पोथी, पतरा, ज्ञान कपट से बहुत बड़ा है मानव

E-mail Print PDF

कविता पाठ करते वीरेन डंगवाल: कानपुर में वीरेन डंगवाल का एकल काव्यपाठ : प्रख्यात कवि वीरेन डंगवाल ने कल दोपहर बाद कानपुर में कविता पाठ किया. एकल कविता पाठ. उसी कानपुर में जहां वे कुछ वर्षों पहले कुछ वर्ष तक रहे, अमर उजाला अखबार के संपादक के बतौर. जहां उन्होंने संपादक रहते हुए दर्जनों पत्रकारों को संपादकीय, मानवीयता, सरोकार और पत्रकारिता का पाठ पढ़ाया.

और, यह पाठ पढ़ा पढ़ा कर नहीं पढ़ाया बल्कि खुद के व्यवहार, बोलचाल, भाषा, तेवर, प्यार, समझ और सरोकार के कारण अनजाने में पढ़ा दिया. जिसने जितना समझा, उतना पढ़ा, उतना पाया. कानपुर वही है और वीरेन डंगवाल भी. लेकिन समय का पहिया बीच में काफी चल चुका है. देश, समाज, जन सबके सामने नए सवाल और नए संकट खड़े हैं. लेकिन हर सवाल और हर संकट के मूल में वही पुराना मुद्दा है, आदमी में आदमी के प्रति ईमानदारी का कमतर होते जाना. वीरेन डंगवाल ने आज जब कानपुर में अपनी कविता 'हमारा समाज' का पाठ किया तो दुनिया के बहुरुपियापन से उपजी मुक्तिबोध की अकुलाहट की मानो तरजुमानी हो गई. इस कविता की कुछ लाइनें यूं हैं- 'पर हमने यह कैसा समाज रच डाला है, इसमें जो दमक रहा शर्तिया काला है. वह कत्ल हो रहा, सरेआम चौराहे पर, निर्दोष और सज्जन, जो भोला-भाला है. किसने आखिर ऐसा समाज रच डाला है, जिसमें बस वही दमकता है जो काला है.'

एकल काव्यपाठ का आयोजन वीएसएसडी कालेज के हिंदी विभाग में किया गया था. वीरेन डंगवाल ने अपने काव्य संकलन 'इसी दुनिया में', 'दुश्चक्र में सृष्टा' और 'स्याही ताल' की चुनिंदा कविताओं का पाठ किया. अलग-अलग मूड की कविताओं ने एक संपूर्णता पैदा कर दी. कहीं आंसुओं और जज्बात का तूफान जगाने वाला 'शव पिताजी' कविता का अहसास- 'मैं बैठा हूं या खड़ा हूं या सोच रहा हूं- या सोच नहीं रहा हूं- य र ल व श, श व ल र य - ऐसी कठिन उलटबांसी जीवन और शव की.' दूसरे पल सटीक कटाक्ष- 'बारिश जमकर हुई, धुल गया सूअर का बच्चा. धुल-पुंछकर अंगरेज बन गया सूअर का बच्चा. ..ठंडक पहुंची सीझ हृदय में अद्भुत मोद भरा है, इससे इतनी अकड़ भरा है सूअर का बच्चा.'

फिर अगली कविता- 'किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया - ऐेसा भी जीवन जिया तो क्या जिया? ..दुनिया देख चुके हो यारो - एक नजर थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो - पोथी-पतरा-ज्ञान कपट से बहुत बड़ा है मानव, कठमुल्लापन छोड़ो, उस पर भी तनिक विचारो-' ने निराला सा फक्कड़पन याद दिला दिया. इसके बाद अगली कविता 'दुश्चक्र में सृष्टा' में वीरेन डंगवाल का अंदाज-ए-सुखन अपना खास था- 'प्रार्थनागृह जरूर उठाए गए एक से एक आलीशान... ऊंगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून! आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर, अपना कारखाना बंद करके किस घोंसले में जा छिपे हो भगवान? कौन-सा है आखिर, वह सातवां आसमान? हे, अरे, अबे, ओ करुणानिधान।'

इसके अलावा वीरेन डंगवाल ने 'पीटी ऊषा', 'इंद्र', 'पपीता', 'हाथी', 'समोसे', 'अपना घर', 'मंगलेश डबराल की चिट्ठी' आदि कविताओं का पाठ किया. कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार गिरिराज किशोर ने की थी. उन्होंने कहा कि साहित्य संवेदनाओं से अलग हो रहा है. युवा पीढ़ी साहित्य से कट रही है. इसके पहले प्रबंध समिति के मंत्री वीरेंद्र जीत सिंह, प्राचार्य डॉ एसके सिंह, हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ सुधा दीक्षित ने विचार व्यक्त किए.


AddThis