शराब, सिगरेट, सुलगन और जिमखाना!

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दयानंद पांडेय: उपन्यास-  ''वे जो हारे हुए'' : भाग (6) : तो समझो बच्चा कि गांव में गांधीपना मत झाड़ो, गांधी पाकिस्तान को पोसते-पोसते हे राम! बोल गए थे, अब तुम भी गांव में पाकिस्तान बना पोस रहे हो, यह ठीक नहीं है : वह सोया ही था कि फ़ोन की घंटी बजी। उधर से जमाल था, ‘बधाई हो आनंद जी, बहुत-बहुत बधाई!’ ‘कौन?’ वह नींद में ही बोला। उधर से आवाज आई...‘अरे जमाल बोल रहा हूं।’

‘अच्छा-अच्छा। बोलो जमाल, क्या हो गया?’
‘हो क्या गया आज आप बिलकुल छा गए हैं, शहर के अख़बारों में।’ वह बोला, ‘एक अख़बार में तो लोकल पेज पर आधा पन्ना आप की प्रेस कानफ्रेंस ही घेरे हुए है।’
‘प्रेस कानफ्रेंस के लिए आधा पेज?’ आनंद हकबका गया।
‘अरे नहीं उस में क़ासिम के वालिद वग़ैरह के इंटरव्यू भी हैं।’
‘ओह तब तो ठीक है!’
‘आप अभी शहर में ही हैं कि लखनऊ में?’
‘क्यों लखनऊ में हूं!’
‘नहीं, मैं ने कहा कि जो शहर में होते तो आ कर मिलता!’
‘नहीं भई मैं तो लखनऊ वापस आ गया हूं। अभी थोड़ी देर पहले ही आया।’
‘अच्छा-अच्छा रात की ट्रेन से चले गए होंगे।’
‘हां, हां।’
‘तो किस पार्टी से नामिनेशन कर रहे हैं?’
‘नामिनेशन?’ आनंद भड़क कर बोला, ‘किस बात का?’
‘अरे नाराज़ क्यों हो रहे हैं आनंद जी!’ जमाल बोला, ‘इलेक्शन के दिन हैं। तो मैं ने सोचा कि आप इलेक्शन की ज़मीन तैयार कर रहे होंगे।’
‘तुम्हें हरदम बेवक़ूफ़ी ही क्यों सूझती है जमाल?’ आनंद बोला, ‘तुम जानते हो कि आज की चुनावी राजनीति के लिए मैं पूरी तरह अनफ़िट हूं। संसदीय चुनाव लड़ने के लिए कम से कम दस-पांच करोड़ रुपए चाहिए ही चाहिए आज की तारीख़ में। और मैं दस-पांच लाख रुपए भी इकट्ठा नहीं कर सकता। दूसरे, पार्टियों से टिकट मांगने की योग्यता भी मेरे पास नहीं है। तीसरे, इस जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति में मुझे भला कोई क्यों वोट देगा? ज़मानत तो ज़ब्त होगी ही, दो चार हज़ार वोट भी शायद ही मिल पाएं मुझे। यह तुम भी जानते हो और मैं भी।’
‘नहीं आनंद जी ऐसा नहीं है! आज के अख़बार तो बताते हैं कि अगर आज आप लड़ जाएं तो महंत जी की तो छुट्टी!’ वह बोला, ‘महंत जी की सांप्रदायिक राजनीति के विरोध में यहां के अख़बारों ने ऐसी चोट तो उन पर कभी नहीं की थी। और तय मानिए क़ासिम का मामला तो अब तूल पकड़ लेगा।’
‘ख़ाक तूल पकड़ेगा!’
‘क्यों अब कसर क्या रह गई?’
‘एक प्रेस कानफ्रेंस अख़बारों में ठीक से छप जाने से कोई मामला तूल नहीं पकड़ता। कोई मामला तूल पकड़ता है, जनता की भागीदारी से। लोगों के जुड़ाव से।’ आनंद बोला, ‘समझे जमाल मियां। तुम लोगों को यह मामला पहले ही पुरज़ोर तरीके़ से उठाना चाहिए था।’
‘चलिए अब से उठाते हैं।’
‘यह अच्छी बात है।’ आनंद बोला, ‘बल्कि एक काम और कीजिएगा जमाल मियां।’
‘क्या?’
‘यह क़ासिम का मामला एक मूवमेंट बने इस के लिए ज़रूरी शर्त यह है कि यह किसी एक नेता, किसी एक पार्टी का मूवमेंट बनने के बजाय, दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर इसे जनता का मूवमेंट बनाया जाए। हमारा शहर क्या समूचा ज़िला बल्कि पूरी कमिश्नरी जो सांप्रदायिकता और जातीयता के ज्वालामुखी पर बैठी है, उस से उसे बचाया जाए।’
‘जी आनंद जी!’
‘है यह मुश्किल काम पर जो नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ी हमें माफ़ नहीं करेगी।’ आनंद बोला, ‘इस के लिए अपने-अपने अहंकार को ताक पर रखना होगा। नहीं जब कोई नौजवान सिर उठा कर खड़ा होगा तो उस की पुलिस से हत्या करवा दी जाएगी और इनकाउंटर बता दिया जाएगा। यह प्रवृत्ति किसी भी समाज के लिए शुभ नहीं है।’
‘ठीक है आनंद जी। एक रोड मैप बनाता हूं। फिर आप को बताता हूं।’ वह बोला, ‘ज़रूरत पड़ी तो आप को फिर शहर आना पड़ेगा।’
‘अरे हज़ार बार आऊंगा!’ आनंद बोला, ‘बस एकजुट हो जाओ! ओ.के.?’
‘ओ.के.!’
थोड़ी देर बाद मुनव्वर भाई का भी फ़ोन आ गया। बहुत उत्साहित थे। बोले, ‘भाई आनंद जी यहां तो ग़ज़ब हो गया। उम्मीद के विपरीत अख़बारों ने पूरा मामला उछाल कर, जम कर छापा है और महंत जी का बाजा बजा दिया है। उन की हिंदू युवा वाहिनी की धज्जियां उड़ा दी हैं। आप की प्रेस कानफ्रेंस, सुख मुहम्मद चाचा और बिस्मिल्ला भाई का इंटरव्यू तीनों मिला कर सभी अख़बारों ने छापा है। अशोक जी वाले अख़बार ने तो आधा पेज में छापा है।’
‘ठीक है मुनव्वर भाई। इन सारे अख़बारों की दो-दो तीन-तीन कापियां एक पैकेट बना कर मुझे आज ही कोरियर कर दीजिए।’
‘कहिए तो किसी साथी को भेज दूं यह सारे अख़बार ले कर?’
‘नहीं-नहीं। इस की ज़रूरत नहीं है। आप कोरियर कर दीजिए! ताकि यहां के प्रशासनिक हलके में इस की कतरन दे कर बात कर सकूं।’
‘ठीक बात है, ठीक बात है।’
‘एक काम और करिए मुनव्वर भाई!’
‘बताइए!’
‘अब इस मामले को पब्लिक मूवमेंट से जोड़ दीजिए। दलगत राजनीति और व्यक्तिगत अहंकार से ऊपर उठ कर।’
‘बिलकुल-बिलकुल!’
‘अभी जमाल का भी फ़ोन आया था।’
‘वह तो तिड़क गया होगा!’
‘नहीं, नहीं।’ आनंद बोला, ‘वह सोच रहा था कि मैं चुनावी ज़मीन तलाश रहा हूं और कि चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा हूं।’
‘ओह!’
‘फिर जब मैं ने उस से इस पर मूवमेंट खड़ा करने की बात कही तो वह रोडमैप बनाने के लिए भी तैयार हो गया।’
‘तो वह यह लड़ाई हम लोगों के हाथ से छीनना चाहता है!’
‘मुनव्वर भाई, आप से एक बात पूछूं?’
‘पूछिए।’ वह खिन्न हो कर बोले।
‘यह बताइए कि आप की राय में इस वक़्त सांप्रदायिकता और जातियता का राक्षस ज़्यादा बड़ा है, या जमाल?’
‘मेरे लिए तो दोनों ही राक्षस हैं।’ वह बोले, ‘इस लड़ाई में जमाल के साथ आने का मतलब है, पहले ही दौर में लड़ाई की हवा निकाल देना। आसमान से गिर कर खजूर पर लटक जाना।’
‘मुनव्वर भाई यह समय व्यक्तिगत अहंकार से छुट्टी पा कर क़ासिम की लड़ाई को लड़ना है। क़ासिम के हत्यारों को क़ानूनी रूप से सज़ा दिलाना है।’
‘आप को पता है कि जमाल के सरोकार महंत जी से भी हैं।’
‘क्या?’
‘हां, उस के एक एन.जी.ओ. ने पिछले दिनों अपने एक कार्यक्रम में महंत जी को मुख्य अतिथि बनाया था।’
‘क्यों?’
‘उन की सांसद निधि से उस को पैसा झटकना था।’
‘तो सांसद निधि महंत जी के पिता जी की नहीं है, देश की है, जनता की है!’
‘चलिए तो भी अगर जमाल इस मूवमेंट को लीड करेगा तो मुझे मुश्किल होगी।’
‘मुनव्वर भाई!’ आनंद बोला, ‘इशू जमाल है कि क़ासिम पहले यह तय कर लीजिए!’
‘बट नेचुरल क़ासिम!’
‘फिर!’ आनंद बोला, ‘और आप ही अभी कल कह रहे थे कि यह हम सब की साझी लड़ाई है!’
‘है तो!’
‘तो क्यों जमाल के फच्चर में फंस रहे हैं। लीड आप करिए। जमाल साथ आता है तो आने दीजिए।’
‘पर मैं लीड करूंगा तो वह नहीं आएगा!’
‘मत आए!’ आनंद बोला, ‘ज़रूरत जनता को इस मूवमेंट से जोड़ने की है, किसी जमाल, फमाल को नहीं। जनता को आगे रखिए, अहंकार को पीछे। फिर देखिए सब ठीक हो जाएगा।’
‘क्या आनंद जी!’
‘अब क्या हुआ?’
‘अभी तक मुझ को आप ने इतना ही समझा है?’ मुनव्वर भाई आहत हो कर बोले, ‘आप हम को अहंकारी समझते हैं?’
‘अरे नहीं भाई! वे तो मैं ने एक बात कही।’ आनंद बोला, ‘अब इतनी छोटी-छोटी बातों पर घायल होते रहेंगे तो क़ासिम की लड़ाई तो समझिए यहीं ख़त्म हो जाएगी!’
‘लड़ाई तो ख़त्म नहीं होगी आनंद जी!’ मुनव्वर भाई बोले, ‘हम हारें चाहे जीतें, इस की परवाह नहीं। पर लड़ंेगे ज़रूर। यह जो पीक मिली है अख़बारों में इस को ज़ाया नहीं होने देंगे। यह हमारा वादा है!’
‘अच्छी बात है मुनव्वर भाई। बस अख़बारों का पैकेट हमें आज कोरियर करवा दीजिएगा।’
‘बिलकुल!’
‘और हां एक बात और मुनव्वर भाई!’ आनंद ने कहा, ‘और इस बात पर भी घायल मत हो जाइएगा।’
‘अरे नहीं, बताइए तो।’
‘यह कि ये मूवमेंट सिर्फ़ मुसलमानों का मूवमेंट ही बन कर न रह जाए।’ आनंद बोला, ‘क्यों कि इस मूवमेंट में इस बात का ख़तरा ज़्यादा है। और वह एक शेर भी ज़रूर ध्यान में रखिएगा कि- कौन कहता है आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता/एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।’
‘बिलकुल-बिलकुल!’ मनुव्वर भाई बोले, ‘पूरी तबीयत से उछालते हैं।’
मुनव्वर भाई के फ़ोन के बाद वह बाथरूम चला गया। वापस आ कर अख़बार पलटने लगा तो उस ने पाया कि उस की प्रेस कानफ्रेंस की ख़बर यहां के भी दो अख़बारों में छपी थी। पर छोटी-छोटी। बहुत उछाल के नहीं। लेकिन जितनी भी छपी थी, काम की थी। एक अख़बार ने उसे पूर्व छात्र नेता लिखा था तो एक ने सामाजिक कार्यकर्ता।
वह आफ़िस में ही था कि उस के गांव से फ़ौजी पंडित का फ़ोन आया। वह बोले, ‘का हो आनंद!’
‘प्रणाम चाचा!’
‘ख़ुश रहो! पर ई अख़बार में का अंट शंट बक बका दिए हो भाई!’ वह बोले, ‘तुम अपने विद्यार्थी जीवन में तो गांधी, गांधी बकबकाते ही थे अब गांधी का पहाड़ा भी पढ़ने लगे हो!’
‘समझा नहीं।’
‘तो समझो बच्चा कि गांव में गांधीपना मत झाड़ो। गांधी पाकिस्तान को पोसते-पोसते हे राम! बोल गए थे। अब तुम भी गांव में पाकिस्तान बना पोस रहे हो, यह ठीक नहीं है।’ वह गला खखार कर बोले, ‘अपनी राजनीति वहीं लखनऊ में बघारो, गांव में मत बघारो। समझे न!’ वह ज़रा रुके और खैनी थूकते हुए बोले, ‘एह तर से राजनीति जो करोगे तो कभी एम.एल.ए., एम.पी., मिनिस्टर नहीं बन पाओगे। काहें से कि अपना गांव, अपने गांव की राजनीति तो तुम समझ नहीं पा रहे हो, देश और प्रदेश की राजनीति का ख़ाक समझोगे?’ वह फिर थूके और बोले, ‘बंद करो ई सब नौटंकी और गांधीपना।’ कह कर उन्हों ने फ़ोन काट दिया।
आनंद चिंतित हुआ अम्मा पिता जी को ले कर। वह चिंतित हुआ कि क़ासिम के चक्कर में वह अम्मा पिता जी का ध्यान कैसे भूल गया! उस ने अपने को धिक्कारा, कोसा और गांव में घर पर फ़ोन किया।
फ़ोन पर अम्मा मिलीं। उस ने पूछा कि, ‘क्या हालचाल है?’
‘गांव में आग लगी है।’
‘क्यों?’
‘तुम अख़बार में फ़ोटो लगा कर कुछ छपाए हो क़ासिम को ले कर यही लोग बता रहे हैं।’
‘और क्या लोग बता रहे हैं?’
‘और तो कुछ नहीं पर तुम्हारे पिता जी बहुत गु़स्सा हैं। कह रहे हैं कि यहां तो तुम ड्रामा कर गए। मियां के घर नहीं गए। आज्ञाकारी पुत्र बन गए। पर शहर में जा कर उस को कपार बैठा कर मुतवा दिया। ऊ कह रहे हैं कि अब बाक़ी का रह गया है!’
‘अच्छा उन से बात करवाओ।’
‘मत करो उन से बात!’
‘क्यों?’
‘उन का माथा बहुत गरम है।’ अम्मा बोलीं, ‘कुछ उलटा सुलटा बोल देंगे तो तुम को भी बुरा लग जाएगा। दो चार दिन में जब ठंडा हो जाएंगे तब बात करना। अभी नहीं।’
‘अच्छा गांव में तुम लोगों को कोई ख़तरा तो नहीं है न!’
‘ख़तरा कवन बात का, तुम्हारे पिता जी तो हई हैं ना!’
‘अरे नहीं कोई कुछ कहे सुने!’
‘अभी तक तो नहीं कोई कुछ कहा सुना। आगे का नहीं जानती।’
‘ठीक है अम्मा भगवान करे ऐसा न हो!’ आनंद बोला, ‘पर कोई कुछ कहे सुने तो घबराना नहीं, हमें बता देना।’
‘तुम वहां से क्या करोगे?’
‘सब कुछ। तुम बस बता देना।’
‘ठीक है बाबू!’ वह ज़रा रुकीं और बोलीं, ‘एक बात कहूं बाबू बुरा मत मानना!’
‘हां बोलो!’
‘ई तुम्हारी नौकरी ही ठीक लगती है तुम्हारे पिता जी को। तुम्हारी राजनीति नहीं सुहाती उन को। न गांव वालों को।’
‘क्या बताऊं अम्मा। कुछ समझ नहीं आता। सोचता हूं कि क्या यह वही गांव है जहां कभी एक बकरी, एक गाय, एक बैल मर जाने पर भी पूरा गांव शोक में डूब जाता था। और अब एक नौजवान मरा है तो उस का शोक एक दिन का भी नहीं मना सकता यह गांव?
‘हां बाबू अब गांव बदल गया है, तुम भी बदल जाओ।’ अम्मा बोलीं, ‘ऊ दोहा बाबू तुम सुने ही होगे कि जाट कहे सुन जाटनी इसी गाम में रहना है, ऊंट बिलैया लई गई हां जी, हां जी कहना है।’
‘अब क्या कहूं?’ आनंद सांस छोड़ते हुए बोला, ‘मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता।’
‘कुछ मत कहो बाबू। मेरी बस इतनी सी बात सुन लो कि इसी गांव में रहना है। खेती-बारी करनी है। अब बैल वाली खेती रही नहीं। कि अपनी मर्ज़ी से खेत जोत लेंगे। अब तो ट्रैक्टर भी किसी का किराए पर लेना पड़ता है, फ़सल कटाई के लिए भी कंबाइन किराये पर लेना होता है। और ई सब सामूहिक रूप से तय होता है। ट्रैक्टर आता है तो सब के लिए। कंबाइन आता है तो सब के लिए। पारी बांध कर। पानी है, खाद है मज़दूरी है। रास्ता है, नाली है, मेड़ है, दुख है, सुख है, तीज-त्यौहार है, हारी है बीमारी है, सब इसी गांव में होना है, इन्हीं लोगों के साथ होना है, तो बैर किस-किस से लेंगे?’ एक सांस में बोलती हुई अम्मा बोलीं, ‘गांव तुम को वैसे ही कुजात कहता है। सब के साथ खाते-पीते हो! फिर तुम्हारी बात और है। तुम शहर में हो। लखनऊ में हो। पर हम पूरे गांव से बैर ले कर कैसे जिएंगे? पट्टीदारी है बाबू!’
‘अच्छा अम्मा!’
‘हां, बाबू हमारी बात पर ग़ौर करना!’
‘अच्छा अम्मा प्रणाम!’
‘भगवान तुम को सदबुद्धि दे।’ कह कर अम्मा ने फ़ोन रख दिया।
पर लगातार किसी न किसी का फ़ोन आता ही रहा। इतना कि आफ़िस वाले फ़ोन सुनते-सुनते परेशान हो गए। इसी बीच जमाल का फ़ोन आया। उस ने बताया कि, ‘कलक्ट्रेट का बड़ा ज़बरदस्त घेराव हो गया है। और जैसा कि आप चाहते थे यह पब्लिक मूवमेंट बने तो आनंद जी यह बात तो हो गई है। और इस के लिए बहुत ईमानदारी से कहूं कि बहुत ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। वो जो कहते हैं न कि लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया। लगभग वही आलम है।’
‘मुनव्वर भाई भी हैं इस मुहिम में?’ आनंद ने पूछा।
‘हां हैं। और पूरे जोश-ओ-ख़रोश से। बल्कि इस समय माइक पर वही हैं। उन की तक़रीर चल रही है।’
‘यह अच्छी बात हुई कि तुम दोनों अपने इगो भूल कर इस लड़ाई में साझीदार हो गए।’ आनंद बोला, ‘बधाई इस के लिए। और हां, यह ज़रूर ध्यान रखना कि यह लड़ाई सिर्फ़ मुसलमानों की बन कर न रह जाए। और कि हिंदू वर्सेज़ मुस्लिम न बन जाए। इस में यह ख़तरा बहुत है।’
‘सो तो है। पर आप मुतमइन रहिए यह हरगिज़ नहीं होने देंगे। मामला अगर हिंदू वर्सेज़ मुस्लिम मंे टर्न लेगा तो लड़ाई बंद कर देंगे। पर यह न होने देंगे।’ जमाल बोला, ‘हम लोग भी सेक्युलर ख़यालात के लोग हैं। कोई फं़डामेंटलिस्ट या तालिबानी या सो काल्ड जेहादी नहीं हैं।’
‘बस यह जज़्बा क़ायम रहना चाहिए!’
शाम को वह ज्ञापन वगै़रह ले कर प्रमुख सचिव गृह के पास गया। और ज्ञापन की कापी बाहर ही पूरी प्रेस टीम को बंटवा दिया। फिर प्रमुख सचिव गृह से मिला। ज्ञापन देख कर वह बोले, ‘देखिए इंक्वायरी तो रुटीन तौर पर भी हर पुलिस इनकाउंटर की होती ही है। पर आप ने ज्यूडिशियल इंक्वायरी मांगी है तो ऊपर बात करते हैं मैडम से भी। रही बात और डिमांड्स की तो उस सब इंस्पेक्टर सहित पूरी इनकाउंटर टीम सस्पेंड कर दी गई है। और जहां तक हत्या के मुक़दमे की बात है तो वह इंक्वायरी रिपोर्ट देखने के बाद ही तय होगा कि क्या करना है। अभी फ़ौरी तौर पर यह संभव नहीं है।’ वह बोले, ‘आप का ज्ञापन तो दरअसल कल ही हमें मिल गया था।’
‘वो कैसे?’
‘डी.एम. ने फै़क्स किया था!’
‘अच्छा-अच्छा!’
‘वैसे आप से एक रिक्वेस्ट है कि इस मामले को बहुत तूल मत दीजिए कि ला एंड आर्डर ब्रेक हो। इलेक्शन का माहौल है। कहीं सिचुएशन कंट्रोल से बाहर हो गई तो मुश्किल हो जाएगी।’
‘हम तूल कहां दे रहे हैं।’
‘नहीं आज कलक्ट्रेट जिस तरह से आप के शहर में घेरा गया है। वह दिक़्क़त वाला है। वो तो प्रशासन को नरमी बरतने को कहा गया है पर कहीं मामला कम्युनल कलर ले लेगा तो आफ़त हो जाएगी। इस से अपने मूवमेंट को बचाइए।’
‘हम आलरेडी इस से अवेयर हैं और प्रिकाशंस लिए हुए हैं।’
‘नहीं-नहीं आज वहां से तीन बार सिचुएशन बिगड़ने की ख़बर आई। पर प्रशासन ने लिनिएंसी बरतते हुए लोगों को कंट्रोल किया। मामला भड़कने नहीं दिया।’
‘ख़ैर चलिए इस के लिए सॉरी और मैं अपने साथियों को फिर से समझाता हूं।’
‘साथियों को तो समझा लेंगे आप। पर भीड़ का क्या करेंगे? भीड़ कुछ नहीं समझती, किसी का नहीं समझती। तो भीड़ को वहां बटोरना बंद कीजिए।’
‘यह भीड़ नहीं, जनता है जनाब। उस को हम कहां से रोक लेंगे?’
‘वेरी सिंपल, जैसे इकट्ठा किया था।’ वह बोले, ‘अपना मूवमेंट कॉल आफ़ कर लीजिए।’
‘सॉरी, जब तक हत्यारी पुलिस के खि़लाफ़ हत्या का मुक़दमा दर्ज नहीं हो जाता, हम मूवमेंट तो वापस नहीं ले पाएंगे।’
‘मतलब दंगे करवा कर ही रहेंगे?’ प्रमुख सचिव गृह टेंस हो कर बोले, ‘चुनावी फ़िज़ा है आनंद जी, मामले की नज़ाकत को समझिए। आप के अपोज़िट लोग चाहते हैं कि मामला भड़के, दंगा हो और वोट उन के लिए पोलराइज़ हो जाएं!’
‘अरे आप के हाथ में प्रशासन है, और जब आप जान गए हैं ऐसे लोगों की मंशा तो उन को कुचल दीजिए, जेल में ठंूस दीजिए।’
‘क्या बताऊं आप को आनंद जी, कैसे समझाऊं?’
‘कुछ नहीं हत्या का मुक़दमा दर्ज कर उस पुलिस टीम को अरेस्ट कीजिए, क़ासिम के परिवार को मुआवज़ा दिलवा दीजिए। सब कुछ अपने आप शांत हो जाएगा।’
‘बिना इंक्वायरी रिपोर्ट के आए कुछ नहीं हो सकता आनंद जी न मुआवज़ा, न मुक़दमा!’
‘तो इंक्वायरी कमेटी से कहिए कि रिपोर्ट एक से दो दिन में दे दे। उस को टाइम बाउंड कर दीजिए।’ आनंद बोला,‘सब कुछ क्रिस्टल क्लीयर है, सब कुछ आप की जानकारी में है।’
‘देखिए बहुत सारी चीज़ें हमारे हाथ में नहीं हैं, कुछ चीज़ें पोलिटिकल भी होती हैं।’ वह बोले, ‘आप कुछ तो समझिए आनंद जी और कोशिश कीजिए प्रोटेस्ट जल्दी से जल्दी ख़त्म हो जाए।’
‘क्या करूं सब कुछ मेरे हाथ में भी नहीं है।’ आनंद बोला, ‘हालां कि चीफ़ मिनिस्टर तो डिक्टेटर हैं, किसी की सुनती नहीं फिर भी अगर संभव हो तो आप इंटरेस्ट ले कर चीफ़ मीनिस्टर से मेरी मीटिंग फ़िक्स करवा दीजिए। शायद समस्या जल्दी सुलट जाए।’
‘मैडम से आप की मीटिंग तो उन के सेक्रेट्रीज़ ही फ़िक्स करवा सकते हैं, मैं नहीं।’
‘चलिए देखता हूं।’ वह बोला, ‘मैं ने सुना था कि आप से सीधी बात होती है, इस लिए आप से कह दिया।’
‘इट्स ओ.के.!’ कह कर आदत के मुताबिक़ प्रमुख सचिव गृह ने हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ा दिया।
वह घर आ गया।

नहा धो कर बैठा ही था कि आफ़िस से फ़ोन आ गया। कंपनी के चेयरमैन के पी.ए. का फ़ोन था। पूछ रहा था कि, ‘ये कैसी प्रेस कानफ्रेंस कर दी आप ने कि आप के शहर के महंत जी नाराज़ हो गए?’
‘कुछ ख़ास नहीं, बस रुटीन!’
‘लेकिन आनरेबिल चेयरमैन सर के पास उन का फ़ोन आया था।’
‘किस का?’
‘महंत जी का। और वह बहुत खफ़ा हैं। और फिर उन की बात सुन कर आनरेबिल चेयरमैन सर का चेहरा भी बिगड़ गया है।’ पी.ए. बोला, ‘वह नाश्ते पर थे। पर फ़ोन के बाद उन का ज़ायका बिगड़ गया तो आप को फ़ोन कर रहा हूं।’
‘ओह!’
‘आप जानते हैं कि वहां भी कंपनी को अपना बिज़नेस करना है। और महंत जी वहां मैटर करते हैं। उन को नाराज़ कर के तो वहां बढ़िया से बिज़नेस रन नहीं कर सकते हम लोग। फिर वह एम.पी. भी हैं। कहीं कोई मामला पार्लियामेंट में भी उठा सकते हैं। हर कंपनी के अपने स्याह सफ़ेद होते हैं।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘मैं समझता हूं आप मेरी बात समझ रहे होंगे।’
‘बिलकुल-बिलकुल!’ आनंद बोला, ‘आप की बात भी समझ रहा हूं और आप का संदेश भी। बोलिए इस्तीफ़ा अभी मेल कर दूं या सुबह लिख कर भिजवा दूं?’
‘सॉरी-सर! मेरा मतलब यह नहीं था।’
‘तो फिर?’
‘सर चाहते हैं कि आप अपने को इस मामले से ड्राप कर लें, वहां मूवमेंट भी ड्राप कर लें और कि महंत जी के खि़लाफ़ जो मोर्चा खोला है, वह बंद कर दिया जाए!’
‘मूवमेंट तो ड्राप करने का ज़िम्मा मैं नहीं ले पाऊंगा, क्यों कि वह तो अब मास मूवमेंट हो गया है। रही बात मेरी तो मैं तो अब वहां हूं भी नहीं। लखनऊ में हूं। और फिर आप को बताऊं कि जो प्रेस कानफ्रेंस मैं ने की, व्यक्तिगत की। किसी पार्टी या किसी कंपनी के बैनर तले नहीं। वह भी इस लिए की कि वह मेरे गांव का मामला था।’ आनंद ज़रा रुका और बोला, ‘अभी मौक़ा है स्पष्ट बता दीजिए तो इस्तीफ़ा भेज दूं। क्यों कि अभी नामिनेशन का टाइम है जा कर कूद ही जाऊं चुनाव में। एक बार आज़मा ही लूं। फिर हारूं चाहे जीतूं, यह दूसरी बात है। पर चेयरमैन साहब को जितनी बातें मैं ने अभी कहीं सब बता दीजिए और फिर मुझे बताइए कि क्या करना है। क्या पता इसी बहाने सक्रिय राजनीति में मेरी वापसी हो जाए। नहीं बाद में पता चले कि नौकरी से भी जाऊं और चुनाव से भी। तो बड़ा मलाल होगा। बल्कि संभव हो तो मेरी बात अभी चेयरमैन साहब से करवा ही दीजिए!’
‘सर, आप तो नाराज़ हो गए। आनरेबिल चेयरमैन सर ऐसा भी नहीं चाहते।’
‘तो क्या चाहते हैं।’
‘वह चाहते हैं कि आप कंपनी में बने रहें और महंत जी भी नाराज़ न हों।’
‘ओह तो मुट्ठी भी बंधी रहे और हाथ भी झुका रहे!’
‘क्या सर!’
‘कुछ नहीं यह कारपोरेट की टर्मानलजी नहीं है।’
‘ओ.के. सर!’ वह बोला, ‘तो प्लीज़ सर मेरी बात का ध्यान रखिएगा।’
‘ठीक बात है!’
कह तो दिया उस ने कि ठीक बात है। पर वह टेंशन में आ गया।

बहुत दिन हो गया था उसे काफ़ी हाउस गए। चला गया काफ़ी हाउस। वहां पहुंचा तो काफ़ी हाउस नदारद! वह घबराया। इधर-उधर चहलक़दमी की। काफ़ी हाउस का बोर्ड तो दिखा पर बड़े से दोनों लकड़ी के दरवाज़े ग़ायब। बरामदे में बैठे अख़बार बेच रहे दुकानदार से पूछा कि, ‘क्या हुआ काफ़ी हाउस?’
‘विवाद हो गया!’
‘वो तो ठीक है। पर गया कहां?’
दुकानदार ने मुंह पिचका कर हाथ हिला दिया। पर बोला नहीं। ख़ैर, वह शीशे का दरवाज़ा खोल कर भीतर गया। चकाचक रेस्टोरेंट। ए.सी। वह चौंक गया। घबरा कर वह बाहर बरामदे में आ गया। भीतर कोई परिचित भी नहीं था।
उस ने सिगरेट जलाई। कश लिया। धुआं छोड़ा। सड़क की ट्रैफ़िक देखी। उस का शोर सुना और अपने आप से पूछा- ये कहां आ गए हैं हम! ये हो क्या रहा है? अब वह अपने साथियों के साथ कहां बैठे? लगा कि सिर की नसें तड़क जाएंगी। वह बरामदे की सीढ़ियों पर ही बैठ गया।
घर में माता-पिता नाराज़, गांव के लोग नाराज़, आफ़िस से चेयरमैन नाराज़। सिस्टम से वह ख़ुद नाराज़। तिस पर काफ़ी हाउस का लापता हो जाना। तो क्या अब वह अपने आप से नाराज़ हो जाए?
यह कौन सी प्यास है?
काफ़ी हाउस के बरामदे और सड़क के बीच संधि बनी सीढ़ियां कुछ नहीं बता पातीं। सिगरेट के आखि़री कश के बाद सिगरेट फेंकता, पैंट झाड़ता वह उठ खड़ा होता है।

शराब, सिगरेट, सुलगन और जिमखाना!
हां, अब वह जिमखाना में बैठा शराब पी रहा है। आज जाने क्यों चिकेन उसे अच्छा नहीं लग रहा। पनीर के कच्चे टुकड़ों पर काली मिर्च और नमक छिड़क कर, पनीर से काम चला रहा है। थोड़ी दही भी वह मंगवा लेता है। और अपने मित्र माथुर से पूछ रहा है, ‘कभी दही के साथ मदिरा ट्राई की है?’
‘नहीं तो!’
‘आज ट्राई करो और मज़ा न आए तो बताओ!’
‘ओ.के.!’ माथुर बोला, ‘क्या बात है आज वेजेटेरियन हो गए हो?’
‘क्या करें यार!’
‘फिर भी?’
‘ज़माने की मार है डियर!’
‘मतलब?’
‘सिंपल!’ आनंद बोला, ‘सिस्टम के हो कर अगर तुम न चलो तो सिस्टम तुम्हें तोड़ देता है।’
‘ये तो है।’ माथुर बोला, ‘देखो न हमारी हाई कोर्ट में जो वकील जस्टिस लोगों को फिट कर लेता है, पैसा थमा देता है, लड़की थमा देता है, सफल वकील बन जाता है। का़नून की मां बहन कर देता है। और जो क़ानून जानता है, का़नून जानने की ढोल पीटता है, वह क्रेक, असफल और निरा मूर्ख मान लिया जाता है!’
‘ये तो है!’ आनंद बोला, ‘हर जगह, हर हलके में यही हाल है। एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं। योग्यता और मेरिट का पहाड़ा पढ़ने वाले मारे जा रहे हैं। भड़ुवे, दलाल, हिप्पोक्रेट साले आगे जा रहे हैं।’
‘अब क्या करें?’ माथुर अपना पैग ख़त्म करता हुआ बोला।
‘कुछ नहीं तुम मेरे पुराने यार हो, वकील हो, थोड़ी तुम्हें चढ़ भी गई तो मुझे लगता है, नाटक नहीं करोगे, सच बोलोगे।’
‘बात तो बताओ!’
‘ये दो चीज़ें; एक इलाज और दूसरा न्याय आदमी के लिए सपना क्यों बनता जा रहा है? बल्कि कहूं मृगतृष्णा!’
‘ये तो मुझे भी नहीं मालूम!’ माथुर बोला, ‘मौज मस्ती की बातों की जगह आज यह तुम क्या ले कर बैठ गए हो। खाओ, पियो, मौज करो और घर चलो। इन सब बेकार की चीज़ों में वक़्त ज़ाया करने से क्या मिलेगा? सिवाय हताशा के?’
‘ये तो है!’
‘चलो औरतों की बात करते हैं।’
‘हां, ये बात हुई।’
‘पर क्या करें यार कोई सुंदर औरत देखे ज़माना हो गया। मदभरी आंखें तो जैसे सपना हो गईं। ये नयन डरे-डरे, जाम भरे-भरे गाने का कोई मतलब ही नहीं रहा।’
‘ये तो है!’
‘पर जानते हो क्यों?’
‘क्यों?’
‘ये ब्यूटी पार्लर!’
‘मतलब?’
‘ब्यूटी पार्लरों ने औरतों की ख़ूबसूरती छीन ली है। देह की लोच, आंखों का नशा नष्ट कर दिया है। औरतें अब लाख फ़ेमनिस्ट बनें पर कठपुतली हो गई हैं। दुनिया भर का मेकअप पोते, नक़ली सुंदरता ओढ़े। हुंह घिन आती है।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘एक काम करो यार!’
‘क्या?’
‘एक जनहित याचिका दायर कर दो।’
‘किस बात के लिए?’
‘दुनिया भर के ब्यूटी पार्लर बंद करने के लिए।’
‘क्यों?’
‘ये औरतों को नक़ली और नख़रेबाज़ बना रहे हैं।’
‘क्या यार तुम भी!’ माथुर बिदकता हुआ बोला, ‘शेरो शायरी सुनाने वाला आदमी आज क्या बकबक कर रहा है? हो क्या गया है तुम को आनंद?’
‘हो नहीं गया है, हो गया हूं।’
‘क्या?’
‘कुत्ता।’
‘क्या!’
‘हां धोबी का कुत्ता! न घर का, न घाट का!’
‘क्या?’
‘सच कह रहा हूं।’ वह शराब देह में ढकेलता हुआ बोला।
‘ओह तो आज तुम कुछ प्राब्लम में हो?’
‘तुम शेर सुनाने के लिए कह रहे थे न?’
‘हां, सुनाओ तो कुछ सिर दर्द कम हो!’
‘नो, सिर दर्द बढ़ जाएगा!’
‘अच्छा सुनाओ तो!’
‘रंग बिरंगे सांप हमारी दिल्ली में/क्या कर लेंगे आप हमारी दिल्ली में। पता है वह काफ़ी हाउस वाले मधुसूदन जी हैं न, एक दिन बहुत मूड में थे तो सुना रहे थे। बाद में गुस्सा हो गए!’
‘ओह!’
‘पर क्या फ़ायदा?’
‘किस का?’
‘अब काफ़ी हाउस ही नहीं रहा!’
‘ओह तो तुम को इस का अफ़सोस है?’
‘किस का?’
‘काफ़ी हाउस का!’
‘किस-किस का अफ़सोस बताऊं तुम को?’
‘नहीं अब इतना जो चट रहे हो तो बता ही दो!’
‘वो शेर सुनाया था न! रंग बिरंगे सांप हमारी दिल्ली में।’
‘हां!’
‘पर ग़लत सुनाया था!’
‘ओह!’
‘सही यह है कि रंग बिरगे सांप हमारी ज़िंदगी में/क्या कर लेंगे आप हमारी ज़िंदगी में?’
‘ओह यार तुम कोई सीधी साफ़ बात भी करोगे आज?’
‘अब और कितनी साफ़ करूं?’
‘ओह!’
‘बल्कि कैसे करूं?’
‘बाप रे कहां बैठ गया मैं आज!’ माथुर माथा पीटते हुए बोला।
‘यही तो, यही तो!’ आनंद जैसे चहका, ‘देखो अब तुम भी मेरे खि़लाफ़़ हो गए!’
‘मैं तुम्हारे खि़लाफ़ नहीं हूं आनंद! अंडरस्टैंड मी!’ उस ने बाल खुजलाते हुए कहा, ‘पर तुम आज बुरी तरह मुझे चाट रहे हो।’
‘ओ.के., ओ.के.। थोड़ी शराब और मंगवा लो नहीं चटूंगा, चुप रहूंगा।’
‘मंगवाता हूं भाई!’ माथुर ने कहा और वेटर को आवाज़ दी।
‘गुड!’ आनंद बोला, ‘तुम्हें पता है सिर्फ़ तुम्हीं नहीं नाइंटी, नाइंटी फ़ाइव परसेंट लोग मेरे खि़लाफ़ हैं।’
‘क्या तुम यहां पहले से पी कर आए हो?’
‘क्यों बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हो आज मुझे?’
‘दोस्त हो यार बर्दाश्त क्या करना! जी रहा हूं तुम्हें।’ माथुर बोला, ‘बहुत जिया है तुम्हें, आज भी जी रहा हूं। पर आज का सीन ज़रा डिफ़रेंट है!’
‘है न! बहुत है।’ आनंद बोला, ‘बताओ तुम ने मुझे बहुत जिया है, पर मैं आज जी नहीं पा रहा हूं। जानते हो क्यों? बल्कि पूछो क्यों?’
‘क्यों?’
‘क्यों कि नाइंटी, नाइंटी फ़ाइव परसंेट बल्कि नाइंटी नाइन कह लो इस समाज के लोग, दुनिया के लोग मेरे खि़लाफ़ हैं। समाज के, घर के, द़तर के नाइंटी नाइन परसेंट लोग मेरे खि़लाफ़ हैं! तो कैसे जी पाऊंगा?’
‘पर यार बात क्या हुई ये तो बता!’ माथुर आनंद का हाथ पकड़ कर पूछते हुए भावुक हो गया।
‘सुनना चाहता है तो चुपचाप सुन! बोलना नहीं बीच में।’
‘ओ.के.!’
‘फिर बोल दिया!’ आनंद ने माथुर को तरेरा तो माथुर ने होठों पर उंगली लगा कर चुप रहने की हामी भरी और बोला नहीं।
फिर दोनों चुप हो गए।
पीते रहे, खाते रहे। पर बोले नहीं।
अंततः माथुर ने उस से पूछा, ‘अब तुम बोलते क्यों नहीं? बोलेगे भी?’
‘क्या बोलता? तुम ने उंगली के इशारे से कहा कि चुप रहो तो मैं चुप हो गया।’
‘अरे नालायक़ वो मैं ने अपने चुप रहने का इशारा किया था।’
‘अच्छा-अच्छा!’ आनंद बोला, ‘लगता है अब मुझे चढ़ रही है।’
‘नहीं-नहीं, तू बोल जो भी बोलना है! चढ़े चाहे उतरे! तुम को क्या?’
‘तो मैं क्या कह रहा था?’
‘नाइंटी परसेंट........!’
‘नहीं-नहीं, नाइंटी फाइव ही रहने देते हैं। जानते हो क्यों? क्यों कि अब तुम तो मेरे साथ आ गए हो।’ आनंद ज़रा रुका और माथुर की तरफ़ देखा और बोला, ‘बोलना नहीं, तुम चुप रहना!’
माथुर ने सिर स्वीकृति में हिला दिया।
‘बताओ मैं पंडित हूं। मतलब ब्राह्मण। पर ब्राह्मण लोग कहते हैं कि तुम ब्राह्मण नहीं हो। कुजात हो। क्यों कि अछूतों के यहां, दलितों, पिछड़ों, मुसलमानों के साथ खाते, पीते, उठते-बैठते हो! चलो मान लिया। पर ये दलित, मुसलमान, पिछड़े कहते हैं कि साथ खा पी लेने से क्या होता है? हो तो तुम पंडित ही, ब्राह्मण! तो मैं क्या हुआ? हुआ न धोबी का?’
माथुर ने स्वीकृति में सिर हिला दिया।
राजनीति करता था, जब पढ़ता था। छात्र राजनीति! और जब राजनीति करने का समय आया तो नौकरी करने लगा। बोलना था राजनीतिक मंचों पर, बोलने लगा सेमिनारों में। तो क्या हुआ?’
माथुर ने बिना बोले हाथों से धोबी की तरह कपड़ा धोने का इशारा किया।
‘हूं। बिलकुल ठीक समझा तुम ने। अब मैं गांव जाता हूं तो मुझे देख कर अम्मा पिता जी डर जाते हैं। अम्मा कहती हैं गांव में हमें रहना है तुम्हें नहीं, तुम क्या जानो गांव की राजनीति? पिता जी तंज़ करते हैं कि देश प्रदेश की राजनीति करते हो, सब समझते हो, मैं क्या कहूं? मतलब यह कि ख़ाक समझते हो! गांव को नष्ट करने वाला फ़ौजी पंडित धमकाता है कहता है कि मैं गांव में पाकिस्तान पाल पोस रहा हूं। गांधी जी ऐसे ही हे राम! बोल गए थे। और बताता है कि ऐसे तो तुम एम.एल.ए., एम.पी., मिनिस्टर कुछ नहीं बन पाओगे! एक निर्दोष लड़का मारा जाता है, शहर सांस नहीं लेता, मैं आवाज़ उठाता हूं तो लोग समझते हैं कि मैं चुनावी ज़मीन तैयार कर रहा हूं। संयोग से जनता साथ खड़ी हो जाती है, मूवमेंट खड़ा हो जाता है तो होम सेक्रेट्री कहता है कि मूवमेंट वापस ले लीजिए, नहीं दंगा हो जाएगा। मंदिर का एक महंत जो एम.पी. भी है मेरे शहर का और पूरी बेशर्मी से अपराधियों को कांख मेें दाब कर घूमता है और तर्क देता है कि माला के साथ भाला भी ज़रूरी है। पूरी कमिश्नरी को सांप्रदायिकता के ज्वालामुखी पर बैठा देता है। उस की इस नस पर मैं हाथ रखता हूं तो वह मुझ से राजनीतिक या सामाजिक तौर पर निपटने के बजाय मुझे मेरी नौकरी से निपटाने के उपक्रम में लग जाता है। कंपनी के चेयरमैन को धौंसियाता है। बेरीढ़ चेयरमैन जो मुझ से पहले लायज़निंग करवाना चाहता था, मना कर देने पर साइड लाइन कर देता है मुझे। और इस महंत के धौंसियाने पर अपने चमचे पी.ए. से मुझे ज़लील करवाता है। ख़ुद बात नहीं करता, पी.ए. से थाह लेता है। इस्तीफ़े की पेशकश पर बिज़नेस की ट्रिप इस्तेमाल करवाता है कि अरे, अरे ऐसा नहीं। चुनाव लड़ने की मेरी हैसियत नहीं, न किसी पार्टी में हूं, न वोट बैंक है, न पैसा, न छल-छंद पर तमन्ना संसदीय राजनीति की है। हूं समाजवादी, पर नौकरी कारपोरेट सेक्टर की करता हूं। तो मैं क्या हुआ?’
माथुर चुप है!
‘अरे बोलो मैं क्या हुआ?’
माथुर फिर धोबी की तरह कपड़ा धोते हुए हाथ उठाने गिराने का अभिनय करता है।
‘अरे बेवकू़फ़ धोबी नहीं!’ आनंद बोला, ‘साफ़ बोलो धोबी का कुत्ता!’
माथुर मुंह बिचकाते हुए स्वीकृति में सिर हिलाता है।
‘और अभी जब मैं घर जाऊंगा और कुछ कहूंगा तो बीवी बोलेगी आप ने ज़्यादा पी ली है। सो जाइए। सुबह बात करिएगा। और सुबह मैं बात भूल जाऊंगा। वह याद भी नहीं दिलाएगी। तो मैं क्या हुआ?’
‘घर का न घाट का! धोबी का कुत्ता!’ माथुर सांस छोड़ते हुए बोला।
‘अब ठीक समय पर तुम बोले।’ आनंद मुसकुराते हुए बोला, ‘गुड एडवोकेट! पर साले तुम्हारी इस मुख मुद्रा और चुप रहने की इस कला पर तो तुम्हें न्यायमूर्ति होना चाहिए। वह सब भी तो ऐसे ही चुप रहते हैं।’ वह हंसा, ‘गांधी के बीच वाले बंदर की तरह!’
माथुर भी हंसने लगा।
‘तुम साले सोच रहे होगे कि मुझे चढ़ गई है।’
‘तुम्हारी तो नहीं पता पर अपनी तो उतर गई है।’ माथुर बोला, ‘दो डबल पेग और मंगा लें। नहीं बार बंद होने को है।’
‘मंगवा लो!’ आनंद बोला, ‘और हां दही भी।’
‘ओ.के.।’
‘पर यार वह बात तुम भूलना नहीं।’
‘क्या?’
‘जनहित याचिका वाली।’
‘किस बात के लिए?’
‘वो ब्यूटी पार्लर्स बंद करने के लिए!’
‘ओ.के., ओ.के.।’ माथुर बोला, ‘तुम कहो तो ये पुलिस इनकाउंटर मामले पर भी रिट हो सकती है। सरकार, एडमिनिस्ट्रेशन जाने क्या करें?’
‘नो डियर!’ आनंद बोला, ‘इस बात पर तो हमारी तुम्हारी कुट्टी हो जाएगी।’
‘ओ.के., ओ.के.।’ माथुर बोला, ‘इस पर नहीं करूंगा।’
‘क्यों? जानते हो क्यों मना कर रहा हूं?’
‘क्यों?’
‘पुलिस इनकाउंटर वाला मामला जनता का है, जनता को निपटने दो। जनता के इशू को कोर्ट में डाल कर जनता को कायर बनाना ठीक नहीं।’ वह बोला, ‘पर ये ब्यूटी पार्लर वाला मामला कोर्ट का मामला है। देखना कोर्ट फ़ौरन सुन लेगी। अब आर्डर चाहे जो दे पर सुन ज़रूर लेगी।’
‘ओ.के.।’
‘हां, क्यों कि औरतों की सुंदरता, नैसर्गिक सुंदरता बचानी है। यह बहुत बड़ी बात है। पर्यावरण बचाना है, औरत की सुंदरता बचानी है। कोई नहीं बचाएगा, कोर्ट बचाएगी। सॉरी, माननीय कोर्ट!’ आनंद झूम कर बोला, ‘बोलो ठीक!’
‘बिलकुल ठीक!’ माथुर ने जैसे ताल में ताल मिलाई।
‘पर यार एक प्राब्लम है!’
‘अब क्या?’
‘ये तुम्हारे जज की डिमांड कैसे पूरी होगी?’
‘क्यों?’
‘नहीं अभी कुछ दिन पहले मेरा एक मास्टर दोस्त एक कहानी का फ्रे़म बता रहा था। बता रहा था कि एक जज के घर में पार्टी हो रही थी। अचानक एक ग़रीब सा टीनएज लड़का जज के पास पहुंचा अपनी टीनएज बहन के साथ। उस ने जज से कहा कि साहब मेरा बाप जेल में है। कल उन की पेशी है। उन को छोड़ दीजिएगा। यह मैं आप के लिए ढेर सारा पैसा लाया हूं चोरी कर के। रख लीजिए। और हां, मैं ने सुना है आप लोग लड़की भी लेते हैं। तो यह देखिए मैं अपने साथ अपनी बहन को भी लाया हूं। मेरी बहन को आज रोक लीजिए। लेकिन कल मेरे बाप को छोड़ ज़रूर दीजिएगा। कह कर वह लड़का जज के पैरों पर गिर गया। साथ में उस की बहन भी।’ आनंद ने माथुर की आंखों में झांका और फिर बोला, ‘डियर यह सब तो मुझ से नहीं हो पाएगा!’
‘हो तो मुझ से भी नहीं पाएगा।’ माथुर बोला, ‘साले तुम ने फिर मेरी उतार दी। अब शराब भी नहीं मिलेगी। बार बंद हो गई है। चलो अब घर चलें।
‘अभी नहीं।’
‘नशा तो उतर ही गया है। क्या पैंट भी उतार दूं?’ माथुर खीझा।
‘अरे नहीं चलो!’ आनंद बोला, ‘पर मुझे पेशाब लग गई है ज़ोर की।’ और वहीं लान में ही खड़े-खड़े उस ने जिप खोल दी। और शुरू हो गया।
‘यह क्या है आनंद?’ माथुर गला दबा कर चीख़ा, ‘क्या मेरी मेंबरशीप ख़त्म करवाओगे? सब लोग देख रहे हैं। औरतें भी यहां हैं।’
‘जो कर रहा हूं, करने दो!’ आनंद ने गाली बकी और कहा, ‘मैं यह क्लब के लान पर नहीं, सिस्टम पर मूत रहा हूं, मूतने दो! खि़लाफ़़ लोगों, मतलब अपने खि़लाफ़ लोगों पर मूत रहा हूं, मूतने दो!’ उस ने दुहराया और चिल्लाते हुए दुहराया, ‘मूतने दो। यह मेरा नपुंसक लेकिन मौलिक अधिकार है। जो कोई रोकेगा तो जनहित याचिका दायर कर दूंगा। श्योर कर दूंगा।’
पेशाब करने के बाद वह पीछे मुड़ा और बाहर गेट की तरफ़ चला। लड़खड़ाते हुए। माथुर उस के बगल में आता हुआ खुसफुसाया, ‘जिप तो बंद कर लो अपनी!’
‘तुम कर दो जिप बंद?’
‘क्या?’ माथुर किचकिचाया।
‘क्यों? मेरी जनहित याचिका तुम दायर करोगे तो मेरी जिप बंद करने क्या वह मंदिर का महंत आएगा?’
‘ओह आनंद आज तुम को क्या हो गया है। पूरी तरह आउट हो गए हो!’
‘हां डियर माथुर मुझे थाम लो नहीं अब मैं गिर जाऊंगा।’
‘ओ.के., ओ.के.।’ कह कर माथुर ने आनंद को थाम लिया। पर दो क़दम चलते ही दोनों ही गिर गए!
वेटरों ने आ कर दोनों को उठाया।
‘थैंक यू, थैंक यू!’ आनंद वेटरों से बोला। वेटरों ने दोनों को क्लब के रिसेप्शन पर ला कर बिठा दिया।
माथुर की तरफ़ देख कर आनंद मुसकुराया और बोला, ‘जानते हो माथुर अब हम दोनों ही क्या हैं?’
माथुर ने मुंह पर अंगुली रख कर चुप रहने का इशारा किया, धोबी की तरह हाथ उठा-गिरा कर कपड़ा धोने का अभिनय किया और फिर हाथ के इशारे से ही कुत्ता दौड़ा कर दिखाया। और मुंह पिचका कर बोला, ‘हुम!’ ऐसे गोया वह आनंद से बात नहीं कर रहा हो, दूरदर्शन पर मूक बधिर समाचार पढ़ रहा हो!
‘गुड!’ आनंद बोला। और फिर चुप हो गया।
दोनों ने देखा कि उन दोनों की स्थिति का पूरा रिसेप्शन मज़ा ले रहा है तो दोनों गहरी ख़ामोशी में ऐसे डूब गए, गोया कुछ हुआ ही न हो।
एक बिज़नेसमैन अपनी बीवी के साथ गुज़रा तो उस की बीवी ने आनंद और माथुर की ओर इंगित कर पूछा, ‘हूज़ दीज़ पीपुल्स!’
‘कुछ नहीं साले सब समाजवादी हैं। पी-पा कर लुढ़क जाते हैं और सोचते हैं कि समाज में क्रांति हो गई।’
‘हिप्पोक्रेट पीपुल!’ उस की बीवी मुंह गोल कर बोली और बड़ी हिक़ारत से मुसकुराती हुई ठुक-ठुक करती चली गई।
आनंद अब रिसेप्शन के सोफे़ पर पैर मोड़ कर लेट गया था। क्लब का एक कर्मचारी उस के पास आया। कहने लगा, ‘सर टैक्सी, रिक्शा, आटो कुछ मंगवा दूं?’
‘क्यों?’ आनंद भड़का, ‘गाड़ी है मेरे पास!’
‘ड्राइवर है?’
‘नहीं, ख़ुद ड्राइव करूंगा।’
‘सर आज ड्राइव न करें तो सेफ़ रहेगा।’
‘अच्छा तुम जाओ, कि तुम्हें बोझ लग रहा हूं?’
‘ओ.के. सर! सॉरी सर!’ कह कर वह चला गया।
‘यार यहां से चला जाए नहीं थोड़ी देर में नुमाइश लग जाएगी यहां हम लोगांे की।’
फिर दोनों बाहर आ गए।
‘यार माथुर हमें कोई आटो या रिक्शा करवा दो। सचमुच गाड़ी ड्राइव करने में कहीं भिड़ भिड़ा गया तो दिक़्क़त हो जाएगी। लोग तो खि़लाफ़ हैं ही, सड़कें भी खि़लाफ़ हो जाएंगी।’
‘कुछ नहीं चलो मैं तुम्हें छोड़ते हुए चला जाऊंगा।’
‘तुम साले ख़ुद ही फ़िट नहीं हो, हमें क्या छोड़ोगे?’
‘उतर गई है मेरी, मेरे साथ चलो!’
आनंद उस की कार में बैठ गया। घर पर उतरते समय आनंद बोला, ‘यार वह जनहित याचिका!’
‘हां, हां।’
‘कौन सी?’
‘इनकाउंटर वाली!’
‘अरे नहीं!’
‘फिर?’
‘वो ब्यूटी पार्लर वाली!’
‘अच्छा-अच्छा। बिलकुल-बिलकुल!’
‘थैंक यू!’ आनंद बोला, ‘मुझे ऊपर तक छोड़ दोगे?’
‘श्योर!’
फिर माथुर उस को पकड़ कर ले जाने लगा। तो आनंद जैसे टूट कर बोला, ‘यार माथुर मैं बिखर गया हूं। मुझे संभाल लो!’
‘मैं हूं तुम्हारे साथ ना!’ आनंद को कस कर पकड़ते हुए माथुर बोला।
‘थैंक्स डियर।’ घर के दरवाज़े पर पहुंच कर आनंद बोला, ‘अब यार घंटी बजा कर तुम चले जाओ। नहीं बीवी तुम्हें देखेगी तो ख़ामख़ा तुम्हारी इंप्रेशन बिगड़ जाएगी। वह तुम पर नाराज़ भी हो सकती है।’
‘ओ.के., ओ.के.!’
‘वो एक शेर है न!’
‘इरशाद-इरशाद!’
‘मेरे दिल पे हाथ रक्खो, मेरी बेबसी को समझो, मैं इधर से बन रहा हूं, मैं इधर से ढह रहा हूं।’
‘तुम्हें नहीं ढहने देंगे डियर!’ माथुर उसे बाहों में भरते हुए बोला।
‘घंटी बजाओ और जाओ।’
‘ओ.के.।’ कह कर माथुर ने बेल बजाई और सीढ़ियां उतर गया।
माथुर सीढ़ियां तो उतर गया। पर आनंद का इस तरह फ्ऱस्ट्रेट होना उसे शॉक कर गया था। अपने घर पहुंचने के पहले उस ने आनंद के घर उस के लैंड लाइन फ़ोन पर फ़ोन किया। आनंद की बीवी ने फ़ोन उठाया तो वह बोला, ‘भाभी मैं माथुर बोल रहा हूं।’
‘कौन माथुर?’
‘एडवोकेट माथुर!’
‘अच्छा-अच्छा हां माथुर भइया बताइए।’ वह बोली, ‘इतनी रात को?’
‘सॉरी, आनंद घर पहुंच गया न?’
‘हां, क्यों?’ वह बोली, ‘लुढ़के पड़े हैं बिस्तर पर। बताइए बात कराऊं?’
‘नहीं-नहीं।’ माथुर बोला, ‘बात तो आप से करनी थी।’
‘सुबह बात करिएगा। अभी आप बहके हुए हैं।’
‘नहीं-नहीं बस एक मिनट!’
‘अच्छा बोलिए!’
‘आनंद को थोड़ा संभालिए!’
‘हूं।’
‘असल में वह टूट गया है भीतर ही भीतर। काफ़ी टूट गया है।’ माथुर बोला, ‘भाभी बुरा मत मानिएगा, पर हम लोगों को उसे बिखरने से, टूटने से बचाना है, सहेजना है।’
‘हूं।’ आनंद की बीवी बोली, ‘और कुछ?’
‘नहीं बस!’ माथुर बोला, ‘और हां, उसे कुछ कहिएगा नहीं।’
‘ओ.के. माथुर भइया!’
‘पर भाभी उस को हुआ क्या? जो इतना अपसेट हो गया है?’
‘हम लोग सुबह बात करें?’
‘ओ.के.।’ माथुर बोला, ‘अगेन सॉरी, भाभी!’
आनंद की बीवी ने फ़ोन रख दिया। और बेडरूम में आ गई। आनंद को झिंझोड़ा बोली, ‘खाना खाएंगे?’
‘नहीं दूध दे दो।’ आनंद बुदबुदाया, ‘मोबाइल आफ़ कर दो, और हां, दूध भी रहने दो, पानी दे दो।’
पानी पी कर वह सो गया।
सुबह देर से वह उठा तो पत्नी ने पूछा, ‘रात गाड़ी नहीं लाए थे क्या?’
‘क्यों?’
‘नीचे गाड़ी नहीं खड़ी है इस लिए पूछा।’
‘हां, कुछ प्राब्लम थी, इस लिए नहीं लाया।’
‘आफ़िस जाएंगे, नाश्ता तैयार करूं।’
‘नाश्ता दो, पर आफ़िस आज नहीं जाऊंगा। और मन कहेगा तो अब कभी नहीं जाऊंगा।’
‘क्या?’
‘हां।’
पत्नी को रात माथुर की बात याद आ गई। सो चुप रह गई। और ख़ुद भी आफ़िस नहीं गई। आनंद ने उस से पूछा भी कि, ‘क्या तुम आफ़िस नहीं जाओगी?’
‘नहीं आज मैं भी नहीं जाऊंगी।’
‘क्यों?’
‘कुछ नहीं बस आप के साथ रहूंगी।’ वह बोली, ‘बहुत दिन हो गए हम लोग एक साथ पूरे दिन नहीं रहे, आज रहेंगे।’
‘क्या बात है, आज बड़ी रोमेंटिक हो रही हो?’
वह मुसकुरा कर रह गई।

....जारी....

लेखक दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424, This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है. इसके पहले के सभी भागों को पढ़ने के लिए नीचे कमेंट बाक्स के ठीक बाद में आ रहे शीर्षकों पर एक-एक कर क्लिक करते जाइए.


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