इस मिनिस्टर को एक करोड़ रुपए का भाव किसने बताया?

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दयानंद पांडेय: उपन्यास-  ''वे जो हारे हुए'' : भाग (4) : हम तो समझे थे कि राजनीति में ही पलीता लगा है, पर पत्रकारिता वाले तो राजनीति से भी कहीं आगे निकल रहे हैं : हालांकि काफ़ी हाउस की न वो गंध रही, न वो चरित्र, न वो रंगत। फिर भी कुछ ठलुवे, कुछ थके नेता, बुझे हुए लेखक और कुछ सनकी पत्रकारों के अलावा कुछ एक दूसरे का इंतज़ार करते लोग अब भी ऊंघते-बतियाते, दाढ़ी नोचते दिख जाते हैं। कुछेक जोड़े भी। काफ़ी का स्वाद पहले भी तीखा था, अब भी है।

हां, सिगरेट के धुएं ज़रा बढ़ गए हैं। फिर भी काफ़ी की गंध और सिगरेट के धुएं की मिली जुली महक नथुनों में अभी भी बेफ़िक्री और बेलौसपना का स्वाद बिंदास अंदाज़ में सांस में भर जाती है। इतना कि रात शराब पर उसे मिनिस्टर मित्र द्वारा साइकेट्रिक के यहां जाने की मिली सलाह, तिस पर पत्नी का तुर्रा कि ‘आप ने ज़्यादा पी ली है सो जाइए!’ और फिर अभी भरी दोपहर में जावेद अख़्तर का कहा कि, ‘भई आप तो बहुत परेशान लगते हैं।’ या फिर उकता कर यह बोलना कि, ‘चलिए आप तो अभी हमें माफ़ कर दीजिए!’ जैसी बातें उस की नसें तड़का रही थीं। वह सोच रहा था कि कभी सब का प्रिय रहने वाला वह अब सब का अप्रिय कैसे होता जा रहा है। कहां तो वह सब को सलाह दिया करता था, अब लोग उसे सलाह देने लगे हैं। इतनी कि लोगों की सलाह उसे चुभने लगी है? या कि वह ही, उस की बातें ही लोगों को चुभने लगी हैं? सीने में उस के जलन बढ़ती जा रही है। और यह चुभन उसे मथती जा रही है। जावेद का ही लिखा राधा कैसे न जले! गाना उसे याद आ जाता है। तो क्या वह राधा है?

वह सिगरेट सुलगा लेता है।

काफ़ी हाउस में कश लेते-धुआं फेंकते वह एक नज़र पूरे हाल में दौड़ाता है। भीतर कोई परिचित नहीं दिखता। बाहर सड़क पर ट्रैफ़िक का शोर है। मन में उठ रहा शोर ज़्यादा है या ट्रैफ़िक का शोर ज़्यादा है? तय करने के लिए वह काफ़ी हाउस के हाल से निकल कर बरामदे में आ जाता है। नहीं तय कर पाता।

वह घर आ जाता है।
आ कर सो जाता है।

एक फ़ोन से उस की नींद टूटी। एक इंजीनियर मित्र का फ़ोन था। सिंचाई विभाग में थे। विभागीय मंत्री से परेशान थे। चीफ़ इंजीनियर बनने की ख़्वाहिश थी। चाहते थे कि आनंद सिफ़ारिश कर दे। कहीं से परिचय सूंघ लिए थे और कह रहे थे कि, ‘मंत्री जी आप के पुराने दोस्त हैं। कह देंगे तो काम बन जाएगा।’ आनंद ने साफ़ बता दिया कि, ‘इस तरह के ट्रांसफर-पोस्टिंग जैसे कामों में उस की न तो कोई दिलचस्पी रहती है, न ही वह कोई सिफ़ारिश कर पाएगा। हां, कहीं किसी के साथ कोई नाइंसाफ़ी हो तो वह मसले को अपने ढंग से उठा ज़रूर सकता है। फिर भी समस्या का समाधान हो ही जाए, कोई गारंटी नहीं है।’
‘तो नाइंसाफ़ी ही तो हो रही है।’
‘क्या?’
‘मंत्री जी का भाव बहुत बढ़ गया है।’
‘मतलब?’
‘जिस काम के वह पहले पचीस-तीस लाख लेते थे, अब एक करोड़ रुपए मांग रहे हैं।’
‘तो आप देते ही क्यों हैं?’
‘अच्छा चलिए हम लोग कहीं बैठ कर बातचीत करें?’
‘हम लोग मतलब कुछ और लोग भी?’ आनंद ने पूछा।
‘हां।’
‘किस लिए?’
‘बातचीत करेंगे और कोई रास्ता निकालेंगे?’
‘चलिए ठीक है।’ आनंद बोला, ‘पर बैठेंगे कहां?’
‘जिमख़ाना क्लब में बैठें?’
‘ठीक है।’ इंजीनियर मित्र बोला, ‘शाम साढ़े सात बजे आज मिलते हैं।’
‘ठीक है।’
शाम को जब जिमख़ाना क्लब में बैठकी हुई तो आठ-दस इंजीनियर लोग हो गए। इधर-उधर की बात के बाद में जब दो-दो पेग हो गया तो इंजीनियर लोग बोलना शुरू हुए। एक इंजीनियर बहुत तकलीफ़ में थे, ‘बताइए इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन हमने किया, इतने साल नौकरी करते हो गए और एक मंत्री हम इंजीनियरों को बिठा कर कहता था कि तुम लोग क्या जानते हो सिंचाई के बारे में? सिंचाई विभाग के बारे में? कहता था कि तुम लोग साल-डेढ़ साल-दो साल के लिए चीफ़ इंजीनियर बनते हो। क्या जानोगे? मैं जानता हूं सिंचाई विभाग को। इतने सालों से विभाग का मंत्री हूं। सरकार किसी की आए-जाए-रहे। इस विभाग का मंत्री तो मैं ही हूं। रहूंगा। बताइए मिनिस्ट्री जैसे रजिस्ट्री करवा ली थी।’
‘हां भई, आखि़र मिली-जुली सरकारों का दौर था तब!’ एक इंजीनियर बोला, ‘बारगेनिंग पावर थी उस में। ’
‘पर अब तो बहुमत की सरकार है।’ एक दूसरा इंजीनियर बोला।
‘बहुमत की सरकार तो अब और ख़तरनाक हो गई है।’ यह तीसरा इंजीनियर था, ‘जो चाहती है, मनमाना करती है। कोई रोकने-छेंकने वाला नहीं।’
‘क्यों आनंद भइया आप की क्या राय है?’ वह इंजीनियर पूछ बैठा।
‘अव्वल तो यह कि बिना बहुमत के कोई सरकार नहीं बनती। पर यहां मैं समझ रहा हूं कि आप लोग एक दल के बहुमत की सरकार की बात कर रहे हैं। तो ऐसी बहुमत की सरकारें प्रशासनिक तौर पर क्या गड़बड़ करती हैं इस पर तो बहुत तफ़सील में मैं नहीं जा रहा। पर यह तो कह ही सकता हूं कि विकास के लिए एक दल के बहुमत की सरकार ज़रूरी है।’ आनंद बोला, ‘पर एक तथ्य और भी हमारे सामने है। कि जब एक दल के बहुमत की सरकारें बहुत ताक़तवर हो जाती हैं तो उन के निरंकुश होने के ख़तरे भी बहुत बढ़ जाते हैं। जैसे इंदिरा गांधी ने जब इमरजेंसी लगाई तब केंद्र में कांग्रेस बहुमत में ही थी। कल्याण सिंह ने जब बाबरी मस्जिद गिरवाई तब उत्तर प्रदेश में भाजपा बहुमत में ही थी। गुजरात में नरेंद्र मोदी ने दंगे करवाए। और अब जब मायावती की बसपा सरकार बहुमत में है तो वह भी दलितोत्थान के नाम पर मनमाना कर रही है।’
‘यही तो। यही तो!’ सारे इंजीनियर जैसे उछल पड़े।
सिगरेट का धुआं, शराब की गंध और उसकी बहक, तंदूरी चिकन से उड़ती भाप में घुल कर एक अजब ही नशा तारी कर रही थी। एक ग़ज़ब ही गंध परोस रही थी।
‘तो इस मिनिस्टर साले का क्या किया जाए?’ इसी धुएं और भाप में से एक आवाज़ अकुलाई।
‘अब तो आनंद भइया आप ही बताइए!’ इंजीनियर मित्र बोला।
‘मेरी बात मान पाएंगे आप लोग?’
‘बिलकुल!’ लगभग सभी आवाजें एक सुर में बोलीं।
‘इस मिनिस्टर को उसी की भाषा में सबक़ सिखाइए।’
‘अब उस की भाषा तो आप ही बताइए। आखि़र आप उस मिनिस्टर के दोस्त हैं!’
‘बिलकुल नहीं!’ आनंद बोला, ‘ऐसा व्यक्ति मेरा दोस्त नहीं हो सकता।
‘तब?’ सभी घबराए।
‘यह बताइए कि इस मिनिस्टर को एक करोड़ रुपए का भाव किस ने बताया? यहां तक उस को किस ने पहुंचाया?’ आनंद ज़रा रुका और सब को एकदम चुप देख कर धीरे से बोला, ‘आप ही लोगों ने।’ आनंद के यह कहते ही जैसे पूरी महफ़िल में सन्नाटा छा गया। सो आनंद ज़रा रुक कर बोला, ‘अब आप ही लोग उस को ज़मीन पर लाएंगे। तय कर लीजिए कि अब से कोई भी उस मिनिस्टर के पास अपनी पोस्टिंग के लिए नहीं जाएगा। चीफ़ इंजीनियर आप ही के बीच से किसी को उस को बनाना मज़बूरी है। शासन बहुत दिनों तक इस पोस्ट को ख़ाली नहीं रख सकता। कोई पैसा दे तब भी, न दे तब भी चीफ़ इंजीनियर बनना ही है। तो आप लोग क्यों एक करोड़ रुपए का रेट खोले हुए हैं? यह रैट रेस बंद कीजिए। चीज़ें अपने आप तय हो जाएंगी।’
आनंद की इस बात पर इंजीनियरों में कुछ ख़ास रिएक्शन तो नहीं हुआ पर सन्नाटा टूटता सा लगा। सिगरेट के धुएं और बढ़ गए। किसी ने यह सवाल ज़रूर उछाला, ‘और जो कहीं वह डेप्युटेशन पर किसी को ले आया तो?’
‘कुछ नहीं होगा। ऐसा नहीं कर पाएगा वह।’ और यह बात इधर-उधर हो गई। तभी एक इंजीनियर जो सिख था अचानक उछल कर बोला, ‘डन जी! अब कल से मंत्री के पास कोई नहीं जाएगा। इस की गारंटी मैं लेता हूं।’
‘तो देख लीजिएगा एक करोड़ का रेट ज़ीरो पर आ जाएगा।’ आनंद बोला।
पर महफ़िल का रंग तो उड़ चुका था। लोग जाने लगे। आनंद भी उठा और चलने लगा। चलते-चलते पीछे से उसे खुसफुसाहट सुनाई दी। कोई कह रहा था, ‘यार यहां रणनीति बनाने के लिए इकट्ठे हुए थे या जुगाड़ जमाने के लिए!’ फिर वही जोड़ भी रहा था, ‘आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास!’
आनंद भी हैरत में था और साथ चल रहे एक इंजीनियर से बोल रहा था, ‘यह अच्छा है कि इतना पीने के बाद भी आप इंजीनियरों को चढ़ी नहीं।’ उस ने ज़रा रुक कर सवाल सीधा करते हुए पूरा किया, ‘क्या इंजीनियरों को शराब नहीं चढ़ती?’
पर किसी ने आनंद को कोई जवाब नहीं दिया। सब का नशा शायद उतर गया था।
पर आनंद का नहीं।
हां, वह तब हैरत में ज़रूर पड़ा जब उसे पता चला कि इंजीनियरों ने उस रात के बाद सिंचाई मंत्री की ओर सचमुच रुख़ नहीं किया। नतीजा सामने था। ह़फ्ते भर में ही चीफ़ इंजीनियर की पोस्टिंग का रेट एक करोड़ से गिर कर पचास लाख रुपए पर आ गया था। उस ने अपने इंजीनियर मित्र को शाबाशी देते हुए कहा भी कि, ‘वेल डन! अब देखना ह़फ्ते-दस रोज़ में रेट ज़ीरो पर आ जाएगा।’ पर उस इंजीनियर ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। धीरे से बोला, ‘देखिए कब तक यह यूनिटी क़ायम रहती है!’
‘क्यों?’
‘इंजीनियरों को आप नहीं जानते। यह साले अपने बाप को छोड़िए, अपने आप के भी नहीं होते।’
और सचमुच जिन सरदार जी ने सबसे आगे कूद कर गांरटी ली थी कि, ‘अब कल से कोई नहीं जाएगा। इसकी गारंटी मैं लेता हूं।’ वही सबसे पहले पहुंच गए और पचास लाख रुपए दे कर चीफ़ इंजीनियर पोस्ट हो गए। पूछने पर कहते, ‘कोई नहीं जी, रेट तो करोड़ से आधा कर दिया। यही हमारी फ़तह। रही बात पैसे देने की तो कोई न कोई देता ज़रूर। मैंने दे दिया। प्राब्लम क्या है?’
पर प्राब्लम तो थी।
आनंद को खीझ हुई थी कि वह इन भ्रष्ट इंजीनियरों के हाथों इस्तेमाल हुआ। और कि उस की रणनीति पर इन इंजीनियरों ने पूरी तरह अमल नहीं किया। दूसरे, उस मिनिस्टर तक भी यह बात पहुंच गई कि यह रणनीति इंजीनियरों ने आनंद के उकसाने पर बनाई थी। उस ने एक दिन फ़ोन पर तंज़ करते हुए कहा भी कि, ‘क्या भाई आनंद जी, अब इंजीनियर्स एसोसिएशन बना कर ट्रेड यूनियन की राजनीति करने का इरादा है क्या?’
‘ट्रेड यूनियन की राजनीति देश में अब बची भी है क्या?’ आनंद ने प्रति प्रश्न किया तो वह चुप हो गया।
उस मिनिस्टर की प्राब्लम यह थी कि उस को मिले पूरे पचास लाख रुपए में से एक भी पैसे उस के हिस्से नहीं आया था। सारा का सारा पैसा मुख्यमंत्री के खाते में चला गया था। बाक़ी उस के हिस्से का पचास लाख इंजीनियरों ने रेट गिरा कर गड़प कर लिया। उस की अपनी टीस थी।

टीस तो आनंद के सीने में भी थी। टीस ही टीस।
अपने सामाजिक जीवन में टूट-फूट को ले कर। अपने दांपत्य जीवन में टूट-फूट को ले कर। अपनी नौकरी में टूट-फूट को ले कर। और राजनीतिक पार्टियों में वैचारिक टूट-फूट तो जैसे उस के मन में सन्निपात ज्वर की तरह भारी उथल-पुथल मचाए थी यह टीस!
किस-किस से लड़े वह?
जो राजनीतिक मित्र थे। साथ जूझे थे, लड़े थे, पुलिस की लाठियां खाई थीं, बेहतर दुनिया के, दुनिया को बदलने के सपने देखे थे। सिद्धांतों के लिए जिए-मरे थे। अब वही लोग रास्ता बदल कर, सिद्धांतों को किसी नाबदान में बहा कर, समझौतों की रेलगाड़ी में बैठ कर सत्ता भोग रहे थे और आनंद को राजनीति का नया व्याकरण सिखा रहे थे। उस के स्वाभिमान को लगभग रौंदते हुए साइकेट्रिक के पास जाने की सलाह दे रहे थे, ट्रेड यूनियन की राजनीति में जाने की संभावनाएं टटोल रहे थे। लेटे होंगे भीष्म पितामह अर्जुन के वाणों से घायल हो कर शर शैय्या पर और पिलाया होगा अर्जुन के वाणों ने उन को पानी। पर गंगापुत्र भीष्म पानी के लिए तरसेंगे यह भी क्या किसी ने कभी सोचा है? उन की इस यातना की थाह ली है किसी ने?
बताइए गंगा का बेटा और प्यास से मरे?
भीष्म पितामह तो फिर भी धर्म अधर्म की लड़ाई में हस्तिनापुर के साथ वचनबद्धता के फ़रेब में अधर्म के साथ खड़े थे। जुआ, द्रौपदी का चीर हरण, निहत्थे अभिमन्यु का मरना देखते रहे। तो यह तो होना ही था! फिर वह एक बार सोचता है कि ऐसा तो नहीं कि कहीं हस्तिनापुर की वचनबद्धता की आड़ में सत्ता और सुविधा के आगे वह घुटने टेक रहे थे? चलिए हस्तिनापुर के साथ आप की वचनबद्धता थी। पर शकुनी, दुर्योधन और धृतराष्ट्र की धूर्तई के आगे घुटने टेकने की वचनबद्धता तो नहीं थी? पर आप तो जैसे वचनबद्ध ही नहीं, प्रतिबद्ध और कटिबद्ध भी थे!
अद्भुत!
तो क्या जैसे आज के राजनीतिज्ञ आज की राजनीति, आज की व्यवस्था, मशीनरी सत्ता और बाज़ार के आगे नतमस्तक हैं, वैसे ही भीष्म पितामह भी तो नतमस्तक नहीं थे? गंगापुत्र भीष्म! और पानी के लए तड़प रहे थे। और प्रायश्चित कर रहे थे कि दुर्योधन के द्वारा प्रस्तुत स्वर्ण पात्र का जल पीने के बजाए अर्जुन के वाणों से धरती की छाती चीर कर ही प्यास की तृप्ति चाहते थे? इच्छा मृत्यु का वरदान उन की इच्छाओं का हनन तो नहीं कर रहा था? सोचते-सोचते उसे एक गीत याद आ गया है- पल-छिन चले गए/जाने कितनी इच्छाओं के दिन चले गए!
शिखंडी, अर्जुन का वाण, शर-शय्या और इच्छा मृत्यु का झूला। कितना यातनादायक रहा होगा भीष्म के लिए इस झूले में झूलना। व्यवस्था-सत्ता और बाज़ार के आगे घुटने टेकने की यातना ही तो नहीं थी यह? तो क्या था गंगापुत्र भीष्म? फिर उसे एक गीत याद आ गया है- बादल भी है, बिजली भी है, सागर भी है सामने/मेरी प्यास अभी तक वैसी जैसे दी थी राम ने!
फिर वह पूछता है कि क्या यह सिर्फ़ भीष्म प्रतिज्ञा ही थी? पर आचार्य द्रोण? सत्ता-सुविधा के आगे वह क्यों घुटने टेके हुए थे? सिर्फ़ बेटे अश्वत्थामा को दूध उपलब्ध न करा पाने की हेठी ही थी? तो एकलव्य का अंगूठा क्या था?
दासी पुत्र विदुर? उन्हों ने तो सत्ता-व्यवस्था और तब के बाज़ार के आगे घुटने नहीं टेके थे? पर वह पांडवों के साथ भी कहां खड़े थे? गदा, धनुष या तलवार ले कर? जहां-तहां सिर्फ़ प्रश्न ले कर खड़े थे। तो क्या आनंद विदुर होता जा रहा है?
एक और विदुर?
आनंद भी जहां-तहां प्रश्न ले कर खड़ा हो जा रहा है आज कल। इतना कि अब ख़ुद प्रश्न बनता जा रहा है! यह तो हद है! वह बुदबुदाता है। उसे विदुर नहीं बनना। विदुर की सुनता कौन है? महाभारत में भी किसी ने नहीं सुनी थी तो अब कोई क्यों सुनने लगा? वह सोचता है क्या विदुर के समय में भी साइकेट्रिक होते रहे होंगे? और कभी किसी धृतराष्ट्र या उस के वंशज ने विदुर को किसी साइकेट्रिक के पास जाने की सलाह दी होगी? या फिर क्या उस समय भी ट्रेड यूनियनें रही होेंगी? और किसी ने तंज़ में विदुर को भी ट्रेड यूनियन की राजनीति में जाने का विमर्श दिया होगा?
और सौ सवाल में अव्वल सवाल यह कि क्या तब भी कारपोरेट जगत रहा होगा जहां तब के विदुर नौकरी बजाते रहे होंगे?
क्या पता?

फ़िलहाल तो आज की तारीख़ में वह अपना नामकरण करे तो प्रश्न बहादुर सिंह, या प्रश्नाकुल पंत या प्रश्न प्रसाद जैसा कुछ रख ही सकता है। कैसे छुट्टी ले वह इस प्रश्न प्रहर के दुर्निवार-अपार प्रहार से? सोचना उस का ख़त्म नहीं होता। अब इस टीस का वह क्या करे? यह एक नई टीस है। जिस का उसे अभी-अभी पता चला है।

‘बहुत दिन हो गए तुम ने मालपुआ नहीं बनाया।’ वह पत्नी से कहता है। ऐसे गोया इस टीस को मालपुए की मिठास और भाप में घुला देना चाहता है। और कहता है, ‘हां, वह गरी की बर्फ़ी और गाजर का हलवा भी। जो तुम पहले बहुत बनाया करती थीं, जब बच्चे छोटे थे।’ कह कर वह लेटे-लेटे पत्नी के बालों में अंगुलियां फिराने लगता है। पत्नी पास सिमट आती है पर कुछ बोलती नहीं। वह जानता है कि जब ऐसी कोई बात टालनी होती है तो पत्नी चुप रह जाती है। बोलती नहीं। वह जानता है कि पत्नी को मीठा पसंद नहीं। बच्चे भी पत्नी के साथ अब नमकीन वाले हो गए हैं। बड़े हो गए हैं बच्चे। जब छोटे थे तब मीठा खा लेते थे। अब नहीं। मीठा अब सिर्फ़ उसी को पसंद है। और वह डाइबिटिक हो गया है। सो पत्नी अब मालपुआ नहीं बनाती। नहीं बनाती गरी की बर्फ़ी और गाजर का हलवा भी। खीर तक नहीं। पत्नी ब्लडप्रेशर की पेशेंट है। पर ख़ुद नमक नहीं छोड़ती। उस का मीठा छुड़वाती है।
आफ़िस में भी पहले सहयोगी बहुत रिस्पेक्ट करते थे। बिछ-बिछ जाते थे। यह जान कर कि आनंद की पालिटिकल इंलुएंस बहुत है। रुटीन काम भी वह करवा ही देता था सब का। पर जब सब की उम्मीदें बड़ी होती गईं, मैनेजमेंट भी लायजनिंग करवाने की कोशिश में लग गया। उस ने पहले तो संकेतों में फिर साफ़-साफ़ मना कर दिया कि वह लायज़निंग नहीं करेगा। हरगिज़ नहीं। सहयोगियों को साफ़ बता दिया कि इतना ही जो पालिटिकल इंलुएंस उस का होता तो वह ख़ुद राजनीति नहीं करता? राजनीति छोड़ नौकरी क्यों करता? नौकरी में टूट-फूट शुरू हो गई। जो लोग पलक पांवड़े बिछाए रहते थे, देखते ही मुंह फेरने लगते।
यह क्या है कारपोरेट में राजनीति या राजनीति में कारपोरेट?

वह एक परिचित के घर बैठा है। घर के लोग किसी फंक्शन में गए हैं। घर में एक बुज़ुर्गवार हैं। घर की रखवाली के लिए। अकेले। बुज़ुर्गवार पेंशन या़ता हैं। आनंद का हाथ पकड़ कहते हैं, ‘भइया गवर्मेंट में एक काम करवा देते!’
‘क्या?’
‘जो पेंशन महीने में एक बार मिलती है, महीने में चार बार की हो जाती। या दो बार की ही हो जाती।’
‘ऐसा कैसे हो सकता है?’ आनंद मुसकुराता है, ‘क्या किसी को दो बार या चार बार तनख़्वाह मिलती है जो पेंशन भी दो बार या चार बार मिले?’
‘नहीं भइया आप समझे नहीं।’ बुज़ुर्गवार आंखें चौड़ी करते हुए बोले, ‘पेंशन का एमाउंट मत बढ़ता। वही एमाउंट चार बार में, दो बार में मिलता। हर महीने।’
‘इस में क्या है? आप को पेंशन तो बैंक के थ्रू मिलती होगी। आप चार बार में नहीं छह बार में यही एमाउंट निकालिए। दस बार में निकालिए!’
‘आप समझे नहीं भइया!’
‘आप ही समझाइए।’
‘निकालने की बात नहीं है। आने की बात है।’
‘ज़रा ठीक से समझाइए।’ आनंद खीझ कर बोला।
‘भइया अब आप से क्या छिपाना?’ बुज़ुर्गवार बोले, ‘घर की बात है। पेंशन की तारीख़ करीब आती है तो घर के सारे लोग मेरी ख़ातिरदारी शुरू कर देते हैं। क्या छोटे-क्या बड़े। पानी मांगता हूं तो कहते हैं पानी? अरे दूध पीजिए। पानी मांगता हूं तो दूध लाते हैं। खाने में सलाद, सब्ज़ी, दही, अचार, पापड़ भी परोसते हैं। ज़रा सी हिचकी भी आती है तो दवा लाते हैं। लेकिन जब पेंशन मिल जाती है तब नज़ारा बदल जाता है। घर का हर कोई दुश्मन हो जाता है। क्या छोटा, क्या बड़ा। पानी की जगह दूध देने वाले लोग पानी नाम सुनते ही डांटने लगते हैं। कहते हैं ज़्यादा पानी पीने से तबीयत ख़राब हो जाती है। बहुत पानी पीते हैं। मत पिया कीजिए इतना पानी। हिचकी की कौन कहे, खांसते-खांसते मर जाता हूं, दवा नहीं लाते। खाना भी रूखा-सूखा। हर महीने का यह हाल है। तो जब दो बार या चार बार पेंशन मिलेगी हर महीने तो हमारी समस्या का समाधान हो सकता है निकल जाए!’
‘पर ऐसा कैसे हो सकता है भला?’ बुज़ुर्गवार का हाथ हाथ में ले कर कहते हुए उन के दुख में भींग जाता है आनंद। कहता है, ‘अच्छा तो अब चलूं?’
‘ठीक है भइया पर यह बात हमारे यहां किसी को मत बताइएगा।’
‘क्या?’
‘यही जो मैं ने अभी कहा।’
‘नहीं-नहीं बिलकुल नहीं।’ कह कर आनंद उन के पैर छू कर उन्हें दिलासा देता है, ‘अरे नहीं, बिलकुल नहीं।’
बताइए इस भीष्म पितामह को महीने में चार बार पेंशन का पानी चाहिए।

एक डाक्टर के यहां अपनी बारी की प्रतीक्षा में वह बैठा है। डाक्टर होम्योपैथी के हैं सो वह सिमटम पर ध्यान ज़्यादा देेते हैं। एक ब्लड प्रेशर के मरीज़ से डाक्टर की जिरह चल रही है, ‘क्या टेंशन में ज़्यादा रहते हैं?’
‘हां, साहब टेंशन तो बहुत है ज़िंदगी में।’ पेशेंट मुंह बा कर बोला।
‘जैसे?’
‘द़तर का टेंशन। घर का टेंशन।’
‘द़तर में किस तरह का टेंशन है?’
‘नीचे के सब लोग रिश्वतख़ोर हो गए हैं। बात-बात पर फाइलें फंसाते हैं। पैसा नहीं मिलता है तो बेबात फंसाते हैं। मैं कहता हूं दाल में नमक बराबर लो। और सब नमक में दाल बराबर लेते हैं। यह ठीक तो नहीं है।’
‘आप का काम क्या है?’
‘बड़ा बाबू हूं।’ वह ठसके से बोला, ‘बिना मेरी चिड़िया के फ़ाइल आगे नहीं बढ़ती।’
‘चिड़िया मतलब?’
‘सिंपल दस्तख़त।’
‘ओह! इतनी सी बात!’
‘इतनी सी बात आप कह रहे हैं। अफ़सर बाबू मिल कर देश बेचे जा रहे हैं और आप इतनी सी बात बोल रहे हैं?’ वह तनाव में आता हुआ बोला, ‘मैं तो अब वी.आर.एस. लेने की सोच रहा हूं।’
‘अच्छा घर में किस बात का टेंशन है?’
‘घर में भी कम टेंशन नहीं?’ वह तफ़सील में आ गया, ‘एक लड़का नौकरी में आ गया है। दूसरा बिज़नेस कर रहा है। बिज़नेस ठीक नहीं चल रहा। तीसरा लड़का कुछ नहीं कर रहा। लड़की की शादी नहीं तय हो रही है।’
‘बस?’
‘बस क्या, घर में रोज़ झगड़ा हो जाता है मिसेज़ से।’
‘किस बात पर?’
‘मुझे हरी सब्ज़ी पसंद है। साग पसंद है। मिसेज़ को तेल मसाला पसंद है। बच्चों को भी मसालेदार पसंद है। इस पर झगड़ा बहुत है।’
‘ठीक है। आप अपनी सब्ज़ी अलग बनवाइए। तेल-घी मसाला और नमक बिलकुल छोड़ दीजिए। द़तर से लंबी छुट्टी ले लीजिए। ब्लड प्रेशर आप का चार सौ चला गया है। इस को रोकिए। नहीं मुश्किल में पड़ जाइएगा।’
‘जैसे?’
‘लकवा मार सकता है। आंख की रोशनी जा सकती है। कुछ भी हो सकता है।’ कहते हुए डाक्टर उस के परचे पर दवाइयां लिख देते हैं।
दूसरा मरीज़ शुगर का है। डाक्टर की मशहूरी सुन कर पटियाला से लखनऊ आया है। सिख है। सरदारनी को भी साथ लाया है। सरदारनी उस के शुगर से ज़्यादा शराब छुड़ाने पर आमादा है। सरदार डेली वाला है। डाक्टर भी समझा रहे हैं। पर वह कह रहा है, ‘नहीं साहब बिना पिए मेरा काम नहीं चलता। बिना इस के नींद नहीं आती।’ डाक्टर नींद की गोलियों की तजवीज़ करते हैं। पर वह अड़ा हुआ है कि, ‘बिज़नेस की टेंशन इतनी होती है कि बिना पिए उस की टेंशन दूर नहीं होती।’
‘तो बिना शराब रोके कोई दवा काम नहीं करेगी?’
‘कैसे नहीं करेगी?’ सरदार डाक्टर पर भड़क गया है, ‘पटियाला से लखनऊ फिर किस काम के लिए आया हूं।’ बिलकुल दम ठोंक कर कहता है, ‘दवा आप दो, काम करेगी मेरी गारंटी है।’
‘इस वक्त भी आप पिए हुए हैं।’ डाक्टर उसे तरेरते हुए मुसकुराते हैं।
‘हां, थोड़ी सी।’ वह हाथ उठा कर मात्रा बताता है।
‘इन को कल ले कर आइए। जब पिए हुए न हों।’ डाक्टर सरदारनी से कहते हैं। पर सरदार अड़ा है कि, ‘दवा आज ही से शुरू होगी। भले कल से बदल दो।’ वह जोड़ता है, ‘आखि़र इतना पैसा ख़र्च कर पटियाले से ख़ास इसी काम के लिए आया हूं। तो काम तो जी होना चाहिए ना!’ डाक्टर को चुप देख कर वह बड़बड़ाता है, ‘फ़ीस बाहर दे दी है, आप दवा दो!’
आनंद बिना दवा लिए क्लिनिक से बाहर आ गया।
सोचता है सिगरेट पिए।
पर सिगरेट नहीं है। आस पास कोई दुकान भी नहीं है। वह कई बार पाइप और सिगार पीने के बारे में भी सोच चुका है। सिगार तो मौक़े बेमौक़े पी लेता है। पर पाइप हर बार मुल्तवी हो जाता है। सोच-सोच कर रह जाता है। ख़रीद नहीं पाता। सिगार भी कभी-कभार ही। नियमित नहीं।

नियमित नहीं है काफ़ी हाउस में भी बैठना उस का। पर बैठता है जब-तब। पहले के दिनों में काफ़ी हाउस में बैठना एक नशा था। अब वहां बैठ कर नशा टूटता है। समाजवादी सोच को अब वहां सनक मान लिया गया है। समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई/हाथी से आई घोड़ा से आई/समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई।’ को अब वहां इसी शाब्दिक अर्थ में गूंथा जाता है। और लोग पूछते हैं, ‘का हो कब आई?’ इतना कि आनंद को ‘जब-जब सिर उठाया/चौखट से टकराया’ दुहराना पड़ता है। लगता है विद्यार्थी जीवन ख़त्म नहीं हुआ। विद्यार्थी जीवन याद आते ही उसे अपनी छात्र राजनीति के दिन याद आ जाते हैं। याद आते हैं पिता। पिता की बातें। वह अंगरेज़ी हटाओ आंदोलन के दिन थे। पिता कहते थे कि, ‘पहले अंगरेज़ी पढ़ लो, अंगरेज़ी जान लो फिर अंगरेज़ी हटाओ तो अच्छा लगेगा। नहीं ख़ुद हट जाओगे। कोई पूछेगा नहीं।’ लेकिन तब वह पिता से टकरा गया था। आंदोलन का जुनून था। कई बार वह पिता से टकराता था तो लगता था-व्यवस्था से टकरा रहा है। व्यवस्था से आज भी टकराता है। पर इंक़लाब ज़ि़दाबाद सुने अब ज़माना गुज़र गया है। जिंदाबाद-मुर्दाबाद के दिन जैसे हवा हो गए। ‘हर ज़ोर-जुलुम के टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है’ को जैसे सांप सूंघ गया है। आर्थिक मंदी के दौर में जगह-जगह से लोग निकाले जा रहे हैं, बेरोज़गार हो रहे हैं। पर अब यह सब सिर्फ़ अख़बारों की ख़बरें हैं। इन ख़बरों में हताशा की बाढ़ है। जोश और इंक़लाब का हरण हो गया है, हमारी रक्त कोशिकाएं रुग्ण हो गई हैं। नहीं खौलता ख़ून। बीस हज़ार-तीस हज़ार की नौकरी छूटती है तो दस हज़ार-पंद्रह हज़ार की नौकरी कर लेते हैं। लाख डेढ़ लाख की नौकरी छूटती है पचास हज़ार-साठ हज़ार की कर लेते हैं कंपनी बदल लेते हैं। शहर बदल लेते हैं। ज़मीर और ज़हन बदल लेते हैं। ‘एक खेत नहीं, एक बाग़ नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे’ गाना हम भूल गए हैं। भूल गए हैं यह पूछना भी कि एक ही आफ़िस में कुछ आदमी आठ लाख-दस लाख महीने की तनख़्वाह ले रहे हैं तो कुछ लोग दस हज़ार, बीस हज़ार, पचास हज़ार की तनख़्वाह ले रहे हैं। यह चौड़ी खाई क्यों खोद रहे हैं हुजू़र? यह कौन सा समाज गढ़ रहे हैं। क्यों नया दलित गढ़ रहे हैं? क्यों एक नए नक्सलवाद, एक नई जंग की बुनियाद बना रहे हैं? अच्छा बाज़ार है! चलिए माना। फिर ये बेलआउट पैकेज भी मांग रहे हैं।
यह क्या है?
मालपुआ खाना है तो बाज़ार की हेकड़ी है। भीख मांगनी है तो लोक कल्याणकारी राज्य की याद आती है? भई हद है!
काफ़ी हाउस में बैठा आनंद सिगरेट सुलगाता है और सोचता है कि इसी माचिस की तीली से बेल आउट देने और लेने वालों को भी किसी पेट्रोल पंप पर खड़ा कर के सुलगा दे। और बता दे कि जनता की गाढ़ी कमाई से भरा गया टैक्स, सर्विस टैक्स और दुनिया भर का ऊल जुलूल टैक्स का पैसा है। इस से बेलआउट के गड्ढे मत पाटो।
‘शिव से गौरी ना बियाहब हम जहरवा खइबौं ना!’ शारदा सिनहा का गाया भोजपुरी गाना कहीं बज रहा है। यह कौन सा कंट्रास्ट है?

वह रास्ते में है।
कोहरा घना है। और थोड़ी सर्दी भी। कोहरे को देख उसे सुखई चाचा की याद आ गई।
घने कोहरे में लिपटी वह रात सुखई चाचा के ज़र्द चेहरे को भी जैसे अपने घनेपन में लपेट लेना चाहती थी। लेकिन बार-बार डबडबा जाने वाली उन की निश्छल आंख छलछलाती तो जैसे वह कोहरे को ही अपने आप में लपेट लेती। उन के रुंधे कंठ से उन की आवाज़ भी स्पष्ट नहीं हो पा रही थी। तो भी उस घोर सर्दी में उन की यातना की आंच जलते हीटर की आंच से कहीं ज़्यादा थी।
यह यातना उन के मुसलमान होने की थी।

उन के नाती को पुलिस ने आतंकवादी घोषित कर दिया था। गांव की राजनीति और लोकल पुलिस का यह कमाल था। आतंकवाद की बारीकियों से बेख़बर आतंकवाद के आतंक की काली छाया में वह घुट रहे थे। आतंक से तो वह परिचित थे, पर आतंकवाद क्या बला है, इसे वह अब भुगत रहे थे, बल्कि उस में झुलस रहे थे।
झुलसते हुए ही वह तीन सौ किलोमीटर की दूरी नाप कर लखनऊ आनंद के पास आए थे अपने नाती को ले कर कि वह आतंकवाद की नंगी तलवार की फांस से उन के नाती को उबार देगा। यह सोच कर कि आनंद बड़का नेता है, जो चाहेगा, करवा देगा। वह यह उम्मीद जताते हुए थर-थर कांप रहे थे, उन की घबराई डबडबाई आंखें जब तब छलछला पड़ती थीं।
सुखई चाचा जो आनंद के जीवन के अनगिनत सुखों के साझीदार थे, अपने इस बुढ़ापे के दुख में आनंद को साझीदार बनाने पर आमादा ही नहीं आकुल-व्याकुल, हैरान-परेशान भयाक्रांत उस के पैरों में समा जाना चाहते थे।
उस ने उन्हें हाथ जोड़ कर रोका कि, ‘नहीं सुखई चाचा, ऐसा नहीं करें। आप मुझ से बहुत बड़े हैं।’
‘नहीं तिवारी बाबा! ओहदा में, जाति में, रसूख़ में तो रऊरा बड़ा बानी।’
‘अरे नहीं-नहीं बड़े तो आप ही हैं।’ कह कर मैं ने उन्हें उठा कर बैठा लिया। और कहा कि, ‘अभी आप खा पी कर आराम से सोइए। रात बहुत हो गई है। सुबह इत्मीनान से बात करेंगे। और इसे बचाने का इंतज़ाम भी। ड्राइंग रूम में ही उन के और उन के नाती के सोने की व्यवस्था करने के लिए पत्नी से कहा तो वह ज़रा बिदकी। पर जल्दी ही वह व्यवस्था करने में लग गई। वह कंबल खोजने लगी तो मैं ने कहा कि, ‘कंबल नहीं मेहमानों वाली रज़ाई दे दो ठंड बहुत है। और हीटर भी जला रहने देना।’

सुखई चाचा जो उस की पैदाइश से ही उसके साथ थे। बाजा बजाते हुए। दादी बताती थीं कि जब मैं आधी रात को पैदा हुआ तो शुभ साइत का नगाड़ा जब बजा तो मियां का बाजा भी बजा। मियां माने सुखई। तब जाड़े की रात थी लेकिन ख़बर मिलते ही सुखई चाचा अपना बिगुल बजाने अपने बेटे के साथ आ गए। सुखई बिगुल यानी ट्रम्पेट्स बजा रहे थे और उन का बेटा तासा। भाई उन का झाल बजाता रहा। अम्मा बताती थीं कि जब मेरा निकासन हुआ तब भी मियां ने बाजा बजाया। मेरा मुंडन हुआ तब भी मियां ने बाजा बजा कर दरवाजे़ की शोभा बढ़ाई। और मैं ने अपने यज्ञोपवीत तथा बाद में विवाह में भी मियां यानी सुखई चाचा को ट्रम्पेट्स बजाते देखा। ट्रम्पेट्स पर उन दिनों फ़िल्मी गानों की बहार आ गई थी पर सुखई चाचा के ट्रम्पेट्स पर कजरी और पुरबी गानों की बहार फिर भी बहकती झूमती छाई रहती। मेरे पैदा होने, निकासन, मुंडन, यज्ञोपवीत, विवाह आदि सभी मौक़े पर सुखई चाचा दरवाजे़ की शोभा बढ़ाते रहे बिगुल यानी ट्रम्पेट्स बजा कर। मुझे याद है कि जब मेरी दादी का देहांत हुआ और उन का पार्थिव शरीर शहर के अस्पताल से ट्रक से गांव ले जाया गया तो सुखई चाचा की बैंड पार्टी दादी की अंतिम विदाई में भी हाज़िर थी। दादी ने लंबी उम्र जी कर विदा ली थी तो ग़मी के बावजूद ख़ुशी का भी मौक़ा था सो उन्हें बाजे गाजे के साथ विदाई दी गई गांव से। घर की औरतें और लोग रो ही रहे थे, सुखई चाचा ने जाने कौन सी धुन या जाने कौन सा राग छेड़ा अपने ट्रम्पेट्स पर कि जो लोग नहीं रो रहे थे, वह लोग भी रोने लगे। सब की आंखें बह चलीं।
सुखई चाचा बैंड बाजे का सट्टा करते थे, पर हमारे घर से वह सट्टा नहीं लिखवाते जजमानी लेते। पहले वह लुंगी या धोती पहने ही ट्रम्पेट्स बजाते थे पर बाद के दिनों में उन की बैंड बाजा कंपनी में बैंड बाजा वाली लाल रंग की ड्रेस भी आ गई। पर वह ख़ुद ड्रेस नहीं पहनते थे। धोती या लुंगी खुंटियाए वह अलग ही दिखते थे। बाद में उन का बेटा बिस्मिल्ला भी तासा छोड़ कर ट्रम्पेट्स बजाने लगा पर सुखई चाचा जैसी तासीर वह अपने बजाने में नहीं ला पाया।
सुखई चाचा का नाम तो था सुख मुहम्मद लेकिन गांव में लोग उन को सुखई कहते थे। गांव की औरतें जो संस्कारवश या लाजवश पुरुषों का नाम नहीं लेती थीं, उन्हें मियां कहती थीं। और हम उन्हें सुखई चाचा कहते थे।
ब्राह्मणों की बहुतायत वाले गांव में चूड़िहारों के भी सात आठ घर थे। उन्हीं में से एक घर सुखई चाचा का भी था। सुखई चाचा का नाम भले सुख मुहम्मद था पर सुख उन के नसीब में शायद ही कभी रहा हो। हां, उन के चेहरे पर एक फिस्स हंसी जैसे हमेशा चस्पा रहती थी। चाहे वह हल जोत रहे हों, चाहे सिलाई मशीन चला रहे हों, चूड़ी पहना रहे हों या बाजा बजा रहे हों। सुखई चाचा जैसे हर काम में माहिर थे। या ऐसे कहूं कि वह हर किसी काम के लिए बने थे। उन के पास मुर्गि़यां भी थीं और बकरियां भी। लेकिन सब कुछ के बावजूद गुज़ारा उन का न सिर्फ़ मुश्किल बल्कि बेहद मुश्किल था।
हमारे घर में क्या गांव के किसी भी घर में शादी ब्याह होता, लगन लगते ही उस घर में सुखई चाचा का डेरा भी जम जाता। सगुन का जुआठा हरीश लगते ही उन की सिलाई मशीन भी जम जाती। घर भर के कपड़े, रिश्तेदारों के कपड़े सिलने वह शुरू कर देते। काज, तिरुपाई, बटन के लिए उन की बेगम, बेटियां, बहू बारी-बारी सभी लग जाते। तब के घर भी कोई दो चार दस सदस्यों वाले घर नहीं होते थे। सिंगिल फेमिली, ज्वाइंट फेमिली का कंसेप्ट भी तब गांव में नहीं था। बाबा की चचेरी बहनें तक घर का ही हिस्सा थीं। बूढ़ी फूफियां अपने नाती पोतों समेत अपनी ससुराल छोड़ शादी के दस रोज़ पहले ही बुला कर लाई जातीं और शादी के दस बारह रोज़ बाद ही वापस जातीं। एक-एक दो-दो कपड़े ही सही, सभी के लिए नए-नए सिले ज़रूर जाते। कोई कुछ कहे तो सुखई चाचा बस, ‘हां बाबा, हां तिवराइन’ कह कर काम समझ लेते और उस के मन मुताबिक़ काम कर देते।
अपने टीन-एज के दिनों में आनंद एक बार बेहद बीमार पड़ा। एक्यूट एनिमिया हो गया था। देह में ख़ून की बेहद कमी वाली इस बीमारी में डाक्टर ने पौष्टिक आहार में दूध और अंडा का भी ज़िक्र कर दिया। घर में मांस-अंडा का पूरी तरह निषेध था। मां को तुरंत सुखई चाचा याद आए। बुलाया उन्हें। उन के घर में दूध देती गाय भी थी और अंडा देती मुर्ग़ी भी। वह सहर्ष तैयार हो गए। और पूरी गोपनीयता के साथ दूध में कच्चा अंडा फेंट-फेंट पिलाते रहे। आनंद के स्वस्थ होने तक।
उसे याद है तब कार्तिक का महीना था। गेहूं की बुआई का समय था। सुखई चाचा के साथ खेत में वह जब-तब हेंगे पर बैठ जाता। रह-रह कर वह हल जोतने की भी ज़िद करता और वह इस के लिए सख़्ती से मना कर देते। एक बार वह हल लुढ़का कर पेशाब करने ज़रा दूर गए। आनंद ने मौक़ा पा कर हल चलाना शुरू कर दिया। ज़रा दूर चलते ही हल की मूठ टेढ़ी-मेढ़ी हुई और हल का फार बैल के पैर की खुर में जा लगा। बैल की खुर से ख़ून निकलने लगा। उस का चलना मुश्किल हो गया। बैल अचकचा कर बैठ गया। सुखई चाचा दौड़ते-हांफते आए। बोले, ‘इ का कै देहलीं बाबा!’ झटपट बैल के जुआठे से पहले हल निकाला फिर बैल के गले से जुआठा। और माथे पर हाथ रख कर बैठ गए। बोले, ‘कातिक महीना, बैल बइठ गइल। अब कइसे बोआई होई!’ वह रुके और बोले, ‘अब गोंसयां हम्मे छोड़िहैं नाईं। गारी से तोप दिहैं।’ हुआ भी वही बाबा ने उन्हें गालियों से पाट दिया। पूछा कि, ‘अब कइसे बुआई होगी?’
गेहूं की बुआई उस साल पिछड़ गई थी। बाद में उधार के बैल से बुआई हुई। पर सुखई चाचा ने एक बार भी बाबा से नहीं कहा कि आनंद ने हल चला कर बैल के पैर में घाव दिया है, आनंद की बेवक़ूफ़ी से बैल का खुर कटा है। भूल कर भी नहीं, सारी तोहमत अपने ऊपर ले ली। आनंद चाह कर भी अपनी ग़लती बाबा से नहीं बता पाया। क्यों कि फिर उसे अपनी पिटाई का डर था। और सुखई चाचा भी यह बात जानते थे सो सारी गालियां अपने हिस्से ले लीं, आनंद को पिटने नहीं दिया। आनंद के बाबा प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर रहे थे। सो पिटाई बड़ी बेढब करते थे। उन की पिटाई के क़िस्से उन के रिटायर होने और निधन के बाद भी ख़त्म नहीं हुए थे गांव से-जवार से।
अकसर जब वह खेत में बाबा के साथ होता तो लोग आते-जाते बड़ी श्रद्धा से उन के चरण स्पर्श करते। लोगों के जाने के बाद जब वह बाबा से पूछता कि, ‘ये कौन थे?’
‘अरे चेला है।’ वह जोड़ते, ‘पढ़ाया था इस को।’ बाबा बताते और लगभग हर किसी के लिए।
‘पर यह आदमी पढ़ा लिखा तो लग नहीं रहा था।’
‘तो ससुरा जब पढ़ा ही नहीं तो पढ़ा लिखा लगेगा कइसे?’
‘पर अभी तो आप कह रहे थे कि पढ़ाया था, चेला है।’
‘हां, पढ़ाया तो था। पर ससुर पढ़ा कहां। दो चार छड़ी मारा, भाग खड़ा हुआ। फिर स्कूल ही नहीं आया।’ अधिकांश लोगों की पढ़ाई बाबा की मार से छूट गई थी। वह अपने समय में मरकहवा मास्टर नाम से मशहूर थे। गणित और उर्दू दो उन के विषय थे। ख़ास कर गणित में वह अपने विद्यार्थियों को बहुत मारते। हाथ-पांव तक तोड़ डालते। नतीजतन तब के विद्यार्थी भैंस चराना मंज़ूर कर लेते पर मरकहवा मास्टर से पढ़ाई नहीं। लेकिन जो विद्यार्थी उन की मार बरदाश्त कर ले जाते वह अव्वल निकल जाते। डिप्टी कलक्टर और कलक्टर बन जाते। ऐसा बाबा ख़ुद बताते। कलक्टर या डिप्टी कलक्टर तो नहीं पर कुछ अच्छी जगहों पर जमे लोगों को बाद के दिनों में ज़रूर उस ने पाया। जो इन मास्टर साहब की पिटाई पर आह भरते और उन के पढ़ाने के गुण की वाह करते कुछ थोड़े से लोगों को पाया। पर अधिकांश पढ़ाई छोड़ कर भागने वाले ही मिले।
सुखई चाचा भी उन्हीं न भागने वालों में से थे। अलिफ़ बे उन्हों ने बाबा से ही सीखा था। पर घर की मजबूरियों ने उन्हें और आगे पढ़ने नहीं दिया। और वह इस उर्दू तालीम को अपनी दर्ज़ीगिरी में आज़माते। और आनंद के घर के सारे काम भी वह पूरी निष्ठा, श्रद्धा या यों कहिए कि पूरे विद्यार्थी धर्म के साथ निभाते। वह बाबा को और उन के पूरे परिवार को अपने श्रम की गुरु दक्षिणा जब-तब प्रस्तुत करते रहते। और अभी भी सुखई चाचा उसी कृतज्ञ भाव से आनंद के पास अपने नाती को पुलिसिया क़हर से, आतंकवाद की आंच और गांव की गिरी राजनीति से बचाने की गुहार भरी आस में नाती को ले कर लखनऊ आए थे।
उन के नाती का दोष सिर्फ़ इतना था कि आज़मगढ़ के एक लड़के से उस की दोस्ती थी। दोस्ती क्या थी, साथ पढ़ता था। टीन-एज में दोस्ती की ललक और उत्साह में वह गांव में सुखई चाचा के घर भी दो-चार बार आया आज़मगढ़ लौटते समय। वह आता और बाबरी मस्जिद के घाव की तफ़सील में जाता। गुजरात दंगों के नासूर गिनाता। देश में मुसलमानों के प्रति हो रहे अन्याय बतियाता। गांव के कुछ लोगों के कान खड़े हो गए। कहने लगे, ‘यह तो साला पाकिस्तानियों की तरह बात करता है।’ किसी ने कहा, ‘अभी नहीं रोका गया तो यह रहीमवा का बाप निकलेगा।’ और रहीम को यह लोग पहले ही सबक़ सिखा चुके थे।

रहीम भी पहले सुखई चाचा की बैंड बाजा टीम में ट्रम्पेट्स बजाता था। लगन के दिनों में। बाद के दिनों में मेहनत-मज़दूरी कर के परिवार चलाता। उन्हीं दिनों छोटे भाई को कमाने के लिए सऊदिया भेजने का जुनून अचानक उस पर सवार हो गया। इसी दौड़ धूप में कुछ लीगी टाइप मुसलमानों से भी उस का परिचय हो गया। बाद के दिनों में उस के बाक़ी दो भाई भी सऊदिया चले गए। रहीम ने छोटी-मोटी मज़दूरी करनी छोड़ दी। अब घर में न सिर्फ़ पैसा आ गया था, रहीम के बर्ताव में भी फ़र्क़ आ गया था। अब वह मौलानाओं की तरह छोटी-मोटी तक़रीर भी करने लगा। कांशीराम, मुलायम ने नब्बे के दशक में दलित, पिछड़ों और मुस्लिम का गठजोड़ बनाया और जल्दी ही तोड़-ताड़ भी बैठे। पर रहीम ने अपने गांव स्तर पर अस्सी के दशक में ही यह गठजोड़ बना लिया था। और इतना ज़बरदस्त गठजोड़ कि सवर्णों की आंख की वह किरकिरी बन बैठा।

उन दिनों खेती ट्रैक्टर और कंबाइन के भरोसे नहीं थी। हल-बैल की खेती थी। हालां कि ट्रैक्टर की आमद गांव में हो चुकी थी पर कंबाइन का कहीं दूर-दूर तक अता पता नहीं था। हां, थ्रेशर की धमक ज़रूर थी। ग़रज़ यह कि खेती बिना मज़दूरों के नहीं हो सकती थी। और मज़दूरों की रहनुमाई रहीम के हाथों धीरे-धीरे आ रही थी। इतना ही नहीं रहीम अब पैसा, और बुद्धि दोनों का खेल खेल रहा था। सब से पहले उस ने ग्राम समाज की ज़मीन पर नज़र गड़ाई। जो खलिहान और बरात के नाम पर सवर्णों के कब्जे़ में थी। उस ने बहुत होशियारी से गांव के नाऊ, कहार, ढांढ़ी, कोइरी आदि जातियों के भूमिहीनों को गोलबंद किया और ग्राम प्रधान को ग्राम समाज की उस ज़मीन को पट्टे पर देने की दरख़्वास्त डलवा दी। वह ख़ुद तो भूमिहीन नहीं था अब, पर न सिर्फ़ अपने बल्कि कुछ और मुस्लिम चूड़िहारों की भी दरख़्वास्तें डलवा दीं। ग्राम प्रधान एक पंडित जी थे। शुरू में उन्हों ने टाल-मटोल किया पर रहीम ने तब के दिनों में चंदा लगा कर पंडित जी को दस हज़ार रुपए रिश्वत में दे कर उन की टाल-मटोल बंद करवा दी। पंडित जी ने पट्टा जारी कर दिया। पर इस अनुरोध के साथ कि पट्टा ले कर साल-छ महीना तक सांस न लें। न ही उस ज़मीन पर नज़र डालें।
रहीम मान गया। ग्राम प्रधान की यह बात।
तो भी ग्राम समाज की इस ज़मीन पर पट्टे की खुसफुसाहट गांव में शुरू हो गई। सवर्ण सकते में आ गए। ग्राम प्रधान पंडित जी को पकड़ा गया। पर उन्हों ने पट्टा देने से साफ़ इंकार कर दिया। और सांस खींच ली। लेकिन रहीम जिस श्रद्धा से झुक कर ग्राम प्रधान पंडित के चरण स्पर्श करता लोगों के मन मंे सवाल उतने ही सुलग जाते। पर यह सुलगन चिंगारी बनती और चिंगारी शोला, ग्राम प्रधान पंडित प्रयाग चले गए। सपत्नीक कल्पवास पर। महीने भर के लिए।
उधर पंडित ग्राम प्रधान कल्पवास पर प्रयाग गए इधर कतवारू नाऊ ने ग्राम समाज से पट्टे पर मिली ज़मीन पर मड़ई डाल दी। रातो-रात। रहीम ने उसे समझाया बहुत पर वह नहीं माना। अंततः दूसरी रात उस की मड़ई में गांव के दबंगों ने आग लगा दी। मड़ई सिर्फ़ सांकेतिक थी, सो कोई उस में सोया नहीं था। इस लिए किसी की जान नहीं गई। कतवारू के पास पट्टे का काग़ज़़ भी नहीं था सो पुलिस ने रिपोर्ट भी दर्ज नहीं की। पट्टे का काग़ज़़ रहीम के पास था। लेकिन चूंकि वह ख़ुद पढ़ा लिखा नहीं था, और काग़ज़़ को ले कर सशंकित भी था, पंडित ग्राम प्रधान गांव में नहीं थे सो उस ने काग़ज़़ किसी को न दिया, न दिखाया। पर कतवारू का कहना था कि उस ने पांच सौ रुपए रिश्वत दे कर पट्टा लिखवाया है और कोने वाली ज़मीन उसी के नाम है। वह बस इतना जानता है। पर रहीम ने उस की किसी बात का जवाब नहीं दिया। ख़ामोश रहा। मौक़ा पा कर उस ने कतवारू को समझाया भी कि, ‘कैंची कपार पर चलाओ, मुंह की कैंची चकर-पकर मत चलाओ। और चुप रहो। पंडित जी आएंगे तो देखा जाएगा। नहीं सारा खेल बिगड़ जाएगा।’
कतवारू चुप हो गया।
लेकिन गांव चुप नहीं हुआ।

तरह-तरह की बातें, तरह-तरह के कयास। लोग कहने लगे कि यह पंडित तो कफ़न बेच कर खा जाने वाला है तो ग्राम समाज की ज़मीन क्या चीज़ है? बेच दिया होगा। लेकिन सारी बातें गुपचुप। कोई खुल कर सामने नहीं आ रहा था। कारण यह था कि ग्राम प्रधान का कारोबार सूदख़ोरी का भी था। विरले ही घर थे जिस का पुरनोट प्रधान के पास न हो। वक़्त-बेवक्त किसी को भी पैसे की ज़रूरत पड़ जाती। जीना-मरना हो या शादी-ब्याह, प्रधान के यहां से सूद पर आदमी पैसा लेता ही था। जो जल्दी ख़त्म होता नहीं था। आदमी सौ रुपए उधार ले कर हज़ार रुपए दे देता पर सब सूद में चला जाता, मूल नहीं ख़त्म होता था। हां, बीच-बीच में पुरनोट ज़रूर बदल जाता। सो लगभग एक दहशत सी थी गांव में ग्राम प्रधान की। बीच दहशत में खुसफुस सूचनाएं तैर रही थीं कि भूमिहीन लोगों को ग्राम समाज की ज़मीन पर पट्टा एक बार फिर भी समझ में आता है पर रहीम के पास तो अपना पक्का घर है दो बीघा ही सही खेत है, तो उस के नाम पर भी पट्टा कैसे हो सकता है भला?
‘तो रहीम को भी पट्टा कर दिया है पंडित ने?’ गांव के सवर्णों में यह सवाल सुलगने लगा। फिर बात यह भी आई कि न सिर्फ़ रहीम बल्कि रहीम ने अपने भाइयों, पट्टीदारों के नाम भी पट्टा करवा लिया है। यह सारी सूचनाएं कतवारू नाऊ के सौजन्य से गांव में फैल रही थीं। रहीम के लिए कतवारू नाऊ अब सिर दर्द होता जा रहा था। कतवारू की ‘होशियारी’ रहीम की ‘रणनीति’ में पलीता लगा रही थी।
गांव में अचानक नवयुवक मंगल दल गठित हो गया था। नवयुवक मंगल दल की ओर से गांव में चंदा लगा। फिर नवयुवक मंगल दल की ओर से एक दिन ग्राम समाज की उस ज़मीन को ले कर एक अदालत में मुक़दमा दाखिल हो गया। तर्क यह दिया गया कि ग्राम समाज की ज़मीन पर भूमिहीनों के बजाय जोतदारों को पट्टा दे दिया गया है। नतीजतन गांव में न सिर्फ़ शांति भंग बल्कि सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ गया है। अदालत में इस बिना पर दरख़्वास्त दी गई कि सारे पट्टे तुरंत प्रभाव से निरस्त कर दिए जाएं। पर चूंकि पट्टे के काग़ज़़ साक्ष्य रूप में उपलब्ध नहीं कराए गए थे सो अदालत ने इस बिंदु पर सुनवाई से इंकार कर दिया। संबंधित लोगों को नोटिस जारी कर यथास्थिति बनाए रखने के आदेश ज़रूर जारी किए अदालत ने। साथ ही प्रशासन को क़ानून व्यवस्था बनाए रखने की हिदायत भी जारी कर दी।
मामला और भड़क गया।
रातों रात रहीम वग़ैरह की भी मड़ई पड़ गई। रहीम से लोगों ने पूछताछ की तो उस ने अदालत के स्टेटस-को का हवाला दिया। और एक अलग ही परिभाषा दे दी स्टेटस-को की। कहा कि स्टेटस-को का मतलब दोनों पक्षों का बराबर-बराबर कब्ज़ा। लोगों ने पूछा भी कि, ‘दोनों पक्ष मतलब नवयुवक मंगल दल का भी यहां कब्ज़ा होना चाहिए?’
‘नहीं, ग्राम समाज और पट्टा पाए लोगों का कब्ज़ा।’ रहीम ने जवाब दिया और कहा कि, ‘ई फ़र्ज़ी नवयुवक मंगल दल कौन होता है हम को रोकने वाला?’
अदालत में उस ने वस्तुस्थिति को जांचने के लिए कमिश्नर रिपोर्ट ख़ातिर दरख़्वास्त दे दी। एक मुस्लिम वकील ही कमिश्नर नियुक्त हुआ। कमिश्नर के आने के पहले रातो रात कई और झोंपड़ियां ग्राम समाज की इस ज़मीन पर सज गईं। पिछड़े, दलित और मुस्लिम अब खुल कर सवर्णों से आमने-सामने थे।
रहीम की नेतागिरी चमक गई थी।
नवयुवक मंगल दल की अगुवाई पहले परदे के पीछे से एक फ़ौजी पंडित जी कर रहे थे। जो उन दिनों दो महीने की छुट्टी पर गांव आए हुए थे। अब वह खुल कर सामने आ गए थे। रणनीति के तहत ही उन्हों ने नवयुवक मंगल दल में कुछ पिछड़े और दलितों को भी जोड़ा था। पर अब वह सब भी छिटक कर अपनी जमात में चले गए थे।
गांव जैसे जल रहा था।
जातिवादी और सांप्रदायिक उफान चरम पर था। इसी बीच ग्राम प्रधान कल्पवास पूरा कर प्रयाग से लौटे तो गांव के बाहर ही उन की घेराबंदी हो गई।
दूसरे दिन ग्राम समाज की ज़मीन की रिपोर्ट अदालत को देने के लिए कमिश्नर को आना था। ग्राम प्रधान के घर रात को सवर्णों की बैठक हुई। पूरी रणनीति पर चर्चा हुई। ज़्यादा तफ़सील में लोग जाते इस के पहले ही ग्राम प्रधान ने एक मंत्र फूंक दिया, ‘सारी मड़ई फूंक डालो, बाक़ी मैं दूख लूूंगा।’
नवयुवक मंगल दल के शोहदों ने फिर दूसरी रणनीति बनाई और तड़के ही सारी झोपड़ियों में आग लगा दी। रहीम अभी कुछ करता-कराता तब तक सारा मलबा साफ़ कर पोखरे में डाल दिया। और ज़मीन पर गोबर की लिपाई करवा दी। नवयुवक मंगल दल का एक बोर्ड भी द़ती पर गुलाबी रंग से लिखवा कर एक बल्ली पर टांग दिया।
कमिश्नर ने आ कर पहले तो पूरी ज़मीन की पैमाइश करवाई। फिर लोगों के बयान लिए। नक़्शा बनाया। ग्राम प्रधान से अलग से अकेले में बात की रहीम, कतवारू वगैरह से पूछा कि किस की मड़ई कहां थी?
‘किसी की कोई मड़ई कहीं नहीं थी।’ नवयुवक मंगल दल का एक शोहदा बीच में कूद कर बोला।
‘फिर यह गोबर की लिपाई-विपाई क्यों है?’
‘वो तो इस लिए कि नवयुवक मंगल दल की आज बैठक है।’ एक दूसरा शोहदा बोला।
‘उस के लिए इतनी बढ़िया लिपाई और सारी ज़मीन पर?’ कमिश्नर ने पूछा।
‘हां, खलिहान की भी तैयारी है।’
‘अच्छा? किस-किस का खलिहान यहां होता है?’ कमिश्नर ने पूछा।
‘गांव के लगभग सभी का?’
‘अच्छा?’ कमिश्नर ने पूछा, ‘सारे गांव का खलिहान इतनी सी ज़मीन में हो जाता है?’
‘नहीं कुछ लोग अलग भी करते हैं।’
‘कौन-कौन लोग यहां खलिहान करते हैं?’ कमिश्नर ने स्पष्ट रूप से लोगों का नाम जानना चाहा। पर किसी ने किसी के नाम का खुलासा नहीं किया। हां, सारा गांव, मुसल्लम गांव का पहाड़ा ज़रूर रटते रहे।
कमिश्नर ख़ानापूरी कर के चला गया।
दो दिन बाद फिर मड़ई सब की तन गईं। मड़ई लगते समय लड़ाई-झगड़ा भी हुआ। किसी का सिर फूटा, किसी का मुंह फूटा। पुलिस आई, एफ़.आई.आर. हुई। दो दर्जन से अधिक लोग 107/151 मंे बंद हुए। इस बीच मड़ई की फ़ोटोग्राफ़ी भी हो गई। दो दिन बाद सब की ज़मानत हो गई। कुछ-कुछ ख़ून सब का ठंडा हुआ।
अब दो मुकदमे थे। एक दीवानी में, एक फ़ौजदारी में।
उधर कमिश्नर ने ग्राम समाज की ज़मीन पर रहीम और उस के साथियों का क़ब्ज़ा दिखा कर उस के पक्ष में रिपोर्ट अदालत को दे दी थी। रहीम की बल्ले-बल्ले हो गई। कुछ दिन बाद अदालत में ग्राम प्रधान की ओर से जारी पट्टे के काग़ज़ात भी जमा हो गए।
अब नवयुवक मंगल दल ने रहीम और उस के भाइयों के खि़लाफ़़ मोर्चा खोला कि यह लोग भूमिहीन नहीं हैं, जोतदार हैं, गांव में पक्का मकान है तो इन को पट्टा कैसे मिल सकता है? रहीम अड़ा रहा कि वह और उस के भाई भूमिहीन हैं। और जो वह जोतदार है तो नवयुवक मंगल दल उस के नाम की खसरा खतौनी दिखाए।
खसरा खतौनी रहीम के अब्बू के नाम थी। और रहीम का कहना था कि, ‘अब्बू ने हम को और हमारे भाइयों को अपनी जायदाद से बेदख़ल कर दिया है।’ अपने अब्बू के इस हलफ़नामे की प्रतिलिपि भी उस ने अदालत में पेश कर दी थी। अदालत ने उसे तुरंत स्वीकार नहीं किया था। पर एक पेंच तो रहीम ने खड़ा ही कर दिया था।
अब गांव में यह सवाल उठा कि ऐसे तो गांव के दो तिहाई से अधिक लोग भूमिहीन बन सकते हैं। फिर ग्राम समाज की ज़मीन पर किस-किस को पट्टा मिल पाएगा? ग्राम समाज के पास ज़मीन है ही कितनी?
ख़ैर, मुक़दमे में तारीख़ पड़ती रही।
फ़ौजदारी का मुक़दमा समाप्त हो चुका था। दीवानी के मुक़दमे और ग्राम समाज की ज़मीन को ले कर गांव के अधिकांश सवर्णों की दिलचस्पी समाप्त हो चली थी। ग्राम प्रधान पंडित जी का टर्म अब ख़त्म होने को था। नए चुनाव की तैयारी थी। ग्राम प्रधान पंडित जी की थुक्का फ़ज़ीहत बहुत हो चुकी थी। खुले आम न सही पीठ पीछे सभी उन को गरियाते थे। क्या सवर्ण, क्या दलित, क्या पिछड़े, क्या मुस्लिम। सभी एक सुर से कहते कि इस ग्राम प्रधान पंडित ने गांव की हवा ख़राब कर दी। माहौल बिगाड़ दिया। खेतों से ज़्यादातर दलितों की छुट्टी हो चली थी। खेत की जुताई अब किराए के ट्रैक्टरों से ज़्यादातर लोग करवाने लगे थे। पिछड़ों का इस ग्राम समाज की ज़मीन से ज़्यादा लेना देना नहीं था। सवर्णों से उन का मेल जोल हो चला था। पर ग्राम प्रधानी के चुनाव में वह भी अब अपनी लाठियों में तेल मल रहे थे। पर सब से ज़्यादा टैंपो हाई था रहीम का। रहीम खुल्लमखुल्ला दम ठोंक रहा था। पंडितों में तीन चार दावेदार आ चुके थे। ख़ास कर एक युवा जो गांव के पोखरों में मछली पालन का पट्टा लिए था। और नवयुवक मंगल दल का ख़ास कर्ताधर्ता था। उसे लग रहा था कि अगर सवर्णों में से तीन चार उम्मीदवार हो जाएंगे तो रहीम की जीत पक्की है। सो पहले उस ने आपस में सब को समझाया। रहीम का डर भी दिखाया। पर कोई समझने को तैयार नहीं हुआ।
उन्हीं दिनों वह फ़ौजी पंडित फिर छुट्टी पर आए हुए थे। बिखरते जा रहे और लस्त-पस्त पड़े नवयुवक मंगल दल की बैठक करवाई। नवयुवक मंगल दल अब उन की निगहबानी में फिर से आते ही जोश में आ गया। रहीम को इस की भनक लगी। फ़ौजी पंडित की सक्रियता देख कर रहीम ने उन के एक पट्टीदार से मेल जोल बढ़ाना शुरू कर दिया। जिस से फ़ौजी पंडित की बातचीत तक बंद थी। वह उन की एक गाय जब-तब दूहने लगा।
इधर नवयुवक मंगल दल ने एक और शिगूफ़ा छोड़ा कि रहीम से अगर ग्राम समाज की ज़मीन न छुड़वाई गई तो वह उस पर मस्जिद बनवा देगा। इस बारे में प्रशासन और अदालत को भी नवयुवक मंगल दल ने चिट्ठी लिख कर सूचित किया।
गांव में मस्जिद बनने की ख़बर ने तूल पकड़ लिया। आस-पास के गांवों में भी यह ख़बर गई। एक मुस्लिम बहुल गांव ने इस ख़बर को कैच कर लिया। उस गांव में मस्जिद ईदगाह सब था। उस गांव के लोग इस गांव आने लगे। हिंदुओं के गांव में अलग एका हो गया। सब कहने लगे कि इस गांव में पाकिस्तान नहीं बनने देंगे। रहीम अब सफ़ाई पर आ गया। सब को बताता कि, ‘एक तो इस ज़मीन का मामला अदालत में है। दूसरे, मस्जिद बनाने भर का हमारे पास पैसा नहीं है। तीसरे अगर मस्जिद बन भी जाती है तो इस में पाकिस्तान बनाने की बात कहां से आ जाती है?’
लेकिन रहीम की यही बात कि, ‘अगर मस्जिद बन भी जाती है तो.......’ को लोगों ने पकड़ लिया। कहने लगे कि यह मस्जिद बनाएगा ज़रूर। इस आशय का एक पत्र भी प्रशासन को नवयुवक मंगल दल ने लिखा। पत्र में साफ़ आरोप लगाया गया कि रहीम के पास सऊदिया से पैसा आ रहा है। इस की जांच की जाए और गांव ही नहीं इलाक़े में भी सांप्रदायिकता सिर उठा रही है।
फिर जांच-पड़ताल का दौर शुरू हो गया। गांव का यह मामला शहर के अख़बारों की सुर्खियों में भी आने लगा। रहीम के बयान भी। अब रहीम की दाढ़ी में भी नूर छलकने लगा था।
नवयुवक मंगल दल के लोगों का तनाव बढ़ता जा रहा था।
फ़ौजी पंडित ने बेक़रार हो कर नवयुवक मंगल दल के शोहदों को इकट्ठा किया। पहले तो उन्हें धिक्कारा और कहा कि, ‘तुम लोगों का ख़ून पानी हो गया है। इतनी बातें हो गईं और तुम लोगोें का ख़ून नहीं खौला? कैसे जवान हो? धिक्कार है तुम लोगों की जवानी पर। चूड़ियां पहन कर घर में बैठो। अब जो करना होगा मैं ही करूंगा। सीमा पर पाकिस्तानियों को हिला कर रख देता हूं और अपने ही गांव का पाकिस्तान नहीं ख़त्म कर पा रहा। धिक्कार है मुझ पर भी!’
‘तो क्या किया जाए चाचा जी!’ नवयुवक मंगल दल के युवा फड़फड़ाए।
‘रहीम नाम की नागफनी को छांट डालो!’
‘पर नागफनी तो छांटने से और बढ़ती है।’ एक नौजवान ने तड़प कर कहा।
‘तो इस नागफनी को समूल नष्ट कर दो!’
‘जी चाचा जी!’ सभी युवा एक सुर में बोले।
फिर फूल-प्रूफ़ योजना बनाई गई।
उन्हीं दिनों फ़ौजी पंडित के पट्टीदार जिन से उन की बोल चाल बंद थी का एक बेटा जो महाराष्ट्र में एक पेपर मिल में काम करता था, छुट्टी पर आया हुआ था। वह थोड़ा नहीं ज़्यादा भावुक था। उस को भी इस टीम से जोड़ा गया। वह पट्टीदारी के लाख मन मुटाव के बावजूद गांव में पाकिस्तान नहीं बनने देने के बहकावे में आ गया और ऐलान कर बैठा कि, ‘मेरे जीते जी इस गांव में मस्जिद नहीं बन सकती।’
लेकिन उस के लाख उत्साह के बावजूद उसे सिर्फ़ इतना सा काम सौंपा गया कि वह रहीम को सिर्फ़ गाय दूहने के लिए अपने घर बुला कर लाए। गांव के पोखरों की मछली का ठेकेदार, जो नवयुवक मंगल दल का कर्ताधर्ता भी था, को रहीम पर कट्टे से फ़ायर करने की ज़िम्मेदारी दी गई। इसी कर्ताधर्ता का एक पट्टीदार होमगार्ड में था। उस को ज़िम्मेदारी दी गई कि कट्टा मारने के बाद रहीम को चेक करना कि मरा है कि नहीं। और जो न मरा हो तो उसे चाकू से मार-मार कर मार डाले। एक और लड़के को ज़िम्मेदारी दी गई कि वह होमगार्ड को कवरेज दे और जो रहीम ज़्यादा उछल कूद करे तो उसे पकड़ कर क़ाबू करे।
दूसरे दिन तड़के फ़ौजी पंडित के घर सभी फिर से इकट्ठे हुए। हवन पूजन हुआ। फ़ौजी पंडित ने चारो नौजवानों को तिलक किया, दही खिलाया। विजयी भव का आशीर्वाद दिया। सूरज निकल रहा था और फ़ौजी पंडित गांव से बाहर जा रहे थे। सब को बताते हुए कि, ‘शाम तक लौटूंगा।’
इधर चारो नौजवान अपने काम पर लग गए। फ़ौजी पंडित के पट्टीदार के घर आ कर बाहर के कमरे में छुप कर बैठ गए। फिर पट्टीदार का लड़का रहीम को गाय दूहने के लिए बुलाने चला गया। रहीम ने कहा कि, ‘पहले अपनी गाय तो दूह लूं।’
‘पर हमारी गाय तो रंभा रही है।’ लड़का बोला, ‘आफ़त किए है। लगता है खूंटा तोड़ा कर भाग जाएगी। अगर अभी नहीं दूही गई।’
‘अच्छा चलिए बाबा!’ कह कर रहीम फ़ौजी पंडित के पट्टीदार के यहां चल पड़ा। बोला, ‘अपनी गाय आ कर दूह लूंगा।’
पट्टीदार के घर आ कर बछड़े से गाय को पेन्हा कर बाल्टी लिए रहीम ने गाय को दूहना शुरू ही किया था कि उस की पीठ पर कट्टे का फ़ायर हो गया। वह उचक कर गिर पड़ा। दूसरा फ़ायर उस की बांह पर लगा। रहीम अब तक समझ गया कि उसे मारने के लिए गाय दूहने के बहाने बुलाया गया है। वह गरियाते हुए भागा। पर तब तक होमगार्ड और दूसरे लड़के ने उसे कस के पकड़ लिया। पकड़ कर पटक दिया। और चाकू से उसे जहां तहां तब तक मारते रहे, जब तक रहीम ने अंतिम सांस नहीं ली।
रहीम को मारने के बाद तीनों एक मोटरसाइकिल पर बैठ कर जय नवयुवक मंगल दल, जय शिव शंकर, जय काली, जय भवानी का उद्घोष करते गांव से बाहर निकल गए। पट्टीदार का लड़का अपने घर में ही छुप गया।
रहीम की हत्या की ख़बर पूरे गांव में सन्निपात की तरह फैली। ऐसे गोया गांव में बिजली गिर गई हो। जो जहां था, वहीं दुबक गया। पशु-पक्षी भी अवाक रह गए। रंभाती हुई गाय बैठ गई।
सुबह-सुबह पूरे गांव में सन्नाटा पसर गया।
यह सन्नाटा तब टूटा जब गांव में पुलिस आई। रमतल्ली चौकीदार ने भाग कर थाने पर इस घटना की सूचना दी। थाने ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को। थोड़ी देर में पूरा गांव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया।
मछली ठेकेदार, होमगार्ड उस के दूसरे साथी के खि़लाफ़ न सिर्फ़ एफ़.आई.आर. दर्ज हुई, हिस्ट्रीशीट भी खुल गई। रहीम की मड़ई जलाने और दो-एक और मामलों में भी इन सब के खि़लाफ़़ एफ़.आई.आर. थी। सो हिस्ट्रीशीट खोलने में पुलिस को दिक्क़त नहीं हुई। फ़ौजी पंडित ख़ुद शहर जा कर मिलेट्री हास्पिटल में भर्ती हो गए और उन के पट्टीदार का लड़का घर में ही था, भागा नहीं था सो उस को पुलिस ने दोषी नहीं माना। वह गिड़गिड़ा कर पुलिस अधिकारियों के पैरों पर बारी-बारी गिरता भी रहा। अब बात आई चश्मदीद गवाह की। गांव में कोई चश्मदीद गवाह नहीं मिल रहा था। फ़ौजी पंडित के पट्टीदार के लड़के ने कहा कि, ‘साहब तीनों लोग मुंह पर गमछा बांधे हुए थे और गोली चलते ही वह ख़ुद भी डर कर छुप गया था। अंततः रहीम की बीवी, बेटे और भाई को पुलिस ने गवाह बनाया। इस ग़रज़ से कि और कोई गवाह होगा तो टूट सकता है। यह लोग नहीं टूटेंगे।
पर पुलिस का यह क़यास ग़लत निकला।
रहीम का बेटा न सिर्फ़ मंदबुद्धि था, पैर से भी अपंग था। रह गया भाई और बीवी। भाई को भी दबंगों ने थोड़े दिनों बाद धमका लिया। कुछ समय बाद रहीम की बीवी को भी ‘समझा-बुझा’ कर शांत कर दिया। इस समझाने बुझाने में बेटे की अपंगता के नाम पर उस की देख-रेख ख़ातिर पचास हज़ार रुपए भी देने की बात की दबंगों ने। तय हुआ कि हर साल पांच हज़ार रुपए बच्चे की परवरिश के लिए इस पचास हज़ार रुपए में से दिया जाएगा। मतलब यह पचास हज़ार रुपए भी दस साल में।
सब के सब छूट गए। हाई कोर्ट से।
रहीम का रंग उतर गया धीरे-धीरे गांव से।
प्रधानी के चुनाव में फिर कोई दूसरा नहीं खड़ा हुआ। रहीम की हत्या के बाद सब का नशा उतर गया था। अंततः ग्राम प्रधान पंडित ही निर्विरोध चुने गए।

आनंद को याद है कि उन्हीं दिनों एक रोज़ शहर में टाउनहाल पार्क के पास कुछ दोस्तों के साथ खड़ा था कि ग्राम प्रधान पंडित उस रास्ते से पैदल ही गुज़र रहे थे। उस ने उन की बुज़ुर्गियत और पट्टीदारी का ध्यान रखते हुए आगे बढ़ कर उन के पांव छुए और साथ खड़े लोगों से उन का परिचय करवाया। बताया कि, ‘हमारे गांव के प्रधान हैं।’ साथ ही उन की और गांव की तारीफ़ में यह भी जोड़ा कि, ‘ख़ासियत यह कि इस घोर प्रतिद्वंद्विता के युग में भी निर्विरोध प्रधान चुने गए हैं।’ यह सुनते ही ग्राम प्रधान पंडित भड़क गए। तड़कते हुए गरजे। गांव भर के लोगों की मां बहन की तफ़सील में गए और मूछों पर ताव देते हुए कहा, ‘किस में इतना दम था जो मेरे खि़लाफ़ खड़ा होता!’
आनंद यह सुन कर सकते में आ गया। उसे लगा कि उस ने अपने दोस्तों से बेवजह ही परिचय करवा दिया। उन के चरण स्पर्श कर के वह पछताया। पछताया इस पर भी काहे को उन के निर्विरोध चुने जाने की तारीफ़ की दोस्तों से।
खै़र, रहीम की हत्या ने गांव में अद्भुत सन्नाटा बो दिया था। फ़ौजी पंडित के पट्टीदार का वह लड़का वापस फिर नौकरी पर नहीं गया। गांव में खेती बारी भी वह नहीं करता। घर से बाहर भी नहीं निकलता। तब से ही वह गुमसुम रहने लगा। कभी कभार पत्नी से ही बात करता। खाता, सोता और लेटे-लेटे घर की छत निहारता रहता। एक ज़िंदा लाश, चलती फिरती लाश बन गया वह।

इसी बीच बोफ़ोर्स मामला सामने आ गया। इस की इतनी चर्चा हुई कि गांव में लोग ग्राम प्रधान पंडित का नाम बदल बैठे। अब उन का नाम बोफ़ोर्स प्रधान हो चला था। पहले गुपचुप फिर खुल्लमखुल्ला। क्यों कि उन के कारनामे दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे थे। राजीव गांधी की जवाहर रोज़गार योजना ने उन के बोफ़ोर्स प्रधान होने में और घी डाला। पर अब गांव में उन का भय, उन का रसूख़, उन का रंग फीका पड़ता जा रहा था। अब मछली ठेकेदार के भय का रंग लोगों में चटक हो रहा था। उस ने मछली पालन के साथ-साथ मुर्ग़ी पालन भी शुरू कर दिया था। और अब सुअर पालने की योजना बना रहा था। उस के पास अब बंदूक़ भी थी, पैसा भी। सो वह अब गांव में एक नई ताक़त था।
सुखई चाचा का यह नाती क़ासिम इन्हीं दिनों पैदा हुआ था।

उसके पैदा होते ही देश में मंडल कमंडल खड़खड़ाने लगे। ग्राम प्रधान पंडित भले ही बोफ़ोर्स प्रधान बन गए हों पर राजीव गांधी पैदल हो गए। बोफ़ोर्स विरोधी घोड़े पर सवार हो कर ‘राजा नहीं फ़कीर है, भारत की तक़दीर है’ का नारा गंूजते-गूंजते वी.पी. सिंह के हाथों देश की बागडोर आ गई थी। वह आए भी और मंडल को लाल क़िले से फहरा कर गए भी। और जैसे कि अपनी ‘लिफ़ाफ़ा’ शीर्षक कविता में वह कहते हैं, ‘पता उन का/पैग़ाम तुम्हारा/बीच में फाड़ा मैं ही जाऊंगा।’ फाड़ भी दिए गए। हालां कि टिप्पणीकारों ने माना कि नेहरू और इंदिरा के बाद अगर किसी ने देश की दिशा और राजनीति बदली तो वह वी.पी. सिंह ही हैं। खै़र, चंद्रशेखर आए। राजीव गांधी की हत्या हुई और फिर पी.वी. नरसिंहा राव आए। बाबरी मस्जिद गिरी। हर्षद मेहता कांड हो गया। देश तहस नहस हो गया। मंडल के चलते अभी जातियों के घाव सूखे भी नहीं थे कि सांप्रदायिक खाई भी गहरी हो गई। मुंबई ब्लास्ट इस की इंतिहा थी।

सुखई चाचा का यह नाती क़ासिम उन्हीं दिनों स्कूल जाने लगा था।

शिबू सोरेन और अजीत सिंह सरीखों के भरोसे नरसिंहा राव की अल्पमत सरकार ने पांच साल पूरे किए। न सिर्फ़ पूरे किए मनमोहनी आर्थिक उदारीकरण के बीज भी बोए। सुखराम जैसे भ्रष्टाचार के दुख बोए। तेरह दिन की अटल बिहारी सरकार के बाद देवगौड़ा और गुजराल आए। और अटल बिहारी फिर-फिर। लाहौर बस हुई, कारगिल हुआ, गोधरा और गुजरात हुआ। नरेंद्र मोदी की महक अब पूरे देश में थी। सरकार भी दंगा कराने लगे यह तो हद थी। हुक्मरान कुर्सी बांट रहे थे, देश टूट की ओर जा रहा था तो उन की बला से। लाल क़िला और फिर संसद भी बम विस्फोटों से दहला तो क्या हुआ। रंज लीडर को भी हुआ पर आराम के साथ। फ़ील गुड और शाइनिंग इंडिया के साथ प्रमोद महाजन, अमर सिंह और राजीव शुक्ला जैसे लोग भी राजनीति में शाइनिंग की छौंक मार रहे थे। राजनीति अब नीति से नहीं व्यापार से चलने को सज-धज कर तैयार खड़ी थी। राजनीति और भ्रष्टाचार दोनों के औज़ार बदल गए थे। मोबाइल, इंटरनेट और मीडिया समाज को दोगला बनाने की होड़ में खड़े हो चुके थे। और यह देखिए सोनिया गांधी की गोद में बैठे मनमोहन सिंह ने अमरीकी बीन पर ऐसा नाचा कि सारा समाज अब बाज़ार में ऊभ-चूभ हो गया। आटा के भाव भूसा बिकने लगा। सिंगूर और नंदीग्राम होने लगा। कामगारों और किसानों की पैरोकार वामपंथी सरकार किसानों और कामगारों के खि़लाफ़ उठ गई। और भाजपा जैसी पार्टियां उन के आंसू पोंछने पहुंच गईं।
सुखई चाचा का यह नाती क़ासिम उन्हीं दिनों कालेज जाने लगा।

कालेज से गांव आता और शेर सुनाता, ‘क़ब्रों की ज़मीनें दे कर हमें मत बहलाइए/राजधानी दी थी राजधानी चाहिए।’ इस शेर का भाव, इस की ध्वनि और इस का तंज़ तो गांव में लोग नहीं ही समझ पाते। परंतु यह ज़रूर समझ जाते कि सुखई के इस नाती जिस का नाम क़ासिम था को जो अभी नहीं रोका गया तो यह रहीम का भी बाप निकलेगा और गांव को चौपट कर देगा।
हालांकि गांव चौपट हो चला था।

भूख तो नहीं पर युवाओं की बेकारी और पट्टीदारी के झगड़े ने गांव की शांति पर झाड़ू चला रखा था। अहंकार का हिमालय पिघलने के बजाय दिन-ब-दिन और फैलता जाता। टैªक्टर से खेत की जुताई और कंबाइन मशीन से फसलों की कटाई ने गांव में खेतीबारी का महीनों का काम घंटों में बदल दिया था। ट्रैक्टर की जुताई के चलते बैल पहले विदा हुए फिर कंबाइन की कटाई से भूसा। सो गाय भैस भी विदा हो गईं। गांव में अब गोबर उठाने का काम भी नहीं रह गया था। त्यौहारों में भी चाव नहीं रह गया था। होली शराबियों और दीवाली जुआरियों के भरोसे ज़िंदा रह गई थी। छुप-छुपा कर पीने वाले अब खुल्लमखुल्ला शान, शेख़ी और हेकड़ी दिखा कर पीने लगे थे। गांव में अधिकांश आबादी बुजु़र्गों की थी जिन में कुछ नौकरियों से रिटायर्ड वह लोग भी थे जो शहर में मकान नहीं बनवा पाए थे, लड़के नाकारा हो चले थे और बेरोज़गार युवा जिन की पढ़ाई या तो पूरी नहीं हो पाई या फिर अधकचरी पढ़ाई के कारण नौकरी नहीं मिल पाई; और अब गांव में शोहदा बन कर घूमने के अलावा उन के पास कुछ ख़ास नहीं था। अगर था तो घर में आपस में लड़ना। कुछ ने तो मां बाप को पीटना ही अपना मुख्य काम बना लिया था। हां, नवयुवक मंगल दल की जगह हिंदू युवा वाहिनी ने ले ली थी। ग्राम प्रधान पंडित अब काफ़ी बुढ़ा गए थे। ग्राम प्रधान अब एक दलित हो गया था पर गांव में हिंदू युवावाहिनी के आगे किसी की कुछ नहीं चलती थी। दलित ग्राम प्रधान की भी नहीं। वह हिंदू युवा वाहिनी के आगे पूरी तरह समर्पण कर जवाहर रोज़ग़ार योजना और तमाम और विकास के मदों में आने वाले पैसों को डकारने में मगन था। फ़ौजी पंडित भी रिटायर हो कर गांव में ही बस गए थे और बी.डी.सी. मेंबर बन कर गांव की राजनीति में पूरा हस्तक्षेप किए हुए थे। जैसे पहले वह नवयुवक मंगल दल को आशीर्वाद देते थे वैसे ही अब वह हिंदू युवा वाहिनी को भी न सिर्फ़ आशीर्वाद देते थे बल्कि गांव स्तर पर हिंदू युवा वाहिनी के थिंक टैंक भी थे।
हिंदू युवा वाहिनी वैसे तो पूरी कमिश्नरी में अपना जाल फैला चुकी थी पर इस गांव में उस का हस्तक्षेप कुछ ज़्यादा ही था। इतना कि तमाम सारे हिंदू भी इस हिंदू युवा वाहिनी से आक्रांत थे। इस हिंदू युवा वाहिनी के खि़लाफ़ थाना-पुलिस में भी कोई सुनवाई नहीं थी। बल्कि थानेदार तो इन के आगे हाथ जोड़े, घिघ्घी बांधे खड़े रहते। कारण यह था कि हिंदू युवा वाहिनी के मुख्य अभिभावक और कर्ताधर्ता एक सासंद थे जो एक मंदिर के महंत भी थे। पूरे ज़िले क्या पूरी कमिश्नरी में उन की ही गुंडई चलती थी और प्रकारांतर से वह ही प्रशासन चलाते थे। शहर तो जैसे उन का बंधक था, गांवों में भी उन का आतंक कम नहीं था।
हालां कि एक बार अपनी गिऱतारी पर वह संसद में फूट-फूट कर रोए भी थे। पर वह राजनीतिक आंसू थे। अब उन की राजनीति भी विस्तार ले रही थी। न सिर्फ़ उन की राजनीति विस्तार ले रही थी बल्कि वह अपनी पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं को भी उनकी औक़ात बताते हुए उन्हें चुनौती पर चुनौती दे रहे थे। ज़िले और प्रदेश के नेताओं को तो वह पिद्दी क्या, पिद्दी का शोरबा भी नहीं समझते थे। इलाक़े के कई विधायक उन की जेब में थे। यह विधायक भी पार्टी की कम इन सांसद महंत जी की ज़्यादा सुनते थे। पूर्वी उत्तर प्रदेश बनने पर वह मुख्यमंत्री बनने का सपना भी संजोये थे। मुस्लिम विरोध उन की राजनीतिक खेती थी। शहर के मुसलमानों को वह मुर्ग़ा बनाए हुए थे। अब छिटपुट गांवों के मुसलमानों की बारी थी। देवेंद्र आर्य जैसे कवि लिख रहे थे, ‘गोरख की सरज़मीं पर गुजरात का ख़याल/चेहरे की आइने से कहीं जंग होती है!’ पर जंग तो हो रही थी आइने से। और फिर इस शहर के मुसलमान तो गुजरात से चार दशक पहले ही से इस महंत के पूर्ववर्तियों द्वारा मुर्ग़ा बना कर टांग दिए गए थे। यह परंपरा इस महंत ने भी जारी रखी थी। हां, अब की बारी अटल बिहारी की तरह अब गांवों की बारी थी।

सुखई चाचा का नाती क़ासिम इसी बारी का नया शिकार था।

‘क़ब्रों की ज़मीनें दे कर हमें मत बहलाइए/राजधानी दी थी, राजधानी चाहिए।’ शेर जब क़ासिम की ज़ुबान से हिंदू युवा वाहिनी के लोगों ने सुना तो इस की तासीर, इस की आंच वह समझ गए। इस का मतलब समझाते हुए एक शोहदे ने जब फ़ौजी पंडित से यह तफ़सील बताई और कहा कि, ‘यह क़ासिम तो शहंशाह बनना चाहता है।’
‘मतलब?’ फ़ौजी पंडित ने खैनी मलते हुए पूछा।
‘मतलब ई चाचा कि अब ई राजा बनना चाहता है। राजधानी मांग रहा है।’
‘ए भाई तो इस गांव को हम उस की राजधानी नहीं बनने देंगे।’ फ़ौजी पंडित बोले, ‘इसके लिए उसको लखनऊ-दिल्ली जाना पड़ेगा। काहे से कि राजधानी तो वहीं है। इहां गांव में कहां राजधानी बन पाएगी?’
‘न हो तो इस क़ासिम को भी रहीम की तरह जन्नत भेज दिया जाए। जाए वहीं राजधानी-राजधानी खेले।’
‘ना!’ फ़ौजी पंडित ने खैनी थूकते हुए टोका, ‘यह ग़लती अब दुबारा नहीं। रहीम को जन्नत भेजने में तीन चार बच्चों की ज़िंदगी जहन्नुम हो गई। हिस्ट्रीशीट खुल गई। हत्या का पाप लग गया। गांव की बदनामी हो गई।’
‘तो?’ हिंदू युवा वाहिनी के शोहदों ने एक साथ पूछ लिया।
‘सोचते हैं।’ फ़ौजी पंडित बोले, ‘थोड़ा बुद्धि से काम लेना पड़ेगा। ब्लाक प्रमुख यादव के पास चलते हैं। मीटिंग करते हैं। फिर तय करते हैं।’
यादव ब्लाक प्रमुख भी हिंदू युवा वाहिनी के शुभचिंतकों में से था। फ़ौजी पंडित ने क़ासिम के इरादों, गांव को पाकिस्तान बनाने, मस्जिद बनाने, सऊदिया से पैसे आने जैसे तमाम ब्यौरे दिए और यह भी बताया कि आज़मगढ़ के एक मुस्लिम लड़के से उस की बड़ी दोस्ती है।
‘आज़मगढ़?’ ब्लाक प्रमुख यादव की आंखों में चमक आ गई। बोला, ‘फिर तो पंडित जी इस का काम लग जाएगा।’
‘पर कैसे?’ फ़ौजी पंडित अकुलाए।
‘आज़मगढ़ और आतंकवाद पूरे देश में एक सिक्के के दो पहलू हो गए हैं। अख़बार-सख़बार, टीवी-सीवी नहीं देखते हैं का?’
‘तो आतंकवादी घोषित हो जाएगा क़ासिम?’ फ़ौजी पंडित की आंखों में चमक आ गई।
‘इनकाउंटर भी हो सकता है।’ यादव ब्लाक प्रमुख बोला, ‘बस थानेदार को थोड़ा क़ाबू करना पड़ेगा। पर है वह भी अपनी ही बिरादरी का। काम हो जाएगा। फिर भी दस पांच हज़ार पेशगी तो देनी ही पड़ेगी।’
‘हो जाएगा इंतज़ाम!’
‘फिर ठीक है।’ यादव ब्लाक प्रमुख बोला।
फ़ौजी पंडित यादव ब्लाक प्रमुख की इस बात से इतना प्रभावित हो गए कि उठ खड़े हुए उस का पैर पकड़ने के लिए। पर तुरंत ही बैठ गए यह सोच कर कि यह तो ससुरा यादव है और मैं पंडित।
दूसरे ही दिन पुलिस गांव में आ गई। क़ासिम घर पर ही था। पकड़ ले गई।
दो दिन की मारपीट और पूछताछ के बाद घर आया। आज़मगढ़ का वह लड़का भी पकड़ा गया था। उस के ही घर वालों ने पैरवी कर अपने बेटे और क़ासिम को छुड़वाया। काफ़ी पैसा ख़र्च करना पड़ा था। मामले की ख़बर लगते ही हिंदू युवा वाहिनी के लोग सक्रिय हो गए। उन की सक्रियता देख कर सुखई चाचा घबराए। क़ासिम को ले कर लखनऊ आनंद के पास आ गए।

सुबह उठ कर चाय नाश्ते के बाद बच्चे स्कूल, कालेज चले गए तो आनंद ने क़ासिम को अकेले में बैठाया और पूछा कि, ‘तुम्हारी प्राब्लम क्या है?’
‘मेरी कोई प्राब्लम नहीं है।’ वह बोला, ‘जो भी प्राब्लम है हिंदू युवा वाहिनी के लोगों को है। वही लोग मेरे पीछे पड़े हैं।’ क़ासिम बोला।
‘आखि़र क्यों वह लोग तुम्हारे पीछे पड़े हैं?’
‘वह लोग चाहते हैं कि मैं गांव में सिर झूका कर चलूं। जैसे कि अब्बू या बाबा चलते हैं। या और छोटी जातियों के लोग चलते हैं।’ वह जैसे तिड़का, ‘वह लोग नहीं चाहते कि मैं सिर उठा कर चलूं।’
‘ऐसा क्यों?’
‘वह कहते हैं कि तुम हमारे आसामी हो, हमारी प्रजा हो, हम ने अपनी ज़मीन पर तुम्हें बसाया सो अदब में रहो। अपनी औक़ात में रहो। और मैं इस से इंकार करता हूं।’
‘और कोई बात?’
‘हां, इधर एक घटना और हुई।’
‘क्या?’
‘रोडवेज़ बस स्टैंड का एक बोर्ड सड़क पर लगा था। काफ़ी मज़बूत था और बड़ा भी। इन लोगों ने उसे पेंट करवा कर बस स्टैंड की जगह हिंदू युवा वाहिनी लिखवा दिया। मैं ने इस का भी विरोध किया। रोडवेज़ में लिखित शिकायत की।’
‘कुछ हुआ?’ आनंद ने पूछा, ‘मेरा मतलब है इन लोगों के खि़लाफ़ कोई कार्रवाई हुई?’
‘कुछ नहीं।’ वह बोला, ‘उलटे आज़मगढ़ वाले मेरे दोस्त और मुझ को आतंकवादी बनवाने की साज़िश रच दी।’
‘आतंकवादियों से सचमुच तुम्हारे कोई संबंध नहीं हैं?’
‘होते तो पुलिस क्यों छोड़ती?’
‘मैं ने सुना है कि अभी जांच चल रही है।’
‘किस ने बताया?’
‘सुखई चाचा ने।’
‘ओह!’ वह बोला, ‘हो सकता है। मुझ से कुछ सादे काग़ज़ों पर पुलिस ने दस्तख़त करवाए हैं। कुछ भी बना सकते हैं, पुलिस वाले।’
‘तुम्हारे सचमुच किसी आतंकवादी से संबंध नहीं हैं?’
‘हैं न?’
‘क्या?’ आनंद के होश उड़ गए।
‘अब तो हिंदुस्तान का हर मुसलमान आतंकवादी है। और मेरे संबंध बहुत सारे मुसलमानों से हैं।’
‘ओह!’ आनंद ने सुकून की सांस ली। बोला, ‘देखो क़ासिम मेरी बात का बुरा मत मानो।’
‘बुरा क्या मानना आप तो थाने की पुलिस जैसे सवाल पूछ ही रहे हैं।’ उस ने जैसे हार मान कर सांस छोड़ी, ‘बाबा बहुत यक़ीन के साथ आप के पास ले आए थे।’
‘देखो क़ासिम अगर मर्ज़ ठीक से मालूम हो जाता है तो डाक्टर सही दवाई दे पाता है। नहीं फिर अंदाज़ा लगाता रह जाता है सो मरीज़ ठीक नहीं हो पाता।’
‘मैं बीमारी नहीं हूं। मरीज नहीं हूं।’ उस ने जोड़ा, ‘और आप भी डाक्टर नहीं हैं।’
‘मैं ने कब कहा कि मैं डाक्टर हूं?’ आनंद खीझ कर बोला।
‘मरीज़ दवाई जैसी बातें फिर क्यों कर रहे हैं?’
‘तुम बी.एस.सी. में पढ़ते हो?’
‘हां।’
‘क्या बनना चाहते हो?’
‘पता नहीं।’ वह बोला, ‘कोई नौकरी करना चाहता हूं। अगर ज़िंदा रहा।’
‘क्या मतलब?’
‘थाने वाले बोले हैं कि मेरा इनकाउंटर भी हो सकता है।’
‘तुम तो यार गले तक भरे हुए हो?’
‘तो क्या करूं?’
‘कम से कम मुझ से लड़ो तो नहीं।’ आनंद बोला, ‘मैं तुम्हारी मदद करना चाहता हूं और तुम हो कि हर बात का तिरछा जवाब दे रहे हो।’ आनंद ने उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘अगर मैं तुम्हारे  बारे में ठीक से नहीं जानूंगा तो तुम्हारी पैरवी, तुम्हारी सिफ़ारिश किसी से कैसे करूंगा?’
‘जैसे नेता लोग करते हैं।’ क़ासिम बेलाग हो कर बोला।
‘कैैसे करते हैं?’ आनंद उसे हैरत से देखते हुए बोला।
‘फ़ोन लगाते हैं और कहते हैं इसे छोड़ दो।’
‘कहां देखा, किस नेता को देखा?’
‘रियल में नहीं।’
‘फिर?’
‘फ़िल्मों में देखा है।’
‘ओह!’ इस खीझ में भी हंसी आ गई आनंद को। हंसी आ गई क़ासिम की इस मासूमियत पर। वह थोड़ी देर चुप रहा। फिर बोला, ‘तुम्हारे पास मोबाइल है?’
‘क्यों?’
‘वैसे ही पूछ रहा हूं।’
‘थाने वाले भी पूछ रहे थे।’ क़ासिम खिन्न हो कर बोला, ‘आतंकवादियों का मोबाइल पर बातचीत का रिकार्ड होता है, इसी लिए आप पूछ रहे हैं? अरे चाचा जी हमारे पास सही सलामत कपड़े तक हैं नहीं। मोबाइल कहां से होगा?’ वह ज़रा रुका, उठा और आनंद के दोनों पैर पकड़ कर बैठ गया रोते हुए बोला, ‘बचा लीजिए चाचा जी हम को। लगाइए फ़ोन। नहीं पुलिस वाले हमारा इनकाउंटर कर देंगे।’ वह जैसे पूरी ताक़त से रोते हुए चिल्लाया, ‘मैं आतंकवादी नहीं हूं।’ और उस ने अपना सिर उस के पैरों पर रख दिया।
‘उठो बेटा, उठो।’ आनंद ने उसे ढाढ़स बंधाया, ‘घबराओ नहीं क़ासिम उठो।’ उसे उठा कर फिर से कुर्सी पर बैठाया। फिर दुबारा पूछा, ‘मैं मानता हूं कि तुम आतंकवादी नहीं हो। पर बेटा कई बार अनजाने में भी आदमी इस्तेमाल हो जाता है इन के हाथों और उसे इस का पता नहीं चल पाता।’ वह बोला, ‘सो बेटा कम से कम मुझे सब कुछ विस्तार से बता दो ताकि तुम्हें बचाने की हर तरह से मुकम्मल तैयारी कर सकूं। नहीं अगर हमें पूरी जानकारी नहीं होगी और पुलिस या और लोग अचानक कोई बात बनाएंगे तो हम उस का क्या जवाब देंगे? और जो पूरी बात मालूम होगी तो उस का माकू़ल जवाब दे देंगे। बेटा मेरी बात समझो।’
‘बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगों पर हम कुछ दोस्त आपस में बात तो करते हैं। गुस्सा भी होते हैं, गांव में भी और कालेज में भी। पर जैसा कि आतंकवादी लोग करते हैं कोई तोड़ फोड़, विस्फोट वग़ैरह तो हमने कभी नहीं किया, कभी सोचा भी नहीं। न ही ऐसे किसी लोग के साथ हमारी दोस्ती है, न ही कभी मिलना जुलना।’
‘फिर ठीक है।’
‘तो चाचा जी पुलिस को फ़ोन लगाएंगे?’
‘किस लिए?’
‘कि हम को छोड़ दे!’
‘नहीं।’
‘क्यों?’
‘हम वैसे नेता नहीं हैं।’
‘फिर?’
‘कुछ नहीं। हम लोग फ़िल्म में काम नहीं कर रहे। यह ज़िंदगी है। और तुमने जैसा बताया है, अगर सब कुछ वैसा ही है तो तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा!’
सुखई चाचा भी तब तक इस कमरे में आ गए थे और पूछ रहे थे, ‘बाबा हमारा नाती बच जाएगा न?’
‘कोशिश तो यही है।’ आनंद यह कह कर किचेन में पत्नी के पास गया और बोला, ‘मैं आफ़िस जा रहा हूं। इन लोगों को ठीक से खाना वाना खिला देना।’
‘कब तक रहेंगे यह लोग यहां?’ पत्नी ने अफना कर पूछा।
‘यह तो मुझे भी नहीं पता।’ कह कर आनंद आफ़िस के लिए निकल गया।
आफ़िस आ कर उस ने कुछ रुटीन काम अपनाए। फिर सोचा कि कैसे क़ासिम को इस कठिनाई से निकाला जाए। उस ने लगातार इस बारे में सोचा। सोचा कि किसी राजनीतिक मित्र से इस बारे में मदद ली जाए। फिर ख़याल आया कि कहीं मामला सांप्रदायिकता में न रंग जाए। सो यह इरादा उस ने छोड़ दिया। क्यों कि गांव में तो हिंदू युवा वाहिनी पहले ही से इस काम में लगी थी। सो उस ने सोचा कि क्यों ने किसी सीनियर पुलिस अफसर से इस बारे में बात की जाए। दो एक पुलिस अफसरों के मोबाइल मिलाए भी उस ने पर वह स्विच आफ़ मिले। फिर सोचा कि क्यों इधर उधर वह भटक रहा है? क्यों न सीधे-सीधे प्रमुख सचिव गृह से मिल कर मामला निपटाया जाए। वह पहले से थोड़ा परिचित भी थे। उस के शहर में कभी डी.एम. भी रहे थे। सो उस ने सीधे उन्हीं को फ़ोन मिलाया और बताया कि एक व्यक्तिगत काम के लिए उन से आज ही मिलना चाहता है। वह बोले, ‘आज तो मीटिंग-सीटिंग बहुत हैं। ख़ैर, शाम पांच बजे रोज़ प्रेस ब्रीफिंग होती है, आज भी होगी। आप उसी समय आ जाइए।’
‘नहीं-नहीं, प्रेस के साथ नहीं। अकेले मिलना चाहता हूं।’
‘भले अकेले मिलिएगा। पर आ उसी समय जाइएगा।’
‘ठीक बात है।’
तय समय के मुताबिक़ शाम पांच बजे वह एनेक्सी पहुंच गया प्रमुख सचिव गृह से मिलने। प्रेस ब्रीफिंग में कुछ ख़ास था नहीं सो दस मिनट में रुटीन की तरह चाय-बिस्किट में ख़त्म हो गई। प्रेस के लोग जब चले गए तो उस ने प्रमुख सचिव गृह से सुखई चाचा के नाती क़ासिम के बारे में तफ़सील से बताया। यह भी बताया कि इस परिवार को चूंकि वह बचपन से जानता है, सो कुछ भी इफ़-बट होने पर वह इस की पूरी ज़िम्मेदारी लेता है। पर प्रमुख सचिव ने कहा कि बिना मामले की जांच करवाए वह कुछ नहीं कह सकते। और कि मामला चूंकि आज़मगढ़ से लिंक हो गया है इस लिए वह भी अपने को इस मामले से अलग कर ले।
‘क्या बात कर रहे हैं आप?’
‘मैं क़ानूनी रूप से जो ठीक लग रहा है, वही कह रहा हूं।’ प्रमुख सचिव ज़रा रुके और बोले, ‘मैं समझता हूं आप साफ़ ख़यालों वाले समाजवादी हैं, सूडो सेक्यूलरिस्ट नहीं।’
‘आप तो अपनी जांच रिपोर्ट आए बिना ही उस मासूम लड़के को दोषी सिद्ध कर दे रहे हैं।’
‘मैं ने कब कहा कि वह दोषी है अथवा नहीं है।’
‘आप की बात से बू तो यही आ रही है।’ आनंद बोला।
‘बिलकुल नहीं आप ने डिटेल दे दी है मैं इस की दो चार रोज़ में जांच करवा कर बताता हूं।’
‘लोकल पुलिस जांच करेगी और उस ने उसे दोषी मान रखा है, बिना किसी सुबूत के।’
‘लोकल पुलिस नहीं एटीएस से जांच करवाता हूं। और जो लोकल पुलिस दोषी हुई तो उसे दंडित किया जाएगा।’
‘तो ठीक है। वह लड़का अभी मेरे घर पर है। अगर आप की जांच कहती है कि वह दोषी है तो मैं ख़ुद आप की एटीएस को सौंप दूंगा। और जो दोषी नहीं है तो उस का इनकाउंटर नहीं होगा इस की गारंटी आप लीजिए!’
‘बिलकुल!’ प्रमुख सचिव गृह ने कहा, ‘क़ानून को अपना काम करने दीजिए!’
‘यही तो मैं भी कह रहा हूं।’
‘पर हां, चूंकि आप मेरे जानने वाले हैं इस लिए बिन मांगी एक राय देना चाहूंगा।’
‘क्या?’
‘उस लड़के को आप अपने घर से हटा दीजिए।’
‘क्या कह रहे हैं आप?’
‘ठीक कह रहा हूं।’ वह बोले, ‘आज कल बाप को नहीं पता पड़ पाता कि उस का बेटा गुंडा, मवाली या आतंकवादी हो गया है। आप तो फिर भी उस के गांव वाले हैं। और रहते भी लखनऊ में हैं, गांव में नहीं। कितना जान पाएंगे उस के बारे में।’ वह बोलते जा रहे थे, ‘फिर आप एक भावुक आदमी हैं। पूरे तथ्य आप के सामने हैं नहीं। सिर्फ़ उस की कही बातें और आप की उस परिवार से जुड़ी संवेदनाएं-भावनाएं हैं। और सिर्फ़ इसी बिना पर चीज़ें तय नहीं होतीं।’
‘पर वह बातचीत में तो पूरी तरह मासूम और निर्दोष दिखता है।’
‘इसी लिए तो!’ ये टेररिस्ट गैंग ऐसे ही मासूम और निर्दोष लोगों को गुजरात और अयोध्या इशू की फ़ीलिंग्स की अफ़ीम में बहका कर अपना कैरियर बना ले रहे हैं, अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। जिहादी बना रहे हैं और ये मासूम बच्चे कुछ समझ ही नहीं पाते। उन का औज़ार बन जाते हैं। दस-बीस को मार कर ख़ुद मर जाते हैं, यह सोच कर कि यह ख़ुदा का काम है। और ख़ुदा का काम कर उन्हें जन्नत नसीब होगी। ऐसा ही उन्हें समझाया जाता है।’
‘यह सब तो ठीक है। पर अगर वह मेरे घर पर ही रह जाता है तो बुरा क्या है?’
‘अब इतने नादान तो आप नहीं हैं।’ प्रमुख सचिव बोले, ‘अगर ख़ुदा न ख़ास्ता उस के कहीं से लिंक जुड़ गए और आप के घर से उस की अरेस्ट होती है तो आप कहां के रहेंगे?’ वह बोले, ‘बदनामी नहीं होगी आप की?’
‘अब आप की पुलिस जबरिया उसे टेररिस्ट प्रूव कर ले तो और बात है पर वह टेररिस्ट है यह तो मानने को मैं तैयार नहीं हूं फ़िलहाल!’
‘चलिए यह आप जानिए!’
‘मैं फिर दुहरा रहा हूं और रिक्वेस्ट पूर्वक दुहरा रहा हूं कि उस का इनकाउंटर नहीं किया जाए। दूसरे अगर वह दोषी पाया जाता है तो मुझे बताइए मैं ख़ुद उसे पुलिस को सौंप दूंगा।’
‘ऐसी नौबत न ही आए तो अच्छा। पर एक बात तो आप जान ही लीजिए कि एटीएस को ज़रा भी सुबूत मिलेंगे उस के खि़लाफ़ तो वह मेरी और आप की बात बाद में सुनेंगे, फ़ौरन अरेस्ट करेंगे।’
‘चलिए ठीक है।’ आनंद ने कहा, ‘जो भी कुछ हो मेरिट पर ही हो।’
‘बिलकुल।’ कह कर प्रमुख सचिव ने हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ बढ़ा दिया। आनंद ने हाथ मिलाते हुए कहा, ‘हां, मेरे घर छापा मत डलवा दीजिएगा।’
‘अरे नहीं!’
वह घर आ गया।
घर आ कर एक वकील मित्र से फ़ोन पर क़ासिम की बाबत क़ानूनी पक्ष जानना चाहा। साथ ही प्रमुख सचिव गृह से हुई पूरी बात तफ़सील से बताई। वकील ने छूटते ही कहा, ‘तो भइया पहले तो उस लड़के को अपने घर से फ़ौरन से पेश्तर हटाइए।’
‘क्यों?’
‘आप को होम सेक्रेट्री को यह तो बताना ही नहीं था कि वह आप के घर है। दूसरे, इस बारे में पहले मुझ से ही बात करनी थी फिर कहीं जाना था।’
‘अब तो जो हुआ सो हुआ। आगे बताइए।’
‘बताना क्या है। हाई कोर्ट में एक रिट फ़ाइल कर देते हैं कि पुलिस फ़र्जी ढंग से फंसा रही है और इनकाउंटर की धमकी दे रही है।’
‘फिर?’
‘फिर क्या? पुलिस के हाथ पांव बंध जाएंगे। अगर वह निर्दोष होगा तो पुलिस परेशान नहीं करेगी वरना वह जेल जाएगा। का़नून अपना काम करेगा।’
‘अरे भाई, आप तो क्लाइंट बनाने में लग गए। उन सब के पास हाई कोर्ट में मुक़दमा लड़ने भर का पैसा नहीं है। और न ही मैं इस समय इतना पैसा ख़र्च करने की स्थिति में हूं।’
‘अब या तो उस की जान बचा लीजिए या पैसा। यह आप को ही तय करना है। पर हां, उसे अपने घर से हटा तो दीजिए ही अगर अपनी इज्ज़त प्यारी है।’
‘घर से हटा कर कहां रखूं?’
‘अरे किसी सस्ते मंदे होटल, धर्मशाला या फिर फु़टपाथ पर ही सुला दीजिए। पर अपने घर तो हरगिज़ नहीं। क्यों कि मौक़ा आने पर ये पुलिस वाले किसी के नहीं होते। आप को भी घसीट लेंगे तो आप क्या कर लेंगे?’
‘चलिए देखता हूं।’
‘क्या?’
‘यही कि क्या कर सकता हूं?’
‘ठीक। जैसा हो बताइएगा।’ कह कर वकील ने फ़ोन काट दिया।
आनंद बड़े असमंजस में पड़ गया। एक तरफ़ संभावित मुश्किलें थीं दूसरी तरफ़ सुखई चाचा से जुड़ी भावनाएं थीं, उन का उस पर अगाध विश्वास था। न तो वह उन का विश्वास तोड़ना चाहता था न ही आपनी भावनाओं को छलना चाहता था।
इस मुश्किल में उस ने मुनव्वर भाई को फ़ोन किया। क़ासिम की कहानी बताई, प्रमुख सचिव गृह और वकील से हुई बातचीत का ब्यौरा बताया और अपनी मुश्किल भी। मुनव्वर भाई ने साफ़ कहा कि, ‘आनंद जी अगर आप को यक़ीन है कि वह आतंकवादी नहीं है तो अपने घर पर ही रखिए और जो ज़रा भी शक-शुबहा हो तो हाथ जोड़ लीजिए।’
‘नहीं मुझे तो ज़रा भी शक-शुबहा नहीं है।’
‘तो फिर आप जैसा आदमी इतना क्यों डर रहा है?’
‘डर नहीं रहा हूं, रास्ता ढूंढ रहा हूं कि कैसे क़ासिम को आतंकवाद के बिच्छू से डंसने से बचाऊं?’
‘वक़्त पर छोड़ दीजिए।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘कुछ बातें वक़्त अपने आप तय कर देता है।’
‘ठीक बात है।’ कह कर उस ने फ़ोन रख दिया।
सुखई चाचा से फिर बात की। उन को ढाढस बंधाया। और कहा कि अब दो तीन दिन में कुछ बता पाऊंगा।
‘अब का बताऊं बाबा आप ही हमारे मीर मालिक हैं।’ सुखई चाचा हाथ जोड़ कर बोले।
‘मीर मालिक तो वह ऊपर वाला है।’ आनंद ने कहा और तैयार हो कर एक शादी में शरीक होने चला गया। सपत्नीक।
दूसरी शाम उस ने प्रमुख सचिव गृह से फ़ोन पर पूछा कि, ‘कुछ फ़ीड बैक मिला क्या?’
‘अभी तो नहीं।’
आनंद ने निश्चिंतता की सांस ली। उस ने मान लिया कि अगर क़ासिम आतंकवादी होता या आतंकवादियों से उस के कोई लिंक होते तो एटीएस चौबीस घंटे क्या चार घंटे में ही उसे अरेस्ट कर लेती। पर जब ऐसा था नहीं तो एटीएस ऐसा करती भी तो कैसे भला?
दो दिन बाद अंततः प्रमुख सचिव गृह ने आनंद को बता दिया कि क़ासिम के खि़लाफ़़ एटीएस को कुछ भी हाथ नहीं लगा है। पर साथ ही यह भी कहा कि किसी ऐसे वैसे या किसी आज़मगढ़ी कनेक्शन से वह बाज़ आए। नहीं आगे दिक़्क़त हो सकती है।
आनंद ने यह बात सुखई चाचा और क़ासिम को बताई। कहा कि निश्चिंत होकर वह दोनों वापस जाएं। फिर सुखई चाचा से कहा कि, ‘एक तो गांव में किसी भी से यह न बताएं कि वह मेरे पास आए थे और कि क़ासिम बच गया है। दूसरे क़ासिम को दो-एक साल के लिए गांव से दूर रखें। नहीं हो सकता है कि मुंह की खाने के बाद गांव के शरारती तत्व या हिंदू युवा वाहिनी से जुड़े लोग उसे किसी दूसरे मामले में फंसाने की कोशिश करें। सो गांव से कुछ दिन दूरी बना कर रखने में कोई हर्ज नहीं है।’
क़ासिम थोड़ा अकबकाया कि, ‘काहे अपनी ज़मीन, अपना घर, अपना गांव छोड़ दें?’ पर सुखई चाचा समझदार और अनुभवी थे। वह मान गए। आनंद ने भी क़ासिम को समझाया और कहा कि, ‘कोई पूरे घर को तो गांव छोड़ने को कह नहीं रहा। सिर्फ़ तुम्हीं कुछ दिन शहर में रह जाओ। कोई दिक्क़त हो तो बताओ मैं तुम्हारे रहने आदि का बंदोबस्त शहर में करवा दूं?’
मान गया क़ासिम भी।
उस ने मुनव्वर भाई को फ़ोन कर बताया पूरा मामला और कहा कि, ‘आप का पता और फ़ोन नंबर दे दिया है। कोई बात होगी तो वह आप से कांटेक्ट करेगा। आप देख लीजिएगा।’
‘बिलकुल-बिलकुल।’ मुनव्वर भाई ने कहा, ‘वैसे भी आप उस को ठीक से समझा दीजिएगा। इस लिए भी कि अगर आप के गांव में हिंदू युवा वाहिनी के बिच्छू हैं तो शहर में मंदिर के महंत और उस के नाग हैं। और महंत जी की मुस्लिम विरोधी राजनीति से आप वाक़िफ़ ही हैं। हम लोग आज कल कैसे जी रहे हैं, हमीं जानते हैं। फ़ासीवाद की इंतिहा है यहां इस शहर में।’
‘क्या कह रहे हैं आप?’
‘बिलकुल ठीक कह रहा हूं।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘यहां तो आलम यह है कि वो दोहा है न कि जाट कहे सुन जाटनी इसी गाम में रहना है, ऊंट बिलैया लै गई हां जी, हां जी कहना है।’
‘ऐसा?’
‘हां, भई, यहां कमोबेश सभी ने घुटने टेक रखे हैं। शासन प्रशासन सब ने।’ उन्हों ने जैसे जोड़ा, ‘और मैं ने भी। हालात बहुत ख़राब हैं।’
‘चलिए यह एक बड़ा मसला है। इस पर मिल कर बात करते हैं।’ कह कर आनंद ने फ़ोन काट दिया।
सुखई चाचा भी क़ासिम को ले कर रात की गाड़ी से चले गए।
बाद में पता चला कि वह थानेदार भी लाइन हाज़िर हो गया। गांव में खुसफुसाहट शुरू हो गई कि आखि़र कैसे हो गया यह सब। समाधान ब्लाक प्रमुख यादव ने किया कि, ‘वह आज़मगढ़ वाली पार्टी काफ़ी पैसे वाली है। सो कप्तान यानी एस.एस.पी. को पैसे दे कर दोनों लड़कों को बचाया है और थानेदार को लाइन हाज़िर करवाया है।’ उस ने बड़ी हेकड़ी से कहा कि, ‘आतंकवादियों के पास पैसे की कमी तो है नहीं। बहा दिया पानी की तरह।’

पानी को लेकर लखनऊ में एक सेमिनार में वह उपस्थित है। पर्यावरणविद हैं, अफ़सर हैं, समाजसेवी हैं, आयोजक हैं, आयोजक के कारिंदे हैं। लंच है, नाश्ता है, कवरेज के लिए प्रेस है। बस श्रोता नहीं हैं और लोगों की आंखों में पानी भी। फिर भी आनंद बता रहा है कि नदियों के पानी पर पहला हक़ समुद्र का है। ये नहरें, ये डैम, ये बिजली परियोजनाएं सभी पर्यावरण और पानी को नष्ट कर रही हैं। नदियों में मछलियां मर रही हैं। बताइए अब गंगा का पानी पी कर लोग मर रहे हैं। कछुवा, मगरमच्छ ग़ायब हो रहे हैं। कैसे पानी साफ़ हो? तिस पर फ़ैक्ट्रियों का कचरा, शहरों के नाले, सीवर। जली-अधजली लाशें। सारी पर्यावरण एजेंसियां, सरकारी मशीनरी सो रही है। लोग कहते हैं कि तीसरा विश्व युद्ध पानी को ले कर होगा। मैं कहता हूं हरगिज़ नहीं। अरे पानी होगा तब न इस के लिए युद्ध या विश्व युद्ध होगा? तो मसला पानी नहीं हमारी सोच है। हम अगर यह जानते हैं कि बच्चे को फ़लां स्कूल में भेजेंगे तो अच्छा पढ़ेगा। अगर फ़लां ट्रेन से फ़लां जगह जाएंगे तो जल्दी पहुंचेंगे। फ़लां से मिल लेंगे तो फ़लां काम जल्दी हो जाएगा। तो हम यह क्यों नहीं सोच पाते कि साफ़ पानी हमारे जीवन को सुंदर बनाएगा? जल ही जीवन है हम आखि़र कैसे भूल गए? अब तो एक व्यवसायी टुल्लू बेचता है और टुल्लू के विज्ञापन में बड़ा-बड़ा लिखता है कि पानी बचाइए! सेव वाटर! हद है आप टुल्लू भी चलाएंगे और पानी भी बचाएंगे? यह दोगलापन विज्ञापन में चले तो चले हमें अपने जीवन में आने से रोकना होगा। शहरों में भू-जल स्तर लगातार गिर रहा है। खेतों में डाली जा रही खाद हमारी फ़सलों को तो बीमार कर ही रही हैं, पानी को भी ज़हरीला बना रही है। शहरों में तो आप एक्वागार्ड छोड़ कर आर.ओ. लगा रहे हैं। बताइए अब एक्वागार्ड भी पानी को साफ़ नहीं कर पा रहा तो आप आर.ओ. लगा रहे हैं शहरों में। पर गांवों में? और शहरी गरीबों के यहां? वहां क्या करेंगे? वहां कैसे बचाएंगे लोगों की किडनी और लीवर? हमें सोचना होगा कि हम लोक कल्याणकारी राज्य में रह रहे हैं कि व्यवसायी राज्य में? यह एक साथ आबकारी विभाग और मद्य निषेध विभाग क्यों चल रहे हैं? चोर से कहो चोरी करो और सिपाही से कहो पकड़ो! यह खेल कब तक चलेगा? क्या यह लोक कल्याणकारी राज्य है? गांधी का चश्मा, घड़ी, चप्पल, कटोरी जैसी चीजें नीलाम होती हैं और अख़बारों में ख़बर छपती है कि विजय माल्या ने बचा ली देश की लाज! यह क्या है? गांधी को कभी मुन्ना भाई के भरोसे हम छोड़ देते हैं कभी शराब सम्राट विजय माल्या के भरोसे? गांधी क्या इतनी गिरी और बिकाऊ वस्तु हो गए हैं? आप सभी को याद होगा कुछ बरस पहले तालिबानियों ने जेहाद के नाम पर अफ़गानिस्तान में बुद्ध की विशाल प्रतिमा डायनामाइट लगा कर तोड़ डाली थी क्रमशः। पूरी दुनिया ने गुहार की, निंदा की तालिबानों और अफ़गानिस्तान से। पर उन्हों ने किसी की नहीं मानी। चीन जो अपने को बौद्धिस्ट मानता है और दुनिया का महाबली भी, वह भी इस पूरे मामले की सिर्फ़ निंदा कर के रह गया।

थाईलैंड, अमरीका, भारत आदि सभी निंदा कर के रह गए। लड़े नहीं। प्रतिहिंसा नहीं की। तो यह बुद्ध की जीत थी, उन की अहिंसा की जीत थी। विजय माल्या भी गांधी की यह प्रतीकात्मक चीजें न ख़रीदते तो अच्छा होता। गांधी बाज़ारवाद के खि़लाफ़ थे। गांधी को बाज़ार के हवाले कर दिया हम लोगों ने। हम हार गए, यह गांधी की हार है। तो आदरणीय मित्रो हमें अपने पानी को भी बाज़ार से निकालना होगा। ठीक वैसे ही जैसे आज की राजनीति और बाज़ार ने हमारी लोकशाही को खा लिया है। संवैधानिक संस्थाएं धूल चाटती नष्ट हो रही हैं। खरबपतियों की गिनती नौ से बढ़ कर छप्पन हो गई है और नब्बे करोड़ लोगों की कमाई बीस रुपए रोज़ की भी नहीं रह गई है। महात्मा गांधी कहते थे कि हम हर गांव का आंसू पोछेंगे। क्या ऐसे ही? हम पानी से हर चीज़ को बदलने की शुरुआत क्यों न करें? पानी जो बाज़ार के चंगुल से हम नहीं निकाल पाएंगे तो हम समूची मानवता को लगातार ज़हरीले पानी के हवाले कर दुनिया को नष्ट कर डालेंगे। लोग अब साफ़ पानी नहीं पाते तो कोक पीते हैं। यह कोक भी सोख रहा है पानी को। चेतिए। पिघलते ग्लेशियर को ग्लीसरीनी आंसुओं से धोने के बजाय हिमालयी कोशिश करनी होगी। बचाना होगा हिमालय, प्रकृति और पानी, तभी हम बचेंगे!
सेमिनार का लंच हो गया है और चर्चा चल रही है गांवों में आ गए बाघ की जो अब आदमख़ोर होता जा रहा है। चर्चा इस पर भी है कि मंत्री जी भी बाघ खोज रहे हैं। आनंद कहता है यही तो दुविधा है कि मंत्री शिकारी का काम कर अख़बारों में फ़ोटो छपवा रहे हैं। अब मंत्री शिकारी तो हैं नहीं कि बाघ पकड़ लेंगे? शिकारी का काम मंत्री करेंगे तो मंत्री का काम कौन करेगा? लोग अपना-अपना काम भूलते जा रहे हैं। मंत्री जी को तो यह सोचना चाहिए कि जंगलों की कटान वह कैसे रोक सकते हैं ताकि बाघ जंगल छोड़ कर मैदान में न आएं। पर नहीं आप हिरन मार कर खाएंगे तो बाघ आप को नहीं तो किस को खाएगा?
‘भाई साहब यह दुविधा तो आप के साथ भी है।’ आनंद का कंधा पकड़ कर एक आदमी कहता है।
‘माफ़ कीजिए मैं ने आप को पहचाना नहीं।’ आनंद अचकचा गया।
‘कैसे पहचानेंगे आप?’ वह बोला, ‘आप वक्ता हैं, मैं श्रोता हूं।’
‘नहीं-नहीं यह बात नहीं है।’
‘आप शायद भूल रहे हैं, मैं आप का वोटर रहा हूं।’
‘क्या बात कर रहे हैं?’ आनंद बोला, ‘आप किसी और को ढूंढ रहे हैं। मैं और चुनाव? नहीं-नहीं।’
‘अरे आप आनंद जी हैं आप हमारी यूनिवर्सिटी में.........’
‘अच्छा-अच्छा छात्र संघ के चुनाव की बात कर रहे हैं आप!’ आनंद सकुचाया, ‘वह तो बीते ज़माने की बात हो गई। बाई द वे आप लखनऊ मंे ही रहते हैं?’
‘हां।’ वह बोला, ‘यहीं सचिवालय में डिप्टी सेक्रेट्री हूं।’
‘अच्छा अच्छा!’
‘आप को नहीं लगता कि आप भी दुविधा में जी रहे हैं? अंतर्विरोध में जी रहे हैं?’
‘ऐसा लगता है आप को?’
‘हां।’
‘कैसे?’
‘आप को लोकसभा या विधानसभा में होना चाहिए था। चुनावी सभाओं में होना चाहिए था। पर आप हैं कि सेमिनारों में जिं़दगी ज़ाया कर रहे हैं। यह आप की दुविधा और आप का अंतर्विरोध नहीं है तो क्या है?’
‘अरे आप तो ऐसे कह रहे हैं कि जैसे कोई अपराध कर रहा हूं मैं?’
‘जी बिलकुल!’
‘आप को लगता है कि आज की राजनीति में मैं कहीं फ़िट हो सकता हूं?’
‘एक समय आप ही कहा करते थे कि राजनीति में पढ़े लिखे लोगों को आना चाहिए।’
‘अरे वह सब बातें तो अब किताबी बातें हो गई हैं।’ आनंद बोला, ‘अब हमारे जैसे लोग जी ले रहे हैं इस समाज में यही बहुत है।’
‘तो मैं मान लूं कि मैं अब एक पराजित आनंद से मिल रहा हूं।’
‘इस में भी कोई संदेह बाक़ी रह गया है क्या?’ आनंद ने धीरे से कहा।
‘आप ने तो आज निराश कर दिया?’
‘कैसे?’ आनंद ने प्रति प्रश्न किया, ‘आप अपने को पढ़ा लिखा मानते हैं?’
‘हां, मानता तो हूं।’ वह व्यक्ति बोला।
‘और आप यह भी चाहते हैं कि पढ़े लिखे लोग राजनीति में रहें।’
‘हां।’
‘तो अपनी नौकरी छोड़ कर क्यों नहीं आ जाते राजनीति में?’
‘राजनीति मेरा कैरियर नहीं है। न कभी की राजनीति। तो अब कैसे राजनीति कर सकता हूं?’
‘क्यों ये अतीक़ अहमद, मुख़्तार अंसारी, डी.पी. यादव, हरिशंकर तिवारी, तसलीमुद्दीन, पप्पू यादव, शहाबुद्दीन, अमरमणि त्रिपाठी जैसों ने तो कभी यह सवाल नहीं पूछा, बबलू श्रीवास्तव और गावली जैसों ने नहीं पूछा कि कभी राजनीति नहीं की, कैसे करूं?’
वह चुप रहा।
‘अपनी बीवी के साथ सोने के पहले किसी और औरत के साथ सोए थे कभी। ली थी कभी सेक्स की ट्रेनिंग?’
‘नहीं तो!’ आनंद के ऐसे सवालों से वह अचकचा गया।
‘तो फिर?’ आनंद बोला, ‘राजनीति आप क्यों नहीं कर सकते?’
‘नहीं कर सकता।’
‘तो मित्र यही बात मैं कह रहा हूं तो आप को पराजित आनंद मुझ में दिखाई दे रहा है।’ वह बोला, ‘सच यही है कि हम सभी पराजित हैं।’
‘नहीं मैं पराजित नहीं हूं।’ वह व्यक्ति बोला, ‘बस पारिवारिक ज़िम्मेदारियां ख़त्म हो जाएं। बच्चे पढ़ लिख लें, शादी ब्याह हो जाए तो सोचता हूं।’
‘यह भी जोड़िए न कि ज़रा रिटायर हो जाऊं, पी.एफ़, ग्रेच्युटी और पेंशन हो जाए तब सोचता हूं।’
‘हां-हां, यह भी।’
‘तब आप राजनीति के लायक़ बचेंगे भी?’ आनंद बोला, ‘बचेंगे भी तो राजनीति पर बतियाने और नाक भों सिकोड़ने के लिए ही।’
सेमिनार का दूसरा सत्र शुरू होने का समय हो गया। सो आनंद ने उन सज्जन का नाम, पता, नंबर लिया, अपना पता, नंबर दिया और कहा कि, ‘मेरी बात का बुरा मत मानिएगा हम लोग फिर मिलेंगे-बतियाएंगे।’ उस ने जैसे जोड़ा, ‘दरअसल ज़िम्मेदारियों और सुविधाओं में जीने की आदत आदमी को नपुंसक बना देती है। और कायर भी।’
‘बिन पानी सब सून’ की अनंत कथा फिर शुरू हो जाती है। बीच पानी की कथा में उसे प्यास लग जाती है। वह पानी पीने के लिए उठ कर बाहर आ जाता है। और देखता है कि भीतर हाल से अपेक्षाकृत ज़्यादा लोग बाहर हैं। यह तो खै़र हर सेमिनार में वह पाता रहा है कि भीतर एक सेमिनार चल रहा होता है और बाहर कई-कई।
पानी पीते समय वह सोचता है आखि़र वह इस तरह क्यों पराजित हो गया है? क्या यह सत्ता की प्यास की पराजय है? वह ख़ुद से ही पूछता है। या ज़िम्मेदारियों और सुविधाओं में जीने की आदत ने उसे भी नपुंसक बना दिया है? वह राजनीति में सर्वाइव नहीं कर पाया और पीछे रह गया? या फिर उस में राजनीति के जर्म्स नहीं थे सिर्फ़ बोलने के जर्म्स थे सो वह सेमिनारी वक्ता बन कर रह गया। राजनीति में भी होता तो शायद पार्टी का प्रवक्ता बन कर रहता या थिंक टैंक हो जाता किसी बरगदी नेता का? राजनीतिक माफ़िया तत्व उस में कभी थे ही नहीं। उसे जब भी सूझा विचारक तत्व ही सूझा। और इस विचारहीन राजनीति के दौर में वह पराजित नहीं होगा तो कौन होगा। उस का सिर चौखट से नहीं टकराएगा तो क्या मुलायम, मायावती, सोनिया, आडवाणी, मोदी और राहुल का टकराएगा?
बताइए क्या रंग हो गया है राजनीति का? विद्यार्थी जीवन के समय का एक फ़िल्मी गाना उसे याद आ गया है- पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, जिस में मिला दो लगे उस जैसा! अब तो राजनीति ही नहीं पानी भी बदरंग हो चला है। कैसे और किस में मिलाया जाए जो राजनीति भी साफ़ हो और पानी भी। क्या पानी और राजनीति का भी कोई आपसी रिश्ता है? साफ़-साफ़ होने का और फिर बदरंग-बदरंग होने का?
ज़रूर होगा।
वह फिर से आ कर हाल में बैठ गया है। एक साइंटिस्ट पानी में प्रदूषण के आंकड़ों की फ़ेहरिस्त परोस रहे हैं जो बहुत ही भयावह तसवीर पेश कर रही है। वह डर जाता है। डर जाता है और पूछता है अपने आप से कि क्या राजनीति में भी प्रदूषण के आंकड़े कोई समाजिक या राजनीतिक विज्ञानी बटोर रहा होगा? जल प्रदूषण मापने के लिए तो वैज्ञानिकों के पास निश्चित विधि और साज़ो सामान हैं। पर राजनीतिक प्रदूषण मापने के लिए कोई वैज्ञानिक तरीक़ा है क्या हमारे पास?
नहीं है।
यह सोच कर ही वह माथा पीट लेता है।

यह कौन सी प्यास है? भीष्म पितामह वाली तो नहीं है। सिगरेट के धुएं, डोसे की तीखी गंध और काफ़ी के गर्म भाप की तासीर में आज काफ़ी हाउस में कुछ समाजवादी इकट्ठे हो गए हैं। आनंद का एक पत्रकार मित्र सुजीत उस से धीरे से कहता है कि, ‘आज तो हम भी मेढ़क तौलने का मज़ा लेंगे!’
‘क्या मतलब?’
‘अरे, जहां चार-छह-दस समाजवादी इकट्ठे हो जाएं वहां उन को किसी बिंदु पर एक कर लेना तराज़ू में मेढक तौलना ही तो है। एक मानेगा, दूसरा उछलेगा, तीसरा मानेगा, चौथा मानेगा पांचवां उछल जाएगा। कभी कोई दसो मेढक एक साथ नहीं तौल पाएगा।’
‘तो तुम हम सब को मेढक समझते हो?’ आनंद किंचित मुसकुरा कर पूछता है और सिगरेट का धुआं फिर धीरे-धीरे छोड़ता है।
‘मेढ़क?’ वह पलटते हुए कहता है यह तो मैं ने नहीं कहा। और हंसने लगता है? और कहता है, ‘छोड़िए भी। अभी मैं कहीं पढ़ रहा था कि राम मनोहर लेाहिया ने कहीं लिखा है भारत के तीन स्वप्न हैं; राम, कृष्ण और शिव!’
‘हां, लिखा तो है!’
‘पर आज के समाजवादी मुलायम सिंह यादव के तो लगता है तीन स्वप्न हैं; सत्ता, पैसा और औरत।’
‘ना।’ एक दूसरे समाजवादी ने हस्तक्षेप किया, ‘मुलायम सिंह यादव के तीन नहीं चार स्वप्न हैं; सत्ता, पैसा, औरत और अमर सिंह।’
‘फिर अमिताभ बच्चन को क्यों छोड़ दे रहे हो भाई!’ राय साहब जो नियमित काफ़ी हाउस का सेवन करते हैं सिगरेट फूंकते हुए बोले।
‘ऐसे तो फिर कई स्वप्न उन के जुड़ते जाएंगे।’ वर्मा जी जो कभी मुलायम सिंह के बहुत क़रीबी होने का दावा करते फिरते थे बोले।
‘अरे यार बात लोहिया जी की कर रहे थे वही करो। कहां राजनीतिक व्यवसायियों की बात ले बैठे।’ मधुसूदन जी भनभनाए। मधुसूदन जी सुलझे हुए लोगों में से जाने जाते हैं और बहुत कम बोलते हैं। अनावश्यक तो हरगिज़ नहीं। वैसे भी वह बोलने के लिए नहीं सुनने के लिए जाने जाते हैं। अकसर उकताए हुए लोग, आजिज़ आए लोग उन के पास आ कर बैठ जाते हैं और जितनी भड़ास, जितना फ्रस्ट्रेशन उन के दिल में होता है मधुसूदन जी के पास जा कर दिल का गु़बार तो निकाल देते हैं और मधुसूदन जी उन गु़बारों को गु़ब्बारे की तरह उड़वा देते हैं। आदमी शांत हो जाता है। ऐसे जैसे कोई नटखट बच्चा सो जाता है, ठीक वैसी ही शांति! निर्मल शांति। और आज मधुसूदन जी ऐसी बात पर सिर्फ़ ऐतराज़ नहीं जता रहे, एक शेर भी सुना रहे हैं; ‘रंग-बिरंगे सांप हमारी दिल्ली में/क्या कर लेंगे आप हमारी दिल्ली में।’
‘क्या बात है मधुसूदन जी! आज तो आप ने कमाल कर दिया।’ आनंद बोला।
‘कमाल मैं नहीं, आप लोग कर रहे हैं। फ़ालतू लोगों के बारे में बात कर के क्यों समय नष्ट कर रहे हैं?’
‘मधुसूदन जी हम लोग अपनी राजनीति और अपने समाज की व्याधियों-बीमारियों के बारे में अब बात भी नहीं कर सकते?’ वर्मा जी ने पूछा।
‘किस-किस बीमारी के बारे में बात करेंगे आप लोग?’ मधुसूदन जी जैसे फटे पड़े जा रहे थे, ‘पाखंडी, नक़ली और भ्रष्ट जब हमारा समूचा समाज ही हो चला हो तो किस-किस बीमारी के बारे में बात करेंगे? बीमारी के बारे में बात करने से पूरा माहौल बीमार हो जाता है। मत कीजिए!’
‘तो क्या अगर हमारे हाथ में कोढ़ हो गया है तो उसे कपड़े से ढंक देने से वह ठीक हो जाएगा?’ वर्मा जी ने मधुसूदन जी को लगभग घेर लिया।
‘नहीं ठीक होगा। पर सिर्फ़ कोढ़ है, कोढ़ है कहने से भी ठीक नहीं होगा।’ मधुसूदन जी बोले, ‘दवा देनी होगी।’
‘तो मधुसूदन जी, हम लोग यही कर रहे हैं। बीमारी का ब्यौरा बटोरने के बाद ही तो दवा तजवीज़ करेंगे?’
‘यहां काफ़ी हाउस में बैठ कर?’ मधुसूदन जी ने तरेरा सभी को, ‘कि ड्राइंगरूम में बैठ कर या सेमिनारों में बोल कर? क्यों आनंद जी?’
आनंद चुप रहा। समझ गया कि मधुसूदन जी आज कहीं गहरे आहत हैं। वरना वह आज यूं न बोलते। शेर नहीं सुनाते रंग बिरंगे सांप हमारी दिल्ली में/क्या कर लेंगे आप हमारी दिल्ली में। आनंद ने ग़ौर किया कि वह ही नहीं मधुसूदन जी के तंज़ पर सभी के सभी चुप हैं। पर मधुसूदन जी चुप नहीं थे, ‘अरे जाइए आप लोग जनता के बीच। यह कहने से काम नहीं चलेगा कि राजनीति पर अब अपराधियों और भ्रष्ट लोगों का क़ब्ज़ा है सो हम लोग दुबके पड़े हैं। यह हिप्पोक्रेसी बंद कीजिए आप लोग।’ वह बोलते जा रहे थे, ‘बताइए भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट्स तक लाइन से रिटायर हो कर राजनीति में दाखि़ला ले रहे हैं, चुनाव लड़ रहे हैं। और आप लोग हैं कि काफ़ी हाउस में बैठ कर चोर-सिपाही खेल रहे हैं। अरे जाइए जनता में बताइए इन सब की करतूत।’
‘क्या बताएं मधुसूदन जी?’ बड़ी देर से चुप बैठे वर्मा जी बोले, ‘कि जिस संचय के खि़लाफ़ थे लोहिया जी, उन्हीं का अनुयायी अब खरबपति बन कर सी.बी.आई. जांच फेस कर रहा है। और सी.बी.आई. कहीं लटका न दे इस लिए गै़र कांग्रेसवाद का नारा भूल कर सारे अपमान पी कर कांग्रेस के आगे घुटने टेके हुए है। भीख मांग रहा है। एक दल्ले अमर सिंह के फंदे में फंस कर फ़िल्मी हीरो हीरोइनों को चुनाव लड़वा रहा है, सारे समाजवादियों को पार्टी से बाहर धकेल चुका है? ख़ुद भी कभी हिस्ट्रशीटर था, सारे गवाहों, पक्षकारों को मरवा कर अब पोलिटिकल हो गया है। पिछड़ों को एक करने के नाम पर बाबरी मस्जिद गिराने वालों को अपने बगल में बिठा कर घूम रहा है। अमरीका परस्त हो चला है?’
‘बिलकुल!’ मधुसूदन जी ने बड़े ठसके से कहा।
‘अरे मधुसूदन जी निरे बबुआ हैं आप?’ वर्मा जी बोले, ‘अभी जितनी और जो बातें मैं ने आप से कहीं क्या कोई नई बात कही क्या? हम आप यह सब जानते हैं और आप समझते हैं कि आप की यह महान जनता कुछ नहीं जानती?’
अब मधुसूदन जी चुप थे।
‘अरे जनता सब जानती है।’ वर्मा जी चालू थे, ‘ये मोटी खाल वाले सिर्फ़ तमाम पार्टियों के नेता भर नहीं हैं। यह जो हमारी महान जनता जो है न उस की खाल इन नेताओं से भी ज़्यादा मोटी है। जानती वह सब है फिर भी इन्हीं भ्रष्ट और गुंडों को वोट दे कर विधानसभा और लोकसभा भेजती है। और नतीजे में हम आप शेर सुनाते हैं-रंग-बिरंगे सांप हमारी दिल्ली में/क्या कर लेंगे आप हमारी दिल्ली मंे। यह रंग-बिरंगे सांप हमारी जनता ही पालती पोसती है। और दोष मढ़ती रहती है दूसरों पर।’
‘अच्छा राजनीति छोड़िए। सिनेमा पर आइए। एक से एक बे सिर पैर की कहानियां, चार सौ बीसी से भरे डिटेल्स वाली फ़िल्में सुपर-डुपर हुई जा रही हैं तो अपनी इसी महान जनता की ही तो बदौलत!’ वर्मा जी अब पूरा नहा-धो कर मधुसूदन जी पर पिल पड़े थे, ‘फ़िल्में भी छोड़िए इलेक्ट्रानिक चैनलों पर आइए। अवैध संबंधों और बे सिर पैर की कामेडी से भरे सीरियलों की कहानियां साल भर बाद भी वहीं की वहीं खड़ी मिलती हैं और हमारी महान जनता उन्हें देख-देख उन की टी.आर.पी. बढ़ाती रहती है। न्यूज़ चैनलों की तो महिमा और बड़ी है। न्यूज़ नहीं है, उन के यहां बाक़ी सब है। भूत प्रेत है, अपराध है, सीरियलों के झगड़े हैं और दिन रात चलने वाली चार ख़बरों का न्यूज़ ब्रेक है। तो यह सब किस की बदौलत है?’ वर्मा जी बोले, ‘हमारी महान जनता की बदौलत है मधुसूदन जी!’
‘क्या तभी से मधुसूदन जी, मधुसूदन जी लगा रखा है वर्मा जी। अब इस में बेचारे ये क्या करें?’ राय साहब बोले।
मधुसूदन जी कुछ बोले नहीं। चुपचाप उठे और काफ़ी हाउस से जाने लगे।
‘कोई रोको भी उन्हें।’ आनंद खुसफुसाया।
पर किसी ने उन्हें रोका नहीं। वह चले गए।
‘तो बात मीडिया की हो रही थी।’ वर्मा जी पत्रकार सुजीत की ओर मुख़ातिब थे, ‘और तुम चुप थे?’
‘तो क्या करता?’
‘मीडिया का बचाव करते।’
‘क्या ख़ाक करता।’ सुजीत भन्नाया, ‘मीडिया को तो जितना भी कोसा जाए कम है।’
‘क्या?’ राय साहब ने जैसे मुंह बा दिया।
‘हां राय साहब!’ सुजीत बोला, ‘मीडिया अब मीडिया नहीं, एक डिपार्टमेंटल स्टोर है, जाइए जो चाहिए ख़रीद लीजिए।’
‘मतलब?’
‘यह जो तमाम तांत्रिक, ज्योतिषी चैनलों पर आ रहे हैं, आप क्या समझते हैं यह सब सचमुच अपने सबजेक्ट के एक्सपर्ट हैं?’
‘हां तो?’
‘कोई एक्सपर्ट-वोक्सपर्ट नहीं हैं। सब टाइम और स्लाट ख़रीदते हैं चैनल वालों से। वह चाहे किसी धार्मिक चैनल पर हों या न्यूज़ चैनल पर। अपने ख़र्चे से पूरा प्रोग्राम शूट करते हैं, चैनल वालों से टाइम बुक करते हैं। वह चाहे कोई बापू हो, कोई स्वामी हों, कोई तांत्रिक या कोई ज्योतिषी।’
‘यह क्या हो रहा है मीडिया में?’ वर्मा जी खदबदाए।
‘यही नहीं आज कल तो तमाम नेता, अभिनेता, खिलाड़ी अपना इंटरव्यू करवाने या अपनी फ़ोटो वाली फ़ुटेज दिखाने के लिए भरपूर पैसा ख़रचते हैं।’
‘मतलब सब कुछ प्रायोजित!’ राय साहब ने फिर मुंह बा दिया।
‘जी हां, प्रायोजित!’ सुजीत बोला, ‘आज कल की सेलीब्रेटी आखि़र कौन है? अमिताभ बच्चन, शाहरुख, अमर सिंह, सचिन तेंदुलकर, राखी सावंत जैसे फ़िल्मी लोग या खिलाड़ी।’ सुजीत बोला, ‘‘आखिर यह सेलीब्रेटी हमारे चैनल ही तो गढ़ रहे हैं? पैसा ख़र्च कीजिए राय साहब आप अमर सिंह से बड़े नेता बन जाइए।’
‘क्या बात कर रहे हो?’ राय साहब बिदके, ‘अब यह दिन आ गया है कि मैं पैसा ख़र्च कर के नेता बनूंगा। अरे गांव जा कर खेती-बाड़ी कर लूंगा। मूत दूंगा ऐसी नेतागिरी पर!’
‘अरे राय साहब आप और आप जैसे लोग अगर ऐसे ही अड़े रहे तो लोग आप की राजनीति पर अभी छुप छुपा कर मूत रहे हैं, बाद में खुल्लमखुल्ला मूतने लगेंगे।’ सुजीत मुसकुराते हुए बोला, ‘सुधर जाइए राय साहब और अपने साथियों को भी सुधारिए।’
‘तो अब तुम हम को राजनीति का ककहरा सिखाओगे?’ राय साहब फिर बिदके।
‘हम नहीं ये चैनल सिखाएंगे।’
‘इन चैनलों से देश तो नहीं चल रहा?’
‘फ़िलहाल तो चल रहा है राय साहब!’ सुजीत बोला, ‘अच्छा आप अभिनव बिंद्रा को जानते हैं?’
‘क्यों?’
‘नहीं, जानते हैं कि नहीं?’
‘कौन है यह?’
‘देखिए मैं जानता हूं कि आप नहीं जानते होंगे। सुजीत बोला, ‘देश का गौरव है अभिनव बिंद्रा लेकिन चैनलों का गढ़ा सेलीब्रेटी नहीं है।’
‘बताओगे भी कि कौन है?’ राय साहब भनभनाए, ‘कि पहाड़ा ही पढ़ाते रहोगे?’
‘पिछले ओलंपिक में निशानेबाज़ी में गोल्ड मेडल लाया था।’ सुजीत बोला, ‘देश में पहला व्यक्ति जो गोल्ड मेडल ओलंपिक से लाया। लेकिन आप या बहुतायत लोग नहीं जानते क्यों कि चैनल वाले इस का खांसी ज़ुकाम नहीं दिखाते। क्यों कि यह सब दिखाने के लिए वह चैनलों को पैसा नहीं परोसता।’
‘तो बात यहां तक पहुंच गई है।’ वर्मा जी ने अंगड़ाई लेते हुए पूछा।
‘अच्छा आप यह बताइए कि एक अभिनेता अपने घर से नंगे पांव मंदिर जा रहा है, या नैनीताल अपने पुराने स्कूल जा रहा है या ऐसे ही कुछ और कर रहा है और चैनल वाले आधे-आधे घंटे का स्पेशल कार्यक्रम दिखाते हैं तो कैसे? क्या सपना देख कर? आप मंदिर जा रहे हैं कि स्कूल? भाई लोग मीडिया टीम अरंेज करते हैं, लाद के अमुक जगह तक ले जाते हैं, पैसा ख़र्च कर स्लाट ख़रीदते हैं, देख रही है जनता। क्यों कि आप यह दिखाना चाह रहे हैं। पर आप के बेटे की शादी होती है वह फु़टेज नहीं दिखाते चैनल वाले क्यों कि आप नहीं देते। पर चैनल वाले एक फ़िल्म की शादी वाली क्लिपिंग दिखा-दिखा कर अपने श्रद्धालु दर्शकों का पेट भरते हैं। हद है!’ सुजीत बोल रहा है, ‘क्या तो आप सदी के महानायक हैं। तो महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल क्या हैं? अच्छा अभिनेताओं वाले महानायक हैं? तो मोती लाल, अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद, संजीव कुमार जैसे लोग घास छीलते रहे हैं जो आप सदी के महानायक बन गए?’ सुजीत ऐसे बोल रहा था गोया प्रेशर कुकर की सीटी। सीटी न हो तो कुकर फट जाए। पर वह फट भी रहा था और बोल भी रहा था। वह बोल रहा था, ‘इस महानायक के खांसी जु़काम वाली ख़बरों सहित तमाम इंटरव्यू भी जब तब चैनलों पर आते ही रहते हैं। अच्छा महानायक और रेखा की कहानी कौन नहीं जानता? पर किसी चैनल वाले के पास रेखा से जुड़ा कोई प्रश्न नहीं होता। क्यों कि महानायक को यह पसंद नहीं। हालत यह है कि कवि पिता का निधन होता है तो चैनलों पर श्रद्धांजलि कोई कवि, आलोचक नहीं अमरीशपुरी, सुभाष घई जैसे लोग देते हैं। यह क्या है?’ कह कर सुजीत ज़रा देर के लिए रुका।
पूरी महफ़िल पर ख़ामोशी तारी थी।
‘तुम भड़ास डॉट कॉम पर क्यों नहीं जाते?’ आनंद ने सन्नाटा तोड़ते हुए सुजीत से कहा, ‘इस में तुम क्या नया बता रहे हो? अरे लोग रिएक्ट करना अब भूल गए हैं। कुछ कहते नहीं तो इस का मतलब यह तो नहीं ही है कि कोई कुछ जानता ही नहीं। ब्लॉगिए इस से ज़्यादा लिख रहे हैं। मीडिया के बारे में समाज के बारे में।’
‘नहीं आनंद ऐसा नहीं है।’ वर्मा जी बोले, ‘इन बातों को इस तरह हम लोग तो नहीं जानते। कम से कम इतनी बेपर्दगी के साथ।’
‘इस से बेहतर तो फिर प्रिंट मीडिया ही है।’ राय साहब बोले।
‘ख़ाक बढ़िया है।’ सुजीत फिर भड़का, ‘वहां भी ऐडवोटोरियल शुरू हो गया है।’
‘एडिटोरियल तो सुना है, ये ऐडवोटोरियल क्या बला है?’ आनंद ने पूछा।
‘क्यों यह किसी ब्लॉग या भड़ास डॉट कॉम पर नहीं है क्या?’ सुजीत ने पूछा।
‘अभी तक तो मेरी नज़र से नहीं गुज़रा।’
‘अरे भाई साहब, कोई पांच-छः साल से यह फ्रॉड चल रहा है।’ वह बोला, ‘आप अपने बारे में जिस अख़बार में चाहें उस अख़बार में मय तमाम फो़टो के जो चाहें बतौर राइट-अप छपवा सकते हैं पैसा दे कर। और उस पर विज्ञापन भी नहीं लिखा रहेगा। आप चाहें तो अपने को अकबर और अशोक का बाप लिखवा लीजिए। धर्मात्मा या ओबामा लिखवा लीजिए अपने आप को। चाहिए तो ओबामा के साथ अपनी फ़ोटो भी छपवा लीजिए। भले आप उस से कभी नहीं मिले हों। मल्लिका शेरावत या बिपाशा बसु की भले परछाई न देखी हो पर उस के साथ डांस करती अपनी फ़ोटो छपवा लीजिए!’
‘ओह तो इतना पतन हो चला है?’ राय साहब गंभीर हो गए। बोले, ‘अरे भई छपे अक्षरों से फिर तो लोगों का यक़ीन उठ जाएगा।’
‘उठता है तो उठे। पर उन की तो तिजोरी भर रही है।’
‘चलो अख़बार तो माना कि पूंजीपतियों, उद्योगपतियों के हैं। उन का कोई एथिक्स नहीं है। बाज़ार और पैसा ही उन का सब कुछ है। अख़बारों में तो पहले भी दबी ढंकी प्रायोजित और पीली ख़बरें छपती रही हैं पर ये न्यूज़ चैनल कई एक पत्रकारों के ही स्वामित्व में हैं?’ आनंद ने सुजीत से पूछा, ‘फिर ये सब भी ऐसा कैसे कर ले रहे हैं। चीख़-चीख़ कर, भविष्यवाणियां कर-कर के आतंकवाद, राजनीति से संबंधित असली फ़र्जी ख़बरें परोसते हैं। कि नाटक फे़ल हो जाएं। नाट्य रूपांतरण कर के अपराध की ख़बरें ऐसे परोसते हैं कि कई बार माथा पीट लेना पड़ता है। और हद तो तब होती है जब ये चैनल नाट्य रूपांतरण कर छोटे-छोटे शहरों में भी वाइफ़ स्वैपिंग की ख़बरें कमेंट्री मार कर परोस देते हैं, सनसनीखे़ज़ ढंग से। ये फ़र्जी स्टिंग आपरेशन ठोंक देते हैं? यह काम तो पत्रकारों के स्वामित्व में नहीं होना चाहिए!’
‘आनंद जी, ये चैनल चलाने वाले पत्रकार होंगे आप की नज़र में अब भी पत्रकार! पर हक़ीक़त यह है कि अब यह पत्रकार नहीं सैकड़ों हज़ारों करोड़ की कंपनियों के मालिक हैं। व्यवसायियों से बढ़ कर व्यवसायी हैं।’ सुजीत बोला, ‘और आप एथिक्स की बात कर रहे हैं? अरे हालत यह है कि इन को अगर पता चल जाए कि इन की मां के बिकने की ख़बर चला कर पैसा मिल जाएगा तो ये सब ताबड़तोड़ अपनी-अपनी मां बेच-बेच कर ख़बरें चला देंगे। और बताते रहेंगे चीख़-चीख़ कर कि सब से पहले मैं ने अपनी मां बेची। देखें सिर्फ़ इसी चैनल पर। और फिर इस ख़बर के असर पर भी दो चार स्टोरी चला देंगे। और आप हैं कि देश और समाज की चिंता इन के कंधों पर डाल देना चाहते हैं!’
‘क्या बेवकू़फ़ी की बात कर रहे हो?’ राय साहब फिर भड़के।
‘नहीं हो सकता है भाई!’ आनंद बोला, ‘नोएडा वाला आरुषी हत्याकांड ऐसे ही तो सारे चैनलों ने दिखाया था। जिस बेशर्मी से वह आई.जी. लेविल का पुलिस अफ़सर प्रेस कांफ्रेंस कर उस चौदह साल की मासूम आरुषी की हत्या के बाद भी उस की चरित्र हत्या कर रहा था, और उस के पूरे परिवार की पैंट उतार कर बेचारे डाक्टर बाप को क़ातिल ठहरा रहा था और सारे के सारे चैनल इस प्रेस कांफ्ऱेंस को लाइव दिखा रहे थे, और फिर बाद में भी पंद्रहियों दिन उस बेचारी मासूम और उस के परिवार को बेइज़्ज़त करते रहे सारे के सारे चैनल, ऐसे जैसे उन के पास और देश में कोई और ख़बर ही न हो तो इस से तो लगता है ऐसा भी हो सकता है।’ आनंद माथे पर हाथ फिराते हुए बोला, ‘सुजीत तुम ठीक कह रहे हो। हो सकता है ऐसा भी!’
‘हम तो समझे थे कि राजनीति में ही पलीता लगा है। पर पत्रकारिता वाले तो राजनीति से भी कहीं आगे निकल रहे हैं।’ वर्मा जी हताश हो कर बोले।
‘नहीं वर्मा जी!’ आनंद बोला, ‘पतन के मामले में पत्रकारिता राजनीति से आगे नहीं जा पाएगी। पर हां, मैं यह ज़रूर मानता हूं कि पत्रकारिता का अगर इतना पतन नहीं हुआ होता तो राजनीति इतनी पतित नहीं होती। पत्रकारिता का इतना पतन हुआ; इसी लिए राजनीति भी पतन के पाताल में, रसातल में, चाहे जो कहिए, चली गई।’ वह बोलता रहा, ‘वैसे भी अब मीडिया चाहे इलेक्ट्रानिक हो या प्रिंट मारवाड़ियों के हाथ से निकल कर बिल्डरों और माफ़ियाओं के हाथ में चला गया है। कुछ चैनल और अख़बार तो सीधे-सीधे बिल्डरों के हाथ में तो कुछ साझे में पत्रकारों के स्वामित्व में। सोचिए कि डी.पी. यादव और मनु शर्मा जैसे लोग अख़बार निकाल रहे हैं और पत्रकारिता के बड़े-बड़े चैंपियन और जीनियस उन के संपादक हैं।’
‘तो ये प्रेस काउंसिल वग़ैरह क्या कर रही है?’ राय साहब ने मुंह उठा कर सुजीत की ओर देखा।
‘नख-दंत विहीन संस्थाएं क्या कर सकती हैं भला?’ सुजीत बोला, ‘खांसी जु़काम तो अख़बारों का ठीक नहीं कर सकती ये प्रेस काउंसिल तो यह सब एड्स और कैंसर जैसी बीमारियां हैं, ये कैसे ठीक करे? और फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए तो अभी तक कोई नार्म्स संसद तक नहीं तय कर पाई। जब-जब संसद में कोई बात आई या सरकार ने कुछ करना चाहा, सारे चैनल गिद्धों की तरह ऐसा गोलबंद हो जाते हैं कि सरकार और संसद की घिघ्घी बंध जाती है। ये चैनल तो सिर्फ़ टी.आर.पी. के तबले पर नाचना जानते हैं। और सरकार कहती है कि ये टी.आर.पी. भी एक धोखा है, एक साज़िश है, मैन्युपुलेशन है। पर बात बयानबाज़ी तक ही रह जाती है। मंत्री अस्पताल चला जाता है। चुनाव का ऐलान हो जाता है, बात ख़त्म हो जाती है।’ वह आजिज़ हो कर बोला, ‘जैसे पुराने समय में लड़ाई हार रहा राजा गायों का झुंड आगे खड़ा कर देता था और अपनी जान बचा लेता था वैसे ही यह चैनल वाले भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नाम की एक गाय संविधान में से निकाल कर खड़ी कर देते हैं। सरकार, संसद, पक्ष-विपक्ष सभी ख़ामोश हो जाते हैं।’
‘पर हमारा देश क्या संविधान और क़ानून से चलता है?’ राय साहब मुनमुनाए।
‘तो फिर देश कैसे चलता है?’ सुजीत ने प्रति प्रश्न किया।
‘संविधान और नियम क़ानून मूर्खों के लिए है। जैसे अदालतों में गीता-कु़रान-ईश्वर या सत्य की क़सम।’ राय साहब बोले, ‘हमारा देश चलता है धर्म से, भ्रष्टाचार से, जाति से, गंुडई से। लोग संसदीय राजनीति की बात करते ज़रूर हैं पर यह संसदीय राजनीति भी सारे असंसदीय कृत्यों से चल रही है। कितने असंसदीय टाइप लोग हमारी लोकसभा और विधानसभाओं में चुन कर हर बार आ जाते हैं, कोई कुछ कर लेता है क्या?’ वह बोले, ‘और हर बार इस का ग्राफ़ बढ़ता ही जाता है।’
‘यह सब अंतहीन बहसें हैं, जाने भी दीजिए।’ आनंद ने कहा, ‘राजनीति और मीडिया, पुलिस और चोर, अदालतें और अस्पताल! यह सब अंतहीन विषय हैं। इन का कोई सर्वकालिक समाधान नहीं है।’
‘भइया इस में शिक्षा और पाकिस्तान भी जोड़ लीजिए!’ बड़ी देर से टुकटुक आंख लगाए, सिगरेट फूंकते और यह बहस सुनते अश्विनी जी बोले।
‘चलिए जोड़ लेते हैं।’ आनंद बोला, ‘पर इन विषयों पर बहस-मुबाहिसा फिर किसी रोज़। आज की बहस अगर आप लोगों की इजाज़त हो तो यहीं मुल्तवी की जाए!’
‘नहीं भई हम लोग तो अभी बैठेंगे।’ वर्मा जी ने प्रतिवाद किया।
‘बैठिए और फिर बहस जारी रखिए। हमें क्षमा कीजिए।’ कह कर आनंद उठ खड़ा हुआ।
‘भाई साहब मैं भी चलता हूं।’ कह कर सुजीत भी खड़ा हो गया।
‘इन राय साहब और वर्मा जी के बारे में जानते हो?’ आनंद ने काफ़ी हाउस के बरामदे में टहलते हुए सुजीत से पूछा।
‘नहीं, कुछ ख़ास नहीं।’
‘सोचो यह राय साहब बी.एच.यू. के प्रेसीडेंट रहे हैं अपने समय में और ये वर्मा जी मिनिस्टर! संसदीय कार्य और पी.डब्ल्यू.डी. जैसे विभाग देख चुके हैं।’
‘अच्छा?’ सुजीत ने मुंह बा दिया।
‘पर हमारी तरह साफ़ सुथरी राजनीति के पक्षधर बनते-बनते पहले राजनीति के हाशिए पर आए और अब शायद हाशिए से भी बाहर हो गए हैं।’
‘आप एक समय राकेश जी के बारे में बहुत भावुक हो कर बात करते थे जो आप के शहर में दो बार एम.पी. भी रह चुके हैं, वह अब कहां हैं?’
‘वह भी अब उखड़े हुए लोगों में हैं। दिल्ली में कांग्रेस की अनुशासन समिति में हैं।’ आनंद बोला, ‘जहां सिर्फ़ सोनिया का अनुशासन चलता है।’
‘वैसे भी भाई साहब राजनीति और अनुशासन दोनों दो चीज़ें हो गई हैं।’ सुजीत बोला, ‘अब तो अनुशासन शायद सेना में ही रह गया है।’
‘ये तो है।’ आनंद बोला। अब तक दोनों कार पार्किंग में आ चुके थे। कार का दरवाज़ा खोलते हुए आनंद ने सुजीत से पूछा, ‘तुम्हें कहीं छोड़ दूं?’
‘नहीं-नहीं, मेरी बाइक उधर खड़ी है।’ सुजीत बोला, ‘आप चलिए।’
‘कभी घर पर आओ। बैठ कर बातें करते हैं।’
‘ठीक भाई साहब!’ कहते हुए वह हाथ जोड़ता हुआ निकल गया।

वह घर आ कर हाथ पैर धो कर बैठा ही था कि मुनव्वर भाई का फ़ोन आ गया। वह बुरी तरह घबराए हुए थे, ‘आनंद जी मैं मुनव्वर बोल रहा हूं।’
‘हां बताइए मुनव्वर भाई! इतना घबराए हुए क्यों हैं?’
‘घबराने की बात ही है।’
‘हुआ क्या?’
‘क़ासिम का इनकाउंटर हो गया।’
‘क़ासिम?’ वह बोला, ‘कौन क़ासिम?’
‘अरे आप के गांव वाला क़ासिम!’
‘ओह हां! कब हुआ, कैसे हुआ?’ पूछते हुए उस की आवाज़ जैसे बैठ गई।
‘आज ही!’
‘पर उस को तो ए.टी.एस. ने क्लीन चिट दे दी थी कि वह आतंकवादी नहीं है।’
‘तो इनकाउंटर आतंकवादी बता कर किया भी नहीं है।’
‘तो फिर?’
‘बैंक राबरी से जोड़ दिया है।’
‘ये तो हद है!’
‘और यह इनकाउंटर उसी दारोग़ा ने किया है जिस को आप ने लाइन हाज़िर करवाया था क़ासिम वाले मामले में।’
‘तो क्या वह दुबारा वहीं पोस्टिंग पा गया था?’
‘नहीं अब की तो वह शहर के थाने में तैनात है।’
‘ओह।’
‘वही महंत जी और उन की हिंदू युवा वाहिनी ब्रिगेड ने यह इनकाउंटर करवाया है।’
‘तो क्या क़ासिम अकेले मारा गया है?’
‘नहीं।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘बैंक राबरी से जोड़ा है तो अकेले कैसे मारेंगे?’
‘तो?’
‘तीन लड़के और हैं।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘कुल चार लड़कों को मारा है। इन में तीन मुसलमान हैं और एक हिंदू।’
‘ओह!’
‘हम तो इस इनकाउंटर की न्यायिक जांच की मांग करने जा रहे हैं। पुलिस या मजिस्ट्रेटी जांच पर हमें बिलकुल भरोसा नहीं है।’ वह बोले, ‘मानवाधिकार आयोग और अल्पसंख्यक आयोग से भी कहने जा रहे हैं कि वह भी जांच करें।’
‘अरे मुनव्वर भाई सीधे सी.बी.आई. जांच मांगते!’ वह बोला, ‘इस सब से कुछ होने हवाने वाला नहीं है।’
‘सी.बी.आई. जांच कहां हो पाएगी आनंद जी?’ मुनव्वर भाई बोले, ‘सरकार कहां मानेगी? न्यायिक जांच ही मान जाए तो बहुत है।’
‘चलिए जो भी करना हो करिए।’ वह बोला, ‘हो सका तो दो एक दिन में मैं भी आऊंगा।’
‘इसी मामले में?’
‘हां, मुनव्वर भाई। आप जानते ही हैं क़ासिम के परिवार से मेरे रिश्ते, मेरी भावनाएं।’ कहते हुए वह जैसे टूट सा गया।
‘हां, वो तो है।’
‘मैं आज ही चल देता।’ वह बोला, ‘पर जानता हूं कि अभी उस की बॉडी मिलने में ही दो दिन लग जाएंगे।’
‘क्यों?’
‘अरे आप नहीं जानते हैं?’ वह बोला, ‘एक दिन तो पोस्टमार्टम वग़ैरह में ही ख़र्च हो जाएंगे। फिर सरकारी और पुलिसिया प्रक्रिया!’
‘हां, ये तो है।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘आइए तो भेंट होगी। तब तक मैं इस मामले को मीडिया में और पोलिटिकली गरमाता हूं।’
‘ये तो ठीक है मनुव्वर भाई!’ वह बोला, ‘पर अब वह बेचारा क़ासिम तो नहीं लौटेगा न!’ उसे लगा जैसे अब वह रो देगा। सो उस ने फ़ोन काट दिया।
सुखई चाचा का ज़र्द चेहरा उस की आंखों में आ कर कौंध गया। अफना कर वह आंख बंद कर लेट गया। सोचने लगा कि अब वह सुखई चाचा का सामना कैसे करेगा भला?

...जारी....

लेखक दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424, This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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