आप बाहर तो बहुत डेमोक्रेटिक बनते हैं, पर घर में इस क़दर तानाशाही?

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दयानंद पांडेय: उपन्यास-  ''वे जो हारे हुए'' : भाग (2) : डाक्टर कमरे से निकल कर अंदर हाल में गया जहां लाइन से लाशें रखी हुई थीं। एक स्वीपर को पकड़ कर लाया। जो मुंह पर कपड़ा बांधे हुए था, पर उस की आंखें बता रही थीं कि वह शराब में धुत है। डाक्टर बग़ल के कमरे में बेटी की बाडी दिखाते हुए उसे बताने लगा कि कहां-कहां से क्या-क्या काटना है। उसने डाक्टर की बात को ग़ौर से सुना और बेटी का शव ले कर हाल में चला गया।

पांच मिनट बाद वह डाक्टर भी हाल की ओर जाता दिखाई दिया।

पीछे-पीछे आनंद भी चला गया।

हाल में जगह-जगह किसिम-किसिम की नंग धड़ंग लाशें पड़ी हुई थीं। ऐसे जैसे किसी खेत में झाड़ झंखाड़ उग आए हों। खूब ढेर सारी बदबू मारती हुई लाशें, तय करना मुश्किल था कि कौन सी बदबू किस लाश की है। नथुनों में बदबू भरते ही आनंद उस हाल से बाहर भाग आया। लगभग दौड़ते हुए।
‘क्या हुआ?’ घबरा कर मुनव्वर भाई ने पूछा।
‘कुछ नहीं। लगता है दो चार दिन अब सो नहीं पाऊंगा। सोऊंगा भी तो सपनों में लाशें ही तैरेंगी।’ आनंद हताश हो कर बोला।
‘तो उधर जाने की क्या ज़रूरत थी?’ मुनव्वर भाई किचकिचाए।
‘अब तो ग़लती हो गई।’
‘आप अभी दोपहर में भी गए थे।’
‘अब क्या करूं ग़लती दुबारा हो गई।’ आनंद बोला।
मुनव्वर भाई चुप रहे। ऐसे गोया उन्हों ने उसे माफ़ नहीं किया हो।
‘दफन के लिए कुछ दोस्तों को बुला लूं?’ आनंद ने धीरे से पूछा।
‘नहीं कोई ज़रूरत नहीं।’ मुनव्वर भाई बड़ी सख़्ती से बोले, ‘बड़ा बेमुरव्वत है यह आप का लखनऊ शहर।’
‘तो?’
‘अपने शहर ले जाऊंगा।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘वहां अपने लोग हैं, अपना शहर है, अपना घर है।’ उन के इस अपना घर है बोलने में एक फ़िल्मी गाने की जैसे गूंज थी, ‘अपना घर फिर अपना घर है! आ अब लौट चलें!’
‘कैसे ले जाएंगे?’
‘कोई टैक्सी ले लेंगे।’
‘कहीं बात हुई क्या?’
‘नहीं, मेरी बात तो नहीं हुई।’ वह बोले, ‘आप कोई टैक्सी बुलवा दीजिए।’
‘ठीक बात है।’

‘चलिए आप टैक्सी देखिए मैं ज़रा अपना मोबाइल चार्ज कर लूं। रात में रास्ते में काम आएगा।’ कह कर वह डाक्टरों के कमरे में घुस गए। और आनंद टैक्सी के जुगाड़ में लग गया। पहले दो तीन दोस्तों से फ़ोन करके कहा कि किसी ट्रेवलिंग एजेंसी से बात कर के कोई टैक्सी का बंदोबस्त तुरंत करें। और दो ट्रेवलिंग एजेंसियों का नंबर ले कर ख़ुद भी बतियाने में लग गया। लेकिन सब बेकार गया। लाश ले कर कोई भी चलने को तैयार नहीं हुआ। यह बताने पर कि, ‘अरे छोटी बच्ची है।’

‘तो क्या हुआ? है तो लाश ही।’ कह कर कोई भी तैयार नहीं हुआ।
‘तो क्या अब लाश गाड़ी लेनी पड़ेगी?’ मुनव्वर भाई घबराए, ‘वह तो साले बहुत पैसा लेंगे।’
‘इसी लिए तो कह रहा हूं कि यहीं दफ़न कर दीजिए।’
‘नहीं यहां तो नहीं।’ मुनव्वर भाई फिर सख़्त हो गए।
‘तो ऐसा कीजिए कि ट्रेन से चले जाइए।’
‘ऐसे? और इस हाल में?’
‘किस को पता पड़ेगा?’ आनंद बोला, ‘किसी को कुछ बताने की ज़रूरत ही क्या है?’
‘नहीं-नहीं’ मुनव्वर भाई बोले, ‘ट्रेन में नहीं। दिक़्क़त हो जाएगी।’
‘फिर?’
‘आप ही अपनी कार से क्यों नहीं पहुंचा देते?’
‘रात में मुझे कार चलाने में दिक़्क़त होगी।’ आनंद बोला, ‘सात आठ घंटे का रास्ता है। वह भी हाईवे पर और जो कहीं कोहरा-वोहरा मिल गया तो? फिर कल आफ़िस जाना ज़रूरी है। आज ही दो-दो मीटिंग छोड़ चुका हूं।’
‘संडे के दिन भी मीटिंग?’
‘हां भई, प्राइवेट सेक्टर है।’
‘तो?’
‘यहां से बेटी का शव ले लेते हैं। फिर वहीं मेडिकल कालेज के पास लाश गाड़ियां खड़ी रहती हैं, चल कर ले लेंगे।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘ज़रा बाहर चल कर सादिया की अम्मी को देख लें। बेचारी कार में अकेली हैं।’
‘हां-हां।’

बाहर जा कर आनंद ने देखा सादिया की अम्मी कार में लेटी पड़ी थीं। लेटी-लेटी बाहर ही टुकुर-टुकुर देखे जा रही थीं। उन की आंखों में बेबसी और चेहरे पर लाचारी बिजली के खंभे की रोशनी में साफ़ पढ़ी जा सकती थी। उन दोनों को देखते ही वह उठ बैठीं। हाथ के इशारे से उसने उन्हें लेट जाने को कहा। वह लेट गईं। वापस पोस्टमार्टम हाउस कैंपस में आने लगा तो उस ने देखा कि कुछ मार्शल टाइप जीपें भी वहां खड़ी थीं जो दूर से लाशगाड़ी ही की तरह थीं। पास जा कर पता किया तो वास्तव में वह लाशगाड़ी ही निकलीं। और टैक्सी के रेट पर ही जाने को भी तैयार हो गए उन के ड्राइवर। तुरंत एडवांस दे कर उन्हें रोक लिया आनंद ने और मुनव्वर भाई से कहा कि, ‘चलिए यह एक काम भी हो गया।’ पर मुनव्वर भाई कुछ बोले नहीं।

भीतर जा कर डाक्टर से आनंद ने कहा, ‘भई आप का दस मिनट डेढ़ घंटे में बदल गया है। आखि़र और कितना टाइम लगेगा?’
‘कुछ नहीं बस हुआ समझिए। इधर पेपर्स आप के तैयार हो रहे हैं और उधर सिलाई चल रही है।’
‘सिलाई? आनंद चौंका।
‘अरे जनाब बाडी काटी गई है तो उसकी सिलाई भी तो होगी।’
‘अच्छा-अच्छा।’
‘क्या बाडी ज़्यादा काट दी गई है?’ मुनव्वर भाई ने धीरे से पूछा।
‘नहीं-नहीं।’ डाक्टर बोला, ‘बस थोड़ा सा। और वह भी आप को पता नहीं चलेगा। जिस बैंडेज में आप लोग लाए थे उसी में फिर से पैक कर देंगे। कुछ पता नहीं चलेगा।’
डाक्टर की बात पर दोनों कुछ बोले नहीं। दोनों ही चुप रहे।
थोड़ी देर में मुंह पर कपड़ा लपेटे वह आदमी आया और डाक्टर के कमरे में घुसा तो पीछे-पीछे आनंद और मुनव्वर भाई भी गए। उसने डाक्टर को बताया कि, ‘सिलाई हो गई है। बाडी ले आऊं?’
‘नहीं, अभी नहीं।’ कह कर उसने पेपर्स आनंद के हाथ में दिए और कहा कि, ‘इसे ले कर पुलिस चौकी चले जाइए।’
‘फिर?’
‘फिर क्या वह पंचायतनामा बना देंगे। फिर यहां आइए।’
‘क्या बेवजह की कसरत करवा रहे हैं आप लोग भी।’
‘अब क्या करें सर प्रोसीजर है।’ डाक्टर मुसकुरा कर बोला।
ख़ैर, मुनव्वर भाई को ले कर आनंद पोस्टमार्टम हाउस के बाहर आया। बाहर आ कर देखा कि वह लाशगाड़ी वाली मार्शल ग़ायब थी। उस का कलेजा धक से रह गया। कि साला इस मुसीबत में भी पैसे ले कर भाग गया। पास खड़ी दूसरी मार्शल लाशगाड़ी के ड्राईवर से पूछा तो वह बोला, ‘भागा नहीं है। खाना खाने गया है। आप के जाने के समय तक आ जाएगा। तब तक आप अपनी कार्रवाई पूरी करिए। आप की कार्रवाई पूरी होने से पहले ही आ जाएगा।’
‘तब भी उस को हमें बता कर जाना चाहिए था।’ आनंद ने शिकायती लहजे में कहा।
‘आप के पास बुकिंग रसीद है न?’
‘हां है।’
‘तो फिर वह कहीं नहीं जाएगा।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘वैसे भी पैसा पकड़ने के बाद कोई कहां भाग कर जाएगा?’
‘लेकिन मान लो हमारी कार्रवाई अभी पूरी हो जाए।’
‘कहां साहब।’ वह ड्राइवर बोला, ‘लोगों को दो दिन, तीन दिन लग जाते हैं। आप को तो कुछ घंटे ही हुए हैं।’
‘तुम को कैसे मालूम?’
‘अरे जनाब यहीं दिन रात रहते हैं तो क्या नहीं मालूम?’
‘तो क्या हम लोगों को भी दो दिन लग जाएंगे?’ मुनव्वर भाई घबराए।
‘नहीं आप का केस तो हो गया है, सुना।’
‘ठीक है।’ आनंद बोला, ‘उस ड्राइवर के पास कोई मोबाइल है?’
‘हां है।’ ड्राइवर बोला, ‘आप की रसीद पर भी नंबर होना चाहिए। फिर भी लिख लीजिए।’

नंबर लेकर उस का मोबाइल नंबर तुरंत मिलाया तो स्विच आफ़ मिला। बताया उस ड्राइवर को। तो वह फिर बोला, ‘घबराइए नहीं, वह आप के समय पर यहीं मिलेगा।’
‘चलिए मुनव्वर भाई, पहले चौकी चलें। बाद में इस को देख लेंगे।’ कह कर आनंद ने मुनव्वर भाई का हाथ पकड़ कर खींच लिया।
पुलिस चौकी के रास्ते में तीनों ख़ामोश रहे। बस आती जाती ट्रैफ़िक का शोर था। ट्रैफ़िक का शोर और बेटी का शोक मिल कर एक ऐसी यातना, एक ऐसी ख़ामोशी रच रहे थे कि उसे किसी वायलिन के तार पर ही अभिव्यक्ति मिल सकती थी। यातना और ख़ामोशी के तनाव की अभिव्यक्ति।
पुलिस चौकी में पहुंच कर यह तनाव और बढ़ गया जब पता चला कि चौकी इंचार्ज नहीं है, न ही मुंशी। चौकी इंचार्ज का मोबाइल फिर स्विच आफ़ मिला। थोड़ी देर बाद आनंद ने एस.एस.पी. का मोबाइल मिलाया। वह लगातार बिज़ी था। कि तभी पुलिस चौकी का मुंशी आ गया। मुंशी के आते ही आनंद उस पर बरस पड़ा।
‘ताव मत खाइए सर।’ मुंशी बोला, ‘चौकी इंचार्ज साहब नहीं हैं तो क्या हुआ? आपका काम तो नहीं रुक रहा है?’
‘उन की दस्तख़त कौन करेगा।?’
‘यह देखिए साहब, दस्तख़त कर के आधी कार्रवाई वह पूरी कर गए हैं। बाक़ी कार्रवाई आप लोगों का नाम-गांव और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का ब्यौरा बस भरना है।’
‘ठीक है-ठीक है। आप अपनी कारवाई जल्दी करिए।’
‘पोस्टमार्टम हाउस से जो काग़ज़ लाए हैं वह पहले दीजिए।’
‘लीजिए।’
‘अपना नाम बताइए।’
‘मुनव्वर आलम ख़ा।’ मुनव्वर भाई ज़रा रुके और बोले, ‘मु लगा के लिखिए मुनव्वर। मो मत लगाइएगा।’ सुन कर इस कठिन घड़ी में भी आनंद को हंसी आ गई। हालांकि वह ज़ाहिर तौर पर नहीं हंसा और टाल गया। पर वह पुरानी याद नहीं टाल पाया जब मुनव्वर भाई बोले कि मु लगा के लिखिए मुनव्वर। उनका पुराना नाम अख़बार डायरी ख़ा याद आ गया। हालांकि डायरी अभी भी उनके हाथ में थी, अलबत्ता, अख़बार नहीं था। जब कि सुबह जब वह मिला था तब उन के हाथ में डायरी और अख़बार दोनों ही बदस्तूर थे। दरअसल कुछ आदतें, कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो आदमी जिंदगी भर नहीं छोड़ पाता। ऐसी ही शायद मुनव्वर भाई की यह आदत थी।
मुंशी डिटेल पूछता जा रहा था और मुनव्वर भाई बिना आपा खोए यंत्रवत जवाब देते जा रहे थे। अंत में हुआ कि पांच लोगों को लाइए जो पंचनामे पर दस्तख़त कर सकें। मुंशी ने पूछा भी कि, ‘पांच लोग हैं क्या?’
‘थोड़ा समय दीजिए तो पांच क्या पचास लोगों को बुला दूं।’ आनंद कुढ़ कर बोला।
‘क्या रात यहीं काटनी है?’ मुंशी तरेर कर बोला, ‘मुझे तो घर जाना है। बस आप के काम के लिए ही रुका हूं।’ वह बोला, ‘पचास नहीं सिर्फ़ पांच लोग। न हों तो बताइए।’
‘पांच लोग तो हैं। आनंद बोला।
‘पांच कहां चार लोग।’ मुनव्वर भाई आनंद का हाथ पकड़ते हुए बोले।
‘क्यों?’ आनंद बोला, ‘हम आप दो। सादिया, सादिया की अम्मी और भाई तीन। कुल पांच हो तो गए।’
‘नहीं सादिया नहीं।’ मुनव्वर भाई अफना कर बोले, ‘आप समझिए ज़रा। सादिया नहीं।’
‘ये सादिया कौन है?’ मुंशी ने धीरे से पूछा।
‘बच्ची की मां है।’ आनंद ने भी उतनी ही धीरे से जवाब दिया।
‘अच्छा तो बच्ची की मां को अभी नहीं बताया गया है?’
‘नहीं?’ मुनव्वर भाई ने संक्षिप्त और सख़्त आवाज़ में जवाब दिया।
‘पर कब तक छुपाएंगे? वह भी मां से।’ कहते हुए मुंशी मुसकुराया। फिर बोला, ‘ख़ैर बाक़ी दो को बुलाइए। एक मैं हो जाऊंगा, पांच पूरे हो जाएंगे।’ पर ‘एक मैं हो जाऊंगा।’ मुंशी के इस कहने में पैसे का लोभ और मांग के संकेत बहुत साफ़ पढ़े जा सकते थे।
ख़ैर, आनंद ने ट्रामा सेंटर जा कर सादिया के भाई को लिया जो ट्रामा सेंटर की चाय की दुकान पर कंबल ओढ़े सादिया के साथ डटा पड़ा था। आनंद को देखते ही सादिया के इंतज़ार और सब्र का गुब्बारा जैसे फट पड़ा। बिलखती रोती हुई वह आनंद का गला पकड़ कर झूल गई, ‘कहां है मेरी जान का टुकड़ा।’

‘अभी आता हूं तो बताता हूं।’ सादिया से बिना आंख मिलाए, बात टालते हुए आनंद उसे अपने से अलग करते हुए बोला। लेकिन वह उसे छोड़े ही न। रोती बिलखती बार-बार आनंद को ऐसे पकड़ कर झूल जाए जैसे वह किसी नदी में डूब रही हो और बचाने आए आनंद को ऐसे पकड़ कर डूब रही हो गोया हम तो डूबेंगे सनम, तुम को भी ले डूबेंगे। आनंद ने उस की दिक्क़त समझी और अपनी भी। उसे लगा कि अब वह भी रो पड़ेगा। बड़ी मुश्किल से उसने अपनी रुलाई रोकी और सादिया के भाई को आंखों ही आंखों में इशारा किया कि वह उसे सादिया से छुड़ाए। उसने कोशिश भी की पर सादिया मानती ही नहीं थी। भाई उसे छुड़ाए और वह दौड़ कर उसे फिर-फिर पकड़ कर झूल जाए। अंततः वह रोती-रोती गिड़गिड़ाई, ‘मैं भी चलूंगी अपनी बेटी के पास। हमको भी ले चलिए।’

‘अभी आता हूं न, फिर बताता हूं।’
‘कब तक आएंगे?’ वह बोली, ‘दिन भर तो यहां बैठे-बैठे बीत गया। वह ज़रा रुकी और बोली, ‘अम्मी कहां हैं?’
‘बेटी के पास।’ वह लड़खड़ा कर बोला।
‘आप झूठ बोल रहे हैं।’ वह बोली, ‘मैं जानती हूं आप को झूठ बोलना नहीं आता।’
‘क्या बात कर रही हो?’ आनंद धीरे से बुदबुदाया।
‘अच्छा सच-सच बताइए।’
‘क्या?’
‘मेरी बेटी जिं़दा है?’
‘क्यों?’ आनंद यह पूछते हुए एक बार तो हिल गया। पर किसी तरह उसने अपने को संभाला और धीरे से बोला, ‘ऐसा क्यों पूछ रही हो?’
सादिया चुप हो गई। वह नीचे सड़क देखने लगी।
‘तुम बेटे को देखो, हम लोग बस अभी आ रहे हैं।’
वह फिर भी कुछ नहीं बोली।
तो क्या वह समझ गई थी कि उस की बेटी अब नहीं रही?
आनंद के लिए समझना कुछ नहीं बहुत कठिन था।

ख़ैर, पुलिस चौकी जब वह पहुंचा तो देखा कि चौकी इंचार्ज आ चुका था। मुनव्वर भाई से वह बतिया रहा था। मुनव्वर भाई, आनंद और सादिया के भाई ने दस्तख़त किए और सादिया की अम्मी ने अंगूठा लगाया। पांचवां दस्तख़त ख़ुद मुंशी ने कर दिया। और मुनव्वर भाई की ओर याचना भरी निगाह से देखा। पर उन्हों ने उस की ओर देखा ही नहीं, चौकी इंचार्ज की ख़ुशामद में ही ख़र्च होते रहे।

ख़ैर, पंचनामा का काग़ज़ ले कर पोस्टमार्टम हाउस की ओर कूच किया सबने। रास्ते में सादिया की अम्मी ने अपने बेटे से सादिया का हाल-चाल लिया और पूछा कि, ‘कहीं उसे पता तो नहीं पड़ गया?’
‘क्या पता पड़ गया?’ सादिया का भाई पूछते हुए अचकचा गया।
‘कुछ नहीं, कुछ नहीं।’ मुनव्वर भाई जैसे बीच में कूद पड़े, और पीछे मुड़ कर सास से मुख़ातिब हो कर बोले, ‘आप बिलकुल ही पागल हैं? कब क्या कहां बोलना चाहिए, कुछ जानती भी हैं?’
‘क्या हुआ भइया?’
‘कुछ नहीं चुप रहिए।’ मुनव्वर भाई बोले,‘कभी औरतों को अपना मुंह बंद भी रखना चाहिए।’ मुनव्वर भाई का यह कहना सब को चुप करा गया।
पोस्टमार्टम हाउस पहुंच कर सादिया की अम्मी और भाई को कार में ही छोड़ कर पुलिस चौकी का काग़ज़ आनंद ने डाक्टरों को देते हुए कहा,‘अब तो छुट्टी दीजिए।’
‘इसे ले कर हम क्या करें?’ डाक्टर ने बड़ी विरक्ति से कहा।
‘बेटी का शव दे दीजिए।’
‘ऐसे नहीं?’
‘फिर?’ आनंद फिर भड़क गया।
‘नाराज़ मत होइए।’
‘तो कितना पैसा चाहिए।’ आनंद पूरी तरह उखड़ गया।
‘पैसा नहीं।’ डाक्टर भी तैश में आ गया, ‘अभी तक सिर्फ़ आप के लिए बैठा हूं नहीं कब का घर चला गया होता।’
‘तो?’ ढीला पड़ता हुआ आनंद बोला।
‘ट्रामा सेंटर के पेपर्स लाइए।’
‘यह कौन देगा?’
‘यह पेपर्स जो पंचनामा का हमें दे रहे हैं ट्रामा सेंटर ले जाइए, वहीं फिर से पेपर्स बनेंगे। ले कर आइए बाडी ले जाइए।’
‘हद है। यह बात पहले ही बतानी चाहिए थी।’
‘यह तो ख़ुद ही जाननी चाहिए।’ डाक्टर बोला, ‘रुटीन है।’
‘यह रुटीन आप के लिए है, हम लोगों के लिए नहीं।’
‘चलिए विवाद करने से कुछ नहीं होगा।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘ट्रामा सेंटर चलिए।’
‘ट्रामा सेंटर जाना मेरे लिए तो बड़ा मुश्किल है।’ पोस्टमार्टम हाउस के बाहर निकलते हुए आनंद ने मुनव्वर भाई से कहा।
‘क्यों?’ मुनव्वर भाई अचानक रुक गए।
‘सादिया है वहां।’
‘तो?’
‘मैं उस का सामना नहीं कर सकता।’

‘तो क्या मैं कर सकता हूं?’ मुनव्वर भाई फफक पड़े, ‘आनंद जी, आज आप मेरे लिए देवदूत बन कर आए हैं।’ कहते हुए आनंद से लिपट गए। आनंद को उन के मुंह से पायरिया की तेज़ बदबू मिली। लग रहा था सुबह उन्हों ने ठीक से ब्रश भी नहीं किया रहा होगा। किसी तरह उसने अपने को उन से छुड़ाया और कहा, ‘ऐसा मत कहिए मुनव्वर भाई!’ उसने जोड़ा, ‘मुझे याद है कि आप ने कैसे-कैसे मुझे पांच-पांच रुपए के ट्यूशन दिलाए हैं।’ वह भावुक हो गया।

कार में बैठते ही सादिया की अम्मी ने पूछा, ‘क्या हुआ?’
‘कुछ नहीं, बस अब आप अपना मुंह बंद रखिए।’ पीछे बैठी अपनी सास की तरफ़ मुख़ातिब हो कर मुनव्वर भाई बोले।
‘ऐसे अम्मी को आप ज़लील मत करिए जीज्जू।’ सादिया का भाई धीरे से बोला।
‘अब आप जनाब चुप रहने का क्या लेंगे?’
‘प्लीज़ जीज्जू ऐसे मत बोलिए।’
‘तो अब दोनों चुपचाप रहो।’ मुनव्वर भाई सख़्ती से बोले, ‘मैं कुछ नहीं बोलूंगा।’
‘ मुनव्वर भाई!’ आनंद ने उन्हें समझाने की कोशिश की।
‘कुछ नहीं आनंद जी, एक तो दिमाग़ वैसे ही परेशान है। दूसरे ये मां बेटे!’
अब सभी चुप हो गए।

ट्रामा सेंटर में मुनव्वर भाई और आनंद को देखते ही सादिया फिर किसी मेढ़की की तरह फुदकी और फुदकते-फुदकते दोनों के पास आ गई। वह कुछ बोले उस के पहले ही मुनव्वर भाई ने उसे लगभग काशन दे दिया, ‘जहां बैठी थी, चुपचाप चल कर वहीं बैठो। जब ज़रूरत होगी तुम्हें बुला लूंगा।’ कह कर मुनव्वर भाई आगे बढ़ गए। आनंद ने चलते-चलते पीछे मुड़ कर देखा सादिया-चुपचाप खड़ी नीचे सड़क निहार रही थी।
अजीब थी यह उस की सड़क निहारने की यातना भी।
‘आप बाहर तो बहुत डेमोक्रेटिक बनते हैं।’ ट्रामा सेंटर की सीढ़ियां चढ़ते हुए आनंद ने मुनव्वर भाई से पूछा, ‘पर घर में इस क़दर तानाशाही? समझ में नहीं आता।’
‘अब यह सब समझने का यही समय है?’ पूछते-पूछते मुनव्वर भाई सीढ़ियों पर रुक से गए। और आनंद की आंखों में अपनी आंखें ऐसे डाल दीं गोया आंखंे नहीं बर्छी हों।
आनंद चुप रह गया।
दोनों सेकंेड ़लोर के उस वार्ड में गए जहां बेटी एडमिट थी। डाक्टर्स, नर्स सभी बदल गए थे। ख़ैर, फ़ाइल मिल गई थी। डेथ सर्टिफ़िकेट बनने में कोई पंद्रह बीस मिनट लगे। डेथ सर्टिफ़िकेट ले कर फिर पोस्टमार्टम हाउस गए सब लोग।
मार्शल जीप का ड्राइवर बाहर ही मिल गया। उलटे बोला, ‘बहुत देर कर दी आप लोगों ने।’
‘घबराओ नहीं बस चल ही रहे हैं।’
पोस्टमार्टम हाउस के भीतर जा कर ट्रामा सेंटर के पेपर्स डाक्टर को दिखाया। और कहा, ‘अब तो कोई कार्रवाई शेष नहीं रह गई है?’
‘नहीं बिलकुल नहीं।’ कह कर डाक्टर ने एक स्वीपर को बुलवाया और कहा कि, ‘बच्ची की बाडी इन्हें दे दो।’
इस बीच मुनव्वर भाई भाग कर गए और बाहर कार में बैठी सादिया की अम्मी को बुला लाए। बेचारी ठंड में कांपती बूढ़ी औरत पोस्टमार्टम हाउस के परिसर में ऐसे खड़ी थी गोया अब उस का भी पोस्टमार्टम होने वाला हो। बल्कि उस बकरी या गाय की तरह जो कसाईबाड़े में खड़ी हो चुपचाप आंसू बहाती रहती है। अपनी हत्या की प्रतीक्षा करती हुई। उसे लगा जैसे यह सादिया की अम्मी नहीं सादिया ही हो। और फ़र्क़ भी क्या था वहां ट्रामा सेंटर में चुपचाप नीचे सड़क निहारती सादिया और यहां पोस्टमार्टम हाउस के कैंपस में खड़ी सादिया की अम्मी!
और उधर लाशों के ढेर में कहीं पड़ी सादिया की फूल सी बेटी!
तीनों में आख़िर फ़र्क़ क्या है?
आनंद ने सोचा और बार-बार सोचा।
अभी वह यह सब सोच ही रहा था। कि एक स्वीपर सादिया की बेटी के शव को ले कर बाहर आया। और बरामदे में नीचे फ़र्श पर ही रख दिया। इस बार बेटी के शव को नीचे फ़र्श पर रखने को ले कर जाने क्यों किसी ने बुरा नहीं माना। तो क्या अब तक सब की देह से गुस्सा ग़ायब हो गया था और कि सब को सिस्टम की नपुंसकता ने घेर लिया था?
तो भी सादिया की अम्मी धीरे-धीरे बेटी के शव तक गईं उसे उस के उढ़ाए हुए कंबल को हटा कर देखा। देखते ही घबराईं और इशारे से आनंद को बुलाया और बेटी के शव की सिलाई दिखाई और फफक कर रो पड़ीं, ‘हमार बिटिया कइसे जिएगी। या अल्लाह!’
शव की सिलाई देख कर आनंद भी हिल गया। फूल सी बेटी जूते सी सिल दी गई थी। वह भीतर डाक्टर के कमरे में गया और कहा, ‘कम से कम सिलाई पर बैंडेज तो बांध दिया होता?’
‘अब यहां बैंडेज तो होता नहीं?’
डाक्टर बोला, ‘आप बैंडेज ले आइए बंधवा देता हूं। या फिर कोई कपड़ा लाइए सिलवा देता हूं, पर जल्दी।’
‘जो बैंडेज पहले से बंधा हुआ लाए थे, वही नहीं बंध सकता?’
‘देखता हूं अगर मिल जाता है तो वही बंधवा देता हूं।’ कह कर डाक्टर ने स्वीपर को बुलवाया और कहा कि, ‘देखो बच्ची की बाडी पर जो पट्टी बंधी थी, मिल जाए तो उसी से फिर से कस कर बांध दो।’
‘वो तो ख़राब हो गई है।’
‘ख़राब हो गई तो क्या हुआ? है न।’ डाक्टर बोला, ‘बस लपेट दो कस कर ताकि सिलाई नहीं दिखे।’ वह बुदबुदाया, ‘कौन कहीं ज़िंदा है?’
स्वीपर बेटी के शव को ले कर फिर से भीतर गया। थोड़ी देर में बैंडेज में बांध कर लाया। पर अब की उस के दो नन्हें कंबलों में से एक कंबल नहीं लाया। सादिया की अम्मी ने टोका तो वह जा कर दूसरा नन्हा कंबल ले आया। और हाथ पसार कर खड़ा हो गया। सादिया की अम्मी ने उसे झिड़क दिया, ‘शर्म नहीं आती?’ वह बड़बड़ाई, ‘ज़िंदा ले जाती और मांगते तो समझ में आता, पर मुर्दा के भी पैसे? हुंह!’ कह कर उन्हों ने बेटी के शव को नन्हें कंबलों में लपेट कर फिर से सीने से चिपका लिया। चलते-चलते उस का माथा भी चूम लिया।
‘इन को कहां बैठाया जाए?’ मुनव्वर भाई ने चलते-चलते धीरे से पूछा, ‘आप की गाड़ी में या लाश गाड़ी में?’
‘आप जैसा बेहतर समझें।’ आनंद बोला।
‘फिर भी आप की राय?’
‘मैं ने कहा न कि आप जहां बेहतर समझें?’
‘चलिए लाश गाड़ी में ही बैठाते हैं।’मुनव्वर भाई बोले, ‘बार-बार उतारने बैठाने से बेहतर है कि एक ही जगह बैठा दें।’
‘यह भी ठीक है।’
‘आप अब इस गाड़ी में बैठिए।’ मुनव्वर भाई ने सादिया की अम्मी को टोकते हुए कहा जो आनंद की कार में बैठने जा रही थीं।
‘इस में क्यों?’ उन्हों ने आपत्ति दर्ज की।
‘इस लिए कि अब लखनऊ से चलना है।’
‘इस को ले कर?’ सादिया की अम्मी ने बेटी के शव को इंगित करते हुए कहा।
‘जी हां।’ मुनव्वर भाई ने सादिया की अम्मी को किसी और सवाल का मौक़ा दिए बिना कहा, ‘अब सादिया के सामने कोई ड्रामा नहीं होना चाहिए। कि मां बेटी मिलें और गले मिल कर रोना धोना चालू कर दें।’ मुनव्वर भाई ने कहा, ‘चुपचाप शांति से पेश आइए। कहीं कुछ गड़बड़ नहीं होने पाए।’ उन्होंने जोड़ा, ‘नहीं अभी एक गई है, फिर दूसरा आने वाला भी चला जाए और फिर वह भी चली जाए।’
‘हां, भइया।’
‘तो पूरा ध्यान रखिए। यह आप की ज़िम्मेदारी है।’
‘मैं अकेले ही बैठूंगी इसमें?’
‘नहीं, अभी आप के साहबज़ादे को भी भेज रहा हूं।’ कह कर मुनव्वर भाई ने आनंद से कहा, ‘ज़रा उस को भी बुला लीजिए।’
जब मां बेटे बेटी के शव को ले कर मार्शल में पीछे से बैठने लगे तो अचानक मुनव्वर भाई को पीछे जब ‘लाश के वास्ते’ लिखा दिखा तो वह घबराए। बोले,‘आनंद जी यह तो गड़बड़ हो गया।’
‘क्या?’
‘यह देखिए!’ उन्हों ने ‘लाश के वास्ते’ लिखा दिखाया।
‘अब यह तो लिखा रहेगा ही।’
‘कहीं सादिया देख लेगी तो सब गड़बड़ हो जाएगा।’
‘कुछ नहीं होगा।’ आनंद बोला, ‘रात हो गई है और कुछ ऐसा कर दिया जाएगा कि ऊपर उसे देखने का मौक़ा ही न मिले।’
‘चलिए फिर यह आप की ज़िम्मेदारी है।’
‘बिलकुल।’ आनंद बोला, ‘आप निश्चिंत रहिए।’ कह कर उसने ड्राईवर से कहा कि, ‘ट्रामा सेंटर चलो भाई।’ फिर लाश गाड़ी के पीछे-पीछे अपनी कार लगा दी।
रास्ते में उसने मुनव्वर भाई से पूछा, ‘आख़िर सादिया से यह सब कुछ छुपाने के लिए इतनी कसरत क्यों?’

‘दरअसल आनंद जी इस टुंटपुजिया राजनीति ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। आदर्शवादिता मुझे ले डूबी। न इधर का रहा, न उधर का। तिस पर कांग्रेसी। जिस की यू.पी. में अब कहीं क़दर नहीं। शादी होनी मुश्किल हो गई। ओवरएज क्या, परम ओवरएज हो गया। बड़ी मुश्किल से पुराने संबंधों का वास्ता, कुछ सादिया के बाप की ग़रीबी, फिर वह भी ओवरएज हो रही थी, उस से मेरी शादी हुई। देर से शादी हुई तो बच्चे भी देर से। बताइए यह पचपन-छप्पन साल की उमर कोई बच्चा पैदा करने की है?’ कहते हुए वह ज़रा रुके और अपने बाल दिखाते हुए बोले, ‘यह कोई सचमुच काले बाल हैं। अरे बाल रंगने से कोई उमर छुप जाती है?’ कह कर वह चुप लगा गए।

आनंद भी चुप रहा।

थोड़ी देर बाद मुनव्वर भाई बोले, ‘आप तब सीढ़ियों पर मेरी तानाशाही पूछ रहे थे न? स्थिति यह है कि सादिया दिल की कमज़ोर है, कहीं हार्ट अटैक पड़ गया और वह भी मर मरा गई तो इस बुढ़ौती में फिर कौन शादी करेगा? कहां जाऊंगा मैं?’ वह ज़रा देर रुके और बोले, ‘फिर वह प्रेगनेंट है, कहीं टेंशन में एबार्शन हो गया तो?’ कह कर मुनव्वर भाई फिर चुप हो गए।
आनंद भी चुप रहा।
लेकिन मुनव्वर भाई फिर बुदबुदाए, ‘और आप जनाब हैं कि मुझे तानाशाह बताए जा रहे हैं।’ वह ज़रा रुके और बोले, ‘अरे देर से ही सही, बुढ़ौती में ही सही, तिनका-तिनका जोड़ कर गृहस्थी बसा रहा हूं, उसूलों को, मूल्यों को बेच कर आदर्शों को तिलांजलि दे कर जीवन बचा रहा हूं आनंद जी! तानाशाही नहीं!’ कहते-कहते वह फिर फफक पड़े, ‘पर इस बेटी ने बैरियर लगा दिया है। क्या करें?’
लाश गाड़ी ट्रामा सेंटर के सामने आ कर रुक गई लेकिन आनंद ने कार नहीं रोकी। वह आगे मोड़ से मुड़ते हुए ट्रामा सेंटर के गेट के पास आ कर रुका। वह गाड़ी सड़क के किनारे पार्क कर, लाक कर ट्रामा सेंटर में घुसने लगा तो देखा कि लाश गाड़ी भी आ कर उस की कार के पास खड़ी हो गई। मुनव्वर भाई का साला उस में से उतर कर आनंद के पास आया और पूछने लगा कि, ‘सब सामान भी इसी में ला कर रख लें?’
‘हां,हां’ बिलकुल।’ आनंद ने धीरे से कहा, ‘अपनी दीदी को भी लिवाते लाना।’
‘आप भी चले जाइए।’ मुनव्वर भाई ने आनंद से लगभग मनुहार की।
‘क्या सामान लेने?’
‘नहीं-नहीं, सामान तो वह ले आएगा।’ मुनव्वर भाई फिर मनुहार पर उतर आए, ‘सादिया को लेते आइए।’
‘सॉरी मुनव्वर भाई।’ आनंद उन के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, ‘मैं सादिया का सामना नहीं कर पाऊंगा।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘झूठ मैं बोल नहीं पाता। वह कुछ पूछेगी, मैं झूठ बताऊंगा और वह मेरा झूठ पकड़ लेगी। वह शुरू से ही मेरा झूठ चेक कर लेती है और जानती है कि मैं झूठ नहीं बोलता।’
‘पोस्टमार्टम हाउस में तो आप पूरी ज़िम्मेदारी ले रहे थे।’ मुनव्वर भाई बिदके।
‘वह तो यह ‘लाश के वास्ते’ लिखा न देखे वह इस की ज़िम्मेदारी ली थी।’
‘उस को क्यों नहीं लाए भई?’ मुनव्वर भाई ने सादिया के भाई से पूछा जो सामान ले कर ट्रामा सेंटर के भीतर से आ रहा था।
‘अभी और जो सामान बचा है, वह उसे देख रही है।’ ठंड से कांपता हुआ सादिया का भाई बोला।
‘ठीक है, ठीक है।’ बला टालते हुए मुनव्वर भाई बोले।
मार्शल जीप में सामान रखने में दिक़्क़त हुई तो सादिया की अम्मी को नीचे उतरना पड़ा बेटी के शव के साथ। हुआ यह कि सामान आगे की तरफ़ रख दिया जाए नहीं पीछे से चढ़ने का रास्ता बंद हो जाएगा।
पर क्या किसी शव को भी जाड़ा लग सकता है?
आनंद यह देख कर दंग था कि सादिया की अम्मी बेटी के शव को सीने से ऐसे चिपकाए खड़ी थीं कंबल में लपेट के इस जतन से कि उसे कहीं ठंड न लग जाए।
यह ममत्व था, तानाशाही की गूंज थी, तनाव था या सचमुच ठंड थी?
आनंद ने एक बार में ही यह सब कुछ सोच लिया। और मान लिया कि यह सिर्फ़ और सिर्फ़ ममत्व था। तिहरा ममत्व। सादिया की अम्मी का यह ममत्व सादिया के लिए तो था ही, सादिया को गुज़र गई बेटी के शोक से बचाने के लिए भी था और कहीं उस के पेट में पल रहा बच्चा एबार्ट न हो जाए, उस की सुरक्षा में भी था। कि जिस शव को दोपहर में उस के बेड से उठाने में जिस के हाथ कांप गए थे और वह शव नहीं उठा पाई थी, वही औरत उस शव को चीर फाड़ के बाद भी सीने से इस क़दर चिपकाए खड़ी थी गोया वह जिंदा हो गई हो।
सादिया और उस के पेट में पल रहे गर्भ को बचाने की ऐसी कोशिश कोई मां ही कर सकती है। उसे महाभारत प्रसंग में अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र याद आ गया जो उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने के लिए चला था जिसे श्रीकृष्ण को यत्नपूर्वक बेअसर करना पड़ा था।
तो क्या सादिया की अम्मी अभी उसी श्रीकृष्ण की भूमिका में थीं? सादिया के गर्भ को बचाने ख़ातिर? कि नातिन के शव को सीने से इस लिए चिपकाए खड़ी थीं कि सादिया को कहीं कोई नुक़सान नहीं पहुंचे और कि उस के गर्भ में पल रहा बच्चा सुरक्षित रहे।
आनंद को लगा कि सादिया की अम्मी श्रीकृष्ण से भी बड़ी भूमिका में थीं, मनुष्य हो कर भी उन का यह यत्न उन के मातृत्व को मान भी दे रहा था और देवत्व भी।
आनंद यह सब सोच ही रहा था कि सादिया ट्रामा सेंटर से बाहर आ गई अपने भाई के साथ सड़क निहारती हुई। धीरे-धीरे।
‘हम लोग चल कहां रहे हैं?’ उसने आते ही मुनव्वर भाई से लगभग नाराज़गी से पूछा।
‘घर और कहां?’
‘और ज़ोया?’ उसने उसी नाराज़गी से पूछा, ‘वह यहीं वेंटीलेटर पर ही रहेगी?
‘नहीं वह भी साथ है।’ मुनव्वर भाई थोड़ा सा हकबकाए और आनंद की तरफ़ लाचार नज़रों से देखने लगे।
पर आनंद ठीक सादिया की तरह सिर नीचे कर सड़क देखने लगा।
‘क्यों इलाज ख़त्म हो गया?’ सब को चुप देख कर सादिया ने आनंद से पूछा।
‘नहीं यहां का ख़त्म हो गया अब बाक़ी घर पर भी हो सकता है।’ आनंद ने बीच का जवाब देना ही ठीक समझा बतर्ज़ युधिष्ठिर कि अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो!
‘सारे सवाल यहीं कर लोगी कि चलोगी भी?’ मुनव्वर भाई ने सादिया का हाथ पकड़ कर आगे की सीट पर अपने साथ बैठाने की कोशिश की। और सादिया की अम्मी और भाई से कहा कि आप लोग भी जल्दी से बैठिए। सादिया का भाई, भांजी का शव हाथ में ले कर मां को जीप में चढ़ाने लगा, आनंद ने भी सहारा दिया।
‘नहीं मैं भी अम्मी के साथ पीछे ही बैठूंगी।’ कह कर मुनव्वर भाई से अचानक हाथ छुड़ा कर बिलकुल किसी गौरैया की तरह सादिया फुदकी और जीप के पीछे आ गई।
आनंद का दिल जैसे बैठ गया। कि अब क्या होगा?
ग़नीमत कि उसने जीप के पीछे ऊपर किसी इबारत की तरफ़ ध्यान नहीं दिया। और लगभग हड़बड़ी में वह जीप के अंदर दाखि़ल हो गई। आनंद ने देखा कि सादिया की अम्मी ने सादिया को देखते ही नातिन के शव को और कस के अपने सीने से चिपका लिया। और नातिन का मुंह ऐसे देखा गोया उसे वह पुचकारने वाली हों।
मुनव्वर भाई भी जीप के पीछे आए और सब को इत्मीनान से बैठा देख कर आनंद की तरफ़ मुड़े, गले लगाया, धीरे से रोए और बोले, ‘आप ने बड़ी मदद की।’
‘पर क्या फ़ायदा हुआ?’ आनंद भी रो पड़ा। उस की आवाज़ रुंध गई, ‘बेटी तो नहीं बचा पाए न।’
‘सब ऊपर वाले का खेल है।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘नसीब में नहीं थी, अल्लाह की मर्ज़ी के आगे भला किस की चली है?’
‘ये तो है।’ कह कर आनंद ने उन से अपने को छुड़ाया, हाथ मिलाया और कहा कि, ‘अब चलिए, वैसे भी बहुत देर हो गई है।’ उसने जोड़ा, ‘रास्ते में कहीं कोई दिक़्क़त पेश आए तो घबराइएगा नहीं, मुझे फ़ोन कर दीजिएगा। घर पहुंच जाइएगा तो पहुंचने की ख़बर ज़रूर दे दीजिएगा।’
‘ठीक है।’ कह कर मुनव्वर भाई चले तो गीली आंखों से उसने सब को विदा किया। मौक़ा हालां कि हाथ जोड़ने का नहीं था तो भी जाने क्यों सादिया की अम्मी को देख कर उस के हाथ जुड़ गए। उस का मन हुआ कि उन के पांव छू ले पर वह ज़्यादा अंदर की ओर बैठी थीं। सो हाथ जोड़ कर ही प्रणाम किया। जवाब में सादिया ने हाथ उठा कर सलाम किया। सादिया के सलाम से अचानक वह ठिठका और सोचा कि क्या बेटी के साथ-साथ सादिया के भीतर की ‘मां’ भी मर गई है कि पास ही में अम्मी की गोद में बेटी का शव है और उसे इस की गंध भी नहीं मिल पा रही है? आख़िर कैसा है उस का दूध जो जननी हो कर भी अपने जाये की ख़बर नहीं पा रही है?
आख़िर यह कैसा कम्यूनिकेशन गैप है? या कि वह पत्थर हो गई है कि उस के दूध में खलबली नहीं हो रही?
ख़ैर, आगे जा कर उसने मुनव्वर भाई से भी हाथ जोड़ कर विदा ली।

मार्शल के निकल जाने के बाद उसने भी अपनी कार स्टार्ट की और अपने घर की ओर चल पड़ा। पेट की भूख अब सिर चढ़ कर बोल रही थी। उसने देखा सड़कों पर से एकाएक बिजली गुल हो गई। उसने अचानक सड़क के एक किनारे जा कर कार रोक दी। घर पर फ़ोन मिलाया। और पत्नी से पूछा कि ‘बिजली आ रही है क्या?’ पत्नी ने कहा, ‘हां।’ तो उस ने पत्नी को बताया कि पानी गरम करने के लिए गीज़र ऑन कर दे और खाना तैयार रखे, वह बस घर पहुंच रहा है। पत्नी ने टोका भी कि, ‘इस वक़्त नहाएंगे?’
‘हां, भाई हां।’ कह कर उसने फ़ोन काट दिया।
घर पहुंच कर कपड़े उतार कर वह सीधे बाथरूम में घुस गया। नहा कर निकला तो पत्नी ने फिर टोका, ‘इस सर्दी में नहाने की क्या ज़रूरत थी?’
‘ज़रूरत थी तभी तो नहाया।’ आनंद ने कहा, ‘पहले खाना खिलाओ और खाओ फिर बताता हूं कि क्यों नहाया?’
‘फिर भी?’
‘अब मान भी जाओ।’ कहते हुए आनंद ने पूछा, ‘खाना तैयार नहीं है क्या?’
‘नहीं, तैयार है।’
खाना खाने के बाद पत्नी ने फिर पूछताछ शुरू कर दी। आनंद ने फिर टाला, ‘बच्चे कहां हैं?’
‘अपने कमरे में पढ़ या सो रहे होंगे।’
‘तो तुम भी सो जाओ मैं बहुत थक गया हूं।’
‘आप बात को टाल रहे हैं।’
‘टालूंगा क्यों?’ आनंद ने फिर बात बदली, ‘पता है तुम्हारी ज़रा सी बेवक़ूफ़ी, ज़रा से आलस ने आज दिन भर भूखे तड़पा दिया।’ उसने जैसे जोड़ा, ‘अगर तुमने खाना खिला कर भेजा होता तो दिन भर क्या अभी तक भूखे तड़पना न पड़ता।’
‘क्यों सादिया ने खिलाया नहीं अपने हाथों से? पिछली बार ईद में तो अपने हाथों से आप को खिला रही थी कबाब, सेंवई और शबाब!’ शबाब पर उस का ज़ोर ज़्यादा था।
‘क्या बेवक़ूफ़ी की बात करती हो?’ आनंद गुस्साया, ‘कुछ पता भी है तुम्हें?’
‘हां, हमें सब पता है।’
‘ख़ाक पता है।’ आनंद बोला, ‘पता होता तो ऐसे मौक़े पर इस तरह बेवक़ूफ़ी की बात नहीं करतीं।’ वह झल्ला कर बोला, ‘पता है तुम्हें उस की बेटी मेरे जाने के दो घंटे बाद ही मर गई। पोस्टमार्टम हाउस के चार-चार चक्कर लगाने पड़े। दिन भर पेट में भूख और मन में ज़िल्लत उठानी पड़ी।’
‘ओह सॉरी!’ पत्नी बोली, ‘और आप ने खाना खा लिया?’
‘तो क्या भूख से छटपटाता रहता?’
‘ऐसे में तो भूख ख़ुद ही मर जाती है।’
‘दिन भर जो ज़िल्लत और अपमान उठाया है, यहां वहां गिड़गिड़ाया और झल्लाया हूं, ऐसे में भूख! अरे शोक भी दफ़न हो गया! उस की बेटी तो कल दफ़न होगी, उस के मरने का शोक आज ही दफ़न हो गया।’ वह बोला, ‘और क्या-क्या बताऊं? सब कुछ बता दूंगा तो सो नहीं पाओगी दो चार दस दिन।’ वह हाथ जोड़ते हुए बोला, ‘भगवान से मनाओ कि आज मैं कम से कम ठीक से सो जाऊं।’
‘इतना गुस्सा क्यों हो रहे हैं, कहा न सॉरी।’
‘हुंह सॉरी!’
‘दिन में आप का कोई फ़ोन नहीं आया तो मैं समझी कि सब कुछ ठीक ठीक होगा और कि.........
‘और कि मैं गुलछर्रे उड़ा रहा हूंगा।’
‘ऐसा मैं ने कब कहा?’
‘मतलब तो तुम्हारा यही था।’
‘ओ.के. बात प्लीज़ यहीं ख़त्म करिए।’
‘ठीक है मेरी मां।’ वह हाथ जोड़ कर बोला और रज़ाई खींच कर ओढ़ा और सोते हुए पत्नी से बोला, ‘मोबाइल प्लीज़ चार्ज़िग में लगा दो।’
‘दूध लेंगे?’
‘नहीं।’ कह कर उसने सोचा कि क्यों न एक बार वह मुनव्वर भाई को फ़ोन कर के हालचाल ले ले। उसने दो तीन बार उन का मोबाइल मिलाया पर हर बार स्विच आफ़ मिला। वह समझ गया कि उनके मोबाइल की बैट्री डाउन है।
वह सोने की कोशिश में लग गया। बड़ी देर तक वह सो नहीं पाया। रह-रह कर सादिया की अम्मी नातिन का शव सीने से चिपकाए सामने आ कर खड़ी हो जातीं। तो कभी पोस्टमार्टम हाउस के हाल में लाइन से पसरी लाशें। डाक्टरों की हिप्पोक्रेसी।

और मुनव्वर भाई की लाचारी।

ख़ास कर आइडियालजी के सवाल पर हिप उठा कर हवा ख़ारिज करते हुए उनका यह कहना कि आइडियालजी तो ऐसे ही धीरे-धीरे ख़ारिज हो गई ज़िंदगी से। उसूल, मूल्य वग़ैरह-वग़ैरह सब कुछ गडमड आते जाते रहे। जागते हुए भी और सपने में भी।

सपने में भी।

वह कुछ भी तो नहीं भूल पा रहा था।

....जारी....

लेखक दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424, This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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