एक लोहिया थे, जाति तोड़ो, दाम बांधो का पहाड़ा पढ़ाते थे...

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दयानंद पांडेय: उपन्यास-  ''वे जो हारे हुए'' : भाग (3) : एक थे विनोबा भावे, इमरजेंसी के पोषक संत बन कर वह ख़ुद ही सो गए! :  एक थे जे.पी., जैसे वह जीवन भर सत्ता से दूर रहे वैसे ही उन के अनुयायी सत्ता की छाल देह पर लपेटे बिना सांस नहीं ले पाते : सन्नो जब वकील साहब से छुट्टी पाती तो उनके चचेरे भाई दबोच लेते, बाद में नौकर भी दबोच ले ते :

सुबह काम वाली की बेल के साथ ही वह उठ गया। अख़बार वग़ैरह देख कर बाथरूम में घुस गया। तैयार होकर खा पीकर वह आफ़िस पहुंचा तो कल की मीटिंग मिनिट्स देखने लगा। मिनिट्स देख ही रहा था कि उस का मोबाइल बज गया। उठाया तो उस के शहर से जमाल का फ़ोन था।

‘कैसे याद किया जमाल मियां।’ वह तफ़रीह लेते हुए बोला।

‘याद नहीं फ़रियाद कर रहा हूं।’

‘क्यों क्या हुआ?’

‘अरे यहां आप के मुनव्वर भाई नरक किए हुए हैं।’

‘क्या बात कर रहे हो?’ आनंद बिदकते हुए बोला, ‘उन की तो कल बेटी गुज़र गई, वह ख़ुद परेशान हैं।’

‘परेशान थे।’ जमाल बोला, ‘अब परेशान कर रहे हैं।’

‘किस को?’

‘नर्सिंग होम वाले को।’

‘क्यों?’

‘उस से मुआवज़ा मांग रहे हैं पचीस लाख रुपए का।’

‘क्या?’

‘बेटी की लाश ले कर नर्सिंग होम के सामने ले कर मजमा बांधे हैं। मदारियों की तरह।’

‘ऐसा तो नहीं करना चाहिए उन को।’

‘अब कर तो रहे हैं।’ जमाल बोला, ‘यहां बार-बार आप का भी नाम ले रहे हैं आनंद जी! बेटी की लाश तो बेच ही रहे हैं, छोड़ आप को भी नहीं रहे हैं।’

‘क्या बात कर रहे हो?’

‘ठीक कह रहा हूं।’ जमाल गला खंखारते हुए बोला।

‘ऐसे तो वह नहीं थे।’

‘बिलकुल नहीं थे!’ जमाल बोला, ‘पर आनंद जी, जिस मुनव्वर भाई को आप-हम जानते थे वह आदर्शवादी मुनव्वर तो कब का मर गया।’

‘अब क्या कर सकते हैं?’ आनंद अफ़सोस करते हुए बोला।

‘पता है आप को कि अख़बारों को एक छोटा सा बयान जारी करने के लिए भी वह पैसा ले लेते हैं। वह बोला, ‘वह चाहे किसी के पक्ष में हो या किसी के खि़लाफ़। किसी के खि़लाफ़ धरना प्रदर्शन करने में पैसा ले लेते हैं।’ पहले फर्टिलाइज़र कारख़ाने में ट्रेड यूनियन के नाम पर दलाली करते थे, वह बंद हुआ तो शुगर मिलों में दलाली शुरू कर दी, फिर रेलवे में दलाली का डंका बजाया। क्या-क्या बताऊं? आनंद जी और आज अपनी बेटी की लाश पर ताल ठोंक कर मुआवज़ा मांग रहे हैं।’

‘इतना पतन तो नहीं हो सकता मुनव्वर भाई का!’ आनंद ने फिर अफ़सोस जताया और कहा कि, ‘एक तो मुनव्वर भाई का इतना पतन मैं मान नहीं सकता, और अगर ऐसा हुआ भी है तो इस के लिए जमाल मियां तुम और तुम जैसे लोग भी ज़िम्मेदार हैं।’

‘हद है, वो कैसे?’

‘उनको सक्रिय राजनीति से काट कर, उन के ख़िलाफ निरंतर गोटें बिछा कर। इस क़दर कि आज तक वह एम.एल.ए. का चुनाव भी नहीं लड़ पाए।’ आनंद बोला, ‘जब कि मुझे अपने वो दिन याद हैं जब हम लोग सिद्धांतवादी राजनीति के लिए मुनव्वर भाई को न सिर्फ़ जानते थे, उन की क़समें भी खाते थे। और जमाल मियां उन की क़समें खाने वालों में कभी तुम भी थे। अलग बात है जल्दी ही तुम्हारे रास्ते जुदा हो गए और तुम समझौतावादी राजनीति के शिकार हो गए सत्ता के गलियारों में टहलने क्या लगे, सत्ताधारियों की गोद में ही जा बैठे।’

‘तो यह क्या ग़लत हुआ?’ जमाल बिदकते हुए बोला, ‘तब हमारी पार्टी सत्ता में थी, तो सत्ता के गलियारों में हम नहीं टहलते तो कौन टहलता?’

‘मुनव्वर भाई भी तो तब टहल सकते थे।’

‘तब वह सिद्धातों का, मूल्यों और आदर्शों का झुनझुना बजा रहे थे तो कोई क्या करता?’

‘संजय गांधी रिजीम के कांग्रेसी हो तुम और मुनव्वर भाई जैसे लोग। और उस रिजीम की राजनीति में पैदा हो कर भी अगर मुनव्वर भाई सिद्धांत, मूल्य और आदर्श की बात बरसों तक करते रहे तो क्या वह आसान था?’

‘पर अब क्या कर रहे हैं?’

‘अब जैसा कि तुम बता रहे हो, वैसा अगर वह करने लगे हैं तो मैं उस को क़तई जस्टीफ़ाई नहीं कर रहा, कंडम करता हूं!’

‘बस-बस यही! यही मैं चाहता हूं कि एक बार आप उन को फ़ोन कर के समझा दीजिए कि यह सब जो वह कर रहे हैं, बंद करें और नर्सिंग होम से अपनी मदारीगिरी उठा कर चलते बनें। बेटी की लाश को क़ब्रिस्तान ले जाएं। पर उस ग़रीब नर्सिंग होम वाले को बख़्श दें।’

‘मतलब जनाब की सारी सहानुभूति उस नर्सिंग होम वाले के साथ है, मुनव्वर भाई की बेटी के साथ नहीं है।’

‘नहीं, उन की बेटी का शोग़ हम सभी को है, पर उस नर्सिंग होम वाले को वह बख़्श दें, बस!’

‘वह नर्सिंग होम वाले को बख़्शें, न बख़्शें इस में मेरा रोल कहां है?’ आनंद ने जमाल से लगभग खेलते हुए कहा, ‘मैं तो तुम लोगों से कोई तीन सौ किलोमीटर दूर लखनऊ में बैठा हूं, मैं क्या कर सकता हूं?’

‘फ़ोन कर के उन्हें समझा सकते हैं। उन्हें सिद्धांतों, मूल्यों और उसूलों की याद दिला सकते हैं।’ जमाल बोला, ‘मुझे यक़ीन है आप की बात पर वह इतना तो शर्म करेंगे ही कि नर्सिंग होम से अपनी ब्लैकमेलिंग की दुकान हटा लेंगे!’

‘सिद्धांतों, मूल्यों वगै़रह का झुनझुना तो जमाल मियां तुम लोग भी उन के सामने जा कर बजा सकते हो।’

‘हम लोगों की तो वह सुनेंगे नहीं न!’

'तो हमारी कैसे सुन लेंगे?'

‘अरे, आप का नाम सुबह से ही वह क़ुरआन की आयतों की तरह पढ़ रहे हैं, जो ही मिल रहा है उसी से!’ जमाल बोला, ‘और लोग हैं कि चुप हो जा रहे हैं।’

‘मुझे उस शहर में कोई जानता भी है अब के समय में?’

‘अरे आनंद जी आप पुराने चावल हैं, कम से कम हमारा सर्किल, हमारी पीढ़ी आप के चाहने वालों से भरी पड़ी है।’ वह चहका, ‘कभी आज़मा कर देखिए।’ वह लंबी सांस भरते हुए बोला, ‘आप के पुराने कालेज की एक दीवार पर तो अभी भी आप का बड़ा-बड़ा नाम लिखा पड़ा है। किसी ने मिटाने की जुर्रत नहीं की है आज तक। और जो ढूंढें तो यूनिवर्सिटी के गलियारों में भी आप का नाम कहीं न कहीं मिल जाएगा और कहीं न सही छात्र संघ भवन में तो आप का नाम दर्ज है ही।’

‘आज के गुंडों और ठेकेदार छात्र नेताओं के नामों के बीच कहीं फंसा हुआ नाम।’ आनंद बिदका।

‘यही तो आज की पॉलिटिक्स की ट्रेजडी है। ख़ास कर स्टूडेंट पालिटिक्स की।’ जमाल बोला।

‘क्यों मेन पॉलिटिक्स क्या गुंडों और ठेकेदारों से ख़ारिज हो गई है?’

‘इसी की यातना तो हम लोग झेल रहे हैं आनंद जी, जो आज पॉलिटिक्स के हाशिए पर खड़े हैं।’

‘जमाल मियां तुम सिर्फ़ अपनी सोच रहे हो।’ आनंद की बेबसी जैसे बाहर आ गई, ‘सोचो कि तुम तो फिर भी पॉलिटिक्स में हो, कभी हमारे बारे में भी सोचो कि पॉलिटिक्स में हम भी क्यों नहीं हैं? क्यों छोड़नी पड़ी पॉलिटिक्स मुझे! या मेरे जैसे लोगों को पॉलिटिक्स क्यों छोड़नी पड़ती है?’

‘है तो यह अफ़सोसनाक पर क्या करें।’ जमाल ने लंबी सांस भरी और बोला, ‘यह तो लंबा डिबेट हो जाएगा। फिर कभी इस पर बात करेंगे। आप कहेंगे तो सेमिनार करवा देंगे।’

‘अपने किसी एन.जी.ओ. के थू्र!’ बात बीच में काटता हुआ आनंद बोला, ‘आज कल कुल कितने एन.जी.ओ. चला रहे हो?’

‘यही कोई सात-आठ।’

‘मैंने तो सुना कि बीस-पच्चीस एन.जी.ओ. हैं तुम्हारे और सभी करोड़ों में लोट पोट हैं।’ आनंद बोला, ‘मैं कहूं कि आख़िर क्यों कांग्रेस यू.पी. में ज़मींदोज़ हो गई है। अब कांग्रेसी भैया लोग स्वैच्छिक संगठन चलाएं कि कांग्रेस का संगठन।’

‘क्या आनंद जी!’ जमाल बोला, ‘सुबह से क्या मैं ही मिला हूं? और एन.जी.ओ. किस पार्टी के लोग नहीं चला रहे हैं?’ वह बोला, ‘गुंडों ठेकेदारों और करप्ट लोगों के बीच पॉलिटिक्स में कैसे सरवाइव कर रहे हैं हम और हमारे जैसे लोग ही जानते हैं।’

‘क्या बात कर रहे हो?’ आनंद ने तंज़ किया, ‘दो-दो बार एम.पी. का टिकट पाए तुम और दोनों बार ज़मानत तक नहीं बचा पाए और फिर भी बता रहे हो कि सरवाइव कर रहे हैं। अरे, सरवाइवल अगर प्राब्लम है तो छोड़ दो पॉलिटिक्स, पॉलिटिशियन बन कर एन.जी.ओ. चलाने से अच्छा है एन.जी.ओ. ही चलाओ! सीधे-सीधे धंधे में आओ!’

‘चलिए यह सारे गिले-शिकवे कभी फिर दूर कर लेंगे।’ जमाल बोला, ‘अभी तो मुनव्वर भाई को संभालिए।’

‘उन को हम क्या संभालें? तुम लोग क्या कम हो, उन्हें संभालने के लिए?’

‘मेरी तो कभी उन्हों ने सुनी ही नहीं। हरदम मेरे लिए उलटा ही सोचा उन्हों ने।’

‘तुम भी तो उन्हें हमेशा काटते ही रहे। इतना काटा कि बेचारे मुख्य धारा की राजनीति छोड़ो, हाशिए पर भी नहीं रहे। कहूं कि धोबी के कुत्ते हो गए, न घर के रहे न घाट के।’ आनंद बोला, ‘कि आज उन का इतना पतन हो गया है कि बेटी की लाश पर मुआवज़ा मांगने लगे हैं।’

‘यही तो!’ जमाल ऐसे चहक कर बोला जैसे उस ने मैदान मार लिया हो, ‘आनंद जी इसी लिए कह रहा हूं कि प्लीज़ उन्हें समझाइए।’

‘देखो जमाल मियां, मेरे वश का उन्हें समझाना है भी नहीं, और फिर जिस की आंख पर लोभ और लालच का चश्मा चढ़ जाता है वह किसी के समझाने पर समझता भी नहीं है।’

‘फिर भी आप ट्राई तो कर ही सकते हैं।’

‘कोई फ़ायदा नहीं। जमाल मियां तुम ने ग़लत नंबर मिला लिया है।’ आनंद ने कहा, ‘वैसे भी नर्सिंग होम वाले ने भी कोई कम हरामीपना नहीं किया कि सत्तर-अस्सी परसेंट जली हुई बच्ची को ह़ते भर अपने पास रखा और जब देह में सेप्टिक फैलने लगा तो प्लेटलेट कम होने का बहाना बना कर अपनी बला टालने के लिए लखनऊ रेफ़र कर दिया तब जब कि प्लेटलेट की कोई समस्या ही नहीं थी।’

‘आप ही कह रहे हैं कि बच्ची सत्तर-अस्सी परसेंट जली हुई थी तो वह कैसे बचती भला?’

‘बच भी सकती थी अगर वह उसे तुरंत दिल्ली में सफ़दरजंग अस्पताल भेज देते या फिर वहीं मिलेट्री हास्पिटल भेज देते जैसे बाद में लखनऊ भेजा। पहले ही भेज देते।’ आनंद ज़रा रुका और बोला, ‘जब तुम जानते हो, मैं जानता हूं कि सत्तर-अस्सी परसेंट जली बच्ची को बचाना मुश्किल था तो क्या वह नर्सिंग होम वाला नहीं जानता था? और जो जानता था तो उस ने साफ़-साफ़ मुनव्वर भाई को क्यों नहीं बता दिया कि आप की बेटी नहीं बच सकती। पर नहीं, उस ने उन्हें बताया कि दस पंद्रह परसेंट जली है, ठीक हो जाएगी। बीस पच्चीस हज़ार रुपए उस ग़रीब आदमी से ऐंठ लिए सो अलग। और जब केस बिगड़ा तो प्लेटलेट की कमी का हौव्वा खड़ा कर के लखनऊ भेज कर अपना पिंड छुड़ा लिया।’

‘आप तो मुनव्वर भाई को ही जस्टीफ़ाई कर रहे हैं।’ जमाल ज़बान में कड़वाहट भरते हुए बोला।

‘क़तई नहीं।’ आनंद बोला, ‘मैं मुनव्वर भाई को क़तई जस्टीफ़ाई नहीं कर रहा पर नर्सिंग होम वाले के हरामीपने को प्वाइंट आउट कर बता रहा हूं कि वह भी कम दोषी नहीं है। और बताऊं जमाल मियां कि मुनव्वर भाई की वह फूल सी बेटी लगता है अभी भी मेरी आंखों में बसी बैठी है। उस बेचारी अबोध का क्या दोष था, जो उसे निरपराध दुनिया से कूच करना पड़ा?’

‘चलिए आनंद जी, कोई बात नहीं, कोई हासिल नहीं हुआ इतनी लंबी बात का आप से।’

‘वैसे जमाल मियां सच-सच बताओ कि उस नर्सिंग होम वाले से तुम को इतनी सहानुभूति क्यों हो रही है?’ आनंद ने अपनी बात में पिन थोड़ी और चुभोई, ‘कि तुम किसी डील के तहत यह इतनी देर से बात कर रहे हो? फ़ोन के बिल की परवाह किए बिना!’

‘कैसी डील?’ जमाल ज़रा भोला बनता हुआ बोला ‘समझा नहीं।’

‘इतने भोले मत बनो जमाल मियां।’ आनंद बोला, ‘मैं नर्सिंग होम वाले से तुम्हारी डील की बात कर रहा हूं।’

‘अरे नहीं आनंद जी!’ झेंप भरी आवाज़ में जमाल बोला, ‘कोई डील वील नहीं। वह तो अपने जानने वाले हैं! और ग़रज़ सिर्फ़ इतनी थी कि मैं जब कभी हेल्थ कैंप वगै़रह लगवाता हूं ग़रीबों के लिए तो इनके डाक्टरों की निःशुल्क सेवाएं मिल जाती हैं तो मैं ने सोचा कि मैं भी अपना फ़र्ज़ अदा कर दूं।’

‘ठीक है तुम अपना फ़र्ज़ अदा करो। पर जमाल मियां इस केस के बीच में मुझे प्लीज़ मत डालो और माफ़ करो। फिर कभी कुछ मेरे लायक़ हो तो ज़रूर बताना।’

‘ओ.के. आनंद जी!’ कह कर जमाल ने फ़ोन काट दिया।

आनंद भी आफ़िस के काम में लग गया।

लेकिन यादों में फिर पुरानी रीलें घूमने लगीं।

गोरा चिट्टा गोल मुंह वाला जमाल। लोग कहते उस के एक नहीं दो मुंह हैं। दोनों ‘गोल’। इस ‘गोल’ के प्रतीक को कम ही लोग समझते थे। खै़र, यह तो बाद की बात है। पहले तो वह आनंद से मुनव्वर भाई के साथ ही मिला था। तब दोनों जार्ज इस्लामिया कालेज में पढ़ते थे। दोनों ही छात्र संघ पदाधिकारी थे। दोनों ही युवक कांग्रेस के सदस्य थे। जमाल मुनव्वर भाई से दो साल जूनियर था और अपने कालेज के छात्र संघ में भी जूनियर लाइब्रेरियन था। जब कि मुनव्वर भाई महामंत्री। तब जमाल मुनव्वर भाई के पास हरदम शरणागत रहता और मुनव्वर भाई भी उसे आशीर्वाद दिए रहते। लेकिन आनंद को तभी दो चार मुलाक़ातों में ही समझ में आ गया कि जमाल महत्वाकांक्षी व्यक्ति है और कि वह मुनव्वर भाई के कंधे पर पांव रख कर बहुत जल्दी उन को पीछे करने वाला है। उन दिनों वह छींटदार बुशर्ट और बेलबाटम पहनता था जब कि मुनव्वर भाई खादी का सफ़ेद कुर्ता पायजामा। हां, हाथ में उन के डायरी और अख़बार भी होता था। उन दिनों मुनव्वर भाई को उस ने कभी पैंट क़मीज़ तो क्या खादी के सफे़द कुर्ता पायजामा के सिवाय किसी और ड्रेस में भी नहीं देखा। हां, घर में ज़रूर वह करघे की चेकदार लुंगी में होते। पर जमाल बिलकुल उलट! जब ख़ूब चौड़ी मोहरी वाले बेलबाटम पर छींट वाली बुशर्ट पहन कर हाई हील की संेडिल पहने लचक कर वह चलता तो पीछे से कई बार लड़की होने का भ्रम देता। उस की इसी चाल और चेहरे मोहरे से वशीभूत कुछ देहाती टाइप के छात्र उसे ‘नमकीन’ या ‘चिक्कन’ खि़ताब से नवाज़ते। इस ‘नमकीन’ या ‘चिक्कन’ पर कभी वह ऐतराज़ जताता तो कभी चुप लगा जाता। मौके़-मौक़े की बात होती। कभी यह शब्द उसे सूट करता, कभी नहीं। यह पूरी तरह उस के मिज़ाज पर मुनःसर करता। मुनव्वर भाई के सामने कभी ज़िक्र होता तो वह मुसकुरा कर टाल जाते। कभी कभार बात कुछ ज़्यादा बढ़ती तो वह जैसे हस्तक्षेप करते हुए कहते, ‘नहीं नहीं लड़का अच्छा है।’ तो कभी कहते ‘वर्कर अच्छा है।’ बाद के दिनों में मुनव्वर भाई शहर युवक कांग्रेस के महामंत्री हुए तो कुछ ही दिनों बाद जमाल भी शहर युवक कांग्रेस का संगठन मंत्री बन गया। युवक कांग्रेस संजय गांधी कल्चर में ऊभ चूभ थी। उधर अंबिका सोनी राष्ट्रीय स्तर पर झंडे गाड़ संजय गांधी की ‘ख़ास’ बनी मचल रही थीं तो शहरांे में भी लड़कियों की खेप की खेप युवक कांग्रेस ज्वाइन कर लचक रही थी। उसी लचक में जमाल भी कमर लचकाता फिरता रहता।

कांग्रेसी नेताओं के लिए जैसे बहार आ गई थी। बाक़ी पार्टियों में महिलाओं का लगभग अकाल था। पर कांग्रेस में, वह भी युवक कांग्रेस में वसंत मचल रहा था।

लेकिन शहर के एक नेता जो उन दिनों प्रदेश सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर थे, युवक कांग्रेस की लड़कियों पर नहीं जमाल पर फ़िदा हो गए। उनकी सोहबत में आते ही जमाल ने अपनी अंकुआती, टीनएज मूछों को भी साफ़ करवा दिया। और जमाल की गाड़ी चल निकली। कांग्रेसियों में मज़ाक़ चलता कि अगर जमाल जनसंघ में होता तो ज़्यादा बिज़ी होता और कहीं ज़्यादा सफल भी। पर जमाल को यह सारी चीज़ें न दिखाई देतीं, न यह तंज़ सुनाई देता। उसे तो सफलता की सीढ़ियां चढ़नी थीं, वह चढ़ रहा था। भले इन सफलता की सीढ़ियों के बदले कोई उस पर भी चढ़ लेता था। देखते-देखते वह शहर युवक कांग्रेस का अध्यक्ष हो गया और मुनव्वर भाई महामंत्री ही रह गए। लोग मुनव्वर भाई से कहते भी कि, ‘बताइए आप उससे सीनियर हैं और उसके अंडर में काम कर रहे हैं?’ लोग उन्हें सलाह देते कि, ‘इस्तीफ़ा क्यों नहीं दे देते?’ वह कहते, ‘कैसे इस्तीफ़ा दे दूं? वह जोड़ते, ‘कांग्रेस का अनुशासित सिपाही हूं जो ज़िम्मेदारी दी जाएगी, वही तो निभाऊंगा।’

‘पर जमाल तो आप का जूनियर है।’ आनंद ने भी एक दिन मुनव्वर भाई को घेरा।

‘जूनियर था, अब वह मेरा सीनियर है!’ संक्षिप्त सा जवाब दिया मुनव्वर भाई ने और कहा कि, ‘पार्टी ने ज़रूर उस को मुझ से योग्य समझा तभी उसे यह मौक़ा, यह ज़िम्मेदारी दी गई।’ पर मुनव्वर भाई की यह सादगी, यह त्याग, यह अपमान का घूंट भी उन के काम नहीं आया। बात उठी कि अध्यक्ष और महामंत्री दोनों ही मुस्लिम कैसे हैं? कोई एक पद गै़र मुस्लिम को दिया जाना चाहिए। और यह सवाल भी किसी और ने नहीं, जमाल ने ही उठवाया। क्यों कि मुनव्वर भाई का क़द उसे अध्यक्ष होने के बावजूद ढंक लेता था। उनकी लियाक़त, सादगी और त्याग महामंत्री होने के बावजूद, उन के सामने अध्यक्ष बौना पड़ जाता था। अध्यक्ष को भी अपना बौनापन चुभता था तो सो उस ने एक पद गै़र मुस्लिम को जाना चाहिए की चर्चा को हवा दी और फिर इस हवा को आग दी। अंततः मुनव्वर भाई के महामंत्री की बलि चढ़ी और एक त्रिपाठी जी को जो कि निहायत ही चुगद टाइप के थे, शहर कांग्रेस का महामंत्री बना दिया गया। मुनव्वर भाई ख़ाली हो गए।
लेकिन जल्दी ही कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति मुनव्वर भाई के काम आई। एक एम.पी. ने जिस का उस कैबिनेट मंत्री से दुराव था, जोड़-तोड़ कर के मुनव्वर भाई को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का मेंबर बनवा दिया। शहर कांग्रेस के महामंत्री पद से हटने के बाद मुनव्वर भाई डिप्रेशन में आ गए थे। पी.सी.सी. की मेंबरी ने उन्हें डिप्रेशन से उबारा। अब वह फिर से सक्रिय हो गए थे।
लेकिन सक्रिय उधर जमाल भी था कि कैसे उन की पी.सी.सी. की मेंबरी कटवाई जाए। पर मुनव्वर भाई फिर भी बेफ़िक्र थे। कोई इस बारे में कुछ कहता भी तो वह कहते कि, ‘कटवा दे। कौन बैनामा करवा कर आया हूं पी.सी.सी. की मेंबरी। क्या पता यहां कटे तो आल इंडिया कांग्रेस कमेटी की मंेबरी मिल जाए। यहां तो बस पार्टी के लिए काम करते रहना है एक मज़बूत सिपाही की तरह जिस को जो करना हो करे, हमें क्या?’
बात ख़त्म हो जाती।
आनंद ने एक बार एक रेस्टोरेंट में बैठे-बैठे जमाल से उस कैबिनेट मिनिस्टर की चर्चा करते हुए पूछा कि, ‘तुम्हारा परिचय इनसे कैसे हुआ?’
‘मुनव्वर भाई ने करवाया।’ छूटते ही जमाल बोला।
‘तब भी तुम मुनव्वर भाई को इतना काटते हो?’
‘कोई किसी को नहीं काटता।’ जमाल बोला, ‘लोग ख़ुद ब ख़ुद कट जाते हैं। और आप को बताऊं कि ज़ाती तौर पर मैं मुनव्वर भाई की बेहद-बेहद रिस्पेक्ट करता हूं। और करता रहूंगा। उन के बहुत से एहसान हैं मुझ पर। बल्कि सच कहूं तो मैं आज जो कुछ भी हूं मुनव्वर भाई की वजह से हूं।’
‘ऐसा!’ आनंद ने तंज़ किया।
‘जी बिलकुल।’ वह बोला, ‘मैं कोई एहसानफ़रामोश इंसान नहीं हूं।’
‘तब भी तुम मुनव्वर भाई को इतना काटते हो।’ आनंद ने अपनी बात फिर दुहराई।
‘देखिए आनंद जी मैं ने आप से पहले भी अर्ज़ किया कि कोई किसी को नहीं काटता, लोग ख़ुद ब ख़ुद कट जाते हैं।’ वह बोला, ‘रही बात मेरी और मुनव्वर भाई की तो आलाकमान जिस को तय करेगा वही तो काम करेगा। और मैं कोई आलाकमान तो हूं नहीं।’ उस ने जैसे जोड़ा, ‘अब अगर आलाकमान पार्टी में युवा मुसलमानों के नेता के तौर पर मुझे बेहतर पाता है तो मुझे ख़ुशी होती है। और आनंद जी पार्टी में युवा मुसलमानों का नेता तो कोई एक ही रहेगा। दस-बीस तो नहीं हो सकते?’
‘तुम शायद जानते ही होगे कि मुनव्वर भाई की सोच में मुसलमानों, सिर्फ़ मुसलमानों का नेता बनना नहीं है। वह सारे समाज और देश का नेता बनने का सपना देखते हैं। बड़े दायरे में सोचते हैं।’
‘यह तो ज़मीनी हक़ीक़त से मुंह मोड़ने वाली बात है।’ जमाल बोला, ‘वोट हिंदू मुसलमान के ख़ाने में हैं, देश बंट गया हिंदू मुसलमानों के ख़ाने में।’
‘तुम को लगता है कि तुम्हारी नेता इंदिरा गांधी सिर्फ़ हिंदुओं की नेता हैं?’
‘बिलकुल नहीं।’
‘फिर?’ आनंद बोला, ‘चलो तुम्हारी बात पर आते हैं। तुम्हें मालूम है कि पार्टी और पार्टी के बाहर तुम्हारी इमेज युवा मुस्लिम नेता से ज़्यादा मंत्री जी से क़रीबी होने की है!’
‘अब मंत्री जी भी मुझे पसंद करते हैं तो यह मेरी ख़ुशनसीबी है!’
‘तुम्हारी इस ख़ुशनसीबी का सच बताऊं?’
‘देखिए आनंद जी, मैं आप की बेहद-बेहद रिस्पेक्ट करता हूं।’ तिलमिला कर वह बोला, ‘आप से बिलो द बेल्ट बात या लूज़ टाक की उम्मीद मैं नहीं करता।’
‘पर जमाल सच को तुम कब तक टालोगे?’
‘माना कि आप मुनव्वर भाई के वेल-विशर हैं पर मैं जानता हूं कि आप मेरे भी दुश्मन नहीं हैं।’
‘ठीक बात हैे।’ आनंद ने बड़ी संजीदगी से कहा, ‘हक़ीक़त यह है कि तुम्हें पार्टी या पार्टी के बाहर भी मंत्री जी के लौंडे के रूप में जाना जाता है। आने वाले दिनों में अगर इस इमेज से तुम ने छुट्टी नहीं ली तो तुम्हारे युवा मुसलमानों का नेता बनने में मंत्री जी भी एक हद से आगे मदद नहीं कर पाएंगे। इस पर तुम्हें सोचना चाहिए। यह मेरी जंेटिल एडवाइस है तुम्हें।’
‘आनंद जी अब आप ने कुछ ज़्यादा ही बोल दिया है। आप की रिस्पेक्ट करता हूं।’ जमाल तिलमिलाता हुआ कुर्ते की आस्तीन मोड़ता हुआ बोला, ‘आप की जगह अभी कोई दूसरा होता तो उस की खोपड़ी फोड़ देता।’ कहते-कहते वह उत्तेजित हो कर चिल्लाने लगा।
कुछ लोगों ने आ कर उसे पकड़ा तो वह होश में आया और कहने लगा, ‘आनंद जी आप अपने वर्ड्स वापस ले लीजिए वरना बहुत बुरा होगा!’
‘देखो जमाल मैंने तुम पर कोई लांछन या कोई आरोप नहीं लगाया सो कोई वर्ड्स वापस लेने जैसी कोई बात है नहीं।’ आनंद भी तेज़-तेज़ बोलने लगा और कहा, ‘मैं ने सिर्फ़ तुम्हारी बिगड़ती इमेज की चर्चा की और मेरी बात पर यक़ीन न हो तो कहो यहीं रायशुमारी करावा दूं लोगों से। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा!’
‘स्टाप इट! स्टाप इट आनंद जी!’ जमाल फिर चिल्लाया, ‘अब यह सब करेंगे तो आप का लिहाज़ भूल जाऊंगा मैं।’
तब तक रेस्टोरेंट की भीड़ आनंद और जमाल के पास सिमट आई थी। कुछ लोगों ने जमाल को पकड़ लिया और कुछ आनंद से वहां से चले जाने को कहने लगे। कि तभी वहां फ़तेह बहादुर सिंह आ गए। आए धीरे से हंसे और आनंद के कान में फुसफुसा कर पूछा कि, ‘इस को मंत्री का लौंडा कह दिया क्या?’ आनंद ने प्रकारांतर से मुंह गोल कर के हामी भरी तो वह फिर धीरे से हंसे और बीच बचाव कर बात ख़त्म करवाई। दोनों को फिर से चाय पिलवाई, हाथ मिलवाया और विदा किया।
फ़तेह बहादुर सिंह का नाम फ़तेह बहादुर सिंह भले था पर अपने नाम के अनुरूप फ़तेह कभी पाई नहीं उन्होंने अपनी ज़िंदगी में। कम से कम अब तक तो यही था। आदर्शवादी राजनीति के मारे हुए फतेह बहादुर अब किसी तरह सरवाइव कर रहे थे।
और आनंद?

आनंद उन दिनों आदर्शवादी राजनीति का ककहरा पढ़ रहा था।

‘जज़्बात, सिद्धांत, ईमानदारी और मेहनत! ये चार शब्द अगर आप अपने जीवन में गंठिया लें और सौ फ़ीसदी अमल में भी लाएं तो आप को तरक़्क़ी से कोई रोक नहीं सकता।’ आनंद जब अपनी खनकदार लेकिन सहज आवाज़ में अपने साथियों के बीच यह बात कहता तो साथियों पर उस का रौब तो नहीं ग़ालिब होता। पर वह अपने दोनों कंधे थोड़ा सा अदब से झुकाए गर्दन ज़रा आगे बढ़ा कर जाकेट के पॉकेट में दोनों हाथ डाले जैसे जोड़ता, ‘फिर देश में ही क्या हो सकता है दुनिया के नक़्शे पर आप के नाम का परचम लहराए।’ वह जैसे बुदबुदाता, ‘कोई रोक ही नहीं सकता आप को आगे बढ़ने से!’ साथी लोग आनंद की इन बातों पर मन ही मन मुसकुराते और आगे बढ़ जाते। लेकिन कुछ साथी थे ऐसे जिन्हें आनंद की इन सीधी बातों में दम दिखता और वह उन्हें एप्रीशिएट करते। तो कुछ साथी ऐसे भी थे जो खुल्लमखुल्ला उसे क्रेक डिक्लेयर कर देते। लेकिन उस के सामने नहीं, पीठ पीछे। पर बात घूम फिर कर आनंद तक भी आती। लेकिन आनंद उन साथियों पर नाराज़ होने, अप्रिय टिप्पणी करने से लगभग बचता। और जब साथी कुढ़ते हुए उन्हें कुरेदते इस मसले पर कि, आख़िर वह सब आप को क्रेक डिक्लेयर कर रहे हैं! तो वह लगभग गंभीर होते हुए कहता, ‘ये सब हताश और परेशान लोग हैं। इन की बातों का प्रतिवाद कर इन से माथा फोड़ना, फोड़वाना है। शोहदे हैं सब जाने दीजिए। हम लोग अपना काम करें।’
यह सत्तर के दशक के बीच के साल थे। इमरजेंसी बस लगना ही चाहती थी। और आनंद राजनीति में उतर रहा था। विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में। मूल्यों और आदर्श की राजनीति करने। मुश्किल था यह काम। वह मानता था। पर ज़रूरी भी है, यह भी वह मानता था। कहता था, ‘यह बेहद ज़रूरी है।’
संजय गांधी की युवक कांग्रेस ब्रिगेड की छाया इस विश्वविद्यालय में भी थी और भरपूर। लड़कियां बेलबाटम पहन कर निकलतीं और संजय गांधी ब्रिगेड के लड़के उस में घुसने को तैयार! घात लगा कर घुस भी जाते।
कुछ दिन बाद तो युवक कांग्रेस में लड़कियों की जैसे बहार आ गई। अब बहुतेरे लड़के तो युवक कांग्रेस की सदस्यता रसीद कटवाते ही इसी लिए थे कि वहां खुले व्यवहार वाली लड़कियां भी हैं। विश्वविद्यालय भी इसी हवा में सांस खींच रहा था। और इस आबोहवा में आनंद चला था, मूल्यों और आदर्श की राजनीति करने।
उस का लंबा क़द और चौड़ा माथा उस के सैद्धांतिक राजनीति में जैसे कलफ़ लगाता। हालां कि इस तरुणाई में भी वह तन कर नहीं ज़रा झुक कर खड़ा होता। और नौजवानों को जैसे मोह लेता अपनी इस अदा से। लोहिया और गांधी, मार्क्स और लेनिन को पढ़ते-पढा़ते आनंद का़का और सार्त्र को भी पढ़ता। दास्तोवस्की और गोर्की के साथ-साथ प्रेमचंद और निराला को भी बांचता। दिनकर को गर्व से गाता और बच्चन को भी गुनगुनाते हुए धूमिल की कविताएं और दुष्यंत कुमार के शेर कोट करता चलता। अजब कंट्रास्ट था। लोग बाग और गुरुजन भी पूछते उस से कि तुम बनना क्या चाहते हो आखि़र आनंद? नेता कि बुद्धिजीवी? पहले यह तो तय कर लो।’ वह अकुलाते हुए कहता, ‘बनना तो अच्छा आदमी ही चाहता हूं। और अच्छा आदमी बन कर राजनीति करना चाहता हूं।’
‘साहित्य और राजनीति एक साथ?’
‘मार्क्स कहता था कि रूसी समाज को जानने में उसे गोर्की से काफ़ी मदद मिलती है।’
‘तो साहित्य पढ़ कर, किताब पढ़ कर समाज को जानोगे, फिर राजनीति करोगे?’
‘हर्ज क्या है?’
‘क्यों ख़ुद समाज से बाहर रहते हो क्या?’ एक गुरुजन की तल्ख़ टिप्पणी थी तो विश्वविद्यालय छात्र संघ के एक पूर्व अध्यक्ष बोले, ‘यह न तो राजनीति करेगा, न साहित्य! जो भी करेगा वह एक नपुसंक राजनीति के बाने में रह कर बुद्धिजीवी होने के ढोंग का सुख भोगेगा।’
‘देखिए आप समझते नहीं हैं। राजनीति बिना विचार के संभव है क्या? बिना सिद्धांत और मूल्य के संभव है क्या? या आप लोग संजय गांधी की युवक कांग्रेस वाली फासीवादी राजनीति में देश को नष्ट करने का सपना देख रहे हैं? मैं तो भाई इस का पुरज़ोर विरोध करता हूं।’ कहते हुए आनंद विश्वविद्यालय की सड़कों पर छितराए गुलमुहर के छोटे-छोटे फूलों को कुचलते हुए आहिस्ता-आहिस्ता ऐसे चलता गोया वह फासीवादी राजनीति को कुचलते हुए चल रहा हो गुलमुहर के फूल नहीं।
लेकिन उस को लगता था कि उस के सपने कुचले जा रहे हैं। साफ़ सुथरी राजनीति का सपना। विचारों की राजनीति का सपना।
आनंद पर उन दिनों लोहिया का नशा सवार था। लोहिया का दाम बांधो, जाति तोड़ो, अंगरेज़ी हटाओ का कंसेप्ट उस के सिर चढ़ कर बोलता था। पर दिक़्क़त यह थी कि आनंद दाम बांधो, जाति तोड़ो, बुदबुदाता था पर दाम थे कि बंधते नहीं थे और राजनीति थी कि जातियों के आक्सीजन में जी रही थी। ग्रास रूट पर जाता तो बिना जातिगत चौखटे के कोई बात ही नहीं होती। और जब सेमिनारों में जाता तो बिना अंगरेज़ी के औघड़पन के कोई बात ही नहीं सुनता। अजीब अंतर्विरोध में फंसता जा रहा था आनंद!
इन सांघातिक स्थितियों से जूझ-जूझ कर वह फिर-फिर हारता, हारता जाता। हार-हार कर बुदबुदाता सर्वेश्वर की एक कविता, ‘जब-जब सिर उठाया चौखट से टकराया।’
कभी कभार वह इस कविता को स्वर भी देता और लगभग किचकिचा कर बोलता, ‘जब-जब सिर उठाया चौखट से टकराया।’ तो उस के घेरे में उपस्थित उद्दंड छात्र कविता का भाष्य, मर्म या संकेत समझने के बजाय एक भद्दा सा फ़िक़रा कसते, ‘तो आनंद जी सिर उठा के चलते ही क्यों हैं?’
‘क्या करूं सिर झुका कर चलने की आदत नहीं है।’
‘पर गरदन तो आप की हरदम कंधे में धंसी रहती है।’ दूसरा फ़िक़रा आता।
‘और जो ज़्यादा दिक़्क़त हो तो चौखट बड़ा बनवा लीजिए। छोटे चौखट को उखड़वा फेंकिए।’ तीसरा फ़िक़रा आता, ‘चौखट का क्या दोष, आप ख़ुद ही ज़्यादा लंबे हैं।’
‘बेवक़ूफ़ो मैं घर के चौखट की बात नहीं कर रहा।’
‘तो?’
‘समाज की, राजनीति की, व्यवस्था के चौखट की बात कर रहा हूं।’ आनंद थोड़ा सहज, थोड़ा असहज हो कर बताता। व्यवस्था विरोधी बातें करना आनंद की जैसे आदत में शुमार होता जा रहा था।

जे.पी. मूवमेंट ज़ोर पकड़ रहा था। आनंद को जैसे राह मिल गई। वह भी जे.पी. मूवमेंट से जुड़ गया। हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस आकाश से कोई गंगा निकलनी चाहिए/मेरे सीने में हो या तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए/सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।’ अपने भाषणों में दुष्यंत का यह शेर आनंद जब दोनों हाथ जाकेट के जेबों में डाले, गरदन कंधों में धंसाए पढ़ता तो जैसे लोगों में चिंगारी फूट पड़ती व्यवस्था को बदलने की। पर्वत सी पीर पिघलती तो ख़ैर नहीं दिखती लेकिन, सीनों में आग ज़रूर सुलगती। लोगों के ज़ेहन में और जज़्बात में भी। आनंद अब अपनी राजनीति की हदें विश्वविद्यालय से बाहर भी तलाश रहा था। नुक्कड़ सभाएं उस की शहर से ले कर गांवों तक फैल रही थीं। शहरों में अपने भाषणों में वह शेर सुनाता तो गांवों में लोक गीतों के मुखड़े।

आनंद की स्वीकृति अब एक स्थानीय जुझारू नेता की हो रही थी। और स्थानीय लोग उस में एक राष्ट्रीय नेता की संभावना साफ़ देख रहे थे।

आनंद भी नुक्कड़ सभाएं ज़रूर कर रहा था लेकिन उस के भाषणों में राष्ट्रीय फ़लक होता, स्थानीय मुद्दे और घटनाएं भी होतीं लेकिन ज़िलाधिकारी और थानेदार नहीं आते उस के भाषणों में अन्य स्थानीय नेताओं की तरह। बल्कि समूची व्यवस्था और व्यवस्था का देश समाया होता उस के भाषणों में। अपने देश के प्रजातंत्र में वह खोट ढूंढता और धूमिल को कोट करते हुए बताता कि ‘हमारे देश का प्रजातंत्र ठीक वैसे ही है जैसे किसी बाल्टी पर लिखा हुआ हो आग पर उस के भीतर होता है बालू या पानी।’ बात को वह और आगे बढ़ाता बतर्ज़ धूमिल ही, ‘लोहे का स्वाद लोहार से नहीं उस घोड़े से पूछो जिस के मुंह में लगाम लगी हुई है।’ सत्ता व्यवस्था की विद्रूपता प्याज़ की तरह परत दर परत वह जब अपने भाषणों में खोलता तो उस के समकालीन छात्र नेता तो छोड़िए अन्य वरिष्ठ राजनीतिज्ञ भी दांतों तले उंगली दबा लेते। बुज़ुर्ग नेताओं को आनंद में एक बड़ी संभावना दिखने लगी थी। लेकिन ज़्यादातर स्थानीय राजनीतिज्ञ आनंद की काट ढूंढने लग गए थे। क्यों कि उन में आनंद के रूप में अपने लिए ख़तरा दिखने लगा था। एक स्थानीय नेता तो ऐलान ही कर बैठे कि, ‘आनंद के पर अभी नहीं कतरे गए तो किसी दिन ये लखनऊ दिल्ली में बैठेगा और हम लोग इस का दरबार करेंगे और ये साफ़ सुथरी राजनीति की सनक में हम लोगों की एक नहीं सुनेगा।’

आनंद के कानों तक भी यह बात आई लेकिन वह बोला, ‘आज की तारीख़ में यह और ऐसी बातों का कोई अर्थ नहीं है। अभी हम सबको एकजुट हो कर रहना है और बड़ी लड़ाई लड़नी है।’

इस बड़ी लड़ाई की अगुवाई जे.पी. कर रहे थे और आनंद तथा उस जैसे जोग अपने को जे.पी. का सिपाही बताते थे और यही जे.पी. देश भर में अलख जगाते आनंद के शहर आ रहे थे। पूरा शहर जैसे एक जुनून में क़ैद हो गया था। कांग्रेसी हकबक अलग-थलग पड़ ऐसे छटपटा रहे थे गोया कोई उन की विरासत छीन ले रहा हो।

जे.पी. का कार्यक्रम अंततः विश्वविद्यालय में ही रखा गया। जे.पी. बीमार थे लेकिन सत्ता व्यवस्था ज़्यादा बीमार थी सो वह सत्ता व्यवस्था की बीमारी दूर करने, व्यवस्था में आमूल चूल बदलाव की बात कर रहे थे। देश भर में घूम-घूम कर।

जे.पी. जब आए तो उन्हें ट्रेन से रिसीव करने, उन्हें ठहराने, उन के कार्यक्रम तक आगे-आगे रहने वालों में आनंद भी एक था। जाने क्यों जे.पी. के आस-पास उपस्थित रह कर ही आनंद और उस के जैसे लोगों के नथुनों में एक अजीब सी सांस समा जाती, सीने फूलने लगते और मन उड़ने लगता। अजीब सी फैंटेसी, अजीब सा उत्साह था यह।

हालांकि बहुतेरे लोगों ने गुपचुप ही सही काटने की बहुतेरी कोशिश की आनंद को लेकिन जब जे.पी. विश्वविद्यालय पहुंचे तो छात्र-छात्राओं और लोगों के उमड़ आए जन सैलाब को जे.पी. के पहले आनंद ने संबोधित किया। बहुत ही संक्षिप्त भाषण था आनंद का और कहा कि यहां आप लोग जे.पी. को सुनने आए हैं, मुझे नहीं, यह मैं जानता हूं और मैं यह भी जानता हूं कि ‘कैसे-कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं/अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।’ फिर लोक नायक जय प्रकाश नारायण के नारों से आकाश गूंजने लगा। लोग नारे लगा रहे थे जे.पी. तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं। जे.पी. ने अस्वस्थ होने के कारण अपना भाषण कुर्सी पर बैठे-बैठे दिया। और अपने भाषण से नौजवानों में सत्ता व्यवस्था को बदलने का एक नशा, एक जुनून, रच कर एक जंग का ऐलान कर दिया।

आनंद और उस के जैसे नौजवान तो इस सत्ता व्यवस्था को उखाड़ने के लिए जैसे कमर कस कर कूद पड़े। उस के भाषणों में जैसे आग दहकती थी। आनंद ने अब अपने साथ कुछ रंगकर्मियों को भी जोड़ लिया था और अपने भाषण के पहले व्यवस्था विरोधी नुक्कड़ नाटक-नुक्कड़ गीत भी करवाता। ‘हम होंगे कामयाब एक दिन हो-हो मन में है विश्वास, पूरा ़है विश्वास हम होंगे कामयाब एक दिन।’ जब उस के रंगकर्मी साथी एक स्वर में गाते तो एक समां सा बंध जाता।

आनंद को जे.पी. मूवमेंट में एक राह, एक जुनून, एक नशा तो मिला ही था, पर एक सब से बड़ी बात यह थी कि इस मूवमेंट में तब जातिवादी गंध नहीं थी। जातिवादी राजनीति या अंगरेज़ी की हिप्पोक्रेसी की चौखट से सिर के टकराने की नौबत नहीं थी। यह बहुत बड़ी सहूलियत थी।

युवक कांग्रेस के नेताओं की राजनीति इन दिनों बिखरने लगी थी। अलग बात है कि युवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष आनंद के ही शहर के थे और पढ़े लिखे भी। लेकिन स्थानीय राजनीति में उन का बहुत ज़ोर इस लिए नहीं था कि उन की राजनीतिक यात्रा अपने शहर से नहीं बल्कि बनारस से शुरू हुई थी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से। एम.टेक. टॉंप किया था उन्हों ने और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष रहे थे। पढ़े लिखे समझदार और साफ़ सुथरी राजनीति के हामीदार रहे तब के प्रदेश युवक कांग्रेस अध्यक्ष राकेश को आनंद बहुत पसंद करता था पर कहता था कि वह ग़लत पार्टी में हैं। उन्हें युवक कांग्रेस छोड़ कर जे.पी. मूवमेंट में आ जाना चाहिए।

राकेश और आनंद में कई एक समानताएं थीं। दोनों पड़ोसी रहे थे और दोनों ही ग्रामीण पृष्ठभूमि के और दोनों ही संवेदनशील और साफ़ सुथरी राजनीति के पक्षधर। हद दर्जे के आदर्शवादी। राकेश की स्थिति यह थी जब वह टीन एज थे और इसी शहर में स्कूल की पढ़ाई कर रहे थे तो राजनीति से लगभग घृणा करते थे। इस घृणा का कारण थे उनके एक चचेरे बड़े भाई वीर प्रताप बहादुर सिंह। यह चचेरे भाई वीर प्रताप बहादुर एडवोकेट थे और तब के दिनों शहर कांग्रेस के महामंत्री रहे थे। व्यवहार में वह विनम्रता दिखाते ज़रूर थे पर ज़मींदारी का अहंकार उन में कूट-कूट कर भरा था और ऐंठ भी।

वकालत चलती नहीं थी, सो राजनीति का शौक़ भी पाल लिया था। वस्तुतः उन का ज़ोर न राजनीति में था न वकालत में। घर की ज़मींदारी से राशन पानी और ख़र्चा वर्चा, नौकर-चाकर सभी उपलब्ध थे। और पैसा था तो दरबारी भी थे। अय्याशी भी। आरामतलबी, औरतबाज़ी और शराब सब कुछ वह साधते पर सब कुछ गुप्त। तब के समय चुनाव पांच साल पर ही होते। और जब भी चुनाव का ऐलान होता अटैची ले कर वीर प्रताप बहादुर लखनऊ निकल जाते। पर जाने क्यों तमाम कोशिशों और ख़र्च-वर्च के बावजूद वह कांग्रेस का टिकट नहीं पाते और लौट आते अपनी वकालत में।

कचहरी भी वह रिक्शे से जाते। नौकर सुबह नौ बजे रिक्शा बुला लाता। वकील साहब आराम से दस बजे, ग्यारह बजे जब मन करता तैयार हो कर निकलते, तब तक रिक्शा खड़ा रहता। लेकिन कचहरी जा कर वह रिक्शे वाले को तय किराया ही देते। एक घंटा, दो घंटा रुकने का नहीं। नोक झोंक करता अगर रिक्शा वाला तो लातों जूतों से पिटाई उस की तय होती। यही हाल शाम को भी होता। वह कचहरी से शाम जल्दी ही आ जाते और रिक्शे वाले को रोके रखते। घंटे दो घंटे बाद वह फिर शहर घूमने निकलते। घूमने निकलते पार्टी बैठक के नाम पर और पी पा कर देर रात लौटते। कई बार भोर हो जाती औरतबाज़ी के फेर में तो कभी-कभी सुबह भी।

कई बार तो अगर वह रात कहीं गए नहीं होते, घर पर ही रहे होते तो अगली सुबह काम वाली महरी उनकी शिकार हो जाती। महरी क्या थी टीन एजर थी। नाम था सन्नो। पंद्रह-सोलह साल की। मुंह अंधेरे आती और वकील साहब अपने कमरे में बुला लेते कि पहले इस कमरे की सफ़ाई करो। और दरवाज़ा बंद कर लेते। वह लड़की भी पैसे की लालच में बिछ जाती थी। अजब था। कि उसको भी पैसा प्यारा था, इज़्ज़त नहीं। मां का निधन हो चुका था। दादी को ठीक से दिखता नहीं था। बाप हरदम घर से लापता रहता। शराब के लती बाप को घर में रोटी कैसे बनती है, इसकी भी चिंता नहीं होती। और बेटी को इज़्ज़त से कोई सरोकार नहीं था। उन दिनों दस पैसे, चार आने दे कर कोई भी उसे लिटा सकता था। बैचलर्स के घर उसे सूट करते बरतन मांजने के लिए। और वीर प्रताप बहादुर सिंह, एडवोकेट का घर उसे काफ़ी सूट करता। यहां सभी ‘बैचलर’ थे। वकील साहब तो शादीशुदा थे। उनके नौकर भी। पर सबकी बीवियां गांव पर थीं। हां, वकील साहब के दो-तीन चचेरे भाई ज़रूर बैचलर थे। जो यहां रह कर पढ़ाई कर रहे थे। तो सन्नो जब वकील साहब से छुट्टी पाती तो उनके चचेरे भाई दबोच लेते। बाद में नौकर भी दबोच लेते। कई बार तो होता यह कि चचेरे भाई और नौकर उससे कहते कि झाड़ू, चौका, बरतन वह ख़ुद कर लेंगे बस वह उनकी वासना तृप्त कर दे। सुबह हो या शाम। और वह मान जाती। दोपहर में शहर से लगे एक ताल में बकरी के लिए वह घास लेने जाती साथ ही कंडा भी बीनती। पर वहां भी पता चलता कि लड़के पहले सन्नो के लिए घास काटते और कंडा बीनते, फिर अपने लिए। और वह उनके लिए भी वहीं ताल में लेट जाती।

आनंद भी उन दिनों टीनएज था। एक सुबह वह वकील साहब के एक चचेरे भाई से अपनी किताब मांगने उन के घर गया तो देखा कि नौकर और एक चचेरा भाई दोनों मिल कर बर्तन मांज रहे थे अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए। और दूसरा चचेरा भाई सन्नो के साथ संभोगरत था। किचेन में ही। किचेन भी ख़ूब बड़ा था। पूरा कमरा। बाहर का दरवाज़ा खुला पड़ा था सो आनंद सीधे घर में घुस गया। आनंद के पहुंचते ही अफ़रा तफ़री मच गई। आनंद ख़ुद ही झेंप गया यह सब देख कर। पर यह तो बाद के दिनों की बात है। राकेश प्रताप बहादुर सिंह तब तक बी.एच.यू. पढ़ने जा चुके थे। बी.टेक. की पढ़ाई की ख़ातिर। लेकिन जब वह यहां थे तब भी वीर प्रताप बहादुर सिंह से वह हरदम ही लगभग असहमत रहते। पर एक बार यह असहमति उन की अवज्ञा में बदल गई। सुबह के आठ बजे थे। नौकर किसी काम में लगा था, वीर प्रताप बहादुर को सिगरेट की तलब लगी और राकेश प्रताप बहादुर सामने पड़ गए। राकेश को उन्होंने पैसे देते हुए चौराहे से सिगरेट लाने को कहा। राकेश ने छूटते ही सिगरेट लाने से साफ़ इंकार कर दिया। कहा कि ‘मैं पढ़ाई कर रहा हूं। सिगरेट लेने नहीं जा सकता।’ यह सुनते ही वीर प्रताप बहादुर सिंह का सामंती जानवर जाग गया। और इस क़दर जाग गया कि लात-घूंसा, जूता-चप्पल जो भी कुछ मिला उस से राकेश प्रताप बहादुर सिंह की डट कर पिटाई हुई। वह पीटते रहे और कहते रहे, ‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे मना करने की?’ साथ ही पूछते भी रहे कि, ‘बोलो, सिगरेट लाओगे कि नहीं?’ और राकेश प्रताप बहादुर भी पूरी अकड़ और पूरी ढीठाई से हर बार जवाब देते रहे, ‘नहीं, सिगरेट लेने नहीं जाऊंगा।’ राकेश प्रताप बहादुर की पिटाई से पूरा अहाता इकट्ठा हो गया। सभी लोग इकट्ठे हो गए। रोक छेंक भी की लोगों ने पर सब बेअसर। इसी बीच उन का नौकर आ गया। उन का पैर पकड़ कर बोला, ‘छिमा सरकार। पैसे दीजिए हम सिगरेट लाए देते हैं।’ उस का इतना कहना था कि उस की भी शामत आ गई। लातों जूतों उस की पिटाई शुरू हो गई। और जब बहुत हो गया तो राकेश प्रताप बहादुर ने आगे बढ़ कर वीर प्रताप बहादुर का जूता वाला हाथ थाम लिया और पूरी सख़्ती से कहा, ‘बड़े भइया अब बस! बहुत हो गया!’

राकेश प्रताप बहादुर की इस सख़्त आवाज़ की उम्मीद शायद वीर प्रताप बहादुर सिंह को नहीं थी। इस सख़्त आवाज़ ने जैसे उन्हें बेअसर कर दिया। वह जूता धीरे से वहीं हाथों से गिरा कर हारे हुए क़दमों से थोड़ी दूर रखी आराम कुर्सी पर जा कर लेट गए। ऐसे गोया पोरस सिंकदर से हार गया हो। और सिंकदर से कह रहा हो कि, ‘मेरे साथ वही व्यवहार किया जाए जो एक राजा दूसरे राजा से करता है।’ लेकिन इधर सिंकदर इस से इंकार करता हुआ वीर प्रताप बहादुर की सामंती ज़ंजीरों को छिन्न भिन्न कर धूल में मिला देने पर आमादा था। मुंह फूट गया था, ख़ून बह रहा था पर आंखों में नफ़रत की धूल भरी आंधी जैसे उन्हें उड़ा ले जाना चाहती थी। राकेश प्रताप बहादुर के मन में राजनीति से नफ़रत के बीज यहीं पड़े।

पर बाद में यही राकेश प्रताप बहादुर सिंह जब बी.एच.यू. में छात्र संघ के अध्यक्ष बने और इस बारे में अख़बारों में ख़बर छपी तो उनके पुराने मुहल्ले के लोग चौंके। कि अरे राकेश बाबू भी राजनीति में? बी.एच.यू. में राकेश बाबू की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से समझा जा सकता था कि बी.एच.यू. में तब एक अध्यक्ष को छोड़ छात्र संघ के सभी पदाधिकारी विद्यार्थी परिषद के चुने गए थे। एक सिर्फ़ अध्यक्ष ही एन.एस.यू.आई. से चुना गया था। यह आसान नहीं था। और सोने पर सुहागा यह कि राकेश बहादुर सिंह ने उस बार एम.टेक. में भी टॉप किया। यह भी एक रिकार्ड था। तब के उ.प्र. के मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा राकेश प्रताप बहादुर से इस क़दर प्रभावित हुए कि उन्हें उत्तर प्रदेश युवक कांग्रेस का अध्यक्ष बनवा दिया। इस सब से उन के परिवार में, गांव में, शहर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। पर एक आदमी दुखी था इस सब से बेहद दुखी। वह थे उन के चचेरे बड़े भाई वीर प्रताप बहादुर सिंह। पर वह खुल कर कहीं कुछ नहीं बोले। ख़ुशी में ख़ामोश शिरकत उन की कमोबेश सभी ने नोट की। संजय गांधी रिजीम में राकेश प्रताप बहादुर की आदर्शवादी और साफ़ सुथरी राजनीति की चादर आसान बात नहीं थी। वह भी बहुगुणा जैसे राजनीतिज्ञ की छत्र-छाया में।

इमर्जेंसी के दिनों की बात है। सर्दियों में राकेश प्रताप बहादुर सिंह शहर आए। बहैसियत अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश युवक कांग्रेस। वह चाहते तो कहीं किसी आलीशान होटल में या किसी बड़े रईस के घर भी ठहर सकते थे। गाड़ी-घोड़ा, फ़ौज-फाटा कर सकते थे। तब के दिनों में यह चलन चल चुका था। पर नहीं, वह तो ऐसे आए कि शहर को पता ही नहीं चला। चुपचाप स्टेशन पर अकेले उतरे। रिक्शा किया और अपने उस किराए के घर आ गए जहां उन के चचेरे बड़े भाई वीर प्रताप सिंह रहते थे। दूसरे दिन शहर में निकले भी तो पैदल चौराहे तक गए। नौकर ने कहा भी कि ‘रुकिए बाऊ साहब, हम रिक्शा ले आते हैं।’ पर वह धीरे से, ‘नहीं।’ कह कर ख़ुद निकल पड़े। जब वह पैदल निकले तब कहीं मुहल्ले वाले भी जान पाए। और सब के मुंह से अनायास निकल पड़ा, ‘अरे, राकेश बाबू!’ और वह सब को पुराने दिनों की तरह, अपने स्कूली दिनों की तरह, ‘चाचा जी नमस्ते!’ ‘भइया जी नमस्कार।’ जैसे संबोधनों से सम्मान देते उसी सहजता से चौराहे की तरफ़ चल पड़े। आनंद भी उन के साथ हो चला। भीड़ बढ़ती गई तो वह बोला, ‘बाऊ साहब मैं आप के साथ बैठ कर इत्मीनान से बात करना चाहता हूं।’ वह उन्हें शुरू ही से बाऊ साहब या राकेश बाबू से ही संबोधित करता था।
‘ठीक है आज दिन में तो कई मीटिंग्स हैं। रात को वापस आता हूं तो बैठते हैं। बल्कि खाना साथ खाएंगे। ठीक?’
‘ठीक है। पर भूलिएगा नहीं।’
‘अरे नहीं आनंद जी इस में भूलने की क्या बात है?’ बंद गले के सूट पर फ़र की टोपी। राकेश बाबू का लुक लगभग पूरा-पूरा नेताओं जैसा ही हो चला था। तिस पर उन का लंबा क़द और इज़ाफ़ा भर रहा था।
रात जब वह घर लौटे तो मुहल्ले वालों के अलावा युवक कांग्रेसियों की भीड़ भी जुट चुकी थी। वह सब से विनम्रता पूर्वक मिले और धीरे-धीरे सभी को विदा किया। बड़े भाई वीर प्रताप से बिलकुल उलटा। कोई चोचलापन नहीं, कोई हेकड़ी, कोई ग़ुरूर नहीं। पर बातचीत में तुर्शी और तेवर साफ़ दिखता था। दिन में राकेश बाबू से बतियाने के लिए आनंद ने ढेर सारी बातें सोच रखी थीं पर रात जब वह उन के साथ बैठा तो सब कुछ बिखर गया। और ज़्यादातर बातचीत बचपन की बीती यादों पर केंद्रित हो गई। बचपन और टीनएज के दोस्तों परिचितों को वह याद कर-कर के पूछते रहे। बचपन और टीनएज में खेले गए उबहन कूद, सेवेन टाइम्स, फुटबाल, गुल्ली-डंडा और ईंट जोड़ कर बनाए गए विकेट वाले क्रिकेट तक की याद की। आइस पाइस की भी याद की। इन्हीं यादों में ऊभ-चूभ आनंद ने उन से पूछा, ‘राकेश बाबू आप तो पहले राजनीति से बड़ी घृणा करते थे?’ उस ने जोड़ा, ‘और फिर भी आप राजनीति में?’
‘हां, मुझे लगा कि राजनीति में पढ़े लिखे लोगों को भी आना चाहिए। क्यों कि सिर्फ़ इंटेलेक्चुवल बहस करने से ही बात नहीं बनने वाली कि आप ड्राइंगरूम में बैठ कर पालिटिशियंस और पालिटिक्स को सिर्फ़ कोसते रहिए। इस से काम नहीं चलेगा।’ वह बोले, ‘आज राजनीति में पढ़े-लिखे, समझदार और ईमानदार लोगों की ज़्यादा ज़रूरत है?’
‘यह हम आप सोचते हैं। पर आज का हमारा समाज और ख़ास कर आप की संजय गांधी ब्रिगेड भी ऐसा सोचती है भला?’
‘तो उन की सोच को राजनीति में आए बिना आख़िर बदलेंगे कैसे?’ उन्हों ने पूछा, ‘क्या इंटेलेक्चुअल डिसकशन से?’
‘थियरोटिकली तो यह बात ठीक लगती है पर क्या प्रैक्टिकली भी यह संभव है?’
‘क्यों नहीं संभव है?’ राकेश बाबू बोले, ‘मैं आज राजनीति में जूते घिस रहा हूं। चाहता तो एम.टेक. के बाद कहीं बढ़िया नौकरी कर के ऐशो-आराम की ज़िंदगी बसर कर रहा होता। पर जो समाज को बदलने, उसे सुंदर बनाने का सपना देखा है, उसे कैसे साकार करता? क्या इंजीनियर बन कर?’ वह बोले, ‘हरगिज़ नहीं। यह सपना सच हो सकता है, राजनीति में ही आ कर। और जो पढ़े लिखे लोग राजनीति से कतराते रहेंगे तो गंुडे मवाली ही देश की राजनीति संभालेंगे!’
‘आप की बात सिद्धांत रूप से तो सुनने में अच्छी लगती है, पर व्यवहार रूप में मुश्किल दिखती है।’
‘यही तो।’ राकेश बाबू बोले, ‘यही तो करना है। और यह कोई मुश्किल काम नहीं है। महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, डा. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल, गोविंद बल्लभ पंत या आपके लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव आदि नेताओं की एक लंबी सूची और परंपरा है हमारे सामने जिन्होंने सिद्धांत की राजनीति को व्यावहारिक जामा भी पहनाया।’
‘हां, लेकिन आप के इस कहने में आंशिक झूठ का भी साया है।’
‘कैसे?’
‘आप इस सूची में कई नेताओं का नाम भूल गए हैं। जैसे कि आप ने जे.पी. जैसों का नाम नहीं लिया। और अपनी नेता इंदिरा गांधी का नाम नहीं लिया!’ आनंद बोला, ‘राजनीति में सिद्धांत और व्यवहार की जितनी दूरी, दूरी क्या जितनी बड़ी खाई इंदिरा गांधी ने खोदी है, शायद ही किसी ने खोदी हो।’
‘इंदिरा जी को समझने में यह देश, ख़ास कर आप जैसे लोग हमेशा ग़लती करते हैं।’ वह बोले, ‘प्रीवीपर्स, बैंकों का नेशनलाइजे़शन, ग़रीबी हटाओ जैसा नारा, बीस सूत्रीय कार्यक्रम और छोड़िए सेवेंटी वन में पाकिस्तान को धूल चटा कर बांगलादेश को दुनिया के नक्शे पर रखना जैसे कार्यों को आप मामूली काम समझते हैं?’
‘नहीं बिलकुल नहीं।’ आनंद बोला, ‘पर इंदिरा जी की एक बड़ी उपलब्धि बताना तो आप भूल ही गए!’
‘क्या?’
‘यह इमरजेंसी के नाम पर तानाशाही और ज़ुल्म का जो राज वह चला रही हैं उसे क्या कहेंगे आप?’
‘कुछ नहीं, देश को अराजकता की आंधी से बचाने के लिए ज़रूरी फ़ैसला था!’ वह बोले, ‘और यह आप के जे.पी.!’ कहते हुए उन्होंने एक लंबी सांस छोड़ी और बोले, ‘जे.पी. को तो अमरीका और उस की सी.आई.ए. ने गोद ले रखा है! जे.पी. और जार्ज फर्नाण्डीज़ दोनों को आर.एस.एस. की मार्फ़त अमरीका बुरी तरह इस्तेमाल कर रहा है! यह तथ्य अभी देश के भोले-भाले लोगों को नहीं पता है।’
‘असल में तानाशाही में फ़ासिज़्म भी मिला होता है। और इस वक़्त आप की नेता इंदिरा गांधी देश को अराजकता की आंधी से बचाने के नाम पर एक साथ डिक्टेटर और फ़ासिस्ट दोनों हो गई हैं। शायद इसी लिए इस तरह का दुष्प्रचार भी करती करवाती जा रही हैं।’
‘दुष्प्रचार नहीं यह तथ्य हैं आनंद जी!’
‘अच्छा ये जो अख़बारों में सेंसरशिप, जबरिया नसबंदी यहां तक कि अस्सी साल की महिलाओं की नसबंदी!’ वह बोला, ‘थाने और जेलों में यातनाएं! लोगों के मलद्वार में, महिलाओं के यौन अंगों में मिर्चें डलवाना वग़ैरह यह सब क्या है?’
‘कहीं-कहीं प्रशासनिक स्तर पर चूक हो रही है, यह मैं मानता हूं पर यातना की इतनी भयावह तसवीर जो आप पेश कर रहे हैं, सच्चाई के विपरीत है।’ वह बोले, ‘यह आर.एस.एस, वालों का दुष्प्रचार है। अफ़वाह फैलाने में इन ससुरों का कोई जवाब नहीं है! इन के आगे हिटलर भी फे़ल है!’
‘ये गुड़ बोओ और पेड़ बोओ क्या है!’
‘संजय गांधी जी के शब्दों पर नहीं भावनाओं पर जाइए। वृक्षारोपण के बहाने पर्यावरण और गन्ना के बहाने वह किसानों को समृद्ध करना चाहते हैं।’
‘पर आप के नेता को जब यही नहीं पता कि गुड़ नहीं गन्ना बोया जाता है और पेड़ बोया नहीं रोपा जाता है तो वह देश की जनता का दुख-दर्द कैसे समझेगा!’
‘समझेगा-समझेगा!’ वह बोले, ‘राजनीति सिर्फ़ शब्दों से नहीं संवेदना, सपना और दृष्टि से चलती है। संजय जी के सरोकार देखिए, उन के सपने देखिए। वह सपने देखने वाले आदमी हैं और सपने ही समाज बदलते हैं।’
‘तानाशाही के बूटों तले कुचलने वाला समाज!’
‘इतनी तल्ख़ी, इतनी आग, इतनी आंच आप की बातों में क्यों हैं, आनंद जी?’
‘सच अगर तल्ख़ है, सच अगर आग है, सच अगर आंच है, सच अगर फांस भी है तो है।’
‘सो तो है।’
‘पर वैसे ही जैसे एक शेर में कहूं कि सच तो एक परिंदा है, घायल है, पर ज़िंदा है!’ आनंद बोला, ‘फिर एक फ़ासिस्ट राज में अगर इंदिरा इज़ इंडिया कहा जाता है तो यह क्या है?’ इस के बरअक्स एक छोटी सी प्रतिक्रिया भी नहीं होती कांग्रेस में? इस लिए कि कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ कह रहे हैं?’ वह बोला, ‘यह तो व्यक्तिवाद की भी पराकाष्ठा है!’
‘देखिए इंदिरा जी बड़ी नेता हैं!’
‘होंगी! पर क्या वह इंडिया हैं?’
‘नहीं, नहीं यह तो वैसे ही है जैसे हम धरती पर कश्मीर को स्वर्ग कह बैठते हैं। बरुआ जी की भावनाएं हैं और कुछ नहीं। इसे तिल का ताड़ बनाने की ज़रूरत नहीं है।’
‘और यह जो देश भर के तमाम प्रतिपक्षी नेताओं को चुन-चुन कर जेलों में ठूंस दिया गया है। यहां तक कि चंद्रशेखर, रामधन और हेगड़े जैसे कांग्रसियों को भी!’
‘आप तो सारे देश का हिसाब ऐसे मुझ से मांग रहे हैं जैसे मैं ही सारा देश चला रहा हूं, ये सारी ग़लतियां मैं ही कर रहा हूं। इस सब के लिए एक अकेला मैं ही ज़िम्मेदार हूं।’
‘नहीं, मैं तो सिर्फ़ आप से बात कर रहा हूं और बताना चाह रहा हूं कि आप इस समय एक ग़लत पार्टी में हैं, उस का पुराना इतिहास चाहे जितना स्वर्णिम रहा हो, आज की तारीख़ में कांग्रेस एक फ़ासिस्ट पार्टी के रूप में हमारे समाने उपस्थित है। कि कोई उस के ख़िलाफ़ कुछ मुंह खोले तो उसे जेल में ठूंस दो। उस पर अत्याचार बरपा कर दो। इंदिरा गांधी को कभी कहा गया रहा होगा कि दुर्गा हैं, गाया गया होगा, यह गीत कि आमार दीदी, तोमार दीदी, इंदिरा दीदी, ज़िंदाबाद!’ वह बोला, ‘पर आज तो वह सुरसा बन कर सारी प्रजातांत्रिक शक्तियों को, सारे सिस्टम को निगले हुई हैं!’
‘अच्छा तो आप चाहते हैं कि यही सब मैं भी बोलूं और चंद्रशेखर जी, रामधन जी की तरह मैं भी जेल भेज दिया जाऊं?’
‘बिलकुल!’ वह बोला, ‘अभी आप ही कह रहे थे कि सिद्धांत और व्यवहार को एक करना है। और कि यह कोई मुश्किल काम नहीं है। गांधी, नेहरू वग़ैरह का उदाहरण भी आप दे रहे थे और कि बता रहे थे कि इन लोगों ने सिद्धांत की राजनीति को व्यावहारिक जामा भी पहनाया।’
‘चलिए सोचता हूं कि इस के मद्दे नज़र आप की बात!’
‘मेरी नहीं, आप की बात!’ आनंद बोला, ‘यह मैं नहीं आप ही कह रहे थे। मैं तो सिर्फ़ याद दिला रहा था!’
‘ठीक है भाई, मेरी ही बात!’ राकेश बाबू बोले, ‘रात बहुत हो गई है। सुबह जल्दी उठना भी है।’
‘ठीक है तो मैं चलता हूं। आप सोइए!’ खड़ा हो कर कंबल अपनी देह पर लपेटता हुआ वह बोला, ‘कहिए तो चलते-चलते आज के हालात पर एक शेर सुना दूं?’
‘बिलकुल-बिलकुल!’ वह उत्सुक होते हुए बोले।
‘भोपाल के एक शायर हैं दुष्यंत कुमार। शेर उन्हीं का है कि कैसे-कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं/अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।’
‘क्या बात है!’ राकेश जी बोले, ‘यह सारा भाषण और तर्क-वितर्क करने के बजाय आप पहले ही यह शेर सुना दिये होते। तो भी मैं आप की बात समझ सकता था।’
‘तो चलिए दो शेर और सुनाए देता हूं।’
‘हां, पर इस के बाद और नहीं।’
‘ठीक बात है!’ वह बोला, ‘यह शेर भी दुष्यंत जी का ही है, कि सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए/मेरे सीने में हो या तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।’
‘बहुत बढ़िया!’ राकेश जी बोले, ‘अगर आप कभी भाषण देंगे तो लगता है कि तारकेश्वरी सिनहा की छुट्टी कर देंगे। ख़ैर, चलिए मैं भी कुछ कोशिश करता हूं। आग जलाने की, सूरत बदलने की!’
‘ठीक बाऊ साहब, नमस्कार!’
‘नमस्कार!’

जाने यह संयोग ही था या कुछ और कि इस बातचीत के कुछ ही दिनों बाद राकेश बाबू के राजनीतिक गुरु और आक़ा हेमवती नंदन बहुगुणा से इंदिरा गांधी किसी बात पर नाराज़ हो गईं। उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा दिया। और उन्हीं के शिष्य नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री पद पर बैठा दिया। इस से पहले भी यही हुआ था। पी.ए.सी. रिवोल्ट के बाद कमलापति त्रिपाठी को हटाया गया। फिर कुछ दिन बाद जब सरकार बहाल हुई तो कमलापति के शिष्य बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया गया था।
ख़ैर, बाद के दिनों में यह चीजें और डेवलप हुईं।
और संयोग देखिए कि जब 1977 में इमरजेंसी ख़त्म हुई, जनता पार्टी का गठन हुआ और चुनाव का ऐलान हुआ तो जनसंघियों, समाजवादियों के साथ-साथ जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा, नंदिनी सत्पथी जैसे कई कांग्रेसी भी कांग्रेस छोड़ जनता पार्टी में आ मिले। जनता पार्टी ने जब लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की सूची जारी की तो उस के शहर में जनसंघ धड़े के एक नेता का नाम जारी हुआ। पर रातोरात सूची में संशोधन कर बहुगुणा ने जनसंघी नेता का नाम कटवा कर राकेश प्रताप बहादुर सिंह का नाम जारी करवा दिया। कहते हैं कि बहुगुणा ने तब तीन चार सीटों को प्रतिष्ठा का विषय बना लिया था। जिस में सब से ऊपर ़राकेश प्रताप बहादुर की सीट थी। खै़र, उधर राकेश प्रताप बहादुर सिंह का नाम लोकसभा सीट के लिए जारी हुआ, इधर उन के चचेरे भाई वीर प्रताप बहादुर सिंह को हार्ट-अटैक हो गया। राकेश बाबू की उम्मीदवारी उन के गले की फांस बन गई। कहां विधायकी के टिकट के जुगाड़ में जवानी बीत गई, बुढ़ापे ने दरवाज़ा खटखटा दिया पर टिकट नहीं मिला। विधायकी तो बहुत दूर की बात थी। और यह कल का लौंडा राकेश जनता पार्टी से एम.पी. का टिकट पा गया था। तब जनता पार्टी से टिकट का मतलब था बिना किसी बाधा के लोकसभा में पहंुचना। राकेश प्रताप की इस सफलता से वीर प्रताप बहादुर टूट गए। इतना टूटे कि हार्ट-अटैक हो गया। डाक्टरों ने बहुत हाथ-पांव मारे पर दूसरे ही दिन उन का निधन हो गया। एक बेटा था जो लखनऊ के सेंट फ्ऱांसिस कालेज में पढ़ता था। राकेश प्रताप ने उस की पढ़ाई का ज़िम्मा ले लिया। चुनाव जनता के भरोसे छोड़ वह वीर प्रताप के श्राद्ध वगै़रह में लग गए। हालां कि संयुक्त परिवार था, जमींदारी थी फिर भी अब घर-परिवार के इंजन राकेश प्रताप बहादुर ंिसंह थे। जनता पार्टी की लहर थी सो वह रिकार्ड मतों से चुनाव भी जीते। फिर भी कहने वाले माने नहीं। कहने लगे कि, ‘राकेश प्रताप ने लाश पर खडे़ हो कर चुनाव जीता है।’ लेकिन राकेश प्रताप पर इन बातों का कोई असर नहीं पड़ा। उन्हों ने वीर प्रताप के इकलौते बेटे की पढ़ाई की पूरी ज़िम्मेदारी लेते हुए उसे पढ़ने के लिए बाद में जे.एन.यू. भी भेजा। वीर प्रताप का बेटा पढ़ने में भी होशियार था। उस की मेहनत रंग लाई। और अंततः वह आई.ए.एस. एलायड में सेलेक्ट हो गया। इनकम-टैक्स में। अब वह इनकम-टैक्स में बड़ा अफ़सर है। राकेश प्रताप लोकसभा पहुंच कर युवा सांसदों में शुमार हुए। न सिर्फ़ शुमार हुए बल्कि तेज़-तर्रार पार्लियामेंटेरियन के तौर पर जाने जाने लगे। लोकसभा मंे होने वाली तमाम बहसों में वह शिरकत करने लगे। ख़बरों में उन का अकसर ज़िक्र होता। दिल्ली से जब अपने शहर भी वह आते तो शालीनता उन के सिर पर सवार रहती। दिखावा, पाखंड, भ्रष्टाचार आदि जो राजनीति का चलन बनता जा रहा था, इन चीज़ों से वह कोसों दूर रहते। एक बार तो वह जब दिल्ली से आए तो संयोगवश उन की ट्रेन दस मिनट पहले आ गई। स्टेशन पर उन्हें कोई रिसीव करने वाला तब तक पहुंचा भी नहीं था। पर वह परेशान नहीं हुए। न कहीं फ़ोन वगै़रह किया। चुपचाप अटैची उठाई, रिक्शा किया और अपने घर चले गए। शहर में वैसे भी वह अकसर अकेले रिक्शे पर बैठे घूमते दिखाई पड़ जाते। कई बार किसी साथी के साथ मोटर-साइकिल या स्कूटर पर भी बैठे दिख जाते वह। पर अपने क्षेत्र के विकास की चिंता वह बराबर करते। उन दिनों सांसद निधि जैसी व्यवस्थाएं नहीं थीं, फिर भी विकास का पहिया अपने क्षेत्र में उन्हों ने कभी रुकने नहीं दिया। वह अकसर दलगत बेवक़ूफियों से भी दूर रहते। जनता पार्टी में वह थे ही, पर आए कांग्रेस से थे सो कांग्रेसियों से भी उन के संबंध मधुर थे। इस से और आसानी होती उन्हें। कभी विरोध के स्वर पक्ष या विपक्ष से नहीं उठते उन के ख़िलाफ़। हालां कि इस से खिन्न कुछ मुरहे छुटभैये कहते भी कि, ‘क्या करें भइया, शहर की राजनीति नीरस हो गई है!’
‘क्यों?’ कोई अनमना हो कर पूछता।
‘क्यों क्या?’ मुरहा बोलता, ‘बिना उखाड़-पछाड़ के भी कोई राजनीति होती है भला? ऐसे तो लोकल पालिटिक्स का पटरा हो जाएगा!’
पर सचमुच ऐसा नहीं हुआ कि लोकल पालिटिक्स का पटरा हो जाए। जल्दी ही चौधरी चरण सिंह, जगजीवन राम आदि की महत्वाकांक्षाएं ज़ोर मारने लगीं। मोरार जी देसाई सरकार का पतन हो गया। चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री हो गए। हेमवती नंदन बहुगुणा भी पैंतरा बदल कर चरण सिंह के साथ आ गए। सो राकेश प्रताप बहादुर सिंह भी उधर ही आ गए। शहर में भी जनता पार्टी दो फाड़ क्या तीन चार फाड़ हो गई। अब जब पार्टी टुकड़े-टुकडे़ हो गई तो लोकल पालिटिक्स भी ज़ोर मारने लगी। राकेश प्रताप पर शालीन ही सही टिप्पणियां, बाद मंे छींटाकशी में बदलीं। चरण सिंह की सरकार गिरी और चुनाव का ऐलान हो गया। अब बहुगुणा फिर से कांग्रेस से हाथ मिला बैठे थे। संजय उनके भांजे हो गए और वह मामा। मामा-भांजे के साथ राकेश जी भी नत्थी हो कर फिर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े। चुनाव हारते-हारते बचे। कुछ हज़ार वोटों से जीते। उन के बहुतेरे दोस्तों-साथियों ने उन्हें बहुगुणा से किनारा कसने, छुट्टी लेने जैसी सलाहें बिना मांगे दीं और वह सिर्फ़ मुसकुरा कर रह जाते। कोई जब ज़्यादा पीछे पड़ता तो वह मुसकुराहट में थोड़ा और इज़ाफ़ा करते। और धीरे से कहते, ‘बिना मांगे किसी को सलाह नहीं देनी चाहिए।’ और फिर जैसे जोड़ते, ‘और आप तो भाई साहब जानते हैं कि बिना मांगी सलाह पर मैं अमल भी नहीं करता।’ कोई फिर भी उन का पीछा नहीं छोड़ता तो वह थोड़ा सख़्ती से कहते कि, ‘बहुगुणा जी मेरे लिए व्यक्तिगत और वैचारिक निष्ठा का प्रश्न हैं। मैं उन का साथ किसी सूरत में नहीं छोड़ सकता।’ एक बार उन के एक वकील दोस्त ने एक अख़बार में एक लेख, जिस का शीर्षक ‘चूकते-चूकते चुक गए हैं बहुगुणा’ था, दिखाते हुए उन से कहा कि अब तो संभल जाइए राकेश जी!’
‘क्या संभल जाएं?’ बिफरते हुए राकेश जी लगभग चीख़ पड़े, ‘बहुगुणा जी कोई कुरता-पायजामा हैं कि उन्हें बदल दूं?’ राजनीति में किसी के प्रति समर्पण और निष्ठा की पराकाष्ठा थी यह। फिर जल्दी ही वह थोड़ा संयत हो कर बोले, ‘क्षमा कीजिए भाई साहब, मैं इस तरह की राजनीति करने के लिए राजनीति में नहीं आया!’
अलग बात है कि कुछ समय बाद बहुगुणा चल बसे। पर जाने राकेश प्रताप उन के साथ नत्थी होने का कि ईमानदार राजनीति करने का अभिशाप आज तक भुगत रहे हैं। और राजनीति के हाशिए पर आ खड़े हुए हैं। बहुगुणा उन्हें कांग्रेस में छोड़ गए थे, वह आज भी कांग्रेस में हैं। शायद आगे भी कंाग्रेस में रहें। बहुगुणा के निधन के बाद वह दो बार संसदीय चुनाव हार गए। बाद के दिनों में उन्हें कांग्रेस ने टिकट भी नहीं दिया। उन के बाद टिकट दिया कांग्रेस ने उन की सीट पर तो जमाल को दिया जो अपनी ज़मानत भी नहीं बचा पाया। हां, राकेश जी बाद में प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष बना दिए गए। पर एक बार प्रदेश कांगेस के कार्यालय में एक महिला से बलात्कार की घटना सामने आते ही उन्हों ने प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया। यह कह कर कि जब हम अपने पार्टी कार्यालय की पवित्रता नहीं बचा सकते तो कोई हक़ नहीं कि पदाधिकारी भी बने रहें। पर उन की यह बात नक़्क़ारख़ाने में तूती साबित हुई। किसी और ने, न अख़बारों ने, न कांग्रेसियों ने इस पर कोई ध्यान दिया। सब ने ऐसा बर्ताव किया जैसे कुछ हुआ ही नहीं। वैसे भी उन के जैसे व्यक्ति के लिए प्रदेश कांग्रेस में कोई जगह नहीं रह गई थी। बल्कि कहें कि उत्तर प्रदेश में अब कांग्रेस के लिए कोई जगह नहीं रह गई थी। जिस जातिवादी गठजोड़ को कांग्रेस परदे के पीछे रख कर राज करती आ रही थी, वही जातिवादी गठजोड़ अब परदे फाड़ कर खुले आम बदबू की तरह पांव पसारे उत्तर प्रदेश में चौतरफ़ा छा गए थे। ऐसे जैसे जातिवाद का फोड़ा फूट पड़ा था। जातियों का विस्तार हो गया था और राजनीति उन से पानी मांग रही थी।
तो राकेश प्रताप बहादुर सिंह ?
जो राकेश प्रताप बहादुर सिंह कभी कहते थे कि राजनीति में पढे़-लिखे लोगों को आना चाहिए। क्यों कि सिर्फ़ इंटेलेक्चुअल बहस करने से ही बात नहीं बनने वाली, कि आप ड्राइंगरूम में बैठ कर पालिटिशियंस और पालिटिक्स को सिर्फ़ कोसते रहिए। इस से काम नहीं चलेगा। आज अपने घर के ड्राइंग रूम में न सही पार्टी कार्यालयों में बैठ कर इंटलेक्चुअल बहस में फंस गए थे और कोसने लग गए थे कि ‘बताइए, अब पालिटिक्स में कैसे-कैसे लोग आ रहे हैं?’
और ख़ुद हाशिए पर छोड़िए हाशिए से भी बाहर हो रहे थे। सिद्धांत की राजनीति अब जातिवादी, भ्रष्टाचारी और गंुडई की राजनीति से पानी मांग रही थी। अद्भुत था यह!

अद्भुत ही था मुनव्वर भाई का अपने शहर में बेटी की लाश का मजमा!
दुपहरिया उतरते-उतरते जमाल का फ़ोन फिर आ गया। कहने लगा, ‘आनंद जी, मनुव्वर भाई को समझाइए!’
‘क्या समझाऊं?’ आनंद भी पूरी तल्ख़ी से बोला।
‘यही कि मदारीपना और ब्लैकमेलिंग छोड़ दें। और कि बेटी को बाइज़्ज़त दफ़ना दें।’
‘यह तो तुम भी उन्हें समझा सकते हो!’
‘क्या ख़ाक समझाऊं?’ जमाल बोला, ‘मेरी तो शकल से ही उन्हें एलर्जी है!’
‘सोचो जमाल सोचो!’ आनंद बोला एक समय था जब मुनव्वर भाई तुम्हें दिलोजान से चाहते थे। तुम्हें अपना छोटा भाई बता कर सब के सामने पेश करते थे।’ वह बोलता गया, ‘पर ज़रूर तुम ने कुछ ऐसा किया होगा कि तुम्हारी शकल से भी उन्हें एलर्जी हो गई!’
‘आनंद जी यह समय इस तफ़सील का नहीं है!’
‘तो?’
‘मुनव्वर भाई को सही मशविरा देने का है।’
‘एक मशविरा तुम्हें दे सकता हूं?’
‘शौक़ से!’ जमाल बोला, ‘फ़रमाइए तो आप!’
‘मान लोगे भला?’
‘बिलकुल!’
‘तो तुम एक काम तो तुरंत यह करो कि उस नर्सिंग होम वाले की पैरोकारी बंद कर दो।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘बल्कि कहूं कि उस की दलाली बंद कर दो, सब अपने आप ठीक हो जाएगा!’
‘यह तो कोई बात नहीं हुई आनंद जी!’ जमाल बोला, ‘और आनंद जी माइंड योर लैंगवेज, मैं किसी का दलाल नहीं हूं।’
‘श्योर!’
‘आनंद जी आप की शुरू से ही बेहद-बेहद रिस्पेक्ट करता हूं, इस का मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि आप के मुंह में जो आए, वह मुझे कह दें!’
‘अच्छा उस नर्सिंग होम वाले की पैरोकारी तुम नहीं कर रहे हो?’
‘पैरोकारी क्या मैं तो जायज़ बात कह रहा था!’
‘क्या?’ आनंद ने पूछा कि, ‘यही न कि मुनव्वर भाई नर्सिंग होम से अपनी बेटी की मौत का मुआवज़ा न मांगें।’
‘एक्जे़क्टली?’
‘क्यों भई क्यों?’
‘अच्छा चलिए जो मुआवज़ा मांगना ही है तो सही प्लेटफ़ार्म पर जाएं। उपभोक्ता फ़ोरम है, अदालतें हैं। पर वह तो खुल्लम खुल्ला ब्लैकमेल कर रहे हैं।’
‘भई वाह जमाल मियां। वाह!’ आनंद बोला, ‘अदालतें! जानते हो कि ये अदालतें आज की तारीख़ में शरीफ़ आदमियों के लिए कसाईबाड़ा बन चली हैं। और अपराधियों के लिए चरागाह कहो या सैरगाह! फिर भी तुम अदालतों की बात कर रहे हो?’
‘अब आप मुनव्वर भाई की पैरोकारी नहीं कर रहे हैं आनंद जी!’ जमाल ‘पैरोकारी’ पर ख़ासा ज़ोर देते हुए ऐसे बोला जैसे वह कह रहा हो कि आनंद जी अब आप मुनव्वर भाई की दलाली कर रहे हैं।
‘अब तुम जो चाहो समझो जमाल!’ जमाल के तंज़ को समझते हुए वह बोला, ‘अब तुम मुझे भले ही मनुव्वर भाई का दलाल कह लो पर यह जान लो कि अदालतों में तो मुनव्वर भाई की दाल गलने वाली है नहीं।’
‘क्यों?’
‘एक तो वह फोकट का कोई चूतिया टाइप का वकील ढूंढेंगे, उस से कुछ बनेगा नहीं। और जो मान लो क़ायदे का वकील करेंगे भी तो वह पहले ही राउंड में उन से इतनी फ़ीस ले लेगा कि उन की पैंट उतर जाएगी। फिर वह तारीख़ों के मकड़जाल में उलझेंगे। और अंततः पता चलेगा कि वह नर्सिंग होम वाला संबंधित जज को औने पौने में ख़रीद लेगा और मुनव्वर भाई हाथ मलते रह जाएंगे। बेटी तो उन की चली ही गई है, मुआवज़ा भी उन का मर जाएगा!’
‘तो अब आप भी उन्हें उन की ब्लैकमेलिंग में शह दे रहे हैं?’
‘क्या बेवक़ूफ़ी की बात कर रहे हो?’ आनंद भड़क कर बोला, ‘लखनऊ में तो उन से इस बारे में कोई चर्चा ही नहीं हुई। और वहां पहुंचने के बाद उन से कोई बात नहीं हुई। और इस सब के बावजूद मैं उन के इस क़दम को कंडम कर रहा हूं। पहले भी यह बात मैं ने तुम से कही थी।’
‘तो एक बार आनंद जी प्लीज़ और प्लीज़ एक बार मुनव्वर भाई को आप फ़ोन कर के सिर्फ़ इतना सा कह दीजिए कि वह यह सब ठीक नहीं कर रहे और कि आप उन के इस फ़ैसले को कंडम कर रहे हैं।’
‘इस से क्या होगा?’
‘होगा यह कि आप के इस कहे से उन की शर्म हया जागेगी और वह अपना मजमा उठा लेंगे।’
‘इस से क्या होगा?’ आनंद ने सवाल फिर दुहराया।
‘होगा यह कि जो अपना नर्सिंग होम वाला मुनव्वर भाई की मदारीगिरी से जो डिफ़ेम हो रहा है, वह फ़ेज़ ख़त्म हो जाएगा। और नर्सिंग होम की इमेज ख़राब होने से बच जाएगी!’ जमाल बोला, ‘आप को पता है कि दोपहर बीत गई है और सुबह से एक भी पेशेंट इस नर्सिंग होम में इंट्री नहीं ले पाया है। उलटे चार मरीज़ जो भरती थे, भाग गए हैं।’ वह बोला, ‘ऐसे तो उस बिचारे का बिज़नेस डूब जाएगा।’
‘एक बात क्या दो बात बताऊं जमाल तुम्हें?’
‘बताइए आनंद भाई!’
‘अव्वल तो यह कि मुनव्वर भाई के इस फ़ैसले से मैं सहमत नहीं हूं, यह साफ़ है। पर तुम यह भी जान लो कि मैं अगर इस मसले पर उन के साथ नहीं हूं तो तुम्हारी तरह उन के खि़लाफ़़ भी नहीं हूं।’ वह बोला, ‘मेरा स्टैंड बिलकुल साफ़ है। इज़ दैट क्लियर?’
‘ओ.के.!’
‘दूसरी बात यह है कि जो तुम कह रहे थे कि मुनव्वर भाई उस नर्सिंग होम वाले का बिज़नेस चौपट कर रहे हैं तो तुम ग़लत कह रहे हो।’
‘क्या आनंद जी!’
‘मेरी पूरी बात तो सुनो!’
‘अच्छा बताइए!’
‘फिर मैं कह रहा हूं कि उस नर्सिंग होम वाले का बिज़नेस मुनव्वर भाई नहीं चौपट कर रहे हैं।’
‘तो?’
‘एक तो उस नर्सिंग होम का मालिक ख़ुद कर रहा है और दूसरे तुम ख़ुद ज़िम्मेदार हो इस के लिए!’
‘क्या बक रहे हैं आनंद जी!’
‘ज़रा तमीज़ में रहो जमाल!’ आनंद बिदकते हुए बोला, ‘बात सुननी हो तो सुनो, नहीं फ़ोन काट दो। वैसे भी मैं ने नहीं तुम्हीं ने मिलाया है।’
‘अच्छा बताइए सॉरी!’
‘तो अगर तुम चाहते हो कि नर्सिंग होम वाले का बिज़नेस न चौपट हो और कि उस की इमेज और न ख़राब हो तो तुम एक काम करो कि इस पूरे मामले से अपने को तुरंत ड्राप कर लो। और कि और भी जो तुम्हारे जैसे लोग नर्सिंग होम वाले की सो काल्ड मदद कर रहे हों, उन से भी कह दो कि ड्राप कर लें!’
‘ड्राप कर लें?’ जमाल बौखला कर बोला, ‘तब तो मुनव्वर भाई उसे कच्चा चबा जाएंगे!’
‘ना, मुनव्वर भाई टूटे हुए हैं, हारे हुए हैं, उन्हें जितना चढ़ाओगे चढ़ते जाएंगे, जितना लड़ाओगे, लड़ते जाएंगे। वह बेटी अपनी खो चुके हैं, तुम लोग बात ज़्यादा बढ़ाओगे तो वह अपने आप को भी दांव पर लगा सकते हैं। और जो कहीं ख़ुदा न ख़ास्ता उन के साथ भी कुछ हो गया, या उन्हों ने ख़ुद कुछ अप्रिय कर करवा लिया तो? तो अभी तो सिर्फ़ भीड़ जुटी है। कल को शहर में मूवमेंट खड़ा हो जाएगा। कौन रोकेगा उसे? तब तो तुम्हारा नर्सिंग होम वाला कहीं का नहीं रहेगा!’ आनंद बोला, ‘एक हारे हुए आदमी का मनोविज्ञान समझो जमाल! और तुम तो मुनव्वर भाई का मनोविज्ञान अच्छी तरह जानते हो कि जब वह अड़ जाएं तो टूट भले जाएं, झुकेंगे नहीं!’ वह बुदबुदाया, ‘इसी अड़ियलपने में उन्हों ने अपना जीवन नष्ट कर लिया। और तुम से ज़्यादा उन का यह सब कौन जानता है?’
‘जी आनंद जी, यह एक पासिबिलिटी तो है कि मुनव्वर भाई अपने साथ भी कुछ ऐसा-वैसा कर सकते हैं।’ जमाल बोला, ‘पर इस की क्या गारंटी है कि हम लोग ड्राप कर लें तो बात ख़त्म हो ही जाएगी!’
‘देखो जमाल, मुनव्वर भाई हारे हुए हैं, असफल हैं, टूटे हुए हैं, सब ठीक है। पर वह जाहिल भी हैं, यह बात तो तुम भी नहीं मानोगे?’
‘बिलकुल नहीं। किसी सूरत में नहीं!’
‘तो क्या वह यह नहीं जान पाए होंगे अभी तक कि नर्सिंग होम वाले को बैकिंग कौन-कौन दे रहा है?’
‘हां, ये तो है!’
‘फिर जब उन्हों ने यह जाना होगा कि तुम भी हो बैकिंग में तब?’
‘हूं।’
‘फिर तुम्हारा नाम आना मतलब सांड़ को लाल कपड़ा दिखाना है।’
‘ये तो है!’ जमाल बोला, ‘पर विकल्प क्या है?’
‘विकल्प यह है कि तुम लोग ख़ुद को ड्राप कर लो। और नर्सिंग होम वाले से कहो कि सीधे मुनव्वर भाई से बात करे। चाहे तो प्रशासन को साथ ले ले। और अव्वल तो यह कि जब तुम लोग हाथ खड़े कर लोगे तो वह ख़ुद ही कोई रास्ता निकाल लेगा। बिज़नेस मैन है, वह सारे गुण जानता होगा। वह तो अभी तक इस लिए अड़ा होगा कि तुम लोग उस के साथ हो। जब उस को लगेगा कि वह अकेला हो गया है तो ख़ुद ही कंप्रोमाइज़ कर लेगा!’
‘यह तो आनंद जी, एक तरह से मुनव्वर भाई को वाक ओवर दे कर उन की फ़तह का रास्ता तजवीज़ कर रहे हैं आप!’
बल्कि महाभारत वाला इक्ज़ांपिल दूं कि, ‘अश्वत्थामा मरो, नरो वा कुंजरो! कह कर आप हमें चित्त करना चाहते हैं।’
‘अब चाहे जो समझ लो जमाल मियां।’ आनंद बोला, ‘तुम ने राय मांगी मैं ने दे दी।’ वह बोला, ‘फिर विकल्प तुम्हारे पास दोनों ही हैं। लड़वा लो या कंप्रोमाइज़ करवा लो।’
‘चलिए देखता हूं!’ जमाल बोला, ‘पर आप एक बार ख़ुद बात नहीं कर लेंगे मुनव्वर भाई से!’
‘मुनव्वर भाई से एक बार क्या सौ बार बात करूंगा।’ आनंद बोला, ‘पर माफ़ करना जमाल इस इशू पर तो बिलकुल नहीं!’
‘आखि़र क्यों?’
‘क्यों कि मैं मुनव्वर भाई को शर्मिंदा नहीं करना चाहता। आखि़र सिस्टम के मारे हुए हैं और मेरे पुराने दोस्त हैं।’ उस ने जैसे जोड़ा, ‘दोस्त तो वह तुम्हारे भी रहे हैं। बल्कि एक समय के तुम्हारे रहनुमा भी!’
‘चलिए आनंद जी!’
‘एक बात और कहूं जमाल!’
‘कहिए!’
‘अगर बेटी की लाश पर ही सही मुनव्वर भाई को कुछ पैसे मिल जाएंगे तो उन का कुछ भला हो जाएगा, अलबत्ता नर्सिंग होम वाले की सेहत पर इस से कुछ ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। वह तो लोगों को लूट कर और कमा लेगा!’
‘हां, पर आनंद जी आप के मुंह से यह और ऐसी बात शोभा नहीं देती!’ वह बोला, ‘हम तो आप को, आप की आइडियालजी के लिए ही आज तक सलाम करते रहे हैं!’
‘चलो अब से मत करना!’
‘नहीं हम तो फिर भी आप को सलाम करेंगे!’ किसी विजेता की तरह जमाल बोला। कह कर जमाल ने फ़ोन काट दिया।
पर थोड़ी देर बाद नर्सिंग होम वाले का फ़ोन आ गया। आनंद समझ गया कि यह जमाल का काइयांपन है। वह उधर से रिरिया रहा था, ‘आनंद भइया कुछ करिए! मुनव्वर भइया को समझाइए!’
‘हम लोग एक दूसरे को पहले से जानते हैं क्या?’ आनंद ने बड़ी तल्ख़ी से पूछा।
‘आप साहब बड़े आदमी ठहरे।’ वह बोला, ‘आप भले हमें नहीं जानते पर हम तो आप को जानते हैं!’
‘कैसे जानते हैं?’
‘अरे साहब, आप इस शहर के हैं, इतने बड़े पालिटिशियन हैं, कौन नहीं जानता आप को?’
‘क्या बेवक़ूफ़ी की बात कर रहे हैं?’ आनंद बोला, ‘वह शहर छोड़े, और फिर राजनीति छोड़े तो मुझे एक अरसा हो गया!’
‘तो भी, तो भी!’ वह रिरियाया, ‘आप को, आप के काम को, आप की इमेज को सब जानते हैं!’
‘अच्छा?’ आनंद ने जैसे उस के रिरियाहट के गुब्बारे में पिन चुभोते हुए कहा, ‘अच्छा, जो अभी आप के कहे मुताबिक़ मैं अगर मुनव्वर भाई से बात नहीं करूं तो क्या आप की नज़र में फिर भी मेरी इमेज वैसी ही रहेगी?’
‘बिलकुल जी, बिलकुल जी!’
‘तो अब आप फ़ाइनली समझ लीजिए कि मैं न तो आप को जानता हूं, न मुनव्वर भाई को न किसी और को!’ आनंद बोला, ‘फिर आप यह भी नोट कर लीजिए कि मैं इस मसले पर न तो आप से, न किसी और से एक शब्द भी बात नहीं करना चाहता!’
‘आप तो सर जी, नाराज़ हो गए।’
‘आप को मेरा नंबर कहां से मिला?’
‘ही ही!’
‘जमाल ने दिया?’
‘वह तो जी आप की हमेशा ही तारीफ़ करते रहते हैं।’
‘करते रहते हैं या आज कर रहे थे?’
‘जी-जी!’
‘अच्छा दो एक बात पूछूं?’
‘जी, पूछें सर!’
‘आप के नर्सिंग होम में बर्न यूनिट है?’
‘जी?’
‘बर्न यूनिट?’
‘जी, यूनिट तो नहीं है पर इलाज हम करते हैं?’
‘सेवेंटी एट्टी परसेंट जले लोगों का भी इलाज आप बिना बर्न यूनिट के करते हैं?’
‘तो तो जी, सब ऊपर वाले की मेहरबानी है, जो बच जाता है, बच जाता है, नहीं तो हम क्या कर सकते हैं जी?’
‘क्यों?’ आनंद बौखला कर बोला, ‘लोगों को लूट तो सकते हैं, मार तो सकते हैं?’ वह बोला, ‘आप को पता है कि सेवंेटी एट्टी परसेट जले लोगों का देश में सिर्फ़ दो ही जगह इलाज संभव है। एक दिल्ली के सफ़दरजंग हास्पिटल मेें, या फिर किसी मिलेट्री हास्पिटल में? और कि फ़ि़टी परसेंट से अधिक जले लोगों के बचने की संभावना शून्य होती है?’
‘नहीं जी!’
‘तो फिर नर्सिंग होम क्यों खोला है? सिर्फ़ लूटने के लिए?’
जवाब में वह कुछ नहीं बोला। लेकिन आनंद बोलता रहा, ‘अरे, जब सेवेंटी, एट्टी परसेंट वह बच्ची जल गई थी, तो तुरंत उसे सफ़दरजंग हास्पिटल भेजना था, जहां मु़त इलाज भी होता और शायद वह फूल सी बच्ची बच जाती! पर नहीं, जब बीस पचीस हज़ार लूट लिए और देखा कि स्थिति बिगड़ गई है तो प्लेटलेट कम होने का ड्रामा कर लखनऊ भेज दिया? अजीब है।’
‘जी सर!’ वह किसी घाघ बिजनेसमैन की तरह पूरी विनम्रता से फिर रिरियाया।
फिर आनंद ने ही ‘सॉरी!’ कह कर फ़ोन काट दिया।
फिर किसी का फ़ोन नहीं आया।
पर सफ़दरजंग अस्पताल की याद आ गई।

दूर के एक रिश्तेदार की बेटी जल गई थी। तेईस, चौबीस साल की लड़की की शादी को अभी सात, आठ महीने ही हुए थे। और जल गई। कि जला दी गई? तुरंत-तुरंत कुछ कहना मुश्किल था। कहानी यह बताई गई कि घर में गैस ख़त्म हो गई थी सो कोयले की अंगीठी सुलगाई। कोयला ठीक से आग नहीं पकड़ रहा था सो घर में रखा स्प्रिट कोयले पर डाला। स्प्रिट ने भड़क कर उसे आग की लपटों में ले लिया। सिंथेटिक साड़ी पहने थी, सो आग पर क़ाबू नहीं पाया जा सका। और वह जब तक साड़ी उतार कर फेंकती फांकती तब तक वह पूरी तरह जल चुकी थी। फ़ोन पर यह कहानी सुन कर आनंद ने लड़की के पिता से पूछा कि, ‘क्या लड़की को आग से बचाने में उस की ससुराल पक्ष में किसी का हाथ पांव भी जला है?’
‘नहीं कहीं कोई ज़रा भी नहीं जला है?’
‘क्या तब घर मेें कोई था नहीं?’
‘सास ससुर थे।’
‘और पति?’
‘वह कहीं काम से गया था।’
‘क्या उन का घर बहुत बड़ा है?’
‘नहीं।’
‘तो फिर वह बचाने क्यों नहीं आए? आखि़र जब वह जली होगी तो जलते ही चीख़ी चिल्लाई होगी!’
‘वह लोग दूसरे कमरे में थे।’
‘कमरे में ही थे न? किसी महल में तो नहीं!’
‘छोड़िए यह सब!’ लड़की के पिता बोले, ‘जलने के बाद वह सब इलाज के लिए सिविल हास्पिटल ले आए, हमें इनफ़ार्म किया। मेरे लिए यही बहुत है। और फिर यह सब बाद में डिसकस कर लेंगे। अभी तो किसी तरह बेटी को बचाने की सोचिए!’
‘कहां हैं, अभी आप लोग?’
‘एक नर्सिंग होम में।’
‘अभी तो आप सिविल हास्पिटल बता रहे थे?’
‘हां, वहां से यहां ले आए!’
‘क्यों?’
‘क्या करते वहां डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए।’
‘ओह!’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘वहां जो डाक्टर उस का इलाज कर रहे हैं, उन से बात करवा दीजिए।’
‘ठीक है अभी खोज कर बात करवाता हूं।’
‘मैं इंतज़ार कर रहा हूं।’
‘वो तो ठीक है, पर यह बताइए क्या बेटी को ले कर लखनऊ आ जाऊं?’
‘पहले वहां के डाक्टर से बात तो करवा दीजिए! कैसी स्थिति है यह तो पता चले पहले।’
‘करवाता हूं अभी!’
लेकिन फ़ोन कट गया।
थोड़ी देर बाद फिर फ़ोन आया तो उधर से डाक्टर से बात हुई। डाक्टर ने बताया, ‘सेवेंटी-एट्टी परसेंट जल चुकी है लड़की।’
‘चांसेज़ कितने हैं?’
‘चांसेज़?’ डाक्टर जैसे ख़ुद सवाल पर उतर आया, ‘सेवेंटी-एट्टी परसेंट जल चुकी है लड़की और आप चांसेज़ पूछ रहे हैं?’
‘तब भी?’
‘देखिए मैं कुछ नहीं कह सकता।’ कहते हुए डाक्टर उकता गया। और फ़ोन उस ने लड़की के पिता को दे दिया।
‘तो क्या करूं लखनऊ आ जाऊं?’ लड़की का लाचार पिता पूछ रहा था।
‘ऐसा कीजिए कि थोड़ी देर रुक कर बात करते हैं।’ आनंद ने कहा।
‘क्यों?’ लड़की के पिता की आवाज़ रुंध गई।
‘लखनऊ में डाक्टरों से ज़रा डिसकस कर लूं फिर बताता हूं।’
‘अच्छा-अच्छा!’ लड़की के पिता की आवाज़ में थोड़ी राहत आ गई।
फिर उस ने कुछ डाक्टर दोस्तों से लखनऊ में बात की। एक डाक्टर को जब उस ने बताया कि लड़की सेवेंटी-एट्टी परसेंट जल गई है तो उस ने कहा कि थर्टी-फोर्टी परसेंट जल गए लोग नहीं बचते तो ये तो सेवेंटी-एट्टी परसेंट जली हुई है सो बचने के चांसेज़ शून्य हैं। और लखनऊ में तो बिलकुल नहीं। अब कोई चमत्कार हो जाए तो अलग बात है। उस डाक्टर ने यह भी कहा कि लखनऊ के मेडिकल कालेज तक में क़ायदे की बर्न यूनिट नहीं है, वेंटिलेटर नहीं है। लखनऊ लाने से बेहतर है, उसे वहीं रहने दीजिए। पर यह कहने पर कि ऐसे ही तो उसे नहीं न मरने देंगे? डाक्टर ने बताया कि फिर उसे वहीं मिलेट्री हास्पिटल में दिखाइए या फिर दिल्ली में सफ़दरजंग हास्पिटल ले जाइए। लखनऊ तो हरगिज़ नहीं।
अंततः दिल्ली में सफ़दरजंग हास्पिटल जाना तय हुआ। वह लोग लड़की को ले कर ट्रेन से चले। ए.सी. कोच में मय कंपाउंडर के। जो रास्ते भर ग्लूकोज़ की ड्रिप लगाता रहा। आनंद भी लखनऊ से उसी ट्रेन में आ गया। ट्रेन में पहुंच कर लड़की को देखते ही वह अवाक रह गया। वह तो पूरा हनुमान बनी हुई थी। पूरी देह बैंडेज में लिपटी पड़ी थी। गले से ले कर पैर तक। उस ए.सी. कोच में ग्लूकोज की चढ़ती बोतल के बावजूद लड़की के चेहरे पर उसे देखते ही मुस्कान आ गई। लड़की मुसकुरा रही थी और वह दहल गया था। दहल गया था उस का यह रूप देख कर। इस के पहले उस ने उसे शादी के जोड़े में देखा था और आज बैंडेज में! इस तकलीफ़़ में भी लड़की के चेहरे पर मुस्कान और जीने की ललक देख कर वह दंग था। लड़की की मुस्कान और जीने की ललक के बावजूद आनंद से रहा नहीं गया। उस के माथे पर हाथ फेरते हुए वह रो पड़ा। उस के आंसू छलछला पड़े। बोलती हुई आवाज़ रुंध गई। फिर भी उस ने पूछा, ‘दर्द ज़्यादा है?’
‘दर्द तो नहीं, जलन ज़्यादा है!’ लड़की ज़रा रुकी और बोली, ‘लग रहा है, पूरी देह अभी भी जल रही है।’ वह फिर रुकी और बोली, ‘लग रहा है जैसे ट्रेन में नहीं, आग में लेटी हुई हूं।’ कह कर वह फिर मुस्कुराने की कोशिश करने लगी। आनंद और रोने लगा। सुबक-सुबक कर। सुबकते हुए ही वह बोला, ‘घबराओ नहीं बेटी, ठीक हो जाओगी।’ आनंद को सुबकते देख कंपाउंडर ने उसे इशारा किया कि वह वहां से हट जाए। वह वहां से हट गया। उस ने देखा लड़की के माता पिता की आंखें रोते-रोते सूख गई थीं। चेहरा बिलकुल धुआं। बदहवास। लड़की के पिता में फिर भी हिम्मत बाक़ी थी। हिम्मत बेटी को बचा लेने की। लड़की के भाई-भाभी उस की देख रेख में लगे थे। ट्रेन के लखनऊ से चलने का समय हो गया था। लड़की की ननद जो लखनऊ में ही रहती थी, लड़की से मिल कर ट्रेन से उतर रही थी।
ट्रेन चलने के बाद आनंद ने लड़की के पिता से पूछा कि, ‘लड़की के ससुराल के लोग नहीं आए हैं क्या?’
‘ननद अभी मिल कर गई है और उस का हसबैंड उधर सो रहा है।’ ऊपर की बर्थ दिखाते हुए वह बोले।
‘सो रहा है?’
‘हां, दो दिन से सो नहीं पाया था।’
‘और सास-ससुर? घर के और लोग?’
‘सास-ससुर वहां अस्पताल में थे।’ कह कर लड़की के पिता ने आंखें झुका लीं।
‘और ख़र्च-वर्च?’
‘ख़र्च-वर्च की दिक़्क़त नहीं है।’ कहते हुए वह आनंद के कंधे पर सिर रख कर लिपट गए। रुंधे गले से बोले, ‘खेत-बारी सब बेंच दूंगा, अपने को बेंच दूंगा पर बस अब आप बेटी को बचा लीजिए किसी तरह!’
‘बचाने वाला तो देखिए भगवान है, डाक्टर हैं!’
‘नहीं बाबू अब सब कुछ आप के सहारे है।’ कह कर वह फिर बिलखने लगे। आनंद ने उन्हें सांत्वना दी और खाना खाने को कहा।
‘खाना खाने का मन नहीं है।’ उन्हों ने जैसे जोड़ा, ‘भूख मर गई है।’ वह बोले।
‘ऐसे तो काम नहीं चलेगा।’ खाना खाने का इसरार करते हुए आनंद ने कहा, ‘आखि़र कल दिन भर दौड़-भाग करनी होगी। देह में कुछ नहीं होगा तो कैसे दौड़-भाग कर पाएंगे?’ कहते हुए उस ने उन के हाथ में पूड़ी-सब्ज़ी का पैकेट थमा दिया। बाक़ी लोगों से भी आनंद ने खाने का इसरार करते हुए कहा कि, ‘खा लीजिए, नहीं खाना ठंडा हो जाएगा।’
खा पी कर आनंद सो गया।

सुबह दिल्ली पहुंचे तो बारिश हो रही थी। लड़की के पिता तिहरी परेशानी में पड़ गए। एक तो बारिश हो रही थी दूसरे, लड़की की हालत बिगड़ती जा रही थी। तीसरे उन के जो दो चार क़रीबी लोग जो दिल्ली में ही रहते थे उन में से कोई भी स्टेशन उन्हें रिसीव करने या बेटी की मिज़ाजपुर्सी करने नहीं आया था। ख़ास कर अपने एक भांजे पर वह कुढ़े हुए थे, जो उन के घर पर रह कर पढ़ा था। और अब दिल्ली में कहीं इंजीनियर था। उन को उम्मीद थी कि दिल्ली पहुंचते ही उन के रिश्तेदार लोग उन्हें हाथों-हाथ थाम लेंगे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ था। हाथों-हाथ थाम लेना तो दूर कोई झांकने भी नहीं आया था। इस सब से वह गहरे डिप्रेशन मेें चले गए थे। और रह-रह बुदबुदा भी रहे थे, ‘बताइए दुख की ऐसी घड़ी में भी ससुरे नहीं आए!’
‘न हो तो फ़ोन कर लीजिए। हो सकता है लोग भूल गए हों।’ उस ने जोड़ा, ‘एक तो बारिश है दूसरे, दिल्ली में वैसे ही लोग व्यस्त रहते हैं।’
‘रहते होंगे!’ वह भड़कते हुए बोले, ‘मैं अब किसी को याद दिलाने नहीं जाऊंगा। अब सब आएं चाहे भाड़ में जाएं।’
ख़ैर, अच्छा यह था कि स्टेशन पर स्ट्रेचर मिल गया और फ़ोन करने पर एंबुलेंस भी आ गई। सफ़दरजंग अस्पताल में आनंद ने पहले ही से एक आई.ए.एस. अफ़सर से सिफ़ारिश करवा ली थी। वह तो अस्पताल पहुंच कर पता लगा कि वहां का स्टाफ़ ऐसे गंभीर रूप से जले रोगियों की तीमारदारी में वैसे ही प्राण-प्रण से लग जाता है। बिना किसी सिफ़ारिश, बिना किसी रिश्वत। और दवा, बैंडेज वगै़रह सब कुछ फ्री! सफ़दरजंग अस्पताल की इस बर्न यूनिट में ऐसी चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था देख कर आनंद दंग था। व्यवस्था देख कर लगता ही नहीं था कि यह सरकारी अस्पताल है। मरीजों की ही नहीं, तीमारदारों के भी बैठने आदि की व्यवस्था पूरी चाक चौबंद। लड़की के पिता को लगा कि अब बेटी बच जाएगी। और वह निश्ंिचत हो गए। लेकिन आनंद उन की निश्ंिचतता देख कर परेशान हो गया। यह सोच कर कि जब इस अभागे बाप को अचानक बेटी के निधन की ख़बर मिलेगी तो बर्दाश्त कर भी पाएगा? क्यों कि लखनऊ में तो डाक्टरों ने उसे बता ही दिया था कि कोई चमत्कार ही लड़की को बचा सकता है। फिर भी वह वहां बर्न यूनिट के हेड से मिला और तफ़सील में बात की। बहुत स्पष्ट तो नहीं लेकिन दबे लहजे में ही उस ने बता दिया कि बहुत मुश्किल है। फिर भी उस ने चलते वक़्त दिलासा दिया। ‘आई विल ट्राई माइ बेस्ट! लेट्स होप!’ कह कर उस ने कंधे उचकाए और दोनों हाथ ऊपर की ओर उठा दिए।
डाक्टर के पास से आनंद जब लौटा तो उस ने देखा कि लड़की का पति पान मसाला चबाते हुए आराम से बैठा था। पर लड़की का पिता आकुल हो कर पूछ रहा था, ‘डाक्टर साहब ने क्या बताया? बेटी बच तो जाएगी न?’
‘उम्मीद तो दिलाई है।’ आनंद ने कह तो दिया पर साथ ही यह भी बता दिया कि, ‘देखिए हम लोग एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं। बाक़ी भगवान मालिक है!’
यह सुनते ही लड़की के पिता का चेहरा बुझ गया। साथ ही उस ने ग़ौर किया कि लड़की के पति के चेहरे पर शिकन भी नहीं आई। वह बदस्तूर पान मसाला चबाता रहा। आनंद को यह देख कर तकलीफ़़ भी हुई और ग़ुस्सा भी आया।
थोड़ी देर बाद लड़की का पुराना बैंडेज उतार कर नया बैंडेज करने का समय आ गया। बैंडेज के समय आनंद लड़की के पति को ले कर ड्रेसिंग रूम में गया। थोड़ी देर बाद बैंडेज बदल रही नर्स ने दोनों से जाने को कह दिया। दोनों जाने लगे तो लड़की ने अपने पति को पास बुला लिया। बड़े मनुहार से बोली, ‘आप मत जाइए! मेरे पास रहिए!’ इतना सब के बाद भी पति के प्रति उसका यह अगाध प्रेम और विश्वास आनंद को भीतर तक भिगो गया। वह भावुक हो गया। इसी बीच जब नर्स ने फिर ऐतराज़ किया तो लड़की बोली, ‘यह मेरे हसबैंड हैं। इन को तो रहने दीजिए मेरे पास।’ लाख तकलीफ़़ के बावजूद उस की आवाज़ में मिठास थी। सख़्त सी दिखने वाली नर्स भी उस की आवाज़ की इस मिठास में पग गई।
आनंद बाहर आ गया।
थोड़ी देर में लड़की के तेज़-तेज़ चीखने की आवाज़ आने लगी। वह समझ गया कि पुरानी बैंडेज उस की देह से उतारी जा रही है।
कुछ देर बाद वह ड्रेसिंग रूम से अपने बेड पर शि़ट कर दी गई। ड्रेसिंग के बाद वह फिर से पूरा हनुमान जी बन गई थी। सिर छोड़ कर पूरी देह पर बैंडेज! अब एक यातना और शुरू हो गई कि उस के पास कोई भी नहीं रह सकता था। तीमारदार बाहर से समय-समय पर उसे पारदर्शी शीशे से ही देख कर संतोष कर सकते थे। ऐसे ही समय-समय पर उसे दूध या पानी दे सकते थे। बस कोई एक। वह भी तब जब नर्स बाहर आ कर तीमारदार को सूचना दे।
अजीब यातना थी यह। कि तकलीफ़ में घिरा मरीज़ अकेले ही रहे। कोई उस के माथे पर हाथ भी नहीं रख सकता था। कोई दिलासा भी नहीं दे सकता था। देह तो जली थी ही, मन भी जलाना था। एक नहीं, सभी मरीज़ों की यही यातना थी। सब के तीमारदार बाहर बैठे रहते थे, अपने मरीज़ की पुकार के इंतज़ार में। नर्स आती और बताती कि फ़लां बेड नंबर का तीमारदार कौन है? और वह संबंधित बेड वाला तीमारदार उठता और दूध-पानी जो भी देना होता जा कर दे आता।
एक बार बहुत मनुहार के बाद लड़की की मां के साथ आनंद भी दो मिनट के लिए लड़की के पास गया। हाल-चाल पूछा तो वह बुदबुदाई, ‘पूरी देह में जलन है। लगता है बेड पर नहीं आग में लेटी हूं।’ ऐसे ही रात ट्रेन में वह कह रही थी कि, ‘ट्रेन में नहीं, आग में लेटी हूं।’ आनंद फिर तकलीफ़ से भर गया। फिर भी अपने भीतर का गुबार निकालते हुए पूछा कि, ‘सच-सच बताना बेटी तुम अचानक जल गई या तुम्हारी ससुराल के लोगों ने तुम्हें जला दिया?’
‘नहीं अंकल मैं अंगीठी से ही जल गई थी।’ कहते हुए उस का चेहरा तकलीफ़ से भर गया।
‘गैस नहीं है क्या तुम्हारे घर में?’
‘है पर ख़त्म हो गई थी।’
‘तुम्हें बचाने क्यों नहीं आया तुम्हारे घर का कोई?’
‘अब क्या बताएं?’ वह जैसे निराश हो गई।
‘चलो फिर भी थोड़ी हिम्मत रखो!’ कह कर वह मुड़ा तो देखा लड़की का पति उस के पीछे खड़ा था। पान मसाला चबाता हुआ।
वार्ड से बाहर आ कर लड़की के पिता से उस ने यह वाक़या बताया और अपना शक भी। कहा कि, ‘और यह जो जासूस की तरह जा कर मेरे पीछे खड़ा हो गया। इस से तो मेरा शक और गहरा होता है।’
‘देखिए आनंद बाबू जैसे भी हो आखि़र रहना उसे इसी पति और परिवार के साथ है।’
‘अरे, जब बचेगी तब तो रहेगी!’ आनंद भड़क कर बोला। फिर पछताया भी कि यह क्या बोल दिया।
‘क्या नहीं बचेगी?’ लाचार पिता का गला रुंध गया।
‘वह तो बाद की बात है।’ आनंद बोला, ‘अगर मैं आप की जगह होता तो पूरे परिवार के खि़लाफ़़ एफ़.आई.आर. लिखवा कर बंद करवा देता।’
‘अब कोई फ़ायदा भी नहीं है।’
‘क्यों?’
‘बेटी एस.डी.एम. को बयान दे चुकी है अपने ही को दोषी बताते हुए।’
‘कब?’
‘जलने के बाद जब घर से सदर अस्पताल ये लोग लाए थे। तब अस्पताल में ही एस.डी.एम. आ कर बयान ले गया।’
‘तो क्या हुआ? एफ़.आई.आर. फिर भी हो सकती है।’ वह बोला, ‘एस.डी.एम. को बयान दुबारा दिया जा सकता है।’
‘लेकिन रहना उस को उसी घर परिवार में है।’
आनंद लड़की के पिता की इस लाचारी पर चुप रह गया।
कुछ दूसरे तीमारदारों की सलाह पर थोड़ी दूर पर एक गेस्ट हाउस में एक कमरा ले कर रहने-सोने की व्यवस्था की गई। यहां दवाई आदि के ख़र्च से तो छुट्टी मिल गई थी। पांच-छः लोगों के रहने खाने का ख़र्च बढ़ गया था। निम्न मध्यवर्गीय परिवार के लिए यह भी एक समस्या थी। नहीं-नहीं में भी रोज़ का दो ढाई हज़ार का ख़र्च।
शाम होते-होते यहां भी एस.डी.एम. आया और लड़की ने वही रटा रटाया बयान दुहरा दिया जो शायद उस के ससुराल वालों ने पहले से रटा दिया था। सब की खुसुर-फुुसुर सुन कर एक तीमारदार ने लड़की के पिता को बेख़ौफ़ सलाह दे दी कि, ‘अगर लड़की को ससुरालियों ने जलाया है तो बिना मौक़ा चूके पुलिस में रिपोर्ट लिखवाओ और सब को बंद करा दो।’ सुन कर लड़की के पिता ने फिर पुरानी टेक ली कि, ‘आखि़र उसी परिवार में रहना है।’
‘कहीं नहीं रहना है।’ वह तीमारदार बेधड़क बोला, ‘इस अस्पताल से मुक़द्दर वाले ही बच कर जाते हैं। ज़्यादातर मर कर ही जाते हैं। और फिर तुम्हारी बेटी जिस तरह जली है, बहुत मुश्किल है।’
‘और जो बच ही गई तो?’
‘तब तो और बुरा होगा!’ तीमारदार बोला, ‘जल कर बचने के बाद हमारी सोसाइटी में मर्दों का ही गुज़ारा है, औरतों का नहीं।’ वह तीमारदार बोलता जा रहा था, ‘जो बच भी गई तो भी उस का हसबैंड उसे छोड़ देगा।’
‘क्यों?’
‘जली हुई औरत, वह भी इस क़दर जली औरत देखने के लायक़ नहीं रहेगी तो हसबैंड कितने दिन रखेगा?’ वह बोला, ‘जो बच गई तो और बुरा होगा। नरक हो जाएगी ज़िंदगी। भगवान उसे उठा ही ले तो अच्छा है।’
‘अच्छा अब आप यहां से जाइए!’ बहुत देर से चुप लड़की की मां उस तीमारदार पर बरस पड़ी। बोली, ‘हम लोग यहां बिटिया को जिलाने आए हैं, मारने नहीं।’ वह ज़रा देर चुप रही और बोली, ‘डाक्टर से हम भी बात किए हैं। वह बताए हैं कि बच जाएगी। और जब बच जाएगी तो बाद की तब देख लेंगे। नहीं होगा तो गहना-गुरिया बेच कर प्लास्टिक सर्जरी करवा देंगे। एतना हम भी जानते हैं।’
तीमारदार भुनभुनाता हुआ चला गया।
दूसरे दिन उस ने देखा कि लड़की के चेहरे पर संतोष और आराम की रेखा थी। वह ख़ुश हुआ। और लड़की के पिता से बोला, ‘अब तो यहां के इलाज से आप संतुष्ट हैं न?’
‘हां, बिलकुल।’
‘तो अब कोई दिक़्क़त है नहीं। कहिए तो मैं लखनऊ लौट जाऊं। अगर कोई बात होगी, कोई ज़रूरत होगी तो फिर आ जाऊंगा।’
‘पर आप के रहने की बात कुछ और है।’
‘वो तो है। पर मैं फ़ोन पर तो हूं ही हमेशा। जो बात कहनी-सुननी होगी, हो जाएगी।’ उस ने जोड़ा, ‘फिर यहां पेशेंट के साथ तो किसी को वैसे भी नहीं रहना है।’
‘चलिए आप जैसा चाहें।’
आनंद लखनऊ लौट आया था।

लखनऊ आ कर एक डाक्टर दोस्त से उस ने स्थितियां बताईं और कहा कि, ‘इंप्रूवमेंट तो है। लगता है लड़की बच जाएगी।’ डाक्टर आनंद की बात सुन कर मुसकुराया। बोला, ‘चलिए बच जाए तो अच्छी बात है। पर है बहुत मुश्किल।’
‘क्यों?’
‘देखिए तीन चार दिन में चीजें़ सामने नहीं आतीं। जब स्किन की पहली, दूसरी और तीसरी लेयर तक जल जाती है। ख़ास कर तब दिक़्क़त और बढ़ जाती है। पहली लेयर जलने के बाद दूसरी लेयर काम करने लगती है। दूसरी लेयर के बाद तीसरी लेयर काम करती है। फिर मांस आ जाता है। या इस के पहले ही सेप्टिक हो जाता है। फिर इस सेप्टिक का ज़हर पूरी देह में फैलने लगता है। तब डाक्टर और दवाई दोनों लाचार हो जाते हैं। कई बार इस पर भी डिपेंड करता है कि कितना एरिया जला है और कितना डीप। दोनों ही फै़क्टर काम करते हैं। अगर दस परसेंट कोई जला हो तो नब्बे परसेंट बचने की गुंजाइश होती है। और अगर नब्बे परसेंट जला है तो दस परसंेट बचने की गुंजाइश होती है। कभी-कभी चमत्कार भी होता है। पर अमूमन नहीं। नब्बे परसेंट जले लोगों की जीवित होने की सूचना लगभग नहीं आती। और कई बार दस परसेंट जले लोग भी मौत को गले लगा बैठते हैं। इट डिपेंड्स ऑन आल सिचुएशंस!’
सुन कर आनंद चुप्पी लगा गया।
तीन दिन बाद एक शाम उस लड़की के निधन की भी ख़बर आ गई। मां-बाप की यातना यह थी कि अस्पताल में होते हुए भी अंतिम समय बेटी के पास नहीं रह पाए। बेटी से कुछ कह-सुन नहीं पाए। अस्पताल की व्यवस्था ही ऐसी थी।
ख़ैर, पोस्टमार्टम के बाद दिल्ली मंे ही अंत्येष्टि कर सब लोग लौट आए। पति ने अग्नि दी। तेरही भी ससुरालीजनों ने की। पर लड़की के पिता तेरही में नहीं गए। अभी शोक ठंडा भी नहीं हुआ था कि लड़के की शादी की तैयारी की ख़बरें आ गईं। अब लड़की की मां का माथा ठनका। आनंद को फ़ोन कर कहा कि, ‘भइया अब से इन लोगों के खि़लाफ़़ पुलिस में रिपोर्ट नहीं हो सकती?’ वह बोली, ‘बताइए भइया साल भर तो यह लोग रुक ही सकते थे। पर दो महीने बाद ही शादी की तैयारी कर ली इन लोगों ने? हमारे दुख का भी ख़याल नहीं किया इन लोगों ने?’
‘रिपोर्ट करने में हर्ज नहीं है। पर सुबूत क्या है उन के खि़लाफ़़?’
‘दो तीन चिट्ठियां हैं।’ वह ज़रा रुकी और बोली, ‘फिर सास ने उस को आग लगाने के लिए उकसाया था।’
‘यह कैसे पता?’
‘बेटी ने अस्पताल में मेरी बहू को बताया था। और बहू ने मुझे।’
‘तो तभी क्यों नहीं बताया?’
‘मैं ने ही बहू का मुंह बंद कर दिया था। लोक लाज और फिर बेटी की जिं़दगी सोच कर। पर अब तो हद हो गई।’
‘उस के पापा क्या कह रहे हैं?’
‘वह तो कुछ बोल ही नहीं रहे।’
‘बात करवाइए!’
‘लीजिए।’ कह कर वह लड़की के पिता से बोली, ‘लीजिए आनंद भैया से बात करिए!’ फ़ोन पर आ कर वह बोले, ‘देखिए आनंद जी, अब जब हमारी बेटी ही नहीं रही तो उस की ससुराल भी नहीं रही। जैसे बेटी को संतोष कर लिया, वैसे ही इस को भी बर्दाश्त कर ले रहे हैं। वैसे भी कुछ होगा-वोगा नहीं। जाने दीजिए!’

पर यहां मुनव्वर भाई ने जाने नहीं दिया नर्सिंग होम वाले को। पांच लाख रुपए का मुआवज़ा ले कर ही छोड़ा। बेटी के पोस्टमार्टम के झमेले में फंसने के बाद लखनऊ में उन्हों ने आनंद से सही ही कहा था कि आज सिर्फ़ सद्दाम हुसैन को ही फांसी नहीं हुई है, मेरे उसूलों और आदर्शों को भी फांसी हुई है। लेकिन तब आनंद ने मुनव्वर भाई के इस कहे की तासीर को अब समझा था।
मुनव्वर भाई का यह बदलना, उन के उसूलों और आदर्शों को फांसी वगै़रह सिर्फ़ मुनव्वर भाई के स्तर पर ही नहीं हो रहा था। आनंद देख रहा था कि समूचा समाज ही आदर्शों-उसूलों को फांसी दे रहा था। पहले जो लोग गुंडों-माफ़ियाओं का विरोध भले नहीं करते थे पर उन के साथ रहने में गुरेज़ तो करते ही थे। एक विभाजन रेखा तो रखते ही थे। कम से कम उन के समर्थन में तो नहीं ही रहते थे। पर अब वही लोग जो गुंडों-माफ़ियाओं से दूरी रखने के बजाय उन के साथ अपना नाम बड़े फ़ख््रा़ के साथ जोड़ने लगे थे। उन के साथ सट कर छाती फुला कर फ़ोटो खिंचवाने लगे थे। चौतरफ़ा आलम यही था। रिश्वतख़ोरों को पहले लोग नफ़रत की नज़र से देखते थे। पर अब वही रिश्वतख़ोरी उन की योग्यता बन चली थी।
और योग्यता?
योग्यता अब सब से बड़ी अयोग्यता मान ली गई थी।
नब्बे के दशक में एक राष्ट्रीय पत्रिका के एक सर्वे की उसे याद आ गई। तब के दिनों नरसिंहा राव प्रधानमंत्री थे। चौदह भाषाओं के ज्ञाता इस प्रधानमंत्री के समय में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई। पर एक भी भाषा में यह प्रधानमंत्री इस को गिरने से रोकने का आदेश नहीं दे पाया। शिबू सोरेन जैसे संघर्षशील आदिवासी नेता को रिश्वत की हांडी में चढ़ा कर अल्पमत की सरकार को पांच साल पूरी कामयाबी से चला ले जाने और समूचे देश को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने वाले इस राजनेता का कोई कुछ तब बिगाड़ नहीं पाया था। हर्षद मेहता जैसे कांडों की झड़ी लगी थी। तभी के दिनों उस राष्ट्रीय पत्रिका ने एक सर्वे में देश की लड़कियों से सवाल पूछा था कि वह किस के साथ सोना पसंद करेंगी? हर्षद मेहता तब भी जेल में था। फिर भी लड़कियों की पहली पसंद में हर्षद मेहता था और दूसरी पसंद में सत्तर पार कर चुके तब के प्रधानमंत्री नरसिंहा राव थे। जैसा निर्लज्ज यह सवाल था, वैसी ही निर्लज्ज यह लड़कियां थीं।
और अब क्या समूचा समाज ही अब निर्लज्ज नहीं हो चला था?
तभी तो ग़रीबी, भुखमरी, बीमारी, अशिक्षा, मंहगाई और बेरोज़गारी से जूझते इस देश के राष्ट्रीय कहे जाने वाले अख़बार और पत्रिकाएं औरतों को कैसा मर्द पसंद है या कि मर्दों को कैसी औरतें पसंद हैं? या कि फिर औरतों का सब से पसंदीदा सेक्स आसन क्या है पर सर्वे रिपोर्ट छाप-छाप धन्य होती हैं।
धन्य है भारत देश!
दिल्ली समेत सारा देश आतंकवादी विस्फोटों में भुट्टे की तरह भुन रहा है और अपने राजनीतिज्ञ हैं कि तराज़्ाू बाट लिए मुस्लिम वोट के हिसाब किताब में अफनाए हुए हैं। देश बिखरता है तो बिखरे! कल टूटता हो तो आज टूट जाए पर मुस्लिम वोटों का मेढक दूसरे की तराज़्ाू में नहीं जाना चाहिए। सामाजिक समरसता के नाम पर देश में गृहयुद्ध के बादल गरजें तो उन की बला से। पिछड़ा, अति पिछड़ा, यह दलित और वह दलित, यह ब्राह्मण तो वह कायस्थ, वह ठाकुर तो यह बनिया! जाति तोड़ो के अलंबरदार लोहिया के अनुयायी भी जब इस जातिवादी सांप-नेवले की लड़ाई का पसावन पीते पसीना-पसीना दिखते हैं तो आनंद का धैर्य जवाब दे जाता है।
तो क्या इन्हीं कारकों के हावी हो जाने से ही उस ने राजनीति से तौबा कर ली? क्या इन कारकों से उसे लड़ना नहीं चाहिए था? वह पूछता है अपने आप से ही। पूछता यह भी है कि क्या इस गंधाती जातिवादी राजनीति से लड़ने के औज़ार थे उस के पास?
एक गांधी थे, उन की अहिंसा, उन का सत्य और उन की पारदर्शिता थी। उन का सत्याग्रह और आदर्श थे। और महत्वपूर्ण यह कि साध्य को पाने के लिए साधन भी पवित्र होने चाहिए। इन्हीं सब बातों को ले कर आनंद और उस के जैसे मुट्ठी भर लोग गांधी की प्रासंगिकता के झंडे गाड़ते फिरते। पर समाज में तो गांधी की प्रासंगिकता धूल धूसरित थी। पहले वह जब-तब सुनता ही रहता था कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। और अब लगे रहो मुन्ना भाई जैसी फ़िल्मों से गांधी की प्रासंगिकता का स्वेटर ख़ुद कांग्रेसी बुन रहे थे। इतना लाचार गांधी को उस ने कभी नहीं पाया था। फ़िल्म ने एक नई शब्दावली गढ़ी थी-गांधीगिरी! जैसे गांधीगिरी न हो उठाईगिरी हो गई हो! दादागिरी, हो गई हो! गांधी का इस से बड़ा अपमान और क्या हो सकता था कि फ़िल्म में एक गुंडा पूरी गुंडई से गांधीगिरी झाड़ रहा था। जो कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी बढ़ा देने की मिसाल देते हुए दूसरे गाल पर भी थप्पड़ लगने पर वह अगले की ठुंकाई यह कह कर कर रहा था कि दूसरे गाल पर थप्पड़ मारने के बाद क्या करना है बापू ने अपुन को यह नहीं बताया! और गांधी के बारे में थोड़ा बहुत जानने वालों की हेठी तो देखिए कि रेडियो पर गांधी पर पूछे गए सवालों का जवाब बताने वाले प्रोफे़सर, प्रेशर कुकर और अन्य चीज़ें पाने के लिए कुत्तागिरी को भी शर्मशार करते दिखते हैं। और फ़िल्म का प्रभाव देखिए कि जगह-जगह शराबी, मवाली, गुंडे, शरीफ़ जिसे देखिए हाथ में फूल ले कर गांधीगिरी झाड़ रहे हैं। तिस पर तुर्रा यह कि खबरिया चैनल उसे दिन-रात दिखा-दिखा अघा रहे हैं।
इस गांधीगिरी से गांधी कितने दलदल में और धंस गए इस का हिसाब-किताब करने की किसी समाजशास्त्री को भी सुधि है भला? क्या समाजशास्त्री, क्या इतिहासकार, क्या लेखक और क्या कवि सभी गांधीगिरी के इस बाज़ार पर इस क़दर मुग्ध हैं कि बाज़ार उन्हें लील जाने पर आमादा हैं, इस की आहट को भी नज़र अंदाज़ कर यह सब के सब बाज़ार की प्रशस्तिगाथा का शिलालेख तैयार करने में युद्धरत हैं। युद्धरत हैं यह सभी स्वामी रामदेवों की योग पताका के बाज़ार का मीनू रचने, पढ़ने, बेचने और छलने की प्रवीणता हासिल करने में। आशाराम बापू जा रहे हैं, स्वामी रामदेव आ रहे हैं। एक बाज़ार जा रहा है, दूसरा बाज़ार आ रहा है। यह क्या है? कि योग, आध्यात्म, गांधी सभी बिकाऊ हो गए हैं!
बाज़ार इतना बड़ा और आदमी इतना छोटा? इतना बौना? बाज़ार से आदमी है कि आदमी से बाज़ार? यह सवाल उतना ही अनबूझ होता जा रहा है जितना कभी विद्यार्थी जीवन में एक सवाल होता था कि नारी बीच सारी है कि सारी बीच नारी है!

एक लोहिया थे। जाति तोड़ो, दाम बांधो का पहाड़ा पढ़ाते थे। उन के अनुयायी समाजवादियों ने इस पहाड़े को जातिवाद के पहाड़ से ढंक दिया, साथ ही पूंजीपतियों की दलाली शुरू कर दी। दाम आसमान छूने लगे तो उन की बला से! जैसे सच्चे गांधीवादी हाशिए से भी बाहर होते-होते जाने किस दड़बे में बिला गए, वैसे ही सच्चे लोहियावादी भी ‘जाने कहां गए वो दिन’ कहते जाने कहां सिधार गए।

एक थे विनोबा भावे। इमरजेंसी के पोषक संत बन कर वह ख़ुद ही सो गए!

एक थे जे.पी.! लोक नायक जयप्रकाश नारायण। जैसे वह जीवन भर सत्ता से दूर रहे वैसे ही उन के अनुयायी सत्ता की छाल देह पर लपेटे बिना सांस नहीं ले पाते। दूसरी आज़ादी की रणभेरी बजाने वाले जे.पी. के ये अनुयायी जे.पी. आंदोलन का बाजा बजाते हुए भ्रष्टाचार की बजबजाती गंगा में आकंठ तर होने के लिए ही जैसे अवतार लिए हों सब के सब!
आनंद ख़ुद भी जे.पी. आंदोलन का सिपाही रहा है। यह सारी चिंताएं जब वह एक रोज़ अपने एक पुराने समाजवादी साथी से शेयर करने लगा जो ख़ुद भी राजसुख भोगते हुए मंत्री पद छकने में विभोर था तो वह उकता गया। दोनों के हाथ में शराब थी। और शराब के बहाने दोनों बहुत समय बाद अपनी दोस्ती का रिन्यूवल कर रहे थे। अचानक वह कहने लगा, ‘आनंद एक तो तुम ने राजनीति अचानक छोड़ कर ग़लती की। तुम्हें थोड़ा सर्वाइव करना चाहिए था। जो तुम कर नहीं पाए। यह तुम्हारी पहली ग़लती थी। दूसरी ग़लती तुमने कारपोरेट सेक्टर की नौकरी कर के की।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘अब देख रहा हूं कि तुम्हारी सोच भी अब कारपोरेट हो गई है। सोचो कि तुम्हारी यह सोच कहीं न कहीं देश की उस महान जनता का अपमान नहीं करती? वह महान जनता जो जनादेश दे कर हमारे जैसे लोगांे को विधानसभा या लोकसभा में भेजती है। कैसे मान लूं कि तुम्हारी सोच सही है और देश की समूची जनता ग़लत! जानते हो यह सब तुम नहीं, तुम्हारी पराजित मानसिकता, तुम्हारा फ्रस्ट्रेशन, तुम्हारी दोहरी मानसिकता बोल रही है। तुम्हारी ही भाषा में कहूं कि तुम उलटी कर रहे हो! हमारी सफलता तुम्हें हज़म नहीं हो रही, पच नहीं रही!’
‘तुम बोल चुके?’
‘हां!’
‘अब मैं बोलूं?’ शराब का गिलास मेज़ पर रखते हुए आनंद बोला।
‘बिलकुल!’
‘देखो राजनीति छोड़ कर मैं ने ग़लती की। अपनी उस नपुंसकता पर पछतावा है मुझे। पर क्या करूं? जिन औज़ारों को ले कर, जिन उद्देश्यों को ले कर राजनीति के सपने हमने बुने थे वह औज़ार भोंथरे हो चले थे, उद्देश्य गुम हो गए दिखते थे। ग़लती हुई कि उन औज़ारों में हम चमक नहीं ला पाए। विचारों के दीए में उतना तेल नहीं डाल पाए कि रोशनी हो और गुम हुए उद्देश्य हासिल कर लें। हथियार डाल दिए हम ने। ग़लती यह भी हुई कि सुविधाओं के जाल में फंस कर कारपोरेट सेक्टर की नौकरी की। यह भी मानता हूं। राजनीति नहीं, न सही, गांव में खेती बारी कर जीवन तो चल ही सकता था! और हो सकता था कि राजनीति के अपने औज़ारों को साफ़ सुथरा कर फिर से राजनीति में आते। पर डियर यह बताओ कि मैं तो कारपोरेट सेक्टर की नौकरी कर रहा हूं। पर तुम भी क्या कारपोरेट सेक्टर की नौकरी नहीं कर रहे?
‘क्या बात कर रहे हो?’ वह किंचित गुस्से में पर मुसकुरा कर बोला।
‘नहीं नाराज़ होने की बात नहीं है और तुम इसे व्यक्तिगत भी मत लो!’
‘चलो!’ कहते हुए उस ने कंधे उचकाए और शराब की एक घूंट भरी।
‘सच बताओ कि इस समय तुम जिस पार्टी में हो वह क्या अब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में तब्दील नहीं है? और देश की ऐसी कौन सी पार्टी है जो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में तब्दील नहीं है? और जो कोई एक भी ऐसी पार्टी हो जो कारपोरेट सेक्टर की दलाली नहीं खाती हो तो उस का नाम ज़रा हमें भी बता दो। सच मानो बड़ा सुख मिलेगा और अपना सारा गिला शिकवा दूर हो जाएगा। देश की महान जनता का जनादेश पा कर आए तुम या तुम्हारे जैसे लोगों को सैल्यूट मारूंगा डियर! प्लीज़ बता दो!’ उस ने जैसे जोड़ा, ‘और हां ऐसी भी किसी एक पार्टी का नाम बता दो जिस में विचारधारा चलती हो और जातिवाद, सांप्रदायिकता नहीं। देश की महान जनता का महान जनादेश पा कर आए लोगों में कोई गुंडा, माफ़िया या हिस्ट्री शीटर न हो! नौकरी-चाकरी छोड़-छाड़ कर उस पार्टी को ज्वाइन कर लूंगा। भले ही फिर से वहां जा कर दरी ही बिछाने का काम करना पडे़।’
‘तुम राजनीतिक पार्टी की बात कर रहे हो या कि किसी रामलीला मंडली की? अब तो रामलीला मंडली भी शायद ही कहीं इतनी साफ़ सुथरी मिले!’
‘तो?’
‘तुम एक काम क्यों नहीं करते?’
‘क्या?’
‘मज़ाक मत समझना और बुरा भी मत मानना!’ वह बोला, ‘मित्रवत सलाह दे रहा हूं।’
‘क्या?’
‘तुम किसी साइकेट्रिक से क्यों नहीं मिल लेते?’
‘तुम्हें लंबी काउंसिलिंग की ज़रूरत है। और शायद दवा की भी!’
‘क्या बेवक़ूफ़ी की बात कर रहे हो?’ आनंद बोला, ‘मैं तुम्हें पागल दिखता हूं?’
‘दिखते नहीं हो पर जिस तरह की बातें तुम कर रहे हो, उस से मुझे डर लग रहा है।’
‘कि मैं पागल हो जाऊंगा।’
‘हां। कुछ समय पहले एक फ़िल्म देखी थी प्रहार। उस में नाना पाटेकर भी सेना का मेजर है। तुम्हारी तरह ऊट पटांग, बिना सिर पांव के बोलता है, गुंडों से मार पीट करता है। और अंततः कोर्ट उसे पागलख़ाने भेज देती है।’ वह बोला, ‘ऐसे ही वह एक फ़िल्म प्रतिघात में भी पागल हो जाता है। दो तीन और फ़िल्मों में भी मैं ने उस को पागलों की तरह ही बड़बड़ाते देखा है। व्यवस्था से बउराया हुआ, घबराया हुआ। जैसे कि तुम!’
‘बड़ी फ़िल्में देख रहे हो आजकल? इतना टाइम मिल जाता है?’
‘टाइम कहां मिलता है? निकालना पड़ता है। फिर मैं तो नाना पाटेकर का फ़ैन हूं।’
‘अच्छा!’
‘तो?’ वह लंबा घूंट मारते हुए बोला।
‘नाना पाटेकर के डायलाग्स अच्छे लगते हैं सो उस के फ़ैन हो और मेरी बातें इतनी बुरी लग रही हैं कि मुझे पागलख़ाने भेज रहे हो?’ आनंद बोला, ‘जानते हो क्यों?’
‘क्यों?’
‘वह तुम्हारे जज़्बात को सहलाता है अपने संवादों से तो अच्छा लगता है। और मैं तुम्हारी रीढ़ पर सीधे मार रहा हूं सो तुम्हें पागल दिखता हूं। नाना पाटेकर के संवाद तुम्हारा मनोरंजन करते हैं। मेरी बातें तुम्हारा ख़ून खौला रही हैं सो तुम्हें या तुम्हारे सिस्टम के लिए ख़तरा दिखती हैं सो पागल का लिबास पहना कर रुख़सत करना ज़रूरी लगता है। है न?’
‘क्या बात कर रहे हो?’ वह बोला, ‘तुम्हारा पुराना मित्र हूं। सो कह दिया। रही बात तुम से या तुम्हारी बातों से ख़तरे की तो तुम्हें चाहे जितना गुमान हो अपनी बातों पर। पर मैं यह तो जानता ही हूं कि कारपोरेट सेक्टर में काम करने वाले लोग इस कद़र बधिया बना दिए जाते हैं कि वह किसी के लिए सुविधा भले बन जाएं, असुविधा तो हरगिज़ नहीं बन सकते। और ख़तरा तो क़तई नहीं, सपने में भी नहीं।’
‘ऐसा!’ आनंद बोला, ‘बड़े मुग़ालते पाल रखे हैं!’
‘मुग़ालता नहीं, सच है यह।’ वह बोला, ‘वी.पी. सिंह जो बोफ़ोर्स के घोड़े पर सवार हो कर बड़ी तेज़ी से धराशायी हो गए जानते हो कैसे?’
‘कैसे?’
‘यह कारपोरेट लॉबी के लोग। अरुण नेहरू जैसे लोग उन्हें धूल में मिला दिए। पहले राजीव को खाया, फिर वी.पी. को। राजीव गांधी हों या वी.पी. सिंह सब को पेंट बना कर देश की दीवार पर पोत दिया अरुण नेहरू, अरुण सिंह सरीखों ने!’ वह बोला, ‘नतीजा देखो कि कांग्रेस के पास अब एक सर्वमान्य और जनाधार वाला नेता नहीं है। बिना जनादेश के एक आदमी प्रधानमंत्री पद पर पांच साल न सिर्फ़ गुज़ार लेता है, आगे भी प्रधानमंत्री बने रहने के सपने जोड़ता है। विचार के नाम पर उस के पास आर्थिक उदारीकरण की एक कुदाल है जिस से देश की नींव खोद कर वह समूची अर्थव्यवस्था को अमरीका के पास गिरवी रख देना चाहता है।’
‘चलो तुम्हारे तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद, एक पाखंडी समाजवादी के नेतृत्व में काम करने के बावजूद समाजवादी आग का झुनझुना तुम्हारे सीने में अभी भी बजता है तो अच्छा है। हालां कि यह आग सुलगती तो अच्छा था। पर ध्यान रखना यह और ऐसी कोई बात कहने के जुर्म में कोई तुम्हें किसी साइकेट्रिक के पास जाने की सलाह दे दे तो साइकेट्रिक के पास चले मत जाना!’
‘साले तुम सुधरोगे नहीं, हमारा रसगुल्ला हमीं को घुमा कर मार रहे हो?’ वह बोला, ‘लेकिन फिर भी तुम ज़रूर जाना। शायद तुम्हारे फ्रस्ट्रेशन, तुम्हारे तनाव, तुम्हारे मोहभंग को विश्राम मिले। मेरा क्या है! सरकारी सुविधाओं और सफलता के नशे में यह आग डायलूट होती रहती है, होम होती रहती है। सो मुझे ज़रूरत नहीं पड़ेगी।’
‘वैसे भी तुम तो मूल्यों और नैतिकता की राजनीति को पहले ही तिलांजलि दे चुके हो सो तुम्हें ज़रूरत पड़ेगी भी क्यों? ख़ैर, और बताओ घर परिवार कैसे चल रहा है?’
‘सरकार से, राजनीति से फुर्सत मिले तब तो परिवार सोचूं?’ वह पूरी रौ में बोला, ‘परिवार को दिल्ली शि़ट कर दिया है। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में यहां लखनऊ में डिस्टरबेंस बहुत था। दूसरे, बच्चों को सत्ता और राजनीति के नशे से भी दूर रखना था। सो दिल्ली भेज दिया।’
‘चलो तुमने सत्ता, राजनीति और परिवार के बीच सेतु बना लिया है, अच्छा है।’ कह कर आनंद ने उस से छुट्टी ली और घर चला आया।
तो क्या राजनीति और परिवार एक साथ नहीं चल सकते?
उस ने सोचा। यह भी सोचा कि आखि़र उस ने भी परिवार के लिए ही तो राजनीति नहीं छोड़ी? पत्नी से यही ज़िक्र किया और बताया कि बताओ उस ने राजनीति के लिए परिवार दिल्ली शि़ट कर दिया!
‘आप ने ज़्यादा पी ली है, सो जाइए!’ पत्नी ने कहा।
हद है! तो क्या वह जैसे राजनीति के लिए उपयोगी नहीं रह गया वैसे ही परिवार के लिए भी अनुपयोगी होता जा रहा है?
दोस्त कहता है साइकेट्रिक को दिखाओ और पत्नी कहती है ज़्यादा पी ली है सो जाइए! इतनी निस्संगता? गांधी, लोहिया, जे.पी. जैसे उस के राजनीति के विचार और औज़ार इतने बेमानी हो गए? वह ख़ुद भी तो बेमानी नहीं हो गया? परिवार में भी? उस ने राजनीति छोड़ दी, क्या घर भी छोड़ दे?
उ़फ़!

तो क्या वह बुद्ध बन जाए? बुद्ध की शरण में चला जाए? बुद्धं शरणम् गच्छामि, धम्मं शरणम गच्छामि! वह सोचता है। सोचता है कि पत्नी उस से ऊब रही है कि वह पत्नी से ऊब रहा है? राजनीति से वह ऊब रहा है या राजनीति उस से ऊब रही है? बहुत ऊब कर जब उस ने राजनीति छोड़ी थी, तब ऐलान कर बाक़ायदा सब को बता कर छोड़ी थी। कि अब बस! मेरे वश की राजनीति नहीं रही या कि शायद अब की राजनीति के लायक़ नहीं रहा वह अब! तो क्या पत्नी को भी अब वह बता दे कि अब घर के भी लायक़ नहीं रहा वह। या यह घर अब उस के लायक़ नहीं रहा। बिन बताए घर छोड़ दे। जैसे सिद्धार्थ सोती पत्नी को छोड़ घर से निकल गया। बन गया बुद्ध! गौतम बुद्ध!
उसे मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा की वह पंक्तियां याद आ गईं, ‘सखि वे मुझ से कह कर जाते/तो क्या वह मुझ को अपनी पग बाधा ही पाते?/मुझ को बहुत उन्हों ने माना/फिर भी क्या पूरा पहचाना?/मैं ने मुख्य उसी को जाना/जो वे मन में लाते।’ उस ने सोचा। सोचा कि पत्नी तो कभी उस के पथ की बाधा बनी नहीं।
फिर काहे को घर छोड़ना?
उस ने सोचा। सोचा कि आखि़र पत्नी के साथ कैसा अहंकार? फिर वह पिए हुए तो है ही। क्या ग़लत कह दिया उस ने? फिर सोचा कि कहीं अहंकार में ही तो उस ने राजनीति से कुट्टी नहीं की थी? दुनिया की अधिकतम समस्याएं अहंकार की ही तो उपज हैं। सोचते-सोचते वह सो गया।
सुबह उठने की जल्दी नहीं थी। पत्नी ने दो बार जगाया और पूछा कि, ‘आफ़िस नहीं जाना है क्या?’
‘जाना तो है पर आफ़िस नहीं एक सेमिनार में जाना है।’ सोए-सोए वह बुदबुदाया।
‘तो पहले ही बताया होता।’ पत्नी बोली, ‘तो खाना भी खाएंगे कि नहीं?’
‘नाश्ता कर लेंगे!’ वह बोला, ‘आधे घंटे बाद जगा देना। और हां, गीज़र चला देना।’

सेमिनार में वह भी वक्ता है। पर जावेद अख़्तर ख़ास वक्ता हैं। मुंबई से फ़िल्मी ग्लैमर ओढ़े हुए आए हैं सो थोड़ी भीड़-भाड़ ज़्यादा है। तक़रीर भी उन की अच्छी होती है। बोलने का लहज़ा इतना उम्दा होता है कि बस पूछिए मत। बिलकुल लज़ीज़ खाने का मज़ा देते हैं। उन की बातों की चाशनी और लहजे की आंच में बड़े-बड़े क़ुर्बान हो जाते हैं। हालां कि सेमिनार का मसला आतंकवाद है पर वह बोल बाबरी मस्जिद पर रहे हैं। हिंदू-मुस्लिम दोनों कठमुल्लों को लताड़ रहे हैं। जाने क्या है कि देश के लगभग सभी मुसलमान बाबरी मस्जिद के घाव को लगातार हरा कर सहलाते ही रहते हैं। देश के और मसले उन्हें विचलित नहीं करते। वह बाबरी मस्जिद के विलाप से मुक्ति नहीं पाते। वह चाहे लाख प्रोग्रेसिव हों या धुर कठमुल्ले। जावेद अख़्तर के बीच बोलने में एक औरत उठ खड़ी होती है और बड़े सलीक़े से कहती है कि, ‘बाबरी मस्जिद की शहादत हमें भी झकझोरती है पर कश्मीर से हिंदुओं का पलायन, कारगिल, लालक़िला, लोकसभा और दिल्ली-मुंबई पर हमले सहित देश में अन्य आतंकवादी हमले भी हमें झकझोरते हैं, हिला कर रख देते हैं, इस पर भी तो बोलिए!’
‘जी बिलकुल! और इस फ़ेहरिस्त में गुजरात दंगे को भी जोड़ लेते हैं।’ जावेद बोले, ‘हम इस सब की मज़म्मत करते हैं।’
‘जी गोधरा को भी जोड़ लीजिए और इन सब की तफ़सील में भी जाइए। सिर्फ़ मज़म्मत से काम मत चलाइए। क्यों कि यह मज़म्मत तो ठीक वैसे ही है जैसे रंज लीडर को है बहुत मगर आराम के साथ!’
‘बिलकुल दुरुस्त फ़रमाती हैं आप।’ और फिर कलफ़ लगी उर्दू में वह शुरू हो गए।
खाने के समय वह फिर लोगों से घिर गए। आनंद ने उन से कहा कि, ‘अब आप को भी पालिटिक्स ज्वाइन कर लेनी चाहिए!’
‘नहीं साहब माफ़ कीजिए। सियासत से दूरी ही अच्छी!’ वह बोले, ‘हमें हमारा काम ही अच्छा लगता है।’
‘कर तो ख़ैर आप वैसे भी सियासत ही रहे हैं। बस फ़र्क है कि बुर्क़ा ओढ़ कर कर रहे हैं। एक पर्देदारी है बस!’
‘नहीं जनाब। ऐसा नहीं है।’
‘अच्छा छोड़िए। इन दिनों आप बहुत अच्छी तक़रीरें तो दे ही रहे हैं गीत भी बहुत अच्छे लिख रहे हैं।’
‘ज़र्रानवाज़ी का शुक्रिया!’
‘और जो आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं आप से?’
‘शौक़ से!’
‘आप को अपने पुराने काम को ले कर कभी पछतावा नहीं होता?’
‘अब आप ज़ाती हो रहे हैं।’
‘नहीं-नहीं मैं हनी इरानी की बात नहीं कर रहा हूं!’
‘तो?’
‘मैं तो आप के फ़िल्मी काम की बात कर रहा हूं।’
‘ओह क्या ऐसा कर दिया?’
‘अरे, आप को इस का एहसास भी नहीं है?’
‘आप बताएं तो सही!’ जावेद खीझ पड़े।
‘ये जंज़ीर, दीवार और शोले जैसी एंग्री यंग मैन वाली फ़िल्में लिख कर आप को कभी अफ़सोस नहीं हुआ?’ आनंद बोला, ‘आप को नहीं लगता कि ऐसी फ़िल्में लिख कर एक पूरी की पूरी पीढ़ी बर्बाद कर दी आप ने। हिंसा हमारे समाज का ख़ास हिस्सा बन गई। माफ़ियागिरी, स्मगलिंग, गुंडई दाल में नमक की तरह ही नहीं मिली बल्कि अब तो नमक में दाल की तरह मिल कर जस्टीफ़ाई होने लगी! यह सोच कर आप को कभी मुश्किल नहीं होती। आज की आप की तक़रीरें चूहे खा कर हज जाने जैसी नहीं लगतीं? कि फ़िल्मों में ही नहीं समाज में भी विलेन और हीरो का फ़र्क़ ख़त्म कर दिया!’
‘आप को लगता है कि फ़िल्में ऐसा कर सकती हैं?’ जावेद बगलें झांकते हुए बोले।
‘कर सकती हैं? आनंद बोला, ‘अरे कर चुकी हैं एक नपुंसक, हिंसक और लालची समाज रच चुकी हैं। आप की तब की लिखी फ़िल्मों ने इस का बीज बोया था, आज की फ़िल्में उस की फ़सल काट रही हैं। न कोई कहानी, न कोई कंटेंट, न मेसेज! सिरे से चार सौ बीसी सिखाती-पढ़ाती ये मीनिंगलेस फ़िल्में कौन सा समाज गढ़ रही हैं, भगवान ही मालिक है।’
‘भई आप तो बहुत परेशान लगते हैं!’ जावेद बगलें झांकते हुए बोले।
‘क्या करें जावेद जी विदेशी फ़िल्मों की नक़ल लिख कर, समाज में हिंसा परोस कर आप और अमिताभ बच्चन जैसों ने नाम, पैसा और शोहरत भले कमा लिए हों पर यह समाज जावेद अख़्तरों और अमिताभ बच्चनों को कभी माफ़ नहीं करेगा!’
‘चलिए, आप तो अभी हमें माफ़ कर दीजिए!’ कह कर जावेद खाना बिना ठीक से खाए ही निकल गए।
आयोजकों में से एक व्यक्ति आनंद के पास आया और शिकायत भरे अंदाज़ में बोला, ‘आप ने उन के खाने का ज़ायका ही बिगाड़ दिया। कम से कम ठीक से खाना तो खा लेने दिया होता।’
‘नहीं भाई साहब, ये बात तो ठीक ही कर रहे थे।’ एक व्यक्ति आइसक्रीम खाते हुए बोला, ‘राजेश खन्ना तक तो ठीक था। प्यार-मोहब्बत की बातें चल रही थीं। ई अमितभवा ने आ कर बदला लेना, बाप का बदला लेना शुरू कर दिया। और हर जगह मार पीट, ख़ून ख़राबा! माहौल बिगाड़ दिया फ़िल्मों का।’
माहौल यहां का भी बिगड़ गया था। सो लोग जाने लगे।
आनंद ने आफ़िस से आज छुट्टी ले रखी थी। सो सोचा कि अब वह कहां जाए?
पहुंचा काफ़ी हाउस।

....जारी....

लेखक दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424, This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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