ह्वेन आई टाक तो आइयै टाक, ह्वेन यू टाक तो यूवै टाक! बट डोंट टाक इन सेंटर-सेंटर

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दयानंद पांडेय: उपन्यास-  ''वे जो हारे हुए'' : भाग (1) : रात वह सो गया था कि मोबाईल की घंटी बजी। एक बार की घंटी वह आलस में टाल गया। पर जब दुबारा बजी तो रज़ाई में से निकल कर उठना पड़ा। दूसरी तरफ़ से सादिया थी। बोली, ‘आनंद जी मैं सादिया बोल रही हूं।’

‘कहां से?
‘यहीं आप के लखनऊ से।’
‘कब आई?
‘तीन दिन से हूं।’
‘और अब बता रही हो?’ वह ताना देते हुए बोला, ‘वह भी इतनी रात को?’
‘क्या करती? टाईम ही नहीं मिला।’
‘कहां ठहरी हो?’
‘ठहरी क्या मेडिकल कालेज में हूं।’
‘क्यों ख़ैरियत तो है?’
‘कहां ख़ैरियत है?’ कहती हुई वह रोने लगी। बोली, ‘बिटिया बुरी तरह जल गई है। उसी को ले कर आई हूं।’
‘मुनव्वर भाई कहां हैं?’
‘वह भी आए हैं। साथ ही हैं।’
‘बात करवाओ।’
‘अभी डाक्टर के पास गए हैं।’
‘अच्छा जब आएं तो बात करवाना।’
‘बात क्या करवाऊं - आप आ ही जाते तो अच्छा होता।’ बोलते-बोलते वह रोने लगी, ‘समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं?’
‘अभी क्या टाईम हो रहा है?’ वह अंधेरे में दीवार घड़ी को निहारता हुआ बोला।
‘रात के एक बजने वाले हैं।’ कहते हुए वह बोली, ‘लीजिए ये भी आ गए हैं। इन से बात करिए।’
‘दो।’
‘हां, आनंद जी!’
‘मुनव्वर भाई आप तीन दिन से आए हुए हैं, और अब ख़बर मिल रही है।’
‘यह सब गिला शिकवा बाद में भी कर लेंगे। आप अभी आ जाते तो बहुत अच्छा होता।’
‘रात के एक बजे आ कर क्या कर लूंगा। कोई डाक्टर वग़ैरह तो मिलने से रहा।’
‘क्यों मिलने से रहा? आप तो घर से उठा कर, जगा कर भी डाक्टरों को बुला सकते हैं।’ वह ज़रा रुके और बोले, ‘मैं आप का पावर जानता हूं।’
‘जब पावर था, तब था। अब ऐसा कुछ भी नहीं है मुनव्वर भाई!’ वह बोला, ‘पर घबराइए नहीं मैं सुबह-सुबह आता हूं।’ रज़ाई में दुबकता हुआ वह बोला।
‘पर यहां तो आनंद भाई बिटिया की जान पर बन आई है। सांस रह-रह कर फंस जा रही है।’
‘डाक्टर प्राब्लम क्या बता रहे हैं?’
‘बेटी है तो जली हुई पर वहां अपने शहर के नर्सिंग होम वाले प्लेटलेट की कमी बता कर यहां के मेडिकल कालेज रेफ़र किए थे, और यहां डाक्टर बर्न यूनिट में भर्ती कर के बर्न का इलाज कर रहे हैं, प्लेटलेट की बात ही नहीं सुन रहे।’
‘अच्छा वहां कोई जूनियर डाक्टर जो ड्यूटी पर हो उस से बात करवाइए।’
‘देखिए कोशिश करता हूं।’ वह ज़रा बिदकते हुए बोले, ‘यहां कोई किसी की सुनता तो है नहीं। फिर भी।’ कह कर वह बोले, ‘काटिएगा नहीं, अभी डाक्टर से बात कराता हूं, और लीजिए एक डाक्टर साहब यहीं आ गई हैं, बात करिए।’
‘कराइए।’
‘डाक्टर साहब ये हमारे दोस्त हैं आनंद जी, ज़रा बात कर लीजिए।’ उधर से मुनव्वर भाई ने डाक्टर से रिक्वेस्ट की।
‘कौन हैं ये आनंद जी।’ डाक्टर ने पूछा।
‘बड़े-बड़े मिनिस्टरों से इनकी दोस्ती रही है, उठना-बैठना है।’ मुनव्वर भाई गिड़गिड़ाए पर ज़रा ठसक से।
‘ख़ुद तो मिनिस्टर नहीं हैं न?’
‘नहीं।’
‘तो फिर?’ डाक्टर ज़रा रुकी और बोली, ‘पहले पेशेन्ट देख लूं, फिर बात करती हूं।’
‘अच्छा-अच्छा!’ मुनव्वर भाई बोले,‘आनंद जी ज़रा रुकिए डाक्टर साहब ज़रा बेटी को देख लें फिर बात करेंगी। आप होल्ड कीजिए।’
‘ठीक बात है।’
थोड़ी देर बाद डाक्टर फ़ोन पर आई तो आनंद ने पूछा, ‘डाक्टर साहब बेटी की तबीयत कैसी है? आखि़र प्राब्लम क्या है?’
‘देखिए सिचुएशन तो बड़ी क्रिटिकल है। फिर भी हम कोशिश कर रहे हैं।’
‘पर यह बताइए कि जब उस की प्लेटलेट कम है तो उसे मेडिकल वार्ड की जगह बर्न यूनिट में क्यों रखे हुई हैं? प्लेटलेट क्यों नहीं चढ़ा रही हैं?’
‘बात प्लेटलेट की नहीं बर्न की है।’ डाक्टर बोलीं, ‘आप समझदार आदमी हो कर भी कैसी बात कर रहे हैं?’
‘मुनव्वर भाई तो कह रहे थे कि प्लेटलेट की कमी के कारण ही नर्सिंग होम वालों ने यहां रेफ़र किया है।’
‘नर्सिंग होम वालों ने तो अपनी बला टाली है और केस को बिगाड़ दिया है।’ डाक्टर बोली, ‘छोटे बच्चों में प्लेटलेट की वैसे भी कमी रहती है, और चलिए प्लेटलेट की प्राब्लम है भी तो बाद में देख लेंगे। अभी तो सोचिए कि बच्ची को बर्न से कैसे बचाएं। सिक्सटी-सेवेंटी परसेंट जली हुई है।’
‘सिक्सटी-सेवेंटी परसेंट जली हुई है?’ आनंद हकबका गया।
‘और तो?’
‘तो फिर कहां बच पाएगी?’ वह डाक्टर से बोला, ‘चांसेज कितना है?’
‘मैं कुछ नहीं कह सकती। बट आई ट्राई माई बेस्ट।’
‘अच्छी बात है डाक्टर साहब। फ़ोन मुनव्वर भाई को दीजिए।’
‘हां, आनंद जी।’ दूसरी ओर से मुनव्वर भाई बोले।
‘देखिए भाई डाक्टर तो ठीक कह रही हैं। वह जैसा इलाज कर रही हैं, करने दीजिए।’
‘ठीक है आनंद जी।’
‘चलिए सुबह आता हूं।’ वह बोला, ‘बेड नंबर, वार्ड नंबर बता दीजिए।’
वार्ड और बेड नंबर बताते हुए मुनव्वर भाई बोले, ‘अगर दस-बीस हज़ार रुपयों की ज़रूरत पड़ी, तो वह भी तो करवा देंगे न आनंद जी!’ वह बोले, ‘भई चुटकियों में पैसे ख़त्म हुए जा रहे हैं।’
‘नहीं-नहीं आप निश्चिंत रहिए जितने भी पैसे की ज़रूरत पड़ेगी, इंतज़ाम करवा दूंगा। आप बस बेटी का इलाज करवाइए।’
‘ठीक है, आनंद जी, करवा ज़रूर दीजिएगा।’
‘फ़ोन ज़रा उस को भी दीजिए।’
‘किसे? सादिया को?’
‘हां।’
‘लीजिए।’
‘हां, आनंद जी!’
‘घबराना बिलकुल नहीं, मैं तुम्हारे साथ हूं। पूरी तरह।’
‘अच्छी बात है।’
फ़ोन काट कर जब वह सोने लगा तो बीवी तंज़ करती हुई बुदबुदाई, ‘कौन सी माशूक़ा कष्ट में आ गई?’
‘क्या हरदम बेवकू़फी की बात करती रहती हो?’
‘क्यों सच बात चुभ गई?’
‘जानती हो कौन थी?
‘कौन थी?’ बुदबुदाती हुई वह रज़ाई में ही कुनमुनाई!
‘सादिया थी।’
‘तो क्या! बचपन की ही सही, थी तो!’
‘तुम नहीं सुधर सकती।’
‘पहले ख़ुद तो सुधर जाइए।’
‘उ़फ़।’ कह कर वह रज़ाई में करवट बदल कर सो गया।

सादिया!

उसकी बचपन की दोस्त! अबोध! उस के अब्बा रेलवे में थे। हम दोनों एक ही क्लास, एक ही स्कूल में थे। एक ही मुहल्ले में रहना तीसरा संयोग था। स्कूल में भी साथ जाते थे। एक्खट-दुक्खट, आइस-पाइस खेलते, झगड़ते-लड़ते हम लोग बड़े हुए थे। हम भाई-बहन भी नहीं बने, न ही आशिक़-माशूक़। बस एक सामान्य सी दोस्ती हमारी उस मुहल्ले में रहते समय तक जारी रही। फिर पिता रिटायर हुए तो पहले मुहल्ला छूटा, फिर शहर छूटा और सादिया भी छूट गई। न उसने हमें याद किया न हमने उसे।

मुनव्वर भाई के पिता भी रेलवे में काम करते थे और उसी मुहल्ले में रहते थे जहां मेरे और सादिया के पिता रहते थे। मुनव्वर भाई उम्र में न सिर्फ़ मुझ से बड़े थे बल्कि बड़प्पन भी दिखाते थे। कोई आठ-दस बरस बड़े थे वह लेकिन बातचीत में बहस में, वह कभी भी अपने को बड़ा नहीं जताते। बाद के दिनों में जब वह कालेज में आया तो समाजवादियों की संगत में आ गया और इस बहाने छात्र संघ और छात्र राजनीति में भी। उस के कालेज में छात्र संघ तब नहीं था। युवा समाजवादियों ने ताव दिला-दिला कर उस के कालेज में छात्र संघ के बीज बो दिए। विश्वविद्यालय छात्र संघ के एक पूर्व अध्यक्ष ने इस बीज को आग में बदला और इस आग में घी भी ख़ूब डाला। इतना कि छात्र संघ का आंदोलन धधक उठा। आंनद ने अगुवाई की और जब देखा कि प्रिंसिपल और मैनेजमेंट किसी भी हाल में छात्र संघ नहीं बनने देंगे तो गांधी जी के उपवास का रास्ता चुना। लोगों ने मना भी किया कि अभी इतनी जल्दबाज़ी ठीक नहीं है। अभी बातचीत और ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद तक ही लड़ाई रखी जाए।

‘ज़िंदाबाद मुर्दाबाद तक तो ठीक है पर बातचीत मेरी लिए बहुत मुश्किल है।’ एक दिन सलाहकारों से आजिज़ आ कर आनंद खीझ कर बोला। तो विश्वविद्यालय छात्र संघ के एक नेता ने आनंद से पूछा भी कि, ‘आख़िर बातचीत में दिक्क़त क्या है? क्या प्रिंसिपल अंगरेज़ी में बात करता है।’
‘नहीं तो।’ वह बोला, ‘और जो प्रिंसिपल साहब अंगरेज़ी में बोलें भी तो क्या दिक्क़त है?’
‘दिक्क़त यह है कि तुम अंगरेज़ी बोल नहीं पाओगे। लोहियावादियों को वैसे भी अंगरेज़ी नहीं आती। पर इस से छुट्टी पाने की भी एक टेक्नीक है मेरे पास?’
‘नहीं यह बात नहीं है।’ आनंद बोला।
‘पर वह अंगरेज़ी से छुट्टी पाने की टेक्नीक क्या है?’ एक दूसरे छात्र नेता ने पूछा।
‘कुछ नहीं अंगरेज़ी का जवाब भ्रष्ट अंगरेज़ी में बल्कि हिंदियाइट अंगरेज़ी में दो साले की बोलती बंद हो जाएगी।’
‘कैसे भाई साहब कैसे?’ एक छात्र अकुला कर बैठने का एंगिल बदलते हुए बोला।
‘देखो अभी ताजा़-ताजा़ सुना है।’ विश्वविद्यालय नेता बोला, ‘थोड़ी बहुत मिलावट भले हो इस बात में पर है बिलकुल सच।’

‘क्या?’ वह छात्र थोड़ा और अकुलाया।

‘चुप बे बकलोल।’ विश्वविद्यालय नेता बोला, ‘बोलने भी दोगे।’ फिर ज़रा रुका और जब देखा कि पूरी सभा शांत है तो बोलना शुरू किया, ‘क़िस्सा बी.एच.यू. का है। वहां छात्र संघ का अध्यक्ष अंगरेज़ी नहीं जानता था। चुनाव जीतने के बाद वह जब भी कोई मेमोरेंडम ले कर वाइस चांसलर के पास जाता। वाइस चांसलर उसे देख कर पहले तो मुसकुराता फिर कहता, ‘यस मिस्टर प्रेसिडेंट।’ कह कर वह अंगरेज़ी में ही कुछ गिटपिटाता और यह तुरंत वापस आ जाता। अपनी कोई बात कहे बिना, कोई मेमोरेडंम दिए बिना अंगरेज़ी की हीनता में मार खा कर लौट आता पांच मिनट में। बाहर खड़े छात्रों की ओर भी नहीं देखता और आंख चुरा कर भाग लेता। अंततः कुछ लवंडों ने रिसर्च की कि आखि़र मामला क्या है? रिसर्च में पता चला कि अपना अध्यक्ष अंगरेज़ी का जूता खा कर भाग आता है। फिर अध्यक्ष को अंगरेज़ी में बात करने की डट कर प्रैक्टिस कराई गई। प्रैक्टिस क्या बिलकुल रट्टा लगवा दिया गया। लेकिन बेचारा अध्यक्ष हिंदी मीडियम का होनहार था जा कर वहां लथड़ गया। पर ऐसा लथड़ा कि वाइस चांसलर की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई।’

‘क्या गाली वाली बक दी?’

‘गाली?’ पान की पीक थूकते हुए विश्वविद्यालय नेता बोला, ‘इससे भी बड़ा काम कर दिया। गाली वाली क्या चीज़ होती है?’

‘तो क्या पीट दिया?’ एक दूसरा छात्र उकता कर बोला।

‘पीट दिया?’ विश्वविद्यालय नेता बोला, ‘अरे इस से भी बड़ा काम कर दिया।’

‘गोली मार दी?’

‘नहीं भाई इस से भी बड़ा काम किया।’ वह बिना रुके बोला, ‘हुआ यह कि जब अपना अध्यक्ष पहुंचा वाइस चांसलर के पास तो रवायत के अनुसार वाइस चांसलर मुसकुराते हुए ज्यों स्टार्ट हुआ कि, ‘यस मिस्टर प्रेसिडेंट।’ तो अपना अध्यक्ष भी फुल टास में बोल पड़ा, ‘यस मिस्टर वाइस चांसलर!’ वाइस चांसलर ने कुछ टोका टाकी की तो अपने अध्यक्ष ने मेज़ पीटते हुए कहा, ‘नो मिस्टर वाइस चांसलर! ह्वेन आई टाक तो आइयै टाक, ह्वेन यू टाक तो यूवै टाक! बट डोंट टाक इन सेंटर-सेंटर!’ और फिर मेज़ पीटा। अध्यक्ष ने इधर मेज़ पीटा, उधर वाइस चांसलर ने अपना माथा। फिर अपना अध्यक्ष हिंदियाइट अंगरेज़ी बोलता रहा, वाइस चांसलर सुनता रहा। जो अध्यक्ष  दो मिनट में वाइस चांसलर के यहां से भाग निकलता था, एक घंटे बाद बाहर आया। और बाहर तक वाइस चांसलर सी ऑफ़ करने आया। फिर तो छात्र एकता ज़िंदाबाद से धरती हिल गई।’ वह रुका नहीं, बोलता रहा, ‘तो आनंद अगर कहो तो तुम्हें भी अंगरेज़ी का रट्टा लगवाने का इंतज़ाम किया जाए।’ वह बोला, ‘लगे हाथ दो काम हो जाएंगे। अंगरेज़ी की भी ऐसी तैसी कर देंगे और छात्र संघ ज़िंदाबाद भी।’

‘नहीं भाई साहब बात अंगरेज़ी की नहीं है।’

‘तब फिर?’

‘असल में जब हम लोग जाते हैं तो प्रिंसिपल साहब इतनी आत्मीयता से बेटा-बेटा कह कर बात करने लगते हैं कि सारी बात धरी की धरी रह जाती है। और जो एकाध बात याद आती भी है तो वह कहते हैं कि अच्छा विचार करेंगे। बस बात ख़त्म हो जाती है।’
‘बस!’
‘आप को बस लगता है। यहां ज्यों वह बेटा कहते हैं प्राण निकल जाता है।’
‘क्यों?’
‘बेटा कहते ही पिता याद आ जाते हैं। संस्कार बाहर आ जाते हैं। श्रद्धा उपज जाती है और जैसे मैं जलता हुआ जाता हूं वैसे ही पिघलता हुआ बाहर आ जाता हूंू। बात व्यक्तिगत हो जाती है। जब कि छात्र संघ कोई व्यक्तिगत मसला नहीं है, सामूहिक है और हमारा अधिकार भी।’ आनंद बोला, ‘इसी लिए मैं उपवास की बात करता हूं कि तब प्रशासन भी इनवाल्व होगा, बात एक कालेज से निकल कर समूचे शहर में पहुंचेगी, अख़बारों में भी बात आएगी और तब शायद बात प्रिंसिपल के कमरे में अकेले नहीं सब के सामने होगी, सब के साथ होगी। तो शायद बात बन जाएगी।’
‘हां, यह भी ठीक है।’
‘मैं यह भी जानता हूं कि एक दो दिन के उपवास से भी यह बात नहीं बनने वाली है। न ही एक दो छात्रों के उपवास से यह बात बनेेगी।’
‘तो क्या आमरण अनशन का इरादा है?’
‘बिलकुल।’
‘नहीं यह ठीक नहीं होगा।’
‘क्यों?’
‘दो कारणों से।’ विश्वविद्यालय नेता बोला, ‘एक तो तुम लोग सभी अभी बालिग़ नहीं हो सो दूसरे, तीसरे दिन ही पुलिस घसीट ले जाएगी और जो पुलिस से बच भी गए ख़ुदा न ख़ास्ता तो दो दिन से ज़्यादा खाए पिए बिना रह नहीं पाओगे। और कहीं जो तबीयत बिगड़-विगड़ गई तो आंदोलन टूट जाएगा।’
‘तब फिर?’
‘फिर क्या कालेज प्रशासन को एक मांग पत्र दे कर ह़ते भर में मांग पूरी करने को कहा जाए और मांग पूरी न होने पर ह़ते भर बाद क्रमिक अनशन की भी नोटिस दी जाए।’
सब ने इस पर सहमति जताई। सात दिन के लिए चार-चार छात्रों के क्रमिक अनशन के लिए जत्था भी बना दिया गया। कालेज प्रशासन को लगा कि लवंडे गीदड़ भभकी दे रहे हैं। मांग मानना तो दूर उस पर विचार भी नहीं किया। नतीजा सामने था। क्रमिक अनशन शुरू हो गया। आनंद पहले ही जत्थे में था। सुबह खाना खा कर माला वाला पहन कर चार छात्र बैठ गए - क्रमिक अनशन पर। पूरे कालेज में अफ़रा-तफ़री थी। एल.आई.यू. वालों ने भी अनशनधारियों के तख़ते के बगल में अपनी कुर्सियां लगा लीं। डाक्टर आए चेकअप कर गए। रह-रह कर छात्र एकता जिं़दाबाद गूंज उठता। जब कोई छात्र नेता आता छात्र एकता ज़िंदाबाद, इंक़लाब ज़िंदाबाद से जैसे धरती हिल जाती, आकाश गूंज जाता। प्रिंसिपल विरोधी तथा मैनेजमेंट से खार खाए कुछ गुरुजनों ने भी छात्रों के इस क्रमिक अनशन की मांग को मौन-मुखर मिश्रित समर्थन दे रखा था।

दिन जोश ख़रोश और ज़िंदाबाद में गुज़रा। शाम होते-होते उबाल ठंडा होने लगा। छात्रों की दर्शक दीर्घा वाली भीड़ छंटी, जिंदाबाद-ज़िंदाबाद का जुनून भी टूटा।

रात हुई तो भूख लग आई ज़ोरों की। लेकिन नींबू पानी, ग्लूकोज़ पानी से ही काम चलाया गया। एक साथी फिर भी नहीं माना। उस के एक साथी ने समोसा, इमरती उस के मसनद के नीचे ला कर रख दिया, और उसने चद्दर ओढ़ कर लेट कर खा लिया चोरी-चोरी।

आनंद बहुत नाराज़ हुआ। पर भीतर-भीतर। ताकि बात बाहर न जाने पाए। विश्वविद्यालय नेता ने उसे समझाया भी कि ऐसे बात-बात पर जो रिएक्ट करोगे तो राजनीति नहीं कर पाओगे। राजनीति में कंप्रोमाइज़ भी एक शब्द है। यह जान लो, अभी से। पर आनंद तब इस बात को, इस बात के दूर तक जाने के अर्थ को नहीं समझ पाया। पर आंदोलन को धक्का न पहुंचे कालेज मैनेजमेन्ट इसे मुद्दा न बना ले सो भीतर-भीतर धधकता हुआ चुप रहा, और गांधी के साधन की पवित्रता और साध्य के मर्म को परिभाषित करता रहा। एक छात्र ने उकता कर उसे उस का मसनद दिखाते हुए कहा भी कि, ‘जैसे उस लड़के ने मसनद के नीचे रख कर इमरती समोसा खा लिया वह भी वैसे ही कुछ खा पी ले तो पेट की आग शांत होने के साथ गुस्सा भी शांत हो जाएगा। आनंद फिर भी नहीं माना तो उस नेता ने कहा, ‘तो फिर अपने सारे सिद्धांत ही उसी मसनद के नीचे रख कर उन्हें सुला दो। क्यों कि सिद्धांत की राजनीति कुछ और है और व्यवहार की राजनीति कुछ और।’

आनंद फिर भी नहीं माना और रात बड़ी देर तक कुढ़ता रहा। सुबह उठा तो भूख फिर ज़ोर मार रही थी। पर अख़बार में छपी फ़ोटो देख कर भूख को उसने दबाया। तब तक कुछ लोगों की आमद बढ़ गई। इसी आमद में उस लड़के ने फिर दो राउंड समोसा इमरती चद्दर ओढ़ कर खाया-मसनद के नीचे से। इस बार उस के साथ के एक दूसरे अनशनधारी ने भी चद्दर ओढ़ कर मसनद के नीचे से समोसा इमरती उड़ाया। आनंद ने उसे भी लानतें भेजीं। इसी बीच दिन के दस बज गए। क्रमिक अनशन के लिए दूसरी टीम आ गई थी पर कालेज का प्रबंधन या प्रिसिंपल की ओर से मांगों के माने-जाने या किसी तरह की वार्ता ख़ातिर कोई प्रस्ताव आदि का दूर-दूर तक कोई संकेत, कोई आसार दिखाई नहीं दे रहा था। ख़ैर, विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष ने संतरे का रस पिला कर क्रमिक अनशन पर बैठे पहले जत्थे का अनशन तुड़वाया और साथ ही दूसरे जत्थे को फूल की मालाएं पहना कर बैठा दिया। पहले जत्थे पर बैठे अन्य लड़कों के घरों के लोग टिफ़िन में खाना ले कर हाज़िर थे। लेकिन आनंद के घर के लोगों का कोई पता नहीं था। आनंद को अपने पिता का रुख़ मालूम था, इस लिए इस की उम्मीद भी नहीं थी कि कोई उस के लिए घर से खाना ले कर आएगा भी। तो भी एक लड़के ने उसे खाने पर बुलाया भी कि, ‘आओ साथ खा लेंगे।’ उस के टिफ़िन से खाने की बढ़िया ख़ुशबू भी आ रही थी। पर जाने क्यों वह टाल गया। बोला, ‘घर जा रहा हूंू। नहा धो कर ही खाऊंगा।’ और वह पैदल ही घर चल पड़ा। पैसे थे नहीं कि रिक्शा कर लेता। भूख से छटपटाता पैदल चलता वह आखों में खाना बसाए घर पहुंचा तो वहां तसवीर ही बदली हुई थी। सारा मुहल्ला जैसे उस के लिए सवालों की आग बन कर खड़ा था। तिस पर उम्मीद के विपरीत पिता घर में मिले। मारे क्रोध के वह आफ़िस नहीं गए थे। क्रोध में वह जैसे जल रहे थे, या कहूं कि क्रोध में कांप रहे थे, कहना कुछ कठिन ही था। पर वह क्रोध की ज्वालामुखी में धधकते हुए बोले, ‘अनशन ख़तम हो गया नेता जी?’ पिता व्यंग्य में उसे पहली बार नेता जी बोल रहे थे। इस से पहले वह उसे पाजी, नालायक़ आदि संबोधनों से नवाज़ते रहे थे।

‘जी।’ वह भूख में कांपता हुआ बोला।

‘चलो कालेज में अनशन ख़तम हुआ, अब एक दिन का अनशन घर में भी कर लो।’ कहते हुए वह बड़की अम्मा की ओर मुड़े, ‘ख़बरदार जो इस को कल से पहले खाना दिया।’ पिता ज़रा रुके और बड़की अम्मा से बोले, ‘अगर इसे खाना दिया तो समझो कुत्ते को खाना दिया और तुम ख़ुद कुत्ते का मांस खाओगी।’ यह सुन कर बड़की अम्मा जैसे हिल गईं। लेकिन आनंद पेट में लगी आग के बावजूद संयत रहा। यह भी अद्भुत था कि उधर पिता क्रोध से कांप रहे थे और इधर आनंद भूख से कांप रहा था। बड़की अम्मा जड़वत कांप रही थीं। इस दुर्निवार संयोग की साक्षी एक बिल्ली बनी जो इस क्षण में भी कठोर बनी म्याऊं-म्याऊं कर रही थी। इधर बिल्ली की म्याऊं-म्याऊं से बेपरवाह पिता शुरू थे, ‘अनुशासनहीनता घर में बिलकुल बर्दाश्त नहीं होगी।’ वह जोड़ रहे थे, ‘बिना मुझ से अनुमति लिए इस की हिम्मत कैसे हुई अनशन पर बैठने की। और अनशन पर बैठते ही इतना बड़ा नेता बन गया कि छोटा भाई गया तो उसे पहचाना ही नहीं।’ वह दहाड़ रहे थे, ‘दो दिन खाना नहीं मिलेगा तो सारी नेतागिरी घुस जाएगी। पढ़ना-लिखना एक पैसे का नहीं, नेतागिरी करने चला है। नाक कटा कर रख दी।’ बड़बड़ाते, दहाड़ते ही पिता ने कपड़े पहने और साइकिल निकाल कर चले गए।

पिता के जाते ही बड़की अम्मा ने उसे बाहों में भर लिया। लगीं रोने फूट-फूट कर, रोते-रोते ही बोलीं, ‘वह चाहे जो कहें, तुम चलो खा लो।’ कह कर वह खाना परोसने लगीं। पर आनंद ने बड़की अम्मा के पैर छुए। कहा कि, ‘बड़की अम्मा माफ़ करो। अब खाना तो नहीं ही खाऊंगा, और अब इस घर में भी नहीं रहूंगा।’ भूख से उस की अंतड़ियां फटी जा रही थीं। पैर कांप रहे थे, लगता था जैसे वह अभी गिर पडे़गा।

‘इतना कठोर मत बनो बेटा।’ कह कर बड़की अम्मा ने उसे लपक कर फिर बांहों में भर लिया। बोलीं, ‘उन को नहीं बताऊंगी कि तुम को खाना दिया है। खा ले मेरे लाल!’ पुचकारते हुए बड़की अम्मा ने उस के मंुह में निवाला डालने की कोशिश की।

‘बड़की अम्मा नहीं।’ कह कर आनंद ने बड़की अम्मा की ममता में नत होते हुए फिर से पांव छुए और घर से बाहर निकल गया।

पीछे रह गया घर और बड़की अम्मा की गुहार, ‘अरे रुको बेटा, सुनो तो बाबू। मेरे लाल। मोरे भइया!’

भूख से कांपते पांव आगे नहीं बढ़ रहे थे। बड़ी मुश्किल से वह मुहल्ले से बाहर आया। बाहर आते ही उस ने एक हैंडपंप देखा। जा कर भर पेट पानी पिया। पैसे थे नहीं जेब में। तो क्या भला रिक्शा करता या क्या कहीं खाना खाता। किसी तरह ख़ुद को ढकेलते हुए कालेज पहुंचा। दोस्तों ने देखते ही ताड़ लिया। तुरंत चाय पिलाई। विश्वविद्यालय के एक छात्र नेता ने उस के कंधे पर हाथ रखा और एक किनारे ले जा कर पूछा, ‘घर में सब ठीक-ठाक तो है?’
‘कहां?’ कहते हुए आनंद की घिघ्घी बंध गई। वह रो पड़ा। ऐसे जैसे कोई नदी बांध तोड़ गई हो।
‘अइसे तो राजनीति नहीं हो पाएगी।’ वह बोला, ‘कम से कम औरतों की तरह रोने से नहीं ही।’
‘तो क्या करें?’
‘दिल कड़ा करो। और धीरज से काम लो।’ वह बोला, ‘पहले चलो कुछ खा पी लो। बिना खाए पिए चेहरा ऐसे लग रहा है। जैसे कितने जूते खाए हो। कुछ खा पी लोगे तो बुद्धि भी खुलेगी।’
‘मेरे पास पैसे नहीं हैं।’
‘यह बताने की भी ज़रूरत है?’ कह कर वह पास के ही एक छोटे से सस्ते से होटल में उसे ले गया। रोटी दाल और प्याज खा कर जब वह निकला तो लगा कि पिता के ख़िलाफ उसने पहला क़िला जीत लिया।
अब उस की लड़ाई दोतरफ़ा थी।
कालेज प्रबंधन और दूसरे, पिता से।
कालेज प्रबंधन से लड़ना आसान था। पर पिता से मुश्किल। वह पिता जिन की छाया मात्र से वह संकोच से भर जाता था। पिं्रसिपल बस इतना ही उस से कहते, ‘हां बेटा।’ इतने भर ही से वह संस्कारों में सिमट जाता। श्रद्धा से भर जाता। जलता हुआ वह पिघल जाता। और अब वह उसी पिता के ख़िलाफ बिगुल बजा कर खड़ा था। जलता हुआ नहीं, बल्कि ज्वालामुखी बन कर।

यह ज्वालामुखी उसे इस क़दर दहकाए हुए था कि वह रात को भी घर नहीं गया। बड़की अम्मा की याद में वह कई बार छटपटाया पर घर फिर भी नहीं गया। रात उसने टेलीफ़ोन एक्सचेंज के वेटिंग रूम में गुज़ारी। वहां आनंद की ही तरह घर से भागे हुए मिले कामरेड शुक्ला। शुक्ला एक सरकारी द़तर में क्लर्क थे। कम्युनिस्टों की सोहबत में थे। उन के चाचा को यह हरगिज़ पसंद नहीं था। चाचा यूनिवर्सिटी में लेक्चरर थे। चाचा चाहते थे कि कामरेड शुक्ला कामरेडगिरी छोड़ कर घर परिवार के पिंजरे में जैसे तमाम लोग रहते हैं, रहें। पर कामरेड शुक्ला थे कि यह पिंजरा बार-बार तोड़ कर बाहर आ जाते थे। कामरेड शुक्ला शादीशुदा थे, पत्नी गांव पर रहती थी। दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे। पर यह गृहस्थी उन्हें रास नहीं आती। लेकिन मार्क्स और माओ-त्से-तुंग की किताबों में वह भटकते फिरते। आधी से अधिक तनख़्वाह किताबों और कामरेडों में फूंक डालते। एक क्लर्क की तनख़्वाह वैसे भी बहुत कम थी। यह क्लर्की भी उन के चाचा ने ही कह सुन कर दिलवाई थी। सो वह पिंजरे में उन्हें डाल कर रखना चाहते थे। कामरेड शुक्ला भी उस दिन घर से भाग कर आए थे। आदी थे। सो उन्हें यह तड़ते देर नहीं लगी कि आनंद भी घर से भाग कर आया है। आनंद तब टीन एज था और कामरेड शुक्ला दो बच्चों के पिता। परिचय के बाद कामरेड शुक्ला ने पूछा, ‘कुछ खाना वाना खाया है कि खाएंगे?’
‘पैसा नहीं है।’

‘पैसा तो बहुत मेरे पास भी नहीं है लेकिन पास में एक होटल है, वहां मेरा खाता चलता है। चलिए वहीं कुछ खा-पी लेते हैं।’

दूसरे दिन कामरेड शुक्ला ने एक गवर्मेन्ट कालेज के हास्टल में आनंद के रहने की व्यवस्था करवा दी। कुछ दिनों के लिए। बतौर गेस्ट। हास्टल में मेस भी था। सो खाने की व्यवस्था भी हो गई। बिलकुल घर की तरह खाना। हास्टल के साथियों में जो स्पष्ट है कि सभी अपरिचित थे आनंद के लिए अद्भुत सहानुभूति थी। सम्मानजनक सहानुभूति। गवर्मेन्ट कालेज होने के नाते यहां अनुशासन भी कड़ा था और खुले आम लफंगई नहीं थी। मेस में खाने के लिए हर रोज़ अलग-अलग लड़कों का गेस्ट बनना पड़ता था उसे। और यह काम रसोइया ने ख़ुद तय कर रखा था। बस शर्त यह थी कि खाने का भुगतान महीने के आख़िर में हो जाना चाहिए। कामरेड शुक्ला ने तय किया कि इस के लिए पढ़ाई के साथ-साथ कोई काम भी शुरू करना चाहिए। उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि जब तक कोई काम नहीं बनता तब तक खाने का भुगतान वह करेंगे। काम कई देखे आनंद ने। पर कोई तकनीकी काम उसे मालूम था नहीं। घरेलू नौकर का काम उसे मंज़ूर नहीं था। काम की तलाश में ही उसे कुर्सी बिनने का काम भी बताया गया। पर पहले कुर्सी बिनना सीखना था उसे। एक कामरेड परवेज़ विश्वविद्यालय में एम.ए. कर रहे थे, रोज़ तीन चार कुर्सियां बिन डालते थे वह। घर पर ही कुर्सियां मंगवा लेते थे वह। उन के साथी कई बार उन्हें चिढ़ाते भी कि,‘बेटा क्यों नेत्रहीनों के पेट पर लात मार रहे हो। उन की रोज़ी छीन रहे हो।’ पर कामरेड परवेज़ बेपरवाह हो कर कहते, ‘काम कर रहा हूं, चोरी मक्कारी नहीं।’ एक जगह खाना बनाने का भी काम करने की बात हुई। अजीब द्वंद्व चल रहा था आनंद के जीवन में। किसी ने एक होटल में प्लेट धोने का काम बताया। इन्हीं सब उधेड़बुन में वह लगा था कि एक दिन रास्ते में मुनव्वर भाई मिल गए। पूछा कि, ‘जब से अख़बार में फोटो छपी तब से आप जनाब गुल ही हो गए।’ वह बोले, ‘इतने बड़े लीडर तो नहीं हो गए आप कि अब मुहल्ले के चौराहे से भी तौबा कर लें।’
‘अरे नहीं, मुनव्वर भाई, बात यह नहीं है।’
‘फिर?’
‘बात यह है कि मैं ने वह मुहल्ला ही छोड़ दिया है।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘मुहल्ला क्या घर ही छोड़ दिया है।’
‘तो नेतागिरी भारी पड़ गई?’
‘नेतागिरी नहीं, पिता की हिटलरशाही भारी पड़ गई मुनव्वर भाई।’ कह कर आनंद ने पूरी तफ़सील से अपना दुख, दिक्क़त और दुविधा बता दी। और कहा कि, ‘फ़िलहाल तो फ़ौरी तौर पर मुझे कोई न कोई काम चाहिए। भोजन बनाने, कुर्सी बीनने या प्लेट धोने से इतर।’
‘अरे आप पढ़े लिखे आदमी हैं, ब्रिलिएंट स्टूडेंट हैं, यह सब काम करने की ज़रूरत भी क्या है?’
‘तो करें क्या?’ वह बोला, ‘हिटलर पिता के आगे घुटने टेक दें?’
‘नहीं, बिलकुल नहीं।’
‘फिर?’
‘ट्यूशन करिए।’
‘कौन देगा ट्यूशन भला मुझ को?’
‘देगा कौन यह तो मैं नहीं जानता। पर मैं दिलवाऊंगा ट्यूशन आप को यह ज़रूर जानता हूं।’ कह कर उन्हों ने अपने हाथ में लिए अख़बार की एक और तह की और हास्टल के कमरे का नंबर लिखने के लिए पूछते हुए जेब से पेन निकाल लिया। हाथ में कोई एक अख़बार मुनव्वर भाई का स्थाई स्वभाव था। सुबह मिलिए, दोपहर मिलिए, शाम मिलिए मतलब कभी मिलिए मुनव्वर भाई के हाथ में मुड़ा हुआ एक अख़बार ज़रूर मिलेगा। बाद में एक अख़बार के साथ-साथ उन के हाथ में एक डायरी भी आ गई। इस क़दर कि बाद में दोस्तों ने मज़ाक-मज़ाक में उन के नाम मुनव्वर आलम ख़ां की तर्ज़ पर उन का नाम अख़बार डायरी ख़ां रख दिया। हालां कि मुनव्वर भाई को यह नाम हरगिज़ पसंद नहीं था। कभी-कभी वह क्रुद्ध भी हो जाते थे यह नाम सुन कर। तो भी लोग पीठ पीछे लगभग इसी नाम से उन का ज़िक्र करते। कई लोग उन्हें मोनव्वर भाई भी कहते या लिखते तो वह सलीके़ से अगले को अपना नाम लिखवाते, ‘मु लगा कर लिखिए मुनव्वर आलम ख़ां।’

दूसरे दिन ही मुनव्वर भाई ने पांच रुपए, पंद्रह रुपए, बीस रुपए और पचीस रुपए के चार ट्यूशन दिलवा दिए। दो ट्यूशन में दस-दस रुपए एडवांस भी दिलवा दिए। आनंद का संघर्ष अब शुरू हुआ था। चारों ट्यूशन में पैदल चलते-चलते उस की तबीयत हरी हो जाती। रही-सही कसर बच्चे शैतानी और चिल्ल पों से पूरी कर देते। तनाव और थकान से चूर उस की अपनी पढ़ाई पस्त होती जा रही थी। जीवन जटिल हो चला था। पांच रुपए वाला ट्यूशन वह छोड़ना चाह रहा था। पर मुनव्वर भाई की रिक्वेस्टनुमा शर्त थी कि, ‘सारे ट्यूशन छोड़ दीजिएगा पर यह ट्यूशन नहीं।’ दरअसल यह ट्यूशन एक धोबी के बच्चे का था जो निर्बल और गरीब था। मुनव्वर भाई कहते, ‘इस के बच्चे का पढ़ना बहुत ज़रूरी है आनंद जी। यह आप की ज़िम्मेदारी है।’ जब कि दूसरा ट्यूशन एक केवट के बच्चे का था जो दूध बेचता था। उस की दो भैंसें थीं। जिस दिन उस की बीवी जो ख़ूब काली थी अपनी भैंस की जितनी ही, ख़ुश होती और भैंस थोड़ा दूध ज़्यादा दे देती उस दिन वह आनंद को एक गिलास दूध दे देती। आनंद को मलाईदार दूध पीना तो अच्छा लगता पर उस के दूध देने का तरीक़ा नहीं। वह उसे दूध ऐसे देती जैसे भिखारी को भीख दे रही हो। और उसे अम्मा की याद आ जाती। यही दूध उसे अम्मा बड़े मनुहार और मान के साथ देती। लगता जैसे वह उसे दूध नहीं अमृत दे रही हों। मुनव्वर भाई जब कभी मिलते तो वह सारी दिक़्क़तें बताता तो वह हंस कर टाल जाते। बहुत कहने पर वह अपनी तकलीफ़ों का पिटारा खोल बैठते। एक दिन कहने लगे कि आप को उस दूध वाली के दूध देने का तरीक़ा पसंद नहीं आता पर भूख लगी रहती है। सो आप को दूध पीना अच्छा लगता है। वैसे ही मुझे जब अब्बा से पैसा लेना होता है तो उस से भी ज़्यादा बुरा लगता है। एक तो जल्दी वह पैसे देते नहीं, दसियों दिन पीछे पड़े रहो तो एक दिन आधा तीहा देते भी हैं तो ऐसे गोया पैसे बेटे को नहीं किसी कोढ़ी को दे रहे हों। जैसे कोढ़ी के कटोरे में सिक्कों की छन्न की आवाज़ होती है वैसे ही मेरे कलेजे में कांटे सी कठोर आवाज़ होती है। गुपचुप। कोढ़ी के कटोरे की आवाज़ तो आप सुन सकते हैं पर मेरे दिल की आवाज?’ वह जैसे रुआंसे हो जाते।

और आज वही मुनव्वर भाई अपनी बेटी के लिए रुआंसे हो रहे थे। तो वह हिल गया था। और वह पुरानी यादों में उतर गया और उन यादों में भीग गया पर पत्नी की शक भरी बेवक़ूफी की बातों ने उन यादों की तासीर को तंग कर दिया।
बड़ी मुश्किल से वह सो पाया।

सुबह वह ज़रा देर से उठा। उठते ही अख़बार देखना शुरू किया। अख़बार देखते ही वह हिल गया। तमाम ख़बरों के साथ एक ख़बर यह भी थी कि, ‘आज हो सकती है सद्दाम हुसैन को फांसी।’ अख़बार पढ़ना छोड़ कर उसने टी.वी. आन किया। सद्दाम हुसैन को फांसी हो चुकी थी। सारे चैनल सद्दाम हुसैन की फांसी वाली क्लिपिंग से अटे पड़े थे। फांसी के ठीक पहले के दृश्यों में सद्दाम हुसैन के चेहरे पर अजीब निश्चिंतता उसे भीतर तक बेध रही थी। सामने फांसी के लिए जल्लाद खड़े हैं और सद्दाम का चेहरा देख ऐसा लगता था गोया वह किसी सेमिनार में जा रहे हों, फांसी चढ़ने नहीं। यह क्या था? अपनी तानाशाही के प्रति प्रायश्चित या जीवन की ढिंठाई या अमरीकी गुंडागर्दी के ख़िलाफ एक मौन प्रतिरोध। आनंद के लिए तुरंत-तुरंत कुछ भी कह पाना कठिन था। फिर उसने अचानक सोचा कि क्या भगत सिंह भी अपनी फांसी के समय ऐसे ही निश्ंिचत रहे होंगे? फिर उसे लगा कि एक क्रांतिकारी, एक शहीद को एक तानाशाह के साथ खड़ा कर के सोचना या तुलना करना तो अपराध हुआ। ख़ैर, अमरीकी गुंडागर्दी और सद्दाम हुसैन की तानाशाही की कथाओं में गंुथी टी.वी. एंकरों की एक्सपर्ट्स के साथ मिली जुली चर्चाएं और मुश्किल कर रही थीं। कि तभी मुनव्वर भाई का फ़ोन आ गया। वह बोले,‘ आनंद जी आप कहां है?’
‘घबराइए नहीं, मुनव्वर भाई, बस मैं पहुंच रहा हूं। फ़ोन काटते-काटते उसने पूछा, ‘बिटिया कैसी है?’
‘अब क्या बताऊं? कुछ समझ में नहीं आ रहा।’ कह कर मुनव्वर भाई रो पड़े।
‘घबराइए नहीं, बस मैं पहुंच रहा हूं। कह कर उस ने फ़ोन ख़ुद ही काट दिया। और बीवी से पूछा कुछ सब्ज़ी-वब्ज़ी है?’
‘हां है। क्यों?’
‘चार पांच लोगों के लिए जल्दी से पूड़ी सब्ज़ी बना दो। और मेडिकल कालेज चलना हो तो ख़ुद भी फटाफट तैयार हो जाओ।’ कह कर आनंद ख़ुद बाथरूम में घुस गया।
नहा धो कर जब वह निकला तो देखा पत्नी तैयार नहीं थी। तो उस ने पूछा, ‘तुम नहीं चल रही हो?’
‘नहीं, अभी आप हो आइए। मैं बाद में चलूंगी।’
‘ठीक है पूड़ी सब्ज़ी तैयार हो गई?’
‘बस हो रही है।’ पत्नी बोली, ‘जब तक आप कपड़े पहनेंगे तैयार हो जाएगी।’
‘मुझे भी कुछ खिलाओगी?’
‘अभी दूध ले लीजिए। आ कर खाइएगा।’
‘ठीक है, मुनव्वर भाई का खाना पैक करो।’
‘क्यों सादिया का नहीं? क्या वह नहीं खाएगी?’ पत्नी ने जैसे फिर से पिन चुभोया।
‘क्यों सादिया क्यों नहीं खाएगी? अरे, सादिया की मां भी खाएगी, उस का भाई भी खाएगा।’ वह लगभग बिदकते हुए बोला, ‘बस तुम खाना पैक करो।’
जब वह मेडिकल कालेज के लिए निकलने लगा तो सोचा कि एक परिचित डाक्टर को फ़ोन कर दे। ताकि वहां आसानी रहे। एक परिचित डाक्टर से सुबह भी कह चुका था। पहले डाक्टर ने भी हाथ खड़े कर दिए थे और   अब यह दूसरा डाक्टर भी हाथ खड़े कर रहा था, ‘आज तो संडे है भाई साहब! आप जानते ही हैं कि कोई सीनियर डाक्टर संडे को होता ही नहीं है। पूरा मेडिकल कालेज संडे के दिन जूनियर डाक्टरों के हवाले होता है।’
‘जूनियर डाक्टरों नहीं, स्टूडेंटस के हवाले होता है पूरा मेडिकल कालेज और सातों दिन होता है, यह मैं जानता हूं तभी तो आप से कह रहा हूं कि कोई सीनियर डाक्टर न सही, कोई जूनियर डाक्टर ही सही वहां अटेंड कर ले और मेरे दोस्त की बेटी का जीवन बचा ले।’
‘देखिए भाई साहब देखता हूं।’ डाक्टर बोला, ‘आप को मैं जानता हूं हेल्थ सेक्रेट्री या हेल्थ मिनिस्टर से भी कह सकते हैं। कह देंगे तो लाइन लग जाएगी डाक्टरों की।’
‘लाइन नहीं लगवानी है डाक्टर साहब, जान बचानी है।’
‘ठीक है मैं कुछ करता हूं।’
‘थैंक्यू!’ उस ने दुबारा कहा, ‘थैंक्यू डाक्टर साहब!’
वह जब मेडिकल कालेज पहुंचा तो मुनव्वर भाई द्वारा बताए गए वार्ड और बेड पर न वह मिले, न सादिया और न उन की बेटी। मिला मुनव्वर भाई का साला जो रज़ाई ओढ़े सो रहा था। उसने बताया कि, ‘एक बड़े डाक्टर आए थे, वहीं थोड़ी देर पहले ट्रामा सेंटर रेफ़र करवा कर ले गए हैं।’
‘ट्रामा सेंटर में कहां?’
‘अब यह नहीं मालूम।’
आनंद अभी तक कभी ट्रामा सेंटर नहीं गया था। फिर उसने सोचा ट्रामा सेंटर तो घायलों के लिए है। इसी उधेड़बुन में उसने मुनव्वर भाई का मोबाईल मिलाया और लगातार मिलाया लेकिन हर बार स्विच आफ मिला। हार कर वह ख़ुद ही पहुंचा ट्रामा सेंटर। फिर से मुनव्वर भाई का मोबाइल मिलाया। अब की मिल गया। लेकिन उठा नहीं। वह लगातार मिलाता रहा। अंततः मुनव्वर भाई ने मोबाइल उठाया। आनंद ने पूछा कि,‘आप है कहां?’
‘ट्रामा सेंटर में।’
‘ट्रामा सेंटर में तो मैं भी हूं। आप ट्रामा सेंटर में कहां है?’
‘कैम्पस में ही चाय वाली दुकान पर।’
‘चाय की दुकान में किधर?’ पूछते हुए वह चाय की दुकान पर पहुंचा। मुनव्वर भाई और सादिया एक साथ दिख गए।
मुनव्वर भाई लपक कर मिले। बोले, ‘चलिए आप आए तो सही।’ कहते हुए जैसे सारी थकावट और उदासी से उन्हों ने छुट्टी ली।
‘आना तो था ही।’ आनंद झेंप मिटाते हुए बोला, ‘आप का मोबाइल लगातार स्विच आफ़ क्यों चल रहा था?’
‘स्विच आफ़ नहीं था, बैट्री डाउन थी।’ वह चाय की दुकान पर चार्जिंग में लगा मोबाइल दिखाते हुए बोले, ‘अब चार्ज़ कर रहा हूं।’
‘बेटी के पास कौन है।’
‘अम्मी हैं।’ अभी तक चुप-चुप सादिया भर्राई आवाज़ में बोली।
‘बेटी की तबियत कैसी है?’
‘लगता तो पहले से ठीक ही है।’ सादिया बुझी-बुझी बोली।
‘नहीं आप ने जो फ़ोन पर डाक्टर से बात की उस से भी फ़रक पड़ा।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘और आज सुबह तो जैसे पूरा मेडिकल कालेज मेहरबान हो गया। कोई सीनियर डाक्टर भी आया था, और उस के साथ कई डाक्टर। लगता है बेटी अब बच जाएगी।’ वह बोले, ‘इतने डाक्टरों की फ़ौज। ज़रूर आप ने फ़ोन किया होगा। तभी ट्रामा सेंटर भी ले आए सब।’ वह मारे उत्साह के बोले, ‘आप तो हमारे लिए देवदूत बन कर आए हैं। अब कोई फ़िकर नहीं है।’ आनंद को मुनव्वर भाई का यह संतोष देख कर अच्छा लगा। वह बोेला, ‘अच्छा एक मिनट रुकिए मैं अभी आया।’ कह कर वह भाग कर मेन सड़क पर गया जहां उस की कार खड़ी थी। कार में रखा पूड़ी सब्ज़ी का पैकेट ले कर वह वापस चाय की दुकान पर पहुंचा। पैकेट सादिया को देते हुए बोला, ‘पूड़ी सब्ज़ी है, गरम है। अभी खा लो नहीं ठंडी हो जाएगी।’
‘भाभी नहीं आईं?’ पूड़ी सब्ज़ी का पैकेट सहेजती हुई सादिया बुदबुदाई।
‘असल में आज संडे है।’ वह झेंपता हुआ बोला, ‘छुट्टी का दिन! तो सारा काम आज ही निपटाना होता है। लेकिन शाम तक वह भी आएगी।’
‘हां, भई। वर्किंग लेडी की यह समस्या तो होती है।’
‘आप लोग खाना खा लीजिए तो बेटी को देखने चलूं।’
‘भइया को भी बुला लेते।’ सादिया सकुचाती हुई बोली।
‘पहले आप लोग खा लीजिए फिर उसे भी बुला लेंगे।’ आनंद बोला, ‘बल्कि अम्मी और भइया एक साथ खा लेंगे। उस को बुलाने में भी टाइम लगेगा।’
‘आनंद जी ठीक कह रहे हैं।’ सादिया की तरफ़ मुख़ातिब हो कर मुनव्वर भाई बोले, ‘लाओ निकालो।’ कह कर मुनव्वर भाई पूड़ी सब्ज़ी ले कर खाने लगे। सादिया भी।
पूड़ी सब्ज़ी खाते हुए देख कर लग रहा था कि मुनव्वर भाई कितने दिनों बाद खाना खा रहे हैं। वह जैसे खाने पर टूट पड़े थे। सादिया सकुचा रही थी तो वह उसे लगभग डपटते हुए बोले, ‘खाओ भाई! आख़िर लड़ाई लड़नी है। बेटी को बचाने की लड़ाई!’ वह बोले, ‘देह में ताक़त रहेगी तभी तो लड़ोगी लड़ाई!’ वह ऐसे बोलने लगे गोया अपनी पत्नी से नहीं, ट्रेड यूनियन के किसी मंच से कामगारों को मैनेजमेंट के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए उकसा रहे हों।
‘अच्छा हमें ज़रा बेटी का बेड-वार्ड नंबर बताइए तब तक मैं वहां देखूं।’ आनंद ने कहा तो मुनव्वर भाई ने बेड नंबर-वार्ड नंबर बताते हुए कहा, ‘सेकेंड फ्लोर पर है।’
‘लेकिन बिना पास के नहीं जाने देंगे।’ कहते हुए सादिया ने पास निकाल कर दे दिया।
आनंद जब वार्ड में पहुंचा तो नज़ारा बदला हुआ मिला। मुनव्वर भाई की निश्चिंतता पर पानी पड़ता दिख रहा था। एक साथ दो तीन डाक्टरों को उस ने बेड पर पाया। सभी झुक कर बेटी के इलाज में लगे थे। एक डाक्टर बड़ी तेज़ी से बेटी की छाती पर फ़ीज़ियोथिरेपी कर रहा था और घबराया हुआ भी था। थोड़ी देर बाद उस के चेहरे से घबराहट ख़त्म हुई और वह बेड से हट कर डाक्टर वाली कुर्सी पर लंबी सांस ले कर बैठ गया। आनंद भी उस के पास जा कर पास के स्टूल पर बैठ गया। अपना परिचय दिया। फिर पूछा कि, ‘बेटी की कैसी स्थिति है?’
‘स्थिति क़तई अच्छी नहीं है।’ छत की ओर दोनों हाथ उठा कर डाक्टर बोला, ‘जब तक सरवाइव कर रही है, कर रही है। बाक़ी राम जाने।’ कह कर उसने एक लंबी सांस फिर छोड़ी। बोला, ‘आई ट्राई माई बेस्ट। बाक़ी बहुत मुश्किल है।’
‘क्या प्लेटलेट बहुत कम हो गई है?’ आनंद ने पूछा।
‘प्लेटलेट?’ डाक्टर उसे घूरते हुए बोला, ‘प्राब्लम प्लेटलेट नहीं, बर्न है। सेवेंटी-एट्टी परसेंट जली हुई है।’
‘जी ये तो है।’
‘तो?’
‘बच जाएगी?’ आनंद मायूस हो कर बोला।
‘आप जानते हैं फिर भी पूछ रहे हैं?’
‘नहीं मुझे पहले बताया गया था कि दस परसेंट जली है और प्लेटलेट की भी कमी है।’
‘यही तो।’ डाक्टर बोला, ‘यहां लाने में इतनी देर कर दी। दस दिन हो गए हैं जले हुए। स्किन की तीन लेयर जा चुकी हैं। पूरी देह में सेप्टिक फैल रहा है। सांस नहीं ले पा रही है। यहां बच्चों का वेंटिलेटर है नहीं। जा कर पेडियाट्रिक में देखिए कोई वेंटिलेटर मिल जाए तो कोई रास्ता बने।’ कह कर डाक्टर एक दूसरे बेड पर जा कर मरीज़ देखने लगा। आनंद उस के पीछे-पीछे वहां भी पहंुचा और बोला, ‘डाक्टर साहब एक मिनट!’
‘देखिए सर!’ डाक्टर झल्ला कर बोला, ‘वक्त ख़राब करने से कोई फ़ायदा नहीं। आप मुझ से सवाल-जवाब बाद में कर लीजिएगा। पहले वेंटिलेटर अरेंज कीजिए प्लीज़!’ वह मुड़ते हुए बोला, ‘मेरे पास और भी पेशेंट हैं। प्लीज़!’
‘ठीक बात है।’ कह कर आनंद बेटी के बेड पर एक बार फिर गया। एक नज़र बेटी को फिर से देखा। फूल सी बेटी अपनी मौत की आहट से बेख़बर टुकुर-टुकुर ताक रही थी।
‘डाक्टर साहब।’ कहती हुई सादिया की अम्मी जो अब तक ख़ामोश थीं, उस की ओर लपकीं।
‘मैं डाक्टर नहीं हूं।’ आनंद ने उन्हें बताया और पूछा, ‘आप सादिया की अम्मी हैं?’ कहते हुए उस ने उन के पांव छुए।
‘हां, बेटा। पर आप?’ उस के सिर पर आशीष देती हुई वह धीरे से बोलीं।
‘मैं आनंद हूं।’
‘कौन आनंद?’ वह अचकचाईं।
‘नहीं पहचाना?’
‘नहीं भइया।’ वह बोलीं, ‘बुढ़ापा आ गया है। लगता है आखों में भी उस का असर पड़ रहा है।’ कह कर वह सिर पर साड़ी का पल्लू ठीक करने लगीं। इस बीच उस ने अपने पुराने मुहल्ले जहां वह आस-पास ही रहते थे का नाम बताया, अपने पिता का नाम बताया। तो उन का भ्रम कुछ साफ़़ हुआ फिर भी वह ठीक से याद नहीं कर पाईं लेकिन याद कर लेने का स्वांग रचा और बोलीं, ‘हां-हां पहचान गई।’ अपने स्वांग को और मज़बूत करते हुए वह बोलीं, ‘असल में भइया तब आप छोटे से तो रहे। अब हट्टे कट्टे, लंबे-चौड़े हो गए हैं तो कैसी पहचानती भला?’
‘ये बात तो है?’ आनंद अभी सादिया की अम्मी से बात कर ही रहा था कि वह डाक्टर वहां आ गया और बोला, ‘अरे, आप अभी तक यहीं हैं? गए नहीं पेडियाट्रिक में वेंटिलेटर चेक करने?’
‘आप सीधे वहां रेफ़र क्यों नहीं कर देते?’
‘देखिए मैं एक ज़िम्मेदार डाक्टर हूं। रिस्क नहीं ले सकता। और फिर कुछ सीनियर डाक्टर्स भी इसे वाच कर रहे हैं। यहां तो देखिए कुछ टेंपरेरी अरेंजमंेट मैं ने कर रखा है। वहां, यह भी नहीं हो पाएगा। प्लीज़ आप जल्दी जाइए और देखिए। बातें, यादें बाद में कर लीजिएगा।’
‘अच्छी बात है।’ कह कर आनंद वार्ड से बाहर आ कर सीढ़ियां उतरने लगा। सीढ़ियां चढ़ते हुए मुनव्वर भाई मिल गए। आनंद को घबराया देख कर वह भी घबरा गए बोले, ‘क्या बात है?’
‘कुछ नहीं आप मेरे साथ आइए!’
‘क्या बेटी फिर सीरियस हो गई है?’ मुनव्वर भाई हड़बड़ा कर सीढ़ी पर से फिसलते-फिसलते बचे।
‘पहले अपने आप को संभालिए और पेशेंस से काम लीजिए।’ फिर दोनों निःशब्द ट्रामा सेंटर से बाहर आने लगे। सादिया भी लपकी।
‘तुम यहीं रहो।’ कह कर आनंद ने जेब से पास निकाल कर उसे देते हुए कहा कि, ‘यहीं क्या बेटी के पास चल कर बैठो, हम लोग अभी आते हैं।’
कार स्टार्ट कर वह बैक करने लगा तो जल्दबाज़ी में डिवाइडर से टकरा कर बंपर झूल गया। पर वह झूलते बंपर की परवाह किए बिना मेडिकल कालेज की तरफ़ चला। बच्चों वाले विभाग के पास पहुंच कर कार पार्क की और अंदर चला गया। वेंटिलेटर रूम में जा कर देखा कोई वेंटिलेटर ख़ाली नहीं था। पांच-छह वेंटीलेटर थे और सभी पर बच्चे थे। और उन के परेशान परिजन साथ में। समस्या सुन कर एक जूनियर डाक्टर ने पीछे सटी हुई एक बिल्डिंग की तरफ़ इशारा करते हुए किसी डिपार्टमेंट का नाम लिया और बताया कि, ‘वहां फ़र्स्ट फ्लोर पर चले जाइए-वहां भी कुछ वेंटिलेटर हैं, हो सकता है कोई ख़ाली हो।’

आनंद भाग कर वहां भी गया। वहां स्थिति और विकट थी। एक बच्चे को लिए उस के परिजन पहले ही से कोई वेंटिंलेटर ख़ाली होने की आस में बैठे थे। आनंद वापस फिर वहीं आया और उस जूनियर डाक्टर से रिक्वेस्ट की, कि ‘कोई रास्ता निकालें। प्लीज़।’
डाक्टर ने बड़ी ख़ामोशी से उसे देखा फिर धीरे से बोला, ‘पांच मिनट वेट कीजिए।’
‘ठीक बात है।’ कह कर वह मुनव्वर भाई के साथ बरामदे में खड़ा हो गया। कुछ देर चुपचाप दोनों खड़े फ़र्श देखते रहे। फिर मुनव्वर भाई ही धीरे से बोले, ‘आख़िर बात क्या है?’
‘बेटी को सांस लेने में दिक्क़त हो रही है, इसी लिए वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ गई है।’
‘ओह मतलब मामला सीरियस हो गया है।’ अपने ब्लेज़र में हाथ डालते हुए वह धीरे से बोले।
‘आप तो कह रहे थे कि बेटी बस दस परसेंट ही जली है।’
‘हां।’
‘किसने बताया?’
‘क्या?’
‘कि वह दस परसेंट ही जली है?’
‘बताया क्या मैं ने ख़ुद देखा है। बस उस की हिप और हलका सा पेट जला है।’
‘अपने शहर में किसी डाक्टर को नहीं दिखाया था?’
‘दिखाया था। एक नर्सिंग होम में।’ मुनव्वर भाई जैसे सफ़ाई देने पर उतर आए, ‘ह़ते भर वहां इलाज चला। वह तो जब प्लेटलेट कम हो गया तो यहां रेफ़र करवा कर लाए। बीस हज़ार वहां ख़र्चा था, आठ दस हज़ार यहां भी ख़र्च हो चुके हैं।’ बोलते-बोलते मुनव्वर भाई की आवाज़ रुंध गई। वह आनंद से लिपट गए। बोले, ‘बस किसी तरह बेटी बच जाए आनंद भाई।’ बोलते-बोलते वह सिसकने लगे।
‘घबराइए नहीं मुनव्वर भाई मैं हूं न।’
‘बस आाप ही का भरोसा है।’ कह कर वह आनंद से फिर लिपट गए।
‘भरोसा ऊपर वाले पर रखिए, डाक्टरों पर रखिए। मैं तो हूं ही।’
फिर दोनों निःशब्द फ़र्श देखने लगे। तभी वह जूनियर डाक्टर बरामदे में आया और बोला, ‘जाइए अपना पेशेंट लाइए। जल्दी से।’
‘ख़ाली हो गया वेंटिलेटर।’ मुनव्वर भाई बोले।
‘हां।’
‘कैसे?’
‘बस आप अपना बच्चा ले आइए।’
तब तक एक बच्चे को गोद में लिए उस के माता पिता रोते पीटते वेंटिलेटर रूम से बाहर आते दिखे। आनंद यह दृश्य देख कर घबरा गया। आनंद से भी ज़्यादा मुनव्वर भाई घबरा गए। मारे घबराहट के वह डाक्टर से लिपट गए। डाक्टर अफनाया,‘यह क्या कर रहे हैं? दूर हटिए।’ पर मुनव्वर भाई उस से और लिपट गए और गिड़गिड़ाए, ‘मेरी बेटी बच जाएगी न?’
‘बिलकुल बच जाएगी!’ डाक्टर आनंद की ओर देखते हुए और मुनव्वर भाई को अपने से छुड़ाते हुए बोला, ‘इन्हें ले जाइए और पेशेंट को जल्दी से ले आइए।’
‘ट्रामा सेन्टर से ले आना है। पंद्रह बीस मिनट या आधा घंटा तो लगेगा ही।’
‘ओह ट्रामा सेन्टर।’ डाक्टर बुदबुदाया, ‘जल्दी जाइए।’ फिर पूछा,‘ इतनी देर क्यों लगाएंगे?’
‘अरे पांच सात मिनट जाने में, इतना ही समय आने में और फिर रेफ़र करने की कार्यवाई में भी इतना समय तो लगेगा ही।’ आनंद बोला, ‘बस आप वेंटिलेटर ख़ाली रखिएगा।’
‘आई डू माई बेस्ट।’ डाक्टर बुदबुदाया।
रास्ते में अचानक मुनव्वर भाई बोले,‘क्या सद्दाम हुसैन को फांसी हो गई?’
‘क्यों? आप को कैसे पता चला?’
‘नहीं ट्रामा सेंटर में चाय की दुकान पर कुछ लोग चर्चा कर रहे थे।’ वह बोले, ‘मर्द आदमी था। अमरीका की गुंडई का शिकार हो गया।’
‘क्यों ख़ुद गुंडा नहीं था?’
‘यह तो अपनी-अपनी राय है।’ वह बोले, ‘पर अमरीका की गुंडई पर तो पूरी दुनिया एक राय है।’
‘नहीं। ख़ुद अमरीका और उसके पैंतीस मित्र देश कम से कम इस पर आप की राय के साथ नहीं हैं।’
‘हूं।’ कह कर इस तकलीफ़ में भी हलका सा मुस्कुराए। बोले, ‘सब साले गुंडे हैं। पर आप को लगता है कि इन साम्राज्यवादी ताक़तों का विनाश जल्दी ही हो जाएगा?’ फिर जैसे ख़ुद ही जवाब देने लगे, ‘नहीं तो दुनिया बरबाद हो जाएगी।’
‘अमरीका और सद्दाम पर हम लोग फिर कभी बात कर लेंगे अभी तो बेटी को बचाने की बात करें।’
‘बेटी तो बच जाएगी।’ वह ज़रा रुके और बोले, ‘आप देवदूत बन कर आ गए हैं। अब सब कुछ ठीक हो जाएगा।’
‘लेकिन बेटी जली कैसे?’
‘अब क्या बताऊं?’ मुनव्वर भाई उदास हो कर बोले, ‘उस का चलना सीखना ही उस के लिए काल बन गया।’
‘मतलब?’
‘अभी-अभी चलना सीखा था उस ने। पहले उंगली थामे फुदक-फुदक चलती थी। फिर गिरते पड़ते चलने लगी। और अब ठुमक-ठुमक कर चलने लगी थी। वो आप के रामचंदर जी वाला भजन है न ठुमक-ठुमक चलत रामचंदर बाजत पैजनिया वाला। ठीक वैसे ही। उस दिन भी आंगन में ठुमक-ठुमक कर चल रही थी। हमारे साथ के किराएदार ने कपड़ा धोने वाले टब में गरम पानी रखा था। ख़ूब खौलता हुआ। वह उसी गरम पानी के टब में जा कर बैठ गई। बैठते ही चिल्लाई। बेगम दौड़ीं फ़ौरन पर तब तक जितना उसे जलना था जल चुकी थी।’ माथा पकड़ते हुए मुनव्वर भाई बोले, ‘क्या बताऊं बेचारी की तकलीफ़ देखी नहीं जाती।’
‘कहीं ऐसा तो नहीं मुनव्वर भाई कि हम लोगों की तकलीफ़ और बेटी की तकलीफ़ एक जैसी ही है?’
‘समझा नहीं।’
‘कहीं हम लोग भी तो इस राजनीति में, इस समाज में चलना सीख लेने की सज़ा ही तो नहीं भुगत रहे?’ आनंद बोला, ‘ठुमक-ठुमक कर चले और खोखले सिस्टम के खौलते पानी वाले टब में बैठ कर जल गए। जल कर अनफ़िट हो गए। इतने कि अब हाशिए की राजनीति के लायक़ भी नहीं रह गए। इतना कि अब परिचय बताने पर भी लोग नहीं पहचानते। पहचानते हुए भी अपरिचित होते जाते हैं लोग।’
‘क्या पता?’ मुनव्वर भाई लंबी सांस छोड़ते हुए बोले।
‘नहीं याद है अपने शहर में हम लोग भले पैदल होते या साइकिल पर लोग दूर से ही पहचानते। परिचय बताने की ज़रूरत भी नहीं होती थी।’
‘याद है आनंद जी!’
‘पर अब तो हालत यह है कि रहते थे हम हसीन ख़यालों की भींड़ में, उलझे हुए हैं आज सवालों की भीड़ में।’
‘सवालों?’ मुनव्वर भाई बोले, ‘बवालों की भीड़ में।’
‘लगता है जैसे हम लोग नपुंसक हो गए हैं।’ आनंद बोला, ‘बल्कि इस नपुंसक समय में घुटने टेक कर जी रहे हैं।’
‘ग़लती कहां से हो गई?’ मुनव्वर भाई ने फिर से माथा सहलाया, ‘समझ में नहीं आता कि समूची राजनीति कैसे दोगली और हिप्पोक्रेट हो गई। सारा समाज दिखावटी और खोखला हो गया। मूल्य मर गए और पैसा राक्षस बन कर बड़ा हो गया।’
‘लीजिए ट्रामा सेंटर आ गया!’ गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी करता हुआ आनंद बोला, ‘अपने इन इंटेलेक्चुवल घावों का इलाज भी यहीं करवा लीजिए।’
‘अफ़सोस तो यही है कि इन घावों का इलाज किसी ट्रामा सेंटर में नहीं हो सकता।’ ट्रामा सेंटर में दाखिल होते हुए मुनव्वर भाई बोले। अभी वह दोनों ट्रामा सेंटर के सेकेंड ़लोर पर जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ ही रहे थे कि एक स्ट्रेचर पर बाडी लिए अस्पताल के कर्मचारी उतर रहे थे। पीछे-पीछे रोते-बिलखते परिजन। यह सब देख कर मुनव्वर भाई फिर दहल गए। आनंद का हाथ पकड़ते हुए बोले, ‘मेरी बेटी तो बच जाएगी न आनंद जी!’

जवाब में आनंद कुछ बोला नहीं हाथ ऊपर उठा कर ऊपर वाले की मर्ज़ी बता दी। वार्ड में बेड पर पहुंचने पर फूल सी बेटी की तकलीफ़ से भरा चेहरा देख कर और मुश्किल हुई। सादिया की अम्मी ऐसे छटपटा रही थीं जैसे कोई मछली पानी से बाहर निकाल दी गई हो। दो तीन जूनियर डाक्टर उस पर झुके हुए थे। कोई आला लगाए नब्ज़ टटोल रहा था, कोई सीने पर फ़िज़ियोथिरेपी में लगा था। छूटते ही आनंद ने डाक्टरों से बताया कि, ‘वेंटिलेटर का इंतज़ाम हो गया है। इसे तुरंत भेज दीजिए।’ जवाब में डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। कहा कि, ‘सर से बात करिए।’
उन का मतलब अपने रेज़ीडेंट डाक्टर से था।
‘वह कहां हैं?’ एक जूनियर डाक्टर ने दाएं-बाएं, बाएं-दाएं कर के किसी कमरे की लोकेशन बताई। उस के हिसाब से आनंद भाग कर गया भी। पर डाक्टर नहीं मिले। वापस आ कर वह झल्लाया तो एक जूनियर डाक्टर ने कहा, ‘मेरे साथ आइए।’ वह रेज़ीडेंट डाक्टर कमरे के अंदर के कमरे में लेटा हुआ था। उसे देखते ही वह उठ बैठा। आनंद ने उसे भी बताया कि, ‘वेंटिलेटर का इंतज़ाम हो गया है।’
‘चलिए देखते हैं।’ डाक्टर खड़े हो कर अपनी पैंट ठीक करते हुए बोला। बरामदे में खड़े मुनव्वर भाई रेज़ीडेंट डाक्टर को देखते ही चहक पड़े। आनंद से बताने लगे, ‘अपने पूर्वांचल के हैं। बहुत ही हेल्पफ़ुल। सुबह यहां आए तो बहुत मदद की इन्होंने।’
‘हां, हां मेरी भी बात हो चुकी है।’
‘कब?’
‘सुबह जब आप नीचे चाय की दुकान पर थे तब।’ रेज़ीडेंट डाक्टर ने आ कर बेटी को देखा। एक जूनियर डाक्टर अभी भी फ़िज़ियोथिरेपी कर रहा था। लगातार। उसे हटा कर जूनियर डाक्टर ने भी कुछ देर फ़िज़ियोथिरेपी की फिर आनंद की ओर मुड़ा और बिना बोले मुंह पिचका कर आंखों ही आंखों में बता दिया कि अब कहीं भी ले जाना बेकार है। आनंद ने डाक्टर को किनारे ले जा कर धीरे से पूछा, ‘कितनी उम्मीद है?’
‘बिलकुल नहीं।’
‘अभी तो ज़िंदा है?’
‘हां, अभी तो है। पर अब वंेटिलेटर पर ले जाना बेकार है।’ रेज़ीडेंट डाक्टर बोला, ‘पूरी देह में सेप्टिक फैल गया है। अब ले भी जाएंगे तो पता चला कि रास्ते में ही चली जाएगी।’
डाक्टर बोला, ‘अब कोई फ़ायदा नहीं। बहुत देर हो गई।’
डाक्टर जब जाने लगा तो मुनव्वर भाई बेटी के पास से भाग कर आनंद के पास आए। घबराए हुए बोले, ‘डाक्टर साहब क्या बता रहे हैं? वेंटिलेटर पर क्यों नहीं ले जा रहे हैं?’
‘कुछ नहीं मुनव्वर भाई।’ आनंद उन का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोला, ‘हम लोग अब हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं।’ फिर लगभग पछताते हुए आनंद बोला, ‘काश कि मैं रात ही आ गया होता।’
‘क्या बात बिलकुल बिगड़ गई है?’ मुनव्वर भाई धीरे से बोले।
‘बिगड़ तो गई है।’ आनंद भी उतने ही धीरे से बोला, ‘डाक्टर यही बता रहे हैं।’
‘सादिया कहां है?’ मुनव्वर भाई ने सादिया की अम्मी से पूछा।
‘बाहर बरामदे में बैठी है। तीन दिन से सोई नहीं थक गई है।’ अम्मी बोलीं।
‘तो उसे ज़रा संभालिएगा।’ मुनव्वर भाई अम्मी से हाथ जोड़ कर बोले।
‘का हुआ भइया?’ आनंद की ओर देखती हुई भर्राए गले से अम्मी बोलीं, ‘कुछ हो गया क्या बिटिया को?’

‘नहीं, नहीं अभी कुछ नहीं।’ कह कर उन्हें टालता हुआ आनंद दूसरी तरफ़ हो गया। सादिया की अम्मी छटपटाती हुई बेटी के बेड की तरफ़ लपकीं। उस का माथा चूमा उस का हाथ अपने दोनों हाथों में ले कर उस की तरफ़ देख कर बोलीं, ‘हाथ तो अभी गरम है।’ वह झुकीं और पुचकार कर बोलीं, ‘बोल बिटिया नानी बोल!’ लेकिन बिटिया कुछ नहीं बोली। सादिया की अम्मी फिर बिन पानी की मछली की तरह छटपटा पड़ीं। अब तक सादिया भी अपनी बेटी के पास आ गई थी। उस की देह की थकावट, मन की छटपटाहट और आंखों में बेटी के बच जाने की आस साफ़ पढ़ी जा सकती थी। वह बेटी के माथे पर हाथ रख कर बेड के पास रखे स्टूल पर बैठ गई। दो डाक्टर भी उस की तीमारदारी में लगे रहे। एक आला लगाए नब्ज़ टटोल रहा था और दूसरा सीने पर फ़िज़ियोथेरेपी कर रहा था। दूसरी तरफ़ आनंद मुनव्वर भाई के पास खड़ा लगातार नर्सिंग होम वाले को कोस रहा था कि ह़ते भर तक उस ने अपने पास रख कर बेटी को ख़तरे में डाल दिया। वह मुनव्वर भाई को भी कोस रहा था कि लखनऊ आने के तीन बाद उसे क्यों ख़बर दी। साथ ही वह अपने को भी कोस रहा था कि वह रात ही क्यों नहीं आ गया! हालां कि अब लगभग तय हो गया था कि बेटी को बचा पाना लगभग संभव नहीं है, जब तक सांस है - उस की तभी तक आस है। डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे। फिर भी अपनी भरसक सभी लगे हुए थे। मुनव्वर भाई भी मान चुके थे कि बेटी को बचाने की लड़ाई अब उन के हाथ से निकल चुकी है। और वह इस जुगत में लगे थे कि सादिया को किसी तरह वहां से हटा दें। क्यों कि कभी भी अप्रिय ख़बर मिल सकती थी। लेकिन सादिया वहां से टस से मस नहीं हो रही थी। अंगद के पांव की तरह जम गई थी।

‘आखि़र सादिया को आप हटाने के लिए इतने परेशान क्यों हैं?’ आनंद ने मुनव्वर भाई से पूछा।
‘इस लिए कि वह कमज़ोर दिल की है और बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। हार्ट अटैक भी हो सकता है।’
‘ओह।’ संक्षिप्त सा बोल कर आनंद चुप हो गया कि तभी बेटी के इलाज में लगा एक जूनियर डाक्टर तेज़ी से रेज़ीडेंट डाक्टर की ओर लपका और रेज़ीडेंट डाक्टर के कान में कुछ खुसफुसाया। रेज़ीडेंट डाक्टर लपक कर बेटी के बेड पर पहुंचा। आला लगा कर नब्ज़ टटोली। सीने पर हाथ रखा। आंखों की पुतलियों को टार्च जला कर देखा। सुस्त क़दमों से आ कर अपनी कुर्सी पर बैठ गया। मुनव्वर भाई और आनंद की ओर गौर से देखा और आंखों के इशारे से बुलाया। मुनव्वर भाई ने आनंद से धीरे से कहा, ‘शायद डाक्टर साहब बुला रहे हैं।’
‘हां, आइए।’
‘नहीं आप देख लीजिए।’
‘ठीक है।’ कह कर आनंद रेज़ीडेंट डाक्टर के पास पहुंचा, ‘जी डाक्टर साहब।’
‘प्लीज़ बैठ जाइए।’ पास की कुर्सी इंगित करते हुए रेज़ीडेंट डाक्टर ने कहा।
‘जी!’ आनंद कुर्सी पर बैठते हुए बोला।’
‘शी इज नो मोर।’
‘ओह।’ आनंद ज़रा रुका और बोला, ‘एक मदद करेंगे?’
‘बोलिए।’
‘बेटी की मां को ज़रा यहां से हटा लें फिर इस बात को डिस्क्लोज़ करें।’
‘ओ.के.।’
‘थैंक यू।’ कह कर वह मुनव्वर भाई के पास आया और, ‘ज़रा सुनिए!’ कह कर उन्हें बुला कर वार्ड के बाहर बरामदे में ले गया।
‘जी आनंद जी!’
‘बेटी की लड़ाई तो समझिए हम हार गए।’ आनंद ने संकेतों में कहा।
‘अब कोई रास्ता नहीं?’ आनंद से लिपटते हुए मुनव्वर भाई बोले,‘अब कोई गुंजाइश नहीं?’
आनंद ख़ामोश रहा। मुनव्वर भाई रोने लगे। बोले, ‘कुछ तो करिए आनंद जी! आख़िर आप की इतनी पहुंच है!’
‘वहां तो किसी की पहुंच नहीं होती मुनव्वर भाई।’ हाथ ऊपर उठाते हुए आनंद बोला, ‘इसी पर तो किसी का वश नहीं होता।’ कहते हुए आनंद ख़ुद रो पड़ा। तभी सादिया की अम्मी भागी आईं और घबराई हुई बोलीं, ‘बिटिया बिलकुल हिल डुल नहीं रही।’
‘आनंद जी कोई सीनियर डाक्टर बुलवा दीजिए।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘हो सकता है बिटिया बच जाए।’
‘हां भइया।’ सादिया की अम्मी बोलीं, ‘हां, भइया ई लवंडा डाक्टरों के वश की नहीं रही। बिटिया के हाथ पांव भी ठंडे हो रहे हैं।
‘आनंद जी, प्लीज़ कुछ करिए।’
‘मुनव्वर भाई अब कैसे कहूं?’ आनंद उन्हें बाहों में संभालते हुए बोला, ‘समझ नहीं आता।’
‘अब आप ऐसे कहेंगे तो हम लोग क्या करेंगे?’ मुनव्वर भाई सादिया की अम्मी की तरफ़ देखते हुए भर्राई आवाज़ में बोले।
‘मुनव्वर भाई समझिए मेरी बात को।’ आनंद ने रुंधे गले से कहा, ‘बिटिया अब नहीं रही।’
‘क्या?’ कह कर सादिया की अम्मी वहीं फर्श पर माथा पकड़ कर बैठ गईं। लगीं बिलख-बिलख कर रोने। बोलती भी जा रही थीं और रोती भी, ‘हाय बिटिया तुम चली गई, अब हमारी सादिया कैसे जिएगी? कैसे रहेगी?’ इधर मुनव्वर भाई भी आनंद को पकड़े फफक रहे थे। आनंद भी अपने आंसुओं को नहीं रोक पाया। रोते-रोते कहने लगा, ‘चुप रहिए मुनव्वर भाई, अपने को संभालिए।’
और मुनव्वर भाई सचमुच जल्दी ही संभल गए। न सिर्फ़ संभल गए, सादिया की अम्मी को भी संभाला। और समझाया कि, ‘सादिया को पता नहीं चले अभी। इस की ज़िम्मेदारी आप की है। नहीं कुछ और गड़बड़ होगा तो आप ही जानिएगा!’ मुनव्वर भाई अचानक डपटने पर आ गए, ‘देखिए गड़बड़ बिलकुल नहीं होने पाए!’
‘नाहीं भइया।’ सादिया की अम्मी बोलीं और फिर आनंद की तरफ़ मुख़ातिब हो कर घिघियाती हुई बोलीं, ‘पर भइया वह भी मां है। अपनी बच्ची की हालत वह नहीं जानेगी तो कौन जानेगा?’
‘हां, मुनव्वर भाई।’ आनंद बोला, ‘आख़िर कब तक छुपाएंगे?’ कहते हुए मुनव्वर भाई सख़्त हो गए। बोले, ‘आनंद जी बाक़ी फार्मेलिटीज़ प्लीज़ आप करवाइए, मैं बेगम को संभालता हूं।’ कह कर वह बेड के पास बैठी सादिया की तरफ़ चल पड़े। और आनंद रेज़ीडेंट डाक्टर की तरफ़। रेज़ीडेंट डाक्टर के पास जा कर आनंद बोला, ‘डाक्टर साहब जो भी फार्मेलिटीज़ करनी हो करवा दीजिए, बाडी दे दीजिए।’
‘इतनी जल्दी?’ डाक्टर ने बड़े सामान्य ढंग से पूछा।
‘क्यों? क्या हुआ?’
‘अरे भई, पोस्टमार्टम होगा।’
‘इतनी छोटी सी बच्ची, फूल सी बच्ची का भी पोस्टमार्टम।’ आनंद आंख फैला कर बोला।
‘हां, पोस्टमार्टम के लिए पेपर बन रहा है।’
‘पोस्टमार्टम से बचने का कोई रास्ता नहीं है?’
‘नहीं सर।’
‘क्यों?’
‘बर्न केस है।’
‘ओह।’
‘हां, आप यह ज़रूर कर सकते हैं कि पुलिस चौकी चले जाइए। वह अगर बिना पोस्टमार्टम के पंचनामा कर देते हैं तो रास्ता बन सकता है।’ रेज़ीडेंट डाक्टर ज़रा रुका और बोला, ‘हालां कि उम्मीद बहुत कम है।’

अभी यह सब चल ही रहा था कि तभी एक और बेड पर मातम छा गया। रोना पीटना शुरू हो गया। एक पैंतीस-चालीस साल का व्यक्ति दुनिया छोड़ चला था। उस की मां और विधवा दोनों ही रो-रो कर बेसुध हुई जा रही थीं। इधर सादिया की अम्मी की छटपटापहट बढ़ती ही जा रही थी। नातिन को खोने का ग़म, बेटी का दुख, अपनी मुश्किलें, दामाद का दबाव सब कुछ मिल कर एक अजीब सांघातिक तनाव उन के भीतर बो रहा था। उनकी छटपटाहट अब ऐसी थी, जैसे कोई लहुलुहान मछली। आनंद की छटपटाहट अलग थी। आज दोपहर बाद आफ़िस में दो मीटिंग्स थीं और दिन के साढ़े बारह बज रहे थे। और अब तक की स्थितियां बता रही थीं कि अब पूरा दिन यहीं ट्रामा सेंटर, पोस्टमार्टम हाउस और क़ब्रिस्तान के बीच ही गुज़ारना है। वह धीरे-धीरे चलते हुए बरामदे में पहुंचा जहां सादिया के साथ मुनव्वर भाई नीचे बिछी चद्दर पर बैठे उसे कुछ समझा रहे थे। इशारों से उसने मुनव्वर भाई को बुलाया और उन्हें कान में बताया कि, ‘पोस्टमार्टम होना है।’
‘क्या?’
‘हां।’
‘रुक नहीं सकता?’ वह धीरे से बुदबुदाए।
‘फ़िलहाल तो डाक्टर मना कर रहा है।’
‘चलिए अब जो नसीब में है, भुगतना ही पड़ेगा।’ वह फिर बुदबुदाए।
‘अच्छा यह बताइए कि बेटी को यहीं दफ़नाएंगे या ............?’
‘यहां क्यों?’
‘फिर?’
‘अपने शहर ले जाएंगे। वहां दफ़नाएंगे।’
‘यहां क्या दिक़्क़त है?’
‘अरे वहां अपने लोग हैं, यहां कौन है?’
‘कहिए तो मेरे कुछ मुस्लिम साथी हैं, यहां भी। सब इकट्ठे हो जाएंगे।’
‘ठीक तो नहीं रहेगा पर देखिए।’
‘ठीक है।’ कह कर आनंद ने अपने दो तीन मुस्लिम साथियों को फ़ोन मिलाना शुरू किया। एक के मोबाइल पर लगातार रिंग जा रही थी पर वह उठा नहीं रहा था। अंततः दूसरे साथी को मिलाया तो दो तीन राउंड रिंग के बाद उसने उठाया। थोड़ी देर तक दोनों तरफ़ से सिर्फ़ ‘हलो-हलो’ ही होता रहा। क्यों कि दूसरी तरफ़ शोर बहुत था। अंततः वही बोला, ‘ज़रा होल्ड करो मैं शोर से किनारे हो कर बात करता हूं।’ फिर ज़रा रुक कर वह बोला, ‘हां, यार बोलो।’
‘यह कहां शोर में फंसे पड़े हो?’
‘कुछ नहीं अपने हीरो सद्दाम को फांसी हो गई है न। तो साले बुश की लानत मलामत कर रहे हैं हम सारे लोग।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘यहां विधानसभा के सामने बास्टर्ड का पुतला फूंकने की तैयारी है।’
‘तब चलो तुम पुतला फंूको।’ आनंद बोला, ‘फुर्सत पा जाओ तो बात करते हैं।’
‘ओ.के.।’
‘आनंद ने तीसरे साथी को फ़ोन किया। उस का फ़ोन तुरंत उठ गया। वह ख़ाली भी था। आनंद ने संक्षेप में सब कुछ बता दिया। और पूछा कि, ‘क्या मदद कर सकते हो?’
‘वो शिया हैं कि सुन्नी?’
‘कौन?’
‘वही जनाब जिन की बिटिया को दफ़नाना है?’
‘अब यह तो मैं ने उन से पूछा नहीं कभी।’ आनंद बोला, ‘पर दफ़नाने में भी शिया सुन्नी का झंझट है, मैं नहीं जानता था।’
‘नहीं झंझट जैसी कोई चीज़ नहीं है, थोड़ा सा एहतियात, थोड़ा सा कस्टम का हेरफेर है कुछ और नहीं।’
‘चलो मैं पूछ कर बताता हूं।’
‘ठीक है, वैसे ज़रा भी किसी को आसानी होती है तो वह अपने शहर और अपनी कम्यूनिटी के ही क़ब्रिस्तान में अपने परिवारीजनों के आसपास ही दफ़नाना पसंद करता है।’ वह बोला, ‘फिर भी जैसा हो बताइएगा मैं हाज़िर हो जाऊंगा और सारे इंतज़ामात करवा दूंगा।’
‘अच्छी बात है।’ आनंद बोला, ‘पर तुम यह बताओ कि तुम शिया हो या सुन्नी?’
‘क्यों हमारी तहज़ीब, बातचीत से क्या लगता है आप को?’
‘मैंने तो कभी इस लिहाज़ से, किसी आइने में तुम्हें देखा ही नहीं।’ आनंद बोला, ‘मैं तो हिंदू मुसलमान में ही अमूमन कोई चश्मा नहीं लगाता। तो भी कस्टम की मैं क़दर करता हूं, इस लिए पूछ लिया।’
‘फ़ार योर काइंड इनफ़ार्मेशन आनंद जी आई एम अ शिया पर्सन।’
‘चलो ठीक है।’ आनंद बोला, ‘इसी लिए तुम घर पर मिल गए। नहीं तुम भी विधान सभा के सामने होते इस समय बुश का पुतला फूंकते हुए।’
‘नहीं आनंद जी, सद्दाम को हुई फांसी पर तो हमें बहुत ऐतराज़ नहीं है पर फांसी के तरीक़े पर तो हमें भी सख़्त ऐतराज़ है।’ वह बोला, ‘इस तरह उस की वीडियो क्लिपिंग तैयार करवाना और दुनिया भर के चैनलों पर दिखाना कतई अनह्यूमन है।’
‘चलो यह बहस अभी लंबी चलेगी।’ आनंद बोला, ‘ज़रूरत पड़ी तो तुम्हें बताऊंगा।’
‘आनंद जी एक मिनट।’ वह बोला, ‘अगर वह जनाब सुन्नी होंगे तब भी बताइएगा मैं वह बंदोबस्त भी करवा दूंगा।’
‘ठीक है। शुक्रिया।’ आनंद बोला, ‘पर एक बात बताऊं, हालां कि यह मौक़ा नहीं है फिर भी।’
‘प्लीज़ बताइए।’
‘फ़िराक़ गोरखपुरी को जानते हो?’
‘हां बड़े प्यारे और मोहतरम शायर हैं।’
‘जानते हो उन की अंतिम समय में ख़ास चिंता क्या थी?’
‘क्या?’
‘एम्स दिल्ली में वह एडमिट थे। और जब कोई जानने वाला उन से मिलने जाता था, तो वह उस का हाथ, हाथ में ले कर कहते थे कि यार देखना मैं हिंदू हूं, मुझे मर जाने पर जलाना, दफ़नाना नहीं, क्यों कि मैं हिंदू हूं।’
‘मैं समझ सकता हूं।’ वह बोला, ‘पर ऐसा क्यों था?’
‘वह अपने घर परिवार से दरअसल एक ख़ास दूरी बना बैठे थे।’
‘ओह, तभी।’
‘ठीक है, जैसा तय होता है, वैसा तुम्हें बताता हूं।’ कह कर आनंद रेज़ीडेंट डाक्टर की तरफ़ बढ़ा और पूछा, ‘पेपर्स तैयार हो गए हैं क्या?’
‘हां, शायद नीचे भेज दिया गया है। पता कर लीजिए। चाहिए तो एंबुलेंस ले लीजिए। स्टाफ़ से कह देता हूं।’
‘थैंक यू डाक्टर साहब!’ कह कर वह मुनव्वर भाई की तरफ़ लपका। उन्हें बताया कि, ‘पेपर्स तैयार हो गए हैं, पोस्टमार्टम के लिए बेटी को ले चलना है।’
‘ठीक है, पर इन का क्या करें?’ सादिया की तरफ़ इशारा करते हुए मुनव्वर भाई बोले।
‘ऐसा करते हैं कि इन्हें ले चल कर नीचे चाय की दुकान पर बैठा देते हैं और कह देगें कि मेडिकल कालेज में वेटिंलेटर के लिए ले जा रहे हैं।’
‘यही ठीक रहेगा।’ कह कर मुनव्वर भाई सादिया को ले कर सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ चले। सादिया ऐसे चल रही थी गोया उस के पैर में कांटे चुभे हों जब कि मुनव्वर भाई की चाल ऐसी थी गोया उनके पैरों में बेड़ियां डाल दी गई हों। और वह सहारे के लिए सादिया का कंधा थामे चल रहे हों।

ख़ैर, इधर पोस्टमार्टम हाउस ले जाने के लिए पेपर बन गए थे। उधर सादिया के नीचे जाते ही सादिया की अम्मी दहाड़ मार कर रो पड़ीं। दिल का सारा गुबार, सारा मलाल उन की रुदन में ऐसे फूट पड़ा जैसे कोई स्प्रिंग बहुत देर तक दबी-दबी छूटते ही उछल पड़ी हो। अब सादिया की अम्मी की रुलाई से पूरे वार्ड को ख़बर हो गई कि वो फूल से बच्ची गुज़र गई। ख़ैर, नीचे सादिया को छोड़ कर मुनव्वर भाई लौट आए और बेटी को पोस्टमार्टम हाउस ले जाने की तैयारी हो गई। एक दाई भी आ गई, बेटी की बाडी को ले जाने के लिए। पर तय यह हुआ कि नीचे सादिया को कोई शक न हो इस लिए सादिया की अम्मी ही बिटिया को गोद में ले कर एंबुलेंस में बैठें। सादिया की अम्मी से पूछा गया तो वह बोलीं, ‘हां हम लेते चलेंगे।’ बेटी की बाडी उस के ही नन्हें से रंगीन कंबल में लपेट दी गई। जैसी नन्हीं सी बेटी थी, वैसे ही नन्हें-नन्हें दो कंबलों के बीच उसे ऐसे लपेटा गया था गोया ठंड बहुत हो। वैसे ठंड थी भी। ख़ैर, सादिया की अम्मी को ले कर आनंद और मुनव्वर भाई बेटी के बेड पर पहुंचे। सादिया की अम्मी ने दिल कड़ा किया और बेटी की बाडी को उठाने के लिए बेड पर हाथ बढ़ाए भी पर अचानक बिजली की तेज़ी से हाथ ऐसे खींचा गोया करंट लग गया हो।
‘क्यों क्या हुआ?’
‘नहीं भइया हम नहीं छू पाएंगे।’ कहते हुए सादिया की अम्मी की आंखें फिर से छलछला गईं।
‘चलो हटो।’ सादिया की अम्मी को एक तरफ़ करते हुई दाई बोली, ‘ज़्यादा समय नहीं है हमारे पास।’ कह कर उसने बिटिया की कंबल में लिपटी बाडी को झट से उठा लिया। और ले कर चल पड़ी। पीछे-पीछे सादिया की अम्मी, मुनव्वर भाई और आनंद।
एंबुलेंस में आते ही दाई ने बेटी की बाडी को सीट पर रखने के बजाय नीचे धम्म से रख दिया। आनंद ने ऐतराज़ जताया तो वह बोली, ‘मिट्टी है। कोई ज़िंदा तो है नहीं।’ दाई की सख़्ती बरक़रार थी। बोली, ‘बहुत प्यार है तो गोदी में लई लो। सीट पर से तो हचका पड़ते ही लुढ़क जाएगी।’ यह सुनते ही सादिया की अम्मी ने बेटी की बाडी को ऐसे गोद में ले कर चिपका लिया गोया वह ज़िंदा हो।
नीचे जब एंबुलेंस में सब लोग बैठने लगे तो चाय की दुकान पर बैठी सादिया भी लपकी। मुनव्वर भाई ने यह देख लिया और सादिया की तरफ़ बढ़ गए। उस को समझाया और बैठा कर आए। आनंद ने देखा कि तब तक मुनव्वर भाई का छोटा सा बेटा और साला भी सादिया के साथ मेडिकल कालेज से आ कर बैठ गए थे। एंबुलेंस जब स्टार्ट हो गई तो आनंद ने ड्राइवर से कहा कि, ‘पुलिस चौकी चलना।’
‘नहीं भइया पोस्टमार्टम हाउस।’ दाई पूरी सख़्ती से बोली, ‘नौकरी थोड़े ही गंवानी है।’
‘अरे पुलिस से पंचनामा करवाएंगे।’
‘पंचनामा बाद में।’ दाई बोली, ‘पहले पोस्टमार्टम।’
‘लेकिन पुलिस की चिट्ठी भी तो होनी चाहिए।’ आनंद बोला, ‘वह तो ले लें।’
‘कुछ नहीं।’ दाई फिर पूरी सख़्ती से बोली, ‘हमका उलझाओ नहीं। पुलिस-वुलिस, चिट्ठी-पिट्ठी सब वहीं होइ जाएगा, पोस्टमार्टम हाउस में।’
और ड्राईवर एंबुलेंस को पोस्टमार्टम हाउस की ओर बढ़ा ले चला। रास्ते में कोई किसी से कुछ नहीं बोला। सभी निःशब्द। बड़े इमामबाड़े के पहले ही बाएं मोड़ पर एंबुलेंस पोस्टमार्टम हाउस के बाहर रुक गई। एंबुलेंस रुकते ही दाई सादिया की अम्मी की ओर मुख़ातिब हुई, ‘अंदर ले चलोगी कि हम ले लें।’
‘अंदर चीर फाड़ में?’ पूछती हुई सीने से बेटी की बाडी और ज़ोर से चिपकाती हुई सादिया की अम्मी कांप गईं।
‘हां।’ दाई बोली, ‘लाओ दो।’ बेटी की बाडी को ले कर दाई आगे-आगे चली और पीछे-पीछे मुनव्वर भाई सादिया की अम्मी और आनंद। पोस्टमार्टम हाउस में घुसते ही बदबू का एक तेज झोंका आया। लेकिन दाई इस से बेख़बर वहीं ज़मीन पर धूल में ही बेटी की बाडी को धम्म से रख कर ट्रामा सेंटर का दिया क़ाग़ज लिए बरामदे में चढ़ गई। मुनव्वर और आनंद ने हालां कि एक साथ ऐतराज़ जताया कि बेटी की बाडी को इस तरह ज़मीन पर वह न रखे। पर दाई ने दोनों के ऐतराज़ को दर किनार कर दिया। और बड़-बड़ करती बरामदे से लगे कमरे में गई जहां दो तीन डाक्टर और एक हवलदार बैठे थे। उसने वहां क़ाग़ज थमाया, बाहर बेटी की बाडी दिखाई और चलती बनी। उस के जाने के बाद सादिया की अम्मी ने बेटी की बाडी को जमीन पर से उठा कर फिर अपनी गोद में ले लिया और आनंद से बोली, ‘भइया इसका चीर फाड़ रुकवा दीजिए।’
‘देखिए कोशिश करते हैं।’ कह कर वह डाक्टरों के पास गया, परिचय दिया।
‘बैठिए सर।’ कह कर डाक्टरों ने उसे एक कुर्सी इंगित कर बैठने को कहा।
‘देखिए एक रिक्वेस्ट थी।’ कुर्सी पर बैठते हुए आनंद ने कहा, ‘अगर बिना पोस्टमार्टम के ही बेटी की बाडी सौंप दिया जाए तो बड़ी कृपा होगी।’
‘सर, ऐसा था तो यहां बाडी लानी ही नहीं थी।’ एक डाक्टर बोला, ‘वहीं ट्रामा सेंटर से ही डेथ सर्टिफ़िकेट सीधे बनवा लेना चाहिए था।’
‘ऐसा हो सकता था!’
‘वहां के डाक्टर चाहते तो ज़रूर हो सकता था।’
‘कहा तो था मैं ने।’
‘तो सर, अब यहां जब उन लोगों ने भेज दिया है तो पोस्टमार्टम तो होगा।’
‘अरे छोटी सी, फूल सी बच्ची है, कुछ तो दया कीजिए।’
‘नहीं सर।’ डाक्टर बोला, ‘हम कुछ नहीं कर सकते। हां, एक रास्ता यह हो सकता था कि आप पुलिस से कह कर वहीं पंचनामा करवा सकते थे, पर अब तो शायद पुलिस भी न माने। फिर भी आप ट्राई कर लीजिए।’
‘हां, यह हम ज़रूर कर सकते हैं कि एक सिंबालिक पोस्टमार्टम कर दें।’ एक दूसरा डाक्टर बोला, ‘ज़्यादा चीर फाड़ नहीं करें।’
‘चलिए यही कर दीजिए पर जल्दी कर दीजिए।’ आनंद बोला।
‘बस पुलिस का पेपर जितनी जल्दी आ जाएगा, उतनी जल्दी हो जाएगा।’
‘अभी पुलिस का भी कोई पेपर आएगा।’
‘हां, बिना उस के हम कुछ नहीं कर सकते।’ डाक्टर बोला, ‘न हो तो आप लोग ख़ुद पुलिस चौकी पर चले जाइए। काम शायद जल्दी हो जाए। नहीं, जाने कितनी देर लग जाए।’
‘बाडी यहीं रहने दें?’
‘हां, बाडी तो अब हमारे ही पास रहेगी।’
अब सवाल उठा कि बेटी की बाडी को कहां रखा जाए। एक स्वीपर आया और बाडी को ले कर एक हाल में गया जहां तमाम नंग धड़ंग लाशें पड़ी हुई थीं, ऐसे जैसे लाशों की कोई नुमाइश लगी हो। किसिम-किसिम की लाशें। यह नज़ारा देख कर आनंद जैसे हिल गया। बदबू का एक बवंडर सा उठा और आनंद उस हाल से सांस रोके बाहर आ गया। बाहर आ कर डाक्टर्स रूम में गया और डाक्टर से कहा कि, ‘बेटी को उस हाल की जगह कहीं और नहीं रखा जा सकता?’
‘अब बेटी कहां है सर?’ डाक्टर बोला, ‘अब वह बाडी है, सिर्फ़ एक लाश।’
‘तो भी लाशों के उस जंगल से उसे हटाया नहीं जा सकता?’
‘कहां रखना चाहते हैं आप?’ एक दूसरा डाक्टर तिलमिलाते हुए तल्ख़ हो कर बोला, ‘क्या आप चाहते हैं यहीं रख लें?’
‘ज़रा तमीज़ से बात कीजिए।’ आनंद उखड़ गया।
‘एक मिनट।’ पहले वाला डाक्टर आनंद से बोला, ‘नाराज़ मत होइए, बात समझिए।’ कहते हुए वह उठ खड़ा हुआ और आनंद को ले कर कमरे से बाहर आ गया। पीछे के एक कमरे में आया। वहां कुछ कबाड़ रखा था। उसने पूछा, ‘यहां रखवा दें?’
‘बिलकुल?’ अलमारी का एक ख़ाना दिखाते हुए आनंद बोला, ‘यहां रखवा दीजिए।’
‘ठीक है।’ कह कर उसने वहीं पान मसाले की पीक थूकी और उस स्वीपर को बुला कर कहा कि, ‘इनका केस यहां ला कर रख दो।’ फिर आनंद की ओर मुख़ातिब होते हुए बोला, ‘पर आप जानते हैं?’ वह बिना रुके बोला, ‘अल्टीमेटली काटने के लिए वहीं ले जाना होगा।’
‘तब की तब देखेंगे।’ आनंद बोला, ‘तब तक तो उसे सम्मान पूर्वक रखिए।’
‘चलिए आप ख़ुश हैं?’ डाक्टर बात को विराम देते हुए बोला।
‘अब इसमें ख़ुश होने की क्या बात है?’
‘कोई बात नहीं, आप पुलिस से पेपर ले आइए फिर हम लोग भी कुछ करें।’
‘ठीक है।’ कह कर आनंद मुनव्वर भाई को ले कर बाहर चलने लगा तो सादिया की अम्मी बोलीं, ‘भइया क्या हम यहीं रहें? कि हम भी साथ चलें?’
‘नहीं आप यहीं रहें।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘हम लोग अभी आते हैं।’
‘लेते चलते हैं इन को भी।’ आनंद ने सलाह दी।
‘नहीं-नहीं आप यहां बेटी को देखिए।’ मुनव्वर भाई ने जैसे फ़रमान जारी किया।
‘लेकिन...।’
‘नहीं, आनंद जी आप ज़रा समझिए कि कहीं उधर बेग़म ने देख लिया हम तीनों को एक साथ तो?’ वह बोले, ‘अभी तो बता सकते हैं कि अम्मी बेटी के साथ हैं।’
‘ओह।’
‘अब हम यहां बिटिया को क्या देखेंगे।’ साड़ी का पल्लू और शाल ठीक करती हुई सादिया की अम्मी बोलीं। वह जैसे पोस्टमार्टम हाउस की आबोहवा और बदबू से उकता गई थीं। लग रहा था कि अगर उन का वश चले तो वह यहां से भाग लें फ़ौरन। लेकिन मुनव्वर भाई के फ़रमान ने उन के हाथ-पांव बांध दिए थे।
मुनव्वर भाई के साथ आनंद बाहर आया। रिक्शा लिया और मेडिकल कालेज की पुलिस चौकी के लिए चल पड़ा।
रिक्शा वाला रिक्शा बहुत धीरे-धीरे चला रहा था। आनंद ने उस से कहा भी कि, ‘भइया ज़रा जल्दी चलो।’ पर वह ऐसे ही धीरे-धीरे चलता रहा। रिक्शे वाले की चाल से परेशान होकर मुनव्वर भाई बोले, ‘मैं ने पहले ही कहा था कि गाड़ी लेते चलिए।’
‘अब मुझे क्या पता था कि एंबुलेंस छोड़ कर चली आएगी।’ आनंद बोला, ‘आप को पता है कि इतने साल हो गए लखनऊ में रहते हुए पर पहली बार पोस्टमार्टम हाउस आया हूं। और लखनऊ क्या दुनिया के किसी भी पोस्टमार्टम हाउस पहली बार आया हूं।’
‘अरे यह भी कोई आने की जगह है।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘मेरा साबक़ा भी पहली बार ही पोस्टमार्टम हाउस से पड़ा है। क़ब्रिस्तान और श्मशान घाट तो कई बार गया हूं पर पोस्टमार्टम हाउस पहली बार।’
‘चलिए अब किया क्या जा सकता है।?’
‘नहीं आनंद जी ज़रा नेतागिरी भारी पड़ गई।’
‘वो कैसे?’
‘असल में मुख्यधारा की राजनीति से भले ख़ारिज हो गया होऊं पर ख़ून से नेतागिरी नहीं गई है। मेरी सांस-सांस में है राजनीति।’ वह बोले, ‘असल में डाक्टर को अपना कांग्रेसी परिचय दे दिया तो वह थोड़ा सक्रिय तो हुआ पर असली चोट दे दी उसने फूल से बच्ची का पोस्टमार्टम करवाने को लिख कर। सोचा होगा कि बाद में कहीं कोई बवाल न हो सो पोस्टमार्टम करवा कर मामला पक्का कर लें।’ वह बोलते रहे, ‘एक ग़लती और हो गई कि डाक्टर को या दाई को ही पैसे दे कर बेटी को ले लिए होते। या फिर पोस्टमार्टम हाउस में ही किसी दलाल को पकड़ कर मामला रफ़ा-दफ़ा करवा लिए होते।’
‘यह आप कह रहे हैं?’
‘हां, मैं ही कह रहा हूं।’ मुनव्वर भाई बगलें झांकते हुए बोले।
‘तो आप की आइडियालजी?’
‘आइडियालजी?’ मुनव्वर भाई अपनी हिप बाईं तरफ़ से हलका सा उठा कर बदबूदार हवा ख़ारिज करते हुए बोले, ‘ऐसे ही धीरे-धीरे आइडियालजी भी ज़िंदगी से ख़ारिज होती गई है, ऐसे ही बदबू मारती हुई।’
‘अफ़सोस नहीं होता?’ नाक दबाते हुए वह बोला।
‘होता तो है।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘पर इस बात पर कि साली आइडियालाजी ज़िंदगी में दाखि़ल ही क्यों हुई?’ वह ज़रा रुके और बोले, ‘आइडियालाजी, ने, नैतिकता और मूल्यों ने मेरा इतना नुक़सान किया है कि क्या बताऊं? साली जवानी ग़ारत हो गई। न इस ओर रहा, न उस ओर। शुरू ही से जो बेशर्म, भ्रष्ट और बेगै़रत रहा होता तो ज़िंदगी में इतनी असुविधा, इतनी क़िल्लत, इतनी ज़िल्लत न उठानी पड़ती।’ वह बोले, ‘आप जानते हैं कि अगर आइडियालाजी, नैतिकता, मूल्य जैसे खोखले शब्दों की आमद मेरी ज़िंदगी में नहीं हुई होती तो मैं भी एक कामयाब नेता होता आज की तारीख़ में। और जो मैं कामयाब नेता होता तो आज जो यह मेरी बेटी मरी है न, नहीं मरी होती।’ वह आनंद की ओर मुड़ कर बोले, ‘बोलिए मरी होती? आप ही बताइए?’
आनंद चुप रहा। क्या बोलता भला?
‘आप को बताऊं आज सिर्फ़ सद्दाम को फांसी नहीं हुई है, मेरी फूल सी बेटी के मर जाने के बाद आज मेरे बचे खुचे वसूलों को भी फांसी हुई है।’
मेडिकल कालेज की पुलिस चौकी के सामने रिक्शा खड़ा हो गया तो मुनव्वर भाई चुप हो गए। पुलिस चौकी में जाने पर पता चला कि अभी तक पोस्टमार्टम हाउस से कोई काग़ज़ नहीं आया है।
मुनव्वर भाई ने आनंद की ओर तीखी नज़रों से देखा और बोले, ‘अब क्या किया जाए?’
‘फिर से पोस्टमार्टम हाउस चला जाए और क्या?’
‘अब की तो अपनी कार ले लीजिए।’
‘आइए ले लेते हैं।’ कह कर आनंद ट्रामा सेंटर की तरफ़ चला। ट्रामा सेंटर के बाहर खड़ी कार जब वह स्टार्ट करने लगा तो मुनव्वर भाई बोले, ‘आप का ड्राइवर कहां गया? क्या छुट्टी पर है?’
‘नहीं हटा दिया है।’
‘क्यों?’
‘ख़र्चा कम करने के लिए।’ कहते हुए आनंद के पेट में भूख की एक मरोड़ सी उभरी। सड़क के किनारे कुछ खाने पीने की चीजें़ देख कर उस का मन हुआ कि कुछ ले कर खा पी ले। क्यों कि अब भूख उसे सता रही थी। पर यह मौक़ा ठीक नहीं लगा खाने-पीने के लिए सो वह ज़ब्त कर गया। लेकिन मुनव्वर भाई खाना खा लिए थे, उन के पेट में भूख की मरोड़ नहीं थी सो वह बोल रहे थे और लगातार बोल रहे थे, ‘आप तो नौकरी कर रहे हैं आनंद जी। भाभी जी भी नौकरी कर रही हैं फिर भी आप को ख़र्चे कम करने पड़ रहे हैं?’
‘हां, मुनव्वर भाई।’ आनंद बोला, ‘राजनीति छोड़ कर नौकरी की ही इसी लिए कि आइडियालाजी, मूल्य, नैतिकता को तिलांजलि दिए बिना या कहूं कि बिना पतन के परिवार की ज़िम्मेदारियां पूरी कर सकूं।’
‘तो आप ने भी मुझे पतन के पलीते में बांध दिया?’ वह आंखों में आग भर कर बोले।
‘नहीं मैं ने ऐसा कुछ नहीं कहा।’ आनंद ने संजीदगी से कहा, ‘मैं तो अपनी सीमाएं बता रहा हूं।’
‘चलिए शुक्रिया।’
‘किस बात का?’
‘कि आप ने मेरी सीमाओं में परवेस नहीं किया।’ मुनव्वर भाई प्रवेश को आदतन कि इरादतन परवेस ही बोलते थे। वह बोले, ‘फिर भी आप प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करते हैं तो क्या मूल्य, नेैतिकता, आइडियालाजी को गंवाए बिना नौकरी करते हैं? कोई कंप्रोमाइज़ नहीं करते?’
आनंद चुप रहा।
‘नो कंप्रोमाइज़?’ मुनव्वर भाई ने अपना सवाल फिर दुहराया। ऐसे गोया वह सवाल नहीं कर रहे हों, हथौड़ा मार रहे हों। और यह हथौड़ा भी आनंद के दिमाग़ पर इस क़दर पड़ा कि वह हड़बड़ाहट में बिना क्लच लिए गेयर बदलने लगा। गेयर बाक्स टूटते-टूटते बचा। हड़बड़ा कर उसने एक्सीलेटर छोड़ कर क्लच पर पैर लगाया और कस कर दबाया। लेकिन तब तक गाड़ी बंद हो गई। पीछे से दूसरी गाड़ी ने टक्कर मार दी। गेयर बाक्स टूटने से बचा तो जो बंपर पहले से टूटा था, और टूट गया। खैर गाड़ी उसने फिर से स्टार्ट की। बुद्धा पार्क में बच्चों को खेलते देख कर मुनव्वर भाई आह भर कर बोले, ‘अगर मेरी बेटी भी ज़िंदा होती तो ऐसे ही खेलती न?’
‘हूं।’ मुंह गोल करते हुए आनंद बोला। फिर दोनों चुप हो गए।
पोस्टमार्टम हाउस के पास पहुंच कर सड़क के एक किनारे गाड़ी खड़ी कर दोनों पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे। हैरान परेशान सादिया की अम्मी बोलीं, ‘क्या हुआ काम हो गया?’
‘कहां हुआ?’ मुनव्वर भाई खीझते हुए डाक्टरों के पास गए और भड़कते हुए बोले, ‘पुलिस चौकी में अभी तक तो कोई काग़ज़ आप का पहुंचा नहीं?’
‘पहुंचेगा कैसे?’ एक डाक्टर विवाद से बचता हुआ बोला, ‘यहां से काग़ज़ ले कर जाने वाला दीवान अभी तक यहां से गया ही नहीं।’ डाक्टर ने उसे बाहर की तरफ़ इंगित करते हुए कहा, ‘वो देखिए वहां खड़ा मोबाइल पर बात कर रहा है।’
‘पर आप तो कह रहे थे कि काग़ज़ गया।’
‘हां, मैंने तो तभी भेज दिया था। पर जब यह यहां से गया ही नहीं, तो हम क्या कर सकते हैं?’ डाक्टर बोला, ‘जाइए उसी से पूछिए।’
‘अजीब हाल है।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘किसी की कोई जवाबदेही है ही नहीं।’ वह ज़रा रुके और बड़बड़ाए, ‘सारा शोग़, सारा तनाव ग़ुस्से और फज़ीहत में बदल दिया है। जैसे यहां सब के सब अनह्यूमन हो गए हैं।’ बड़बड़ाते हुए ही वह दीवान के पास गए पर वह मोबाइल पर ही लगा रहा। जब ज़्यादा हो गया तो मुनव्वर भाई बड़ी दयनीयता से हाथ जोड़ कर दीवान से बोले, ‘कुछ मानवता भी है आप में बची हुई या वह भी शर्म में घोल कर पी गए हैं।’
‘आप चलिए बस मैं पहुंच रहा हूं।’ मोबाइल पर बात करते हुए ही वह पूरी लापरवाही से ऐसे बोला जैसे उसने मुनव्वर भाई की बात सुनी ही नहीं हो, बस देखते ही डायलाग मार दिया हो।
‘आप के पास अगर समय न हो तो काग़ज़ मुझे दे दीजिए, मैं ही पहुंचा देता हूं।’ मुनव्वर भाई ने फिर याचना की।
‘काग़ज़ आप को कैसे दे दूं?’ वह उलटे घुड़प कर बोला, ‘कहा न चलिए मैं पहुंच रहा हूं दो काग़ज़ और तैयार हो रहे हैं। अकेले कोई आप का ही केस नहीं है।’
‘आइए मेरे साथ मेरी गाड़ी में चले चलिए और बातें भी करते रहिए।’
‘मोटर साइकिल है मेरे पास।’ वह फिर लापरवाही से बोला, ‘कहा न अभी दो केस का लेटर और लेना है।’
‘बड़े हृदयहीन हैं आप लोग भई।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘यहां बिटिया मर गई है और इन लोगों ने उसे केस बना दिया है। बताइए।’ आनंद की तरफ़ देखते हुए रुंधे गले से वह बोले, ‘बताइए क्या ज़माना आ गया है।’ और फिर फफक कर रो पड़े।
आनंद ने उन्हें दिलासा दिलाते हुए चुप करवाया और बोला,‘क्या कीजिएगा सिस्टम ही चौपट हो गया है। और सिस्टम के तराज़ू में मानवीयता नहीं अमानवीयता का ही बोलबाला रहता है।’
‘अब क्या करूं बेटी की मौत ने तोड़ दिया है आनंद जी।’ कहते हुए मुनव्वर भाई फिर फफक पड़े। आनंद ने उन्हें फिर पकड़ा और उन का हाथ पकड़े पोस्टमार्टम परिसर के बाहर आने लगा तो सादिया की अम्मी भी पीछे-पीछे आती हुई बोलीं, ‘हम भी आ जाएं भइया।’
‘आ जाइए।’ आनंद ने धीरे से कहा।
मुनव्वर भाई ने भी कोई ऐतराज़ नहीं किया।
गाड़ी स्टार्ट करने के पहले आनंद ने घड़ी देखी शाम के पौने चार बज गए थे। वापसी में रास्ते में फिर बुद्धा पार्क पड़ा। मुनव्वर भाई ने फिर बड़ी हसरत से आइसक्रीम खाते बच्चों को देखा पर अब की वह चुप रहे।
रेलवे पुल के नीचे तिराहे पर वह गाड़ी मेडिकल कालेज की तरफ़ मोड़ ही रहा था कि मुनव्वर भाई कार में रेडियो पर बज रहे ‘कजरारे-कजरारे तेरे कारे-कारे नयना’ की ओर इंगित करते हुए कहा, ‘आनंद जी इसे तो बंद कर दीजिए।’ वह रुके और बोले, ‘या कि आप भी अमानवीय हो गए हैं?’
‘सॉरी।’ आनंद बोला, ‘वेरी सॉरी। असल में गाड़ी स्टार्ट के साथ ही यह भी आटोमेटिक स्टार्ट हो जाता है।’ कहते हुए उसने मोड़ गुज़रने के बाद रेडियो बंद कर दिया।
‘हां भई सिस्टम है।’ मुनव्वर भाई ऐसे बुदबुदाए गोया वह आनंद को जूता मार रहे हों।
आनंद यह सुन कर थोड़ा आहत हुआ पर ख़ामोश रहा मुनव्वर भाई के दुख को समझते हुए।
पुलिस चौकी पहुंच कर आनंद ने चौकी इंचार्ज को अपना परिचय दिया, सारी बात बताई, साथ ही दीवान की लापरवाही और बदसलूक़ी भी।
चौकी इंचार्ज से आनंद ने कहा कि ‘डायन भी सात घर छोड़ देती है पर आप लोग तो डायन को भी फेल किए हुए हैं।’ उसने मुनव्वर भाई की ओर इंगित करते हुए कहा कि, ‘बेटी का शोक भी इन की फ़ज़ीहत में कनवर्ट हो गया है।’ कहते हुए उसने मोबाइल निकाल लिया और पूछा कि, क्या अब इस काम के लिए भी एस.एस.पी. या आई.जी., डी.आई.जी. से कहलवाना पड़ेगा।’
‘आप नाराज़ न हों।’ चौकी इंचार्ज बोला, ‘कृपया बैठें। इतना ऊपर जाने की ज़रूरत नहीं है। और कोई काम एस.एस.पी. या डी.आई.जी. के कहने पर करने से अच्छा है आप ही के कहने से कर दें।’ वह बोला, ‘मैं ख़ुद दीवान को बुलाता हूं।’ कह कर अपने मोबाइल से दीवान का मोबाइल मिलाने लगा। मोबाइल से नंबर मिलते ही उसने दीवान को डपटना शुरू कर दिया। गालियां दीं और कहा कि, ‘आदमी नहीं पहचानते हो, हर जगह शिकार ढूंढते हो।’ उसने जोड़ा, ‘जो भी काग़ज़ मिल गया हो, न मिला हो उस से हमें कोई मतलब नहीं, दस मिनट के अंदर हमें तुम्हारा थोबड़ा चौकी में दिख जाना चाहिए।’ कह कर वह आनंद की तरफ़ पलटा, ‘चाय पिएंगे।’
‘ये चाय पीने की न तो जगह है, न यह मौक़ा है।’ आनंद ने धीरे से कहा।
‘राइट-राइट।’ कहते हुए वह बोला, ‘आप को पोस्टमार्टम हाउस जाना ही नहीं चाहिए था। सीधे यहीं आना चाहिए था। हम फ़ौरन काग़ज़ बनवा देते। फिर आप गए होते पोस्टमार्टम हाउस।’
‘आप यहां होते तब तो।’ आनंद बोला, ‘हम लोग एक बार यहां से लौट चुके हैं। आप का मोबाइल नंबर तक तो यहां किसी को मालूम नहीं था, या बताना नहीं चाहते थे ...... अब क्या कहूं?’
‘पुलिस की नौकरी ससुरी है ही ऐसी।’ चौकी इंचार्ज़ बुदबुदाया।
‘ख़ैर यह बताइए कि ज़रा हमारा एक फ़ेवर कर लेंगे?’ आनंद ने कहा, ‘आप चाहें तो अभी भी मेरी मदद कर सकते हैं।’
‘जी बिलकुल। बताएं!’
‘यही कि पोस्टमार्टम से बचा दें बेटी की बाडी को!’
‘मुश्किल है।’ मुंह सिकोड़ते हुए वह बोला, ‘आप को ट्रामा सेंटर में ही सीधा डेथ सर्टिफ़िकेट बनवा लेना था। पर अब तो काग़ज़ पोस्टमार्टम हाउस तक पहुंच चुका है।’
‘नहीं, पोस्टमार्टम हाउस वाले भी और ट्रामा सेंटर के डाक्टर्स भी कह रहे थे कि पुलिस अगर चाहे तो पोस्टमार्टम के बिना भी काम चल सकता है। आप सीधा पंचनामा बनवा सकते हैं।’
‘सब साले अपनी-अपनी बला टालते हैं।’
‘आख़िर फूल सी बच्ची है। बमुश्किल साल सवा साल की।’ आनंद ने भावुक हो कर कहा, ‘हम पर न सही, उसी पर तरस खा लीजिए।’
‘नो सर।’ चौकी इंचार्ज़ बोला, ‘पोस्टमार्टम तो करवाना पड़ेगा। तभी पंचनामा बनेगा। हां, इतना ज़रूर करवा देंगे कि सिंबालिक पोस्टमार्टम हो, ज़्यादा चीर फाड़ न हो और जल्दी हो जाए।’
‘कोई रास्ता नहीं बनता।’ आनंद ने फिर रिक्वेस्ट की।
‘असल में बर्न केस है न। मेडिकोलीगल केस हो गया। करना तो पड़ेगा पोस्टमार्टम।’ कहते हुए चौकी इंचार्ज अचानक चहका, ‘देखिए हमारा दीवान भी आ गया।’
‘जय हिंद सर!’ दीवान ने आते ही चौकी इंचार्ज को सैल्यूट ठोका।
‘जय हिन्द!’ चौकी इंचार्ज बोला, ‘फ़टाफ़ट इन का काग़ज़ तैयार कर लाओ और जा कर ख़ुद खड़े हो कर सिंबालिक पोस्टमार्टम करवाओ। विद आउट टाईम।’
‘राईट सर।’
‘तुम भी इस की मदद करो भई।’ एक दूसरे दीवान से चौकी इंचार्ज ने कहा।
थोड़ी देर में पेपर्स बन गए। मुनव्वर भाई और सादिया की अम्मी को ले कर आनंद फिर पोस्टमार्टम हाउस चला। पीछे-पीछे दीवान भी पेपर्स ले कर अपनी मोटरसाईकिल से चला। हालां कि वह जल्दी ही आनंद की कार से आगे निकल गया। जाने गुस्से में था कि तेज़ी में। पर निकल गया।
रास्ते भर तीनों निःशब्द थे। कार का रेडियो बंद था। पर ट्रैफ़िक का शोर ज़्यादा था। शाम हो जाने से ठंड भी पांव पसार रही थी। पक्षियों के झुंड अपने-अपने घरों की ओर जा रहे थे और आनंद, मुनव्वर भाई, सादिया की अम्मी पोस्टमार्टम हाउस की ओर।
पक्का पुल के पास वाले मोड़ पर आनंद ने देखा कि सूरज डूबते-डूबते लाल हो रहा था। उसने सोचा और शिद्दत से सोचा कि सूरज उगते समय भी लाल और डूबते समय भी लाल क्यों होता है? उस के इस तरह लाल होने के भी क्या कोई निहितार्थ हैं? यही सोचते-सोचते उसने कार पोस्टमार्टम हाउस के पास रोक कर सड़क के किनारे पार्क कर दी।
उधर सूरज लाल हो कर डूब रहा था और इधर मुनव्वर भाई, सादिया की अम्मी और आनंद बुझ रहे थे। थकावट, शोक, असुविधाओं और सिस्टम के जाल ने इन तीनों को ज़ीरो वाट के बल्ब सरीखा बना दिया था। जाने सादिया बेचारी का क्या हाल होगा? आनंद ने सोचा और उसे अपनी अम्मा याद आ गई। जो वह लखनऊ में बीमार होता है या किसी क़िस्म की तकलीफ़ में पड़ता है, बच्चे भी बीमार होते हैं, या चोट खा जाते हैं तो गांव में बैठी अम्मा बिना किसी सूचना के ही खाना-पीना छोड़ बैठती है। उस के दिल में खलबली मच जाती है। कहती है, ‘ज़रूर कहीं कुछ गड़बड़ हुआ है, खाना अच्छा नहीं लग रहा।’
तो क्या सादिया के दिल में भी खलबली नहीं मची होगी? आख़िर वह भी तो मां है। और उस की फूल सी बेटी तो बीमार भी नहीं है, दुनिया से कूच कर गई है। क्या उस के स्तन में दूध नहीं भटक रहा होगा? अपनी बेटी के लिए उस का दिल नहीं तड़प रहा होगा? जमील ख़ैराबादी की गज़ल का एक शेर उसे याद आ जाता है, ‘इक-इक सांस अपनी चाहे नज्ऱ कर दीजै/मां के दूध का हक़ फिर भी अदा नहीं होता।’ तो यह सादिया का दूध अपनी बेटी के लिए कैसे नहीं तड़प रहा होगा? उसने सोचा। और यह भी सोचा कि मुनव्वर भाई सादिया के मातृत्व के साथ क्या नाइंसाफ़ी नहीं कर रहे? आखि़र बेटी की मौत मां से कब तक छुपा पाएंगे? पोस्टमार्टम हाउस के बरामदे में खड़ा वह मुनव्वर भाई से पूछता भी है तो वह एक ठंडा सा जवाब देते हैं, ‘जब तक संभव बनेगा, तब तक।’

आनंद की देह में जाड़ा और पसर जाता है।

पोस्टमार्टम हाउस में अब की तिबारा खडे़-खड़े आधा घंटे हो गए हैं। सादिया की अम्मी बेतरह थक गई हैं। लगता है खड़े-खडे़ वह गिर जाएंगी। आनंद उनसे रिक्वेस्ट करता है कि वह चल कर कार में बैठ जाएं। वह मान जाती हैं। सादिया की अम्मी को कार की पिछली सीट पर वह लेट जाने को कहता है तो वह पैर मोड़ कर शाल ओढ़ कर लेट जाती हैं। वह वापस पोस्टमार्टम हाउस के बरामदे में आ जाता है। थोड़ी देर खड़े-खड़े जब वह थक जाता है तो सारी थकावट, सारे शोक का गुस्सा भीतर बैठे डाक्टरों पर उतारते हुए जैसे फट पड़ता है, ‘आख़िर कब होगा बेटी का पोस्टमार्टम।’
‘बस थोड़ी देर और!’
‘सुनते-सुनते कान पक गए हैं कि थोड़ी देर और, थोड़ी देर और।’
‘आप प्लीज़ बाहर जाएंगे?’ एक बुज़ुर्ग सा डाक्टर धीरे से बोलता है।
‘नहीं, हम नहीं जाएंगेे।’ आनंद चीख़ा, ‘क्यों जाएं बाहर हम?’
‘हमें थोड़ा काम कर लेने दें।’ वह हाथ में लिए कुछ चार्ट दिखाता हुआ कहता है, ‘कुछ टैली हैं, कुछ क्वैरीज़ हैं, इन को पूरा कर लें तभी आप का केस हो पाएगा।’
‘इसे बाद में नहीं कर सकते?’
‘नही, आब्ज़र्वेंशंस ग़लत हो जाएंगे।’ वह बोला, ‘मर्डर है कि सुसाइड इन्हीं डिटेल्स की टैली पर डिपेंड करेगा। प्लीज़।’
‘आनंद जी प्लीज़!’ मुनव्वर भाई भी आनंद के कंधे पर धीरे से हाथ रखते हुए बोले।
आनंद डाक्टरों के कमरे से बाहर आ कर बरामदे में फिर खड़ा हो गया। कि तभी पुलिस चौकी वाला दीवान दिख गया। बाक़ी गुस्सा उसने उस दीवान पर निकाला। बोला, ‘तुम लोग बिना पैसा लिए लाश भी नहीं छोड़ते?’
‘क्या करें साहब नीचे से ऊपर तक सबका बंधा है।’ वह पूरी ढिठाई और बेशर्मी से बोला, ‘आप लोग बड़े आदमी हैं, इतना भी नहीं समझते।’ जहां पैसा के बिना एक क़दम नहीं उठता वहां आप लोग दबाव और सिफ़ारिश से काम करवाने में लगे हैं।’
‘तो पहले ही बताए होते।’ मुनव्वर भाई खुसफुसाए।
‘क्या बताते आप लोग तो नेतागिरी झाड़ रहे थे।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘वहीं पुलिस चौकी में ही चढ़ावा चढ़ा दिए होते तो पोस्टमार्टम हाउस आने की ज़रूरत ही नहीं पढ़ती। वहीं तुरंत-फुरंत पंचनामा हो गया होता। पर आप लोग चौकी इंचार्ज की चिकनी चुपड़ी बातों में फंस कर सब कुछ फ्ऱी में करवाने में लगे रहे।’
‘तो अब से नहीं हो सकता?’ मुनव्वर भाई खुसफुसाए।
‘अब क्या होगा?’ वह बिदका और बोला, ‘चौकी इंचार्ज से बात करिए।’
‘उस का मोबाइल नंबर दो।’
‘पर यहां डाक्टरों को भी पटाना पड़ेगा।’ दीवान बुदबुदाया।
‘कुल ख़र्च कितना हो जाएगा?’
‘यही कोई दस हज़ार।’ दीवान बुदबुदाया और धीरे से वहां से सरकने लगा।
‘चौकी इंचार्ज़ का मोबाइल नंबर बताओ।’ डपटता हुआ आनंद बोला।
‘नंबर ले कर क्या करेंगे?’ दीवान बुदबुदाया, ‘सारा काम यहीं हो जाएगा।’
‘तो भी नंबर तो बता दो।’
‘ले लीजिए।’ कह कर वह बोला, ‘हो सकता है, वह कुछ बढ़ा दें।’ और चौकी इंचार्ज का मोबाइल नंबर दे दिया। आनंद ने वह नंबर तुरंत मिलाया। पर स्विच आफ़ मिला। उसने बार-बार मिलाया और हर बार स्विच आफ़ मिला। वह आजिज़ आ गया। और बौखलाया हुआ डाक्टरों के कमरे में घुसा। बोला, ‘आख़िर क्या रेट है आप लोगों का जल्दी पोस्टमार्टम करने का?’
‘क्या बात कर रहे हैं?’ एक डाक्टर उसी तल्ख़ी से बोला।
‘नहीं यह बताइए कि क्या तनख़्वाह नहीं मिलती आप लोगों को?’
‘मिलती है, बिलकुल मिलती है।’ कहते हुए तीनों डाक्टर एक साथ उठ खड़े हुए।
‘तो फिर बिना रिश्वत के ख़र्चा नहीं चलता?’ आनंद चीख़ा, ‘लाशों पर भी रिश्वत! हद है!’

आनंद चीख़ रहा था। इस चीख़ में गुस्सा भी था और भूख भी। साथ ही मूल्यों में जीने की घिघियाहट भी। इधर आनंद चीख़ रहा था, उधर दीवान दुम दबा कर मोटरसाईकिल स्टार्ट कर रहा था वहां से भागने के लिए। इतने में एक डाक्टर आनंद के पास हाथ जोड़े आया.. बोला, ‘दस मिनट का समय देंगे?’

‘तब से समय ही तो दे रहा हूं।’ आनंद खिन्न हो कर बोला।

....जारी....

लेखक दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424, This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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