संडे से पढ़िए, नया उपन्यास, वे जो हारे हुए

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: साफ सुथरी राजनीति और समाज का सपना देखने वाले तमाम-तमाम लोगों के नाम : भारतीय राजनीति और समाज में हो रही भारी टूट-फूट और उथल-पुथल की आह, अकुलाहट और इस की आंच का तापमान भर नहीं है, वे जो हारे हुए। ज़िंदगी की जद्दोजहद का, जिजीविषा और उसकी ललक का आकाश भी है। मूल्यों का अवमूल्यन, सिद्धांतों का तिरोहित हो जाना, इन का अंतर्द्वंद्व और इस मंथन में हारते जा रहे लोगों के त्रास का अंतहीन कंट्रास्ट और उन का वनवास भी है।

जातिवाद का ज़हर, सांप्रदायिकता का सन्निपात और मुनष्यता का क्षरण वे जो हारे हुए में अपने पूरे कसैलेपन के साथ पूरे कैनवस पर दर्ज है। शमशेर के एक शेर में जो कहें कि, ‘कैसे-कैसे लोग ऐसे-वैसे हो गए, ऐसे-वैसे लोग कैसे-कैसे हो गए!’ वे जो हारे हुए में इस का ही अक्स है, इसकी ही पड़ताल है, इसका ही पता है, इसकी ही कथा है। आनंद छात्र जीवन में राजनीति का जो ककहरा पढ़ता है, साफ सुथरी राजनीति का ककहरा, यही ककहरा बाद के दिनों में जातीयता, सांप्रदायिकता और माफियाओं की गिऱत में घिरी राजनीति के घटाटोप में ध्वस्त हो जाता है, विलुप्त हो जाता है। जब जब सिर उठाया/चौखट से टकराया में न्यस्त हो जाता है।

राजनीतिक दलों के प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में तब्दील होते जाने से वह उकता कर राजनीति की मुख्य धारा से कट जाता है। ऐसे जैसे किसी छिछली नदी के बीच कोई छोटा सा टापू। वह नौकरी करने को अभिशप्त हो जाता है। पर साफ सुथरी राजनीति का उस का सपना उसे लगातार जगाए रखता है। जीवन में, नौकरी में वह यदा-कदा समझौते करता रहता है। पर राजनीति में समझौते से उस की कुट्टी है। एक जगह वह कहता भी है कि नौकरी भले अपने मनकी न करूं पर राजनीति तो अपने मन की ही करूंगा। मुनव्वर, सादिया, माथुर, सुखई और क़ासिम के अपने तनाव, संत्रास और सवाल हैं। महंत, मैडम, माफ़िया तिवारी और जमाल जैसों ने कैसे तो समूची राजनीति और समाज को जकड़ रखा है, डंस रखा है; इस का ताप और भाष्य भी अपने पूरे पन में वे जो हारे हुए में बांचा जा सकता है।

गांव की ज़मीनी राजनीति का संस्पर्श भी वे जो हारे हुए में खूब उपस्थित है। अपने ठेठ और ठाट दोनों में। समाज और राजनीति की जो गिनती-पहाड़ा वे जो हारे हुए में उपस्थित है, वह किसी भी ककहरे को, उस की कसक को मलिन और शून्य कर कैसे उसे पराजित भी कर देती है, यह देखना, बांचना और इसे भुगतना वे जो हारे हुए को एक नया अर्थ देता है, एक नई खिड़की, एक नई आंच देता है। एक नया परवाज़ है यह, और आगाज़ भी।

आपका

दयानंद पांडेयदयानंद पांडेय

लेखक

उपन्यास 'वे जो हारे हुए'


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