हिंदी रुकने वाली नहीं है

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अरविंद कुमार: बूढ़ी होती दुनिया में युवाओं का देश है भारत :हिंदी के उग्रवादी समर्थक बेचैन हैं कि आज भी इंग्लिश का प्रयोग सरकार में और व्यवसाय में लगभग सर्वव्यापी है। वे चाहते हैं कि इंग्लिश का प्रयोग बंद कर के हिंदी को सरकारी कामकाज की एकमात्र भाषा तत्काल बना दिया जाए। उनकी उतावली समझ में आती है, लेकिन यहां यह याद दिलाने की ज़रूरत है कि एक समय ऐसा भी था जब दक्षिण भारत के कुछ राज्य, विशेषकर तमिलनाडु, हिंदी की ऐसी उग्र मांगों के जवाब में भारत से अलग होकर अपना स्वतंत्र देश बनाने को तैयार थे।

तब ‘हिंदी वीरों’ का कहना था कि चाहे तो तमिलनाडु अलग हो जाए, हमें हिंदी चाहिए… हर हाल, अभी, तत्काल… उस समय शीघ्र होने वाले संसद के चुनावों में उन्होंने नारा लगाया कि वोट केवल उस प्रत्याशी को दें जो हिंदी को तत्काल लागू करने के पक्ष में हो। सौभाग्य है कि भारत के लोग इतने नासमझ न थे और न आज हैं कि एकता भंग होने की शर्त पर हिंदी को लागू करना चाहें। मैं समझता हूं कि पूरी राजनीतिक और भाषाई तैयारी के बिना हिंदी को सरकारी कामकाज की प्रथम भाषा बनाना लाभप्रद नहीं होगा। हिंदी पूरी तरह आने में देर लग सकती है, पर प्रजातंत्र और राष्ट्रीय एकता के लिए यह देरी बरदाश्त करने लायक़ है। तब तक हमें चाहिए कि सरकारी कामकाज में हिंदी प्रचलन बढ़ाते रहें और साथ-साथ अपने आप को और हिंदी को आधुनिक तकनीक से लैस करते रहें।

इंग्लिश के विरोध की नीति हमें अपने ही लोगों से भी दूर कर सकती है। आम आदमी इंग्लिश सीखने पर आमादा है तो एक कारण यह है कि आज आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए इंग्लिश का ज्ञान आवश्यक है। दूसरा यह कि संसार का सारा ज्ञान समेटने के लिए देश को इंग्लिश में समर्थ बने रहना होगा, वरना हम कूपमंडूक रह जाएंगे। यही कारण था कि 19वीं सदी में जब मैकाले की नीति के आधार पर इंग्लिश शिक्षा का अभियान चला था, तब राजा राम मोहन राय जैसे देशभक्त और समाज सुधारक ने उस का डट कर समर्थन किया था। वह देश को दक़ियानूसी मानसिकता से उबारना चाहते थे। राममोहन राय ने कहा था, ‘एक दिन इंग्लिश पूरी तरह भारतीय बन जाएगी और हमारे बौद्धिक सामाजिक विकास का साधन।’ स्वामी विवेकानंद ने भी अमरीका में भारतीय संस्कृति का बिगुल इंग्लिश के माध्यम से ही फूंका था।

इसके माने यह नहीं हैं कि आज हम लोग हिंदी का महत्त्व नहीं जानते या हिंदी की प्रगति और विकास रुक गया है या रुक जाएगा। मैं समझता हूं कि हिंदी के विकास का राकेट नई तेज़ी से उठता रहेगा। हिंदी अब रुकने वाली नहीं है, हिंदी रुकेगी नहीं। कारण है हिंदी बोलने समझने वालों की भारी तादाद और उन के भीतर की उत्कट आग। भाषा विकास क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों का तथ्याधारित अनुमान हिंदी प्रेमियों के लिए उत्साहप्रद है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की जो चंद भाषाएं होंगी उन में हिंदी अग्रणी होगी।

संसार में 60 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मारीशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की कुछ जनता हिंदी बोलती है। अमरीकी, यूरोपीय महाद्वीप और आस्ट्रेलिया आदि देशों में गए हमारे तथाकथित एनआरआई कमाएं चाहे इंग्लिश के बल पर, लेकिन उनका भारतीय संस्कृति और हिंदी के प्रति प्रेम बढ़ा ही है। कई बार तो लगता है कि वे हिंदी के सब से कट्टर समर्थक हैं।

अकेले भारत को ही लें तो हिंदी की हालत निराशाजनक नहीं, बल्कि अच्छी है। आम आदमी के समर्थन के बल पर ही पूरे भारत में 10 शीर्ष दैनिकों में हिंदी के पांच हैं (दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका), तो इंग्लिश का कुल एक (टाइम्स आफ़ इंडिया) और मलयालम के दो (मलयालम मनोरमा और मातृभूमि), मराठी का एक (लोकमत), तमिल का एक (दैनिक थंती)। इसी प्रकार सब से ज़्यादा बिकने वाली पत्रिकाओं में हिंदी की पांच, तमिल की तीन, मलयालम की एक है, जबकि इंग्लिश की कुल एक पत्रिका है। हिंदी के टीवी मनोरंजन चैनल न केवल भारत में बल्कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान में भी लोकप्रिय हैं और हिंदी के साथ-साथ हमारे सामाजिक चिंतन का प्रसार कर रहे हैं।

जहां तक हिंदी समाचार चैनलों का सवाल है इंग्लिश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित न्यूज़ वीकली इकोनमिस्ट ने 14 अगस्त 2010 अंक में पृष्ठ 12 पर­‘इंटरनेशल ब्राडकास्टिंग’ पर लिखते हुए कहा है कि अमरीका और ब्रिटेन के विदेशी भाषाओं में समाचार प्रसारित करने वाले संस्थानों को अपना धन सोच’ समझ कर बरबाद करना चाहिए। उदाहरण के लिए भारत की अपनी भाषाओं के न्यूज़ चैनलों से प्रतियोगिता करना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है।

हमारी ताक़त है हमारी तादाद…

यह परिणाम है हमारी जनशक्ति का। यही हिंदी का बल है। बहुत साल नहीं हुए जब हम अपनी विशाल आबादी को अभिशाप मानते थे। आज यह हमारी कर्मशक्ति मानी जाती है। भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने सही कहा है :‘अधिक आबादी अपने आप में कोई समस्या नहीं है, समस्या है उस की ज़रूरियात को पूरा न कर पाना। अधिक आबादी का मतलब है अधिक सामान की, उत्पाद की मांग। अगर लोगों के पास क्रय क्षमता है तो हर चीज़ की मांग बढ़ती है।’ आज हमारे समृद्ध मध्य वर्ग की संख्या अमरीका की कुल आबादी जितनी है। पिछले दिनों के विश्वव्यापी आर्थिक संकट को भारत हंसते खेलते झेल गया तो उस का एक से बड़ा कारण यही था कि हमारे उद्योगों के उत्पाद मात्र निर्यात पर आधारित नहीं हैं। हमारी अपनी खपत उन्हें ताक़त देती है और बढ़ाती है।

इसे हिंदी भाषियों की और विकसित देशों की जनसंख्या के अनुपातों के साथ साथ सामाजिक रुझानों को देखते हुए समझना होगा। दुनिया की कुल आबादी आज लगभग चार अरब है। इसमें से हिंदुस्तान और चीन के पास 60 प्रतिशत लोग हैं। कुल यूरोप की आबादी है 73-74 करोड़, उत्तर अमरीका की आबादी है 50 करोड़ के आसपास। सन 2050 तक दुनिया की आबादी 9 अरब से ऊपर हो जाने की संभावना है। इसमें से यूरोप और अमरीका जैसे विकसित देशों की आबादी बूढ़ी होती जा रही है। (आबादी बूढ़े होने का मतलब है किसी देश की कुल जनसंख्या में बूढे लोगों का अनुपात अधिक हो जाना।) चुनावी नारे के तौर पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा कुछ भी कहें, बुढाती आबादी के कारण उन्हें अपने यहां या अपने लिए काम करने वालों को विवश हो कर, मजबूरन या तो बाहर वालों को आयात करना होगा या अपना काम विदेशों में करवाना होगा।

इस संदर्भ में संसार की सब से बड़ी साफ़्टवेअर कंपनी इनफ़ोसिस के एक संस्थापक नीलकणी की राय विचारणीय है। तथ्यों के आधार पर उनका कहना है कि ‘किसी देश में युवाओं की संख्या जितनी ज़्यादा होती है, उस देश में उतने ही अधिक काम करने वाले होते हैं और उतने ही अधिक नए विचार पनपते हैं। तथ्य यह है कि किसी ज़माने का बूढ़ा भारत आज संसार में सबसे अधिक युवा जनसंख्या वाला देश बन गया है। इस का फ़ायदा हमें 2050 तक मिलता रहेगा। स्वयं भारत के भीतर जनसंख्या आकलन के आधार पर 2025 में हिंदी पट्टी की उम्र औसतन 26 वर्ष होगी और दक्षिण की 34 साल।’

अब आप भाषा के संदर्भ में इस का मतलब लगाइए। इन जवानों में से अधिकांश हिंदी पट्टी के छोटे शहरों और गांवों में होंगे। उन की मानसिकता मुंबई, दिल्ली, गुड़गांव के लोगों से कुछ भिन्न होगी। उनके पास अपनी स्थानीय जीवन शैली और बोली होगी। नई पहलों के चलते हमारे तीव्र विकास के जो रास्ते खुल रहे हैं (जैसे सबके लिए शिक्षा का अभियान), उनका परिणाम होगा असली भारत को, हमारे गांवों को, सशक्त कर के देश को आगे बढ़ाना। आगे बढ़ने के लिए हिंदी वालों के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत है अपने को नई तकनीकी दुनिया के सांचे मेंढालना, सूचना प्रौद्योगिकी में समर्थ बनना।

यही है हमारी नई दिशा। कंप्यूटर और इंटरनेट ने पिछ्ले वर्षों में विश्व में सूचना क्रांति ला दी है। आज कोई भी भाषा कंप्यूटर तथा अन्य इलैक्ट्रोनिक उपकरणों से दूर रह कर पनप नहीं सकती। नई तकनीक में महारत किसी भी काल में देशों को सर्वोच्च शक्ति प्रदान करती है। इसमें हम पीछे हैं भी नहीं… भारत और हिंदी वाले इस क्षेत्र में अपना सिक्का जमा चुके हैं। इस समय हिंदी में वैबसाइटें, चिट्ठे, ई-मेल, चैट, खोज, एसएमएस तथा अन्य हिंदी सामग्री उपलब्ध हैं। नित नए कम्प्यूटिंग उपकरण आते जा रहे हैं। इनके बारे में जानकारी दे कर लोगों में जागरूकता पैदा करने की ज़रूरत है ताकि अधिकाधिक लोग कंप्यूटर पर हिंदी का प्रयोग करते हुए अपना, देश का, हिंदी का और समाज का विकास करें।

हमें यह सोच कर नहीं चलना चाहिए कि गांव का आदमी नई तकनीक अपनाना नहीं चाहता। ताज़ा आंकड़ों से यह बात सिद्ध हो जाती है। गांवों में रोज़गार के नए से नए अवसर खुल रहे हैं। शहर अपना माल गांवों में बेचने को उतावला है। गांव अब ई-विलेज हो चला है। तेरह प्रतिशत लोग इंटरनेट का उपयोग खेती की नई जानकारी जानने के लिए करते हैं। यह तथ्य है कि ‘गांवों में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों का आंकड़ा 54 लाख पर पहुंच जाएगा।

इसी प्रकार मोबाइल फ़ोन दूरदराज़ इलाकों के लिए वरदान हो कर आया है। उस ने कामगारों कारीगरों को दलालों से मुक्त कर दिया है। यह उनका चलता फिरता दफ़्तर बन गया है और शिक्षा का माध्यम। अकेले जुलाई 2010 में 1 करोड़ सत्तर लाख नए मोबाइल ग्राहक बने और देश में मोबाइलों की कुल संख्या चौबीस करोड़ हो गई। अब ऐसे फ़ोनों का इस्तेमाल कृषि काल सैंटरों से नि:शुल्‍क  जानकारी पाने के लिए, उपज के नवीनतम भाव जानने के लिए किया जाता है। यह जानकारी पाने वाले लोगों में हिंदी भाषी प्रमुख हैं। उनकी सहायता के लिए अब मोबाइलों पर इंग्लिश के कुंजी पटल की ही तरह हिंदी का कुंजी पटल भी उपलब्ध हो गया है।

हिंदी वालों और गांवों की बढ़ती क्रय शक्ति का ही फल है जो टीवी संचालक कंपनियां इंग्लिश कार्यक्रमों पर अपनी नैया खेना चाहती थीं, वे पूरी तरह भारतीय भाषाओं को समर्पित हैं। आप देखेंगे कि टीवी पर हिंदी के मनोरंजन कार्यक्रमों के पात्र अब ग्रामीण या क़स्बाती होते जा रहे हैं।

सरकारी कामकाज की बात करें तो पुणें में प्रख्यात सरकारी संस्थान सी-डैक कंप्यूटर पर हिंदी के उपयोग के लिए तरह तरह के उपकरण और प्रोग्राम विकसित करने में रत है। अनेक सरकारी विभागों की निजी तकनीकी शब्दावली को समो कर उन मंत्रालयों के अधिकारियों की सहायता के लिए मशीनी अनुवाद के उपकरण तैयार हो चुके हैं। अभी हाल सी-डैक ने ‘श्रुतलेखन’ नाम की नई विधि विकसित की है, जिस के सहारे बोली गई हिंदी को लिपि में परिवर्तित करना संभव हो गया है। जो सरकारी अधिकारी देवनागरी लिखने या टाइप करने में अक्षम हैं, अब वे इसकी सहायता से अपनी टिप्पणियां या आदेश हिंदी में लिख सकेंगे। यही नहीं इस की सहायता से हिंदी में लिखित कंप्यूटर सामग्री तथा एसएमएस आदि को सुना भी जा सकेगा। निस्संदेह एक संपूर्ण क्रांति हो रही है।

लेखक अरविंद कुमार हिंदी की अपरिहार्य और अनवरोध्य प्रगति के प्रति माधुरी तथा सर्वोत्तम रीडर्स जाइजेस्ट जैसी पत्रिकाओं के पूर्व संपादक हैं. इन्‍होंने हिंदी के पहले शब्‍दकोश समांतर कोश के रचियता और शब्देश्वरी तथा पेंगुइन हिंदी-इंग्लिश/इंग्लिश-हिंदी थिसारस द्वारा भारत में कोशकारिता को नई दिशा दिया है. ये हिंदी को आधुनिक तकनीक से लैस करने के हिमायती हैं और आजकल इंटरनेट पर पहले सुविशाल हिंदी-इंग्लिश-हिदी ई-कोश को अंतिम रूप देने में लगे हैं. आप उनसे This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it या 09716116106, 0120-4110655 जरिए संपर्क कर सकते हैं.


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