पहले रिपोर्टर पैसा लेकर ख़बर छापते थे तो हमको लगा कि सीधे हम ही क्यों न पैसा ले लें

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दयानंद पांडेय: उपन्यास-  ''वे जो हारे हुए'' : भाग (5) : वह गांव गया भी। दो दिन बाद। यह सोच कर कि अब तक क़ासिम को दफ़ना दिया गया होगा। पर अजब संयोग था कि जब वह गांव पहुंचा तो एक घंटे पहले ही क़ासिम का शव शहर से गांव आया था। गांव में सन्नाटा पसरा था। ख़ामोश नहीं, खौलता सन्नाटा। अम्मा उसे देखते ही चौंक गईं। सिर्फ़ चौंकी ही नहीं डर भी गईं। यह पहली बार था कि गांव जाने पर उसे देखते ही अम्मा चौंक कर डर गईं।

नहीं तो पहले उसे देखते ही वह इतरा जाती थीं। वह जब सुखई चाचा के यहां जाने के लिए घर से चलने लगा तो अम्मा समझ गईं कि वह सुखई चाचा के घर जा रहा है। अम्मा धीरे से बोलीं, ‘बाबू वहां मत जाओ।’ उस का डर अभी तक उस के चेहरे पर था।

‘क्यों?’ आनंद ने भी धीरे से पूछा।
‘इस लिए कि गांव में माहौल बहुत ख़राब है।’
‘क्या?’
‘हां।’ वह बोली, ‘क़ासिम को ले कर सारा गांव बहुत नाराज़ है।’
‘क्यों?’
‘उस का चाल चलन ठीक नहीं था।’ अम्मा बोलीं, ‘ऊ आतंकवादी था। बैंक लूटने में मारा गया।’
‘यह कौन कहता है?’ आनंद लगभग बौखला गया, ‘ये फ़ौजी पंडित? ये हिंदू युवा वाहिनी?’
‘मुसल्लम गांव!’ अम्मा धीरे से बोलीं।
‘ओह!’ कह कर आनंद बैठ गया। अम्मा से धीरे से बोला, ‘अब जो भी हो वह तो मर गया न? तो ऐसे में उस के घर जाने में उस की शव यात्रा में जाने में हर्ज क्या है?’
‘हर्ज तो नहीं है।’ अम्मा बोलीं, ‘तुम तो दो दिन में फिर लखनऊ चले जाओगे। यहां रहना हमें है। गांव हमें अकेला कर देगा। ताना देगा। तुम क्या जानो गांव की राजनीति।’ अम्मा हाथ जोड़ कर बोलीं, ‘बाबू हम को यहीं रहना है!’
‘वो तो ठीक है।’ आनंद बोला, ‘पर अम्मा सोचो कि सुखई चाचा जब यह जानेंगे कि मैं गांव में हो कर भी उन के शोक में शामिल नहीं हुआ तो वह क्या सोचेंगे?’
‘सोचने दो!’ अम्मा बोलीं, ‘पर हमें तो शांति से रहने दो।’
‘अम्मा यह तुम कह रही हो?’ आनंद ने बड़ी कातरता से अम्मा की ओर देखा, ‘वह भी सुखई चाचा के लिए?’
‘हां, बाबू मैं कह रही हूं।’ कहते हुए अम्मा रो पड़ीं। बोलीं, ‘तुम नहीं जानते कि गांव कितना बदल गया है। कितनी राजनीति हो गई है, गांव में। और ई क़ासिम को ले कर तो जैसे हिंदुस्तान-पाकिस्तान बन गया है। रहीमवा फेल हो गया इस के आगे।’
‘क्या?’
‘हां।’ अम्मा बोलीं, ‘जब तुम ने क़ासिम को पिछली दफ़ा बचाया था तब गांव में किसी ने हम से कुछ कहा तो नहीं पर सब की आंखों में हमारे लिए, हमारे घर के लिए घृणा दिखाई देने लगी। और जो आज मियां के घर तुम चले जाओगे तो रही सही कसर भी निकल जाएगी। समझो कि आग ही लग जाएगी।’
‘क़ासिम को मैं ने बचाया था, यह किस ने बताया तुम को?’
‘पूरा गांव जानता है।’
‘गांव को किसने बताया?’
‘क़ासिम ने।’
‘क्या बताया?’
‘कि आनंद चाचा ने अपने घर में बैठे-बैठे बचा लिया। कहीं जाना भी नहीं पड़ा।’
‘अरे, उस को तो मैं ने मना किया था।’
‘पर वह कहां माना?’ अम्मा बोलीं, ‘पर बाबू तुम मान जाओ!’
‘अब जब पूरा गांव जानता है कि मैं ने क़ासिम को बचाया तो फिर जाने में दिक़्क़त क्या है?’
‘दिक़्क़त है।’
‘क्या?’
‘चिंगारी को शोला मत बनाओ।’ वह बोलीं, ‘आग को लपट मत बनाओ!’
‘ओह!’ कह कर वह एक बार फिर बैठ गया।
थोड़ी देर बाद वह पिता जी के कमरे में गया। वह लेटे हुए थे। उस ने उन से क़ासिम की चर्चा की। बताया कि वह जाना चाहता है सुखई चाचा के घर। मातमपुर्सी के लिए। लेकिन अम्मा मना कर रही हैं। क्या करे वह?
‘मैच्योर हो, राजनीति करते समझते हो, लखनऊ में रहते हो, ख़ुद फ़ैसला ले सकते हो।’ लेटे-लेटे ही पिता जी बोले, ‘इस में मुझ से पूछने की क्या ज़रूरत है?’
वह समझ गया कि पिता जी और अम्मा की राय एक है। फ़र्क़ बस इतना है कि एक डायरेक्ट स्पीच में है, दूसरा इनडायरेक्ट स्पीच में।
तो गांव क्या ज्वालामुखी पर बैठा हुआ है?
उस ने सोचा। और बारहा सोचा।
वह बड़ी दुविधा में पड़ गया। एक तरफ़ सुखई चाचा के प्रति उस की संवेदनाएं थीं, दूसरी तरफ़ अम्मा-पिता जी की भावनाएं थीं, गांव में रहने की मुश्किलें थीं, उन की बात का, उन के मान सम्मान का सवाल था। तीसरी तरफ़ उस की अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता थी, सच का साथ देने का सवाल था। और इस सब में भी सुलगता एक मासूम सा सवाल भी था कि आखि़र वह गांव आया ही क्यों था? मातमपुर्सी करने, क़ासिम के जनाजे़ को कंधा देने, या अपने ही को सूली पर चढ़ाने?

वह जब छोटा था मुहर्रम में ताज़िया उठाना एक फ़र्ज़ होता था गांव के लिए। पूरे गांव के लिए। सब के घर के सामने से ताज़िया गुज़रती। छोटे-बड़े सभी कांधा देते। ताज़िया बनाने के लिए चंदा भी सभी लोग अपनी श्रद्धा से देते। कोई पैसा देता तो कोई अनाज। कोई कुछ नहीं भी देता तो कोई बात नहीं। ठीक वैसे ही जैसे होली में सम्मत जलाने के लिए लोग अपनी इच्छा से लकड़ी, उपला आदि देते। कुछ लंठ लड़के कुछ लोगों के उपले, लकड़ी रात के अंधेरे में उठा ले जाते। इसे सम्मत लूटना कहते। ख़ूब गाली गलौज भरा गायन होता। ढोल नगाड़ा बजता। सम्मत जलती। दूसरी सुबह सम्मत की राख से होली शुरू होती। सम्मत की राख झोली में भर-भर कर छोटे बच्चे मुंह अंधेरे ही राख की होली शुरू कर देते। राख से फिर गोबर, कीचड़ पर आती होली। फिर नहा धो कर रंग की होली शुरू होती। होरिहार अमीर-ग़रीब सब के घर बारी-बारी जाते। दरवाज़े पर पहुंचते ही गाली गलौज भरा कबीर गाते। बैठते। झाल, करताल, ढोलक बजा कर झूम-झूम कर होली गाते। गरी-छुहारा, गुझिया-गुलगुला खाते। और ‘सदा आनंद रहैं एहि द्वारे, मोहन खेलैं होली’ गाते हुए दूसरे दरवाजे़ चले जाते। गांव की मासूमियत, गांव का सौंदर्य और गांव की एकता होली के रंग में और चटक, और सुखऱ्रू, और मज़बूत होती जाती। सरसों के फूल की तरह चहकती और अरहर के फूल की तरह महकती।
ताज़िया उठाने के समय भी गांव की यही मासूमियत, गांव का यही सौंदर्य, गांव की यही एकता मुहर्रम की ग़मी के बावजूद गुलज़ार रहती। ऐसे भरा-भरा दिखता गांव कि जैसे अरहर की छीमी गदरा कर पूरा खेत इतराए मह-मह!
क्या यह वही गांव है?

आनंद पुराने दिनों की भीगी यादों से निकल कर अचानक इन तपिश भरे दिनों में लौट आता है। नहीं रहा जाता उस से इस गांव में। सड़क पर आता है तो पाता है कि सड़क किनारे का बरगद ग़ायब है। नहीं मिलती उस घने बरगद की छांव।
गांव से अफना कर वह शहर आ जाता है।
मुनव्वर भाई से मिलता है। गांव के हाल चाल और अपनी तकलीफ़, अपनी नामर्दगी की चर्चा करता है। कहता है कि लगता है कारपोरेट सेक्टर की नौकरी करते-करते वह नपुंसक हो गया है। कहता है, ‘लगता है मुनव्वर भाई इस नपुंसक और हिंसक समाज का मैं भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा हूं।’
‘नहीं आनंद जी, ऐसा तो मत कहिए!’ मुनव्वर भाई आनंद को अपनी बाहों में सहारा देते हुए कहते हैं, ‘आप भी ऐसा कहंेगे तो हम लोग क्या करेंगे?’
‘क्यों हम सभी इस नपुंसक और हिंसक समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं हैं?’ वह कहता है, ‘मुनव्वर भाई आप हो न हों, मैं तो हो गया हूं।’ वह रो पड़ता है।
‘मत रोइए आनंद जी। रोने से विचार बौने पड़ जाते हैं।’
‘ठीक बात है!’ वह बोला, ‘मुनव्वर भाई एक प्रेस कानफ्रेंस करना चाहता हूं। कल ही। अरंेज करवा देंगे?’
‘इसी क़ासिम मुद्दे पर?’
‘हां?’
‘आप घुमा फिरा कर महंत जी पर, उन की हिंदू युवा वाहिनी पर फा़ेकस करेंगे, उन को दोषी बताएंगे।’
‘बिलकुल!’
‘एक लाइन कहीं नहीं छपेगी।’
‘क्यों?’ आनंद बोला, ‘क्या सारे अख़बार महंत जी या हिंदू युवा वाहिनी के पेरोल पर हैं?’
‘लगता तो यही है।’
‘या उन का आतंक है?’
‘दोनों कह सकते हैं।’
‘प्रेस कानफ्रेंस फिर भी करना चाहता हूं।’
‘देखिए आनंद जी इस मसले पर मैं ख़ुद बयानबाजी कर चुका हूं। एक दिन दो अख़बारों में एक-एक पैरा बयान छपा। वह भी तोड़-मरोड़ कर। सिर्फ़ इतना सा कि न्यायिक जांच की मांग! बस। फिर आगे के दिनों में भी मैं बयान भेजता रहा, किसी अख़बार ने सांस नहीं ली।’
‘एक पैरा, दो पैरा छपेगा न!’ आनंद बोला, ‘और जो न भी छपे तो भी प्रेस कानफ्रेंस करने में कोई नुक़सान तो नहीं है न?’
‘नहीं, नुक़सान तो नहीं है।’
‘फिर करवाइए।’ आनंद बोला, ‘मैं कुछ ऐसे सच रखूंगा कि अख़बार वालों को छापना ही पड़ेगा।’
‘ठीक बात है।’
‘इलेक्ट्रानिक चैनलों को भी हो सके तो बुलाइए।’
‘ठीक है।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘पर इस का ख़र्चा वर्चा कौन उठाएगा।’
‘किस का?’
‘प्रेस कानफ्रेंस का।’
‘अरे, चाय नाश्ता ही तो लगेगा।’
‘चाहिए तो लंच भी।’
‘अरे नहीं।’
‘प्रेस क्लब का किराया भी लगेगा।’
‘चलिए ठीक है।’
फिर पता चला कि प्रेस क्लब आलरेडी एक नेता जी और एक व्यापारिक संस्थान की प्रेस कानफ्रेंस के लिए उस दिन बुक है। मुनव्वर भाई बोले, ‘वैसे भी इस चुनावी हवा में यहां एक अख़बार तो बाक़ायदा विज्ञापनों की तरह ख़बरों का भी रेट बांध दिए है। कि इतने बाई इतने की ख़बर का इतना पैसा, इतने बाई इतने के कवरेज का इतना, इंटरव्यू का इतना, इस का इतना, उस का इतना पैसा!’
‘ओह!’ आनंद बोला, ‘तो यह रोग यहां भी आ गया?’
‘रोग?’ मुनव्वर भाई बोले, ‘महामारी बन गया है। शरीफ़ और ईमानदार आदमी की ख़बर तो छपने से रही। ब्लैक आउट जैसी स्थिति है। अब तो जिस के पास ब्लैक मनी है, वही अपनी ख़बर छपवा सकता है।’
‘ये तो है।’
‘क्या यह सिलसिला लखनऊ में भी है?’ मुनव्वर भाई ने उत्सुकता से पूछा।
‘लखनऊ?’ आनंद बोला, ‘क्या लखनऊ इस देश से बाहर है? अरे, दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कहे जाने वाले अंगरेज़ी अख़बार ने तो बाक़ायदा रेट कार्ड छाप दिए हैं। और मध्यप्रदेश के एक अख़बार मालिक ने तो साफ़-साफ़ कह दिया है कि पहले रिपोर्टर पैसा ले कर ख़बर छापते थे तो हम को लगा कि सीधे हम ही क्यों न पैसा ले लें?’
‘मतलब अनैतिक कार्य को नैतिक जामा दे दिया?’ मुनव्वर भाई ने पूछते हुए कहा, ‘फिर तो वह दिन आने में भी ज़्यादा समय नहीं है कि हत्या, बलात्कार या चोरी आदि का भी रेट तय हो जाएगा, क़ानूनी रूप से कि इतना पैसा दे कर कत्ल कर लो, इतना पैसा दे कर बलात्कार, इतना पैसा दे कर चोरी, इतने का डाका, इतने का यह, उतने का वह!’ मुनव्वर भाई बोले, ‘आखि़र हमारा समाज जा कहां रहा है? हम कहां तक जाएंगे?’
‘क्यों सांसद या विधायक पैसे ले कर सरकार बनवा या गिरा सकता है, संसद या विधान सभा में सवाल उठा सकता है, पैसे ले कर तो यह क़ानून भी किसी रोज़ बनवा ही सकता है। इस में अनहोनी क्या है? अफ़ज़ल गुरु को फांसी देने से मुसलमान नाराज़ हो सकता है, यह बात हमारी सरकार जानती है, पर इस से संसद पर हमले में कुर्बान हो जाने वाले शहीदों के मनोबल पर या समूचे फ़ोर्स के मनोबल पर क्या असर पड़ता है, सरकार यह कहां जानती है?’
‘आप भी आनंद जी कभी-कभी भाजपा लाइन पर चले जाते हैं।’
‘अच्छा देश की अस्मिता पर बात करना भाजपाई हो जाना होता है?’ वह बोला, ‘यह तो हद है। और फिर इसी तर्ज़ पर जो मैं कहूं कि आप लीगी हो जाते हैं! तो इस के क्या मायने हैं?’
फिर थोड़ी देर दोनों चुप रहे।
‘प्रेस कानफ्रेंस होगी भी?’ आनंद चुप्पी तोड़ते हुए बोला।
‘क्यों नहीं होगी?’ मुनव्वर भाई बोले, ‘पर प्रेस क्लब ख़ाली तो हो।’
‘अच्छा आप प्रेस क्लब के अध्यक्ष का नंबर दीजिए।’
मुनव्वर भाई ने नंबर दे दिया।
आनंद ने प्रेस क्लब के अध्यक्ष से बात की और कहा कि, ‘सुना है आप के क्लब में कल दो-दो प्रेस कानफ्रेंस हैं।’
‘हां, हैं तो।’
‘तीन प्रेस कानफ्रेंस हो जाएं तो?’
‘तीन क्या चार-पांच-छह जो चाहिए कर लीजिए।’ अध्यक्ष बोला, ‘बस एक दूसरे का टाइम नहीं टकराना चाहिए।’
‘ठीक बात है।’ आनंद बोला, ‘बाक़ी दोनों प्रेस कानफ्रेंस कब हैं?’
‘एक बारह बजे दिन में, एक दो बजे दिन में।’
‘तो एक चार बजे शाम को भी रखवा दीजिए।’
‘ठीक है।’ अध्यक्ष बोला, ‘पर अगर इस के पहले वाली थोड़ी देर भी खिंची तब आप को रुकना होगा।’
‘रुक जाएंगे।’ आनंद बोला, ‘बुकिंग का सुना है आप लोग पैसा भी लेते हैं।’
‘हां, एक घंटे का ढाई सौ रुपए, ज़्यादा का पांच सौ रुपए!’
‘और जो हमारे पास पैसे न हों तो?’
‘तो क्या?’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘सोचते हैं। मित्रों से बात करते हैं। अपने प्रेस कानफ्रेंस का परपज़ बता दीजिए, कोशिश करेंगे कि फ्ऱी में भी आप का हो जाए।’
‘देखिए हमारा इशू सोशल है। पोलिटिकल या इकोनामिकल नहीं है!’
‘तो ठीक है, कोशिश करता हूं कि हो जाए!’
थोड़ी देर में उस ने फ़ोन दुबारा किया प्रेस क्लब के अध्यक्ष को तो वह बोला, ‘आप वो विश्वविद्यालय छात्र संघ वाले आनंद जी हैं?’
‘हां हूं तो। क्यों क्या हुआ?’
‘नहीं हम को किसी ने बताया कि आप राजनीति तो कब की छोड़ चुके हैं!’
‘तो मित्र आप को मैं ने कब कहा कि मैं राजनीति पर प्रेस कानफ्रेंस करूंगा?’ वह बोला, ‘मैं ने तो आप को पहले भी कहा था कि सोशल इशू पर प्रेस कानफ्रेंस करनी है।’
‘नहीं-नहीं!’ अध्यक्ष बोला, ‘वो पैसे वाली बात थी दरअसल! अगर आप ढाई सौ रुपए जमा कर देते तो!’
‘चलिए जमा कर देते हैं। बताइए कब और कहां जमा कर दें।’
‘वहीं प्रेस क्लब चले जाइए। आदमी मिल जाएगा।’ अध्यक्ष बोला, ‘आप चाहें तो कल उसी समय भी जमा कर सकते हैं।’
‘नहीं अभी जमा करवा देते हैं। आप अपने आदमी को बता दीजिए। हम थोड़ी देर में पहुंचते हैं।’
फिर जब वह प्रेस क्लब की ओर चलने को हुआ तो मुनव्वर भाई बोले, ‘आनंद जी आप को जाने की ज़रूरत नहीं है। मैं किसी चेले को लगा देता हूं।’
‘पर पैसे?’
‘वह भी हो जाएगा।’
‘चलिए ठीक है।’ आनंद बोला, ‘पर एक काम मुनव्वर भाई आप को और करना होगा।’
‘क्या?’
‘मेरे गांव जाना होगा। और गुपचुप!’
‘क्या करने?’
‘सुखई चाचा और क़ासिम के पिता को लिवा लाने!’
‘चलिए किसी चेले को भेज देता हूं।’
‘ना!’ आनंद बोला, ‘यह काम चेले के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।’
‘विश्वसनीय आदमी है।’
‘कितना भी विश्वसनीय क्यों न हो!’ आनंद बोला, ‘मुनव्वर भाई मामला सेंसिटिव है और आप को बताऊं कि हमारा गांव इस वक़्त जैसे ज्वालामुखी पर बैठा हुआ है।’ वह बोला, ‘मुनव्वर भाई समझिए। नहीं मैं ख़ुद नहीं चला जाता?’
‘चलिए मैं ही जाता हूं।’ वह बोले, ‘कोई गाड़ी की व्यवस्था करनी पड़ेगी बस!’
‘गाड़ी से नहीं, बस से जाइए। पूरी ख़ामोशी से। और उसी ख़ामोशी से लौट आइए। ऐसे कि जैसे आप गए ही नहीं हों।’
‘ठीक है भाई!’ मुनव्वर भाई बोले, ‘पर जो वह लोग नहीं आए तो?’
‘आप मुझे बताइएगा। वह लोग चुपचाप आ जाएंगे। और जो फिर भी कोई दिक़्क़त हो तो फ़ोन पर मेरी बात करवा दीजिएगा।’
फिर उस ने अपने गांव का अता पता और पूरा नक़्शा बना कर दिया मुनव्वर भाई को। सुखई चाचा के घर का रास्ता समझाया। और कहा कि, ‘जितने कम से कम लोगों से आप मिलेंगे और जितनी कम से कम आप बात करेंगे, वही अच्छा रहेगा।’
‘अच्छी बात है।’
‘और इस लिए भी आप को भेज रहा हूं कि आप तजुर्बेकार हैं और कोई बात बने-बिगड़ेगी तो आप संभाल लेंगे। और कि कोई अप्रिय स्थिति आई भी तो आप निपट लेंगे।’
‘कोशिश करते हैं भाई आनंद जी, बाक़ी तो अल्ला के हाथ है।’ कह कर उन्हों ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा लिए।
‘और हां, देखिएगा जो क़ासिम की कोई छोटी बड़ी फ़ोटो मिल जाए तो वह भी ले आइएगा।’
‘ठीक बात है।’
‘तब तक के लिए कोई एक चेला बुलाइए जो प्रेस कानफ्रेंस की चिट्ठी अख़बारों के द़तर पहुंचा सके, और इसे टाइप-वाइप भी करवा दे। फिर आप मेरे गांव जाइए।’
मुनव्वर भाई ने एक नहीं दो तीन चेले फ़ोन कर के बुलवा लिए। एक को प्रेस कानफ्रेंस का मज़मून लिख कर टाइप करवाने को भेज दिया। फिर वे तीनों ही अख़बारों के द़तर चिट्ठी ले कर चले गए। मुनव्वर भाई जब आनंद के गांव जाने लगे तो कहने लगे, ‘एक से भले दो!’
‘मतलब?’
‘अगर आप की इजाज़त हो तो कोई एक संजीदा सहयोगी साथ में आप के गांव लेता जाऊं?’
‘यह आप के विवेक पर है।’
‘नहीं मुझे थोड़ी सुविधा रहेगी और संबल भी।’
‘जैसा आप चाहें।’ वह बोला, ‘और हां, यहां के अख़बारों के संपादकों और संवाददाताओं का फ़ोन नंबर हो तो दे दीजिए।’
‘संपादक तो ऐज़ सच यहां किसी अख़बार में हैं नहीं। हां, सो काल्ड एडीटोरियल इंचार्ज टाइप कुछ हैं, उन के नंबर और कुछ रिपोर्टर के नंबर इस डायरी में हैं, सब के नाम और अख़बार सहित।’ वह अपनी डायरी आनंद को देते हुए बोले, ‘आप इस को रख लीजिए।’
‘फिर आप का काम बिना डायरी के कैसे चलेगा?’ कहते हुए वह मुसकुराया कुछ-कुछ उसी अर्थ में कि अख़बार, डायरी ख़ान!
मुनव्वर भाई उस का निहितार्थ समझते ही सावधान हो गए और गंभीरता ओढ़ते हुए बोले, ‘तो मैं चलता हूं।’ कह कर वह चले गए।

आनंद के गांव वह अकेले ही गए। गांव में ज़्यादा दिक़्क़त उन्हें नहीं हुई। सुखई चाचा का घर भी उन्हें आसानी से मिल गया। पर सुखई चाचा और क़ासिम के पिता दोनों ही शहर आने को तैयार नहीं हुए। मुनव्वर भाई ने फिर आनंद से फ़ोन पर बात करवाई। सुखई चाचा बोले, ‘तिवारी बाबा अब कुछ भी हो जाए हमारा क़ासिम तो हम को वापस मिलेगा नहीं, वह ज़िंदा तो होगा नहीं। हम तो उस को दफ़ना भी दिए। अब कोई फ़ायदा नहीं।’
‘पर एक बार मेरे लिए आ जाइए। ताकि मैं न मरूं, जिं़दा रह सकूं।’
‘अइसा मत बोलिए बाबा, हम लोग आ रहे हैं।’ सुखई चाचा द्रवित हो गए और उन का गला रुंध गया।
वह जब तक आए तब तक रात हो चुकी थी। खा पी कर सभी सो गए। सादिया ने सब को खिलाने पिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बिलकुल भक्ति भाव से। सोने जाते समय आनंद ने सादिया से पूछा, ‘और अम्मी कैसी हैं?’
‘ठीक हैं। पर अब बीमार बहुत रहती हैं।’
‘क्या हो गया?’
‘कुछ नहीं बस बुढ़ापा है।’
‘उन से कल मिलना हो सकता है?’
‘ठीक है कल बुलवा दूंगी।’
‘हां, कल रात की ट्रेन से मेरी वापसी है।’
दूसरे दिन प्रेस कानफ्रेंस में जाने के पहले उस ने सुखई चाचा से कहा कि, ‘आप बस साथ में बैठे रहिएगा। और जो कोई कुछ पूछे तो जो भी सच है, वह बोल दीजिएगा।’
‘का इंक्वायरी होगी।’
‘नहीं, नहीं। बस बातचीत।’
सुखई चाचा मान गए।
प्रेस कानफ्रेंस समय से शुरू हो गई। आनंद ने ख़ुद एड्रेस किया। पत्रकारों को स्पष्ट रूप से बता दिया कि, ‘मैं किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा नहीं हूं न ही किसी पार्टी का सदस्य हूं। फिर भी यह प्रेस कानफ्रेंस कर रहा हूं तो सिर्फ़ इस लिए कि यह मेरे गांव का मामला है। मेरे गांव का एक निर्दोष और मासूम लड़का बिना किसी कु़सूर के मारा गया है। उस की हत्या की गई है और पुलिस द्वारा उसे मुठभेड़ का नाम दिया गया है। वह किसी बैंक डकैती में शामिल नहीं रहा। उस का कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा। हां, मुठभेड़ का नाटक रचने वाले दारोग़ा का इतिहास हम ज़रूर बताना चाहते हैं। इस यादव दारोग़ा ने क़ासिम को पहले भी गिऱतार किया था, आज़मगढ़ के एक लड़के के साथ। और इसे आतंकवादी बताया था। इस मसले पर मैं ख़ुद व्यक्तिगत रूप से लखनऊ मेें प्रमुख सचिव गृह से मिला था। उन्हों ने मेरे अनुरोध पर ए.टी.एस. से इस मामले की जांच करवाई थी। और क़ासिम को निर्दोष बताया था। न सिर्फ़ क़ासिम को निर्दोष बताया बल्कि इस दारोग़ा को दोषी पा कर सस्पेंड कर लाइन हाज़िर कर दिया था। लेकिन चूूंकि यह दारोग़ा क़ासिम को फांसने की फ़ीस ले चुका था सो दुबारा शहर में तैनाती मिलने पर इस ने बैंक डकैती की कहानी गढ़ी और निर्दोष क़ासिम की हत्या कर दी। पुलिस इनकाउंटर का नाम दे दिया। क़ासिम के परिवार को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। वह वर्षों से विपन्नता में ही जी रहा है।’
‘वह कौन लोग हैं जिन्हों ने क़ासिम की हत्या की फीस दारोग़ा को दी थी?’ एक पत्रकार ने सवाल किया।
‘हमारे ज़िले में एक नया तालिबान उठ खड़ा हुआ है, हिंदू तालिबान जो गांव-गांव में पैर पसार चुका है। मेरे गांव में भी है। सांप्रदायिकता का यह एक नया व्याकरण है। शासन और स्थानीय प्रशासन इन के चरण पखार रहा है, यह शर्मनाक है।’ वह बोला, ‘यह लोग हिंदू संस्कृति की दुहाई दे कर हिंदू संस्कृति को भी नष्ट कर रहे हैं। न सिर्फ़ नष्ट कर रहे हैं हिंदू संस्कृति की ग़लत व्याख्या भी कर रहे हैं। खुले आम अपराधियों को गले लगा रहे हैं और तर्क दे रहे हैं कि अब माला के साथ भाला भी ज़रूरी है। आप लोग जानते हैं कि मैं भी हिंदू हूं, आप में से भी अधिसंख्य हिंदू ही हैं, हिंदू संस्कृति में हिंसा की कोई जगह नहीं है, मैं भी जानता हूं और आप सब भी!’
‘आप का इशारा महंत जी और उन की हिंदू युवा वाहिनी की तरफ़ तो नहीं है?’ एक दूसरे पत्रकार ने पूछा।
‘मेरा इशारा नहीं, सीधी चोट है इन आपराधिक शक्तियों पर, इन की ताक़त को हम कुचलने का, नेस्तनाबूद करने का आप सभी से आह्वान करते हैं। साथ ही निवेदन भी करना चाहते हैं कि अपने गांव, अपने मुहल्ले, अपने शहर, अपने ज़िले, अपने प्रदेश, अपने देश और अपने समाज को ज्वालामुखी पर मत बैठाइए, मत बैठने दीजिए। हिंदू, मुस्लिम के चश्मे से चीज़ों को मत देखिए!’
‘मतलब आप चाहते हैं कि हर गांव, हर मुहल्ले, हर शहर, हर ज़िले में एक पाकिस्तान का निर्माण ज़रूरी है, तभी अमन चैन से हम लोग रह सकते हैं?’ एक पत्रकार लगभग हांफते हुए बहुत उत्तेजित हो कर बोला।
‘नहीं, ऐसा तो मैं ने नहीं कहा।’ आनंद इस सवाल पर हतप्रभ था।
‘नहीं आप जैसे सूडो सेक्यूलरिस्टों की बातों का लब्बोलुबाब होता तो यही है।’
‘मैं सेक्यूलरिस्ट हूं पर सूडो सेक्यूलरिस्ट नहीं हूं।’
‘आप को पता है आज कल देश में आए दिन फुटकर आतंकवादी घटनाएं क्यों बंद हैं? कैसे बंद हो गई हैं?’
‘मैं तो समझता हूं कि प्रशासनिक कड़ाई और फिर पाकिस्तान के बिगड़े हालात के कारण ऐसा हो पाया है।’
‘जी नहीं।’ वह पत्रकार बोला, ‘जब से साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और दयाशंकर पांडेय जैसे हिंदूवादियों की गिऱतारी हुई है और इन मुसलमानों को पता लग गया कि अब इन के ठिकानों पर, मस्जिदों और ईदगाहों पर भी हमले हो सकते हैं, इन को भी मारा जा सकता है, तब से ही इन की रुह कांप गई है।’ वह उत्तेजित हो कर बोला, ‘लोहा, ही लोहे को काटता है। तो यह लोग डर गए हैं सो फुटकर आतंकवादी घटनाएं बंद हो गई हैं। गुजरात का सबक़ भी एक फै़क्टर है।’
‘भई मेरे लिए यह नई जानकारी है। फिर भी मैं इस बात पर अडिग हूं कि किसी भी सभ्य समाज में हिंसा की कोई जगह नहीं है। वह चाहे हिंदू हिंसा हो, चाहे मुस्लिम हिंसा।’
‘वह तो ठीक है आनंद जी!’ एक दूसरा पत्रकार बोला, ‘आप तो लखनऊ में रहते हैं आप क्या जानें यहां के हिंदू और मुसलमान को। आप को बताऊं कि अगर यह महंत जी न हों, और यह उन की वाहिनी न रहे तो यहां के मुसलमान हिंदुओं को भून कर खा जाएं! क्यों कि सरकारें तो सांप्रदायिकता से लड़ने के नाम पर सिर्फ़ मुस्लिम वोटों को अपनी-अपनी तिजोरी में भरने के फेर में पड़ी हैं। वोट बैंक बना रही हैं। बाक़ी पार्टियां भी यही कर रही हैं।’
आनंद चुप रहा।
‘आप को पता है आनंद जी, कि देश के दलित, पिछड़े, और मुसलमान देश के नागरिक नहीं, अब देश के दामाद हैं। वह दामाद जिन को दहेज में रत्ती भर भी कमी हुई तो देश नाम की दुलहन को जला कर मार डालने में सेकेंड भर की भी देरी नहीं करेंगे। इस लिए अब समूचा देश इन से डरता है।’
‘देखिए मित्रों हम लोग प्रेस कानफ्ऱेंस में हैं। किसी गोष्ठी, सेमिनार, विमर्श या काफ़ी हाउस में नहीं हैं। और इस प्रेस कानफ्रें़स का सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही विषय है एक निर्दोष नौजवान की पुलिस द्वारा हत्या। जिसे पुलिस मुठभेड़ कहती है।’ वह बोला, ‘मैं फिर दुहराना चाहता हूं कि इस यादव दारोग़ा ने पहले इस नौजवान को आतंकवादी बता कर फंसाने की कोशिश की। पर जब प्रमुख सचिव गृह ने हस्तक्षेप कर आतंकवाद विरोधी दस्ता ए.टी.एस. से इस पूरे मामले की मेरिट पर जांच करवाई, और इस जांच में क़ासिम न सिर्फ़ निर्दोष साबित हुआ बल्कि इस यादव दारोग़ा को इसी आरोप में सस्पेंड कर लाइन हाज़िर किया गया। फिर बहाल होने पर इसी दारोग़ा ने इस क़ासिम की हत्या कर दी और इस हत्या को पुलिस इनकाउंटर बता दिया। मैं प्रशासन से इस पूरे मामले की न्यायिक जांच की मांग करता हूं और साथ ही इस हत्या में शामिल सभी पुलिस कर्मियों के खि़लाफ़ कड़ी क़ानूनी कार्रवाई की मांग करता हूं। जिस में इन दोषी पुलिस कर्मियों के खि़लाफ़़ इरादतन हत्या का मुक़दमा दर्ज कर इन्हें जेल भेजा जाए, इन पर मुक़दमा चलाया जाए, यह मांग भी करता हूं। क़ासिम के परिजनों को पांच लाख रुपए मुआवज़ा भी दिया जाए। आज ही इस बारे में ज़िलाधिकारी को ज्ञापन भी हम देंगे और इस की कापी कल लखनऊ में मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव गृह को भी देंगे। इस ज्ञापन की कापी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, देश के गृहमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस, हाई कोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस, मानवाधिकार आयोग और अल्पसंख्यक आयोग को भी भेज रहा हूं।’ आनंद ने कहा, ‘इस विषय में कोई और सवाल या जानकारी आप पूछ सकते हैं। यहां क़ासिम के पिता तथा उस के पितामह भी उपस्थित हैं, आप चाहें तो उन से भी जो सवाल चाहें पूछ सकते हैं। रही बात बाक़ी बहस की तो मैं उस से भी कतरा नहीं रहा हूं। आप लोगों द्वारा उठाए गए बाक़ी सवाल भी महत्वपूर्ण हैं, मुझे झकझोर गए हैं आप के वह सवाल। पर उन मसलों पर हम लोग फिर कभी बैठ लेंगे। पर अभी तो इसी विषय पर आप लोग बात करें तो ख़ुशी होगी।’
प्रेस कानफ्ऱेंस में जैसे सन्नाटा सा खिंच गया।
आनंद समझ गया कि प्रेस कानफ्रें़स अब ख़त्म है। फिर भी उस ने पूछा, ‘मित्रों कोई सवाल, कोई बात हो तो पूछें।’
‘नहीं भाई साहब अब कोई सवाल नहीं है। सारी बातें साफ़ हैं। इतना तो हम लोग भी जानते हैं कि पुलिस इनकाउंटर अमूमन फ़र्ज़ी ही होते हैं। यह भी फ़र्ज़ी है। पर क़ासिम को आतंकवादी भी बनाने की कोशिश की थी पुलिस ने, यह बात ज़रूर हम लोगों के लिए नई है।’ एक पत्रकार बोला।
‘इतना ही नहीं, इस पुलिस ने क़ासिम का कनेक्शन आज़मगढ़ से भी जोड़ने की कोशिश की थी।’ आनंद बोला, ‘और क़ासिम के एक सहपाठी जो कि आज़मगढ़ का ही था, उस के साथ ही गिऱतार भी किया था।’
‘तो उस आज़मगढ़ी लड़के का क्या हुआ?’ एक पत्रकार ने पूछा।
‘वह भी निर्दोष निकला। और अभी वह ज़िंदा है।’
‘आप को कैसे पता?’
‘वह इसी शहर में पढ़ता है, आप को मैं ने बताया भी कि वह क़ासिम का सहपाठी है। और कि पुलिस द्वारा क़ासिम के मारे जाने के बाद यानी उस की हत्या के बाद वह क़ासिम के गांव, उस के घर गया था, ऐसा क़ासिम के पितामह श्री सुख मुहम्मद ने मुझे बताया है, जो कि यहां मेरे साथ, मेरे बग़ल में उपस्थित हैं। चाहंे तो आप लोग इन से दरिया़त कर सकते हैं।’ आनंद ने यह कह कर माइक सुखई चाचा की तरफ़ बढ़ा दिया।
‘क़ासिम के उस दोस्त का नाम क्या है?’ एक पत्रकार ने सुख मुहम्मद को इंगित कर पूछा।
‘इरफ़ान!’ बोलते समय सुख मुहम्मद का गला रुंध गया।
‘आप कैसे जानते हैं उसे?’ उस पत्रकार ने फिर पूछा।
‘क़ासिम का दोस्त था। दो तीन दफ़ा मेरे घर भी आया था, अपने घर आज़मगढ़ जाते समय।’
‘वह सचमुच आतंकवादी नहीं है, आखि़र आज़मगढ़ का है।’
‘हम को ई सब नहीं मालूम।’ सुख मुहम्मद बोले, ‘हम बस इतना जानते हैं साहब कि क़ासिम बदमाश नहीं था, आतंकवादी नहीं था!’ कह कर सुख मुहम्मद फूट-फूट कर रोने लगे। बग़ल में बैठा उन का बेटा और क़ासिम का पिता बिस्मिल्ला भी फूट-फूट कर रोने लगा।
फ़ोटोग्राफ़रों के कैमरों के लैश चमकने लगे। इलेक्ट्रानिक मीडिया के कैमरों ने भी सुख मुहम्मद और बिस्मिल्ला की रुलाई को शूट करना शुरू कर दिया। उन को रोने की बाइट मिल गई थी। आनंद समझ गया कि कल के अख़बारों में ख़बर उस की प्रेस कानफ्रेंस की नहीं सुख मुहम्मद और बिस्मिल्ला के रोने की ज़्यादा बनेगी।
प्रेस कानफ्रेंस ख़त्म हो चुकी थी। अब सुख मुहम्मद और बिस्मिल्ला के इंटरव्यू और फ़ोटो ख्ंिाच रहे थे। भीड़ में किनारे खड़े मुनव्वर भाई ने आंखों ही आंखों में आनंद को इशारा किया कि ‘काम तो हो गया है!’ आनंद ने भी आंखों से ही मुनव्वर भाई को सहमति में संदेश दिया। किंचित मुसकुरा कर।
हालां कि इस घड़ी में उस को अपना यह मुसकुराना अच्छा नहीं लगा और वह दूसरे ही क्षण झेंप गया।
वह अपनी कुर्सी से धीरे से उठ खड़ा हुआ। पत्रकारों की भीड़ में आ गया। उधर कुछ पत्रकार सुखई चाचा का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करने में लगे थे।
पत्रकारों का चाय, नाश्ता भी जारी था। और बातचीत भी। शहर के कुछ लोग भी आ गए थे। बात राजनीति की फिर शुरू हो गई थी। शहर के सांप्रदायिक रंग में रंग जाने की बात हो रही है। आनंद हकबक है कि शहर की राजनीति के इस क़दर पतन पर कि पत्रकार भी अब सवाल ले कर नहीं पक्षकार बन कर खड़े हैं। वह सवाल पत्रकार के चश्मे से नहीं, हिंदू मुसलमान के चश्मे से पूछ रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक एकता, सांप्रदायिकता विरोध, समरसता या सभ्य समाज की कल्पना उन की सोच, उन के एजेंडे, उन के सवाल या सरोकार में नहीं है। वह अपने एक पुराने मित्र से पूछ भी रहा है यह सब जो उस की छात्र राजनीति के समय के साथी हैं, पहले गज़लें लिखते थे, अब पत्रकार हो चले हैं और प्रेस कानफ्रेंस में कवरेज के लिए नहीं आनंद से मिलने के लिए आ गए हैं। वह पूछ रहा है कि, ‘बताइए अशोक जी ऐसे कैसे चलेगा? पत्रकारिता जो राजनीति के लिए महावत का काम करती थी, राजनीति में पद के मद पर अंकुश रखती थी, वह पत्रकारिता ही मदमस्त हो जाए, महावत ही जब बिगड़ैल हो जाए तो हाथी कैसे संभलेगा भई? आप ही बताइए?’
‘क्या बताएं आनंद जी अब सब ऐसे ही चलने वाला है। और जो पत्रकार यह सब नहीं कर रहे मेरी तरह उपेक्षित हो कर सिर्फ़ नौकरी कर रहे हैं।’ अशोक जी बोले।
‘कुछ नहीं आनंद जी आप तो शुचिता, नैतिकता वग़ैरह करते-करते राजनीति से बाहर हो गए। क्या चाहते हैं हम पत्रकार भी आप की तरह यही सब करते हुए पत्रकारिता से भी बाहर हो जाएं? फिर शहर से भी बाहर हो जाएं? आप ही बताएं?’ एक युवा पत्रकार पूछ रहा है आनंद से।
‘मतलब?’ आनंद धीरे से बोला, ‘मैं समझा नहीं।’
‘समझना क्या है आनंद जी!’ युवा पत्रकार बोला, ‘ज़माना बदल रहा है, आप भी बदलिए। इंटरनेट का ज़माना है, दुनिया हाइटेक हो रही है, अब लोग चिट्ठी भी इंटरनेट पर लिख रहे हैं।’
‘तो मित्र आप क्या चाहते हैं कि हम राजनीति भी इंटरनेट पर करें?’
‘बिलकुल!’ वह युवा पत्रकार बोला, ‘इस हाइटेक ज़माने में आप चाहते हैं कि राजनीति में पुराने नुस्खों से सफल होना तो कैसे चलेगा?’
‘अच्छा?’ आनंद उस युवा पत्रकार की बात में दिलचस्पी लेता हुआ बोला।
‘तो और क्या?’ वह युवा पत्रकार चहका, ‘आप राजनीति करेंगे आज के दौर की और औज़ार इस्तेमाल करेंगे मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, लोहिया और जयप्रकाश नारायन के ज़माने के? और हम से चाहेंगे कि हम भी पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी, चेलापित राव की पत्रकारिता करें? आनंद जी आप ख़ुद तो मर ही गए हैं, हम सब को भी क्यों मारना चाहते हैं? नहीं चलने वाली है यह मूल्यों की राजनीति और पत्रकारिता। अब सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही सूत्र, एक ही नैतिकता और एक ही फ़ार्मूला है, वह है बाज़ार और बाज़ार की सफलता का। चहुं ओर इसी की लीला है। साध सकें तो साधिए नहीं घर बैठिए!’
‘भाई आप को पता नहीं है शायद, मैं कब का घर बैठ चुका हूं। नहीं करता राजनीति अब। मैं जानता हूं कि मदन मोहन मालवीय, गांधी, लोहिया या जे.पी. के पुराने औज़ारों से आज की राजनीति नहीं हो सकती। लेकिन मेरी दिक़्क़त यह है कि मैं इन औज़ारों को छोड़ नहीं सकता। और मनमोहन, आडवाणी, अमर सिंह, मुलायम, मायावती, प्रमोद महाजन, राजीव शुक्ला, लालू, करुणानिधि, जयललिता आदि के औज़ारों को साध नहीं सकता। इसी लिए अब एक छोटी सी प्राइवेट नौकरी करता हूं।’ उस ने जोड़ा, ‘कोई ठेकेदारी नहीं करता, कोई एन.जी.ओ. नहीं चलाता।’
‘तो यह प्रेस कानफ्रेंस?’ युवा पत्रकार अकबका गया।
‘यह क़ासिम नाम का नौजवान हमारे विश्वविद्यालय का छात्र था, हमारे गांव का था, मेरे उस के घर से भावनात्मक रिश्ते हैं, इस लिए उस की तकलीफ़ कहने आ गया था, राजनीति करने नहीं।’
‘अच्छा-अच्छा!’ कहते हुए वह पत्रकार थोड़ा शर्मिंदा हुआ और बोला, ‘माफ़ कीजिएगा सर, मुझे यह जानकारी नहीं थी। मुझे लगा चुनावी मौसम में आप चुनाव लड़ने का आधार बना रहे हैं इसे। आज कल लाशों पर भी राजनीति होती है तो मैं यह सब बक गया। सॉरी!’
‘कोई बात नहीं।’ आनंद बोला, ‘अभी आप की उम्र ही कितनी है, अनुभव ही क्या है?’
‘जी सर!’
‘हां, पर यह अपने भीतर की आग जलाए रखिएगा। और इस का हो सके तो सकारात्मक उपयोग कीजिएगा। नकारात्मक नहीं।’
‘जी बिलकुल!’
फिर अशोक जी के साथ आनंद प्रेस क्लब के बाहर आ गया। सड़क उस पार खड़ा हो कर उस ने सिगरेट सुलगा ली। अशोक जी ने सिगरेट पीने से इंकार कर दिया। बोले, ‘अब छोड़ दी है।’
‘ठीक है कोई बात नहीं।’ कहते हुए उस की नज़र प्रेस क्लब के बोर्ड पर चली गई। उस ने उसे पढ़ते हुए अशोक जी से पूछा, ‘यह जर्नलिस्ट प्रेस क्लब क्या बला है? जर्नलिस्ट भी और प्रेस भी? मतलब आप मनुष्य भी हैं और आदमी भी?’
‘हां, यह मूर्खता जल्दबाज़ी में हो गई।’ अशोक जी बोले, ‘दरअसल एक प्रेस क्लब और था, उस में विवाद ज़्यादा बढ़ गया था। सो नया प्रेस क्लब बनाना था और उस से अलग भी दिखना था सो जर्नलिस्ट प्रेस क्लब नाम से रजिस्ट्रेशन हुआ और यही लिख दिया गया।’
‘क्या मूर्खता है!’ आनंद बोला, ‘लखनऊ में भी दो प्रेस क्लब हैं और दोनों ही प्रेस क्लब लिखते हैं। दोनों का अलगाव विचारधारा के कारण है। पर दोनों ही धड़ों के लोग आपस में मिलते जुलते हैं। दोनों ही सरकारी सहायता से चलते हैं।’
‘पर यहां तो महंत जी और कुछ तिवारी टाइप माफ़ियाओं के आशीर्वाद से चलता है यह जर्नलिस्ट प्रेस क्लब! सो कई बार नान जर्नलिस्ट भी इस जर्नलिस्ट प्रेस क्लब का अध्यक्ष बन जाता है। पिछले कई सालों तक आकाशवाणी का एक एनाउंसर इस जर्नलिस्ट प्रेस क्लब का अध्यक्ष था, अब एक इलेक्ट्रानिक सामान बेचने वाला दुकानदार अध्यक्ष है।’
‘ओह तभी मैं कहूं कि पत्रकार यहां पक्षकार बन कर क्यों सवाल पूछ रहे थे, बिलकुल भगवा रंग में रंगे हुए सवाल। एक तरफ़ा सवाल।’ उस ने पूछा, ‘तो महंत जी ने इन पत्रकारों को ख़रीद रखा है या धमका रखा है?’
‘कुछ नहीं!’ अशोक जी बोले, ‘वह पत्रकारों से बैठने को कहते हैं तो ये कुकुरमुत्ते लेट जाते हैं। हाता और मंदिर में बंट जाते हैं।’
‘हाता और मंदिर मतलब?’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘मतलब माफ़िया तिवारी और माफ़िया महंत?’
‘हां। और क्या?’ अशोक जी बोले, ‘कुछ दोनों जगहों पर मत्था टेकते हैं और हाज़िरी लगाते हैं। कुछ-कुछ एक-एक जगह ही। और तो और कवि, शायर, लेखक, प्राध्यापक, वाइस चांसलर, वकील, जज, राजनीतिक सभी किसी न किसी के यहां मत्था टेकने जाते ही हैं। और फिर छाती फुला कर लौटते हुए बताते हैं कि, ‘हाता से आ रहा हूं। या फिर मंदिर से आ रहा हूं। बड़ी भयावह तसवीर है।’
‘मतलब सारे बुद्धिजीवी हाता या मंदिर से पेटेंट लिए हुए हैं?’
‘हां भई हां।’ अशोक जी खीझ कर बोले।
‘और आप?’ आनंद ने जैसे पिन चुभोया अशोक जी को।
‘जी मैं?’ अशोक जी की खीझ और बढ़ गई। बोले, ‘आप का दिमाग़ ख़राब हो गया है? मैं क्यों पेटेंट कराने जाने लगा हाता या मंदिर? यही गाली सुनने के लिए आप से मिलने आया था यहां?’ वह पूरी तरह भड़क गए।
‘सॉरी अशोक जी!’ आनंद ने अशोक जी का हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘मैं ने तो बस रुटीन में पूछ लिया था। आप का दिल दुखाने का इरादा मेरा बिलकुल नहीं था। मैं जानता हूं आप इन में से नहीं हो सकते। भेंड़ चाल में नहीं समा सकते आप! अगेन सॉरी!’
अब तक मुनव्वर भाई भी सुखई चाचा और बिस्मिल्ला को लिए प्रेस क्लब से बाहर आ गए थे। और सुखई चाचा पूछ रहे थे, ‘बाबा अब?’
‘चाचा अब आप लोग घर जाइए!’ आनंद ने उन्हें सांत्वना दी, ढांढस बंधाया और कहा कि, ‘घबराइए नहीं। क़ासिम को तो हम वापस नहीं ला सकते पर उस हत्यारे दारोग़ा को भी नहीं छोड़ेंगे। सज़ा दिलवाएंगे ही।’ सुखई चाचा फिर रोने लगे। उन की बूढ़ी आंखों में जाने कितने आंसू थे जो थम ही नहीं रहे थे। बिस्मिल्ला भी रो रहा था पर उतना नहीं, जितना सुखई चाचा!
सुखई चाचा को विदा कर वह मुनव्वर भाई के घर आ गया। सादिया की अम्मी आ गई थीं। उसे देखते ही वह उस से धधा कर मिलीं। साथ में अशोक जी भी थे। वह सादिया की अम्मी का ममत्व देख कर उन पर न्यौछावर हो गए। झुक कर पांव छुए। हाथ पैर धो कर सब लोग बैठे ही थे कि सादिया ने सूजी का गरम-गरम हलवा सब के लिए परोस दिया।
हलवा खाते हुए मुनव्वर भाई बोले, ‘भाई आनंद जी प्रेस कानफ्रेंस तो बढ़िया हो गई। और उस से भी अच्छा सुख मुहम्मद चाचा और बिस्मिल्ला भाई के इंटरव्यू हो गए। अब देखिए कल हाथ कितना आता है?’
‘मतलब?’ आनंद ने पूछा।
‘मतलब छप कर कितना और क्या आता है?’ मुनव्वर भाई बोले, ‘सच आनंद जी मुझे क़तई अंदाज़ा नहीं था कि प्रेस कानफ्रेंस इतनी कामयाब हो जाएगी और कि सुख मुहम्मद चाचा और बिस्मिल्ला भाई के बुला लेने से मामला इतना जम जाएगा।’
‘चलिए कुछ हुआ तो!’ आनंद बोला, ‘हो सकता है बात अभी आगे और बढ़े। बस वह ज्ञापन डी.एम. वग़ैरह तक पहुंचवा दीजिएगा।’
‘पहुंचवा दीजिएगा?’ मुनव्वर भाई बोले, ‘आप की प्रेस कानफ्रेंस ख़त्म होने से पहले ही वह डी.एम. के यहां रिसीव हो गया और सभी प्रतिलिपियां रजिस्ट्री हो गईं।’
‘चलिए यह अच्छा किया आप ने।’ आनंद बोला, ‘अब कुल कितना ख़र्चा-वर्चा हो गया, यह भी बता दीजिए।’ कहते हुए उस ने जे़ब से पर्स निकाल लिया।
‘अरे नहीं, इस सब की ज़रूरत नहीं है। आप इसे रखिए।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘कौन लाख पचास हज़ार ख़र्च हो गए हैं। इतना ख़र्च तो हमारे साथियों ने ही उठा लिया। हमें भी नहीं पता चला कि क्या ख़र्च हुआ। कल बैठेंगे तो पूछेंगे साथियों से। आप प्लीज़ इसे रखिए।’ हाथ जोड़ते हुए मुनव्वर भाई बोले।
‘फिर भी!’ आनंद बोला, ‘दो तीन हज़ार रुपए तो कम से कम ख़र्च हुए ही होंगे। आप कैसे अकेले अफ़ोर्ड करेंगे?’
‘कर लेंगे। कर लेंगे! बस आप इस को भूल जाइए।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘फिर यह हम सब की साझा लड़ाई है! कोई एक अकेले की नहीं।’
‘फिर तो ठीक है आनंद जी।’ अशोक जी बोले, ‘मुनव्वर भाई ठीक कह रहे हैं।’
‘चलिए ठीक है फिर!’ आनंद ने पर्स जेब मंे रख लिया।
बात पुराने दिनों, पुराने दोस्तों की चली। मूल्यों और सिद्धांतों की चौहद्दी में कौन-कौन रहा, कौन-कौन बिछड़ गया। कौन खूंटे में रहा, कौन पगहा तुड़ा गया। कौन कितना गिरा, कौन कितना उठा, कौन-कौन सफल हुआ और कौन-कौन असफल!
‘यहां तो हम तीनों ही असफल लोग बैठे हुए हैं।’ अशोक जी बोले।
‘असफल ही नहीं, हारे हुए लोग भी हैं हम लोग भाई!’ मुनव्वर भाई बोले।
‘मूल्य, सिद्धांत भी हम कितना बचा पाए हैं, इस का भी हिसाब लिया-दिया जाए तो हम शायद वहां भी फिसड्डी निकलेंगे।’ आनंद बोला, ‘लाख कोशिश के बावजूद मैं तो भाई मूल्यों और सिद्धांतों की अपनी नाव में ढेरों छेद किए बैठा हूं। कि नाव कब डूब जाए पता नहीं है।’ वह बोला, ‘फिर भी जितनी रक्षा कर सकता हूं, करता हूं।’
‘तो हम लोग भी कहां कितना बचा पाए हैं?’ अशोक जी बोले, ‘बस नंगे नहीं हुए हैं।’
‘फिर भी हम लोग असफल क्यों हो गए? क्यों हारे हुए लोगों के रजिस्टर में नाम पता दर्ज करवा बैठे?’ मुनव्वर भाई आह भरते हुए बोले।
‘देखिए जहां तक सफल-असफल की बात है तो भाई मैं तो बहुत साफ़ मानता हूं कि सफलता का कोई तर्क नहीं होता।’ आनंद बोला।
‘बिलकुल!’ अशोक जी धीरे से बोले।
‘सफलता का कोई तर्क नहीं होता पर योग्यता का तर्क होता है। अब अलग बात है कि योग्य व्यक्ति सफल भी हो यह कोई ज़रूरी नहीं है, ठीक वैसे ही सफल व्यक्ति योग्य भी हो, यह कोई ज़रूरी नहीं है।’ आनंद बोला, ‘हमने मानवीयता और मूल्य अपने भीतर बचा रखे हैं इस अमानवीय और बाज़ार से आक्रांत समय में हमारे लिए महत्वपूर्ण यही है। असफल हैं भी तो क्या हुआ? क्या पता कभी हमारा दौर भी आए, अच्छा दौर भी आए।’
‘ये तो है।’ कहते हुए अशोक जी ने जम्हाई ली।
‘वो एक शेर है न!’ आनंद बोला, ‘इक मुसलसल दौड़ में हैं मंज़िलें और फासले/पांव तो अपनी जगह हैं, रास्ता अपनी जगह!’
‘क्या बात है!’ मुनव्वर भाई उछल पड़े, ‘आप की शेरो शायरी गई नहीं, बाक़ी है। अच्छी बात है।’ वह बोले, ‘आप को याद है यूनिवर्सिटी के दिनों में आप अपने भाषणों में जब तब इसी तरह शेर ठोंकते रहते थे। इतना कि राकेश जी जैसे लोग कहते थे कि ऐसा ही रहा तो एक दिन आप तारकेश्वरी सिनहा की छुट्टी कर देंगे।’
आनंद मुनव्वर भाई की इस बात पर मुसकुरा कर रह गया।
थोड़ी देर बाद वह अशोक जी से बोला, ‘आप को याद है फलनवा जो आज कल मिनिस्टर है। एक दिन शराब पीने के लिए मुझे बुला बैठा। कहने लगा पुरानी दोस्ती, पुरानी यादें ताज़ा करेंगे। मैं गया। अच्छा लगा कि उस ने दोस्ती बरक़रार रखी। मिनिस्टर होने का रौब ग़ालिब नहीं कराया। साथ में चार ठो चमचों को नहीं बिठाया। हां में हां मिलाने के लिए। बस हम दो बैठे। बहुत अच्छा लगा। पर थोड़ी देर में बातचीत में अचानक वह कहने लगा कि मैं किसी साइकेट्रिक से मिल लूं!’
‘क्यों?’ अशोक जी भड़के।
‘उस को लगा कि मेरा फ्रस्ट्रेशन बढ़ गया है और कि मैं मेंटली डिस्टर्ब हो गया हूं।’
‘क्या?’
‘हां भाई!’
‘बताइए साला जब यूनिवर्सिटी में था पढ़ाई लिखाई में सिफ़र था, नकल टीपने में चैंपियन! जिस तिस के चरण चांप-चांप कर अब साला मिनिस्टर हो गया तो आप को मेंटल होने का सर्टिफ़िकेट देने लगा है!’
‘हां भई!’ आनंद बोला, ‘और फलनवा जो आज कल सिंचाई मंत्री है एक दिन मुझ से फ़ोन पर पूछने लगा कि ट्रेड यूनियन की नेतागिरी आज़मा रहे हैं क्या?’
‘बताइए भड़ुवा साला, लड़कियों का सप्लायर!’ अशोक जी बोले, ‘हद है कैसे-कैसे लोग ऐसे-वैसे हो गए/ऐसे-वैसे लोग कैसे-कैसे हो गए!’
‘हां, शमशेर ने जब यह लिखा होगा तो जाने कितनी यातना से गुज़रे होंगे तभी तो यह लिख पाए!’ आनंद बोला, ‘वह तो लिख कर अपने को हलका कर गए। हम लोग अपने को कैसे हलका करें? सवाल तो यह है।’
‘ये तो है!’ अशोक जी चिंतित हो कर बोले, ‘पर वह क्यों आप को ट्रेड यूनियन में भेज रहा था?’
‘नहीं, मैं ने उस से कहा भी कि ट्रेड यूनियन अब देश में है कहां जो ट्रेड यूनियन की राजनीति करूंगा? पर वह माना नहीं। पूछता रहा।’ आनंद बोला, ‘असल में वह चीफ़ इंजीनियर बनाने के लिए एक करोड़ रुपए का रेट खोले था, इंजीनियरों को मैं ने समझाया तो वह सब पहले तो गोलबंद हुए पर बाद में टूट गए। तो भी इस का रेट एक करोड़ से गिर कर पचास लाख पर आ गया। और उस पचास लाख में से भी एक पैसा इस को नहीं मिला।’
‘क्यों?’
‘इस लिए कि वह पचास लाख मुख्यमंत्री के हिस्से का था। तो इस का हिस्सा मारा गया। सो हमें ट्रेड यूनियन ज्वाइन करवाने में लग गया।’
‘ओह तो ये बात है!’ मुनव्वर भाई बोले, ‘बताइए कैसे-कैसे लोग आज कल राजनीति कर रहे हैं, बल्कि राजनीति के शिखर पर हैं, आज के युवाओं के रोल माडल हैं। और आलम यह कि एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं। औरों की क्या कहूं हमारी कांग्रेस में भी यही सब हो रहा है। कहां गांधी, नेहरू हमारे रोल माडल थे और कहां यह सारे लोग! समझ में नहीं आता कि आदर्शवाद कहां चला गया? कहा बिला गया?’
‘कुछ नहीं मुनव्वर भाई, अब तो आदर्श की आहट भी नहीं मिलती दिखती तो आदर्शवाद को तो गुम होना ही था! और वह हर हलके से गुम है। जहां तक आप लोगों की बात है तो राजनीति में एक शब्द है कंप्रोमाइज़! वही आप लोग नहीं कर पाए। शायद इसी लिए आप लोग आज राजनीति के हाशिए से भी बाहर हो गए।’ अशोक जी क्षुब्ध हो कर बोले।
‘ये भी एक फै़क्टर तो है।’ आनंद धीरे से बोला।
‘अच्छा भाई आनंद जी अब मैं चलना चाहूंगा। नाइट शि़ट में हूं। सो चलूं काम पर।’ अशोक जी बोले, ‘बरसों बाद आज अच्छी मुलाक़ात हुई आप से। बल्कि आप लोगों से!’
‘क्यों मुनव्वर भाई से भी बरसों बाद मिले हैं आज आप?’ आनंद ने पूछा।
‘हां भई, सच तो यही है। एक शहर में रहते हुए भी हम लोग अजनबियों की तरह रहते हैं। सामने पड़ने पर भी मोड़ पर कतरा कर निकल लेते हैं।’ अशोक जी बोले।
‘इस छोटे से शहर में भी!’ आनंद बोला, ‘यह तो दुर्भाग्यपूर्ण है।’
‘ख़ैर, अब जो है, सो है।’ अशोक जी बोले, ‘अब इजाज़त दीजिए!’
‘अच्छी बात है अशोक जी!’ आनंद बोला, ‘मुझे भी ट्रेन पकड़ने की तैयारी करनी है। हालां कि कुछ और लोगों से भी मिलना था। पर चलिए अगली बार!’
‘अच्छी बात है।’ कह कर अशोक जी बारी-बारी दोनों से गले मिले और चले गए।
अशोक जी के जाते ही सादिया की अम्मी आ कर आनंद के पास बैठ गईं। साड़ी का पल्लू ठीक करती हुई बोलीं, ‘और भइया, घर में बाल-बच्चे सब ठीक हैं?’
‘हां, बस आप का आशीर्वाद है।’
‘वो तो अल्लाह की दुआ से है ही।’ फिर वह सादिया की बेटी की यादों में खो गईं। कमरे में रखी उस नन्हीं मुन्नी की फ़ोटो देख कर सुबुकती हुई वह बोलीं, ‘कैसे तो फुट-फुट कर के नानी-नानी बोलती थी। कभी नानी कहती, कभी आनी कहती।’ वह ज़रा रुकीं और बोलीं, ‘बच्ची की बहुत याद आती है। और भइया जब बच्ची की याद आती है तो आप की भी याद आती है। बड़ी मदद किए रहे थे आप तब लखनऊ में। कोई आगे-पीछे नहीं था वहां तब लखनऊ में पर आप तो भइया अंगद के पांव की तरह जमे रहे तो जमे रहे। दिन भर एक पांव पर इहंा-ऊहां दौड़ते रहे। रात में हम लोग जब चले तभी आप गए।’ कहते-कहते वह भावुक हो गईं।
‘आप अंगद को जानती हैं?’
‘हां भइया काहें नहीं जानेंगे?’
‘कैसे जानती हैं?’
‘जानती हूं?’ वह बोलीं, ‘काहें, रामलीला में देखी हैं हम भी। हनुमान जी की सेना में थे। रावण के दरबार में कोई उन का पैर हिला नहीं पाया था। ई हम कई बार देखी हैं रामलीला में।’
‘अच्छा-अच्छा।’
‘आप भूल गए का भइया!’ वह बोलीं, ‘उहां बाले मियां के मैदान में हर साल होती थी रामलीला। तब आप लोग छोटे-छोटे थे। मंूगफली और चीनिया बादाम खाने के लिए आप कितना तो रोते थे। और आप की बड़की अम्मा आप को डांटा करती थीं। हम को सब याद है।’ कहते-कहते वह जैसे ख़ुश हो गईं।
‘ओह हां!’
‘पर का करें भइया अब तो सब बदल गया। ज़माना बदल गया, शहर बदल गया, मुहल्ला बदल गया, लोग भी बदल गए।’ वह आह भर कर बोलीं, ‘अब लोग हिंदू मुसलमान हो गए।’
‘अब क्या किया जाए!’
‘हां भइया अब कुएं में ही भांग पड़ गई है।’
‘सो तो है!’
‘चलिए भइया आप नहीं बदले। हमारे लिए यही अच्छा है।’ वह बोलीं, ‘तो आज दुपहर में जब सादिया का फ़ोन आया और इस ने बताया कि आप आए हैं, और मिलना चाहते हैं तो हम फ़ौरन रिक्शा पकड़े और भागी चलीं आईं।’
‘यह अच्छा किया आप ने।’ आनंद बोला, ‘क्यों कि हमें भी आप की बहुत याद आती है!’
‘सचहूं भइया!’ कहते हुए सादिया की अम्मी की आंखें मारे ख़ुशी के छलछला आईं।
‘हां। और क्या!’ कह कर वह घड़ी देखने लगा।
‘अच्छा भइया अब आप की ट्रेन का टाइम हो रहा होगा। चलिए आप खाना खा लीजिए तो हम भी चलें।’
‘अब इतनी रात में जाएंगी?’
‘हां, रिक्शा पकड़ कर चली जाऊंगी।’ वह हंसती हुई बोलीं, ‘कवने बात का डर है!’
और वह सचमुच खाना खिला कर चली गईं।
आनंद भी स्टेशन आ गया। आते समय उस ने मुनव्वर भाई का एक बार फिर शुक्रिया अदा किया।
संयोग से ट्रेन न सिर्फ़ टाइम से थी, टाइम से ही, लखनऊ भी आ गई। घर आ कर फ्रे़श हो कर वह सो गया।

...जारी....

लेखक दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424, This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है. इससे पहले के पार्ट पढ़ने के लिए नीचे कमेंट बाक्स के ठीक बाद में आ रहे शीर्षकों पर एक-एक कर क्लिक करते जाएं.


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