाद में विनय को बुला कर सरोज जी ने जब याद दिलाया तब कहीं उनके सम्मान का नंबर आया। संचालक ने सरोज जी का नाम भूल जाने के लिए माफी मांगी और उनका नाम पुकारा।

बात यही तक होती तो गनीमत होती। कवि सम्मेलन का संचालक जैसे उनसे खार खाए बैठा था। उसने सरोज जी को शुरू के दो तीन लोकल कवियों के क्रम मे ही कविता पाठ के लिए बुला लिया। सरोज जी कुपित हो गए। पर नाम कविता पाठ के लिए पुकार लिया गया था, वह करते भी तो क्या करते। आदतवश माला उनके गले में ही थी। कंधे पर उन्होंने सम्मान वाली शाल भी डाल रखी थी। माइक पकड़ कर वह खड़े हो गए। बताया कि, "क्रम में यह मेरा स्थान नहीं।" संचालक की ओर आग्नेय नेत्रों से फुंफकारा और वीर रस की लंबी कविता बेलीगारद का पाठ शुरू कर दिया। पर "बेलीगारद! बेलीगारद।" चार बार सुना कर ज्यों ही वह दूसरी लाइन पर आए, हूटिंग शुरू हो गई। जबरदस्त हूटिंग! पर सरोज जी जैसे बहरे हो गए। हूटिंग उन्होंने नहीं सुनी। जब श्रोता खड़े होकर हूट करने लगे तो उन्होंने कान के साथ-साथ आंखें भी बंद कर लीं। पर कविता पाठ नहीं बंद किया।

हूटिंग का शोर इतना जबरदस्त था कि सिवाय बेलीगारद के सरोज जी का उच्चारा कुछ भी सुनाई नहीं पड़ रहा था। बिलकुल विधान सभा या संसद जैसा दृश्य उपस्थित था। पर सरोज जी बेलीगारद कविता का पाठ ऐसे कर रहे थे जैसे कोई मंत्री संसद में शोर गुल की परवाह किए बिना अपना वक्तव्य पढ़ता जा रहा हो। वीर रस की उनकी कविता का वाचन अब तक करुण रस में बदल गया था। सरोज जी कांपने लगे। इस कंपकंपाहट में उनकी सम्मान वाली शाल कंधे से नीचे गिर गई। श्रोताओं के बीच से बिलकुल विधान सभा की तर्ज पर "पढ़ा हुआ मान लिया गया" कि आवाज भी कई बार आई। वह रूआंसे हो गए। लगा कि सरोज जी अब रो देंगे। पर वह रोए नहीं। उनका कविता पाठ भी नहीं रुका। मंच पर बैठे कवि हंसते रहे। और इस तरह कोई आध घंटे सरोज जी कविता पढ़ते रहे। और तब तक कविता पढ़ते रहे जब तक वह खत्म नहीं हुई। कविता खत्म हुई। सरोज जी बिलकुल एबाउट टर्न स्टाइल में पीछे मुड़े। नीचे गिरी सम्मान वाली शाल उठाई, कंधे पर पहले की तरह रखा और अपनी जगह वापस आ, सीना फुला कर मुसकुराते हुए वह ऐसे बैठे गोया उनके कुछ हुआ ही न हो।

दूसरे दिन रिपोर्टर्स मीटिंग में वह बताने लगे कि, "लोगों ने फोन करि-करि के बताया कि सरोज जी कविता तो बस आप ही ने पढ़ी, बाकी तो सब भड़ैंती हुई।" उन्होंने जोड़ा, "खास कर आफिसरों ने। सीनियर-सीनियर आफिसरों ने। जो प्रबुद्ध लोग थे। सब यही कहि रहे थे कि कविता तो बस सरोज जी की।" सरोज जी की आत्मप्रशंसा अभी चालू ही थी कि फोटोग्राफर शुक्ला आ गया। उसे देखते ही सरोज जी मुसकुराए और बोले, "आवो आवो।" वह बैठ गया तो उन्होंने पूछा "फोटो तो अच्छी आई है?"

"कौन सी?" शुक्ला अचकचाया।

"हुईं?" सरोज जी ने आंखे चौड़ी कीं, "अरे हमारे सम्मान की और किसकी?"

"आपका सम्मान हुआ था?" शुक्ला चकित होता हुआ बोला।

"काव बकि रहे हौ!" सरोज जी रौद्र रूप में आ गए, "सबके सामने हुआ और तुमने देखा ही नहीं!"

"नहीं दादा!" शुक्ला मासूमियत भरी मायूसी ओढ़ कर बोला, "जब सबका सम्मान हो गया तो मैं पेशाब करने चला गया।" उसने बताया, "हां, आपकी बेलीगारद वाली कविता सुनी थी। ऊ फोटो भी खींची है। बेलीगारद वाली कविता पढ़ते समय आपकी।"

"बेलीगारद!" पूरे सुर से भड़कते हुए सरोज जी बोले, "असली फोटो लिए नहीं। बेलीगारद लई लिए।" वह बिफरे, "मुख्यमंत्री सम्मानित करि रहा था, सबके सामने अई देखे नहीं।" सरोज जी चीखे, "बेलीगारद देख रहे थे। जाइए देखिए बेलीगारद!" वह हांफने लगे, अब हम नाहीं बचाइ पाएंगे आपकी नौकरी। कउनो अउर अखबार में जाई के बेलीगारद देखिए। हियां अब ई सब नहीं चलेगा। कह कर सरोज जी हांफते हुए उठ गए।

रिपोर्टर्स मीटिंग बर्खास्त हो गई थी।

शुक्ला की नौकरी थी ही नहीं, तो जाती भला कहां से। हां, उसकी रिटेनरशिप बची रह गई। उसने संपादक को सब कुछ साफ-साफ बता दिया था। अलबत्ता उस दिन से शुक्ला का दफ्तर में बेलीगारद नाम पड़ गया। शुरू में वह इस नाम से चिढ़ उठता पर बाद में सामान्य हो गया। पर सरोज जी शुक्ला के प्रति फिर कभी सामान्य नहीं हुए।

सरोज जी झूठ गढ़ने और झूठ बोलने में भी महारत रखते थे। वजह बेवजह झूठ गढ़ना और झूठ बोलना जैसे उनकी आदत में शुमार था।

वो वि.प्र. सिंह की जनमोर्चा के दिन थे। बोफोर्स का घड़ा बस फूटा ही था। संजय ने एक खबर लिखी कि कांग्रेस के बाइस हरिजन विधायकों ने जनमोर्चा ज्वाइन करने का फैसला लिया। संजय ने यह खबर दिन ही में लिख कर संपादक को दे दी। शाम को वह चुपचाप बैठा था। सरोज जी "कुछ गड़बड़ है" यह भांप गए थे। कई बार, "आज काव दे रहे हैं?" पूछ-पूछ कर उन्होंने सूंघने की कोशिश की। पर संजय ने हर बार मायूस होकर "कुछ नहीं सरोज जी" कह कर उन्हें टालता रहा। पर दूसरे दिन जब खबर छपी तो हमेशा की तरह सरोज जी हांफते हुए संजय से बोले, "ई काव लंतरानी हांक मारे हैं?" वह बिफरे, "और शाम को कहि रहे थे कुछ नहीं।"

संजय चुप रहा।

"घबराइए नहीं, शाम तक आपको प्रेम पत्र मिलि जाएगा।" सरोज जी गरदन तिरछी करते हुए बोले।

"क्या मतलब?" संजय हकबकाया।

"टाइप होइ रहा है।" सरोज जी बोले, "इज्जत प्यारी होय तो इस्तीफा देइ डालिए।"

"क्यों?"

"बाइसों विधायकों ने लिख के दइ दिया है कि जनमोर्चा से उनको कवनो वास्ता नाहीं। खबर मनगढ़ंत है।"

"पर बैठक में तो वह बाइसो थे। सबने दस्तख्त की है।" संजय सफाई में बोला।

"आपके पास हैं दस्तखत? आप थे बैठक में?" सरोज जी ठंडे स्वर में बोले।

"नहीं।" संजय बोला, "पर खबर तो सौ फीसदी सही है।"

"खाक सही है!" सरोज जी बोले, "ई दिल्ली नहीं, लखनऊ है।" संजय घबरा कर संपादक के पास गया। पूछा कि माजरा क्या है। सरोज जी तो ऐसा-ऐसा कह रहे हैं। संपादक ने बताया कि, "खंडन लिखित तो नहीं पर दो तीन फोन जरूर ऐसे आए हैं। पर निश्चिंत रहिए। ऐसी कोई बात मेरी समझ से नहीं है।" उन्होंने जोड़ा, "सरोज जी का परेशान होना लाजमी है। एक तो उनकी कांग्रेस बीट पर हमला दूसरे, मुख्यमंत्री के यहां जी हुजूरी में बाधा।"

संजय दफ्तर से बाहर आ गया। सिगरेट सुलगाए यहां वहां दिन भर घूमता रहा। कांग्रेस के प्याले में तो जैसे तूफान आ गया था। शाम को वह खुश-खुश दफ्तर आया तो सचमुच बाइस में से बीस विधायकों का लिखित खंडन आ चुका था। सरोज जी की बात सच निकली। संजय के पैर तले से जैसे जमीन खिसक गई। संपादक ने कहा, "खंडन आया है तो छपेगा भी।"

"पर साथ में मेरा पक्ष भी तो छप सकता है?" संजय ने संपादक से कहा।

"जरूर छप सकता है।" विधायकों की सारी खंडन वाली चिट्ठियां देते हुए संपादक ने कहा, "इनका खंडन बना कर अपना पक्ष भी लिख दीजिए। पर आज ही।"

"दो दिन का मौका नहीं मिल सकता?"

"मुश्किल है।" संपादक ने कहा, "हमारे ऊपर भी मालिकों का दबाव है। कल खंडन नहीं छपा तो मेरी पेशी हो जाएगी। आखिर कांग्रेस रूलिंग पार्टी है और बनिये के उससे पचास काम हैं।"

"फिर भी बस एक दिन!" संजय ने विनती की। संपादक मान गए और बोले, "एक दिन का मतलब एक दिन।"

"बिलकुल!"

"संजय दफ्तर से बाहर आ गया। और यह खबर देने वाले उस हरिजन आई.ए.एस. अधिकारी के घर जा पहुंचा जिसकी बीवी भी विधायिका थी। सचिव स्तर के उस आई.ए.एस. अधिकारी ने विधायकों के खंडन वाले सारे पत्र देखे और मुसकुराया।"

"आप हंस रहे हैं और मेरी पर बन आई है।" संजय बिफरा।

"कुछ नहीं संजय जी! कुछ नहीं। आप बिलकुल फिक्र मत कीजिए।" वह बोला, "खबर आप की हंडरेड परसेंट सही है। घबराने की कोई बात नहीं।"

"पर सुबूत क्या है?" संजय बोला, "खबर सही है यह तो मैं भी जानता हूं। पर अब तो सुबूत चाहिए। सुबूत!

"सुबूत मिल जाएगा।" कहते हुए उसने शराब की बोतल खोली और गिलास में ढालने लगा। दूसरी गिलास संजय को देते हुए बोला, "आज तक मेरी दी कोई खबर गलत साबित हुई है?" वह जोर देकर बोला, "बोलिए!"

"नहीं, हुई तो नहीं है।" संजय बोला, "पर अबकी बात दूसरी है। क्योंकि अबकी खबर एडमिनिस्ट्रेटिव नहीं पोलिटिकल है।"

"फिलहात तो चिंता छोडिए और इंज्वाय कीजिए।" वह गिलास में बर्फ डालते हुए बोला, "कल तक सब ठीक हो जाएगा। चीयर्स।" उसने जोड़ा, "बीवी को विधायिका यूं ही नहीं बनवाया है।"

"चीयर्स!" बुझे मन से कह तो दिया संजय ने पर गिलास मुंह से नहीं लगाई।

"आप शुरू कीजिए संजय जी!" वह अधिकारी बोला, "कल सब ठीक हो जाएगा। डोंट वरी!"

"कैसे वरी न होऊं?" संजय शराब की चुस्की लेता हुआ ठंडे स्वर में बोला।

"अब हुई न बात!" कह कर वह अधिकारी झूम गया। बोला, "संजय जी आज मजा आ गया। आपके इस स्कूप ने आज बोफोर्स की बहस को किनारे कर दिया। आज दिन भर लखनऊ से दिल्ली तक इसी की चर्चा होती रही। फोन में, प्लेन में, ट्रेन में हर कहीं यही चरचा कांग्रेस के बाइस विधायक जनमोर्चा में। और कांग्रेसियों का खून सूखता रहा।"

"पर अभी तो मेरा खून सूख रहा है।" संजय बोला।

"क्यों सूख रहा है?" उस अधिकारी का यह तीसरा पेग था। और वह तीसरे पेग में ही बहकने लगा। जाने उस खबर का नशा था कि शराब का नशा वह झूमता हुआ संजय का हाथ पकड़ कर बोला, "मजा आ गया।" वह बोला, "आप क्या समझते हैं मैं कच्ची गोलियां खेलता हूं।" और जैसे राजभरी आंखे फैलाता हुआ वह बोला, "मेरे पास सारा सुबूत है। क्या समझे?" वह बहका, "एक-एक विधायक की सिगनेचर है।"

"सच!" संजय खुशी से छलक उठा, "तो दीजिए न!"

"यहां हो तब न दूं।" वह बहकते हुए बोला, "एक-एक दस्तख्त हैं। पर यहां नहीं दफ्तर में हैं। कल दोपहर बाद आइएगा दे दूंगा। पर यह खंडन मत छपने दीजिएगा।"

फिर वह अपनी बीवी से, "खाना लगवाओ" कह कर नया पेग बनाने लगा। उसकी बीवी जो विधायिका थी, कांपती हुई आई और खाना लगवा कर बैठ गई। रात के साढ़े बारह बज रहे थे। वह बैठी-बैठी नींद में ऊंध भी रही थी। दुबली पतली सी उसकी पत्नी इस उम्र में भी सुंदर दिख रही थी।

"एक पेग और हो जाए!" संजय बोला।

उस अधिकारी ने जोड़ा, "आज के नायक आप हैं। आपका कहा कौन भला तोड़ सकता है?"

"नहीं बात यह नहीं है।" संजय लजाता हुआ बोला, "असल में अब पीने का मन हो रहा है।"

"तो अब तक क्या कर रहे थे?" वह हंसता हुआ बोला।

"अभी तो बस बना रहा था।" संजय बोला, "पीना तो अब चाहता हूं।"

"पांच पेग हो गए और आप कह रहे हैं कि पीना तो अब चाहता हूं।"

"कहा न अभी बेस बना रहा था।"

"ठीक है पर मैं तो अब नहीं लूंगा।"

"साथ तो दे सकते हैं?"

"ओह श्योर!" कहते हुए वह अपनी बीवी से बोला, "तुम लोग खा लो भई। हम लोगों को अभी देर लगेगी।"

उसकी बेटियां भी खाने की मेज पर आ गईं। संजय ने गौर किया कि एक बार वह अपनी कार में एक लड़की बिठाए जा रहा था। संजय ने पूछा घूरा तो उसने प्रदर्शित किया जैसे वह उसकी बेटी हो। पर वह "बेटी" नहीं थी खाने की मेज पर। पहले उसने सोचा कि वह नशे में है शायद इसलिए पहचान नहीं पा रहा है। पर जब उसने पक्का कर लिया कि वह इनमें से नहीं है तो पूछ ही बैठा, "आपकी वो वाली बेटी नहीं है क्या?"

"है तो। यह बैठी तो है।" आंख मारता हुआ वह बोला, "वही न जो पढ़ने में बड़ी तेज है। जिसकी चरचा मैंने की थी। उसी को तो पूछ रहे हैं आप?" कहते हुए उसने फिर आंखें मारी।

"हां, हां।" संजय बात बदलता हुआ बोला। और समझ गया कि वह लड़की कोई और थी जिसकी चरचा यह यहां नहीं करना चाहता।

संजय को अपने पड़ोसी आई.ए.एस. अधिकारी भाटिया की याद आ गई। जो उसके फ्लैट के नीचे वाले फ्लैट में रहता था। और उन दिनों समाज कल्याण विभाग का निदेशक था। संजय जब अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने जाता तो भाटिया हाफ पैंट पहने कार से उतरता। वह बताता, "टहलकर आ रहा हूं।" उसकी सेवा में चार पांच गाड़ियां और तमाम नौकर चाकर लगे रहते। सो जब वह कार से उतरता हुआ बोलता, "टहल कर आ रहा हूं।" तो संजय को हैरानी नहीं होती। पर एक रोज गजब हो गया।

वह इतवार का दिन था।

संजय सोया हुआ ही था कि किसी ने तेज-तेज काल बेल बजाई। दरवाजा खोला तो देखा गैराज के ऊपर बने क्वार्टरों में रहने वाले दो तीन कर्मचारी थे। वह सब हांफ रहे थे और कह रहे थे, "संजय जी जल्दी चलिए।"

"क्यों क्या बात है?" आंखे मीचते हुए संजय बोला।

"बहुत बड़ी खबर है।" वह एक साथ बोले, "कैमरा भी ले लीजिए।"

"कैमरा मेरे पास कहां हैं।" संजय बोला, "मैं फोटोग्राफर तो हूं नहीं।"

"तो कैमरा वाला बुला लीजिए।"

"पर पहले बात तो बताओ।"

"एक आई.ए.एस अधिकारी है भाटिया। वह रोज अपने गैराज में सुबह-सुबह कार लेकर आ जाता है। मुंह अंधेरे। फिर आधे-एक घंटे तक गैराज बंद कर अंदर ही रहता है। तो लोगों को शक हुआ। आते-जाते कार के अंदर देखते तो वह अकेला ही रहता। एक दिन हम दो तीन लोगों ने पीछा किया। तो देखा गोमती बैराज के पास भाटिया ने कार रोकी। पीछे का फाटक खुला और एक लड़की कार से उतर कर आगे की सीट पर जाकर बैठ गई। हम लोगों को विश्वास नहीं हुआ। एक बार लगा कि आंखों को धोखा हुआ होगा। फिर दुबारा पीछा किया, तिबारा पीछा किया। हर बार यही ड्रामा। उस लड़की के बारे में पता किया तो मालूम पड़ा कि वह उसकी पी.ए. है। और गोमती नगर में रहती है। वह भी सुबह-सुबह टहलने के बहाने निकलती है और कार लेकर समय पर पहुंच जाता। फिर वह कार में बैठ जाती। गोमती बैराज पर कार रुकती और वह आगे से पिछली सीट पर आकर सो जाती। कार गैराज में आ जाती किसी को पता नहीं पड़ता। और गैराज क्या है पूरा बेडरूम है। हार्ड बेड, परदा सब कुछ है।"

"तो अब गैराज की फोटो खिंचवानी है?" संजय खीझता हुआ बोला।

"नहीं साहब।" उसमें से दूसरा व्यक्ति बोला, "उन दोनों की फोटो खींचनी है।" वह बोला, "हम लोग बहुत दिनों से तड़े हुए थे। कि यह मुंह अंधेरे रोज क्यों आता है। और घंटे-घंटे भर अंदर क्या करता है। पर जब लड़की वाली बात पता पड़ी तो पूरी योजना बना कर आज बंद कर दिया साले को।" वह अभी यह बात बता ही रहा था कि नीचे से सीढ़ियां चढ़ता एक और व्यक्ति दौड़ा-दौड़ा आया। बोला, "वह भाटिया तो यहीं नीचे ही रहता है।"

"चलो उसके बीवी बच्चों को भी उसकी कारस्तानी बताएं।" दूसरा व्यक्ति बोला। और सबके सब फट-फट सीढ़ियां उतर गए। भाटिया की बीवी को बुलाया उन सबने और सारा वाकया बताया। भाटिया की बीवी कुछ बोली नहीं और घर का दरवाजा नौकर से बंद करवा दिया। वह सब ऊपर आकर फिर संजय के घर की कालबेल बजाने लगे। संजय अब तक वहां जाने का इरादा बदल चुका था। उसने सोचा पड़ोसी के फच्चर में पांव फंसाना ठीक नहीं रहेगा। पर कालबेल बजती रही। दरवाजा खोलकर वह बेरुखी से बोला, "अब क्या बात है?"

"बात तो वही है। आप चलिए न साहब।" वह बोला, "पेपर में निकलेगा तो मजा आजाएगा। आपके पेपर की सेल बढ़ जाएगी।"

"सेल वेल की चिंता तुम छोड़ो।" कहते हुए उसने अपनी विवशता फिर ओढ़ी, "मेरे पास कैमरा नहीं है। और बिना फोटो के यह खबर बनेगी नहीं।"

"कैमरे वाले को फोन कर दो साहब।"

"पर फोटोग्राफर के पास फोन नहीं है।"

"तो हमें पता बता दीजिए। हम घर से बुला लाएंगे।"

"अच्छा।" कह कर संजय बड़े असमंजस में पड़ गया। उसने फोटोग्राफर का पता देते हुए कहा, "काफी दूर रहता है ये।"

"कोई बात नहीं साहब।" वह व्यक्ति बोला, "हम चले जाएंगे। पर आप अभी चलिए।"

"हमको अभी ले चल कर क्या करोगे?" संजय टालते हुए बोला।

"नहीं साहब आपका अभी चलना जरूरी है।" उसमें से एक बोला।

"नहाने धोने दोगे कि ऐसे ही चलूं?" संजय ने फिर टाला।

"वापस आकर नहा धो लीजिएगा।" वह व्यक्ति बोला, "पर अभी वहां पहुंचना जरूरी है।"

"तुम लोगों ने गैराज में ताला तो बाहर से बंद कर दिया है न?" संजय बोला, "फिर जल्दी किस बात की, वह भाग तो पाएगा नहीं।"

"वो तो ठीक है साहब। पर आप चले चलते तो ठीक था।" उसने जोड़ा, "हम लोग छोटे कर्मचारी हैं।"

"औऱ वह आई.ए.एस. अधिकारी है। कभी हमारे ही विभाग में अफसर बनकर आ जाए तो हम लोगों की तो नौकरी खा जाएगा।" दूसरा व्यक्ति बोला, "इसीलिए हम लोग सामने नहीं आना चाहते।"

"पर उसकी बीवी के सामने तो आ गए हो।" संजय बोला, "इस तरह डरना था तो ताला ही नहीं लगाना था।"

"अब तो साहब सांप के बिल में हाथ डाल दिया है।" पहला व्यक्ति बोला।

"तुम लोग ऐसा करो कि पुलिस को खबर कर दो।" संजय सलाह देते हुए बोला, "वह लड़की समेत पकड़ा जाएगा। बेइज्जत होगा। और सारे अखबारों में अपने आप खबर छप जाएगी।"

"पुलिस में भी आप ही खबर कर दीजिएगा साहब।" दूसरा व्यक्ति बोला।

"जब सब हम ही कर दें तो तुम लोग क्या करोगे?" संजय उकता कर बोला।

"पुलिस हम लोगों की कहां सुनेगी?" दूसरा व्यक्ति फिर बोला।

"क्यों नहीं सुनेगी पुलिस? बिलकुल सुनेगी।" संजय बोला, "बस तुम लोग यह मत बताना पुलिस से कि किसी आई.ए.एस. अफसर को बंद किया है। वरना थाने की पुलिस भी डर जाएगी। तुम लोग ऐसे ही कोई ड्राइवर वगैरह बताना।"

"ठीक साहब!" पहला व्यक्ति बोला।

"ठीक-ठीक नहीं, अब चले जाओ।" संजय ने कहा, "अब हमें भी नहा धो लेने दो।"

नहा धोकर संजय गैराज पर पहुंचा तो पुलिस, फोटोग्राफर सभी आ चुके थे। पर वह आई.ए.एस. अफसर भाटिया भाग चुका था। हुआ यह कि जब इन आदमियों ने भाटिया की बीवी को किस्सा बताया तो उसने तुरंत हथौड़ी देकर एक नौकर को भेज दिया। उसने बाहर से गैराज का ताला तोड़ कर भाटिया को लड़की समेत भगा दिया। वैसे गैराज की हालत देख कर लगता था कि भीतर से भाटिया ने भी गैराज का फाटक तोड़ने की कोशिश कार से धक्का मार-मार कर की थी। भाटियां वहां से निकला तो बाहर की भीड़ उसे देखते ही तितर बितर हो गई। उलटे उसने वहां लोगों को गालियां दी और धमकी भी कि, "एक-एक को देख लूंगा।" और वहां से निकल भागा।

संजय पछता कर रह गया। उसने खुद से ही सवाल किया कि, "क्या उसने खुद नहाने धोने के बहाने भाटिया को बचाने का मौका नहीं दिया? पड़ोसी धर्म निभाने में लग गया?"

"सो तो है!" उसने खुद को जैसे जवाब दिया।

उसने सोचा कि भाटिया के घर आज महाभारत मचेगा। पर उसकी बीवी ने ऐसा कुछ नहीं किया। किसी को पता भी नहीं चला कि ऐसा कुछ हुआ है। पर उसके बाद से हुआ यह कि भाटिया की शक्ल काफी दिनों तक नहीं दिखी। उसका टहलना जैसे बंद हो गया था। नौकरों को सुबह-सुबह डांटने की भाटिया की आवाज भी गायब हो गई थी। उसकी बीवी ऐसे चेहरा गिराए दिखती गोया यह हरकत भाटिया ने नहीं उसी ने किया हो। संजय को देखते ही वह आंखें नीचे कर लेती। उसकी बेटियों का भी यही हाल था। संजय ने भी किसी से कुछ नहीं कहा, न ही खबर लिखी। एक बार उसने सोचा कि एक सटायर पीस या टिट बिट्स का एक पीस बिना नाम लिए लिख दे। पर नहीं लिखा। टाल गया। पर बाद में उसने गौर किया कि भाटिया की बीवी उसे घृणा की नजरों से देखने लगी। शायद उसे लगा कि वह सब कुछ संजय ने ही कराया हो।

भाटिया अब फिर टहलने जाने लगा था। वह ऐसे मिलता जैसे कुछ हुआ ही नहीं। संजय ने उसे एहसास भी नहीं कराया। न ही कोई चरचा की। बात खत्म हो गई थी।

संजय ने उसी तरह यहां भी बात खत्म कर दी। और एक पेग खत्म होते न होते वह भी खाने की मेज पर आ गया और बोला, "हम लोग भी खा ही लें।"

खाना खाते-खाते पता नहीं कैसे बात ब्राह्मणों पर आ गई। और वह हरिजन आई.ए.एस. अधिकारी जो खुद अपने को सिंह लिखता था ब्राह्मणों को गाली देने लगा। पहले तो संजय ने टाला। पर जब बहुत हो गया तो जैसे भीतर से उसका ब्राह्मण जागा और बोला, "इस तरह ब्राह्मणों को गालियां मत दीजिए!"

"क्यों?"

"इसलिए कि मैं भी ब्राह्मण हूं।" संजय बोला।

"आप ब्राह्मण हैं?" वह बोला, "मैं नहीं जानता था। वेरी-वेरी सॉरी!" वह रुका और बोला, "फिर भी आप यह मानेंगे कि ब्राह्मणों ने हमारी जाति पर बड़ा जुल्म किया है।" वह थोड़ा रुका फिर बोला, "पर आप ब्राह्मण हैं, यह मैं नहीं जानता था। जानता तो आपके सामने ऐसे नहीं बोलता।" वह हाथ जोड़ कर बोला, "व्यक्तिगत रूप से आपको कष्ट पहुंचाने का मेरा इरादा नहीं था। क्षमा चाहता हूं।"

"कोई बात नहीं! पर आप अपनी बात बिना गाली दिए भी कह सकते हैं।" कह कर संजय चुप हो गया।

पर आप कौन से ब्राह्मण हैं? वह बोला, "आई मीन आप अपने नाम के आगे तो कुछ लिखते नहीं?"

"आप बुरा न मानें तो आपसे पूछूं?"

"श्योर!"

"आप कौन से सिंह है?" संजय बोला, "आप तो अपने आपके आगे सिंह लिखते हैं। तो क्या आप क्षत्रिय हैं?"

"नहीं मैं क्षत्रिय नहीं हूं।" कहते हुए वह झेंपा।

"तो फिर क्यों लिखते हैं आप सिंह?" संजय बोला, "अगर आप हरिजन हैं तो उसमें शर्म किस बात की? सिंह लिखकर अपने आपको छलने की क्या जरूरत है? हरिजन होना कोई शर्म की बात नहीं है। हरिजन होना अपराध नहीं है। जो आप छुपाते फिरें! अगर आपका नाम भूसी राम है तो बी.आर. सिंह लिखने से क्या फर्क पड़ जाता है?"

"पड़ता होगा तभी तो लिखते हैं।" वह बोला।

"क्या फर्क पड़ता है? यही तो मैं जानना चाहता हूं।" संजय बोला, "खास कर तब जब आप आई.ए.एस. हैं।"

"ऐसा!" कह कर उस अधिकारी ने कंधे उचकाए।

"एक्जेक्टली ऐसा ही है।" संजय ने कहा, "तो अगर मैं आई.ए.एस. न होते हुए भी अगर अपने नाम के आगे आई.ए.एस. लगाने लगूं तो क्या मैं आई.ए.एस. हो जाऊंगा?"

"आई.ए.एस. तो नहीं, चार सौ बीस जरूर हो जाएंगे और जेल की हवा भी खानी पड़ जाएगी।" वह शराब के घूंट भरता हुआ बोला।

"क्यों?"

"फर्जी तौर पर आई.ए.एस. लिखने के जुर्म में।"

"क्यों आई.ए.एस. का मतलब कोई एक ही तो होता नहीं।" संजय ने कहा, "अपने देश में एक शार्ट फार्म के कई लांग फार्म बना कर लोग फ्राड करते है और चार सौ बीस होने से भी बच जाते हैं। मैं भी ऐसे ही कर लूंगा।"

"कैसे?"

"आई.ए.एस. का मतलब इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस के बजाय इटरमीडिएट आर्ट साइड भी हो सकता है।" संजय बोला, "कुतर्क पर सिर्फ आपकी बिरादरी का ही अधिकार तो नहीं है।"

"क्या मतलब?"

"मेरा मतलब आपकी आई.ए.एस. बिरादरी से है जो आज देश की भाग्य विधाता बनी बैठी है।" संजय बोला, "आपकी हरिजन बिरादरी से मेरी मंशा नहीं थीं।" वह रुका और बोला, "पर जरा सा संकेत भी आपको बुरा लगा। यह अच्छी बात है। अपनी कौम, बिरादरी के प्रति कांशस रहना अच्छी बात है।" उसने जोड़ा, "पर व्यर्थ की ढाल कहिए, दिखावे की खाल कहिए ओढ़ना उतना ही गलत है।" संजय ने कहा, "अगर आज की तारीख में आई.ए.एस. होना श्रेष्ठ होना है और श्रेष्ठ होने का मतलब ब्राह्मण होना है तो मैं वह नहीं हूं। और अगर मैं आई.ए.एस. नहीं हूं इसका मतलब हरिजन नहीं है कि मैं हीनता से भर जाऊं, हीनता से मर जाऊ और नकलीपन का सहारा ले लूं। आई.ए.एस. न हो पाना कोई अपराध नहीं है। यह कोई शर्म की बात नहीं है।"

"तो आई.ए.एस. न होने पाने का कांपलेक्स आपके मन में है!" वह मुसकुराता हुआ बोला।

"कतई नहीं।" संजय ने जोर से कहा, "मैं आई.ए.एस. हो ही नहीं सकता था।"

"क्यों?" वह बोला, "बुद्धि तो है। मेहनत नहीं की होगी।"

"सच बताऊं?"

"आफकोर्स!"

"जब आई.ए.एस. बनने की उम्र थी तब यह जानता भी नहीं था कि आई.ए.एस. या पी.सी.एस. क्या बला होती है।" संजय रुका और बोला, "गांव से निकल कर शहर पढ़ने गया था यही बहुत बड़ा सुख था।" वह कहने लगा, "अगर खुदा न खास्ता जान भी गया होता कि आई.ए.एस. किस चिड़िया का नाम है तब भी शायद उस ओर रुख नहीं करता।"

"क्यों?"

"क्योंकि तब तो बस एक ही सपना था, एक ही तमन्ना और एक ही हसरत थी, कविता, क्रांति और समाज को बदलने की छटपटाहट।" संजय पुरानी यादों में खोता हुआ बोला, "अगर तब मेरी चली होती तो ग्रेजुएशन में ही पढ़ाई छोड़ दी होती। कम्युनिस्ट साहित्य, सोहबत और समाज की हालत बार-बार यही ललकारती थी कि इस एकेडमिक पढ़ाई लिखाई में कुछ नहीं रखा। व्यर्थ की चोंचलेबाजी है।" संजय बिना रुके बोला, "और मुझे आज भी यह एकेडमिक पढ़ाई वास्तव में बेमानी लगती है, फ्राड लगती है।" वह रुका और शराब देह में ढकेलता हुआ बोला, "मेरी सोच ही तब कुछ और थी, एप्रोच ही और थी तो आई.ए.एस. बनना गाली होती मेरे लिए। मैं तब जानता भी नहीं था आई.ए.एस. के बारे में और जो जानता होता तब भी किक करता ऐसी आई.ए.एस. गिरी को। लानत है देश के आई.ए.एसों. को जो देश को दोनों हाथों से लूट और लुटा रहे हैं।"

"आपको चढ़ गई है।" वह अधिकारी बोला, "ऐसा तो नहीं है।"

"ऐसा ही है।" गिलास मेज पर पटकता हुआ संजय बोला।

"खैर छोड़िए, यह बहस फिर कभी।" वह बोला, "पुराने सवाल पर वापस आएं और बताएं कि आप कौन से ब्राह्मण हैं। आईमीन योर सरनेम क्या है?"

"सच बताऊं भूसी राम जी कि झूठ?" संजय नशे में झूमता हुआ बोला।

"सच-झूठ दोनों ही बताइए।"

"श्योर?"

"श्योर!"

"तो सुनिए मेरा पूरा नाम है संजय सिंह तिवारी।"

"क्या मतलब?"

"क्यों मुलायम सिंह यादव हो सकता है, बलराम सिंह यादव हो सकता है, भूसी राम बी.आर.सिंह हो सकता है तो संजय सिंह तिवारी क्यों नहीं हो सकता?" संजय बोला, "देखिए भूसी राम जी, सिंह, शर्मा, वर्मा और हो सकता हो कुछ और सरनेम भी हों, यह सब बड़े उदार सरनेम हैं। जो जब चाहे जहां चाहे लगा ले। सिंह, क्षत्रिय, यादव, चमार कोई भी लगा ले, कोई रोक नहीं। शर्मा, बढ़ई, लोहार, ब्राह्मण कोई भी लिख ले, इसी तरह वर्मा, कायस्थ, कुर्मी, खटिक, सुनार कोई लिख सकता है, कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। तो मैं अगर संजय सिंह तिवारी हो जा रहा हूं तो आपको क्यों ऐतराज हो रहा है?"

"आपके इस व्यंग्य को मैं समझ रहा हूं संजय तिवारी जी।" वह "तिवारी" पर जोर देकर बोला।

"खाक समझ रहे हैं।" संजय बोला, "मैं संजय सिंह तिवारी हूं और आप सिर्फ संजय तिवारी कह रहे हैं।"

"यही तो व्यंग्य है आपका मान्यवर!" वह बोला, "ऐसे ही! ऐसे ही आप ब्राह्मणों ने हम दलितों पर जुल्म किए हैं।" वह जैसे तिलमिला कर बोला।

अब पता नहीं आप कबकी बात कर रहे हैं। संजय बोल, "न तो मैंने दलित उत्पीड़न का पूरा इतिहास पढ़ा है न ही ब्राह्मण उत्थान का धर्मशास्त्र, वेद, मनुस्मृति वगैरह पढ़ा है इसलिए आधिकारिक रूप से कुछ कह पाना कठिन है। पर मोटा-मोटा यह जरूर जानता हूं कि चाहे सदियों पूर्व की व्यवस्था हो चाहे आज की व्यवस्था! सत्ता हमेशा ही प्रजा को पीड़ित करती रही है। सत्ता हमेशा ही से प्रजा की देह छील कर इतिहास लिखती रही है, आज भी लिख रही है। ऐसे जैसे यह प्रकृति का नियम हो।" संजय बोला, "और मैं नहीं पाता कि ब्राह्मण जाति ने कभी इस तरह आधिकारिक रूप से सत्ता भोगी हो कि वह किसी पर अत्याचार कर सके। रही वर्ण व्यवस्था की तो क्या वह नियम आज भी नहीं लागू है कि जो जिस कार्य के लायक हो उसे वही कार्य दिया जाए। अब कि जैसे मैं आई.ए.एस. नहीं हूं तो क्या मैं डी.एम. या आपकी तरह कहीं कमिश्नर नियुक्त हो सकता हूं? मुझे छोड़िए पी.सी.एस. भी बेचारा बिना आई.ए.एस. में प्रमोट हुए डी.एम. नहीं बन सकता। तो क्या सिर्फ इसलिए कि आई.ए.एस. श्रेष्ठ है। जाहिर है कि नहीं। यह एक व्यवस्था है।" संजय बोला, "तो जिसे आप मनुवादी व्यवस्था बताते हैं वह भी कुछ ऐसी ही या वैसे ही रही होगी-व्यवस्था आधारित।" संजय बोला, "और जाहिर है कि लंबे समय तक उसमें अपेक्षित सुधार या संशोधन नहीं हुए होंगे तो वह व्यवस्था बेमानी हो गई होगी, व्यर्थ हो गई होगी और अपना अर्थ खोकर धूल में मिल गई। और आज हम नई व्यवस्था में जी रहे हैं।" संजय बोला, "यह इस नई व्यवस्था की ही देन है कि जिसे समाज से नीचे की जाति मानता है वह भंगी जाति का व्यक्ति भी कलक्टर बन जाता है और जिसे समाज सबसे श्रेष्ठ जाति का मानता है उस ब्राह्मण जाति का व्यक्ति उसी भंगी जाति के कलक्टर के यहां सफाई धुलाई करते दिखता है। तो क्या यह अन्याय है उस ब्राह्मण जाति के साथ?" संजय बोला, "हरगिज नहीं। अगर आप पढ़ेंगे लिखेंगे नहीं तो यही नौकरी आपको मिलेगी चाहे आप जिस जाति के हों। तो ऐसा ही कुछ पहले की व्यवस्था में रहा होगा। अब चूंकि वह व्यवस्था पारदर्शी नहीं थी सो धूल में मिल गई। यह आज की व्यवस्था भी अगर पारदर्शी नहीं साबित होगी तो यह भी धूल में मिल जाएगी।"

"यह तो कुतर्क है।" वह अधिकारी बोला, "आप चाहे जो कहें। पर हकीकत यही है कि ब्राह्मणों ने हमारी जाति बिरादरी पर अत्याचार किया।"

"चलिए मान लिया!" संजय बोला, "किसी एक ब्राह्मण राजा का नाम बताइए जो बड़ा भारी राजा रहा हो और उसने चमारों पर अत्याचार किया हो!"

"अब तुरंत तो किसी का नाम नहीं याद आ रहा।" वह अधिकारी माथे पर हाथ फेरता हुआ बोला, "पर मैं बाद में बताऊंगा। लेकिन आप यह तो मानेंगे कि ब्राह्मण हमेशा सत्ता के करीब रहे। ब्राह्मण राजाओं के सलाहकार रहे।"

"हमेशा तो नहीं। पर रहे हैं।" संजय बोला, "अब चाणक्य की बात लीजिए। चाणक्य भी ब्राह्मण था। पर हिंदुस्तान के इतिहास को बदल दिया चाणक्य ने। आप चाहे उसे कुटिल कहिए पर सच यही है कि चंद्रगुप्त जैसे पिछड़ी जाति के व्यक्ति को सम्राट बनाना तबके समय में बहुत आसान नहीं था। यह चाणक्य के ही बूते की बात थी।"

"आप जो भी कहिए पर ब्राह्मणों ने हम पर अत्याचार किए हैं।" वह बोला, "आखिर पूरे दो हजार साल तक देश में ब्राह्मणों ने राज किया है। ऐसा मैंने कहीं पढ़ा है।"

"दो हजार साल क्यों आप फिर से इतिहास पढ़िए पूरे पांच हजार साल जिसको राज करना आप कह रहे हैं, वह ब्राह्मणों ने किया है।" संजय बोला, "पर आजादी के यानी 15 अगस्त 1947 के पहले तक किसी एक ब्राह्मण का नाम बता दीजिए जो करोड़पति रहा हो। एक नहीं मिलेगा। क्योंकि ब्राह्मण ने लूट और अत्याचार को ठीक नहीं माना था। और बिना लूट, अत्याचार के कोई करोड़पति नहीं बन सकता। आजादी के बाद की बात मैं नहीं कर रहा अब तो कई ब्राह्मण भी करोड़पति हैं और चमार भी कई करोड़पति, अरबपति हैं। क्योंकि लूट में, अत्याचार में अब हर जाति शामिल है।" संजय बोला, "आप ऐसा मत समझिए कि मैं ब्राह्मणों की कोई वकालत कर रहा हूं। क्योंकि मैं ब्राह्मण हूं। ऐसा नहीं है। मैं तो अब जनेऊ भी नहीं पहनता। नाम के आगे ब्राह्मण तिवारी भी नहीं लगाता। क्योंकि मैं ब्राह्मण कहलाने योग्य नहीं। इसलिए कि ब्राह्मण होने को मैं पाप मानता हूं। बल्कि इसलिए कि ब्राह्मण होना बहुत बड़ी बात है। ब्राह्मण होना आसान नहीं है। ब्राह्मण कहलाने का हक सिर्फ इसलिए नहीं मिल जाता कि मैं ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ हूं। दूसरे और महत्वपूर्ण यही है कि सही मायने में मैं इस तरह की जाति व्यवस्था में यकीन भी नहीं करता। इसलिए भी अपने नाम के आगे तिवारी नहीं लिखता।"

"पर संजय जी इससे फिर भी यह साबित नहीं होता कि ब्राह्मणों ने हमारी बिरादरी पर अत्यचार नहीं किया।" वह बोला, "हमारी बिरादरी को समाज में अछूत बनाने वाले ब्राह्मण ही हैं।"

"यह पूरी तरह सच नहीं है।" संजय बोला।

"हमसे ज्यादा अंतर्विरोध तो आप जी रहें हैं।" वह बोला, "हम सिर्फ सिंह लिखते हैं और आप हमें कटघरे में खड़ा कर देते हैं। और आप ब्राह्मण सूचक शब्द नहीं लिखते नाम के आगे, जनेऊ नहीं पहनते पर ब्राह्मणों की वकालत पूरी-पूरी करते हैं। यह आपका अंतर्विरोध नहीं तो क्या है?"

"यह अंतर्विरोध नहीं है। यह तथ्य है। और चीजें कोई अचानक नहीं बदल जातीं। फिर मैं कोई ब्राह्मणवाद की वकालत नहीं कर रहा। एक तथ्य रख रहा हूं। तर्क रख रहा हूं। जिसे आप तथ्य से, तर्क से काट भी सकते हैं। क्योंकि मैं कोई अकाट्य सत्य नहीं भाख रहा हूं।" संजय बोला, "सच को सच मान लेने से नुकसान नहीं होता। और मैं फिर यह बात दुहराना चाहता हूं कि सत्ता हमेशा प्रजा की देह छील कर इतिहास लिखती है चाहे वह सत्ता ब्राह्मण की हो, चाहे चमार की। सत्ता आखिरकार सत्ता होती है। अंतत: सत्ता होती है। और सत्ता का हमेशा यही चरित्र रहा है, यही चरित्र रहेगा। राज सत्ता में भी यही होता था और आज प्रजातांत्रिक सत्ता के दौर में भी यही हो रहा है।"

"यह सब ठीक है। पर अंतिम सच यही है कि ब्राह्मणों ने ही व्यवस्था बनाई और उस व्यवस्था में हमें अछूत बनाया।" वह नशे में टूट कर बोला।

"क्या तभी से ब्राह्मण-ब्राह्मण लगा रखा है आपने?" संजय बोला, "तभी से ब्राह्मण और सत्ता का फर्क समझा रहा हूं आपकी समझ में नहीं आ रहा है। लगता है किसी ने बचपन से ब्राह्मणों के खिलाफ इतनी घुट्टी पिला रखी है कि आप खुले दिमाग से कुछ सोच ही नहीं सकते।"

"हो सकता है।" वह लड़खड़ाती आवाज में शराब की जगह पानी पीता हुआ बोला, "हमारी बिगड़ी हालत के लिए ब्राह्मण ही जिम्मेदार हैं।"

"सच!" संजय बोला, "अगर यही सच है तो कम से कम आपको व्यक्तिगत तौर पर ब्राह्मणों का शुक्रगुजार होना चाहिए।"

"क्यों? वो क्यों?" वह ऐसे बोला जैसे उसकी समझ में कुछ आया ही न हो।

"वह ऐसे कि अगर ब्राह्मण नहीं होते तो आपकी चमार बिरादरी पर अत्याचार नहीं होते! चमार अछूत नहीं हुए होते! जैसा कि आप कह रहे हैं और यह सब जो नहीं हुआ होता तो आजादी के बाद आरक्षण नहीं लागू हुआ होता।" संजय बोला, "आरक्षण नहीं लागू हुआ होता तो आप आज आई.ए.एस. नहीं हुए होते।"

"नहीं, नहीं मैं आई.ए.एस. डिजर्व करता हूं।" वह घबरा कर बोला।

"बिलकुल करते होंगे। पर आए तो आरक्षण कोटे से ही चुन कर!" संजय बोला, "आपकी पत्नी भी बिना सुरक्षित सीट के जीत कर विधान सभा में आ पातीं भला?"

"यह तो कोई तर्क नहीं हुआ?"

"बस यही मैं तबसे आपको समझा रहा हूं।" संजय बोला, "ब्राह्मण हो या चमार सभी के समान विकास से ही देश और समाज का कल्याण है। न कि एक दूसरे को गाली देकर।"

"चलिए यह बहस फिर कभी!" वह बोला, "अब खाना खा लिया जाए।"

"हां, देख रहा हूं बड़ी देर से आप शराब की जगह पानी पी रहे हैं।" कह कर संजय खुद पानी पीने लगा।

"ज्यादा शराब पी लेने के बाद पानी पीते रहने में ही भलाई है।"

"वो तो है।"

खाना खाते-खाते रात के दो बज गए। वह घर पहुंचा ढाई बजे। सोते-सोते तीन बज गए। दूसरे दिन वह देर से सो कर उठा। नहा धोकर उस अधिकारी के दफ्तर गया। वह नदारद!

संजय का दिमाग खराब हो गया।

वह वापस घर आकर उसे लगातार फोन करता रहा। न तो वह घर में मिलता, न दफ्तर में। संजय परेशान हो गया। उधर संपादक भी रह-रह कर संजय के घर फोन करते रहे। और संजय पत्नी से यही कहता रहा कि, "कह दो नहीं हैं।" कई बार कहते-कहते उसने सोचा कि कहीं जनाब भूसी राम भी तो यही नहीं कर रहे, "कह दो नहीं है।" यह खयाल आते ही वह भूसी राम के दफ्तर की ओचल दिया। वह दफ्तर में नहीं मिला तो संजय उसके घर पहुंचा। वह वहां भी नहीं था। उसका कोई मेसेज भी नहीं।

संजय की परेशानी की कोई सीमा नहीं थी।

शाम हो गई। संजय बैठा-बैठा खीझ रहा था कि फोन की घंटी बजी। वह पत्नी से बोला, "कह दो नहीं है।" पर पत्नी बोली, "होल्ड कीजिए।"

"बी.आर. सिंह बोल रहा हूं।" उधर से आवाज आई।

"आप कहां गायब हो गए प्रभू!"

"गायब नहीं हूं।" वह बोला, "बचता-बचाता घूम रहा हूं।" वह घबराया हुआ बोला, "आप नहीं जानते, मुझे सुबह से ही वाच किया जा रहा है।"

"क्या?"

"हां।"

"पर कैसे?" संजय बोला, "मैंने तो कहीं लीक नहीं किया। आपको प्वाइंट आऊट नहीं किया।"

"मैंने पता किया तो चला कि रात को आप को फालो किया इंटेलीजेंट वालों ने।" वह बोला, "कल रात आप को मेरे घर नहीं आना चाहिए था।"

"हां, गलती तो हो गई।" संजय बोला, "पर क्या फर्क पड़ता है। कोई कहीं भी आ जा सकता है।"

"वो तो है।" वह बोला, "पर मेरी पोजीशन थोड़ी आकवर्ड हो रही है।" वह रुका और बोला, "पर चिंता की बात नहीं। मैं सब ठीक कर लूंगा।"

"आप बोल कहां से रहे हैं?"

"बोल तो मैं सचिवालय से ही रहा हूं। पर अपने आफिस से नहीं।"

"क्या हुआ उस सुबूत का?"

"थोड़ी देर में मैं भिजवाता हूं।" वह बोला, "आपके दफ्तर भेज दूं?"

"नहीं भई, मैं घर पर हूं।" संजय बोला, "बिना उसके मैं दफ्तर कैसे जा सकता हूं।"

"राइट-राइट।" वह बोला, "मैं खुद तो आ नहीं पाऊंगा। आप भी मुझे कांटेक्ट मत करिएगा। पर एनी वे मैं एक आदमी से मौका देख कर भिजवाता हूं।"

"भिजवा दीजिए।" संजय बोला, "अगर आज सुबूत नहीं मिला तो कल खंडन छपा मिलेगा।"

"राइट-राइट।" वह बोला, "मैं जल्दी भिजवाता हूं। पर खंडन किसी सूरत में नहीं छपने पाए।"

"आप सुबूत भेजिए तो सही!"

"राइट-राइट।"

"ओ.के.।" कह कर संजय ने फोन रख दिया।

थोड़ी देर बाद एक निरीह सा आदमी सीलबंद लिफाफा लेकर आया। और काफी दरियाफ्त के बाद वह लिफाफा उसने संजय को दिया। लिफाफा खोलते ही संजय की आंखों में चमक आ गई। कांग्रेस के 22 हरिजन विधायकों की दस्तखत समेत प्रस्ताव की फोटो कापी अब उसके हाथ में थी। उसने खंडन वाली चिट्ठियों से दस्तखत मिलाए। दस्तखत हूबहू वही थे।

संजय ने दफ्तर जाकर संपादक को प्रस्ताव के दस्तखत और खंडन के दस्तखत दिखाए। संपादक जी की जान में जैसे जान आ गई। बोले, "आप सुबह से गायब थे। मेरे तो हाथ पांव फूल गए थे।" वह बोले, "फटाफट खबर लिखिए।"

दूसरे दिन जब बैनर बाक्स बन कर दोनों दस्तखतों की फोटो स्टेट सहित खबर छपी तो तहलका मच गया। सरोज जी उस दिन रिपोर्टर्स मीटिंग में नहीं आए। शाम को संजय को देखते ही वह बिसूरते हुए बोले, "मार लिया मैदान!"

संजय कुछ बोला नहीं। फीकी मुसकान फेंक कर रह गया। सरोज जी की तकलीफ का अंदाजा उसे था। क्योंकि जब एक दिन पहले वह सुबह रिपोर्टस मीटिंग में नहीं आया तो सरोज जी ऐलान कर चुके थे कि "संजय तो गए!" इसलिए वह चुप ही रहा। दूसरे मुख्यमंत्री और कांग्रेस पर खबर! सरोज जी को यह कभी नहीं सुहाता था। आज इस खबर के साथ उन्हें अपने एम.एल.सी. बनने का सपना एक बार फिर टूटता नजर आया।

थोड़ी देर बाद चपरासी ने संजय को आकर कहा, "सरोज जी बुलाय रहे हैं।"

संजय उनकी केबिन में गया और कुर्सी पकड़ कर खड़ा हो गया। सरोज जी ने उसे देखा पर कुछ बोला नहीं। लिखने में लगे रहे। जब पांच मिनट बीत गए तब संजय बोला, "जी, सरोज जी!"

"हां, बैठिए!" ठंडी सांस खींचते हुए वह बोले।

"जी।" बैठते हुए संजय बोला।

"अब हम काव बताएं!" वह बड़े ठंडेपन से बोले, "मुख्यमंत्री आपसे बहुत नाराज हैं। कहि रहे थे बताइए इनको मकान दिया। हेन किया, तेन किया। पर हमारे जिले के होकर भी हमारे खिलाफ खबर लिख रहे हैं। पार्टी में बगावत करवा रहे हैं।" कहते हुए सरोज जी ठंडी सांस खींच कर फिर बोले, "बहुत नाराज हैं आपसे मुख्यमंत्री।"

"क्या कह रहे हैं आप?" सवाल उछाल कर संजय ने भांपने की कोशिश की कि सरोज जी के इस कहने में कितना सच है और कितना झूठ!

"अब मुख्यमंत्री नाराज तो हुए हैं आपसे!" कहते हुए सरोज जी की आवाज थोड़ी हलकी हुई। दूसरे हमेशा की तरह वह हांफे भी नहीं। संजय समझ गया सरोज जी पूरा-पूरा झूठ गढ़ रहे हैं। संजय को चुप देख कर सरोज जी ने फिर अपनी बात दुहराई, "मुख्यमंत्री बहुत नाराज है आपसे!"

"पर हमसे तो मुख्यमंत्री कह रहे थे कि ऐसे ही आंखे खोले रखिए। पता तो चले कि कौन किसके साथ है!"

संजय ने भी सरोज के झूठ को दूसरा झूठ गढ़ कर खाने की कोशिश की।

"हईं!" सरोज जी का गप सचमुच भहरा गया। उनकी आवाज का ठंडापन गायब हो गया। वह सहज होते हुए बोले, "ऊ जो मुख्यमंत्री का सूचनाधिकारी मेहता है वही हमसे कहि रहा था कि मुख्यमंत्री जी नाराज हैं।" सरोज जी अब दूसरा झूठ गढ़ गए थे।

"पर मेहता तो आज हमारे घर आया था।" संजय ने फिर झूठ बोला, "बल्कि वही हमें मुख्यमंत्री के पास ले गया। बताया कि मुख्यमंत्री जी ने बुलाया है।" संजय ने देखा कि सरोज जी के झूठ पर उसके झूठ का निशाना सही-सही गया था। वह बोला, "अभी थोड़ी देर पहले वहीं से तो आया हूं।"

"कहां से?" सरोज जी अचकचाए।

"मुख्यमंत्री के यहां से।" संजय बोला।

"हमारे बारे में कुछ नहीं पूछ रहे थे?"

"कौन? मेहता?" संजय ने सरोज जी को छेड़ा।

"अरे नहीं। किस बेवकूफ की बात कर रहे हैं।" सरोज जी लपक कर बोले, "मुख्यमंत्री जी! हमारे बारे में तो पूछ नहीं रहे थे।"

"चरचा तो चली थी सरोज जी आपकी!" संजय बोला, "मेहता ने ही बात चलाई थी।"

"हां, मेहता अच्छा आदमी है!" क्षण भर में ही मेहता के बारे में सरोज जी की राय बदल गई थी। अभी-अभी वह उसे बेवकूफ बता रहे थे। और अब अच्छा आदमी बता रहे थे। उनकी उत्सुकता अभी बनी हुई थी, "तो काव कह रहे थे मुख्यमंत्री हमारे बारे में?"

"यही कि कैसे हैं?"

"और?"

"और हाल चाल पूछ रहे थे।"

"और?"

"हां, उन्होंने मेहता से कहा कि सरोज जी से मिले बहुत दिन हो गए। कभी खाने पर बुलाओ।"

"ऐसे कहि रहे थे मुख्यमंत्री!" सरोज जी खुश हो गए थे। शायद एम.एल.सी. बनने का सपना उनकी आंखों में तैर गया था।

बाइस हरिजन विधायकों के कांग्रेस से जनमोर्चा जाने से कांग्रेसी सरकार को कोई खतरा नहीं था। सरकार गिरने वाली नहीं थी। मुख्यमंत्री की कुर्सी को भी कोई आंच मोटा मोटी नहीं लगती दिखती थी। पर प्रधानमंत्री दरबार में मुख्यमंत्री की क्लास तो हो ही सकती थी। क्योंकि इस तरह सारे हरिजन विधायकों के कांग्रेस से जनमोर्चा जाने की यात्रा सिर्फ पार्टी स्तर की बगावत भर नहीं थी। यह जनमोर्चा द्वारा कांग्रेस का हरिजन आधार काटने का संकेत था। हरिजन वोट बैंक के टूटने की घंटी थी। खतरे की घंटी। मुख्यमंत्री, उनके सहयोगी और उनका स्टाफ इसी नाते इस खबर से भीतर-भीतर तबाह थे। पर बाहर-बाहर यही जताते रहे कि कुछ नहीं हुआ है। और सचमुच खबर छपने के चौथे दिन विधान परिषद में जो नजारा देखने को मिला संजय एक क्षण को तो सकते में आ गया। विधान परिषद में संजय के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव पेश हो गया था। क्योंकि जनमोर्चा प्रस्ताव पर दस्तखत करने वाले विधायकों में से कुछ विधान परिषद सदस्य भी थे। संजय का कयास था कि वह सारे विधायक सिर्फ मंत्री पद पाने भर के लिए यह दबाव बनाए हुए थे। पर इसका भंडाफोड़ सार्वजनिक रूप से हो जाएगा इसका उन्हें तनिक भी आभास नहीं था।

विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश करने वाले विधायकों की जिद थी कि तुरंत प्रस्ताव मंजूर किर लिया जाए। और संबंधित संवाददाता को सदन में बुला कर दंडित कर जेल भेजा जाय। पर पीठासीन अधिकारी ने तुरंत मतदान करा प्रस्ताव मंजूर करने से इंकार कर दिया। पर लंच बाद यह सारे सदस्य वही मांग लेकर विधान परिषद सभापति के आसन के निकट पहुंच गए। सवाल व्यवस्था का उठ गया। परिषद की बैठक दूसरे दिन के लिए स्थगित हो गई।

दफ्तर में संजय परेशान इधर उधर घूमता रहा। मनोहर बोला, "जेल तो डियर तुम्हें हो ही जाएगी। भले तीन दिन की हो। पर होगी जरूर। और इसमें कोई जमानत भी नहीं होगी। हाईकोर्ट क्या सुप्रीम कोर्ट भी जमानत नहीं देती।" उसने जोड़ा, "पर तुम हीरो हो गए आज। खुदा न खास्ता जो जेल चले गए तो देश भर के अखबारों में पब्लिसिटी अलग।" वह टांट करता हुआ बोला, "चांदी है अब तो।"

"पर मेरा कुसूर क्या है?" संजय बोला, "सही खबर लिखना गुनाह है? फिर मैंने तो सुबूत सहित लिखा है!"

"सही गलत का फैसला तो बाद में होगा। पहले तो तुम्हें जेल होगी।" मनोहर बोला, "पर अगर आज का प्रबंध" करवा दो तो मैं जेल जाने से तुम्हें बचवा सकता हूं।

"प्रबंध मतलब?" संजय बिफरा।

"आज की दारू!" मनोहर बोला, "बड़ी सीधी सी बात है।"

"मैंने कभी पिलाई है?"

"तभी तो कह रहा हूं, आज पिला दो।"

"सवाल ही नहीं उठता।" संजय सिगरेट सुलगाता हुआ बोला, "मैंने कभी खुद तो खरीद कर पी नहीं। पिलाने का तो सवाल ही नहीं उठता।"

"जेल जाने के सवाल पर भी नहीं?"

"हरगिज नहीं।"

"सोच लो!" मनोहर बोला, "एक मैं ही हूं जो तुम्हें जेल जाने से बचा सकता हूं।"

"तो भी नहीं।" संजय बोला, "शराब तो मैं हरगिज-हरगिज नहीं खरीद सकता।"

"जेल जा सकते हो?"

"चला जाऊंगा।"

"पर शराब खरीद कर नहीं पिलाओगे?"

"सवाल ही नहीं।"

"और मुफ्त की मिले तो टैंकर की तरह पी जाओगे?"

"हां, यह तो आप जानते ही हैं।"

"तो चलो आज तुम्हारा टैंकर भी फुल करवा देता हूं।" मनोहर बोला, "और तुम्हारा जेल जाना भी मुल्तवी करवा देता हूं।"

"कहां?" संजय हैरत से बोला।

"है मेरा दोस्त!" मनोहर बोला, "क्या समझते हो तुम रिपोर्टिंग वालों के पास काम के लोग होते हैं। चलो आज तुम्हें दिखाता हूं कि मेरा क्या जलवा है?"

"कहीं सरोज जी की तरह तो नहीं?"

"क्या मतलब?"

"उस बार सरोज जी ने भी यही कहा था कि चलिए दिखाऊं कि लखनऊ में मेरी क्या प्रतिष्ठा है!"

"अरे नहीं।" मनोहर बोला, "सरोज जी और मुझमें तुम्हें कोई फर्क नजर नहीं आता?" वह अपनी लंबी-लंबी टांगे फैलाता हुआ बोला, "कम से कम इस बार तो मान ही लो।"

"क्यों?"

"क्योंकि इस बार सरोज जी तुम्हें जेल भिजवाने में लगे हैं और मैं तुम्हें बचाने में।" वह बोला, "और सरोज जी से मोर्चा लेना कितना खतरनाक होता है, तुमसे बेहतर कौन जानता है।" वह पैंट खींचता, नाखून चबाता हुआ खड़ा हो गया। बोला, "पर सरोज जी तुम्हें जेल नहीं भिजवा पाएंगे।"

"पर सरोज जी हमें क्यों जेल भिजवाएंगे?" संजय हैरान हुआ।

"तुम क्या समझते यह सब कुछ अपने आप हो रहा है।" वह पैंट खींचता हुआ कमर पर हाथ रखता हुआ बोला, "इस आग में घी वही डाल रहे हैं।" उसने जोड़ा, "और मुझे तो लगता है आग भी उन्हीं की है, लगाई उन्होंने है और घी भी वही डाल रहे हैं। तुम सरोज जी को जानते नहीं कि वह क्या चीज हैं!"

"मुझे तो किसी मुगलिया दरबार के मिरासी लगते हैं। और साफ कहूं तो एक कस्बाई भांड़ से ज्यादा कुछ नहीं लगते।"

"यह उनकी बाहरी रूप है।" मनोहर बोला, "भीतर से वह औरंगजेब हैं। खूंखार भेड़िया हैं।"

"मुझे तो गीदड़ लगते हैं। हरदम रंग बदल लने वाले।" संजय बिदकता हुआ बोला, "हरदम उगते हुए सूरज को प्रणाम करने वाले भांड़।"

"पर यही भांड़ अबकी सांड़ बन कर तुम्हारी बत्ती बनवाने में लगा हुआ है।" मनोहर बोला, "विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश करने की सलाह इसी भांड़ की है।"

"क्या बकते हैं आप?"

"बक रहा हूं? चलो अभी पता चल जाएगा।" वह बेचैन होता हुआ बोला, "चल रहे हो कि मैं जाऊं?"

"चलना कहां है?"

"चलो तो सही!"

"क्या विधान परिषद सभापति के यहां?"

"अरे नहीं।"

"पर कहां?"

"चलो।" वह बोला, "गलत जगह नहीं ले जाऊंगा।"

"ठीक है चलिए!"

"वहां ज्यादा चूं चपड़ मत करना। न ही रिपोर्टरी झाड़ना।" दफ्तर के बाहर अपनी लंबी-लंबी टांगों से स्कूटर में किक मारता हुआ मनोहर बोला।

"अब अगर ऐसी बंदिश है तो मुझे मत ले चलिए।"

"चलो भी।" मनोहर बोला, "अब लौंडियों की तरह नखरे मत चोदो।"

"मैं नहीं जाऊंगा।" संजय ठंडे स्वर से बोला, "जेल होती है तो हो जाए। पर मैं कहीं घुटने टेकने नहीं जाने वाला।"

"भाव मत बनाओ। चलो!"

"मैं नहीं जाऊंगा।"

"श्योर?"

"श्योर!"

मनोहर भुनभुनाता हुआ चला गया। पर रात कोई पौने एक बजे उसने घर पर फोन किया। संजय सोया था। उठकर फोन उठाया। मनोहर की आवाज नशे में लड़खड़ाई हुई थी। पर वह भावुक हो रहा था। वह कह रहा था, "घबराओ नहीं। सब इंतजाम हो गया है! सरोज जी समेत सबकी काट ली गई है!" लड़खड़ाती आवाज में वह बोला, "त्रिपाठी से बात करो।" त्रिपाठी की आवाज मनोहर से भी ज्यादा नशे में लड़खड़ा रही थी। वह बोला, "बुद्धू तुम जेल नहीं जाओगे। निश्चिंत होकर सो जाओ। पूरी लॉबिइंग हो गई है। निश्चिंत होकर सो जाओ।"

"सो तो रहा ही था। आप लोगों ने जगा दिया।" संजय बिफरा।

"अरे पागल तुम सचमुच बुद्धू हो।" त्रिपाठी बोला, "तुम्हारे लिए हम लोग यहां जाग रहे हैं और तुम सो रहे हो।" त्रिपाठी नशे में भी मक्खन लपेटने से बाज नहीं आ रहा था।

"आप लोग मेरे लिए जाग रहे हैं कि पीने के लिए।"

"पगलू तुम्हारे लिए!"

"ठीक है तो मैं सोऊं?" कह कर संजय ने फोन का रिसीवर रख दिया।

दूसरे दिन विधान परिषद में संजय के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव की नोटिस ले ली गई। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले एक विधायक ने यहां तक कह दिया कि, "इस खबर को लिखने वाला संवाददाता ब्लैक मेलर है!" वह बोला, "यह खबर पढ़ कर मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।"

"तो माननीय सदस्य को मनोरोग विशेषज्ञ को दिखाए जाने की व्यवस्था करवा दे मान्यवर!" कहते हुए एक विपक्षी सदस्य ने चुटकी ली, "इन्हें इलाज की जरूरत है। और इनका सदन में रहना हम लोगों के स्वास्थ के लिए अहितकर है।" वह सदस्य बोला, "माननीय सदस्य के मानसिक इलाज की फौरन व्यवस्था की जाए मान्यवर!"

इस वाकये से पूरा मामला हंसी में बदल गया। और मत विभाजन हो जाने से यह विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव अपने आप गिर गया। कई कांग्रेसी विधायक ही इस प्रस्ताव के खिलाफ बोलने लग गए। इस पूरी कार्रवाई के दौरान प्रेस गैलरी में बैठे-बैठे संजय की धुकधुकी बढ़ती रही।

पर ऐसा कैसे हो गया?

संजय ने जब इसकी पड़ताल की तो पता चला कि दिल्ली से कांग्रेस हाई कमान का स्पष्ट निर्देश आ गया था कि प्रस्ताव को पास न होने दिया जाय। क्योंकि प्रस्ताव पास हो जाने से मामला तूल पकड़ जाएगा। और अंतत: हरिजन वोटरों के बीच कांग्रेस की साख गिर जाएगी। इस पूरी पड़ताल की स्टोरी लिख कर संजय ने संपादक को दे दी। पर संपादक ने, "नाऊ दिस चैप्टर इस क्लोज्ड" कह कर वह स्टोरी देखने से ही इंकार कर दिया।

संजय बहुत आहत हुआ।

उसी रात मुख्यमंत्री के सूचनाधिकारी मेहता ने संपादक को फोन किया कि, "मुख्यमंत्री जी आज आपके साथ भोजन करना चाहते हैं। आपको बुलाया है।"

"भोजन आपके साथ करना हो तो जहां बताइए आ जाता हूं।" संपादक ने मुख्यमंत्री के सूचनाधिकारी से कहा,  "पर भोजन अगर मुख्यमंत्री को करना हो तो कहिए वह खुद बात करें।"

सूचनाधिकारी मेहता घबरा गया। उसने आनन-फानन यह बात सूचना निदेशक को बताई। सूचना निदेशक समझ गया कि मामला और बिगड़ गया है। सो वह भागा दफ्तर आया और संपादक से मिलकर सूचनाधिकारी की बात के लिए माफी मांगी और कहा कि, "मैं आपको लेने आया हूं।"

"क्या भोजन अब आप के साथ करना है?" संपादक ने मुसकुरा कर पर ठस आवाज में पूछा।

"नहीं सर! मुख्यमंत्री के साथ!" सूचना निदेशक को यह उम्मीद नहीं थी कि संपादक इस सवाल को फिर दुहरा देंगे। सो वह भहरा गया।

"तो मुख्यमंत्री से कहिए कि अगर उनको इस गरीब के साथ भोजन करने का शौक चढ़ गया हो तो पहले मैनर सीखें।" संपादक ने कहा, "और तरीका यह है कि अगर भोजन उन्हें कराना है तो खुद न्यौतें। कर्मचारियों से न न्यौतवाएं।"

"वेल सर!"

"हां, अगर आपके साथ भोजन करना हो तो कहिए मैं अभी चलता हूं।"

"राइट सर!" इस तरह सूचना निदेशक बड़ी देर तक सर-सर करता रहा। और संपादक उसे बताते रहे कि, "मैं उन कुत्ता संपादकों में से नहीं हूं जो मुख्यमंत्री के दरबार में हमेशा दुम हिलाते घूमते रहते हैं और मान अपमान कुछ नहीं समझते हैं।" वह बोले, "जाइए अपने मुख्यमंत्री से बता दीजिए कि हर पत्रकार हड्‍डी नहीं पंसद करता।"

दरअसल लखनऊ में रिपोर्टरों ने तो राजनीतिक हलकों में काकटेली डिनर खा पी कर ऐसी ही रवायत बना दी थी। कई बार तो बिन बुलाए भी कई पत्रकार पहुंच जाते। बस उन्हें सूचना भर होनी चाहिए। और कई बार यही भी होता कि भोज पर बुला कर मेजबान राजनीतिज्ञ खुद गायब रहता। क्योंकि उसका मकसद पत्रकारों की मेजबानी नहीं, उन्हें खिला पिला कर, "ओब्लाइज" भर करना होता।

पत्रकार भी भर पेट शराब पीकर, मुर्गा खाकर ओब्लाइज हो कर चले जाते। मान अपमान की उन्हें कोई परवाह नहीं रहती। मुख्यमंत्री या कोई मंत्री एक बार स्टेट प्लेन या हेलीकाप्टर में किसी पत्रकार को बिठा कर दो दिन घुमा लाता तो वह उस यात्रा का वर्णन तो चंदरबरदाई शैली में डट कर लिखता ही, उसका आफ रिकार्ड ब्यौरा महीनों यहां वहां परोसता फिरता। पर यह सब मान अपमान तब सिर्फ रिपोर्टरों के हिस्से तक था। संपादक तबका तब तक इस नाबदान से बचा हुआ था।

पर जल्दी ही संपादकों का पतन भी शुरू हो गया। और उस बार तो हद ही हो गई। एक मुख्यमंत्री ने अपने मुख्यमंत्रित्व के एक साल पूरे हो जाने की संध्या पर दो हिंदी और एक अंग्रेजी अखबार के तीन चुनिंदा संपादकों को भोजन पर आमंत्रित किया। तीनों संपादक समय से मुख्यमंत्री निवास पर पहुंच गए। वहां उनकी बड़ी आवभगत हुई बिलकुल दामाद की तरह। तीनों संपादक गदगद! जब बड़ी देर हो गई फिर भी मुख्यमंत्री नजर नहीं आए तो संपादक गण परेशान हुए। पूछताछ की तो पता चला कि मुख्यमंत्री जी नहीं आ पाएंगे पर आप सादर भोजन करिए। तीनों संपादकों ने बिना मुख्यमंत्री के सादर भोजन किया। और जब चलने लगे तो एक संपादक डकार लेकर आह भरते हुए बोले, "मुख्यमंत्री जी होते तो एक बढ़िया सा इंटरव्यू भी हो गया होता।"

"इंटरव्यू हो गया है न!" मुख्यमंत्री का एक सूचनाधिकारी अदब से बोला और बने बनाए इंटरव्यू की टाइप प्रतियां निकाल कर तीनों को एक-एक प्रति देते हुए बोला, "तीनों इंटरव्यू अलग-अलग है।" उसने विनम्रतापूर्व जोड़ा, "आई मीन तीनों इंटरव्यू तीन तरह के हैं। सेम-सेम नहीं हैं। तीनों के एंगिल और क्योश्चन डिफरेंट-डिफरेंट हैं।"

अंगरेजी के संपादक जो अंग्रेजों के जमाने से ही पत्रकारिता कर रह थे, आजादी के तुरंत बाद एम.एल.सी. का सुख भी लूट चुके थे, जिनकी अंग्रेजी पत्रकारिता में बड़ी प्रतिष्ठा और धाक थी, से वह सूचनाधिकारी बोला, "सर आपका आइटम अंग्रेजी में ही है। हिंदी से ट्रांसलेशन वाली दिक्कत नहीं होगी।"

मुख्यमंत्री निवास से चलते समय इन तीनों संपादकों को बने बनाए इंटरव्यू के साथ-साथ भारी डग्गा यानी भारी गिफ्ट से भी नवाजा गया और निवेदन किया कि "सर, कोई काम हो तो बिना संकोच आदेश करें।"

तीनों संपादक मुख्यमंत्री निवास से खुशी-खुशी लौटे।

दूसरे दिन तीनों संपादकों के अखबारों में मुख्यमंत्री का इंटरव्यू पहले पेज पर विथ बाइलाइन विस्तार से छपा था। वह इंटरव्यू जो इन स्वनाम धन्य संपादकों ने लिया ही नहीं था, वह इंटरव्यू जो मुख्यमंत्री ने दिया ही नहीं था, वह इंटरव्यू जो विभाग के कई सूचनाधिकारियों और संयुक्त निदेशकों ने मिल-जुल कर तीर पर तुक्का स्टाइल में तैयार किया था। वही इंटरव्यू अक्षरश: इन अखबारों में उनके संपादकों ने अपनी-अपनी बाइलाइन के साथ खोंस दिया था।

जाहिर है संपादकों का भी अब पतन हो गया था।

अब ऐसे माहौल में अगर कोई संपादक तन जाए, रीढ़ दिखाने लगे मुख्यमंत्री से तो सूचना निदेशक के लिए "मैनेज" कर पाना बहुत नहीं तो थोड़ा मुश्किल तो था ही। हालांकि वह सूचना निदेशक व्यवहार में शालीन, मिजाज में नफीस और "मैनेज" करने में खासी महारत रखता था। वह था तो आई.ए.एस. कैडर का ही। और सीनियर भी। पर आई.ए.एस. अधिकारियों की ऐंठ और अपने आपको खुदा समझने की अकड़ उसे छूती तक नहीं थी। कम से कम अपने व्यवहार में वह इस गंध को नहीं आने देता था। पर उसकी शालीनता, नफासत और कायस्थीय कमनीयता इस संपादक को मैनेरिज्म के बावजूद मैनज नहीं कर पा रही थी। वह संपादक की केबिन में "सर-सर" कहता यहां वहां फोन घुमाता रहा और लगातार यह जताता रहा कि कहीं भी मुख्यमंत्री जी मिल जाएं तो कम से कम फोन पर ही मुख्यमंत्री से संपादक को भोजन का न्यौता दिलवा दे। हालांकि संपादक उसे बार-बार बताते जा रहे थे कि, "आज तो मैं फिर भी भोजन पर मुख्यमंत्री निवास नहीं आ पाऊंगा। क्योंकि मुझे कहीं और जाना है। और कम से कम इस तरह तो कतई नहीं।"

"कल का रख लें सर!" सूचना निदेशक विनम्रतापूर्वक बोला।

"नहीं इस तरह तो नहीं।" संपादक बोले।

इस बीच जाने कैसे और कहां से सरोज जी को खबर लग गई कि मुख्यमंत्री ने संपादक को खाने पर बुलाया है और संपादक ने जाने से मना कर दिया है। वह भागे-भागे संपादक की केबिन में घुसे और बिना किसी इधर-उधर के सीधे-सीधे प्वाइंट पर आ गए, "कहौ तो हम चले जाएं।" सरोज जी की बात सुनकर सूचना निदेशक बिदका। पर सरोज जी जैसे बोरिया बिस्तर बांध कर आए थे, "प्रतिनिधित्व हम कर देंगे।" सुनकर संपादक का चेहरा लाल हो गया। पर सूचना निदेशक के वहां होने के नाते वह कुछ बोले नहीं। लेकिन सरोज जी फिर भी चालू रहे, "कहौ तो हम चलिए जाएं।"

"पर मुख्यमंत्री जी ने एडीटर साहब को बुलाया है।" सूचना निदेशक ने स्पष्ट किया।

"तो क्या हुआ?" सरोज जी बाल हठ पर आ गए, "एडीटर के बिहाफ पर हम चले चलते हैं। बात वही भई।"

"ठीक है हम बाद में तय कर लेंगे।" कह कर अदब से सिर झुका कर सूचना निदेशक चला गया। उसके जाने के बाद सरोज जी भी उसके पीछे-पीछे संपादक की केबिन से बाहर निकलने लगे तो संपादक को लगा कि कहीं सरोज जी निदेशक के साथ नत्थी होकर सचमुच ही न एडीटर के बिहाफ पर मुख्यमंत्री का भोज खा आएं! सो उन्होंने सरोज जी को रोकते हुए कहा, "सुनिए सरोज जी!"

"हां।" कह कर वह ठिठक गए। बोले, "बोलौ!"

"आज मुख्यमंत्री के यहां एडीटर के बिहाफ पर भोजन पर मत चले जाइएगा।" संपादक ने जोर देकर कहा, "और अगर जाइएगा तो इस्तीफा देकर जाइएगा।"

"अरे, नहीं प्यारे।" सरोज जी बोले, "हम कवनो नादान हैं। इतनी बात तो हम भी समझते हैं। आखिर इज्जत की बात है। और हम इसमें बट्टा नाहीं लगावेंगे।" सरोज जी मौका नाजुक देखकर पट पैंतरा बदल गए थे, "ऊ तो हम एह मारे कहि रहे थे कि अफसर है, मुख्यमंत्री का खास है, कहीं नाराज न होई जाए। और जानते ही हो प्यारे कि लाला को पचास काम पड़ते हैं मुख्यमंत्री से। इसलिए उसको खुश करने के लिए उतना कहि दिया। बस! हम सचहूं थोड़े जाएंगे।" उन्होंने जोड़ा, "आखिर इज्जत हमहू को प्यारी है प्यारे!"

"कुछ नहीं। कोई इज्जत विज्जत नहीं प्यारी है आप जैसे लोगों को।" संपादक ने कहा, "आप ही जैसे लोगों ने पत्रकारों की छीछालेदार करा रखी है। नहीं तो मुख्यमंत्री की इतनी हिम्मत की अपने चाकरों से भोजन के लिए हमें कहलाए!"

"घबराओ नहीं प्यारे!" सरोज जी उत्तेजित होने का अभिनय करते हुए बोले, "हम कल ही मुख्यमंत्री को टाइट करते हैं।"

"यह भी करने की जरूरत नहीं है।" संपादक बोले, "आपको तो बस मुख्यमंत्री से मिलने का बहाना चाहिए।"

"नहीं हम मुख्यमंत्री को अबकी टाइट करेंगे।" सरोज जी वीर रस में आ गए थे, "आखिर हमारे संपादक की गरिमा का सवाल है प्यारे!"

"कुछ नहीं। कोई जरूरत नहीं।" संपादक ने कहा, "मुख्यमंत्री के एक मामूली से अफसर के आगे तो आप भी मेरे सामने गिड़गिड़ा रहे थे। मुख्यमंत्री को क्या टाइट करेंगे?"

"वह अब हम पर छोड़ौ।" सरोज जी बोले, "हम समझ लेंगे।"

"कहा न, कोई जरूरत नहीं।" संपादक ने कहा, "सरोज जी किसी भी बहाने आप मुख्यमंत्री के पास नहीं जाएंगे।"

"पर संपादक की गरिमा का सवाल है प्यारे!" सरोज जी किसी घाघ मगरमच्छ की तरह अपनी बात पर डटे रहे।

"संपादक मैं हूं। अपनी गरिमा की रक्षा करना मैं जानता हूं।" उन्होंने कहा, "वह मैं कर लूंगा। आप अपनी गरिमा बचाइए। कुछ ग्रेस मेनटेन करिए सरोज जी!"

उदास सरोज जी चुपचाप तब खिसक गए थे। सरोज जी जिनके लिए नरेंद्र जी अक्सर कहा करते थे, "सरोज जी की योग्यता कायदे से जिला संवाददाता बनने लायक भी नहीं है। पर वह किस्मत की खा रहे हैं और बरसों से राजधानी में विशेष संवाददाता बने बैठे हैं। विधान सभा, मुख्यमंत्री "कवर" कर रहे हैं तो कोई क्या कर लेगा?" नरेंद्र जी जोड़ते, "क्या पता किसी दिन वह संपादक भी बन जाएं।" गरदन हिला कर वह कहते "सरोज जी तमन्ना तो है ही संपादक बनने की।"

एडीटर के बिहाफ पर बेहयाई और अपमानित होने की हदें लांघ मुख्यमंत्री का भोज खाने के लिए ललचने वाले वही सरोज जी एक्टिंग ही सही, एडीटर बन गए थे। सरोज जी के तीन सपनों में से एक सपना आज पूरा हो गया था। सरोज जी कार्यवाहक संपादक बन गए थे और संजय से नाराज थे।

बेहद नाराज!

गंदी गोमती, गंधाते सरोज जी, विधान सभा मार्ग और "गंगा जी धीरे बहो" गुनगुनाता संजय। इन चारों का संयोग कहिए, दुर्योग कहिए, कोई अंतविर्रोध रच रहा था, कोई कंट्रास्ट कि कोई कोलाज गढ़ रहा था। कोलतार का बना विधान सभा मार्ग उस काली घुप अंधेरी रात में कुछ भी तय नहीं कर पा रहा था। स्ट्रीट लाइट्स भी उसे ऐसा कुछ हेर पाने में मदद देने से जैसे इंकार कर रही थीं। पर संजय था कि गुनगुनाता ही जा रहा था "गंगा जी धीरे बहो, नाव फिर भंवर में है।" ठहरे हुए पानी वाली गंदी गोमती की बदबूदार गंध का आदी यह विधान सभा मार्ग "गंगा जी धीरे बहो" का मर्म तो नहीं समझ पा रहा था पर इस गीत के दूसरे मिसरे "नाव फिर भंवर में है" की आंच उसे जरूर मिल रही थी, महसूस हो रही थी। जाने कैसे? अब जब कि गोमती भंवर बिसार चुकी थी। भूल चुकी थी भंवर का भाष्य!

ठहरे हुए पानी को भला भंवर का भाष्य क्या मालूम? भंवर का भेद वह कैसे भेदे भला? भंवर की भावना, भंवर के स्वाद, भंवर के भ्रम में कैसे भिंगोए किसी को वह। पर विधान सभा मार्ग भंवर की आंच में भींज रहा था। आंज में भी भींजता है कोई भला? पर विधान सभा मार्ग तो भींज रहा था। यह भींजना आंच से उपजा पसीना तो नहीं था? कि बाढ़ आ गई थी गोमती में जो वह भंवर का भाव विधान सभा मार्ग को शेयर के भाव की तरह परोस रही थी, परोस-परोस उसे भिंगो रही थी, नाव को भंवर के लपेटे में ऐसे लपेट रही थी गोया वह आग की लपट हो!

हां, यह बाढ़ ही थी।

भंवर के भाव ऐसे उछल रहे थे गोया शेयर के भाव हों।

"तो ऐसे में संजय महाराज क्या किसी डॉक्टर ने प्रेसक्राइब किया है कि जानबूझ कर आप अपनी नाव भंवर के भाव चढ़ा दे?" वह खुद ही से पूछता है। और खुद ही जवाब भी देता है कि, "हां प्रेसक्राइब्ड तो किया है।" वह जरा अटकता है और जोड़ता है "नियति के डॉक्टर ने। और नियति से, नियति के नियंता में लड़ना नहीं चाहता।" जवाब उसका लंबा होता जाता है "दरअसल नपुंसकों कायरों और जाहिलों के आगे मैं घटने नहीं टेकना चाहता। भले ही आज इन्हीं का समय है। और समय से भला कौन लड़ा है? जानता हूं कि समय बड़ा हरजाई है, निर्मम है। पर मैं एक बार समय से भी लड़ लूंगा। यह जानते हुए भी कि समय से हर कोई हारा है। हो सकता है मैं भी हारूं। हो सकता है मैं जीतूं भी। समय से न सही, इस समय के नपुंसकों, कायरों, जाहिलों, कुटिलों और धूर्तों से तो जीतूंगा ही। हो सकता है इनसे भी हार जाऊ। हो सकता है मेरी नाव को भंवर लील ले, उबरने न दे। पर मैं उबर भी न पाऊंगा इसकी गारंटी देने वाला भंवर भी कौन होता है? ताकतवर भंवर होगा तो वह हमें लील जाएगा। मुझमें शक्ति होगी, युक्ति होगी तो मैं उबर जाऊंगा। और भंवर भी भला कौन बारहमासी है। ठहरे हुए पानी में भटक कर बाढ़ के सिर आया हुआ भंवर! कितने देर रहेगा? एक दिन पानी फिर ठहरेगा, भंवर का भाव भहरा जाएगा। हां, उसके बाद जो सड़न, बदबू और उसकी बयार बहेगी वह जरूर मार डालने वाली होगी। बेचने की जरूरत इसी से है।"

"पर वह बचे कैसे?" वह खुद ही पूछता है, "कोई कार्य योजना है क्या?"

"कोई कार्य योजना तो नहीं है।" वह खुद को जैसे जवाब देता है, "पर एक सूत्र है। जिसे वह अपनी रिपोर्टिंग में अकसर आजमाता रहा है कि आंख, कान और दिमाग खुले रख कर पानी की तरह जाना और पानी की तरह आना, साथ में अमृत-विष, हीरा-मोती, कूड़ा-कचरा, अच्छा-बुरा जो भी तथ्य मिले बहा लाना और सबको सलीके से परोस देना। तो वह पानी बन कर लड़ेगी भी।" वह फिर जोड़ता है ऐसे जैसे खुद को टोकते हुए, खुद को टटोल रही हो, "और पानी! पानी तो बड़े घमंड से खड़े पहाड़ की छाती भी चीर कर बहता हुआ जमीन पर आ जाता है सबको जीवन देने। और जीवन देकर बहते-बहते नदी बन समुद्र में समा जाता है।"

"तो क्या वह भी समुद्र में समा जाएगा?" उसका यह सवाल खुद उसमें जाग जाता है। और इस सवाल का अर्थ, उसकी ध्वनि गुम होने लगती है।

इस सवाल का शोर, संजय के भीतर इतना ज्यादा है कि इसकी गूंज के आगे खुद को वह निरुत्तर पाता है! जाने यह भंवर के भय का शोर है, कि समुद्र में समा जाने का संशय है, कि समय की आग में स्वयं को सुलगाने का संकट?

समय, स्वयं, शोर और सुलगन! शायद सभी हैं।

वह खुद को चेतावनी देते हुए बताना भी चाहता है कि सिगरेट के साथ सुलगने और समय के साथ सुलगने की दुश्वारी, उसका फर्क और परिणाम भी वह सोच ले!

कि समय आखिर समय है और सिगरेट सिर्फ सिगरेट! समय सिगरेट नहीं है। और सिगरेट समय नहीं है। समय का यह सवाल उसे साल रहा है, उसे बेध रहा है। इतना कि क्षण भर को लगता है वह बधिर हो जाएगा। स्कूटर रोक कर उसने सिगरेट सुलगा ली है। वह सुलगने लगा है। पर राह नहीं मिलती।

शराब मिलती है।

प्रेस क्लब में बैठकर वह शराब पी रहा है। अब शराब है, सिगरेट है, थकन है, वह है, पर सुकून नहीं है। साथ में प्रकाश बैठा है। रूमाली रोटी और कबाब खाते हुए वह लड़के को बिरयानी लाने की हांक देता है। सामने कुछ पत्रकार जुआ खेल रहे हैं। कुछ जुआ खेलते-लोगों को देख रहा हैं। कुछ ऊंघाए, कुछ उनींदे, कुछ ऊबे बैठे टी.वी. देख रहे हैं। पर ज्यादातर के हाथों में सिगरेट और शराब है। ....जारी....

इस उपन्यास और इसके लेखक के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए तस्वीर पर क्लिक करें.


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