अपने-अपने युद्ध (अंतिम)

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तो क्या यह सब भी सुलग रहे हैं? सिगरेट की तरह, भींगी हुई लकड़ी की तरह कि संजय की तरह? जानना मुश्किल है, क्योंकि यह सभी पत्रकार हैं। और पत्रकार दूसरों का तापमान तो बता सकते हैं, पर अपना नहीं बताते। और उनका तापमान कोई नोट भी करे, यह उन्हें कुबूल नहीं है। दूसरों को शीशा दिखाने वाले ये लोग खुद शीशा देखना गाली समझते हैं। अपनी तकलीफ से आंख मूंद उस पर परदा डाले रहते हैं।

सबकी तकलीफ सुर्खियों में बताने वाले ये लोग खुद सुलगते रहते हैं। बिना धुएं के। ऐसे कि जैसे कोई देखे नहीं और न ही पूछे कि, "ये धुआं कहां से उठता है?" सुलगना, बिन धुएं के सुलगना, जैसे उनकी नियति हो!

प्रेस क्लब में बैठकर शराब पीने, जुआ खेलने का सबब तो समझ में आता है पर ये उनींदे, उंघाए, ऊबे बैठे टी.वी. देखने वाले पत्रकारों का क्या किया जाय? क्या यह घर में टी.वी. नहीं देख पाते, घर में नहीं सो पाते जो मुंह उठाए प्रेस क्लब चले आते हैं। वह यह सब अभी सोच ही रहा होता है कि प्रकाश कहता है, "अब तुम लइया चना मंगा लो। मेरे पास पैसा नहीं हैं।"

"रुको अभी मंगा लेना।" संजय टालता हुआ बोला, "बिरयानी खाने के बाद लइया चना का क्या मतलब?"

"मतलब है।" बोतल दिखाता हुआ प्रकाश बोला, "अभी चार-पांच पेग बची है आखिर खींचोगे कैसे?"

"सिगरेट से ही सही।" संजय बोला, "पर लइया चना रहने दो।" उसने जोड़ा, "बल्कि कबाब या बिरयानी ही मंगा लो।"

"टेट में पैसे हैं?" प्रकाश बौखलाया, "अच्छा चूतिया हूं। दारू भी पिलाओ और बिरयानी, कबाब भी खिलाओ। चने नहीं खाएंगे। वाह!" वह नया पैग बनाते हुए बोला, "तुम भी अपनी खत्म करो।"

"चलो आज तुम भी झेलवा लो।" कहते हुए संजय ने एक लंबा घूंट भरा और गिलास खाली कर दी।

"हां, सुना आज तुमने सुबह सरोज के साथ पंगा ले लिया?'' शराब की चुस्की लेता प्रकाश बोला।

"मैं क्यों पंगा लूंगा?"

"त्रिपाठी जी बता रहे थे।" प्रकाश बोला।

"असल में सारी आग त्रिपाठी की ही लगाई हुई थी।"

"त्रिपाठी को क्या पड़ी है?"

"पता नहीं।" संजय सिगरेट का धुआं फेंकता हुआ बोला, "पर मेरे आने के पहले ही दिन से मेरे पीछे पड़ा है। एक से एक चालें, एक से एक बिसातें बिछाता रहता है।" संजय रुका और बोला, "पर मुझे परवाह नहीं। उस जैसे लोग मेरा कुछ भी नोच नहीं सकते।"

"वो तो ठीक है।" प्रकाश बोला, "पर वह है चाणक्य बुद्धि का। और फिर सरोज से तुम्हें नहीं भिड़ना चाहिए था। आफ्टर आल वह अब तुम्हारा एडीटर है।"

"मेरा एडीटर कैसे हो जाएगा!" संजय खीझा, "वह बनिये के अखबार का एडीटर हो तो हो। मेरा एडीटर नहीं हो सकता। मैं उसे एडीटर नहीं मान पाता।"

"वो तो ठीक है।" प्रकाश बोला, "एडीटर नहीं मानों न सही पर पंगा लेना जरूरी था?"

"हद है!" संजय बोला, "आप मुझ पर थूके और मैं उसे पोछूं भी नहीं, उसका प्रतिकार भी नहीं करूं?"

"क्या कहा उसने?"

"कहने लगा कि मैं ब्राह्मणवाद चला रहा हूं।"

"अच्छा तो वो अधिकारी ब्राह्मण है।"

"होगा।" संजय भड़का, "पर मैं तो उस अधिकारी को जानता तक नहीं। शकल तक नहीं देखी उसकी।"

"तो खबर लिखी क्यों?"

"खबर थी इसलिए लिखी।"

"आईमीन खबर मिली कैसे?"

"जरूरी है कि जिसके बाबत खबर हो, वही मिले तभी खबर लिखी जाए!"

"नहीं। मैंने यों ही पूछा।"

"जानना चाहते हो?" संजय बोला, "सचिवालय में रूटीन-वे में इसकी चरचा चली। और चरचा के केंद्र में यह था कि एक सीनियर आई.ए.एस. लंदन में भी बैठ कर ट्रांसफर पालिसी की ऐसी तैसी करवा रहा है।" संजय बोला, "बस यही प्वाइंट मुझे क्लिक कर गया। मैंने डिटेल्स बटोरे और खबर लिख दी। पर इत्तफाक से हेडिंग में यह लंदन वाली बात नहीं आ पाई। और खबर की ध्वनि बदल गई।" संजय बोला, "तो इसमें मेरी क्या गलती? मैंने हेडिंग तो नहीं लगाई।"

"कौन सी खबर डिसकस हो रही है।" मनोहर अपने लंबे-लंबे पांव फैलाकर बैठता हुआ बोला, "भाई मैं भी पीऊंगा।" कह कर उसने गिलास और पानी के लिए हांक लगाई।

"मैं चल रहा हूं।" कह कर संजय खड़ा हो गया।

"रुको तो।" प्रकाश बोला।

"जाने दो।" मनोहर बोला, "ये साला टैंकर चला जाए तभी ठीक है। नहीं साला आधी शराब तो यही सूत जाएगा। हम लोग क्या पीएंगे?" कह कर मनोहर पेग बनाने लगा।

प्रकाश "रुको-रुको" कहता रहा पर संजय रुका नहीं। प्रेस क्लब में सरोज जी के संपादक बनने की खबर अब तक बासी पड़ गई थी। संजय नशे में टुन्न स्कूटर स्टार्ट कर रहा था। पर स्कूटर स्टार्ट नहीं हो रही थी।

किसी तरह स्कूटर स्टार्ट हुई तो उसका मन हुआ कि वह सीधा चेतना के घर जाए और उससे लिपट जाए। उसे चूम ले। पर आधी रात का खयाल करके वह चेतना के घर नहीं गया। और घर जाकर बीवी से चिपक कर सो गया। बीवी रात बुदबुदाती रही कि, "मुंह हटाइए बदबू आ रही है।" पर वह सपने में डूब गया। सपने में उसने देखा वह मैनेजिंग डायरेक्टर के सामने बैठा है और कह रहा है, "यह एडीटर हटाइए, बदबू आ रही है।"

दूसरे दिन दफ्तर में पता चला कि नरेंद्र जी को सिक्योरिटी वाले फेंकू सिंह ने गेट पर रोक लिया। नरेंद्र जी अपने साथ कुछ किताबें ले जा रहे थे। फेंकू सिंह ने उन्हें किताबें ले जाने से मना किया। नरेंद्र जी ने बताया कि यह उनकी व्यक्तिगत किताबें हैं। और कि गिफ्ट की भी नहीं, खरीदी हुई हैं। पर फेंकू सिंह बेइज्जती की हदें छूता हुआ नरेंद्र जी की किताबें ले जाने से रोकता रहा। अंतत: उन्होंने जनरल मैनेजर को फोन किया। उसने कहा- मैनिजिंग डायरेक्टर से बात करिए। मैनेजिंग डायरेक्टर ने कहा, तब कहीं जाकर फेंकू सिंह ने उन्हें और उनकी किताबों को छोड़ा। नरेंद्र जी तो चले गए पर पीछे अपनी अपमान कथा छोड़ गए। जाहिर है कि यह सब एम.डी. के इशारे पर ही हुआ था। संजय ने यह सब सुना तो बोला, "ये बनिये साले किसी के नहीं होते।"

दो दिन बाद उसे पता चला कि नरेंद्र जी की कुछ किताबें, पेंटिंग्स, टाइपराइटर तथा कुछ छुटपुट सामान अभी भी उनकी केबिन में पड़ा हुआ है। उसने सरोज जी से कहा, "बनियों की नौकरी में यह किसी के साथ कभी भी हो सकता है। हमारे साथ भी हो सकता है। आपके साथ भी हो सकता है।"

"ठीक कहि रहे हैं आप।" कह कर सरोज जी गदगद हो गए।

"तो फिर बाकी सामान भी नरेंद्र जी का उनके घर भिजवा देना चाहिए।" संजय ने सरोज जी का गदगद मन देख कर फौरन प्रस्ताव रख दिया।

"पर कइसे, कवन लइ जाएगा?" सरोज जी अचकचाए।

"आप कहिए तो हम लेते जाते हैं।" संजय बोला।

"सहर्ष लइ जाइए।"

संजय चकित रह गया। सरोज जी का यह बदलाव था ही चकित करने वाला। फिर उसने सोचा कि उनके इस ह्रदय परिवर्तन में कहीं कोई चाल तो नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि जब वह समान लेकर चले तो गेट पर उसे भी रोक लिया जाए? चोरी के आरोप में उसे पकड़ कर अपमानित किया जाए? क्योंकि सरोज जी कुछ भी और किसी भी स्तर पर आ सकते थे। उसने फौरन पैंतरा बदला और चपरासी फूल सिंह को बुला लिया। सामान उसी से भिजवाया।

सरोज जी की रणनीति सचमुच गड़बड़ा गई थी।

जनरल मैनेजर को जब सामान ले जाने की बात मालूम पड़ी तो उसने संजय को बुलवाया। संजय समझ गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए उसने पैंतरा बदल लिया। बता दिया कि उसने तो सिर्फ सलाह दी थी। पर सामान सरोज जी ने चपरासी से भिजवाया। सरोज जी की पेशी हुई। सरोज जी ने अपनी मंशा साफ बता दी कि वह संजय को इस तरह चोरी के आरोप में निकालना चाहते थे पर ऐन वक्त पर उसने चपरासी को आगे कर दिया। और बात रह गई।

"तो उसको निकालने की दूसरी तरकीब निकालिए" जनरल मैनेजर ने कहा कि, "उसकी इतनी हिम्मत कैसे हुई?"

"ऊ आप हम पर छोड़ दीजिए।" सरोज जी बोले, "पर थोड़ा टाइम दे दीजिए।"

"ठीक है पर उसको सबक सिखाना जरूरी है।" जनरल मैनेजर बोला।

"सबक नहीं सिखाऊंगा। उसे निकालना ही पड़ेगा।" कह कर सरोज जी चले आए।

उधर दूसरों की खबर रखने वाला संजय अपने ही खिलाफ हो रही साजिश से बाखबर होते हुए भी बेखबर था। तो क्या संजय अब एक नया अभिमन्यु बनने जा रहा था?

ऐसे में उसे साधना की याद आ गई। साधना भी तब ठीक ऐसे ही अपने खिलाफ साजिश से बेखबर, बेहतर एनाउनसिंग का सलीका सीखने में लगी थी।

संजय उन दिनों दिल्ली में बिलकुल नया-नया पहुंचा ही था। साधना से उसकी भेंट, दूरदर्शन के एक कार्यक्रम में हुई थी। वह भी बस दिल्ली नई-नई आई थी। साधना थी तो जयपुर की पर लखनऊ में उसका ननिहाल था। संजय के लिए बस इतना ही काफी था। वह तब कैजुअल एनाउंसर थी और महीने में बड़े जुगाड़ और मिन्नत से हफ्ते भर की उसकी बुकिंग हो पाती थी। इसी तरह हफ्ते भर आकाशवाणी में भी बुकिंग जुगाड़ लेती थी। महीने के पंद्रह दिन उसके इस तरह निकलते। बाकी के पंद्रह दिन वह फुटकर बाहरी कार्यक्रमों की एनाउनसिंग या संजय के साथ दिल्ली में वहां यहां घूमने में गुजार देती। पर उसका ध्यान हमेशा दूरदर्शन की एनाउनसिंग में ही रमा रहता। दूरदर्शन का ग्लैमर उसे कहीं ठहरने ही नहीं देता। उसकी उम्र बाइस-तेइस बरस ही थी पर सपने उसके सोलह बरस की लड़कियों के सी थी।

सपनों पर सपने जोड़ना जैसे उसकी हॉबी थी। इसके बिना वह जी नहीं पाती थी। ग्लैमर को वह आकंठ जी लेना चाहती थी। निम्न मध्यवर्गीय परिवार की यह लड़की फाइव स्टार होटलों, फार्म हाउसों और महंगी कारों की दीवानी थी। जो कि उसकी जिंदगी में तुरंत-तुरंत किसी भी सूरत में नहीं आने वाले थे। संजय उसे समझाता भी कि, "दूरदर्शन की कैजुअल एनाउनसिंग के बूते यह तो हो सकता है कि राह चलते लोग तुम्हारी "एक्सट्रा" नोटिस ले लें, पर तुम यों ही बेशुमार पैसे भी न्यौछावर कर दें, मुमकिन नहीं।" वह जोड़ता, "रियलिस्टिक बनो। रियलिस्टिक।"

"डैम इट!" वह बिफरती और कहती, "इट्स टु मच।" फिर वह जल्दी ही कुछ एडवरटाइजिंग एजेंसियों के फेरे में पड़ गई। एडवरटाइजिंग एजेंसियां भी उसे मॉडल नहीं, रिप्रजेंटेटिव के तौर पर इस्तेमाल करने लगीं। दूरदर्शन का ग्लैमर यहां उसके काम आता और वह बड़ी-बड़ी कंपनियों के विज्ञापन झटक लाती। मोटा कमीशन पाती, मस्त हो जाती। अब संजय के लिए उसके पास "समय" नहीं होता। पर संजय बड़ी बेहयाई से उससे चिपका रहता। जब-तब उससे चिपट जाता और चूमने लगता तो वह पहले तो घूरती, फिर झिड़कती, "इट्स एनफ।" शुरू-शुरू में वह बड़ी जल्दी संभोग के लिए तैयार हो जाती थी, पर अब उसे चूमने तक के संजय को पड़ी कसरत, बड़ा इसरार और बेहद तनाव जीना पड़ता था।

यह उन्हीं तनाव के दिन थे। जब साधना को दूरदर्शन ने एक "नोटिस" दी। उसके खिलाफ कुछ शिकायतें आई थीं। पर वह इस नोटिस से बेफिक्र, साजिश से बेखबर एनाउनसिंग का सलीका सीखने में लगी थी।

संजय ने उसे समझाया भी। वह नहीं मानी। बोली, "तुम मर्दों को दिक्कत क्या है, मैं जान गई हूं।" वह जैसे तनाव में आ गई। बोली, "बस उस बुड्ढे खूसट प्रोड्यूसर जो पैनल बनाता है, उसकी बांहों में समा जाऊं, अपनी टांगें उसके लिए फैला दूं तो सब ठीक है, नहीं सब खराब है।"

"तो अब तुम यह सब भी करोगी?" पूछते हुए संजय अकुला गया।

"क्यों तुम्हारे साथ कर सकती हूं तो किसी भी के साथ कर सकती हूं।" वह बोली, "आखिर दिक्कत क्या है। तुम्हारी भी तो बीवी नहीं हूं।"

"पर हमारे साथ तुम्हारा कोई स्वार्थ नहीं है।" संजय बोला, "यह तो दोस्ती है।"

"तो क्या उस बुड्ढे से कोई दुश्मनी है मेरी?"

"फिर भी। कुछ तो नैतिक होना चाहिए।" संजय सुलगता हुआ बोला।

"कैसी नैतिकता!" साधना बोली, "फिर मैं कोई सती सावित्री की भूमिका में भी नहीं हूं। वह मुंह घुमाती हुई बोली, पर उस बुड्ढे की शक्ल से ही उबकाई आती है।"

सो तुम उदास मत हो मेरे रोमियो, मैं उसकी बांहों में नहीं जाने वाली और न ही वह मेरी....! कह कर वह संजय के कंधों पर सिर रख कर किसी सोच में खो गई। संजय बड़ी देर तक उसके बाल, हाथ और गला सहलाता रहा। पर ज्यों ही उसके हाथ साधना कि हिप पर गए, वह उठ खड़ी हुई बोली, "बस यही दिक्कत है तुम्हारे साथ। मुश्किल समय में भी तुम्हें बस यही सूझता है।"

वह चली गई। खटखट करती हुई। और अंतत: दूरदर्शन से उसकी छुट्टी हो गई। वह कहती कि, "वह खुद ही छोड़ गई।" और जब दूरदर्शन छूटा तो दूरदर्शन का ग्लैमर भी जाता रहा। और जब दूरदर्शन का ग्लैमर जाता रहा तो एडवरटाइजिंग एजेंसियों के लिए भी वह "बेकार" हो गई। फिर वह जयपुर वापस लौट गई। पर दूरदर्शन से उसका मोह नहीं छूटा। अब वह जयपुर दूरदर्शन में कैजुअल थी।

कैजुअल एनाउंसर।

बहुत बाद में जब संजय लखनऊ आ गया तो साधना फिर दिल्ली आ गई। एक वीडियो मैगजीन में कंप्यूटर की नौकरी पाकर। अब वह मुटाने लगी थी और कुछ सीरियलों के चक्कर में थी। संजय को भी उसने चिट्ठी लिखी और लिखा कि अब सपने देखने उसने बंद कर दिए हैं और उसकी ही तरह वह भी अब रियलिस्टिक हो गई है और उसे स्टेबिल करने के लिए वह चाहती है कि संजय भी दिल्ली वापस आ जाए। वह समझती थी कि संजय ने दिल्ली उसके बिछोह में छोड़ी थी। हुआ यह था कि एक बार संजय ने ही उसे लिख दिया था कि "अब जब दिल्ली में तुम नहीं, तो मैं यहां क्या करूंगा।" और जरा ज्यादा भावुकता से लिख दिया था। सो साधना संजय का वही "गैप" भरना चाहती थी। उसने कोई एक फिल्मी गाना भी लिखा था जिसकी ध्वनि यह थी कि "सोए तो कई बांहों में मगर...." उसने संजय को यह भी लिखा कि आने वाले प्रिंट मीडिया के नहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के हैं। सो वह इसलिए भी चाहती है कि संजय दिल्ली आकर अभी से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खप जाए। ताकि आगे कोई दिक्कत न हो। कि जूनियर्स बाजी मार ले जाएं और आप सीनियर्स की खोल ओढ़े टापते रह जाएं।

पर तब संजय को यह सारी बातें बेकार सी लगी थीं। शायद इसलिए भी कि तब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने शुरुआती दौर में था, और यह भी कि लखनऊ उसे रास आ गया था। दिल्ली में बेकार की दौड़ धूप उसे बेमानी लगती थी। जवाब में उसने साधना को लिख दिया कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कुछ नहीं रखा है। जो मजा पैर फैला कर लिखने में है, वह इसके उसके आगे-पीछे माइक्रोफोन लेकर खड़े होने और कैमरामैनों के नखरे झेल कर अपना थोबड़ा दिखाने भर के लिए यहां वहां भागने फिरने में नहीं है। कि उसे फंतासी अब और नहीं जीनी!

साधना, संजय के इस जवाब से खुश नहीं हुई और लिखा कि बाद में पछताओगे। पर संजय फिर भी नहीं माना। और अब सचमुच वह पछताता है।

पर तब?

तब तो उसे अपने युद्ध से ही फुर्सत नहीं थी। जैसे वह एक नया ही महाभारत रचने में लगा था। तब उसे लगता कि जैसे वह अर्जुन की भूमिका में है। तब उसे यह नहीं मालूम था कि वह अर्जुन नहीं, दरअसल अभिमन्यु की भूमिका में घिरता, फंसता और जूझता जा रहा है। तो सरोज जी ने दूसरे दिन संजय को एक अप्रेंटिश टाइप एसाइनमेंट थमाया कि, "कार्तिक पूर्णिमा" का स्नान आप "कभर" कीजिए। सुन कर संजय तिलमिलाया बहुत। पर कुछ बोला नहीं। चलते-चलते सरोज जी ने ताकीद की कि, "सुबह-सुबह पहुंच जाइएगा।" फिर उन्होंने घाटों की तफसील भी बताई।

पर संजय दिन भर घर में ही पड़ा रहा। शाम को पुलिस कंट्रोल रूम को फोन करके पता कर लिया कि कोई डूब-ऊब तो नहीं मरा। फिर एक रूटीन सी तीन पैरे की खबर लिखी और फिर घर वापस आ गया। उसके दूसरे रोज उसे नोटिस मिली कि, "कार्तिक पूर्णिमा के स्नान में तीन लोग डूब कर मर गए। पर आपकी खबर में यह ब्यौरा नहीं है।" नोटिस में तुरंत जवाब देने और खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी थी। नोटिस पाते ही संजय का माथा ठनका। उसने फिर से कंट्रोल रूम, एस.एस.पी., एस.पी. सिटी सबसे दरियाफ्त किया पर किसी ने भी स्नान में डूब कर किसी के मरने की खबर पुष्टि नहीं की। फिर संजय ने शहर के दूसरे अखबारों की खबरे पलटीं। एक अखबार में उसे तीन लोगों के डूब मरने की खबर मिल गई। पर वह तीन लोग लखनऊ में नहीं कानपुर में डूबकर मरे थे। पर डेटलाइन चूंकि लखनऊ की थी सो सरोज जी ने सो कोल्ड समाचार संपादक की सलाह पर संजय को नोटिस दे दी।

संजय ने भी नोटिस का जवाब बिलकुल कारण बताओ शैली में लिखा। और पूछ लिया कि तीन लोगों के डूब मरने की खबर और उसका स्रोत बताएं। सरोज जी संजय का यह जवाब पाते ही घबरा गए। उसे बुलाया और "नोटिस" मांगी। कहा कि "जरा देखें तो?" और फिर लगभग झपट्टा मार कर फाड़ते हुए बोले, "अब क्या है?" घूरते हुए वह कहने लगे, "जाइए, अपना काम कीजिए। बड़े आए हैं हमसे जवाब तलब करने वाले!"

फिर जल्दी ही सरोज जी ने संजय को रिपोर्टिंग से हटा कर डेस्क पर बिठा दिया। कहा कि, "आपके खिलाफ बड़ी शिकायतें आ रही है।" उधर डेस्क पर भी संजय के खिलाफ "बिसात" बिछ चुकी थी। पर संजय जाने क्यों बेफिक्र। नोटिसों का ढेर बढ़ता जा रहा था। शायद ही कोई हफ्ता होता जिसमें संजय को नोटिस न मिलती हो।

बाद में तो वह दफ्तर आते ही चपरासी से पूछ लेता, "कोई प्रेम पत्र है क्या?"

पर संजय को निकालने का कोई मजबूत आधार सरोज जी और उनका काकस नहीं निकल पा रहा था। संजय ने इस बीच देखा कि मनोहर और प्रकाश भी उससे कन्नी काटने लगे थे। अकेले में तो वह उसे खूब ललकारते पर जब बात सबके सामने की होती तो वह दोनों चुप लगा जाते। उनका तर्क होता कि उन्हें भी नौकरी करनी है। नतीजतन संजय अब इस युद्ध में अकेला था। पर वह युद्ध में था, इसकी तारीफ मनोहर और प्रकाश अकेले में करते।

संयोग ही था कि सरोज जी कार्यवाहक संपादक पद से हटा कर संपादकीय सलाहकार बना दिए गए और एक नया संपादक आ गया। फोटोग्राफर सुनील कहता, "लेव संजय अब का. वा. सं. तो गया, तुम्हारी मौज होई गई। और नौकरिया बच गई।"

नया संपादक रणवीर राना भी रिपोर्टर था। और संजय के साथ कइयों बार रिपोर्टिंग कर चुका था। सो संजय निश्चिंत था कि राना तो उसका खयाल रखेगा ही। पर वह राना की चमचई में नहीं उतरा। राना की ज्वाइनिंग के समय वह उसकी अगुवानी में भी नहीं आया।

राना यो यही बात नागवार गुजरी।

संजय को यह पता लग गया। फिर भी वह राना के पास सफाई देने नहीं गया। नहीं गया उसके तलवे चाटने। संजय को जाने क्यों बड़ी भारी गलतफहमी क्या खुशफहमी थी कि राना उससे हाल चाल पूछने आएगा और उसे सम्मान देगा। पर जल्दी ही संजय का नशा टूटा। राना ने भी उसे "प्रेम पत्र" देने शुरू कर दिए। संजय समझ गया कि जनरल मैनेजर के इशारे पर यह सब हो रहा है और फिर बात "मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की" की तरह बढ़ती गई। संजय को राना जितना परेशान कर सकता था, जितना अपमानित कर सकता था, जितना नुकसान कर सकता था, उसने पूरी ताकत भर किया। स्पोर्ट, कामर्स, डाक कोई डेस्क बाकी नहीं रखी, संजय को हर जगह नचाया।

संजय कहता, "मैं स्पोर्ट की ए.बी.सी. नही जानता।" पर राना उसे स्पोर्ट का इंडिपेंडेंट चार्ज थमा देता। संजय कहता "मैं कामर्स बिलकुल नहीं जानता।" पर राना उसे कामर्स का प्रभारी बना देता। इस सबसे नहीं बात बनी तो उसे अभद्र व्यवहार के आरोप में सस्पेंड कर दिया। इनक्रीमेंट रोक दिया। अंतत: उसने अपने एक चमचे कामिल से पिटवा दिया।

"यह तो हद है।" यूनियन के नेता से संजय ने कहा, "पिटाई भी मेरी हुई, सस्पेंड भी मैं हुआ, और मेरे खिलाफ इंक्वायरी भी होगी।"

"नहीं होने दूंगा इंक्वायरी।" यूनियन नेता दूबे बोला, "देखता हूं किसकी हिम्मत है जो संजय को निकालता है?"

संजय का सीना चौड़ा हो गया। हालांकि कुछ प्रेस कर्मचारियों ने कहा भी कि दूबे के चक्कर में नहीं आना यह जनरल मैनेजर का आदमी है। पर संजय तो तब जैसे धर्म युद्ध लड़ रहा था। वह कहता, "जब मेरी गलती नहीं तो मेरे खिलाफ कार्रवाई कैसे हो जाएगी!"

पर उसे यह नहीं पता था कि जिस क्रांति और सच्चाई की दरी पर वह चल रहा है, उसके नीचे भारी-गड्ढा है। बेकारी, अपमान और भूख का गड्ढा है। और राना तो जैसे उसके पीछे ही पड़ गया था।

संजय दो कदम उससे भी आगे था। उसे आता देखता तो थूक देता। राना तिलमिला कर उसे घूरता। तो संजय हाथ में पेपरवेट लेकर घुमाने लगता जैसे उसे मार ही देगा। संजय को जैसे राहत मिल गई। अखबार का स्वामित्व अचानक बदल गया। कंपनी बिक गई थी। वह कहता, "अब तो राना का जाना तय है। अब क्या कर लेगा राना?"

पर राना नहीं गया।

त्रिपाठी कहता, "भइया यह राना नहीं राणा प्रताप का चेतक है। कि गया-गया फिर ठहर गया।"

राना ने दिल्ली के एक बड़े नेता से अपने लिए सिफारिश करवा ली थी। वैसे भी उसे एक मुख्यमंत्री ने ही संपादक भी बनवाया था। सूचना विभाग से विज्ञापन के मद में छत्तीस लाख रुपए एडवांस देकर।

इस बीच राना ने मनोहर और प्रकाश को भी नोटिसें देनी शुरू कर दी थीं। और पहली बार मनोहर और प्रकाश भी खुल कर राना के खिलाफ बोलने लगे।

कंपनी में नया चीफ जनरल मैनेजर आया। वह बातें बड़ी दिलेरी और प्यार से करता। और कहता कि, "मैं मैनेजर नहीं, ह्मूमन मैनेजमेंट जानता हूं।" और सचमुच संजय को उसने "मैनेज" कर लिया। दिखाने के लिए उसने इंक्वायरी भी कराई और संजय के सारे दोस्त ही उसके खिलाफ गवाही दे गए। क्या तो उन्हें नौकरी करनी थी और "राना भाई साहब का आदेश था।"

संजय नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। पहले तो उसे डर दिखा कर कि, "बड़ी बदनामी होगी।" इस्तीफा मांगा गया और यह काम भी उसके एक दोस्त ने किया। जो वहां एडमिनिस्ट्रेटिव अफसर था। और राना के खिलाफ हरदम दांत पीसता रहता था। पर जब वह संजय से इस्तीफा मांग रहा था, तब कंपनी की "वफादारी" में था। क्योंकि उसके भी बीवी बच्चे थे। पर संजय ने इस्तीफा फिर भी नहीं दिया। उसने डिसमिसल लेटर ले लिया और कहा कि, "इसका मतलब है मैं लड़ाई लड़ूगा। भले ही वैसे जैसे बिल्ली बाघ से लड़े।"

"हाईकोर्ट!"

हां, हाईकोर्ट अब संजय का नया ओढ़ना-बिछौना था।

"कचहरी तो बेवा का तन देखती है, खुलेगी कहां से बटन देखती है।" तथ्य से वाकिफ होते हुए भी वह तब अपने को राम की भूमिका में पाता और समूची व्यवस्था को रावण की भूमिका में। वह "धर्मयुद्ध" के नशे में यह भूल गया कि हाईकोर्ट भी न्याय का घर नहीं, रावण ही का घर है। वह घर जहां कोई विभीषण भी नहीं होता कि जिससे पूछ कर वह रावण की नाभि में बाण मार दे। दूसरी तरफ उसके पास कोई हनुमान भी नहीं था जो उस अन्याय की नगरी हाईकोर्ट को जला देता। वह तो धर्मयुद्ध के नशे में था और बिल्ली की भूमिका में बाघ से लड़ रहा था यह गाते हुए कि, "लड़ाई है दिए की और तुफान की।" बिन यह जाने कि उसकी जिंदगी में अब एक नया तूफान बसने वाला है और कि वह दीया नहीं आदमी है। दीया बुझ जाने पर कोई उसे फिर जला देता है, तूफान से ओट कर बचा लेता है। पर जब आदमी बुझता है तो कोई उसे जलाता नहीं, उस पर थूक देता है।

हाईकोर्ट जो रावणों का घर है। जहां हर जज, हर वकील रावण है। न्याय वहां सीता है और कानून मारीच। जैसे रावण अपने मामा मारीच को आगे कर सीता को हर ले गया ठीक वैसे ही हाईकोर्ट में जज और वकील कानून को मामा मारीच बना कर न्याय की सीता छलते हैं। "राम" को हिरन की तलाश में भटकाते हुए न्याय की सीता को हर लेते हैं। क्या तो अपना-अपना इंटरप्रेटेशन है! लॉ का एक प्रोसिजर है! तिस पर तुर्रा यह कि "वादकारी का हित सर्वोच्च होता है।" पर वास्तविकता यह है कि वादकारी राम बना मारीच के पीछे-पीछे भागता रहता है और थक-हार कर वापस आता है! तो पाता है कि सीता यानी न्याय का हरण हो गया है। फिर वह व्यक्ति राम की तरह "तुम देखी सीता मृगनयनी" कहता हुआ यहां-वहां तारीखों के मकड़जाल में भटकता रहता है। फिर भी जैसे राम को भी पता था कि मृग सोने का नहीं होता, फिर भी सीता के कहे पर पीछे-पीछे भागता है। न्याय पाने की आस में। ऐसा भी नहीं कि न्याय वहां नहीं मिलता। न्याय मिलता भी है पर राम को नहीं। रावण को और उसके परिजनों को। हत्यारों, डकैतों को जमानत मिलती है। हां, राम को तारीख मिलती है!

तो तारीख के तंत्र से बेखबर संजय ऐसे मारा-मारा फिरता, जैसे रोशनी की तलाश में पतंगा दीए के आगे पीछे घूमता है और मारा जाता है। दूसरों को सलीका सिखाने वाले संजय को लगता था कि वह एक नई राह गढ़ने वाला है। उसे यह नहीं पता था कि वह नई राह गढ़े न गढ़े, किसी राह के गुड्ढे में खुद को औंधा जरूर पाएगा।

लेकिन अभी तो शुरुआत थी।

शुरूआती दौर में उसने लड़ाई लगभग जीत ली थी। अंतरिम आदेश उसके पक्ष में था। अब अलग बात है कि अंतरिम आदेश झुनझुना ही साबित हुआ। पर तब तो वह कहता था कि देश में न्याय तो है। लेकिन इस न्याय को अन्याय में बदलते ज्यादा देर नहीं लगी। वह तारीखों के तंत्र में टूटता-फूटता जड़ होता गया। डिप्रेशन का दंश उसे हीन बनाता। वह घर लौटता तो सोचता कि वह इस नपुंसक न्याय व्यवस्था का क्या करे? सोचते-सोचते वह यही सोचता कि वह कहीं खुद भी तो नपुंसकता की राह नहीं चल पड़ा! लेकिन जब वह कई और दूसरों को; निर्धन, दबे कुचले और असहाय लोगों को जब हाईकोर्ट के बरामदे में आस की रोशनी के लिए भागते देखता, उसे जैसे थोड़ी देर के लिए आक्सीजन मिल जाती। जब यह सारे लोग अगली तारीखों पर आने की बात करते, लगता जैसे वह रेगिस्तान में भटक रहा हैं। चुल्लू भर पानी के लिए जल के रेत में मर रहे हैं। लेकिन वकीलों और न्यायमूर्तियों की सेहत पर इन सब चीजों से शिकन तक नहीं आती। सैकड़ों आदमी उनकी आंखों के सामने बरबादी के ढूह पर चढ़ते जाते और वह "मूर्ति" बने न्याय की प्रोसीडिंग का कहवा पिला देते।

संजय को अकसर एक बूढ़ी महिला हाईकोर्ट के बरामदे में रोती मिल जाती। उसकी तकलीफ यह थी कि वह एक तो विधवा थी, दूसरे कोई बीस साल मुकदमा लड़ने के बाद अपने मकान का मुकदमा जीती थी। लेकिन चार साल से उसके मकान पर गुंडों ने कब्जा कर रखा था। लेकिन हाईकोर्ट अपने आदेश का अनुपालन कराने में अक्षम था। गुंडे उसके मकान पर कब्जा भी किए थे और धमकाते भी थे। उसने न्यायमूर्ति बने कई मूर्तियों से यह बात कही थी, लेकिन मूर्तियां तो जैसे पत्थर की थीं, सब कुछ अनसुना कर देती थीं। वह बूढ़ी महिला इतनी आहत हुई कि एक दिन भरी अदालत में उसने अपनी जीत के फैसले का कागज जला दिया और खुद भी जलने को उद्धत हो गई। न्यायमूर्तियों का न्याय देखिए कि अपने ही आदेश का अनुपालन करवा पाने में अक्षम उस बूढ़ी महिला को दोषी करार दे दिया और उसे पुलिस हिरासत में भेज दिया। संजय यह देख कर दहल गया।

वह सोचता यह कौन-सी राह है?

वह सोचता रहता अदालतों की किसी बेंच पर बैठा न्यायमूर्तियों के "मूर्ति" में तब्दील होते जाने के खतरों से विवश। पहले वह सुनता था कि कोई पोस्टकार्ड पर लिख कर अपना दुखड़ा भेजता था तो न्यायमूर्ति लोग उसे ही याचिका मान कर उस पर फैसला दे देते थे। और वह यहां देखता कि पोस्टकार्ड की कौन कहे, याचिकाओं पर ही सुनवाई के लिए न्यायमूर्तियों के पास समय नहीं होता। वकीलों की दलाली, अपराधियों का गठजोड़ और धनपशुओं का बोलबाला जैसे हाईकोर्ट का अविभाज्य अंग बन चुका था। और उस दिन तो संजय की आंखें खुली की खुली रह गईं जब एक काफी बड़े वकील ने उससे पूछा, "आप पढ़े लिखे आदमी हैं?" संजय ने जब "हां!" कहा तो वह वकील बोले, "तो फिर आप यहां क्या कर रहे हैं? हाईकोर्ट कोई पढ़े लिखों की जगह नहीं है।" लेकिन संजय फिर भी बिदका नहीं उसे तो अगली तारीख पर अपनी विजय पताका फहराती दिखती थी। और ऐसा सपना संजोने वाला संजय कोई अकेला नहीं था, सैकड़ों-हजारों लोग थे। इन सैकड़ों हजारों लोगों का अपराध सिर्फ इतना था कि वह कहीं न कहीं अन्याय के शिकार हुए थे और न्याय की लड़ाई लड़ रहे थे।

राम केवल ऐसे ही लोगों में से एक था। कोई आठ साल से अपनी नौकरी का मुकदमा लड़ रहा था। वह मुकदमा जीत चुका था लेकिन हाईकोर्ट के आदेशों का अनुपालन नहीं हो रहा था। राम केवल जब सुबह हाईकोर्ट में मिलता तो उसके चेहरे पर दिवाली की दमक होती। पूरा दिन निकल जाता, उसकी अवमानना याचिका की सुनवाई का नंबर ही नहीं आता। उसके चेहरे पर लगता किसी ने पचासों जूते मारे हों। लेकिन वह कहते हैं न कि "आंखों में नमी, हंसी लबों पर" ऐसी ही स्थिति चेहरे पर होती। वह फिर अगली तारीख के लिए पेशकार के फेरे लगाता, चढ़ावा चढ़ाता और कहता, "अगली तारीख पर तो फाइनल हो ही जाएगा।" और एक दिन हुआ यह कि राम केवल एक अदालत में बैठे-बैठे खुद ही "फाइनल" हो गया। इस बात की सुधि किसी न्यायमूर्ति ने नहीं ली, न ही उसके वकील ने। ली तो पेशकार ने। पेशकार सबसे आखिर में चिल्लाया, "राम केवल, तुम भी अपनी तारीख ले लो।" पेशकार यह नहीं जानता था कि राम केवल अब खुद तारीख बन चुका है। वह तो समझा कि राम केवल सो गया। उसने उसे पास जाकर झिंझोरा। राम केवल गिर पड़ा तब पेशकार की समझ में आया कि राम केवल की तारीखें पूरी हो चुकी हैं। अब उसको न "अनलिस्टेड" की जरूरत है और न ही "नेक्स्ट काजलिस्ट" की।

संजय तब भीतर तक हिल गया। बिना कोई तारीख लिए वह घर चला गया। बहुत दिनों तक वह फिर हाईकोर्ट जाने से कतराता रहा। पर धीरे-धीरे न्याय पाने का कीड़ा उसके भीतर फिर से कुलबुलाने लगा। राम केवल का हश्र हाशिए पर रख कर वह एक दिन फिर से अपने वकील के चैंबर में जा रहा था। इस तरह हाईकोर्ट एक बार फिर वह जीने जा रहा था। हाईकोर्ट जीने जा रहा था कि अपने ही को छलने जा रहा था? उसके लिए तुरंत-तुरंत यह समझ पाना मुश्किल था।

मुश्किल ही था उसके लिए न्याय पाना भी। लेकिन मोती बी.ए. के उस भोजपुरी गीत को गुनगुनाता हुआ बोला, "रेतवा बतावे नाईं दूर बाड़ैं धारा, तनी अऊरो दऊर हिरना पा जइब किनारा।" संजय हाईकोर्ट के गलियारों की गंध एक बार फिर अपने नथुनों में भरने लगा। तारीखों की कील से दिल दिमाग और पावों को छीलता हुआ, न्यायमूर्तियों की मूर्तियों से अपने मन को मारता हुआ, न्याय की आस में हांफता हुआ संजय एक नया ही संजय बनता जा रहा था। बारिश में भींगता हुआ, सर्दी में गलता हुआ और धूप में तपता हुआ, आते-जाते मौसम की मार खाता वह अब न्यायमूर्तियों के सामने जब तब खुद अपने मामले की पैरवी करने लगा था। हालांकि न्यायामूर्तियों की मूर्तियां उसकी बातों की परवाह नहीं करतीं पर वह जूझ-जूझ जाता। वह जब पढ़ता था तो कहीं पढ़ा था कि किसी देश के लिए सेना से भी ज्यादा जरूरी न्यायपालिका होती है।

पर क्या 'बेल' पालिका में तब्दील हो गई यह नपुंसक न्यायपालिका?

जो अपने ही आदेश न मनवा सके। आदमी आदेश लेकर झुनझने की तरह बजाता घूमता रहे और कोई उस आदेश को मानना तो दूर उसकी नोटिस भी नहीं ले। एक डी.एम. बल्कि उससे भी छोटा उसका एस.डी.एम. क्या तहसीलदार भी कोई आदेश करे तो उसका अनुपालन तुरंत हो जाए। पर हाईकोर्ट के जज का आदेश रद्दी की टोकरी में चला जाए। तो ऐसे में न्यायपालिका के औचित्य पर प्रश्न उठ जाना सहज ही है। फिर सेना से ज्यादा जरूरी न्यायपालिका कैसे हो सकती है? कि एक छोटा सा प्रशासनिक आदेश तुरंत फुरत मान लिया जाता है पर न्यायपालिका के आदेश को कोई आदेश ही मानने को तैयार नहीं होता। बल्कि कई बार तो बिना आदेश का अनुपालन किए उस आदेश की वैधता को ही चुनौती दे दी जाती है। इस चुनौती का निपटारा भी जल्दी करने के बजाय न्यायमूर्तियों की मूर्तियां मुसकुरा-मुसकुरा कर तारीखों की तरतीब में उलझा कर रख देती हैं। फिर झेलिए स्पेशल अपील बरास्ता सिंगिल बेंच, डबल बेंच, और फुल बेंच। आप अदालतों की बेंचों पर बैठे-बैठे कमर टेढ़ी-सीधी करिए और ये "बेंचे" आपको तारीखें देंगी। आप कहते क्या चिल्लाते रहिए कि देर से मिला न्याय भी अन्याय ही है। पर इन न्यायमूर्तियों की कुर्सियों को यह सब सुनाई नहीं देगा। सुनना भी चाहेंगे तो अपोजिट पार्टी के वकील का जूनियर खड़ा हो कर कहेगा कि, "माई लार्ड हमारे सीनियर बीमार हैं। या कि फलां कोर्ट में पार्ट हर्ड में बिजी हैं।" भले ही सीनियर उसी कोर्ट के बाहर बरामदे में कुत्ते की तरह यह सूंघते हुए टहल रहा तो कि भीतर क्या घट रहा है।

संजय और उसके जैसे जाने कितने न्याय के भुखाए लोग इस "न्यायिक प्रक्रिया" के शिकार बने तड़पते घूमते रहते हैं। न्याय व्यवस्था के दोगलेपन पर एकालाप करते रहते हैं जिस-तिस से। पर कोई सुनता नहीं।

यहां तक कि चेतना भी नहीं।

चेतना संजय से कहती है कि, "बाकी सारी बातें सुन सकती हूं, पर हाईकोर्ट की भड़ास नहीं।" इस पर संजय बिफरा पड़ता, "यहां जिंदगी जहन्नुम हुई जा रही है और तुम इसे भड़ास कहती हो!" वह छूटते ही बोलती, "बिलकुल! किस डाक्टर ने कहा कि हाईकोर्ट में मुकदमा लड़िए? मैं तो कहती हूं कि अगर कोई डाक्टर कहे भी तो मुकदमा नहीं लड़ना चाहिए!" वह कहती, "कोई और बात करिए। यहां तक कि जहन्नुम की बात करिए सुनूंगी। पर हाईकोर्ट और मुकदमे की नहीं। क्योंकि जहन्नुम एक बार सुधर सकता है। पर हाईकोर्ट नहीं। फिर जहन्नुम में कम से कम किसी शरीफ और भले आदमी को तो अकारण नहीं फंसना पड़ता। पर हाईकोर्ट में?" वह बोलती, "अच्छा भला आदमी सड़ जाता है। जाता है न्याय मांगने और न्याय की रट लगाते-लगाते अन्याय के भंवर में डूब जाता है। और कोई बचाने नहीं आता।"

चेतना की यह बातें सुन कर संजय चुप लगा जाता। चुप-चुप बैठे-बैठे वह उससे लिपटने लगता। चूमने लगता। वह फुंफकारती, "यह कोई बेडरूम नहीं है।"

"बेडरूम में इस तरह लिपटा या चूमा नहीं जाता। सीधे शुरू हो जाया जाता है।" संजय उसका प्रतिरोध करते हुए बोलता। और चेतना की फुंफकार की परवाह किए बगैर उसे फिर से चूमने लगता।

"हाईकोर्ट में मुकदमा लड़ते-लड़ते आप वहां के वकीलों की तरह बेहया भी हो गए हैं। कुछ भी कहा सुना आप पर फर्क नही डालता। कुछ तो सुधरिए और समझिए कि मैं हाईकोर्ट नहीं हूं।" वह दूर छिटकती हुई बोलती।

"तो क्या सुप्रीमकोर्ट बनना चाहती हो?" चुहुल करता हुआ संजय पूछता।

"जी नहीं। कोई कोर्ट वोर्ट नहीं। बनाना हो तो बीवी बना लीजिए।"

"फिर चाहे चौराहे पर ही शुरू हो जाऊं?"

"तब चाहे जहां शुरू हो जाइए!"

"पर मेरी एक बीवी है। दूसरी कैसे कर लूं?"

"तो जाइए उस एक बीवी के साथ लिपटिए। यहां मेरे साथ क्या कर रहे हैं?"

"क्या मतलब?"

"मतलब यह कि एक बीवी के रहते आप दूसरी बीवी नहीं कर सकते"

"तो?"

"तो क्या, जाइए और बीवी के पल्लू में लिपटिए।" कहती हुई वह मुसकुराई।

"सच।"

"हां, एक काम और करिए कि हाईकोर्ट का चक्कर छोड़िए। मुकदमेबाजी से बाज आइए और कोई एक ठीकठाक नौकरी कर लीजिए। इसी में आप की भलाई है।" वह रुकती हुई बोली, "अब यहां से चलिए। अंधेरा हो रहा है।"

"ठीक है।" कहते हुए संजय ने उसे फिर से बांहों में भर कर चूम लिया।

"आप सुधरेंगे नहीं।" अपने को संजय से छुड़ाती हुई चेतना बोली।

स्कूटर स्टार्ट करते हुए संजय चेतना से पूछने लगा, "कुछ पैसे हैं क्या?"

"क्यों क्या हुआ?"

"कुछ नहीं। स्कूटर रिजर्व में है। पेट्रोल भरवाना है।"

"कितना लगेगा?"

"बीस रुपए में भी काम चल सकता है और सौ रुपए में भी।"

"यह लीजिए।" उसने सौ रुपए का नोट पर्स से निकालते हुए कहा।

"हमको नहीं चाहिए। पेट्रोल पंप पर ही दे देना।"

"वहां देना ठीक नहीं लगेगा। यहीं ले लीजिए।"

"नहीं। देना हो तो पेट्रोल पंप वाले को ही देना।"

"आप तो कुछ समझते ही नहीं। क्या बताऊं। अच्छा चलिए।" वह स्कूटर पर बैठती हुई बोली।

"रास्ते में वह पीछे से अचानक चिपट गई। उसके चिपटने में कसाव इतना ज्यादा था कि संजय बहकता हुआ बोला, कहीं और चलूं क्या?"

"नहीं!" वह जोर देकर बोली।

संजय चुपचाप रहा।

दूसरे दिन हाईकोर्ट में उसकी तारीख थी।

वह हाईकोर्ट की एक अदालत में बैठा था। इस अदालत में बैठे न्यायमूर्ति इलाहाबाद से आए थे। यह न्यायमूर्ति हिंदी में आदेश लिखवाते थे इसलिए संजय इनकी खास इज्जत करता था। संजय इन दिनों अपने पक्ष में मिले अंतरिम आदेश का अनुपालन न हो पाने पर अवमानना याचिका दायर किए हुए था। आज उसी की सुनवाई थी। वह बैठा-बैठा अपनी बारी जोह रहा था। कि तभी एक दहेज हत्या का मुकदमा आ गया। पति ने अपनी पत्नी को जला कर मार डाला था। पति पक्ष का वकील उसकी जमानत मांग रहा था। वह जोरदार पैरवी भी कर रहा था। पर सरकारी वकील जो विरोध में खड़ा था। मिमिया रहा था। शायद इस केस की फाइल उसके पास नहीं थी। पति पक्ष के वकील ने बात ही बात में बताया कि वह अपनी पत्नी को "बचाने" की गरज से अस्पताल ले गया, जहां डाक्टर उसे बचा नहीं सके।

"अच्छा तो वह पत्नी को अस्पताल ले गया?"

"येस मी लार्ड।"

"मतलब बचाने की कोशिश की?"

"येस मी लार्ड।"

"वेल देन, बेल!" हिंदी में आदेश लिखवाने वाले यह न्यायमूर्ति अंग्रेजी में बोले। और पत्नी के हत्यारे पति को जमानत दे दी। अब इन न्यायमूर्ति से भला कौन पूछता कि जब पति ने पत्नी को आग लगाई होगी तब पत्नी बेचारी चिल्लाई होगी। उसका चिल्लाना सुनकर अड़ोसी-पड़ोसी इकट्ठे हुए होंगे। दबाव पड़ा होगा तो उसे मजबूरीवश-भयवश अस्पताल तो ले ही जाना था। पर मुख्य सवाल तो यह था कि उसने उसे जलाया। पर न्यायमूर्ति को यह तथ्य बेकार लगा और देखते हुए उठा और पच्च से थूकता हुआ चलता बना। घर आकर वकील से फोन पर पूछा पता चला कि संजय के केस में "नेक्स्ट काज लिस्ट" हो गया था। सुनते ही वह बोला, "अच्छा हुआ इस मूर्ख के यहां मेरा केस टेक-अप नहीं हुआ।" फोन रख कर वह प्रेस क्लब चला गया।

आज जी भर कर और छक कर वह पीना चाहता था।

वह जब प्रेस क्लब पहुंचा तो तमाम लोगों के साथ मनोहर प्रकाश भी पंत के साथ एक कोने में बैठे दिखे। पंत ने संजय को देखते ही, "आइए भाई साहब" की गुहार लगाई। पर उसने नोट किया कि मनोहर और प्रकाश को पंत द्वारा उसे बुलाना अच्छा नहीं लगा। फिर भी वह तब तक बैठ चुका था। वह तीनों रम का एक अद्धा लिए बैठे थे। संजय मनोहर और प्रकाश की उदासीनता का कारण समझ गया। पर पंत ने जब गिलास मंगवा कर उसके लिए भी पेग बना दिया तो संजय शुरू हो गया। बात मनोहर ने ही शुरू की। पूछा, "संजय तुम्हारा हाईकोर्ट में क्या हुआ?"

"हाईकोर्ट में जो होना था हो चुका। अब तो जो होना है आफिस में ही होना है।" संजय बिफरता हुआ बोला।

"खुद जो कर सको करना। हम लोग कुछ बहुत इनीसिएटिव नहीं ले पाएंगे।" सिगरेट पीते हुए प्रकाश बोला, "आखिर हम लोगों को उसी संस्थान में नौकरी करनी है।"

"क्यों जब मैं तुम लोगों के लिए लड़ रहा था, तब मुझे नौकरी नहीं करनी थी? तुम्हारी नौकरी, नौकरी है। और मेरी नौकरी, नौकरी नहीं थी?" कहते हुए संजय ने अपनी रम खत्म की और बाथरूम जाने के लिए उठ खड़ा हुआ। पंत ने टोका, "भाई साहब कहां जा रहे हैं? बैठिए तो।" संजय चलता हुआ बोला, "आ रहा हूं बाथरूम से। जा नहीं रहा।" और बाथरूम की ओर चला गया।

"पंत तुम भी!" मनोहर बुदबुदायापर

"क्या हुआ भाई साहब!" पंत अचकचाता हुआ बोला।

"अरे किस साले टैंकर को बुला लिया।" मनोहर ने जोड़ा, "यह अद्धा उस अकेले के लिए कम है। तिस पर साले का फ्रस्ट्रेशन! क्या बताएं-शाम खराब हो गई!"

"हां, भई कहीं और चलें। नहीं संजय तो साला हाईकोर्ट-हाईकोर्ट का रिकार्ड बजा कर सारा मजा बदमजा कर देगा।"

"किसका मजा मदमजा हो रहा है भई!" संजय वापस आकर कुर्सी खींचता हुआ बोला।

"अरे नहीं भाई साहब आप बैठिए!" दूसरा पेग बनाता हुआ पंत बोला।

"मेरे लिए तो अब मत बनाना भई पंत। आज अब पीने का मूड नहीं है।" संजय संजीदा होता हुआ बोला, "वैसे भी इस अद्धे में चार लोगों का कुछ बने बिगड़ेगा नहीं। और मेरे पास पैसे भी नहीं है। स्कूटर में पेट्रोल तक कल एक लड़की से कह कर भरवाया था!"

"पैसे की बात नहीं है भाई साहब। मेरे पास हैं। अभी एक अद्धा और मंगवाता हूं।" कर कर पंत जेब से पैसे निकालने लगा।

"नहीं पंत, पैसे मत निकालों मैं नहीं पिऊंगा।"

"क्यों? बात क्या हुई?" पंत बोला।

"बात-वात कुछ नहीं। हालांकि सोचकर तो आया था कि आज छक कर और जी भर के पीऊंगा। पर अब नहीं, अब नहीं।"

"नहीं भाई साहब, आप चिंता मत करिए। जितनी चाहिए-पीजिए।" पंत फिर बुदबुदाया।

"नहीं, पंत अब चिंता तो करनी पड़ेगी। दोस्त, वह दोस्त जो कल तक साथ जीने मरने का दम भरते हों, और आज टैंकर कहने लग जाएं, फ्रस्ट्रेशन देखने लग जाएं तो चिंता होनी चाहिए। ज्यादा होनी चाहिए।"

"तुम तो बेवजह फैले जा रहे हो!" मनोहर सिगरेट झाड़ते हुए बोला।

"बेवजह नहीं, वजह है।" संजय बोला, "फिर मैं फैल नहीं रहा। वजह है इसलिए नहीं पिऊंगा।"

"क्या वजह है?" प्रकाश बिदकते हुए बोला।

"बेरोजगारी!" संजय हुंकारते हुए बोला, "आज यह समझ में आ गया कि बेरोजगारी में शराब वगैरह जैसे शौक नहीं पालने चाहिए। सो आज से शराब बंद। बिलकुल बंद। और अभी से।"

"सिगरेट तो पी सकते हैं?" पंत भावुक होता हुआ बोला।

"हां, सिगरेट तो चल सकती है। पर आज अभी तो कुछ भी नहीं!" कह कर संजय प्रेस क्लब से बाहर निकलने लगा।

"अरे क्या हुआ तुम्हारा हाईकोर्ट में भाई?" माथुर एक कोने से चिल्लाता हुआ चल कर संजय के पास आ गया। पर संजय ने माथुर की बात अनसुनी कर दी। तो माथुर ने फिर पूछा, "क्या हुआ?"

"कहां क्या हुआ?" संजय बिदक कर बोला।

"हाईकोर्ट में?" माथुर फिर जोर से बोला।

"हाईकोर्ट की मां की चूत!" संजय बौखला कर बोला, "समझे माथुर कि कुछ और डिटेल्स दूं?"

"नहीं भइया माफ करो!" बुदबुदाता हुआ माथुर उलटे पांव लौटा। कहने लगा, "चढ़ गई है साले को!"

"किसको चढ़ गई?" मनोहर ने माथुर से पूछा।

"संजय साले को!" माथुर बड़बड़ाया।

"पर उसने तो बस एक ही पेग लिया था।" मनोहर बिगड़ता हुआ बोला।

"तो बेरोजगार आदमी के लिए एक पेग क्या कम है?" माथुर जैसे सारा गुस्सा मनोहर पर ही निकाल देना चाहता था।

"संजय जैसों के लिए तो कम है!" प्रकाश दाढ़ी खुजाता हुआ बाथरूम की ओर जाने लगा।

संजय प्रेस क्लब से बाहर निकल कर अपने आफिस की यूनियन के नेता दूबे के यहां चला गया। उसने नेता से साफ कहा कि, "मैं धरना देना चाहता हूं, बल्कि अनशन करना चाहता हूं। आफिस के गेट पर। इस काम में आप की और यूनियन की नैतिक मदद चाहता हूं। तख्ता-तंबू मैं अपने खर्च पर करूंगा। बस आप लोग साथ खड़े हो जाइए!"

"भई यूनियन के एक्जिक्यूटिव मेंबर तो आप भी हैं। सबसे बात कीजिए। सबसे राय लीजिए। फिर कुछ करिए।" यूनियन नेता दूबे बोला।

"लेकिन मैं तो कल से ही अनशन शुरू करना चाहता हूं। और आप रायशुमारी के लिए कह रहे हैं?"

"ऐसे कैसे कल से ही अनशन शुरू कर देंगे?" दूबे बोला, "आप व्यक्तिगत रूप से चाहें तो करिए पर वैसे कल से कुछ नहीं हो पाएगा।"

"क्यों नहीं हो पाएगा?" संजय बिफरा।

"कुछ कायदे कानून होते हैं। अनशन धरना देने के लिए पूरी कार्यकारिणी की राय लेनी पड़ेगी। फिर नोटिस देनी पड़ेगी मैनेजमेंट को। फिर कुछ हो सकेगा।"

"तो कार्यकारिणी की बैठक कल बुला कर नोटिस दे दीजिए!" संजय बोला।

"कल तो मैं बाहर जा रहा हूं। हफ्ते भर बाद आऊंगा तो देखा जाएगा।" दूबे बोला।

"हद है। सारा कायदा कानून कर्मचारी के लिए ही होता है। हाईकोर्ट का एक आर्डर है जिसे मैनजमेंट नहीं मान रहा। और आप मैनेजमेंट से कुछ नहीं कह पा रहे। उसे कायदा कानून नहीं बता रहे हैं और हमें कायदा कानून समझा रहे हैं। यह तो सरासर अन्याय है।"

''कुछ नहीं, इस पर वार्ता कर लेंगे''

"खाक वार्ता करेंगे!" संजय बिगड़ता हुआ बोला, "तीन साल से हाईकोर्ट का एक आर्डर लिए घूम रहा हूं। कुछ होता हवाता है नहीं और आप वार्ता ही कर रहे हैं। सिर्फ वार्ता!"

"अब आपके कहे से वहां हड़ताल तो हो नहीं जाएगी।" दूबे बोला, "अगले हफ्ते कुछ करते हैं।"

संजय घर चल आया। बिना खाना खाए सो गया।

दूसरे दिन भी वह घर से निकला नहीं। शाम को चेतना के घर चला गया। पर वह थी ही नहीं। वापस आ गया। घर आकर बेवजह बीवी से झगड़ा किया। खाना खाया, टी.वी. देखा और सो गया।

अगले हफ्ते यूनियन की कार्यकारिणी बैठक में उपस्थिति बहुत कम थी। और जो सदस्य थे भी वह संजय की मांग के खिलाफ थे। क्या तो किसी एक आदमी के लिए पूरे आफिस में आग लगाना ठीक नहीं हैं!

"मैं आग लगाने के लिए कह भी नहीं रहा।" संजय बोला, "मैं भी चाहता हूं बातचीत शांतिपूर्ण माहौल में हो।"

"अनशन धरने से माहौल शांतिपूर्ण तो नहीं रहेगा।" एक सदस्य भन्नाता हुआ बोला।

"तो चूडियां पहन कर घर में बैठो!" दूबे उसे डपटते हुए बोला, "यूनियन की बैठक में क्या करने आते हो।"

"साथियों, यह मामला देखने में जरूर सिर्फ मेरा अकेला मामला लगता है। पर सच यही नहीं है। सच यह है कि मैं मैनेजमेंट के लिए एक ट्रायल केस हूं।" संजय आगाह करते हुए बोला, "जिस दिन मैं गिर गया। समझिए सभी गिर जाएंगे। कोई उफ्फ तक नहीं कर पाएगा और मैनेजमेंट जब जिस पर चाहेगा, तलवार चला देगा!"

"बिलकुल ठीक कहा संजय ने।" दूबे बोला, "आज अनशन की नोटिस मैनेजमेंट को दे दी जाएगी।"

"लेकिन....?" एक सदस्य अभी कुछ कहना ही चाहता था कि दूबे उसे चुप कराते हुए बोला, "कोई लेकिन-वेकिन नहीं, नोटिस आज ही दी जाएगी। मैं जा रहा हूं टाइप करवाने!"

अनशन की नोटिस शाम को मैनेजमेंट को दे दी गई।

पूरे आफिस में नोटिस की चरचा थी। हर कोई नोटिस बोर्ड पढ़ता और कहता अब सही कार्यवाही हुई है। पर बोलते सभी दबी जबान से। खुल कर कोई सामने नहीं आता था। चरचा गरम होती देख मैनेजमेंट ने दूसरे दिन वह नोटिस, नोटिस बोर्ड से उतरवा दिया। तब चरचा और तेज हो गई। लगता है कि अब आर या पार कुछ होकर ही रहेगा।

लेकिन चार दिन बाद ही सारी हवा निकल गई। मैनेजमेंट ने अनशन करने के खिलाफ मुंसिफ साऊथ के यहां से स्टे ले लिया था।

एक्स पार्टी स्टे। साथ ही संजय की आफिस में एंट्री बैन कर दी गई।

"हद है! गांधी जी ने अनशन की शांतिपूर्ण राह दिखाई थी। अब अदालतों की राय में यह भी अपराध हो गया!" संजय पान वाले से झल्लाया। पर उसकी तरफदारी में बोलता तो दूर आफिस का कोई उसके पास खड़ा भी नहीं हुआ। वह गेट पर पान वाले से ही अपनी बड़बड़ कर वापस चला आया।

दूसरे दिन मुंसिफ साऊथ की कोर्ट जाकर उसने सरे आम मुंसिफ की ऐसी तैसी कर दी। बस मारा भर नहीं, और गालियां नहीं दी। बाकी सब किया। पर वह मुंसिफ बोला कुछ नहीं। चश्मे के नीचे से टुकुर-टुकुर ताकता रहा। लेकिन संजय जैसे सारा ठीकरा उस मुंसिफ पर ही फोड़ डालना चाहता था। वह बोला, "कितने पैसे खा लिए?" पर मुंसिफ फिर भी चुप रहा। संजय फिर दहाड़ा, "आखिर हाईकोर्ट का एक आर्डर मनवाने के लिए ही हम अनशन करने जा रहे थे और आप को वह भी अनुचित लगा?" संजय बोलता ही जा रहा था, "दिल्ली में एक कैदी ने यूं ही नहीं एक मुंसिफ पर भरी अदालत में लैट्रिन उठा कर फेंक दिया। आप पर भी लैट्रिन फेंकी जानी चाहिए। आपने भी वैसा ही अन्याय किया है!" पर उस मुंसिफ की आत्मा जैसे मर गई थी। वह फिर भी कुछ नहीं बोला।

संजय कोर्ट से बाहर आ गया।

अगले हफ्ते हाईकोर्ट में तारीख थी। तारीखों की कीलों से अब वह आजिज आ गया था। कई बार तो केस टेकअप ही नहीं हो पाता था। कभी कभार होता भी था तो अपोजिट पार्टी का वकील कोई न कोई बहानेबाजी कर तारीख ले लेता था। एक बार बसु नाम का जज इलाहाबाद से आया। उसकी सख्ती के बड़े चरचे थे। लगातार तीन दिन तक उसके यहां संजय का केस टेकअप हुआ। पर अपोजित पार्टी के वकील का जूनियर हर रोज मिमिया कर खड़ा हो जाता और बताता कि सीनियर फलां कोर्ट में पार्ट हर्ड में हैं। जब कि उसका सीनियर अदालत के बरामदे में ही कुत्ते की तरह सूंघता हुआ टहलता रहता। तीन दिन तक लगातार यही ड्रामा देखते-देखते बसु भन्ना गया। बोला, "आपके सीनियर बहुत बिजी रहते हैं?"

"जी सर!" जूनियर घिघियाया।

"तो ठीक है कल भी नहीं, परसों सवा दस बजे सुबह इस केस को ऐज नंबर वन टेक अप करूंगा। अपने सीनियर को खाली रखिएगा।" बसु बड़ी सख्ती से बोला।

"जी सर!" कह कर जूनियर चलता बना।

संजय को कई वकीलों ने आकर बधाई दी। कहा कि, "मिठाई खिलाइए। अब आपका संघर्ष खत्म हुआ।" एक वकील बोला, "अब परसों वह पार्ट हर्ड में नहीं रहेगा बल्कि आकर कहेगा सर, आर्डर कंपलायंस कर दिया गया है।"

संजय को लगने लगा कि अब तो किला फतह! पर जब उसने अपनी वकील से पूछा तो वह बोली, "अभी परसों तो आने दीजिए!" यह सुनकर संजय का दिल धक से रह गया। वह परसों आने तक धक-धक में ही जीता रहा। तरह-तरह के पूजा पाठ करता रहा।

परसों भी आ गया।

वह आधे घंटे पहले ही हाईकोर्ट पहुंच गया। उसकी वकील भी जल्दी आ गई थीं। और अपोजिट पार्टी का वकील भी बड़ा-सा टीका लगाए आ गया।

कोर्ट शुरू हो गई। बसु आ गया था। अपने आदेश के मुताबिक औपचारिक कामों को निपटाने के बाद उसने संजय का केस ऐज केस नंबर टेक अप कर लिया। लेकिन कार्रवाई देखकर संजय सन्न रह गया। अचानक एक खूबसूरत-सी वकील उठीं। उनकी काया काफी गठी हुई थी। वह युवा भी थीं और दर्शनीय भी। हाईकोर्ट की वह रौनक कही जाती थीं। लोग आते-जाते आंखें तृप्त करते थे। उनकी बुलबुल जैसी आवाज पर जज भी मोहित रहते थे। संजय भी। फिर वह एक नामी वकील की बेटी थीं। जो बतौर कम्युनिस्ट जाने जाते थे। हालांकि उसके पिता के बारे में कुछ वकील कहते थे, "काहे का कम्युनिस्ट? अरे वह तो दल्ला है-दल्ला। बेटी पेश कर देता है जीत जाता है मुकदमा। और कि हरदम कामगारों के खिलाफ, पूंजीपतियों के पक्ष में खड़ा रहता है।" बहरहाल उन सुदर्शनीया वकील को खड़े होते देखकर संजय खड़े-खड़े बैठ गया। उसका दिल धकधकाने लगा। वह वकील बड़ी संजीदगी से वकालतनामा न्यायमूर्ति की ओर बढ़ाती हुई, बड़ी-बड़ी छातियों को काले गाऊन के नीचे से फड़काती हुई बोलीं, "अपोजिट पार्टी नंबर दो की ओर से पावर फाइल कर रही हूं। और केस समझने के लिए कोई अगली तारीख दे दी जाए।" बसु छूटते ही, "ग्रांटेड।" बोल कर "नेक्स्ट केस"। पर आ गया।

संजय के सारे सपने चूर कर दिए थे वकालत के इस नए ड्रामे ने। वह कोर्ट से बाहर निकला तो अपोजिट पार्टी का वह "सीनियर वकील" बड़ा-बड़ा टीका लगाए उसे ऐसे घूरते हुए निकला जैसे सैकड़ों जूते संजय को मार दिए हों।

हुआ भी यही था।

संजय की वकील ने पीछे से आकर ढांढस बंधाया। बोलीं, "यह सब तो यहां होता ही रहता है। घबराने की बात नहीं।" वह बोली, "अगली तारीख पर देखते हैं।"

संजय अभी जा ही रहा था कि एक वकील आकर बोला, "साहब बंगालीवाद चल गया!" दूसरा बोला, "कुछ नहीं "रात" डील हो गई।" तीसरा वकील एक कोने में उसे खींचता हुआ बोला, "कुछ नहीं इन बुड्ढे जजों को चार पांच लाख रुपए चाहिए और सोलह साल की लड़की। ब्रीफकेस और लड़की लेकर सामने होटल में बुला लीजिए, इन जजों से जो चाहिए फैसला लिखवा लीजिए!"

संजय था तो आहत पर उन वकीलों से खेलता हुआ बोला, "जरा धीरे बोलिए। नहीं जस्टिस बसु सुन लेंगे तो कंटेंप्ट कर देंगे। और कंटेंप्ट करने वालों के खिलाफ ये जस्टिस कंटेंप्ट प्रोसिडिंग्स भले न चला पाएं, इनकी आत्मा मर जाती हो, पर वकीलों के खिलाफ प्रोसिडिंग्स चलाने में इन्हें जरा देर नहीं लगती! इसमें माहिर हैं !"

"हां, ये तो है। पर आएं नोच लें।" वह वकील बोला, "जस्टिस के नाम पर ये सब दिन दहाड़े इनजस्टिस कर रहे हैं तो कोई कब तक चुप रहेगा। ये जस्टिस साले अब एक दिन कोर्टों में ही खींच-खींच कर मारे जाएंगे तब समझ में आएगा।"

"अच्छा ये बताइए वकील साहब कि आपके घर में नौकर हैं?" संजय पूछा।

"हैं। बिलकुल हैं।" वकील बोला।

"तो अगर आप उससे पानी मांगे और वह न दे तो?"

"उसकी मजाल कि न दे! कचूमर निकाल लूंगा!"

"अच्छा अगर दस मिनट में दस बार आप पानी मांगे। और वह देने से इंकार कर दे!"

"दस नहीं, सौ बार मांगू तो उसे पानी देना पड़ेगा। नहीं जूते लगाकर निकाल बाहर कर दूंगा!"

"तो इसीलिए न कि आपके आदेश की वह अवज्ञा करेगा!" संजय छूटते हुए कहा, "तो इन न्यायमूर्तियों को यह बात कैसे सुहाती है कि उनका आदेश अगला नहीं मानता तो भी वह इसका बुरा नहीं मानते। वह भी एक संवैधानिक आदेश!"

"यही तो बात है!" वह वकील बोला, "पहले दो चार साल में एकाध कंटेंप्ट केस फाइल होता था। और "इशू नोटिस" होते ही कंपलायंस हो जाता था। और अब? अब तो तीसियों हजार कंटेंप्ट केसेज बरसों से पेंडिंग हैं। कोई पूछने वाला नहीं। इसी नाते अब हाईकोर्ट के आर्डर को कोई आर्डर नहीं मानता। रद्दी समझ कूड़े में डाल देते हैं लोग।"

अब तक कुछ और वकील और मुवक्किल इस बहस में शरीक हो गए। मुवक्किल-सा दिखने वाला एक आदमी कुछ किस्सा सुनाने के अंदाज में बोलने लगा। वह कहने लगा, "आपमें से कोई गांव का रहने वाला है?" तो चार पांच लोगों ने "हां-हां" कहा तो वह पूछने लगा, "ग्राम पंचायत जानते ही होंगे आप लोग!" उसने जोड़ा, "इसी तरह गांवों में पहले न्याय पंचायतें भी होती थीं।" वह बोला, "आप लोग नौजवान हैं। नहीं जानते होंगे। पर न्याय पंचायतें बड़ी ताकतवर होती थीं। कोई गलती काम कर दे तो सरपंच कहिए, पंच परमेश्व कहिए उसका हुक्का पानी तक बंद कर देते थे। बड़ा दबदबा होता था इन न्याय पंचायतों का। क्योंकि लोगों को इनमें पूरा-पूरा यकीन था। यह पंचायते करती भी थीं दूध का दूध पानी का पानी। पर बाद के दिनों में इन पंचायतों में घुन लगने लगा। गलत लोग इसमें आने लगे। बेईमानी और पक्षपातपूर्ण फैसला करने लगे। सो लोगों का यकीन धीरे-धीरे इन न्याय पंचायतों से उठने लगा। नतीजा सामने है। अब यह न्याय पंचायतें ही गांवों से उठ गईं। कोई इनका नामलेवा नहीं रह गया।" वह आदमी दुख में भर कर लेकिन ठसक के साथ बोला, "आप लोग देखिएगा इन अदालतों का भी यही हश्र होने वाला है। क्योंकि लोगों का यकीन अब इन अदालतों से उठता जा रहा है। चाहे सुप्रीम कोर्ट हो, हाईकोर्ट या लोवर कोर्ट। सबका एक ही हाल है।"

"बात तो आप ठीक ही कह रहे हैं।" एक दूसरा आदमी बोला, "मकान खाली कराने के लिए, किसी जमीन का विवाद निपटाने के लिए या और ऐसे और मामलों पर लोग कोर्ट आते थे। पर अब लोग ऐसे मामले निपटाने के लिए गुंडों की शरण में जाते हैं। और जो मामला ये अदालतें बीसियों सालों तक सिर्फ तारीखों में उलझाए रखती हैं न्याय मांगने वाले को अन्याय के दोनाले में ढकेल देती हैं, वही मामला समाज में आपराधिक छविवाला गुंडा एक ही तारीख में निपटा देता है। भले पैसा लेकर सही। और फिर क्या अदालतों में पैसा नहीं लगता?" वह बोला, "अब अदालतों में आने वाले बेवकूफ माने जाते हैं।" वह रुका और बोला, "अच्छा चलो अदालत कोई फैसला बीस-पचीस साल में दे भी देती है तो उसे मानता ही कौन है?"

"ये बात तो है!" एक वकील बोला। बात बढ़ती क्या फैलती जा रही थी। संजय धीरे से वहां से खिसक गया। पर बहस चालू थी। न्याय मांगने आए, अन्याय की मार झेलने वाले कोई एक दो तो थे नहीं। पूरा का पूरा हुजूम था। अन्याय और तारीखों के कंटीले तारों में उलझा हुआ। मरता हुआ। तिल तल कर। संजय के केस की फिर तारीखें लगीं। पर अपोजिट पार्टी के वकील ने "सरसुरारी" और "मेंडमस" का तीर चला कर एक बार कंटेंप्ट की प्रोसिडिंग ही रुकवा दी। कहा कि प्राइवेट बाडी के खिलाफ "सरसुरारी रिट" लाई नहीं करती सो रिट ही मेनटेनेबिल नहीं है। और न्यायमूर्ति मान भी गए। फिर रिट की मेनटेनेबिलिटी पर तारीखों और बहसों का दौर साल भर चला और आखिरकार रिट एडमिट हो गई। कंटेप्ट की प्रोसिडिंग फिर से शुरू हो गई। पर अपोजिट पार्टी ने फिर एक बहाना लिया कि उन्होंने रिट की मेनटेनेबिलिटी के खिलाफ स्पेशल अपील की है। स्पेशल अपील की सुनवाई तक कंटेंप्ट प्रोसिडिंग रोक दी जाए। न्यायमूर्ति फिर मान गए। कंटेंप्ट प्रोसिडिंग रोक दी। कोई छः-सात महीने बाद स्पेशल अपील खारिज हो गई और कंटेंप्ट प्रोसिडिंग फिर शुरू हुई तो अपोजिट पार्टी के सीनियर वकील फिर पार्ट हर्ड में "बिजी" रहने लगे।

संजय इस अदालती चूतियापे से हार गया था। तारीख दर तारीख वह टूटता जा रहा था पर तारीखों का सिलसिला नहीं टूटता था। बेरोजगारी अलग तोड़ती जा रही थी। फ्रीलांसिंग वह भी लखनऊ में अब भारी पड़ती जा रही थी। वह अब नौकरी करना चाह रहा था। पर उसकी छवि एक मुकदमेबाज की बन चली थी सो जब भी कहीं नौकरी की बात वह चलाता, लोग बड़ी संजीदगी से बात टाल जाते। सो हाईकोर्ट उसकी विवशता थी। इस विवशता को ढोने के लिए जैसे वह अभिशप्त हो गया था।

बेतरह!

हार मानकर उसने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सबको चिट्ठियां लिखनी शुरू कीं। पर वो कहते हैं, न कि, "कहीं से कोई सदा न आई।" बहुत बाद में छपी छपाई औपचारिक चिट्ठी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की आई कि आवश्यक कार्यवाई के लिए लिख दिया गया है। पर कभी कोई कार्यवाई नहीं हुई। मानवाधिकार आयोग से किसी बड़े बाबू टाइप के व्यक्ति की चिट्ठी आई कि वह इसकी रेमेडी हाईकोर्ट में ही ढूंढे। संजय यह चिट्ठी पढ़कर बिलबिलाया कि हाईकोर्ट में अगर रेमेडी होती तो वह मानवाधिकार आयोग को चिट्ठी ही क्यों लिखता? उसने एक चिट्ठी और मानवाधिकार आयोग को लिखी कि अदालत के आदेश के मुताबिक उसे वेतन मिलना चाहिए जो कि उसे नहीं मिल रहा। सो वेतन न मिलना भी मानवाधिकार का हनन है सो आयोग इस मामले में हस्तक्षेप कर उसे वेतन दिलवाए। पर इस चिट्ठी का जवाब भी संजय को नहीं मिला।

संजय ने मुख्यमंत्री के मार्फत भी दबाव डलवाने की सोची। वह मुख्यमंत्री से मिला भी। उन्होंने आश्वासन भी दिया। कुछ दिनों तक उसने इसी चक्कर में काटे। वह तो बाद में मुख्यमंत्री के एक सचिव ने संजय की आंखें खोलीं। उसने बताया कि, "मुख्यमंत्री जी आपसे जान पहचान के नाते साफ नहीं बता पाते। पर स्थिति अब वह नहीं है जो आप समझ रहे हैं। स्थिति उलट गई है। पहले उद्योगपति आते थे तो कहते थे कि मुख्यमंत्री जी से मिलना है। पर अब? मुख्यमंत्री जी ही उद्योगपतियों का दरवाजा जब-तब खटखटाते रहते हैं कि हम मिलना चाहते हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री उस उद्योगपति से क्या कहेंगे? क्या दबाव डालेंगे? और वह क्या मानेगा? आप खुद ही सोच सकते हैं!"

फिर संजय ने डिप्टी लेबर कमिश्नर के यहां रिकवरी खातिर दौड़ लगानी शुरू की। यहां भी तारीखें लगने लगीं। पर  डिप्टी लेबर कमिश्नर ने काफी तेजी देखाई क्योंकि एक बार लेबर सेकेट्री ने संजय के कहे पर उसे बुलाकर लगभग आदेश ही दिया कि दो तीन लाख रुपए संजय को मिल जाएंगे तो इनका भला हो जाएगा जबकि उस उद्योगपति का इससे कुछ नहीं बिगड़ेगा। तब डिप्टी लेबर कमिश्नर "यस सर, सर" कहता हुआ गया था। और फिर बिलकुल राणा प्रतापाना अंदाज में कार्यवाई शुरू की। संजय को लगने लगा कि उसकी हल्दीघाटी अब उसे मिलने ही वाली है। तब उसको जरा भी अंदाजा नहीं था कि जिस राणा प्रताप की बिना पर वह हल्दीघाटी के सपने जोड़ रहा है वह राणा प्रताप नहीं जयचंद है। वह डिप्टी लेबर कमिश्नर पचीस हजार रुपए में मैनेजमेंट से पट गया और संजय की रिकवरी अप्लीकेशन रिजेक्ट कर दी।

संजय को इससे बहुत आश्चर्य नहीं हुआ।

धोखा खाना और वह भी मुकदमेबाजी में, उसने सीख लिया था। चेतना ने उसे एक बार फिर कहीं कोई नौकरी कर लेने को कहा। वह कहने लगी, "अगर अखबार में नौकरी नहीं मिलती तो कहीं और कोई दूसरी नौकरी कर लीजिए।" वह भावुक होती हुई उसके माथे के बाल सहलाती हुई बोली, "और जो नौकरी नहीं भी करिए तो कम से कम एक काम करिए ही....!"

"क्या?" चेतना की बात बीच में ही काटते हुए संजय पूछा।

"यह मुकदमेबाजी छोड़ दीजिए!"

"ठीक है दो चार तारीखें और देख लेते हैं। नहीं कुछ बना तो छोड़ देंगे। बिलकुल छोड़ देंगे।"

"आपको तो जैसे नशा लग गया है। बिलकुल जुआरियों की तरह। कि हारते जाते हैं और कहते जाते हैं-बस एक बाजी और। और वह बाजी कभी खत्म नहीं होती। भले घर बार बिक जाए!" कह कर चेतना और भावुक हो गई।

संजय ने चेतना की बात का प्रतिवाद नहीं किया और चुपचाप उसके बाल सहलाने लगा। फिर वह धीरे-धीरे चेतना को बाहों में भर कर उस पर झुकने लगा। उसे चूमने लगा। वह "नहीं-नहीं, आज नहीं" कहती रही और संजय उसके एक-एक कपड़े उतारता रहा। थोड़ी देर बाद दोनों हांफ कर निढाल हो गए। संजय चुपचाप लेटा पड़ा था कि अचानक चेतना उसकी देह पर चढ़ आई। संजय ने अचकचाकर पूछा, "क्या बात है?"

"कुछ नहीं।" कहती हुई वह शरमाई और बोली, "अब मैं करूंगी।" वह हंसती हुई बोली, "बिलकुल आपकी तरह!" और वह शुरू हो गई। ऐसे जैसे वह सचमुच ही पुरुष हो, स्त्री नहीं। संजय ने भी अपने को उसके हवाले कर दिया। बिलकुल किसी समर्पिता स्त्री की तरह कि लो भोगो। जितना और जैसे चाहो भोगो। और चेतना भी भोग रही थी उसे बिलकुल किसी ढीठ पुरुष की तरह। कभी छातियों का निप्पल उसके मुंह में डालती, कभी मुख मैथुन पर आ जाती और फिर वह उस पर किसी घुड़सवार की तरह सवार होकर हांफने लगी। तब तक जब तक वह निढाल नहीं हो गई।

संजय को यह अनुभव भी अच्छा लगा।

जैसे चेतना ने संजय को अभी-अभी भोगा ठीक वैसे ही संजय हाईकोर्ट को भोगना चाहता है। जैसे उसने चेतना के सामने अपने को समर्पिता स्त्री की तरह हवाले कर दिया, हाईकोर्ट भी अपने को संजय के हवाले कर दे। जिस विकलता और तन्मयता से चेतना ने संजय को भोगा, उसी विकलता और तन्मयता से संजय हाईकोर्ट को भोगे और जैसे चेतना ने देह का सुख पाकर नेह बटोरा वैसे ही संजय न्याय का सुख पाकर संतोष और संतुष्टि बटोर ले!

पर क्या ऐसा सपने में भी संभव है?

सोचता है संजय चेतना की बगल में लेटे-लेटे जो पसीने में लथपथ पड़ी है निर्वस्त्र। तो क्या न्याय भी निर्वस्त्र होकर मिलेगा? ठीक उसी अर्थ में कि "न्याय हो और होता हुआ दिखाई भी दे!" संजय यह भी सोचता है। सोचता है कि उसकी तारीख भी नजदीक आ गई है। और हाईकोर्ट में छुट्टियों का दिन भी।

वह हाईकोर्ट में बैठा है। तीन दिन से लगातार "अनलिस्टेड" में उसका केस लग रहा है पर कभी अपोजिट पार्टी का वकील गायब रहता है तो कभी केस टेक अप नहीं हो पाता। पर आज अपोजिट पार्टी का सीनियर वकील भी भारी-सा टीका लगाए बैठा है और अनिलिस्टेड केसेज भी चल रहे हैं। इलाहाबाद से आया यह जस्टिस शरण भी कड़क है। लगता है आज बात बन जाएगी। संजय सोचता है। पर संजय की वकील नहीं है। वह परेशान है। कि तभी उसका नंबर आ जाता है। वह खुद खड़ा हो जाता है। न्यायमूर्ति पूछते हैं, "आपके वकील कहां हैं?"

"अभी नहीं हैं। पर मैं अपनी बात खुद कहना चाहता हूं।" संजय बोला।

"पहले वकालतनामा विदड्रा कीजिए, फिर अपनी बात कीजिए। या अपने वकील को बुलाइए!" संजय अभी कुछ और कहता कि उसकी वकील दौड़ती हुई आ गईं। उसे हटाया और "सॉरी" कहती हुई बहस शुरू कर दी। अपोजिट पार्टी के सीनियर वकील के पसीने छूट गए। उसका बड़ा सा टीका पसीने में बहने लगा। जस्टिस शरण ने अवमानना करनेवालों के खिलाफ नान बेलेबिल वारंट के आर्डर कर दिए थे। और वह सीनियर वकील गिड़गिड़ा रहा था कि, "वारंट की जरूरत नहीं है। वह खुद ही उन्हें अदालत में पेश कर देगा।" पर न्यायमूर्ति फिर भी नहीं माने तो सीनियर वकील बेलेबिल वारंट की रिक्वेस्ट पर आ गया। वह जाने क्यों गिड़गिड़ाता जा रहा था। और समय काटता जा रहा था। फिर न्यायमूर्ति पसीजे और उन्होंने नान बेलेबिल वारंट के आदेश रद्द कर बेलेबिल वारंट कर दिए। पर सीनियर वकील अभी भी गिड़गिड़ा रहा था कि सिर्फ तारीख दे दी जाए और.... अभी कुछ और वह कहता कि वह सुदर्शनीया वकील साहिबा जो बुलबुल की तरह बोलती थीं, अपनी भारी-भारी छातियों और उससे भी भारी नितंबों को फड़काती हुई, हांफती हुई पर मादक मुसकान से सबको मारती हुई आ गईं। उन्हें देखते ही संजय के होश उड़ गए। वह समझ गया कि अब यह फिर कोई ड्रामा करेगी। उसने किया भी और कहा कि, "आज के इस अनलिस्टेड केस की उसे सूचना नहीं थी, वह इस केस की फाइल भी नहीं लाई है इसलिए इस मामले की सुनवाई की कोई अगली तारीख दे दी जाए!"

संजय की वकील ने उस बुलबुल-सी बोलने वाली वकील की बात का बेतरह प्रतिवाद किया पर न्यायमूर्ति तो पिघल गए थे, बुलबुल-सी आवाज में बह गए थे और अपने सारे पिछले आदेश रद्द कर अगली तारीख दो महीने बाद की दे बैठी। संजय की वकील निराश होकर बैठ गई। पर संजय भड़क उठा। वह जाकर वकील की जगह खड़ा हो गया और न्यायमूर्ति से बहस पर आमादा हो गया। उसने साफ-साफ कहा कि, या तो हाईकोर्ट का जो आदेश है वह अभी रद्द कर दिया जाए। वह आखिर यह आदेश कब तक झुनझुने की तरह बजाता हुआ घूमता रहेगा और अपनी जवानी बरबाद करता रहेगा। दूसरे, अगर अदालत उस आदेश को मानती है तो उसे पूरी तरह माने। तीसरे, उस आदेश को अपोजिट पार्टी ने नहीं माना है। साफ है कि आदेश की अवमानना हुई है। क्लीयरकट कंटेंप्ट है। और जो फिर भी अदालत को लगता है कि अपोजिट पार्टी ने कंटेंप्ट नहीं किया, संजय ने इस बात को चीख कर कहा कि, "मैं इर भरी अदालत में इस अदालत की अवमानना करता हूं।" वह और जोर से चीखा, "मैं कंटेप्ट करता हूं। मुझे जेल भेजा जाए। कम से कम वहां रोटी दाल तो मिलेगी।" संजय बोलता जा रहा था और न्यायमूर्ति उसे बराबर टोकते जा रहे थे कि, "बैठ जाइए!" वह बार-बार संजय की वकील से कह रहे थे कि वह संजय को कोर्ट से बाहर ले जाएं। कोर्ट में बैठे बाकी वकील संजय की इस हरकत से सकते में आ गए थे। संजय की वकील भी घबरा-घबरा कर बार-बार संजय को पीछे से खींचती और कहती, "संजय जी प्लीज बाहर चलिए। चुपचाप बैठ जाइए।" पर संजय पर तो जैसे जुनून सवार था, वह लगातार चीख रहा था, "मैं इस कोर्ट का कंटेंप्ट कर रहा हूं, मुझे जेल भेजिए!"

न्यायमूर्ति ने संजय को फिर से समझाया, "हर चीज की प्रोसिडिंग होती है।"

"हद है! आप दस मिनट के अंदर अपना ही आदेश तीन बार बदलते हैं। इन ड्रामेबाज वकीलों के झांसे में आ जाते हैं और हमें प्रोसिडिंग समझाते हैं?" संजय जैसे पागल हुआ जा रहा था और बार-बार चीखने से न्यायमूर्ति भी एक बार तैश में आ गए। संजय से वह भी चीख कर बोले, "मैं कह रहा हूं आप चुपचाप कोर्ट से बाहर जाइए नहीं आपको अभी कस्टडी में ले लिया जाएगा।"

"मैं तो कह ही रहा हूं कि मुझे जेल भेजिए। मैं कंटेप्ट कर रहा हूं।" संजय फिर चिल्लाया। फिर न्यायमूर्ति का धैर्य जैसे जवाब दे गया। वह संजय के केस में अंतत: "नाट बिफोर" का आदेश दे "कोर्ट इज एडजर्न" कह कर तमतमाते हुए उठ कर अपने चैंबर में चले गए।

"नाट बिफोर" का क्या मतलब? एक वकील से संजय ने पूछा।

"मुझे नहीं मालूम।" वह वकील खीझ कर बोला। पर उसके बगल में खड़े एक दूसरे वकील ने बताया कि, "अब यह केस यह कभी नहीं सुनेंगे!"

"अच्छा!" संजय बड़बड़ाया और जरा जोर से, "ऐसे नपुंसक जजों के सामने मेरा केस न ही जाए तो अच्छा है!" कह कर वह कोर्ट से बाहर आ गया। ज्यादतर वकील उसे देख कर कन्नी काट गए। उस सीनियर का एक जूनियर संजय के पास आकर बोला, "हमारे सीनियर वकील नहीं, चलती फिरती कोर्ट हैं। समझे!" संजय कुछ बोला नहीं और घर चला आया। खाना खाकर सो गया।

शाम हो गई थी जब वह सोकर उठा।

बाथरूम गया पेशाब करने। पेशाब करते समय उसे एक घटना याद आ गई। उस घटना की याद आते ही उसे हंसी आ गई।

कुत्तों से संजय को हरदम परहेज रहा। परहेज क्या वह हद से ज्यादा डरता है कुत्तों से। दिल्ली में जब वह था, उसके फ्लैट के बगल वाले फ्लैट में एक डॉक्टर थे। डॉक्टर के पास एक कुत्ता था। वह कुत्ता जब तब संजय के फ्लैट के सामने आकर पेशाब-टट्टी कर दिया करता था। संजय ने कई बार डॉक्टर से इसकी शिकायत की। पर डॉक्टर को इसकी परवाह नहीं हुई।

एक दिन संजय ने खूब पी। धुत्त होकर घर लौटा। घर आते ही उसे जोर से पेशाब लगी। वह बाथरूम की और बढ़ा। पर अचानक कुछ सोच कर रुक गया। वापस दरवाजा खोल कर बाहर निकला और डॉक्टर के फ्लैट के सामने खूब जी भर कर छर-छर मूत दिया। पेशाब डॉक्टर के घर के अंदर तक गया। उसने सोचा डॉक्टर उससे शिकायत करेगा। पर डॉक्टर ने कभी शिकायत नहीं की। यह जरूर हूआ कि तबसे डॉक्टर के कुत्ते ने संजय के फ्लैट के आगे पेशाब-टट्टी बंद कर दिया। संजय यह सोचकर फिर हंसा और सोचा कि आज वह हाईकोर्ट में मूतेगा।

पर कैसे?

हां, कैसे? उसने सोचा और पाया कि यह सब करने के लिए शराब में धुत्त होना जरूरी है। और शराब वह छोड़ चुका है।

तब?

तो क्या आज वह इस पुनीत कार्य के लिए शराब पी ले? उसने सोचा। फिर तय किया कि वह शराब नहीं पिएगा। सोचा कि यह हाईकोर्ट का अन्याय क्या कम है उसे धुत्त करने के लिए?

वह उठा।

उठ कर चार पांच लोटा पानी पिया। एक घंटे में वह जितना अधिक से अधिक पानी पी सकता था पीकर हाईकोर्ट पहुंचा। पहुंच कर चौकीदार को पकड़ा। उसे सौ रुपए का नोट दिया और हाईकोर्ट की उस अदालत का दरवाजा खुलवाकर ऐन उस न्यायमूर्ति की कुर्सी के सामने छर-छर मूतने लगा। मूतना तो वह न्यायमूर्ति की कुर्सी पर चाहता था पर चौकीदार ने ऐसा नहीं करने दिया। अपनी नौकरी का वास्ता दिया। सो वह न्यायमूर्ति की कुर्सी के सामने मूतता रहा। वहां मूत कर वह बड़ा निश्चिंत भाव से बाहर निकला।

गरज यह कि एक नपुंसक व्यवस्था के खिलाफ एक नपुंसक विरोध दर्ज हो गया था।

तो क्या संजय नपुंसक हो गया था?

यह सोचते हुए उसने यह भी सोचा कि नपुंसक व्यवस्था से लड़ते-लड़ते आदमी नपुंसक नहीं तो और क्या बनेगा? उसने स्कूटर स्टार्ट की और चल पड़ा। कहीं रेडियो बज रहा था कि टेप, संजय जान नहीं पाया पर सुदर्शन फाकिर के लिखे को जगजीत सिंह गा रहे थे, "रहते थे हम हसीन खयालों की भीड़ में / उलझे हुए हैं आज सवालों की भीड़ में।"

संजय ने स्कूटर और तेज कर दी!

दूसरे दिन संजय एक सेमिनार में बैठा हुआ है। एक न्यायमूर्ति इस सेमिनार का अध्यक्षीय भाषण कर रहे हैं। मुसलमान हैं और भारतीय संस्कृति की दुहाई बार-बार उच्चार रहे हैं, उसे और समृद्ध करने पर जोर भी मारे जा रहे हैं। सुन-सुन कर संजय अफना रहा है। उसके बगल में बैठी महिला पत्रकार मनीषा पूछती भी है, "क्या बात है संजय जी? कोई दिक्कत है क्या?"

"नहीं कोई बात नहीं।" संजय लापरवाही से बोलता है।

"कुछ तो है!" मनीषा पिंड नहीं छोड़ती। सवाल फिर दुहराती है, "क्या बात है?"

"बात कुछ नहीं।" संजय जोड़ता है, "यह हत्यारों को जमानत देने वाला संस्कृति की बात कर रहा है, उसे और समृद्ध करने की बात कर रहा है तो बात हजम नहीं हो पा रही!"

"तो?"

"तो क्या?" संजय बिफरा, "हत्यारों को जमानत देने वालों को संस्कृति पर बोलने का अधिकार नहीं देना चाहिए!" वह बोला, "मुझे तो उबकाई आ रही है!" और यह कहता हुआ वह सेमिनार हाल से बाहर निकल आया। उसके पीछे-पीछे वह महिला पत्रकार मनीषा भी आ गई। आयोजकों ने बाहर घेर कर रोका भी कि, "कुछ खा पीकर जाइए!" पर संजय जैसे बदहवास गया था। बोला, "अरे नहीं उबकाई आ रही है!" यह सुनते ही आयोजकों ने घेरेबंदी तोड़ दी और संजय और मनीषा को बाहर निकल जाने दिया।

"आपको जजों से इतनी एलर्जी क्यों है?" बाहर निकल कर मनीषा ने संजय से पूछा।

"जजों से एलर्जी नहीं है।" संजय बोला, "जजों के दोगले चरित्र और दोमुंहेपन से एलर्जी है!"

"खैर चलिए मैं बहस के मूड में नहीं हूं।" वह बोली, "आपकी उबकाई कुछ कम हुई?"

"कम नहीं, खत्म हो गई।" संजय बोला, "तुम्हारा मूड ज्यादा बिगड़ गया हो तो ठीक कर लो! क्षमा करना!"

"नहीं, ऐसी कोई बात नहीं।" अपना बैग और टुपट्टा ठीक करती हुई बोली, "मैं तो साथ सिर्फ इसलिए चली आई कि आप बाहर निकल कर किसी से झगड़ा न कर लें।" उसने जोड़ा, "और कि कहीं खुदा न खास्ता अगर आपकी तबीयत सचमुच खराब हो तो वह भी देख लूं।"

"ओह! बड़ी फिक्र है मेरी?" संजय चहका, "चलो इसी बात पर तुम्हें चिकेन चिली खिलाता हूं।"

"अरे नहीं, इसकी कोई जरूरत नहीं!" मनीषा संकोच बरतती हुई बोली।

"घबराओ नहीं!" वह बोला, "तुम्हारा संकोच वैसे जायज है कि इस बेरोजगारी में मैं चिली की बात कर रहा हूं तो कहीं खुद न पेमेंट करना पड़ जाए?"

"नहीं, यह बात भी नहीं है।" वह बोली।

"फिर ठीक है।" संजय बोला, "अब बिना इफ-बट किए चली चलो। मेरे पास ठीक ठाक पैसे हैं। अभी आज ही एक अच्छा पेमेंट मिला है।"

बिना कुछ बोले वह चुपचाप संजय के स्कूटर पर बैठ गई।

रेस्टोरेंट में आकर वह भी हाईकोर्ट के सवाल पर आ गई। पूछने लगी, "आखिर दिक्कत क्या है? तब जब कि आपसे पास हाईकोर्ट का आर्डर है।"

संजय ने टुकड़े-टुकड़े करके उसको सारी मुश्किलें, सारे किंतु-परंतु का संक्षिप्त ब्यौरा थमा दिया और बोला, "सारी मुश्किल कोर्ट प्रोसिडिंग्स के नाम पर वकीलों और जजों का दोगलापन है कुछ और नहीं।" वह थोड़ा और तफसील में जाता हुआ बोला, "ठीक वैसे ही जैसे कोई नपुंसक पुरुष अपना ऐब छुपाने के लिए अपनी बीवी को दोष देता फिरता है और पीटता रहता है कि, बच्चा क्यों नहीं जन्मी?"

"आप यह बात मीडिया के मार्फत क्यों नहीं उठाते?" वह बोली।

"कहा था कुछ सो काल्ड लॉ-रिपोर्टरों से। पर उनके साथ दो दिक्कतें आईं एक तो जजों की खिलाफत कैसे करें? उन जजों की जिनकी भड़ुआगिरी वह अपनी कुंडली में लिखवा कर लाए हैं। दूसरे, मेरा मामला एक अखबार के मैनेजमेंट के खिलाफ है। और ये लॉ-रिपोर्टर सती सावित्री छाप वेजेटेरियन हैं। उनके खिलाफ कैसे लिखें? लिख देंगे तो नरक को प्राप्त हो जाएंगे!"

"इन लॉ-रिपोर्टरों के अलावा आप खुद भी तो लिख कर दे सकते हैं?" मनीषा बोली।

"दे सकता हूं। या कोई और भी लिख सकता है। लेकिन इन अखबारों में बैठे सो काल्ड एडीटर भी तो हिजड़ों से बढ़कर हैं! क्या तो यह कोर्ट की खबर है। कानूनी मसला हैं लॉ-रिपोर्टर ही लिखेंगे। नहीं, मामला बिगड़ जाएगा!" संजय बिफरा।

"तो आप इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वालों से बात करिए!"

"बात की इन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वालों से भी। कल तक जो भाई साहब, भाई साहब कहकर पांव छूते थे, खबरों का इंट्रो और एंगिल हमसे पूछते फिरते थे, आज वह भी खलीफा हो चले हैं, कैमरे के आगे कमर मटकाते ऐसे फिरते हैं कि तुम लड़कियां उनके आगे फेल! कहते हैं कि दिल्ली से परमिशन लेनी पड़ेगी!"

"क्या हर खबर वह परमिशन लेकर ही करते हैं?" वह बोली।

"कुछ नहीं। सब साले हिजड़े हैं।" संजय बोला, "मैंने तो यहां तक कहा कि मेरा मामला बिलकुल मत छुओ। जिक्र तक मत करो। पर इस हाईकोर्ट में कंटेंप्ट के जो हजारों केस साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं और उनकी सुनवाई ही नहीं हो पा रही, उसपर एक फीचर करो। अच्छी ह्रयूमन स्टोरी बनेगी। यही बात मैंने अखबार वालों से भी कही और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वालों से भी। पर सब के सब कन्नी काट गए!"

"यह तो हद है!" मनीषा बिफरी।

"तो तुम मेरी बात से सहमत हो?" संजय ने पूछा।

"बिलकुल!" वह इतराती हुई बोली।

"तो तुम खुद यह स्टोरी क्यों नहीं करती?" संजय बोला, "मैं तुम्हारी पूरी मदद कर दूंगा। सारे डिटेल्स दिला दूंगा। फीगर्स मिल जाएंगे, साल दर साल। कुछ वकीलों, जजों और अवमानना की आंच में जलते भुक्त भोगियों सहित अवमानना करने वालों से बातचीत भी करवा दूंगा। इन सबकी फोटो वोटो लेकर लिखोगी तो एक इक्सक्लूसिव स्टोरी तुम्हारी खाते में दर्ज होगी। ऐसी कि पढ़ कर लोगों के रोंगटे खड़ा हो जाएं!"

"ठीक है मैं आज ही अपने एडीटर से इस पर डिसकस करती हूं।" वह दृढ़ होती हुई बोली।

"राजेश खन्ना वाला डायलाग बोलूं तो कहूं कि यहीं मार खा गया हिंदुस्तान!" संजय बोला, "खैर, डिसकस कर लो। वैसे मुझे उम्मीद कम है कि तुम्हारा एडीटर इस स्टोरी के लिए मान जाएगा।" वह बोला, "फिर भी टेक एक चांस! तुम लड़की हो! हो सकता है लड़की होने का फायदा तुम्हें मिल जाए। और तुम्हारी बात से वह सहमत हो जाए!"

"बात लड़की होने की नहीं है।" वह बोली, "इस स्टोरी में दम भी है।"

"बाकी लोगों को इस स्टोरी में दम नहीं दिखा, बल्कि सुनकर ही बेदम हो गए तो तुम्हारे एडीटर को कहां से दम दिखेगा? वह भी तो पूंजीपतियों की चाटुकारिता में प्रवीण है। खैर, फिर भी देखो क्या बनता है?"

"यही तो मैं कह रही हूं।" वह निश्चिंत होती हुई बोली।

वह दोनों चाओमिन के साथ चिकेन चिली खा रहे थे तो जगजीत सिंह का गाया एक रिकर्ड बज रहा था, "पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम, पत्थर के ही इंसा पाए हैं/तुम शहरे मुहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं।" एक बार वह इस गायकी में खो गया। चिकेन चिली खाकर वह दोनों जब उस एयर कंडीशन रेस्टोरेंट से निकले तो बाहर चिलचिलाती धूप मिली। बिलकुल तोड़ देने वाली धूप।

"कहीं और चल कर बैठें?" संजय ने मनीषा से पूछा।

"कहां?" वह धूप से बिलबिलाती हुई बोली।

"कहीं किसी घने पेड़ के नीचे!" संजय बहकता और दहकता हुआ बोला, "उस घने पेड़ की छांव में आइसक्रीम खाएं, कोई फिल्मी गाना सुनते हुए!"

"बड़े रोमैंटिक हो रहे हैं आप! पर यह संभव है कहां?" वह सकुचाती और किचिंत इठलाती हुई बोली।

"तुम हां कहो तो सब कुछ संभव है।" संजय उसकी मादकता में डूबता हुआ बोला।

"तो चलिए!" वह अल्हड़ होती हुई बोली।

संजय समझ गया कि यह हाईकोर्ट की कंटेप्ट स्टोरी लिखे न लिखे, उसकी बांहों में सोएगी जरूर! सो संजय की स्कूटर तेजी से कुकरैल पिकनिक स्पाट की ओर भागने लगी। कुकरैल पहुंच कर वह बोली, "यह कहां ले आप आए?"

"घने पेड़ की छांव, आइसक्रीम और फिल्मी गाने का खुशनुमा संयोग इस कड़ी धूप में सिर्फ यहीं संभव है।"

संजय ने जोड़ा "और पूरे एकांत के साथ।"

"ओह!" उसने अपने बालों को झटका देते हुए कहा, "इरादा तो नेक है?"

"बिलकुल!" संजय संजीदा होते हुए बोला, "बिलकुल नेक और पाक!"

"ऐसा!" वह बोली, "आपका खिलंदड़पन और मस्ती देख कर लगता नहीं कि आप इतने संघर्ष में हैं।" वह गंभीर हो गई। बोली, "कोई और हो तो टूट कर बिखर जाए। कपड़े फाड़कर घूमे!"

"कपड़े नहीं, कुर्ता फाड़कर घूमे और मजनूं की तरह!" वह बेफिक्री से बोला, "फिलहाल तो यह सब छोड़ो! अभी तो आईसक्रीम और घने पेड़ की छांव में गाना सुनते हैं। वही गाना जो मुकेश ने गाया है, "संसार है एक नदिया....ना जाने कहां जाएं, हम बहते धारे हैं" बोलो ठीक है!"

"हूं।" कहती हुई वह झूम कर चली। गाती हुई, "झूमती चली हवा...."

आइसक्रीम लेकर वह एक पेड़ की छांव में बैठे बतियाने लगे। राजनीति, फिल्म लोग और वगैरह-वगैरह बतियाते-बतियाते संजय बोला, "इस घने पेड़ की छांव कम पड़ रही है। है न?"

"नहीं, ठीक तो है। पूरी घनी छांव है। और ठंडी भी।" वह बोली, "आपका सेलेक्शन ब्यूटीफुल है!"

"लेकिन यह छांव मेरे लिए कम पड़ रही है।" वह बुदबुदाया, "अगर तुम्हारी इजाजत मिल जाए तो इस छांव में थोड़ा इजाफा कर लूं?"

"इजाजत की क्या जरूरत है? आप इजाफा कर लीजिए।"

"इजाजत की जरूरत है।" संजय अपने पुराने मुहावरे पर वापस आते हुए खुसफुसाया, "अगर तुम बुरा न मानो तो इस घने पेड़ की छांव में तुम्हारी जुल्फों की छांव भी जोड़ लूं? ओढ़ लूं तुम्हारी जुल्फों को।"

"क्या मतलब है आपका?" वह थोड़ा संकोच, थोड़ा गुस्सा घोल कर बोली। पर धीरे से।

"इसीलिए तो इजाजत मांगी।" वह भावुकता में भींग कर बोला, "प्लीज बुरा मत मानना। यह तो तुम्हारी खुशी पर है। तुम्हारी पसंद पर है।"

"आपकी यह बेचारगी देखी नहीं जाती!" वह अपने बालों के रबर बैंड खोलती हुई, बालों को झटका देती हुई बोली। थोड़ा रुकी और कहने लगी, "आप इतनी जल्दी प्रपोज कर देंगे। मुझे अंदाजा नहीं था।"

"तो तुम क्या चाहती थी कि साल भर आइसक्रीम ही खाते और पेड़ के नीचे बैठते रहते?" संजय उसके बालों में अपना चेहरा छुपाते हुए बोला, "वक्त खराब करने से क्या फायदा?" उसने जोड़ा, "बस मेंटल हारमनी चाहिए!"

"ये तो है!" वह संजय की सासों में अपनी सांसें मिलाती हुई खुसफुसाई, "पर आज बस इतना ही!"

"इतना ही क्यों?" संजय बोला, "तुम ज्यादा इफ-बट मत करना! न ही पत्रकार बनना। लड़की ही बनी रहना बस! और थोड़ा-सा मुझ पर भरोसा करना!" कह कर संजय उसकी देह जहां तहां टटोलने लगा।

चुपके-चुपके।

थोड़ी देर बाद उसे लगा कि अब बात बिगड़ेगी नहीं तब वह वहां बने गेस्ट हाऊस के चौकीदार के पास गया। उसे सौ रुपए पकड़ाते हुए बोला, "मेम साहब की तबीयत जरा खराब हो गई है। कमरा खोल दो अभी थोड़ी देर आराम करके चली जाएंगी।"

"ठीक हजूर!" कह कर उसने कमरा खोल दिया। और, "कुछ चाहिए तो बताइएगा हजूर!" कह कर मूंछों में मुसकुराता हुआ वह चला गया। उसके जाते ही दरवाजा बंद करके संजय उस पर बुरी तरह टूट पड़ा। इतनी कि मनीषा परेशान होकर बोली, "देखने में तो आप बहुत सभ्य और शरीफ लगते हैं। पर इस समय क्यों जानवर बने जा रहे हैं?"

"क्या बेवकूफी की बात करती हो?" वह बोला, "थोड़ी देर चुप रह सको तो मजा आएगा!" कह कर वह उसके कपड़े उतारने लगा।

"यह क्या कर रहे हैं आप?" कहती हुई वह उसका हाथ पकड़ कर रोकने लगी।

"कुछ करूंगा नहीं। बस समीज खुद ही तुम उतार लो। नहीं जल्दबाजी से फट-फटा गई तो मुश्किल होगी।"

"बस समीज ही उतारूंगी। कुछ और नहीं।" वह खुसफुसाई।

"ठीक है। पर जल्दी उतारो!" संजय हड़बड़ाता हुआ बोला। समीज उतारने के बाद वह उसकी ब्रा भी उतारने लगा तो वह फिर उसका हाथ पकड़ती हुई बोली, "आपने सिर्फ समीज के लिए कहा था।"

"क्या डिस्टर्ब करती हो। ब्रा भी समीज के साथ रहती है। यह भी उतार दोगी तो क्या बिगड़ जाएगा?" वह ब्रा की हुक खोलता हुआ बोला। वह उसकी ब्रा बाहों से बाहर करता कि उसने कूद कर बिछी चादर लपेट ली। तो भी उसने ब्रा बाहर कर दी और उसके उरोजों से खेलने, चूसने और रगड़ने लगा तो वह उत्तेजित होने लगी। बावजूद इसके "कुछ और नहीं, कुछ और नहीं" की रट बड़ी देर तक लगाए रही। अंतत: संजय का धैर्य जवाब दे गया और उसने लगभग जबरदस्ती उसकी सलवार खोल दी। तब उसने देखा कि "कुछ और नहीं, कुछ और नहीं" की रट भले लगा रही थी पर वह इतना डिस्चार्ज हो चुकी थी कि उसकी पैंटी और सलवार बुरी तरह भीग चुकी थी। फिर तो संजय जैसे पागल हो गया। और उसके "नहीं-नहीं" कहते रहने के बावजूद वह उसके ऊपर आकर लेट गया। बोला, "अपना काम हो गया और मुझसे नहीं-नहीं कर रही हो।" कह कर उसकी दोनों टांगें उठाईं और शुरू हो गया। थोड़ी देर बाद दोनों पसीने से लथपथ निढाल पड़े थे। तभी वह उससे चिपटती हुई बोली, "कुछ हो गया तो?" उसका इशारा प्रिगनेंसी की तरफ था। पर संजय कुछ नहीं बोला। उसने फिर अपनी बात दुहराई, "कुछ हो गया तो?"

"कुछ नहीं होता एक दो बार में। हां, हिंदी फिल्मों में एक बार में जरूर हो जाता है।" संजय उसे टालते हुए बोला।

"फिर भी!" वह खुसफुसाई।

"कुछ नहीं। निश्चिंत रहो। और थोड़ा चुप रहकर देह के नेह को मन में भींच कर महसूस करो।" कह कर संजय आंखें बंद कर उसके बाल और नितंब सहलाने लगा। थोड़ी देर बाद वह उसके उरोजों को चाटने चूसने लगा। जल्दी ही दोनों उत्तेजित होकर फिर से हांफने लगे।

शाम हो गई थी। पर दोनों को जाने की जल्दी नहीं थी। उधर सूरज ढल कर लाल हो गया था और इधर मनीषा की देह महक रही थी। संजय उसकी देह के नेह में नत था! यह एक सवाल अपने आपसे पूछता हुआ कि क्या देह भी अपने आप में यह युद्ध नहीं है?

फिर खुद ही जवाब देता है कि, "है तो!"

देह अभी भले युद्ध हो संजय के लिए पर बाकी युद्ध उसने छोड़ दिए हैं। कभी 'याचना नहीं, अब रण होगा!' गरज कर हुंकारने वाला संजय अब अपमान के दलदल में फंसा रण भूल कर याचना सीखने की कोशिश कर रहा है पर सीख नहीं पा रहा है। तो उसके लिए यह भी एक युद्ध है! एक युद्ध रीना भी लड़ रही है। राजनीतिक युद्ध। हालांकि रीना की शादी उसके पिता ने एक आई.ए.एस. अफसर से करवा दी। अब वह आई.ए.एस. की बीवी है और दो बच्चों की मां। पर घर में अब उसका मन नहीं लगता। राजनीतिक गलियारो में ज्यादा लगता है। उसका टारगेट अपने पिता की तरह मिनिस्टर बनने का है। यह पार्टी की वह पार्टी या तमाम और बातें उसके लिए टैबू नहीं हैं। और जिस तरह से वह राजनीतिक फेरे मार रही है उससे लगता यही है कि वह अपना टारगेट पा लेगी। हां, शादी के बाद भी कभी कभार संजय से मिल लेती है पर पहले की तरह अपनी ही सुविधा और अपनी ही मर्जी से!

प्रकाश और मनोहर भी बीच युद्ध में हैं। वह दोनों पत्रकारिता छोड़ छोटे-मोटे बिजनेस शुरू कर संघर्ष कर रहे हैं। क्योंकि वह अखबार बिक कर दूसरे स्वामित्व में चला गया। पर कोई चूं नहीं बोल पाया। और नया मालिक इतना होशियार निकला कि वह मुर्गी मार कर सोने के अंडे के फेर में पड़ गया। नतीजतन दो तिहाई से अधिक कर्मचारी सड़क पर आकर अब उसके खिलाफ जंग लड़ रहे हैं। कानूनी जंग! कभी कभार संजय से मिलता है तो बताता है कि, "तुम सच कहते थे कि तुम 'ट्रायल केस' हो। तुम्हारे मसले पर ही सब लोग जूझ गए होते तो यह बेरोजगारी तीन सौ लोगों के सिर पर नहीं टूटती!"

रही बात ट्रेड यूनियन नेता दूबे की तो अब वह दो ट्रक, एक टैक्सी और आलीशान मकान का मालिक है। यह ट्रेड यूनियन के 'ट्रेड' में बदलते जाने की कथा है, कुछ और नहीं। हां, आखिरकार कर्मचारियों का वह फिर भी नेता है! ठीक वैसे ही जैसे मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास 'गोदान' की प्रासंगिकता पर मधुकर एक कविता सुनाता था; 'बैंकर खन्ना अब भी नेता है/देशी पहनता/विदेशी पीता है।'

संजय जब कभी कर्मचारियों के धरने, आंदोलन में जाता है और वहां दूबे को देखता है तो कर्मचारियों से एक बात जरूर कहता है कि, "खिचड़ी बनाओ दयानंद पांडेयऔर उसमें नमक जरूर डालो! फिर दूबे जी को खिलाओ भी जरूर।" वह जोड़ता है, 'कुछ तो नमक का खयाल रखेंगे ही दूबे जी!' कह कर वह पूछता है, 'क्यों दूबे जी?'

दूबे भीतर-भीतर नाराज तो होता ही है पर जाहिर नहीं करता। ऊपर-ऊपर मुसकुराता रहता है। यह युद्ध नहीं, युद्ध को दबोच लेने वाली गंध है। कहीं ज्यादा घातक और तोड़ने वाली। समाप्त

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