सुनता हूं कि मैडम टिकट में ही पैसे ले लेती हैं

E-mail Print PDF

दयानंद पांडेय: उपन्यास-  ''वे जो हारे हुए'' : भाग (7) : इसी डिप्रेशन में रात ज़्यादा पी ली : ज्योतिष और संतई भी डूब गई है जनाब इन चैनलों के बाज़ार में : आनंद ने मोबाइल का स्विच आन किया, फ़ोन का रिसीवर फ़ोन पर रखा और अख़बार पढ़ने लगा। अख़बारों में चुनावी गहमा गहमी ही ज़्यादा थी, ख़बर कम। प्रायोजित ख़बरों की जैसे बाढ़ आई हुई थी अख़बारों में। अंदर के एक पन्ने में उस के ज्ञापन वाली ख़बर भी दो पैरे की थी और क़ासिम का इनकाउंटर करने वाले दारोग़ा के सस्पेंशन की ख़बर भी थी।

वह अख़बार पढ़ ही रहा था कि मुनव्वर भाई का फ़ोन आया। बहुत उत्साहित थे। बता रहे थे कि वहां के अख़बारों में उन के मूवमेंट की ख़बर ख़ूब फैला के छपी है। भाषण देते हुए उन की फ़ोटो और भारी जन समूह की फ़ोटो एक साथ छपी थी। दारोग़ा के सस्पेंशन की ख़बर भी वह बताते रहे। साथ ही बताया कि, ‘आज का आंदोलन और ज़ोरदार होगा।’

‘पर मुद्दा क्या होगा?’
‘वही क़ासिम!’
‘क़ासिम में क्या?’
‘उस की फ़र्जी मुठभेड़!’
‘फ़र्जी मुठभेड़ नहीं मनुव्वर भाई, हत्या! क़ासिम की हत्या और हत्यारों के खि़लाफ़ मुक़दमा, उन की गिऱतारी।’
‘हां, हां यही-यही!’
‘और एक बात का विशेष ध्यान रखिएगा कि इस आंदोलन में शरारती तत्वों की शिरकत रत्ती भर भी नहीं हो। बिलकुल शांतिप्रिय ढंग से। सांप्रदायिक उफान भी नहीं आना चाहिए रत्ती भर भी। प्रशासन पर ही हमलावर रहिएगा भाषणों में।’
‘बिलकुल-बिलकुल।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘हम अपनी ज़िम्मेदारी ख़ूब समझते हैं।’
‘हां अगर पुलिस लाठीचार्ज वग़ैरह भी करे जो भीड़ को तितर-बितर करने के लिए तो जवाबी पथराव वग़ैरह भी नहीं होना चाहिए। शांतिप्रिय आंदोलन चाहिए हमें यह हर क्षण याद रखिएगा।’
‘बिलकुल-बिलकुल।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘महातमा जी के रास्ते से ही सांप्रदायिकता के खि़लाफ़ हम लड़ेंगे।’
‘एक्जे़क्टली!’
बात ख़त्म हो गई।
दोपहर में चेयरमैन के पी.ए. का फ़ोन आया। पूछने लगा, ‘सर, आज आप आफ़िस नहीं आए।’
‘हां भाई। कल आप की बातों ने मुझे बहुत परेशान कर दिया। डिप्रेशन में आ गया। इसी डिप्रेशन में रात ज़्यादा पी ली। पूरी देह टूट रही है। इस लिए नहीं आया।’
‘राइट सर, राइट! हम समझे कि आप ख़फ़ा हो गए।’
‘नहीं, नहीं। आप लोग अगर नहीं चाहते तो मेरी दिलचस्पी अभी इस्तीफ़ा देने की है भी नहीं। वह बोला, ‘यह तो आप लोगों पर डिपेंड करता है।’
‘नहीं सर इधर से ऐसी कोई बात नहीं है।’ पी.ए. बोला, ‘बस सर ज़रा एक बार आप महंत जी से बात कर लेते। रियलाइजे़शन कर लेते!’
‘क्या?’ आनंद भड़का।
‘नहीं सर, मैं ऐसा नहीं कह रहा!’
‘तो फिर?’
‘आनरेबिल चेयरमैन सर चाहते थे कि मामला किसी तरह रफ़ा दफ़ा हो जाता।’
‘तो अब मुझे महंत जी से माफ़ी मांगनी होगी?’ आनंद बोला, ‘ठोकर मारता हूं ऐसी नौकरी पर।’
‘माफ़ी नहीं सर!’
‘फिर?’
‘बातचीत सर!’
‘अभी तो आप रियलाइज़ेशन की बात कह रहे थे।’ आनंद बोला, ‘आप शायद जानते नहीं, जान लीजिए और चेयरमैन साहब को भी बता दीजिएगा कि अपनी आइडियालजी की क़ीमत पर मैं अपनी ज़िंदगी भी जीना गवारा नहीं करूंगा, यह तो नौकरी है।’
‘राइट सर, राइट! आई आनर सर!’ वह बोला, ‘बस बातचीत कर के मामला निपटवा दीजिए।’
‘देखिए बातचीत इतना होने पर भी अगर भारत पाकिस्तान में हो सकती है तो महंत जी से बातचीत करने में मुझे ऐतराज़ नहीं है। कहिए उन से कि बातचीत, शास्त्रार्थ हर चीज़ के लिए मैं तैयार हूं। पर माफ़ी मांगने, घुटने टेकने और कंप्रोमाइज़ करने को मैं तैयार नहीं हूं।’
‘ठीक है आनंद जी, मैं बताता हूं। बस थोड़ा सा लैक्शेबिल होने की बात है।’
‘वो आप लोग हो लीजिए!’
बात ख़त्म हो गई।

आनंद जानता है कि चेयरमैन का पी.ए. स्पीकर आन कर बात करता है। चेयरमैन के सामने। चेयरमैन बात सुनता रहता है, इशारों से या लिख कर निर्देश देता रहता है, पी.ए. वैसा ही बोलता रहता है। इसी लिए वह भी बातचीत में चार क़दम आगे, दो क़दम पीछे की रणनीति बनाए रखता है। बाक़ी जानता तो वह भी है कि इस चुनावी बिसात में वह कहीं नहीं ठहरता। इस शतरंज में पैदल की भी हैसियत नहीं है उस की। राजा, रानी के बाद एक से एक हाथी, ऊंट, घोड़ा फैले पड़े हैं। सो चुनाव में कूदने की बात गीदड़ भभकी ही है। पारिवारिक ज़िम्मेदारियां हैं, बच्चों की पढ़ाई, लिखाई, शादी-ब्याह है, रुटीन ख़र्चे हैं, सो नौकरी की बाध्यता है। कहीं और प्लेट में सजा कर नौकरी रखी भी नहीं है। और कि वह यह भी जानता है कि आनंद के बहाने चेयरमैन महंत जी को भी सेट करने में लगा होगा ताकि बातचीत के बहाने आमदऱत बढ़े और बिज़नेस के फंदे में वह भी कंपनी का टूल बन जाए। ये पूंजीपति किसी को बेचने में सेकेंड भर की भी देरी नहीं लगाते। बड़ों-बड़ों को टूल और प्रोडक्ट बना लेने में इन्हें महारत है। किस हाथी को पैदल बना दें और किसी पैदल को घोड़ा वह ही जानते हैं। शतरंज की बिसात उन की, गोटियां उन की। खेल उन का। गोल्फ़ उन का, पोलो उन का। देश उन का। गोया देश, देश न हो खेल हो उन का।
ख़ैर शाम तक क़ासिम के इनकाउंटर टीम के खि़लाफ़़ हत्या के मुकदमे की ख़बर भी आ गई। प्रमुख सचिव गृह ने ख़ुद फ़ोन कर आनंद को यह ख़बर दी और कहा कि, ‘कांग्रीचुलेशंस!’
‘थैंक्यू! पर किस बात के लिए?’
‘अरे आप की सारी डिमांड्स कंपलीट हो गईं। इनकाउंटर टीम के खि़लाफ़़ हत्या का मुक़दमा लिखवाने के आर्डर्स हो गए हैं, मुआवजे़ के भी।’
‘अरे इस के लिए तो आप को बहुत-बहुत शुक्रिया!’
‘नहीं, नहीं शुक्रिया तो चीफ़ मिनिस्टर साहिबा को दीजिए। यह उन्हीं का फ़ैसला है। आ़टर आल उन्हें भी तो मुस्लिम वोटों की दरकार है। और फिर इस से तो महंत की राजनीति को भी धक्का लगेगा।’
‘चलिए इस सब से मुझे बहुत सरोकार नहीं है। मैं तो ख़ुश हूं बस इस बात से कि पीड़ित को न्याय मिल गया। वह भी इतनी जल्दी। जिस की कम से कम मुझे तो सच बताऊं, बहुत उम्मीद नहीं थी। और इतनी जल्दी तो क़तई नहीं। और आप की इस चीफ़ मिनिस्टर से तो हरगिज़ नहीं।’
‘चलिए अब आप का भी रास्ता साफ़!’
‘मतलब?’
‘आप के चुनाव लड़ने का मार्ग प्रशस्त हो गया। अच्छा ख़ासा आप गेन करेंगे!’
‘कहां की बात कर रहे हैं आप भी भाई साहब!’ आनंद बोला, ‘कहीं चुनाव-वुनाव लड़ने नहीं जा रहा मैं। इस चुनाव, इस राजनीति के लायक़ अब नहीं रहा मैं। कहां से इतना पैसा लाऊंगा, कहां से जातियों को भरमाऊंगा, हिंदू, मुसलमान कहां और कैसे लड़ाऊंगा?’
‘यह सब करने की आप को ज़रूरत भी अब कहां है? अब तो आप अपने शहर में हीरो हैं। पब्लिक टूट कर आप को वोट करेगी।’
‘इतनी ख़ुशफहमी में जीने की आदत पता नहीं क्यों मुझ में कभी नहीं रही।’
‘कुछ नहीं आनंद जी, कालीन बिछ गई है आप के लिए, बस अब आप को चलना है। आप के बस हां की देर है।’
‘समझा नहीं मैं।’
‘मैडम का सीधा प्रस्ताव है कि आप उन की पार्टी ज्वाइन कीजिए और अपने शहर से पार्टी के टिकट पर नामिनेशन कीजिए!’
‘यह आप क्या कह रहे हैं?’
‘चौंक गए न आप?’ प्रमुख सचिव गृह बोले, ‘मैं जानता था कि आप चौंकेंगे। खै़र, तो मैं आप की हां समझूं?’
‘यह पोलिटिकल प्रपोज़ल ब्यूरोक्रेटस कब से देने लगे भाई मैं तो समझ नहीं पा रहा।’
‘इस सब झमेले में आप मत पड़िए। आप तो बस हां कीजिए। फिर देखिए!’
‘पर वहां तो वह माफ़िया तिवारी का बेटा आलरेडी कंडीडेट डिक्लेयर है।’
‘वह कहां जीतने वाला है, यह तो मैडम भी जानती हैं।’
‘पर सुनता हूं कि मैडम टिकट में ही पैसे ले लेती हैं।’
‘यह सारे फै़क्टर्स आपके साथ निल हैं। मैडम तो बस महंत जी के खि़लाफ़ एक मज़बूत उम्मीदवार चाहती हैं जो उन्हें हरा दे। और आप वहां हीरो हो ही चुके हैं। महंत जी को टक्कर दे चुके हैं। ब्राह्मन हैं। एक प्लस प्वाइंट यह भी है। सोशल इंजीनियरिंग वाला फै़क्टर है ही। जुझारू छात्र नेता रहे ही हैं आप। सो आप आसानी से महंत जी को डिफ़ीट दे सकते हैं, ऐसा मैडम मानती हैं।’
‘मैडम कुछ नहीं जानतीं।’ आनंद बोला, ‘ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि कोई शीर्षासन भी कर ले तो आज की तारीख़ में महंत जी को हराना मुश्किल है। महंत जी की जड़ें वोटरों में बहुत गहरी हैं, मंदिर में आस्था के चलते वह जीत ही जाएंगे। आप नहीं जानते, मैडम नहीं जानतीं, पर मैं जानता हूं वहां की जनता को।’
‘कुछ नहीं, बड़ी-बड़ी इंदिरा गांधी हार गई हैं और फिर मैडम के करिश्मे को आप नहीं जानते, मिट्टी पर भी हाथ रख देती हैं तो सोना हो जाता है। फिर आप तो हीरा हैं, मैडम के लिए। बस अब आप हां कीजिए तो मैं मीटिंग फ़िक्स कराता हूं आप की मैडम के साथ।’
‘भाई मुश्किल है। बहुत मुश्किल।’
‘क्या?’
‘हां।’
‘क्यों?’
‘मेरी आइडियालजी मुझे एलाऊ नहीं करती इस काम के लिए।’ आनंद बोला, ‘मैडम जो राजनीति कर रही हैं या जिस राजनीति की वह हामीदार हैं, मैं उन की पार्टी में, उन के साथ एक क़दम नहीं चल सकता। लोहिया से सीखा था, जाति तोड़ो पर यह मोहतरमा तो इन दिनों जाति जोड़ो की राजनीति कर रही हैं, जाने कहां-कहां से जातियां खोज रही हैं, जातियों का ध्रुवीकरण कर सोशल इंजीनियरिंग की आइंस्टीन बनी हुई हैं। सो उन को अपना नेता नहीं मान सकता, उन की सामंती तानाशाही, जातिवादी राजनीति, फ़ासिस्ट तरीके़, गांधी के खि़लाफ़ उन का लगातार बोलना, ज़हर बोलना, कुछ भी तो मुझे सूट नहीं करता उन का!’
‘अरे यह कारपोरेट सेक्टर की दो कौड़ी की नौकरी सूट करती है आप को?’
‘नहीं करती।’
‘पर आप करते हैं।’
‘मजबूरी है जीवन यापन की।’
‘तो यह सक्रिय राजनीति में आने में, जो थोड़ी सी आइडियालजी आड़े आती है, उस को भी डायल्यूट कर लीजिए।’
‘मुश्किल है भाई साहब! मुझे माफ़ कीजिए।’ आनंद बोला, ‘नौकरी मैं अपने मन की नहीं कर सकता, मजबूरी है। पर राजनीति तो मैं अपने मन की ही करूंगा। मन की नहीं मिली तो नहीं करूंगा। वो आप ने एक गाना सुना होगा, दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें! तो दुनिया छोड़िए यहां तो ख़ुद ही से करें सवाल तो हम क्या जवाब दें?’ वह बोला, ‘सॉरी मेरे लिए यह नामुमकिन है।’
‘आप एक बार फिर सोच लीजिएगा आनंद जी!’
‘एक बार?’ आनंद बोला, ‘हज़ार बार सोच कर ही यह कहा आप से!’
‘दिक़्क़त यह है कि मैडम कहीं बुरा न मान जाएं!’
‘तो मानने दीजिए! इस से क्या फर्क़ पड़ता है!’
‘फ़र्क़ तो मुझे पड़ता है। मैं तो कानफ़िडेंट था कि आप मान जाएंगे।’
‘चलिए आप से अगेन सॉरी!’
‘मैडम की नाराज़गी आप नहीं जानते?’
‘फिर एक गाना दुहरा दूं? ये भी पुराना है- तीरे नज़र देखेंगे, ज़ख़्मे जिगर देखेंगे!’
‘चलिए आप तो गानों में बात निकाल दे रहे हैं और आप से एक गोल्डेन चांस निकला जा रहा है, यह आप नहीं सोच रहे? अरे सोचिए कि पूरा ले़ट, थर्ड फ्रंट मैडम को प्राइम मिनिस्टर डिक्लेयर कर चुका है तो कुछ सोच कर ही। आखि़र उन सब के पास भी अपनी-अपनी आइडियालजी है!’
‘आइडियालजी है?’ आनंद बोला, ‘अरे दुकान कहिए, दुकान! आइडियालजी की दुकान, सत्ता ख़रीदने बेचने की दुकान! गोया कबाड़ी की दुकान!’
‘फिर भी!’
‘आप मेरे जज़्बात, मेरी बात क्यों नहीं समझते?’
‘आप के इस जज़्बे को सैल्यूट! पर फिर भी आप विचार करिएगा, मैं फ़ोन फिर करूंगा!’
‘इस बात के लिए न ही करिए तो बेहतर!’
‘आप को तो संत होना चाहिए था, या हो जाना चाहिए!’
‘क्या बात कर रहे हैं आप भी, क्यों गाली दे रहे हैं?’
‘अब इस में गाली की क्या बात हो गई?’
‘आप देखिए जो चैनलों पर हैं, वही तो संत हैं?’
‘हां, और क्या?’
‘और ये सब संत, साध्वी हैं कि अभिनेता, अभिनेत्री हैं? गा रहे हैं, बजा रहे हैं, नाच रहे हैं, नचा रहे हैं, दुकान खोले बैठे हैं। पैसा लुटा रहे हैं, पैसा कमा रहे हैं। हज़ारों करोड़ का कारोबार है इनका। अरबों की हैसियत है इनकी और आप कह रहे हैं संत हैं ये सब! ज्योतिष और संतई भी डूब गई है जनाब इन चैनलों के बाज़ार में।’
‘चलिए यह सब फिर कभी। आप को फिर फ़ोन करता हूं।’
‘अरे हां यह बताइए कि कहीं मेरी असहमति, मेरे इंकार से बाक़ी सारे फ़ैसले बदल तो नहीं जाएंगे?’
‘अरे नहीं, वह सारे फ़ैसले हो जाने के बाद ही मैं ने आप को फ़ोन किया है।’ वह बोले, ‘चुनाव आयोग से अनुमति ले कर ही यह सब किया गया है। नहीं मामला भड़क जाएगा तो लेने के देने पड़ जाएंगे।’
‘ओ.के., ओ.के.।’
उस ने फ़ोन रख कर पत्नी को बताया कि, ‘मैडम का प्रपोज़ल है कि उन की पार्टी से मैं चुनाव लड़ूं!’
बात सुनते ही पत्नी लपक कर गले लिपट गई। बोली, ‘इस से अच्छी और क्या बात होगी?’ उसे जल्दी-जल्दी चूमती हुई बोली, ‘आप का डिप्रेशन, फ्ऱस्ट्रेशन सब छूट जाएंगे।’
‘पर मैं ने तो इंकार कर दिया।’
‘क्या?’ वह जैसे आसमान से गिरी। उस की बाहों का कसाव ढीला पड़ गया। फिर वह दूर छिटकती हुई बोली, ‘दुनिया बदल रही है, आप भी बदलिए!’
‘तो जा कर, दौड़ कर उस मूर्ख औरत के पैर छू लूं? अपने को गिरवी रख दूं? ताकि जो सांस ले भी पा रहा हूं, न ले पाऊं? जातियों के हिमालय में जा कर गल जाऊं?’
‘नहीं यह तो मैं नहीं कह रही।’
‘तो फिर?’
‘चुनाव लड़ना चाहिए!’
‘उस महंत के खि़लाफ़ जो एक नंबर का धूर्त है। संतई, साधना भूल कर आपराधिक सांप्रदायिक और हिंसक समाज की वकालत कर रहा है।’
‘हां।’ वह बोली, ‘तो उस के आगे आप हथियार मत डालिए।’
‘वहां की आधी से अधिक आबादी उस की अंध समर्थक है। ज़मानत भी नहीं बचेगी मेरी। फज़ीहत हो जाएगी, दाग़ लगेगा ऊपर से। जीवन भर की कमाई नष्ट हो जाएगी।’
‘कुछ नहीं मैडम की हवा है, प्राइम मिनिस्टर होने जा रही हैं, लड़ जाइए चुनाव आप भी मिनिस्टर हो जाइएगा, धड़ाक से। इस नौकरी से छुट्टी पा जाइएगा। आप के क़द से मेल नहीं खाती यह नौकरी।’ वह बोली, ‘और फिर नौकरी के लिए आप बने भी नहीं हैं, आप तो जन्मजात पोलिटिकल हैं।’
‘ख़ाक हैं!’ वह बोला, ‘अपने छोटे से गांव की नस तो समझ नहीं पाया आज तक! अपने गांव से दस-बीस वोट भी नहीं पा सकता और तुम संसदीय चुनाव की बात कर रही हो?’
‘मैडम के नाम पर आप को वोट मिलेंगे। ब्राह्मण, दलित, मुसलमान सभी। आप जीत जाएंगे।’
‘इतने सालों से मेरे साथ रह रही हो, इतना ही मुझे समझ पाई हो?’ आनंद उदास हो कर, बहुत धीरे से बोला।
पत्नी चुप रह गई।
बात टालने के लिए वह अकसर इसी चुप रहने का हथियार इस्तेमाल करती है। बहुत बड़ा हथियार है यह उस का।

चुनावी दंगल, आफ़िस की आफ़त, गांव की मुश्किलें सब कुछ छोड़ कर वह दूसरे दिन पत्नी, बच्चों को ले कर पहाड़ घूमने निकल गया।
यह कौन सी प्यास है?
जो पहाड़ पर ही बुझेगी?
कि संत होने की ओर वह अग्रसर है?
कोई गुफा, कोई कंदरा ढूंढ कर धूनी रमा लेगा वह?
या कि यह पलायनवादिता है उस की?
या फिर वह कहीं फिसल न जाए अपने मूल्यों, सिद्धांतों और आइडियालजी वगै़रह-वग़ैरह से!
शायद सब कुछ मिला जुला हो।
वह कभी सुनता था कि तमाम राजस्थानी, और महाराष्ट्रियन पंडित अपना धर्म बचाने के लिए नदियों के किनारे-किनारे भागते-भागते पहाड़ों में आ कर छुप गए थे। तो क्या वह भी अपना धर्म बचाने के लिए पहाड़ों पर आ गया है?
वह नहीं जानता। पर आ गया है।
पत्नी तो बहुत नहीं, पर बच्चे ख़ूब ख़ुश हैं। उसे अच्छा लग रहा है। पहाड़ों का हुस्न इस में और इज़ाफ़ा कर रहा है। उसे एक फ़िल्मी गाना याद आ रहा है, ‘हुस्न पहाड़ों का क्या कहने कि बारों महीने यहां मौसम जाड़ों का।’ नैनीताल के ताल वह घूम रहा है। नैनी ताल, भीम ताल, नौकुचिया ताल। सारे सरकारी गेस्ट हाउस चुनावी पर्यवेक्षकों और उनके सहायकों ने घेर रखे हैं। बमुश्किल नैनीताल क्लब में एक सूट मिल पाता है। सीज़न भी पीक पर है और चुनाव भी। पर्यटकों के लिए चुनाव बैरियर है या चुनावी कर्मियों के लिए पर्यटक बैरियर हैं, कहना मुश्किल है। वह तल्ली ताल से मल्ली ताल, मल्ली ताल से तल्ली ताल के राउंड मारता है। दो दिन में ही सब कुछ देख दाख कर बच्चे बोर हो गए हैं। बोटिंग कर के भी। एक उस की पुरानी महिला मित्र हैं, वकील हैं, सोशल एक्टिविस्ट भी और यहां बोट क्लब की मेंबर भी। खाने पर बुलाती हैं। घर में नहीं, बोट क्लब पर। रहती वह भुवाली में हैं। बताती हैं कि घर में कुछ कंस्ट्रक्शन चल रहा है सो घर तितर बितर है, डिस्टर्ब है। सो यहीं। पत्नी, बच्चे सब वेजेटेरियन हैं। तो वह कहती हैं, ‘हम लोग भी वेज ले लें?’
‘आप की मर्ज़ी!’ आनंद बोला, ‘पर मैं तो चिकेन खाऊंगा। तंदूरी चिकेन भी और बटर चिकेन भी।’
‘ओ.के.।’ वकील मित्र बोलीं, ‘तो ड्रिंक भी?’
‘श्योर!’

वह उस के लिए पीटर और अपने लिए बोदका आर्डर करती हैं। इशारों से पत्नी के लिए पूछती हैं तो वह इशारों में बताने के बजाए बोल पड़ता है, ‘अरे नहीं।’
पत्नी और बच्चे बिदके हुए हैं कि यह औरत हो कर भी बोदका पीती है। बोदका मतलब रशियन ठर्रा। पर औरतें इसे इस लिए पसंद करती हैं कि एक तो स्मूथ है दूसरे, स्मेल मामूली है। वह पहले भी इस वकील मित्र की मेहमाननवाज़ी क़बूल चुका है। पर तब की वह यहां अकेले आया था। तब भी वह इसी बोट क्लब में डिनर पर आया था। तब एक सेमिनार में आया था अब की घूमने। घूमने कि बचने? बचने मुश्किलों से। बचने फिसलने से। बचने डिप्रेशन और फ्रस्ट्रेशन से। बचने की और भी कई तफ़सील हैं। पर अभी वह बच रहा है कि पत्नी ज़्यादा न बिदके। महिला मित्र का पीना देख कर। बच्चे तो अपने पिज़्ज़ा विज़्ज़ा में लग गए हैं। और वह महिला मित्र से ज़्यादा पत्नी से बतियाने में मसरूफ है और बता रहा है कि, ‘नैनीताल में उसे दो ही चीज़ें सब से ज़्यादा अच्छी लगती हैं। एक तो यहां का राजभवन। और राजभवन क्या बल्कि उस का लॉन, उस का आर्किटेक्ट। दूसरे यहां का यह बोट क्लब। बेहद खूबसूरत, सलीके़दार और सारी सुविधाओं से भरपूर।’ वह बता रहा है कि, ‘इस की लाइब्रेरी भी बहुत अच्छी है और इस में लकड़ियों का काम तो ग़ज़ब का है।’
‘ये तो है!’ पत्नी इस बात को मानती है और ठंड से सिकुड़ जाती है।
‘चलते समय ही कहा था इनर या स्वेटर वग़ैरह पहन लो। बाहर ताल के किनारे बैठोगी तो ठंड लगेगी। पर मानती कहां हो?’
‘मैं अपना स्वेटर दूं?’ महिला मित्र बोली।
‘नहीं-नहीं।’ कहती हुई पत्नी और बिदक गई। बोली, ‘इस शॉल से काम चल जाएगा।’
पत्नी कहीं ज्वालामुखी न बन जाए सो आनंद ने दो पेग पर ही इतिश्री कर ली। चिकेन तंदूरी ख़त्म किया। और कह दिया कि, ‘अब खाना खाया जाए!’ क्यों कि उस के भड़कने के एक नहीं तीन-तीन कारण थे। शराब, महिला मित्र और उस का शराब पीना।
‘बड़ी जल्दी है आप को? कहीं और भी जाना है क्या?’
‘नहीं, नहीं।’
‘तो एक दो ड्रिंक और लीजिए!’
‘नहीं-नहीं मैं नहीं।’ सा़ट ड्रिंक ले रही पत्नी बोल पड़ी।
‘सॉरी आप के लिए नहीं आनंद जी के लिए कहा।’
‘अच्छा?’ पत्नी बोली ऐसे गोया किसी गुब्बारे में पिन चुभो रही हो। और बिदक गई।
‘सॉरी अब मन नहीं है।’ आनंद ने फिर हाथ जोड़ लिया।
‘आज आप पता नहीं क्यों संकोच कर रहे हैं?’ महिला मित्र शिष्टाचार में बोलीं।
‘आज मैं हूं न इन के साथ?’ पत्नी उन का सारा शिष्टाचार धोती हुई बोली।
‘अच्छा-अच्छा ये बात है!’ महिला मित्र खिलखिलाई। बोली, ‘मतलब आप से डरते हैं?’
‘डरने पर तो ये हाल है!’ पत्नी तंज़ करती हुई बोली, ‘जो न डरते तो जाने क्या होता?’
‘ओह!’ कह कर मित्र ने बात टाली और कहने लगी, ‘सुबह का अख़बार देखा आप ने?’
‘क्यों?’
‘आप की चीफ़ मिनिस्टर का एक बयान छपा है जिस में उस ने एक क्रिमिनल मुख़्तार अंसारी को ग़रीबों का मसीहा बताया है। ये तो हद है!’
‘हद क्या वेटिंग प्राइम मिनिस्टर है भई!’ आनंद तंज़ भरे अंदाज़ में बोला।
‘वो तो है ही!’ पत्नी बोली, ‘आप भी मान जाते तो कितना अच्छा होता!’
‘ओह तुम तो फिर!’ आनंद बोला, ‘यह चैप्टर तो क्लोज़ हो चुका है हमारी ओर से!’
‘कौन सा चैप्टर भई!’ मित्र मुसकुराई।
‘सोचिए चीफ़ मिनिस्टर ने इन को अपनी पार्टी ज्वाइन करने और एम.पी.का टिकट प्रपोज़ किया। और ये इंकार कर के यहां भाग आए हैं।’
‘आनंद जी, इज शी राइट?’
‘हां।’ आनंद धीरे से बोला।
‘आफ़र बुरा नहीं, एक्सेप्ट करना चाहिए आप को।’
‘आप मुझे जानती हैं?’
‘हां।’
‘फिर भी ऐसा करने को कह रही हैं?’
‘ओह सॉरी!’ मित्र बोलीं, ‘आनंद जी पर एक बात बोलूं? इफ़ यू डोंट माइंड!’
‘हां, हां बिलकुल।’
‘जिं़दगी में हम लोग कितने सारे कंप्रोमाइज़ करते हैं तो पालिटिक्स में भी कंप्रोमाइज़ चलता है। चलता है क्या दौड़ता है!’
वह चुप रहा।
उसे याद आया कि अभी पिछले दिनों उस के शहर में उस के पुराने मित्र और पत्रकार अशोक जी ने भी उस से और मुनव्वर भाई से कहा था कि पालिटिक्स में एक शब्द होता है कंप्रोमाइज़। जो आप लोग नहीं कर पाए।
‘क्यों आनंद जी!’ मित्र ज़रा देर रुक कर बोलीं, ‘ऐम आई राइट?’
‘नो!’ आनंद थोड़ा सख़्ती से बोला, ‘अगर आप को ज़ोर की प्यास लगी है और पास कहीं पानी नहीं है, नाली का बहता या रुका हुआ पानी ही उपलब्ध है तो क्या उसे पी लेंगे? नहीं न! तो तमाम सारी मुश्किलों के बावजूद राजनीति मेरे लिए समझौता नहीं है। राजनीति मेरे लिए अभी भी एक संभावना है। जैसे साफ़ पानी की तलाश!’
‘जब इतने कानफ़िडेंट हैं आप तो अब मैं क्या कह सकती हूं।’
‘हां क्यों कहंेगी?’ पत्नी भी सख़्ती से बोली, ‘आप जैसे दोस्तों ने ही इन का दिमाग़ ख़राब कर रखा है?’
‘जो भी हो यह चैप्टर यहीं क्लोज़ करें?’ वह पत्नी की तरफ़ मुसकुरा कर देखते हुए बोला।
‘आप किसी की मानते ही कब हैं?’ वह बोली, ‘पता नहीं कब आप के सपनों की राजनीति इस धरती पर होगी और आप सक्रिय राजनीति में आएंगे। मुझे तो लगता है आप सोशल एक्टिविस्ट ही बने रहेंगे जिं़दगी भर!’
‘तो कोई पाप तो नहीं है न यह!’ वह बोला, ‘कुछ तो करेंगे न। पर ग़लत नहीं करेंगे यह तो तय है।’
खाना ख़त्म हो चुका था। नींबू पानी का बाऊल आ चुका था हाथ धोने के लिए। बात भी ख़त्म हो गई। महिला मित्र को उस ने थैंक्यू कहा। अच्छे से डिनर के लिए। मित्र पत्नी से गले मिल कर विदा हुई। वह भी बोट क्लब से नैनीताल क्लब के लिए चला। बाहर हलका कोहरा था। धुएं जैसा एहसास कराता कोहरा।
यह क्या था?
पत्नी के मन में उठता संशय?
मुख्यमंत्री का प्रस्ताव न मानने का संशय या महिला मित्र के साथ शराब पीने का संशय?
जाने क्या था।
पर गुलाबी नशे के बीच यह कोहरा उसे अच्छा लगा। उस ने उसे हाथ से छूना चाहा। पर हाथ में नहीं आया। तो क्या उस की ज़िंदगी कोहरा हो गई है? हवा, धुआं, कोहरा! यह सब हाथ क्यों नहीं आते? क्या यह हवा, धुआं, कोहरा भी सफलता हैं? कि हाथ नहीं आते? कि सफलता के प्रतिमान हैं?
पता नहीं।
पर टीन एज क्रास कर रही बेटी कह रही है, ‘पापा अब की नैनीताल आने के बजाय कश्मीर चलना चाहिए था। यहां तो कई दफ़ा आ चुके हैं। पर कश्मीर कभी नहीं गए!’
‘कश्मीर की फ़िज़ा आज कल ख़राब चल रही है बेटी। तिस पर चुनाव। ख़तरे से ख़ाली नहीं है इन दिनों वहां जाना।’
बेटी चुप हो जाती है।
‘कुछ नहीं बेटी यहां हम घूमने नहीं, सिर्फ़ मौसम का लुत्फ़ उठाने आए हैं और मन हलका करने!’
‘और उस चुड़ैल के साथ पीने!’ पत्नी ठुनक कर बोली।
‘ओह तुम चुप नहीं रह सकती ज़रा।’ वह बोला, ‘इस कोहरे का मज़ा लो।’
पर तब तक नैनीताल क्लब आ गया था।
कोहरा छंट गया था।
तो क्या कोहरा भी पानी पीने चला गया था?
यह कौन सी प्यास है?
या प्यास की कौन सी फांस है?
उस का मन करता है कि रात-वात की परवाह किए बिना नैनीताल के चाइना टाप की ऊंचाई पर जा चढ़े और जा कर चीख़ कर सब को बताए कि यह राजनीति हमारी है! मुग़ले आज़म का सलीम जैसे चीख़ा था अनारकली मेरी है!
तो क्या जैसे सलीम घिर गया था अकबर के बुज़दिल सिपाहियों के घेरे में और बेहोशी के आलम में चीख़ा था अनारकली मेरी है, वैसे ही वह भी घिर गया है प्रजातंत्र के इन बुज़दिल राजनीतिज्ञों के घेरे में? इसी लिए वह चीख़ना चाहता है कि राजनीति हमारी है! सलीम-अनारकली, अकबर की कहानी कहते हैं कि फ़ुल फ़ैंटेसी है, इतिहास में यह कथा कहीं दर्ज नहीं है। सब कुछ कमाल अमरोही की कलम की उपज है।
तो क्या राजनीति में वह भी तो कोई फैं़टेसी ही नहीं जी रहा? अगर वह भी राजनीति में फ़ैंटेसी ही जी रहा है तो यह किस कमाल अमरोही के कलम की उपज है? कौन के. आसिफ़ उस की फैंटेसी को डायरेक्ट कर रहा है कि वह चाइना टाप पर जा कर, चीख़ कर आधी रात को सब को सुनाना चाहता है कि यह राजनीति हमारी है। फिर कौन सुनेगा? पूरा देश या सिर्फ़ नैनीताल?

वह नैनीताल जिसने वैसी मुश्किल में नारायण दत्त तिवारी को हरा दिया। तब नैनीताल ने उन्हें जिताया होता तो वह शायद देश के प्रधानमंत्री हुए होते। पर नहीं, उनके हारने का सबब बन गया कि तब चुनाव न लड़ने के बावजूद नरसिंहा राव धो पोंछ कर निकाले गए। प्रधानमंत्री बन गए। बाबरी मस्जिद गिर गई, हर्षद मेहता कांड हो गया, मनमोहनी आर्थिक उदारीकरण देश के गर्भ में ऐसे आ गिरा गोया कुंती के गर्भ में कर्ण। देश जिस की क़ीमत अब चुका रहा है, जाने कब तक चुकाएगा, अमरीका के हाथों गिरवी हो गया। कि बंधुआ हो गया। और बेचारे नारायण दत्त तिवारी? जिस उत्तर प्रदेश के वह चार बार मुख्यमंत्री रहे थे, उसी के खंडित आठ ज़िलों के प्रदेश उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनने को विवश हो गए। छुटभैयों ने फिर भी उन्हें चैन नहीं लेने दिया। राज्यपाली में दिन बिताने को विवश हैं विकास पुरुष! यह कौन सी यातना, कौन सी प्यास और कौन सी फांस है?

उन्हें यह यातना, यह प्यास और यह फांस देने वाले इस नैनीताल में वह चीख़ना चाहता है कि राजनीति हमारी है! कौन सुनेगा, किस को सुनाएं की मनःस्थिति में आ गया है वह!

नारायण दत्त तिवारी पुराने समाजवादी हैं। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से होते हुए वह कांग्रेस में आए थे, कांग्रेस तिवारी बनाई, फिर कांग्रेस में लौटे। तो क्या तिवारी पुराने समाजवादी हैं इस लिए उस की भावनाएं, उन की ओर द्रवित हो रही हैं, या उन की यातना से उसे सहानुभूति हो रही है। और वह यह भूल जा रहा है कि संजय गांधी की चाकरी उन्हों ने भी की है और कि इमरजेंसी के समय में वह ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी थे। उसी दौर में उसे जेल भुगतनी पड़ी थी। या कि फिर बाद के दिनों में कुछ प्रशासनिक मदद उन्होंने की थी, उसकी इस नौकरी में भी वह एक फै़क्टर बने थे, वह भावनाएं ही उन्हें उनके पक्ष में उसकी सहानुभूति की गंगा यमुना बहा रही हैं?

पता नहीं?

पर नैनीताल की उस कृतघ्नता के लिए वह नैनीताल को फिर भी माफ़ नहीं कर पाता। नहीं जाता वह चाइना टाप। वह राजनीति में फैंटेसी या फैंटेसी की राजनीति में नहीं जीना चाहता। ज़मीनी सच्चाई, ज़मीनी राजनीति को जीना चाहता है वह!

ठंड बढ़ गई है। उस ने कंबल देह में और कस के लपेट लिया है।

दूसरा दिन इतवार का है। शाम को वापस लखनऊ लौटना है। दिन में दो तीन लोगों से मिलना है। ख़ास कर एक जस्टिस हैं। लखनऊ में पहले एडवोकेट थे। अब यहां जस्टिस हो कर आ गए हैं। लंच उन्हीं के साथ है। उन की पत्नी बहुत अच्छा खाना बनाती हैं और बहुत ही सलीक़े से, बहुत ही मुहब्बत से खिलाती हैं। बिलकुल शबरी भाव से। खाना खा कर मन और आत्मा दोनों तृप्त हो जाते हैं। आनंद आ जाता है। वह चाहे जो खिलाएं। वह अकसर कहती भी थीं लखनऊ में कि, ‘आनंद जी को तो बात बेबात आनंद आ जाता है। सूखी रोटी नमक भी खिला दो तो भी उन को आनंद आ जाता है।’
‘भाभी जी आप खिलाती ही कुछ इस तरह हैं कि मैं क्या करूं? अवश हो जाता हूं।’
पर यह लखनऊ की बात थी।
यहां नैनीताल में बात अलग थी। ख़ानसामा, अर्दली में वह फंस गई थीं। आनंद को देखते ही चहक पड़ीं। बोलीं, ‘अरे हमें तो पता ही नहीं पड़ा कि आप लोग आ रहे हैं। नहीं खाना ख़ुद बनाती।’
‘बनाया नहीं तो क्या हुआ?’ आनंद बोला, ‘परोसने में अपना हाथ लगा दीजिएगा। आप का हाथ लगते ही आप वाली मिठास आ जाएगी।’
‘पर ख़ुद बना कर ख़ुद परोसने की बात ही और है।’ वह बोलीं, ‘उस सुख को आप मर्द क्या जानें?’
‘क्यों नहीं जानेंगे?’ वह बोला, ‘आखि़र आप लोगों का बनाया खाने वाले हमीं लोग तो हैं।’
‘ये तो है।’
‘पता है आप को कि एक आदमी बहुत दिनों तक घर से बाहर रहा। एक दिन घूमते-घामते वह ऐसे ढाबे पर पहुंचा जहां बाहर बोर्ड पर लिखा था, बिलकुल घर जैसा खाना। वह लपक कर ढाबे में घुस गया। पर जब खाना सामने आया और वह खाने लगा तो झेल गया। वेटर को बुलाया और पूछा, ये क्या है? दाल में नमक ज़्यादा, रोटी जली हुई, चावल कच्चा! यह सब क्या है? तो वेटर बोला बोर्ड नहीं पढ़ा था? वह बोला- पढ़ा था। तो वेटर बोला- फिर क्यों झल्ला रहे हो? बिलकुल घर जैसा खाना नहीं है क्या?’
‘अरे अभी तक तो आप शेर ही सुनाते थे अब लतीफ़े भी सुनाने लगे?’ वह बोलीं।
‘लतीफ़ा?’ आनंद बोला, ‘ये हकीक़त आप को लतीफ़ा लगती है तो मैं क्या कर सकता हूं भला?’ कह कर वह ख़ुद मुसकुराने लगा।
लखनऊ से एक वकील साहब भी सपरिवार नैनीताल घूमने आए थे। यहां वह भी लंच पर थे। और जब एक एडवोकेट और जस्टिस बैठे हों तो मुक़दमों की बात न चले यह हो नहीं सकता।
‘भई देखिए मैं तो हमेशा से कहता आ रहा हूं कि इलाज और न्याय इस देश में अब एक सपना है, बल्कि मृगतृष्णा है।’
‘हां भाई साहब हो तो गया है।’ वकील साहब बोले, ‘लेकिन एक बात है ब्रिटिशर्स न्याय करना भी जानते थे। और जो कहते हैं कि न्याय हो और होता हुआ दिखाई भी दे, वह न्याय दिखाते भी थे।’
‘वह सर्वशक्तिमान लोग थे भाई।’ जस्टिस बोले।
‘नहीं भाई साहब लखनऊ में एक क़िस्सा आज भी चलता है। हो सकता है आप भी सुने हों। मलिहाबाद में एक बाग़ का झगड़ा था। एक विधवा औरत थी। वह कहती थी कि बाग़ मेरा है। उस औरत का देवर कहता था कि बाग़ मेरा है। काग़ज़-पत्तर, साक्ष्य वग़ैरह दोनों के पास थे। वह अंगरेज़ जज तय नहीं कर पा रहा था कि बाग़ का मालिकाना हक़ किस के पक्ष में तय करे। अंततः एक दिन रात में ड्राइवर से कहा कि एक बड़ी सी रस्सी रख लो गाड़ी में और गाड़ी निकालो। फिर वह उस बाग़ में पहुंचा। ड्राइवर से कहा कि वह उसे एक पेड़ में बांध दे। ड्राइवर घबराया। कहने लगा साहब अंगरेज़ जज को बांधने की बहुत बड़ी सज़ा मिल जाएगी। नौकरी चली जाएगी। अंगरेज़ जज ने उसे डांटा और कहा कि ऐसे तो नहीं पर मुझे जो नहीं बांधोगे तो ज़रूर नौकरी चली जाएगी और सज़ा भी मिलेगी। फिर ड्राइवर ने एक पेड़ से अंगरेज़ जज को बांध दिया। अंगरेज़ जज ने ड्राइवर से कहा कि अब तुम गाड़ी ले कर यहां से जाओ। और कहीं किसी से कुछ बताना मत। ड्राइवर गाड़ी ले कर चला गया। सुबह हुई तो लोगों ने देखा कि एक अंगरेज़ पेड़ से बंधा पड़ा है। इलाक़े में सनसनी फैल गयी। भीड़ इकट्ठी हो गई। पुलिस आ गई। पुलिस ने पेड़ की रस्सी खोल कर उस अंगरेज़ को छुड़ाना चाहा और पूछा कि साहब किस ने बांध दिया आप को। अंगरेज़ जज ने बताया कि जो इस बाग़ का मालिक है, उसी ने हम को बांधा है। बाग़ के मालिक के दोनों दावेदारों को बुलाया गया। पहले विधवा औरत का देवर आया। उस से पूछा गया कि क्या इस बाग़ के मालिक तुम हो और अंगरेज़ जज साहब को बांधा है। छूटते ही विधवा औरत के देवर ने हाथ जोड़ लिए और बोला कि साहब यह बाग़ हमारा नहीं, एक विधवा औरत का है, उसी ने बांधा होगा जज साहब को। विधवा औरत बुलाई गई। उस ने आते ही बेधड़क कहा कि हां, बाग़ हमारा है। यह कहते ही पुलिस ने उसे गिऱतार कर लिया। पर अंगरेज़ जज ने पुलिस से कहा कि इसे छोड़ दो। यह बेक़सूर है। मुझे तो बस यह जानना था कि यह बाग़ किस का है। और यह पता चल गया। फिर उस ने फै़सला उस विधवा औरत के पक्ष में कर दिया।’ वकील साहब बोले, ‘बताइए भाई साहब आज है किसी जज में यह जज़्बा! जो इस तरह न्याय दे सके।’
‘भई मैंने पहले ही कहा कि वह लोग सर्वशक्तिमान थे।’ जस्टिस बोले, ‘फिर आज की तारीख़ में हम न्याय इस तरह दे भी नहीं सकते। यह एक महज़ क़िस्सा है कोई साइटेशन नहीं है। और क़िस्सों के आधार पर फ़ैसले नहीं होते। फै़सले होते हैं संविधान और क़ानून के हिसाब से। और वह जितना परमिट करता है, हम करते हैं। हम कोई जहांगीर का दरबार लगा कर नहीं बैठे हैं। कि किसी ने घंटा बजाया और उसे जहांगीरी न्याय मिल जाए। किंवदंतियां और क़िस्से अपनी जगह हैं। क़ानून और संविधान अपनी जगह। देश संविधान और क़ानून की रोशनी में चलता है, क़िस्से, कहानियों और किंवदंतियों से नहीं, इतना तो आप लोग भी जानते हैं।’
‘अब हमारी अदालतें बीमार हैं भाई साहब, यह बात स्वीकार कर लेने में कोई हर्ज मेरे ख़याल से है नहीं।’ आनंद बोला, ‘हमारा ज्यूडिशियल सिस्टम कोलैप्स कर गया है।’
‘हूं यह मानता हूं।’ जस्टिस धीरे से बोले।
‘कार्यपालिका और न्यायपालिका हमारे सिस्टम के लीवर और किडनी हैं। और यही दोनों चौपट हुए जा रहे हैं तो समाज भला कैसे स्वस्थ रह सकता है, यह सोचने की बात है।’ आनंद बोला।
‘और जो समाज पचास प्रतिशत से सत्तर-अस्सी प्रतिशत आरक्षण पर आधारित हो, वह भी भला कैसे स्वस्थ हो सकता है, यह भी तो सोचिए।’ वकील साहब बोले।
‘तो यह भी तो न्यायपालिका की देन है।’ आनंद बोला, ‘मंडल पीरियड में सुप्रीम कोर्ट भी मंडलाइज़ हो गई। आरक्षण चाहिए समाज को यह तो मैं मानता हूं। पर बूटा सिंह, मीरा कुमार, पासवान या मायावती जैसे कहां से दलित हैं मैं नहीं जानता। करुणानिधि, जय ललिता, लालू और मुलायम जैसे कहां के पिछड़े हैं यह भी मेरे लिए पहेली है। हां, विचारों से दलित और पिछड़े हैं यह तो मैं स्वीकारता हूं। तो आर्थिक आधार वाला आरक्षण ही क्यों नहीं सुप्रीम कोर्ट ने लागू किया? दोषी तो न्यायपालिका ही है! अच्छा चलिए नौकरी में आरक्षण तो था ही, प्रमोशन में भी आरक्षण! यह किस लिए भाई? जातियों की दीवार को चीन की दीवार क्यों बनाए जा रहे हैं भाई? जज साहब कुछ तो बोलिए। बोलिए भी कि आप कोर्ट में नहीं हैं।’
‘कोई अरबपति, खरबपति भी इसी देश में ही दलित या पिछड़ा हो सकता है और दलितों और पिछड़ों की सुविधाएं भी भोग सकता है। और क्या कहूं? दिक़्क़त तो है ही भाई।’ जस्टिस धीरे से सांस छोड़ते हुए बोले।
बात सांप्रदायिकता की ओर घूम गई है। जस्टिस बोले, ‘जातियों से भी ज़्यादा ख़तरनाक तो सांप्रदायिकता है।’
‘आप भूल रहे हैं कि एक समय मंडल और कमंडल दोनों ही आमने-सामने थे।’ आनंद बोला, ‘और मैं इस मामले पर भी बिलकुल क्लीयर हूं कि मंडल और कमंडल दोनों ही मामलों को ज्यूडिशियली ने उलझाया।’
‘वो कैसे?’ जस्टिस बोले, ‘कमंडल मामले को कैसे उलझाया भला?’
‘हद है आप भी भूल गए?’ आनंद बोला, ‘अरे उन दिनों तो आप भी लखनऊ में वकील थे। कुछ भी याद नहीं आप को? डे बाई डे अयोध्या मामले की सुनवाई होती थी। तीन जजों की बेंच थी। इस के चक्कर में कितने और मुक़दमों की बलि चढ़ जाती थी। कंटेंप्ट आफ़ कोर्ट मामलों की तो रेंड़ पिट गई थी। इतने मामले लंबित हो गए कि हाईकोर्ट के आदेशों की कोई अहमियत ही नहीं रह गई थी। आप ख़ुद ही भुनभुनाते घूमते थे।’
‘हां, यह तो याद है।’ जस्टिस बोले, ‘पर मस्जिद तो गिरवाई कल्याण सिंह ने, गिराई वीएचपी वालों ने।’
‘बिलकुल पर आप तो वैसे ही कह रहे हैं कि जैसे फलां जल्लाद ने फलां को फांसी लगाई।’ आनंद बोला, ‘जल्लाद फांसी लगाता ज़रूर है पर फांसी के आदेश कौन देता है? पहले निचली अदालत फांसी देती है। ऊपरी अदालत उस पर मुहर लगाती है, फिर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट मुहर लगाती है। बरास्ता गृह मंत्रालय, राष्ट्रपति को मामला जाता है। फिर वापस गृह मंत्रालय आता है। और अंततः सरकार फ़ैसला लेती है, बरास्ता कैबिनेट कि फलां को फांसी होगी।’
‘आप कहना क्या चाहते हैं?’ वकील साहब बोले।
‘कहना यह चाहता हूं कि बाबरी मस्जिद गिराने में अगर मैं किसी एक को दोषी मानता हूं तो वह सिर्फ़ और सिर्फ़ मुलायम सिंह यादव को।’ आनंद बोला।
‘यह तो आप पूरी बात ही पलट दे रहे हैं, यह कह क्या रहे हैं आप?’
‘आप सुनेंगे भी, तब तो कहूं?’
‘अच्छा कहिए!’

‘मुलायम सिंह जब 1989 में मुख्यमंत्री हुए थे तब नवंबर, 1990 में जो अयोध्या में उन्हों ने कड़ाई की थी, कार सेवकों पर गोलियां चलवाई थीं। तब लोग गुस्से में आ गए। वह कहते रहे कि, ‘परिंदा भी पर नहीं मार सकता।’ हालां कि परिंदा पर मार गया। लोग मस्जिद के गुंबद तक पर चढ़ गए। रिहर्सल हो गई थी, तभी वीएचपी वालों की। वीएचपी वालों का मनोबल उसी से बढ़ा। वह कहते रहे कि परिंदा पर नहीं मार सकता। और लोग लाश बन-बन कर इकट्ठे हो गए। एक लाश मतलब पांच लोग। इस कड़ाई को वहां की स्थानीय जनता ने भी नहीं पसंद किया और वीएचपी की आग में घी बन बैठी। देश के हिंदुओं में इस कड़ाई को पसंद नहीं किया गया। साफ़ कहूं कि मुलायम ने हिंदुओं को उकसाया भी और भड़काया भी। ठीक वैसे ही जैसे बाद के दिनों में गोधरा के बहाने नरेंद्र मोदी ने गुजरात में मुसलमानों को मरवाया और देश भर के मुसलमानों को भड़काया। कल्याण से उन की दोस्ती बैकवर्ड कार्ड के बूते थी ही, दोनों ने अपनी राजनीति पक्की की। लोगों का ख़ून बहा तो उन की बला से। देश पर एक दाग़ लगा, देश तबाह हुआ तो उन की बला से। वह मस्जिद की रखवाली का दावा करते रहे, मस्जिद गिर गई। आप अगले को भड़का कर अपनी कोई चीज़ सुरक्षित रख सकते हैं, यह कभी संभव नहीं है, इस बात को एक साधारण आदमी भी जानता है। फिर दूसरी भूल थी वहां कार सेवा के बहाने भीड़ इकट्ठी करना। इस भीड़ को बटोरने के लिए नरसिंहा राव और कल्याण दोनों दोषी मान लिए गए हैं। पर सुप्रीम कोर्ट क्या इतनी अंधी और नादान थी कि एक कल्याण रूपी मुख्यमंत्री के शपथ पत्र को स्वीकार कर बैठी? वह न्यायमूर्ति लोग नहीं जानते थे कि भीड़ हमेशा हिंसक होती है? भीड़ कुछ भी कर सकती है। एक बात।’ आनंद बोला, ‘दूसरी बात यह कि हाईकोर्ट की अपनी लखनऊ बेंच की पीठ ने अगर ज़मीन अधिग्रहण वाले मामले पर समय रहते फ़ैसला दे दिया होता तो शायद तब भी मस्जिद बच सकती थी। इस बेंच ने भी मुलायम की तरह ही वहां मौजूद कार सेवकों को भड़काया।’ वह बोला, ‘मुझे याद है जस्टिस एस.सी. माथुर, जस्टिस बृजेश कुमार और जस्टिस सैय्यद हैदर अब्बास रज़ा की फुल बेंच थी तब। और कि ज़मीन अधिग्रहण मामले की सुनवाई पूरी हो गई थी। आर्डर रिज़र्व हो गया था। जस्टिस एस.सी. माथुर और जस्टिस बृजेश कुमार से जस्टिस रज़ा की ओपिनियन डिफ़रेंट हो गई थी। तो भी जस्टिस एस.सी. माथुर और जस्टिस बृजेश कुमार ने अपने आर्डर लिखवा दिए थे। और बता दिया था कि अधिग्रहण ग़लत है। जस्टिस सैय्यद हैदर अब्बास रज़ा ने डिले किया। न सिर्फ़ डिले किया दो-तीन महीने बल्कि डिलेड जस्टिस इज़ इनजस्टिस को भी फलितार्थ किया। आदेश जारी किया तब, मस्जिद जब गिर-गिरा गई, दंगे भड़क गए देश भर में तब। और तो भी उन के आर्डर में था क्या? कोरी ल़फ़ाज़ी। कोई क्लीयर आदेश नहीं। यह ल़फ़ाज़ी आप पहले भी झाड़ सकते थे, मस्जिद शायद बच जाती। लोग इकट्ठे हो ही गए थे तो शायद उस ग़ैर विवादित सवा एकड़ ज़मीन जो वीएचपी के पास पहले ही से थी उस पर ही कार सेवा कर के लौट गए होते। तो जनाब एक मुलायम और दूसरी यह न्यायपालिका दोनों ने मिल कर मस्जिद गिरवा दी, देश पर दाग़ लगवा दिया, देश तबाह कर दिया। देश कम से कम पचीस साल पीछे चला गया। दंगों ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। आतंकवाद का नासूर और गाढ़ा हो गया। हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के धागे में गांठ पड़ गई।’ वह बोला, ‘यह मेरी अपनी राय है। ज़रूरी नहीं कि आप लोग मेरी बात से सहमत ही हों।’

‘नहीं मसले का एक पहलू तो यह भी है।’ जस्टिस बोले और वकील ने हां में हां मिलाई।
‘तो इस न्यायपालिका को सोचना चाहिए कि चीजे़ं बिगड़ने के बाद न्याय देने का क्या कोई मतलब है? आदमी मर जाए न्याय मांगते-मांगते और आप उस के मरने के बाद उसे न्याय दे भी दें तो उस का क्या अर्थ है?’
‘आप लोग खाना भी खाएंगे या बातों से ही पेट भर लेंगे?’ जस्टिस की पत्नी बोलीं, ‘बच्चे लोग खाना खा चुके हैं बस हम लोग ही बाक़ी हैं।’
‘तो परोसिए।’ आनंद बोला, ‘सच बताऊं मैं तो आप को देखते ही भुखा जाता हूं। जाने कहां से भूख आ कर पेट में बैठ जाती है और कहती है, ‘खाओ-खाओ, जल्दी खाओ।’
‘आप तो आनंद जी ऐसा कर देते हैं कि लोगों को आता होगा मज़ा खाने में, पर हम को तो खिलाने में मज़ा आ जाता है।’
‘अब ज़्यादा कहंेगी तो पेट के चूहे मुंह में आ जाएंगे।’
सब लोग हंसने लगे।
खाना खा कर आनंद ने कहा कि, ‘ज़रा आप का घर देख लूं?’
‘हां, हां क्यों नहीं।’
उनके बेडरूम की एक खिड़की से जिस में खूब बड़ा सा शीशा लगा था, नैनी झील का व्यू इतना मोहक दिख रहा था कि वह तरस कर रह गया। बोला, ‘क्या बताऊं आज वापसी की टिकट है नहीं आज रात यहीं सो जाता।’
‘अरे तो टिकट कैंसिल करवा देते हैं।’
‘अरे नहीं-नहीं। अगली बार जब आएंगे तब!’

जज साहब के घर से वह फिर नैनी झील आ गया। बच्चों के साथ फिर बोटिंग की। शाम होने को आ गई। वापस नैनीताल क्लब आ कर सामान समेटा। नैनीताल से विदा हुआ। संयोग ही था कि रास्ते में टैक्सी वाले ने राम तेरी गंगा मैली का वह गाना भी बजा दिया जो वह नैनीताल आते ही सोच रहा था, ‘हुस्न पहाड़ों का, क्या कहना कि बारों महीने यहां मौसम जाड़ों का।’ आनंद आ गया आनंद को। साथ ही साथ बच्चे भी यह गाना गाते जा रहे हैं। बिलकुल सुर में सुर मिला कर। एक से एक मनोरम दृश्य पहाड़ों की हरियाली इस गाने में और इज़ाफ़ा भरती जाती है। पहाड़ों के मोड़ की तरह यह गाना भी कई मोड़ लेते हुए ख़त्म हो रहा है, ‘दुनिया ये गाती है, कि प्यार से रस्ता तो क्या ज़िंदगी कट जाती है।’
‘ये तो है।’ पत्नी मुदित हो कर बुदबुदाती है।
‘क्या बात है डार्लिंग मज़ा आ गया।’ अचानक आनंद उछल कर बोला। तो बच्चे अचकचाते हुए मुसकुरा पड़े।
लखनऊ लौट कर उस ने एक दिन रेस्ट किया। दूसरे दिन आफ़िस गया। उस ने पाया कि आफ़िस में सब कुछ सामान्य सा ही था कुछ भी बदला हुआ नहीं था।
उसे अच्छा लगा।
चैनलों और अख़बारों में इन्हीं दिनों एक ही परिवार की राजनीति के दो फांक दिखाए जा रहे थे। एक तरफ़ राहुल गांधी के विजु़अल्स थे जिस में वह लोकसभा में कलावती का मामला उठा रहे हैं, कहीं श्रमदान हो रहा है तो वहां मिट्टी ढो रहे हैं। दूसरी तरफ़ वरुण गांधी के विजु़अल्स थे जिस में वह दहाड़ रहे हैं कि जो भी हिंदुओं की तरफ़ आंख उठा कर देखेगा उस के हाथ काट डालूंगा। या ऐसे ही कुछ। फिर पीलीभीत की दीवारों पर लिखे नारे दिखते- वरुण नहीं यह आंधी है, दूसरा संजय गांधी है।
वह पूछता लोगों से, ‘यह क्या हो रहा है?’
‘कुछ नहीं बड़े भइया कलावती-कलावती कह कर मिट्टी ढोते रह गए। और यह देखिए यह तो निकल गया। बड़ा नेता हो गया। चहंु ओर इसी की चर्चा है।’ एक पत्रकार सिगरेट की राख झाड़ते हुए कहता है।
‘आप पत्रकार हैं! और यही आप का विज़न है?’ आनंद जैसे डपटता है!
‘विज़न नहीं भाई साहब टेलीविज़न! टेलीविज़न यह कह रहा है, जनता यही कह रही है। देखते नहीं आप ख़बरों में कि जनता टूटी पड़ रही है- वरुण गांधी पर! भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं की नींद उड़ा दी है इस ने।’ पत्रकार कहता है, ‘कांग्रेस में तो यह परिवार क़ाबिज़ था ही, अब भाजपा में भी क़ाबिज़ हो गया। आप को पता है कि नरेंद्र मोदी के बाद भाजपा में स्टार प्रचारक के तौर पर सब से ज़्यादा वरुण की ही मांग है!’
‘अच्छा?’
‘अरे, अब वरुण महानायक है!’
‘और राहुल?’
‘शून्य! सिफ़र! मज़दूर! कहिए कि भइया मिट्टी ढोते रहो। हुंह मिट्टी ढो कर भी कहीं राजनीति होती है आज की तारीख़ में? चुगद साला!’
तरह-तरह की टिप्पणियां हैं।
तो क्या आनंद भी ऐसे ही रह जाएगा? सांप्रदायिक हुए बिना, जातिवादी हुए बिना इस देश में राजनीति नहीं हो सकती? तो वह ऐसे ही साफ़ सुथरी राजनीति के सपने बुनता रह जाएगा?
वह डर जाता है।
डर जाता है राजनीति के इस तरह अराजक होने से, दिशाहीन, सांप्रदायिक और जातिवादी होने से।

आनंद के एक रिश्तेदार हैं। दिल के मरीज़ हैं। रुटीन जांच के लिए आए हैं। बात अपने शहर की हो रही है। चुनाव की भी होती है। वह बता रहे हैं कि, ‘माहौल तो महंत के खि़लाफ़ बहुत है। ख़ास कर आप की क़ासिम वाली प्रेस कानफ्रेंस के बाद। मुसलमान तो नाराज़ हैं ही। हिंदू भी बहुत नाराज़ हैं।’
‘हिंदू क्यों नाराज़ हैं?’
‘कोई एक कारण तो है नहीं। कुछ भी हो लोग अब दंगा फ़साद नहीं चाहते हैं। चैन से रहना चाहते हैं। विकास चाहते हैं। इस लिए नाराज़ हैं। दूसरे शहर के जितने भी मंदिर हैं, अच्छे मंदिर वहां के लोग नाराज़ हैं?’
‘वो क्यों?’
‘महंत जी लगातार उन के खि़लाफ़ कुछ न कुछ कुचक्र रचते रहते हैं। दो मंदिरों के रास्तों पर ़लाई ओवर बनवा दिया। एक मंदिर को ़लाई ओवर चाहिए, वहां नहीं बनने दिया।’
‘ऐसा क्यों?’
‘ताकि लोग और मंदिरों में न जाएं। उन्हीं के मंदिर में आएं। उन की आय बढ़ती रहे। ऐसे ही छिटपुट अड़ंगा और भी मंदिरों में वह डालते ही रहते हैं।’
‘ओह!’
‘अपने मंदिर में भी तरह-तरह से लूट खसोट बढ़ा दिए हैं। जो कमरे, जो हाल पहले निःशुल्क थे, उन सब का अच्छा ख़ासा किराया लेने लगे हैं। लोगों को कथा कहलानी है, मुंडन वगै़रह कराना है, शादी ब्याह के लिए लड़की दिखानी है, और भी तमाम काम हैं, मान-मनौती है। कमरा, हाल सब कुछ का अच्छा ख़ासा किराया है। समझिए कि एक मंदिर में प्रवेश छोड़ कर बाक़ी सब सशुल्क है। उन के अस्पतालों में भी मनमानी फ़ीस है। उन के स्कूलों, कालेजों में भी। तो लोग इस सब से नाराज़ हैं।’
‘आप को पता ही होगा कि विश्वविद्यालय की राजनीति में भी इन का ख़ासा हस्तक्षेप है।’
‘होगा ही।’ वह बोले, ‘शहर की हर सांस में उन का हस्तक्षेप है तो विश्वविद्यालय क्या चीज़ है।?’
‘नहीं आप को बताऊं कि यह विश्वविद्यालय ही दरअसल हमारे शहर के लिए ग्रहण बन कर आया। शायद मैं ग़लत कह रहा हूं बल्कि विश्वविद्यालय की राजनीति ने इस शहर पर, इस इलाक़े पर, इलाक़े के विकास पर ग्रहण लगा कर ख़ूनी खेल की धरती में तब्दील कर दिया।’
‘अच्छा?’ वह बोले, ‘ये तो हम नहीं जानते थे।’
‘है तो ऐसा ही।’
फिर उस की आंखों में वह सारे दृश्य जैसे किसी सिनेमा की तरह घूमने लगे।

1947 में आज़ादी मिलने के बाद ही विश्वविद्यालय समिति बनी और कोई दस बारह बरस बाद विश्वविद्यालय की शुरुआत हुई। आचार्य नरेंद्र देव जैसे समाजवादी भी थे इस समिति की देखरेख में। तो भी हुआ यह कि विश्वविद्यालय के दो प्रमुख संस्थापक सदस्यों में जब मतभेद शुरू हुआ तब यह नौबत आई। एक आई.ए.एस. अफ़सर थे। पंडित थे। यहां डी.एम. भी रहे और कमिश्नर भी। बाद में कोई तीन टर्म ग्रेजुएट कांस्टीच्वेंसी से एम.एल.सी. भी रहे। लोग मणि जी, मणि जी कहते थे। विश्वविद्यालय की स्थापना में उन की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण रही। पर साथ ही इस मंदिर के पूर्ववर्ती महंत जी ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन को लोग बड़े महंत जी कहते थे। वह तब की हिंदू महासभा के न सिर्फ़ सदस्य थे संभवतः हिंदू महासभा के अकेले निर्वाचित सांसद भी थे। दो या तीन टर्म वह सांसद रहे। तो बड़े महंत जी और मणि जी ने विश्वविद्यालय तो बनवा दिया। कार्यकारिणी के सदस्य भी हो गए। शुरू के दिनों में सब कुछ ठीक-ठाक चला। पर बाद के दिनों में दोनों के हित और अहंकार दोनों ही टकराने लगे। मणि जी आई.ए.एस. रहे थे। काग़ज़-पत्तर में बुद्धि से बड़े महंत जी को उलझा देते। बड़े महंत ने बाद में इस का तोड़ दबंगई में ढंूढा। मंदिर में अखाड़ा भी था और लठैत भी। बड़े महंत जी की इस दबंगई के चलते मणि जी की एक न चलती। चुप हो जाते। अवश हो जाते। बेबसी जब उन की सारी सीमा पार कर गई तो उस पढ़े लिखे आदमी ने भी दबंगई की काट दबंगई में ही ढंूढी। यह तिवारी माफ़िया उन दिनों विश्वविद्यालय में पढ़ता था। तब माफ़िया नहीं था। पिता इस के पुरोहित थे। किसी का छुआ पानी तक नहीं पीते थे। पूजा पाठी थे। खूब चंदन लगाते थे। कहीं जाते तो लोटा डोरी ले कर। अपने इलाक़े में पूजनीय और प्रतिष्ठित पंडित थे। उन की चेलहटी बहुत बड़ी थी। लेकिन प्रतिष्ठा जितनी बड़ी थी, उतनी ही बड़ी विपन्नता भी थी। तो यह तिवारी शहर में जब पढ़ने आया तो शुरू में तो यह भी पंडित बना रहा। पर बाद में शहर की हवा लगने लगी, संगत बदलने लगी, खर्चे बढ़ने लगे। अब यह क्या करे? रंगदारी पर उतर आया। धीरे-धीरे गोल बना कर यह गोलघर बाज़ार घूमने लगा। दुकानदार इसे देखते ही थरथरा जाते। इस की तीखी और नुकीली मूंछें इस के रौब में ख़ूब इज़ाफ़ा भरतीं। धोती कुरता और मूंछों वाला यह नया गुंडा गोलघर बाज़ार पर छा गया था। इस का ह़ता बंध गया छोटी-बड़ी सभी दुकानों से। विश्वविद्यालय में भी उस का रंग जमने लगा। बाज़ारों की भी सीमा बढ़ी। एक बाज़ार से दूसरे। दूसरे से तीसरे, तीसरे से चौथे बाज़ार तक। अब हो यह गया था कि बाज़ारों में रंगदारी और विश्वविद्यालय में रंगबाज़ी। मणि जी को किसी ने इस तिवारी के बारे में बताया। तो वह ख़ुश हो गए। अपने तौर पर उस के बारे में पूरी रिपोर्ट पता किया। रिपोर्ट क्या इस तिवारी की पूरी कुंडली अब उन के पास थी। उन्हों ने तिवारी को अपने यहां बुलाया। दो चार सिटिंग्स में उस को नापा जोखा। तौला, वाच किया। उस की महत्वाकांक्षाओं को और जगाया। कहा कि, ‘एक दिन तुम बहुत आगे जाओगे!’ वह इन के पैरों पर गिर पड़ा। तो इन्हों ने भी उस के सिर पर हाथ फेर कर आशीर्वाद दिया। ब्राह्मणवाद की कुछ ख़ुराकें पिलाईं। फिर तोल-मोल किया। और जैसे कि ब्यूरोक्रेट्स कई काम अपने शार्पनेस और शातिरपने से अंजाम देते हैं। कुछ-कुछ उसी अंदाज़ से मणि जी ने इस तिवारी को बड़े महंत जी के खि़लाफ़ मैदान मंे उतार दिया। ऐसे जैसे पूंजीपति अपने प्रोडक्ट बाज़ार में उतारते हैं। वो जो होता है न कि छोटा बच्चा बड़ी तेज़ी से ग्रोथ करता है, बड़ी तेज़ी से चीजों को सीखता है। तो तिवारी की ग्रोथ भी कुछ इसी तेज़ी से हुई। उस ने सीखा भी बड़ी तेज़ी से। नतीजा सामने था। अब तिवारी नहीं, तिवारी गिरोह था। बड़े महंत जी को उस ने पहले बच्चों की तरह तुतुला कर, फिर ज़रा दब दबा कर और फिर खुले आम चुनौती दे दी। लोगों को लगा कि बड़े महंत जी अब तिवारी को छोड़ेंगे नहीं, उसे ख़त्म करवा देंगे। और सचमुच बड़े महंत जी ने ऐसा चाहा भी। पर तिवारी के ऊपर आई.ए.एस. मणि जी की छाया हमेशा बनी रही। मणि जी यह जानते थे कि महंत जी के पास आखि़री विकल्प तिवारी को मरवाना ही होगा। सो मणि जी ने तिवारी का सुरक्षा घेरा काफ़ी मज़बूत बनवा रखा था। इतना कि कोई अर्जुन भी जो तब आ जाता तो तिवारी के सुरक्षा घेरे का चक्रव्यूह नहीं तोड़ पाता। यह तिवारी का सुरक्षा घेरा ही है कि तिवारी के जाने कितने समकालीन माफ़िया मारे गए, उन के बाद की दो पीढ़ियों के जाने कितने माफ़िया आए गए, भभक कर बुता गए, मर गए, मार दिए गए पर तिवारी अभी भी न सिर्फ़ क़ायम है बल्कि अपनी पकड़, अपनी ऱतार भी क़ायम रखी है। राजभोग, सत्ताभोग जो कहिए, इस का अनवरत सुख लेते हुए। तीन-तीन सरकारों में कैबिनेट मिनिस्टर रह चुके तिवारी ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। घोर संकट के समय में भी ऱतार क़ायम रखी।

ख़ैर बड़े महंत जी को शह पर शह देते तिवारी ने अंततः बड़े महंत जी को मात दे दी। यहां तक कि गोलघर में बनी उन की दुकानों ने भी तिवारी को ह़ता देना शुरू कर दिया। बड़े महंत जी के पास एक इंटर कालेज पहले से था उसी को उन्हों ने डिग्री कालेज में एक्सटेंड किया। विश्वविद्यालय की लड़ाई में मात खाते-खाते उन्हों ने डिग्री कालेज में ही सारा ध्यान लगा दिया। शहर का आलम भी उन दिनों कुछ अजब था। सभी जातियों के अपने-अपने स्कूल थे। ब्राह्मण स्कूल, क्षत्रिय स्कूल, कायस्थ स्कूल, मुस्लिम स्कूल। लड़कियों के स्कूलों में भी यह जातीय चेतना खुल कर सामने थी। इस जातीय चेतना को बस दो रेलवे के स्कूल, और दो सरकारी स्कूल ही थोड़ा बहुत ब्रेक कर पाते थे। सो बड़े महंत जी को तिवारी को उलझाने के लिए ब्राह्मण, ठाकुर की लड़ाई बनाने में देर नहीं लगी। शहर क्या पूरा ज़िला ब्राह्मणवाद-ठाकुरवाद की आंच में झुलसने लगा। बड़े महंत जी के पास मंदिर की आय थी, मंदिर का फ़ार्म हाउस था, स्कूल थे, नर्सरी से ले कर डिग्री कालेज तक। आय के अनेक स्रोत थे। इस के विपरीत तिवारी के पास आय के नाम पर सिर्फ़ रंगदारी। रंगदारी की आय और मणि जी की छाया। अब दिन यह आ गए थे कि खेती में भी अगर निवेश न करें तो अनाज का उत्पादन घट जाता था। फिर यह तो गुंडई थी। बिना पूंजी निवेश के गुंडई कैसे हो? तिवारी के लिए यह प्रश्न जैसे यक्ष प्रश्न बन कर दिन रात सिर पर सवार रहता। रास्ता निकाला अंततः मणि जी ने ही। तिवारी को छोटी मोटी ठेकेदारी शुरू करवा कर। साइकिल स्टैंड का ठेका, रिक्शा स्टैंड का ठेका, नगर निगम की सड़क पर मिट्टी डालने का ठेका। तिवारी ने जैसे महंत जी के लठैतों को क़ाबू किया था, ठेकों को भी क़ाबू कर लिया। तिवारी का नाम आते ही लोग किनारे हो जाते। तिवारी को ठेका मिल जाता। तिवारी अब छोटे ठेकेदार, पेटी ठेकेदार से मुख्य ठेकेदार बन गया था। अब उस की पैठ पी.डब्ल्यू.डी. और वन विभाग के ठेकों में हो रही थी। तिवारी ने इस फेर में चार-पांच क़त्ल भी कर, करवा दिया। अब तिवारी, तिवारी नहीं, माफ़िया तिवारी के अवतार में था। उन्हीं दिनों एक मस्जिद को ले कर हिंदू-मुस्लिम विवाद उठ खड़ा हुआ। बड़े महंत जी ने मौके़ का फ़ायदा उठाया। अपनी गिरी साख को ऊपर उठाने का। मामला तूल पकड़ गया। तत्कालीन ज़िलाधिकारी को बड़े महंत जी ने साध लिया। और अपने मंदिर के पीछे थोड़ी दूर की एक मस्जिद को रातोरात नेस्तनाबूद कर वहां बड़े-बड़े पेड़ लगवा दिए। ज़िलाधिकारी ने उन्हें रात भर का समय दिया था कि जो करना हो वह कर लें। और उन्हों ने कर लिया। जिन मुसलमानों ने सिर उठाया उन्हें कुचल दिया गया। हिंदू-मुस्लिम दंगा भड़क गया। कहते हैं कि बड़े महंत जी ने कुछ मुसलमानों को मरवा कर राप्ती नदी की रेत में दबवा दिया। कहीं कोई लाश नहीं मिली। सो बड़े महंत जी का कुछ नहीं हुआ। मुसलमानों को सांप सूंघ गया। वैसे भी शहर में ज़्यादातर मुसलमान जुलाहा थे। ख़ामोश हो गए।

देश में यह दिन जय जवान, जय किसान वाले नारों के दिन थे। पाकिस्तान पर फ़तह के दिन थे। बड़े महंत जी के अनुयायी कहते कि एक पाकिस्तान देश ने जीता है, दूसरा पाकिस्तान बड़े महंत जी ने। ताशकंद समझौते के बाद शास्त्री जी के निधन ने देश को भले तोड़ दिया था, महंत जी मज़बूत हो रहे थे। नया-नया माफ़िया बना तिवारी, हालां कि तब के दिनों में यह माफ़िया शब्द इतना चलन में नहीं था, पड़ोसी देश नेपाल में भी अपनी जड़ें तलाश रहा था। नेपाल की राजशाही वहां राजतंत्र के खि़लाफ़ प्रजातंत्र की लड़ाई लड़ने वालों को बूटों तले कुचल रही थी, सो नेपाल के तमाम योद्धा इस पास पड़ रहे शहर को अपना अड्डा बना रहे थे। यहीं से अपनी लड़ाई संचालित कर रहे थे। इन्हीं दिनों नेपाल राजशाही के एक कारिंदे ने तिवारी को साधा। तिवारी उन के लिए भाड़े का हत्यारा बन गया। एक, दो, पांच, सात करते-करते बीस से अधिक नेपाली योद्धाओं की हत्या हो गई। तिवारी की तो जैसे चल पड़ी। अपराध और व्यवसाय दोनों ही हलक़ों में तिवारी के पंख अब विस्तार ले रहे थे। तिवारी अब माफ़िया से मिथ बन रहा था। तिवारी अब गुंडा बदमाश नहीं पंडित जी कहलाना पसंद करता। बाज़ारों में रंगदारी वसूलने वाला तिवारी अब लोगों को दिखना बंद हो गया। अब सिर्फ़ उस का नाम सुनते। उस की कहानियां चलतीं। रंगदारी, ठेकेदारी और ख़ून ख़राबा जैसे तिवारी के पर्याय बन गए थे। ईंट भट्ठा, कोयला में भी उस ने हाथ डाल दिया। पी.डब्ल्यू. डी., सिंचाई, वन विभाग से होते हुए वह रेलवे के स्क्रैप ख़रीदने लगा। और यह देखिए चंदनधारी पुरोहित का बेटा अब देशी, अंगरेज़ी शराब का ठेकेदार बन गया। ठेकेदार ही नहीं उस के कई-कई सिंडीकेट बन गए। पूर्वी उत्तर प्रदेश से लगायत पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक। लोग बड़े महंत जी से यह सब कहते तो वह कहते, ‘भई इस स्तर पर तो आ कर मैं उस से नहीं लड़ सकता। दूसरे, अब वह वृद्ध भी बहुत हो गए थे। चुनावी राजनीति से भी अब वह दूर हो रहे थे। अपना उत्तराधिकारी भी वह घोषित कर बैठे थे। जल्दी ही उन का निधन भी हो गया। उन के उत्तराधिकारी निरे संत थे। दुनियावी छल छंद से उन का कोई सरोकार नहीं था। मंदिर का प्रशासन, तमाम संस्थानों का संचालन उन की दिलचस्पी के विषय नहीं थे। ध्यान, साधना, तप और वैराग की परंपरा के संत थे वह। अंततः इन सब कामों के लिए उन्हों ने मंदिर से ही एक युवा को अपना प्रतिनिधि चुना। और फिर मंदिर का महंत भी बना दिया। इस महंत ने बड़े महंत की परंपरा को न सिर्फ़ आगे बढ़ाया। मंदिर और अन्य संस्थानों का उत्तरोत्तर विकास करते हुए मंदिर को भी व्यवसाय में बदल दिया। मंदिर का विस्तार जीर्णोद्धार, दुनिया भर की सुविधाएं, स्कूल कालेज और तमाम संस्थाओं की चमक बढ़ा दी। मंदिर में लाखों का चढ़ावा अब करोड़ों में हो गया था। इस महंत ने राजनीतिक लगाम भी हाथ में ली और संसद में पहुंचा। माफ़िया तिवारी के खि़लाफ़़ भी मोर्चा मज़बूत किया। तिवारी के खि़लाफ़़ ठाकुरों को लामबंद किया। तिवारी का एक ख़ास लेटिनेंट था शाही। शाही को तिवारी का नंबर दो कहा जाता था। शाही एकदम युवा था और तिवारी को अपना गुरु मानता था। वह कहता था कि, ‘पंडित जी एक तो ब्राह्मण हैं, दूसरे मेरे द्रोणाचार्य। मैं बचपन से ही इन के जैसा बनना चाहता था। ख़ैर, जब दूसरे महंत ने तिवारी के खि़लाफ़ मार्चा बांधा तो मणि जी ने मौक़े की नज़ाकत समझी। फिर उन्हें लगा कि तिवारी को थोड़ी बहुत राजनीतिक छत्रछाया दे कर राजनीतिक चोले का कवच पहना दिया जाए तो अच्छा रहेगा। एम.एल.सी. वह थे ही। आई.ए.एस. रहते कमलापति त्रिपाठी जैसे राजनीतिज्ञों से भी उन का वास्ता पड़ा था और पटरी भी बैठी थी। ब्राह्मणवाद की केमेस्ट्री ने दोनों का कैप्सूल बनाया था। इसी कैप्सूल के तहत मणि जी ने तिवारी को कमलापति त्रिपाठी से मिलाया, उस की प्रतिभा का बखान किया और कहा कि इसे अपना आशीर्वाद दीजिए।

....जारी....

लेखक दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424, This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है. इसके पहले के सभी भागों को पढ़ने के लिए नीचे कमेंट बाक्स के ठीक बाद में आ रहे शीर्षकों पर एक-एक कर क्लिक करते जाइए.


AddThis