मंत्रीजी मुख्यमंत्री के पैरों पर गिर गिड़गिड़ाए

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दयानंद पांडेय: उपन्यास-  ''वे जो हारे हुए'' : भाग (अंतिम) : ''वह तुमको थप्पड़ नहीं सैल्यूट मार रहा है, समझे!'' इतना सुनने के बाद मंत्री जी थरथराते हुए ट्रेन से नीचे उतरे :  एक बार क्या हुआ कि मंत्री जी के कुछ पियक्कड़ दोस्तों ने जब तीन चार पेग पी पिला लिया तो उनको चढ़ा दिया :

कमलापति त्रिपाठी ने तिवारी को आशीर्वाद दे दिया। तिवारी प्रदेश कांग्रेस कमेटी का सदस्य हो गया। फिर विश्वविद्यालय की कार्य समिति का भी सदस्य हो गया। साथ ही फ़र्टिलाइजर कारखाने में एक ट्रेड यूनियन में भी पदाधिकारी हो गया। ग़रज़ यह कि उस का बायोडाटा अब पोलिटिकल बायोडाटा में तब्दील हो गया। यह वही दिन थे जब भारतीय राजनीति में अपराधियों की आमद शुरू क्या हुई थी बल्कि अपराधी राजनीति में प्रवेश के लिए दस्तक देने लगे थे। मनी पावर और मसल पावर भारतीय राजनीति के दो मुख्य घटक बनने जा रहे हैं, यह उस की आहट थी।

तिवारी ने अपने पोलिटिकल बायोडाटा को और पुख़्ता किया एम.एल.सी. का चुनाव लड़ कर। एक समय से कभी पीछे मुड़ कर न देखने वाले तिवारी ने पंचायतों द्वारा चुने जाने वाले इस एम.एल.सी. चुनाव में पराजय का स्वाद चखा। कोई 11 वोटों से हार से बौखलाए तिवारी ने बाज़ारें बंद करवा दीं। कि एक अनाज मंडी में दुहरा हादसा हो गया। तब के एक कोतवाल ने कहा सुनी में तिवारी को दो चार हाथ दे दिए। फ़ोर्स ज़्यादा थी और तिवारी के लोग कम। पर्याप्त हथियार भी नहीं थे। व्यापारी और लोग भड़के हुए थे। सो तिवारी वहां से सरक गया। खीझ मिटाने और रौब ग़ालिब करने के लिए तड़ातड़ तीन हत्याएं करवा दीं, ताकि इलाक़े में उस का आतंक फिर से क़ायम हो जाए। आतंक क़ायम हो भी गया। लेकिन कोतवाल का दबदबा भी बना रहा।

तब इस कोतवाल को लोग टाइगर कहते थे। शहर में उस की जांबाज़ी और दिलेरी के क़िस्से भी आम थे। किंवदंती की तरह। उन्हीं दिनों एक उप चुनाव में संविद सरकार के मुख्यमंत्री टी.एन. सिंह को एक द्विवेदी जी ने हरा दिया। मुख्यमंत्री हालां कि चुनाव जीत रहे थे। पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की एक चुनावी सभा में आते समय बीच रास्ते में राजनारायण ने एक फ़िएट कार पर खड़े हो कर धोती उठा कर जो अभद्र प्रदर्शन किया इंदिरा गांधी को चिढ़ाने के लिए उस से लोग नाराज़ हो गए। और मुख्यमंत्री चुनाव हार गए। सरकार गिर गई। कमलापति त्रिपाठी मुख्यमंत्री बन गए।

तो टी.एन. सिंह को हराने वाले द्विवेदी जी को भी अपने मंत्रिमंडल में ले लिया डिप्टी मिनिस्टर बना कर। मंत्री बनने के पहले इस शहर कोतवाल जिस को लोग टाइगर कहते थे, उस ने कभी किसी मामले में द्विवेदी जी को भी पीट दिया था। पर अब द्विवेदी जी डिप्टी मिनिस्टर भले बने थे पर उन को मिला गृह विभाग था। सो जब उन को वापस अपने शहर जाना हुआ तो एक ज़िद यह पकड़ी कि पहले उस कोतवाल का ट्रांसफ़र हो जाए। लेकिन उन के एक दोस्त दुबे जी जो विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष भी थे ने कहा कि, ‘सिर मुड़ाते ही ओले मत गिराओ! भूल जाओ कि कभी उस ने तुम को पीटा था।’

तो द्विवेदी जी ने पूछा, ‘पर कहीं फिर उसने पीट दिया तो? दुबे जी ने उनकी इस शंका का भी समाधान किया कि, ‘उलटे तुम्हारा वेलकम करेगा, सैल्यूट ठोंकेगा। तुमको याद है कि उसने पीटा था। पर वह अब तक इतने लोगों को पीट चुका है कि उसने तुम को भी कभी पीटा था, भूल चुका होगा। निश्चिंत होकर अपने शहर चलो। तुम्हारे स्वागत की फुल तैयारी है।’ पर जब द्विवेदी जी ट्रेन से अपने शहर पहुंचे तो प्लेटफ़ार्म पर तमाम भीड़ में वह कोतवाल भी था। मंत्री जी को देखते ही उसने सैल्यूट मारने के लिए तेज़ी से हाथ उठाया। मंत्री जी ट्रेन में डब्बे के गेट पर थे तभी। मंत्री जी पलट कर वापस भागे कि, ‘साला फिर मारेगा।’ दुबे जी पीछे ही थे मंत्री जी को वापस नीचे उतारते हुए बोले, ‘नाटक मत करो डरपोक! वह तुमको थप्पड़ नहीं सैल्यूट मार रहा है।’ तो मंत्री जी थरथराते हुए ट्रेन से नीचे उतरे।

एक बार क्या हुआ कि मंत्री जी के कुछ पियक्कड़ दोस्तों ने जब तीन चार पेग पी पिला लिया तो उनको चढ़ा दिया, ‘कि बताइए जो टी.एन. सिंह को आप ने नहीं हराया होता तो क्या कमलापति मुख्यमंत्री हो पाते? नहीं न? और फिर भी आप को डिप्टी मिनिस्टर बनाया। कैबिनेट नहीं, न सही स्टेट मिनिस्टर तो बनाया होता।’ मंत्री जी हताश होकर बोले, ‘यह तो है।’ एक दोस्त ने कहा, ‘तो मौक़ा मत चूकिए अभी मुख्यमंत्री को फ़ोन लगाइए।’ तबके दिनों में ट्रंकाल बुक करने का चलन था। ट्रंकाल बुक किया गया। मुख्यमंत्री को मंत्री जी ने अर्दब में ले लिया। अकबक बोलते हुए गरजे, ‘मेरे ही चलते मुख्यमंत्री बने और मुझे ही डिप्टी मिनिस्टर बना दिया?’ जवाब में मुख्यमंत्री ने डपट दिया, ‘बोले अभी तुम होश में नहीं हो। होश में आते ही लखनऊ आ जाओ फिर बात करते हैं।’

मंत्री जी पस्त हो गए। सारा नशा चूर हो गया। दूसरे दिन भाग कर लखनऊ पहुंचे। मुख्यमंत्री से मिले। मुख्यमंत्री ने इस्तीफ़ा मांग लिया। कहा कि, ‘तुम अभी मंत्री बनने के योग्य नहीं हो। शराब पी कर जब तुम मेरे साथ अभद्रता कर सकते हो तो बाक़ी के साथ क्या कर सकते हो समझ सकता हूं।’ मंत्री जी मुख्यमंत्री के पैरों पर गिर गए। गिड़गिड़ाने लगे। अंततः मुख्यमंत्री पसीज गए। बोले, ‘लेकिन अब तुम होम में नहीं रहोगे। कोई और विभाग में जाओ। होम मिनिस्टरी लायक़ तुम्हारा आचरण नहीं है।’ मंत्री जी फिर पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाए। तो मुख्यमंत्री ने उन्हें बख़्शते हुए कहा कि, ‘चलो होम में तो रहोगे पर देखोगे होम गार्ड। यानी डिप्टी होम मिनिस्टर होमगार्ड।’

मंत्री जी लौटे अपने शहर लुटे-पिटे अंदाज़ में। डिप्टी होम मिनिस्टर होमगार्ड बन कर। मंत्री जी उस कोतवाल को भी नहीं हटा पाए। और वही कोतवाल अब तिवारी के लिए भारी पड़ गया था।

मणि जी की सलाह पर तिवारी फिर फ़रार हो गया। राजनीति भूल कर फिर से रंगदारी, ठेकेदारी और ख़ून ख़राबे के खेल में लग गया। उन दिनों तमाम सरकारी कर्मचारी भी चार सौ छः सौ रुपए वेतन वाले थे और बड़ा सपना उन के पास यही होता कि कम से कम रिटायर होते समय ही वेतन फोर फिगर में यानी एक हज़ार रुपए हो जाता! जो कि अकसर नहीं होता। लखपति होना शान का सपना होता मध्यवर्ग में जो कोई नहीं होता। उन दिनों में भी तिवारी करोड़ों में खेलने लगा। और जो कोई ज़रा भी उस की राह में आने की ग़लती करता उस को वह सीधे स्वर्गीय बना कर स्वर्ग यात्रा पर भेज देता।

महंत जी ने उन्हीं दिनों विश्वविद्यालय छात्र संघ के एक नेता को पकड़ा। उसे क्षत्रियवाद की ख़ुराक पिलाई। जैसे कभी मणि जी ने तिवारी को ब्राह्मणवाद की ख़ुराक पिलाई थी और बड़े महंत जी के खि़लाफ़ खड़ा किया था। तो महंत जी ने भी छात्र संघ के इस क्षत्रिय नेता को क्षत्रियवाद की ख़ुराक दे कर तिवारी के खि़लाफ़ खड़ा किया। छात्र संघ का यह नेता वास्तव में राजनीति करना चाहता था, साफ़ सुथरी राजनीति। उस ने उन दिनों जैसे एक रिकार्ड सा बना दिया था। लगातार तीन-तीन विश्वविद्यालयों के छात्र संघ का अध्यक्ष बन कर। अपने शहर के विश्वविद्यालय के बाद वह बी.एच.यू. में भी छात्र संघ अध्यक्ष रहा और लखनऊ विश्वविद्यालय में भी। अंगरेज़ी हटाओ आंदोलन का नेता था वह। आनंद ने जब अपने कालेज में अनशन किया था तब उस को जूस पिला कर इसी नेता ने अनशन तुड़वाया था।

अब वह अपनी जगह छात्र संघ के बजाय संसदीय राजनीति में तलाश रहा था। एक बार विधानसभा का चुनाव निर्दलीय लड़ कर वह हार चुका था। पर दुबारा विधायक चुन लिया गया था। अब वह तिवारी के अवैध कारोबार पर लगाम बन कर खड़ा था। तिवारी की उन दिनों रवायत यह थी कि सड़क बनाने का ठेका लेता। सड़क बनती काग़ज़ पर और पेमेंट हो जाता। पेमेंट क्या हो जाता, इंजीनियर लोग चेक तिवारी के घर पहुंचा आते। ऐसे ही बाक़ी ठेकों में भी होता। इस विधायक ने तिवारी के खि़लाफ़ विधानसभा से ले कर सड़क तक पर मोर्चा खोल दिया। अपने गुर्गों को तिवारी के पैरलेल ठेकों में भी उतार दिया। तिवारी का आतंक और आय दोनों पर लगाम कस गई।

नतीजा सामने था।

विधायक का दायां हाथ कहा जाने वाला जो विश्वविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष भी रह चुका था गोलघर  बाज़ार में सरेशाम गोलियों से भून दिया गया। शहर में सन्नाटा फैल गया। जल्दी ही जवाबी हमले में तिवारी के भी दो आदमी मार गिराए गए। तो तिवारी ने भी सरे बाज़ार सात लोगों को एक साथ गोलियों से छलनी कर दिया। फिर तिवारी के भी पांच आदमी मार दिए गए। अंततः एक दिन सुबह-सुबह रेलवे स्टेशन पर वह विधायक भी जो विधानसभा की बैठक में भाग लेने लखनऊ जा रहा था अपने गनर सहित तड़ातड़ चली गोलियों से छलनी हो गया। शहर में अफवाहों का बाज़ार गरम हो गया। ख़ौफ का तंबू तन गया। तिवारी का घर चारों ओर से भारी पुलिस बल ने घेर लिया। पर जाने इसमें कितना सच था, कितना झूठ पर यह कहानी ज़ोरों पर चली कि तिवारी ने बिलकुल फ़िल्मी अंदाज़ में उस के घर पूछताछ के लिए गए एक पुलिस अफ़सर को बंधक बनाया, उस की वर्दी उतार कर पहनी और उसी की जीप में पुलिस वालों से सलामी लेता पुलिस घेरे से बाहर निकल कर सीधे नेपाल चला गया। और पुलिस टापती रह गई।

शहर की चर्चा अब बी.बी.सी. रेडियो तक पर थी। शहर की ख़ून से लाल हुई सड़कों की चर्चा चहुं ओर थी। कहा जाने लगा कि दुनिया के टाप क्रिमिनल सिटी में इस शहर का नाम शुमार है। अमरीका के शिकागो से इस शहर की तुलना होने लगी। लगता था कि जैसे यहां क़ानून का राज नहीं, जंगल राज हो। देश का एक ऐसा टापू जहां सिर्फ़ अपराध ही पढ़ाया-लिखाया जाता हो!

देश और प्रदेश औद्योगिक विकास की ओर पेंग मार रहा था। पर इस शहर में ख़ून ख़राबा इतना आम हो गया कि कोई उद्योगपति या कोई व्यवसायी यहां आने से कतरा गया। इस ख़ूनी खेल ने पूर्वी उत्तर प्रदेश को औद्योगिक और व्यावसायिक विकास से महरूम कर दिया। विकास के पहिए यहां आने से ही इंकार कर गए।

रही सही कसर तिवारी के एक ख़ास ले़फ्टिनेंट शाही ने तिवारी के खि़लाफ़ बग़ावत कर के पूरी कर दी। शाही ने तिवारी के सामने क़दम-क़दम पर मुश्किलें खड़ी कीं। वह तिवारी के सारे ठेके-पट्टे और हथकंडे से न सिर्फ़ वाक़िफ़ था, बल्कि राज़दार भी था। उस ने तिवारी का जीना मुश्किल कर दिया। ठेकों पर से उन का एकछत्र राज तो छीना ही उन पर ताबड़तोड़ हमले भी करवाए। उन के लोगों को तोड़ा। तिवारी ने भी शाही की भरपूर सांसत की। एक बार तो सरे बाज़ार शाही की कार को पूरी तरह छलनी कर दिया। शाही ने कार की सीट उखाड़ कर सीट के नीचे छिप कर अपने प्राण बचाए। शाही ने भी राजनीतिक टोटके आज़माए और विधानसभा में निर्वाचित हो कर निर्दलीय की हैसियत से पहुंच गया। चेले ने अब गुरु का जीना हराम कर दिया। गुरु जो हरदम फ़रार रहते थे, सामने आने पर मजबूर हो गए। और एक संसदीय चुनाव में गुरु और चेले आमने-सामने हो गए।

दोनों के खि़लाफ़ एन.एस.ए. लग गया। दोनों एक ही जेल में बंद हो गए। अगल-बगल की बैरकों में। दोनों ने ही एक ही संसदीय सीट के लिए जेल से परचा भरा, जेल से ही चुनाव संचालन किया, पानी की तरह पैसा बहाया। पर दोनों ही की ज़मानत ज़ब्त हो गई। पर जल्दी ही हुए विधानसभा चुनाव में दोनों ही जीत गए अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से। दोनों ने ही जेल से ही जा कर विधानसभा सदस्यता की शपथ ली और बाद में एन.एस.ए. हटने पर छूट भी गए। शहर का एक काबीना मंत्री जो ठाकुर था, उसने भी तिवारी की नाकाबंदी की। अब शाही के पास डबल बैकिंग थी। एक महंत जी की, एक मंत्री जी की। बल्कि इस मंत्री ने बीते दोनों चुनाव में तिवारी को कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने दिया था। पर विधानसभा चुनाव में यह मंत्री गच्चा खा गया अपने ही राजनीतिक गुरु चतुर्वेदी जी से। चतुर्वेदी जी तपे तपाए स्वतंत्रता सेनानी थे और मंत्री के राजनीतिक गुरु। मंत्री हो गया यह ठाकुर कभी चतुर्वेदी जी का झोला ढोता था।

चतुर्वेदी जी 1952 में विधानसभा में गए तो कभी हारे नहीं। पर 1985 के चुनाव में कांग्रेस का टिकट पा कर पर्चा भी भरे पर तिवारी के पक्ष में बैठ गए। ब्राह्मणवाद के नाम पर तिवारी का डट कर प्रचार किया। चतुर्वेदी जी का तिवारी के पक्ष में प्रचार और तिवारी के पिता की पुरोहिताई ने तिवारी को जितवा दिया। इस ठाकुर मंत्री ने हालां कि कोशिश की कि बैलेट बाक्स वग़ैरह बदल-वदल कर तिवारी को हरवा दिया जाए। पर तब के एक एस.डी.एम. ने ऐसा करने करवाने से साफ़ इंकार कर दिया। तिवारी विधानसभा चुनाव भले जीत गया पर उस के दुर्भाग्य ने उस का पीछा नहीं छोड़ा। शहर का वह ठाकुर मंत्री अब प्रदेश का मुख्यमंत्री हो गया था। उस ने तिवारी के सारे ठेके छिन्न भिन्न करवा दिए और पूरी ताक़त झोंक दी तिवारी को बरबाद करने के लिए। दो तीन बार पुलिस इनकाउंटर की भी कोशिश करवाई। लेकिन तिवारी अपनी तरकीबों से बच निकला। एक बार तो तिवारी ने अपने एक कालेज के फंक्शन में कमलापति त्रिपाठी को मुख्य अतिथि बनाया। फंक्शन ख़त्म हुआ तो कमलापति त्रिपाठी बाई रोड बनारस निकल गए। लेकिन तिवारी को पुलिस ने अवैध हथियार रखने के आरोप में रोक लिया। सत्तर-अस्सी किलोमीटर दूर के एक थाने में पूछताछ के लिए ले गई। इरादा रात में इनकाउंटर का था। पर तिवारी के लोेग रातों रात इतने ज़्यादा इकट्ठे हो गए की पुलिस फ़ोर्स कम पड़ गई लोग ज़्यादा। तिवारी छूट गया।

तिवारी अपनी सुरक्षा को ले कर चिंतित हो गया। नींद हराम हो गई। वैसे भी तिवारी कभी ट्रेन से नहीं चलता था। कहता कि अगर ट्रेन से चलूं तो पता चला कि रास्ते में ही चेन पुलिंग कर के सब मार देंगे। तो या तो बाई रोड या बाई एयर ही चलता तिवारी। और एक साथ तीन चार प्रोग्राम बनाए रहता। मंगाए रहता हवाई जहाज का टिकट और चल देता बाई रोड। बाई रोड जाना होता कानपुर चल देता बनारस। वह भी रास्ता बदल-बदल कर। रात दो बजे सोता सुबह चार बजे उठ जाता। सरकारी सुरक्षा के भरोसे रहता नहीं था। अपनी सुरक्षा में लगे निजी लोगों को भी रोटेट करता रहता। रास्ते में भी आठ-दस गाड़ियां साथ रहतीं। थोड़ी-थोड़ी देर में गाड़ियां भी बदलता रहता। भरोसा किसी पर नहीं करता। अपने सगे भी उस के शक के दायरे में रहते। और जिस पर भी उस का शक गाढ़ा होता उसे वह फ़ौरन मौत की नींद सुला देता। कभी भूल कर भी वह कोई चांस नहीं लेता।

लेकिन इस ठाकुर मुख्यमंत्री ने तिवारी की चौतरफ़ा नाकाबंदी कर के उस की कमर तोड़ दी थी। शहर में क्या पूरे ज़िले में ठाकुरवाद-ब्राह्मणवाद की लड़ाई पूरे उफान पर थी। हालां कि शाही खुल कर कहता, ‘कहीं ठाकुरवाद-ब्राह्मणवाद की लड़ाई नहीं है। हमारी और गुरु जी की लड़ाई दरअसल ठेके पट्टे की लड़ाई है।’ वह अपने कई ले़फ्टिनेंटों के नाम गिनाता और कहता, ‘देखिए यह सभी पंडित हैं और हमारे ख़ास हैं।’ फिर वह तिवारी के कई ख़ास ले़फ्टिनेंटों के नाम गिनाता और कहता, ‘देखिए गुरु जी के यह लोग ठाकुर हैं। तो काहें की ब्राह्मणवाद-ठाकुरवाद की लड़ाई?’ वह जोड़ता, ‘सब गुरु जी का खेल है लोगों को उकसाने-भड़काने और अपनी रोटी पकाने का।’

शाही थोड़ा दिल का साफ़ था और तबीयत का बादशाह। एक समय तिवारी के लोग उसे मारने के लिए कुत्तों की तरह खोज रहे थे पर वह फिर भी सिनेमा देखने सिनेमा हाल चला जाता था। उन दिनों वीडियो, सी.डी., डी.वी.डी. की तकनीक कहीं दूर-दूर तक नहीं थी। सो वह सिनेमा हाल चला जाता। उन दिनों एक फ़िल्म लगी थी मेरा गांव मेरा देश। सिल्वर जुबिली हुई थी। तो शाही ने भी पचीसियों बार इस फ़िल्म को देखा। जान ख़तरे में डाल कर। शाही को औरतों, शराब वगै़रह का भी शौक़ था। पर तिवारी को औरतों, शराब वगै़रह से न सिर्फ़ मुश्किल थी बल्कि ऐसे लोगों को भी अपने से दूर रखता। हां, कभी-कभी तिवारी के होमो होने के शौक़ की चर्चा दबे ढंके ज़रूर चल जाती। पर बाक़ी मामलों में तिवारी शुद्ध शाकाहारी और विशुद्ध कंजूस के रूप में अभी भी जाना जाता है। तिवारी के अभेद्य सुरक्षा में यह अवयव भी महत्वपूर्ण साबित हुआ।

एक समय श्री प्रकाश शुक्ला नामक एक अपराधी पूरे पूर्वांचल में छा गया। उसे हत्या कर नाम कमाने का जैसे नशा सा था। अपराधी पुलिस सब को वह ताश की तरह फेंट कर मारता। उस ने तिवारी और शाही को भी निशाने पर लिया। तिवारी को निशाने पर उस के एक शागिर्द ने ही लिया जिस ने बाद में मंत्री रहते हुए भी एक कवियत्री की हत्या करवा दी क्यों कि वह उस के बच्चे को गिरवाने को तैयार नहीं थी। वह अब सपत्नीक जेल भुगत रहा है तो यह वह कवियत्री की बहन की वजह से नहीं बल्कि तिवारी की कृपा से। उस शागिर्द की सारी ज़मीनी नाकेबंदी तिवारी ने करवाई और सुप्रीम कोर्ट तक से उसे नाथ दिया। ख़ैर श्री प्रकाश शुक्ला लाख कोशिश के बावजूद तिवारी को नहीं मार पाया। पर शाही को एक सुबह लखनऊ में ही उस ने मार गिराया। जब वह औरतबाज़ी कर के अकेले लौट रहा था। बाद में तो श्री प्रकाश शुक्ला भी पुलिस के हाथों मारा गया। लेकिन तिवारी न सिर्फ़ बचा रह गया बल्कि मिली जुली सरकारों के दौर में बार-बार मंत्री भी बना। विभाग भले ही अच्छे न मिले हों उसे पर बना कैबिनेट मिनिस्टर ही। पहली बार जब तिवारी को विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय दिया गया तो तिवारी के लोग घूम-घूम कर कहते, ‘यह तो पंडित जी का अपमान है।’ तो एक दिन एक पत्रकार जो कभी शाही का मुंहलगा भी था बोला, ‘यह पंडित जी का अपमान नहीं है, यह तो बेचारे उन वैज्ञानिकों का अपमान है जो एक माफ़िया मंत्री के मातहत हो गए हैं।’ तब से तिवारी के लोगों ने यह कहना बंद कर दिया।

बहरहाल यह शहर कभी सांप्रदायिकता तो कभी अपराध की भट्ठी में सुलगता दहकता रहा। विकास का सपना भी नहीं देखा इस शहर ने और शीशे की तरह टूटता रहा। उस ठाकुर मुख्यमंत्री ने एक औद्योगिक विकास प्राधिकरण भी बनाया नोएडा की तर्ज पर। लेकिन अपनी स्थापना के ढाई दशक बाद भी यह प्राधिकरण फूल फल नहीं सका। तिवारी अब खरबपति हो कर यहां की चीनी मिलों को औने-पौने ख़रीद कर, बंद कर अपनी निजी संपत्ति बना कर मौज कर रहा है। और जिस भी किसी की सरकार बनती है उस में कभी सीधे, कभी प्रकारांतर से शामिल हो जाता है। भांजों, बेटों और चेलों को आगे पीछे लगा देता है। अब वह ख़ुद विधायक या मंत्री नहीं है तो क्या उस का एक बेटा सांसद है और भांजा एम.एल.सी.।

आप पूछ सकते हैं कि कभी तिवारी के पोषक रहे मणि जी कहां हैं? तो मणि जी अब दिवंगत हैं। लेकिन दिवंगत होने के पहले तिवारी ने उन को भी उन की हैसियत बता दी थी। हुआ यह कि एक कुष्ठाश्रम के ट्रस्ट में दोनों ही ट्रस्टी थे। मणि जी ने जब देखा कि कोढ़ियों का भी पैसा कुष्ठाश्रम का सुपरिंटेंडेंट हजम कर जा रहा है तो ट्रस्ट की मीटिंग में उन्हों ने इस पर हैरत जताई और डट कर विरोध जताया। लगभग सभी ट्रस्टी सुपरिंटेंडेंट को हटाने पर सहमत हो गए। सिर्फ़ एक माफ़िया तिवारी को छोड़ कर। सुपरिंटेंडेंट दरअसल गड़बड़ी कर ही रहा था तिवारी के दम पर। करोड़ों रुपए का बजट गटक रहा था, तिवारी को उन का हिस्सा दे रहा था। पर जब बाक़ी ट्रस्टियों ने सुपरिंटेंडेंट को बचाने में तिवारी की दिलचस्पी देखी तो चुप लगा गए। लेकिन मणि जी चुप नहीं हुए। लगातार बोलते रहे तमाम अनियमितताओं के खि़लाफ़! आजिज़ आ कर तिवारी मणि जी के पास हाथ जोड़ कर पहुंचा और कहा कि, ‘शांत हो जाइए।’

‘क्यों शांत हो जाऊं?’ मणि जी भड़के।

‘शांत हो जाइए!’ तिवारी ने हाथ जोड़ कर ही पर डपट कर कहा कि, ‘शांत हो जाइए, नहीं शांत कर दूंगा।’

मणि जी सकते में आ गए।

ट्रस्ट की मीटिंग से उठ कर चुपचाप चले गए। हालां कि वह कोई कमज़ोर नहीं थे। ख़ुद आई.ए.एस. रह चुके थे, एम.एल.सी. रह चुके थे। एक बेटा जस्टिस था जो बाद में एम.पी. भी हुआ। एक बेटा आई.पी.एस. था जो बाद में डी.जी.पी. भी हुआ। एक बेटा सेना में मेजर था। सब कुछ था पर इस तिवारी ने जो उन से कहा कि, ‘शांत हो जाइए, नहीं शांत कर दूंगा।’ उस के इस कहे ने उन्हें मथ दिया था। अकेला कर दिया था। तोड़ दिया था-भीतर तक। वह शंकर नहीं थे, पर भस्मासुर पैदा कर बैठे थे। आम समझ कर बबूल लगा बैठे थे। यह उन को अब एहसास हो रहा था। जब तिवारी की नागफनी ने उन को हलके से छुआ था।

यह क्या था?

यही उन का अवसान था।

फिर उन का देहावसान भी हो गया।

बड़े महंत जी कब के दिवंगत हो चुके थे। उन के बाद के महंत भी अब बुढ़ा रहे थे। उन के अवसान का समय भी अब नज़दीक था। इस महंत ने मंदिर के विस्तार और तमाम और संस्थानों के विस्तार में जो तत्परता और कुशलता दिखाई थी उस में एक छेद भी था- इस महंत की औरतबाज़ी। इस के लिए वह बदनाम हो चले थे। अपनी इन औरतों और इन से हुए बच्चों को उन्हों ने अपना नाम भले न दिया हो पर उन्हें सामाजिक स्वीकृति, संपन्नता और प्रतिष्ठा ख़ूब दी और दिलवाई। फिर जब अपने अवसान पर जीते जी स्वास्थ्य का हवाला दे कर इस नए महंत को अपनी गद्दी सौंपी तो दबी ज़ुबान ही सही यह चर्चा भी मंदिर परिसर से ही चल पड़ी कि यह महंत जी की ही संतान है। और कि उत्तराखंड में इस की माता निवास करती है।

पर यह चर्चा आम नहीं हुई, ख़ास ही बनी रही।

तिस पर महंत जी के उग्र तेवर ने लोगों में ऐसी दहशत भरी कि सारा शहर उन के यशोगान में डूब गया। क्या प्रशंसक क्या विरोधी किसी की भी ज़बान पर यह बात नहीं आई। सब जानते थे कि जो किसी की ज़बान पर यह बात आई तो उस की ज़बान उस के मुंह में नहीं रह पाएगी, काट दी जाएगी।

जो भी हो महंत जी सारी उठा पटक के बावजूद चुनाव भारी मतों से जीत गए। माफ़िया तिवारी के बेटे को छोड़ कर बाक़ी सभी की ज़मानत ज़ब्त करवा दी महंत जी ने।

वह टी.वी. पर देख रहा है कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की दुबारा शपथ ले रहे हैं। नीचे लगातार पट्टी पर लिखा आ रहा है कि नेहरू के बाद दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री जो अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद दूसरी बार शपथ ले रहे हैं। तभी मुनव्वर भाई का फ़ोन आ जाता है। वह बता रहे हैं, ‘बस अभी आप के गांव से लौटा हूं।’

‘क्यों क्या हुआ मेरे गांव में?’

‘अरे आप भूल गए?’ वह थोड़ा गंभीर हो कर बोले, ‘आज चालीसवां था क़ासिम का!’

‘अच्छा-अच्छा!’

‘हमें तो उम्मीद थी कि आप भी आएंगे।’

‘कहां मुनव्वर भाई।’ वह बोला, ‘आप तो सारी बात जानते हैं।’

‘हां भई जानता हूं कि जो किसी से नहीं हारा, हार गया अपनों से।’

‘हां मुनव्वर भाई हम हारे हुए लोग ही तो हैं।’ वह बोला, ‘हारे हुए भी और अपमानित भी।’

‘सॉरी आनंद जी!’ मुनव्वर भाई बोले, ‘मैं अपने को इस तरह हारा हुआ नहीं मानता। आप को भी नहीं मानना चाहिए। हम एक न एक दिन कामयाब होंगे।’

‘यह सब रूमानी और किताबी बातें हैं मुनव्वर भाई!’ वह बोला, ‘पढ़ने-सुनने में अच्छी लगती हैं। ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही है।’

‘मैं ऐसा नहीं मानता।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘देखिए अब की चुनाव में एक बात तो साफ़ हो ही गई है राहुल गांधी और वरुण गांधी की लड़ाई में। कि देश में अब वरुण गांधी की राजनीति नहीं चलने वाली। सांप्रदायिकता और नफ़रत की जगह राहुल जी की साफ़ सुथरी राजनीति देश के लोग चाहते हैं। इन टोटल देखें तो लोगों ने सांप्रदायिक, जातीय राजनीति को तो लगभग तमाचा मारा है।’

‘मुनव्वर भाई चलिए एक हद तक आप की बात मान लेते हैं। और नीतीश कुमार की साफ़ सुथरी राजनीति को भी जिसे आप छोड़ रहे हैं, इस मंे जोड़ लेते हैं। फिर भी यह बताइए कि अब की चुनाव में वोटिंग का औसत क्या रहा?’

‘हां, यह तो अफ़सोसनाक है।’

‘तो फिर यह कैसे तय होगा कि देश की राजनीति कहां जा रही है?’ वह बोला, ‘एक समय था कि आप की कांग्रेस पैंतीस परसेंट-चालीस परसेंट, फिर तैतीस परसंेट वोट पा कर देश पर रूल करती थी। अब लगभग इतने ही परसेंट वोटिंग हो रही है। यह क्या है?

‘हो सकता है, अगले चुनाव तक यह चीजें भी ठीक हों।’

‘अच्छा आप यह बताइए कि अब की अपने शहर में महंत के खि़लाफ़ माहौल था?’

‘बिलकुल था।’

‘फिर भी वह लोगों की लगभग ज़मानत ज़ब्त करवा कर जीता। यह क्या है?’

‘ये तो है।’

‘सच यह है मुनव्वर भाई कि जैसा कि लोग कहते हैं कि देश के नेताओं की खाल मोटी है। तो मैं भी मानता हूं कि हां है। पर यह भी मानता हूं और जानता हूं कि इन नेताओं से भी ज़्यादा हमारी जनता की खाल मोटी है। जानती है कि फ़लां बदमाश है, कमीना है, भ्रष्ट है, अपराधी है, जातिवादी है, सांप्रदायिक है पर उस के खि़लाफ़ वोट देने नहीं जाती। तो यह क्या है?’

‘सो तो है?’

‘बताइए कि मुंबई में जब ताज, ओबराय होटलों और स्टेशन वगै़रह पर आतंकवादी हमला हुआ था तब गेट वे ऑफ इंडिया पर मोमबत्ती जलाने जैसे समूचा मुंबई सड़कों पर उतर आया था। पर जब शिव सेना के गुंडे अभी इस के कुछ दिन पहले यू.पी. और बिहार के गरीबों को मार रहे थे, वहां से भगा रहे थे तो यह मंुबई की जनता वहां चुप क्यों बैठी थी? सड़कों पर क्यों नहीं आई थी? क्या इस का विरोध नहीं करना चाहिए था वहां के लोगों को?’ वह बोला, ‘और देखिए अब यही मुंबई की जनता वोट देने भी नहीं निकली। बल्कि एक फ़िल्मी एक्टर बेशर्मी पार करते हुए कहने लगा कि वोट देने के लिए भी पैसा मिलना चाहिए। पैसा नहीं मिला इस लिए उस ने वोट नहीं दिया। तब जब कि वह एक साथ कांग्रेेस, भाजपा दोनों के प्रचार में गया था। तो जाहिर है कि वहां पैसा मिला होगा तभी गया होगा। जब कि एक फ़िल्मी हीरो ने चैनलों को तमाशा करते हुए बताया कि वह विदेश में अपनी शूटिंग छोड़ कर वोट डालने आया है। जब कि हक़ीक़त यह थी कि एक पंूजीपति के घर उस दिन शादी में वह नाचने के लिए आया था, करोड़ो रुपए ले कर। और यही फ़िल्मी हीरो हमारे समाज के आज के आइकन हैं, सेलिब्रिटी हैं।’

‘चलिए आनंद जी यह सब चीज़ें हमारी आप की बहस से सुलझने वाली भी नहीं हैं।’

‘पर यह जो पैसे का राक्षस हमारे समाज को संचालित कर रहा है। इस का क्या करें? पैसा बड़ा था शुरू से पर अब यह इतना बड़ा राक्षस हो गया है कि क्या करें? राम के ज़माने में रावण भी इतना बड़ा नहीं रहा होगा, कृष्ण के ज़माने में कंस भी इतना बड़ा नहीं रहा होगा, जितना बड़ा राक्षस यह पैसा हो गया है हम लोगों के ज़माने में।’

‘ये तो है।’

‘चलिए मुनव्वर भाई भाषण बहुत हो गया। फिर बात होगी।’

‘अच्छी बात है।’

‘अरे हां, यह बताइए कि हमारे गांव में सब कुछ सामान्य तो है न?’

‘हां, हमें तो सामान्य ही लगा।’ वह बोले, ‘क्यों क्या हुआ?’

‘नहीं वैसे ही पूछ लिया कि कहीं कोई तनाव वग़ैरह।’

‘नहीं ऐसा कुछ नहीं दिखा हमें तो।’

‘ठीक बात है।’

बात ख़त्म हो गई थी।

उधर टी.वी. पर शपथ ग्रहण की ख़बर भी ख़त्म हो गई थी।

मन हुआ उस का कि गांव फ़ोन कर के घर गांव का हालचाल ले ले। पर जाने क्यों वह टाल गया। चला गया गोमती नगर एक दोस्त के घर। लौटा तो गांधी सेतु के रास्ते। अंबेडकर पार्क और लोहिया पार्क के बीच से। एक तरफ़ अंबेडकर दूसरी तरफ़ लोहिया। बीच में टाटा ग्रुप का पांच सितारा ताज होटल। तीनों को गोमती पार से जोड़ता गांधी सेतु अजब कंट्रास्ट है। अंबेडकर पार्क पत्थरों में तब्दील हैं। तीन साल से काम ख़त्म ही नहीं हो रहा। लखनऊ पहले बाग़ों का शहर होता था अब पार्कों और पत्थरों का शहर है। कि तानाशाहों का शहर है यह? मास्टर प्लान में यह इलाक़ा ग्रीन बेल्ट का था अब यहां पत्थर बोलते हैं। अंबेडकर, लोहिया, गांधी सेतु! तीनों ग़रीबों के पक्षधर बीच में टाटा का पांच सितारा ताज। अमीरी का प्रतीक। नवाबों के शहर लखनऊ की यह नई कैफ़ियत है! कि चौराहे बड़े हो गए हैं और सड़कें संकरी।

यह क्या है? कौन सी कैफ़ियत है?

कभी शायरों के काफिया तंग होते थे अब लोगों की कैफ़ियत!

वह आफ़िस के एक सहयोगी के घर पर है। उस के पिता का निधन हो गया है। अचानक। मौत पता तारीख़ तो बता कर आती भी नहीं। पर लोग भी नहीं आए हैं। उस के पिता का निधन एक दिन पहले ही हो गया था। रिश्तेदारों, पट्टीदारों को ख़बर भेज कर दो दिन का इंतज़ार किया। कोई नहीं आया। यहां तक कि कोई पड़ोसी भी झांकने नहीं आया। आफ़िस के लोग भी इक्का दुक्का ही हैं। कुछ लोग फ़ोन कर के जबरिया बुलाए जाते हैं। दर्जन भर लोग भी इकट्ठे नहीं होते। एक सहयोगी बुदबुदा रहा है, ‘यह साला भी तो किसी के दुख सुख में नहीं जाता। तो कोई कैसे आएगा?’ लाश वाली गाड़ी बुलाई जाती है। श्मशान घाट पहुंच कर दाह संस्कार संपन्न हो जाता है। सहयोगी कुपित है और चाहता है कि सब कुछ आर्य समाज ढंग से दो तीन दिन में संपन्न हो जाए। फ़ालतू का ख़र्च भी बचेगा। पर सहयोगी की रोती बिलखती मां अड़ गई है कि, ‘सब कुछ विधि विधान से होगा। दसवां भी होगा, तेरही भी और बरखी भी। आखि़र पिता थे तुम्हारे!’

मां और बेटे में मौन जंग जारी है।

घर आकर आनंद सोचता है कि क्या मनुष्य अब सामाजिक प्राणी नहीं रहा? कभी स्कूलों में निबंध लिखवाया जाता था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उस ने बीच-बीच में भी कई बार पाया कि मनुष्य अब सामाजिक प्राणी नहीं बल्कि पारिवारिक प्राणी हो गया है। तो क्या अब वह कुछ दिनों में पारिवारिक प्राणी भी नहीं रह जाएगा। सुविधाओं और तकनीक में फंसा मनुष्य अब एकल प्राणी होने की ओर अग्रसर है! आने वाले दिनों में स्कूलों में निबंध लिखवाया जाएगा कि मनुष्य अब एकल प्राणी है। सॉरी अब तो निबंध नहीं एस्से लिखवाया जाता है स्कूलों में। इंगलिश मीडियम का बुख़ार है स्कूलों में अब तो। तो क्या आगे के दिनों में मनुष्यत्व भी या मनुष्य भी नहीं बचा रह पाएगा?

यह कौन सी कैफ़ियत है?

यह कौन सी प्यास है?

कंपनी के चयेरमैन के साथ वह अपने शहर आया है। एक प्रोडक्ट की लांचिंग है। चार्टर्ड प्लेन से सभी लोग पहुंचे हैं। वहां पहुंचने पर पता चलता है कि उसे चेयरमैन के साथ मंच पर बैठना है। उसे मुश्किल हो जाती है। कि जिस शहर में वह राजनीति के लिए, लड़ने के लिए जाना जाता है, उसी शहर में अपने लोगों के सामने उसे प्रोडक्ट बेचने के लिए बैठना पडे़गा। जिस बाज़ार के खि़लाफ़ वह सेमिनारों में पचासियों बार बोलता रहा है, अब उसी बाज़ार के साथ मैं भी खड़ा हूं, यह लोगों को बताना दिखाना पड़ेगा। चेयरमैन से तो नहीं पर वह एम.डी. से कहता है कि, ‘सर प्लीज़ मुझे मंच से थोड़ा दूर रखिए।’

‘अरे भाई आप यहां एक पब्लिक फीगर हैं। कंपनी इस का लाभ लेना चाहती है। सिंपल! इस में आप को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए। बिलकुल नहीं होना चाहिए।’

‘पर सर!’ वह सकुचाते हुए कुछ बोलना चाहता है।

‘कुछ नहीं आनंद जी इट्स डिसीज़न आफ़ आनरेबिल चेयरमैन सर। मैं कुछ कर भी नहीं सकता। और फिर अभी महंत जी भी आ रहे हैं।’ एम.डी. फुसफुसा कर बोला।

‘महंत जी!’ आनंद बोला, ‘तब तो आप मुझे हरगिज़ न बिठाइए।’

‘हिंदुत्व और सेक्युलरिस्ट दोनों एक साथ स्टेज पर रहेंगे तो क्या मैसेज जाएगा पब्लिक में!’ एम.डी. चहकते हुए बोला, ‘कि यह प्रोडक्ट सब का है। क्या आइडिया। आनरेबिल चेयरमैन सर इज़ वेरी इंटेलिजेंट! हैव ग्रेट आइडिया! गंगा-जमुनी कल्चर इसी को तो कहते हैं।’ कह कर वह ही ही कर हंसने लगा।

‘पर महंत जी के साथ एक स्टेज शेयर करने में मेरी आत्मा गवारा नहीं करती।’

‘क्यों नहीं करती?’ एम.डी. बोला, ‘अभी कल को आप पार्लियामेंट में जाएंगे तो क्या पार्लियामेंट में बैठने से सिर्फ़ इस लिए इंकार कर देंगे कि महंत जी भी यहां बैठे हैं या आप के अन्य विरोधी भी बैठे हैं? तो जैसे पार्लियामेंट में सभी विरोधी एक साथ बैठ सकते हैं तो यहां आप क्यों नहीं बैठ सकते?’

‘पर यह पार्लियामेंट नहीं है।’

‘देन यू प्लीज़ टाक टू आनरेबिल चेयरमैन सर!’ वह बोला, ‘आई एम सॉरी!’

आनंद को लगा कि अब उस के दिमाग़ की नसें तड़क जाएंगी।

भीड़ से अलग हट कर वह सिगरेट निकाल लेता है। सिगरेट सुलगाते ही कंपनी चेयरमैन का पी.ए. मुसकुराता हुआ उस की ओर बढ़ आता है। कहता है, ‘हैव ए नाइस डे सर!’

‘शुक्रिया।’ वह बोला,‘दिन मेरा अच्छा रहे इस के लिए थोड़ी मदद करेंगे मेरी।’

‘बिलकुल सर!’ पी.ए. बोला, ‘आज तो सर आप स्टेज पर होंगे। आनरेबिल चेयरमैन सर के साथ। मंच पर कुल पांच लोग होंगे। आनरेबिल चेयरमैन सर, एम.डी. सर, महंत जी, आप सर और वाइस चेयरमैन बजाज सर! आप की सीट महंत जी के साथ होगी सर। ताकि आप लोगों की बातचीत हो सके और पिछला गिला-शिकवा दूर हो सके। आनरेबिल चेयरमैन सर ऐसा ही चाहते हैं।’

‘पर मैं अगर स्टेज पर नहीं बैठूं तो?’ आनंद बोला, ‘अपने आनरेबिल चेयरमैन सर को बता दीजिए कि मैं स्टेज शेयर नहीं करना चाहता। रही बात महंत जी से गिला-शिकवा दूर करने की तो यह तो पब्लिकली स्टेज पर हो भी नहीं सकती।’

‘जस्ट हारमोनी सर! एंड बिज़नेस स्ट्रेटजी सर! प्लीज़ सर!’

‘चेयरमैन से मेरी बात करवा सकते हैं? अभी?’

‘सॉरी सर! आ़फ्टर फंक्शन!’

‘तब बात कर के क्या करेंगे?’

‘सर, अब तो उनके आने का समय भी हो गया है।’ घड़ी देखते हुए पी.ए. बोला।

‘ओ़फ़! मैं क्या करूं?’

‘कुछ नहीं सर, चलिए और स्टेज की शोभा बढ़ाइए।’

आनंद अपना माथा पीट लेता है। सोचता है कहीं महंत की ही यह साज़िश तो नहीं है उसे अपमानित करने की, उसे खंडित करने की, उसे तोड़ देने की, तोड़ कर छिन्न-भिन्न कर देने की?

कुछ दिन पहले हिंदी के एक लेखक के साथ भी ऐसा कुछ क्या ऐसे ही घट गया था? ज़िंदगी भर सांप्रदायिकता के खि़लाफ़ लिखने वाले इस लेखक ने एक पारिवारिक सम्मान इस महंत के हाथों स्वीकार कर लिया था और नेट पर ब्लागरों ने उसे घेर लिया था। उस लेखक के पास मुंह छुपाने की भी जगह नहीं छोड़ी थी, ब्लागरों ने। इस लेखक ने ब्लागरों को जवाब देने में भी शालीनता की सीमा लांघ दी थी। कहा था मेरे मित्र के अख़बार के एक कर्मचारी ने मेरे खि़लाफ़ कुछ अनर्गल सा लिखा है। और बता दिया था कि मैं उसे जानता तक नहीं और कि यह मेरे ऊपर कुछ जातिवादियों का हमला है, वगै़रह-वगै़रह! जब कि वह ब्लागर पत्रकार भी उस लेखक का मित्र था। लेखक के इस हेकड़ी भरे जवाब ने लोगों को और उकसाया। और वह घिरता ही गया। फिर उसने अंततः माफ़ी मांगी। पर अब तक उसको लोगों ने माफ़ नहीं किया। तमाम सफ़ाई के बावजूद। वह तो समाज से लगभग कटे हुए लेखकों की एक सीमित सी दुनिया है जिसमें भी लोगों ने उस लेखक को माफ़ नहीं किया। तो आनंद तो अपने को प्रतिबद्ध राजनीतिक मानता है, लोग कैसे उसे माफ़ करेंगे? जनता जवाब मांगेगी तो वह क्या जवाब देगा? जवाब देते बनेगा भी उस से भला? इसी शहर के एक कवि देवेंद्र आर्य का शेर याद आ जाता है... कलियुग में त्रेता हूं इसका क्या मतलब / तुमको छू लेता हूं इसका क्या मतलब / गरियाता हूं जिन्हें उन्हीं के हाथों से / पुरस्कार लेता हूं इसका क्या मतलब?

सिगरेट उसकी ख़त्म हो गई है और चेयरमैन की कार भी आ गई है। मय लाव लश्कर के। प्रोटोकाल के मुताबिक़ लाइन से खड़ा हो कर चेयरमैन का स्वागत करने वालों में उस को भी खड़ा होना था, लोग खड़े भी हो गए हैं। पर वह आडिटोरियम के दूसरे छोर पर अकेला खड़ा वह यह सब देख रहा है। उस का मोबाइल बजता है। उधर से चेयरमैन का पी.ए. है। खुसफुसा रहा है, ‘सर आप कहां हैं? आनरेबिल चेयरमैन सर आप को याद कर रहे हैं।’

‘आ रहा हूं।’ कहते हुए वह आगे बढ़ता है बुदबुदता हुआ, ‘लगता है अब आज मेरी नौकरी के दिन पूरे हो गए!’

चेयरमैन अभी तक कार में बैठे हैं। जाने सचमुच किसी से मोबाइल पर बात कर रहे हैं कि बात करने का अभिनय कर रहे हैं। ख़ैर, वह धीरे से क़तार में खड़ा हो जाता है। ठीक एम.डी. के बग़ल में। एम.डी. कनखियों से उसे देखते हुए मुसकुराते हैं। सब के हाथ में बुके है। आनंद का हाथ ख़ाली है। एक आदमी पीछे से आ कर उस के हाथ में भी बुके थमा देता है। चेयरमैन कार से बाहर आ गए हैं। फूलों की बरसात के बीच वह सब से बुके लेते हैं। आनंद उन्हें बुके देते हुए कहता है, ‘सर, आप से कुछ बात करनी है अभी!’

‘हां, आनंद जी हम लोग लंच साथ करेंगे तभी बात करते हैं ओ.के।’ कहते हुए चेयरमैन मुसकुराए और उस का हाथ पकड़े हुए आडिटोरियम के अंदर बढ़ चले। आनंद सन्न! अब क्या करे! तब तक पता पड़ा महंत जी भी लाव लश्कर सहित बाहर आ गए थे। चेयरमैन पलट कर आडिटोरियम से बाहर जाने लगे। बोले, ‘आइए महंत जी को रिसीव कर लें।’
पर आनंद वहीं रुक गया।

ज़रा देर में ही फूल माला से लदे महंत और चेयरमैन आडिटोरियम के भीतर आ गए और तालियों की गड़गड़ाहट से उन का स्वागत हुआ। अन्य समारोहों की तरह नारेबाज़ी नहीं हुई। आडिटोरियम में एक कोना खोज कर आनंद फिर खड़ा हो गया। एनाउंसर ने सब का स्वागत करते हुए मंच पर पहले महंत जी को बुलाया फिर चेयरमैन से उन का स्वागत करने को कहा। एम.डी. ने चेयरमैन का स्वागत किया। वाइस चेयरमैन ने एम.डी. का। वाइस चेयरमैन के स्वागत के लिए आनंद को पुकारा गया। उसे पूर्व छात्र नेता और सामाजिक कार्यकर्ता बताया गया। फिर आनंद का स्वागत कंपनी के एक दूसरे अधिकारी ने किया। आनंद अपना नाम सुन कर सकपकाया। और पीछे हटने की कोशिश की। तो पाया कि चेयरमैन का पी.ए. उस के पीछे मुसकुराता हुआ ही ही करता खड़ा था। आनंद ने उस से खीझ कर पूछा भी कि, ‘क्या आज आप का एसाइनमेंट मैं ही हूं?’

‘राइट सर!’ बोलते हुए ही ही करते हुए उसे मंच तक ले गया।

अजीब मूर्खता थी।

जब वह अपनी तय कुर्सी पर बैठा तो महंत जी मुसकुरा कर आनंद से मुख़ातिब हुए, ‘कहिए आनंद जी!’

‘जी नमस्कार।’

तब तक कंपनी की एक मैनेजर आनंद के पास लपक कर आई। बोली, ‘सर आप की स्पीच के लिए प्रोडक्ट के बारे में ये डिटेल है जो आप को अभी बोलना होगा।’

उसने बेमन से काग़ज़ ले कर चेयरमैन की ओर देखा। चेयरमैन ने आंखों के इशारे से आनंद को स्वीकृति दी। और मुसकुराया।

उधर एम.डी. की स्पीच जारी थी। वह समझ गया कि आज वह चेयरमैन के जाल में फंस गया है। नौकरी में मिल रही सुविधाएं आज अपनी क़ीमत मांग रही हैं। उसे एक पाकिस्तानी शायर आली का एक दोहा याद आ गया; तह के नीचे हाल वही जो तह के ऊपर हाल/मछली बच कर जाए कहां जब जल ही सारा जाल!

उसने अपनी छोटी सी स्पीच में भी इस दोहे को कोट किया और कहा कि जाल जब इतना सर्वव्यापी हो जाए तो इस कंपनी का यह प्रोडक्ट ही आप सब को इस दुर्निवार जाल से बाहर निकाल सकता है।

इस पर तालियां भी बजीं और उस ने ग़ौर किया कि चेयरमैन की आंखों में भी उस के लिए प्रशंसा के भाव थे। वह और मर गया।

चेयरमैन ने अपने भाषण में आनंद के उस जाल के रूपक को इक्ज़ांपिल कह कर कोट किया। और प्रोडक्ट के गुन बताते हुए महंत जी से अनुरोध किया कि वह इस की लांचिंग करें। महंत जी ने प्रोडक्ट की औपचारिक लांचिंग की और फिर कंपनी और चेयरमैन की प्रशस्ति में धुआंधार भाषण झाड़ा।

लांचिंग प्रोग्राम संपन्न हो गया था।

और जैसा कि चेयरमैन ने आनंद से कहा था कि लंच साथ करेंगे। वह लंच के लिए आनंद को साथ ले कर चले अपनी कार में। रास्ते में वह आनंद की लैक्सिबिलिटी और लांचिंग की सक्सेस के यशोगान में लगे रहे। आगे-आगे महंत जी की कार थी, पीछे-पीछे चेयरमैन की। चेयरमैन ने बात ही बात में बताया कि महंत जी बड़े काम के आदमी हैं। इस प्रोडक्ट के लिए तमाम एजेंसियों की उन्हों ने लाइन लगवा दी है इस पूरे बेल्ट में। सो आनंद को थोड़ा उन से टैक्टफ़ुली पेश आना चाहिए। उन को लगे कि उन का ईगो हम एक्सेप्ट करते हैं और कि लंच में थोड़ा उन का इगो मसाज हो जाए!

आनंद चुप रहा।

चेयरमैन का होटल भी आ गया था। लंच क्या था, लगभग फलाहार और शाकाहार था। महंत जी की इच्छा के अनुरूप।

बातचीत चेयरमैन ने ही शुरू की पर लगाम जल्दी ही महंत के हाथ आ गई। इधर-उधर की बातों के बाद महंत जी बोले, ‘आनंद जी आप भाषण बहुत बढ़िया और सटीक देते हैं। शेरो शायरी का पुट मिला कर। पहले लोगों से सुनता था आज देख भी लिया। क्या शेर फिट किया आज आप ने।’

‘शेर नहीं दोहा था।’ आनंद धीरे से बोला।

‘अरे वही-वही।’ महंत जी बोले, ‘सच मानिए अगर आप चुनाव लड़ने भी मेरे खि़लाफ़ आए होते तो मज़ा आया होता। ई माफ़िया के लवंडे और नचनिया गवैया से लड़ने में मैं बोर हो गया। पढ़े लिखे और आप जैसे बोलने वाले आदमी से लड़ने में रस ही कुछ और होता।’

‘मैं और चुनाव?’ आनंद बोला, ‘वह भी आप के खि़लाफ़?’

‘हां भई, हां।’ वह बोले, ‘मज़ा तो मज़बूत आदमी से लड़ने में ही आता है। टक्कर बराबर की होनी चाहिए!’

‘मतलब आप जीत का रिकार्ड बनाना चाहते थे?’

‘आप जो समझिए!’ महंत जी बोले, ‘पर आप को मैडम का आफ़र एक्सेप्ट कर लेना चाहिए था।’

‘अरे इस आफ़र की जानकारी आप को कैसे हो गई?’ आनंद मुसकुराते हुए अचरज में पड़ गया।

‘मैडम का आफ़र समझा नहीं आनंद जी!’ चेयरमैन ने उत्सुकता से पूछा।

‘अरे वह जो इनकाउंटर हुआ था, जिस में इन्हों ने मुझ पर निशाना बांध कर मजमा बांध दिया था, हीरो बन गए थे। तो अपनी मैडम चीफ़ मिनिस्टर इन पर फ़िदा हो गईं। सीधा आफ़र रख दिया मेरे खि़लाफ़ इन को अपनी पार्टी से उम्मीदवार बनाने का। पर जाने क्यों यह पीठ दिखा गए।’

‘क्या यह सच है आनंद जी!’ चेयरमैन का चेहरा देखने लायक़ था।

‘हां सच है।’ आनंद बोला, ‘पर यह बात दो तीन लोगों को छोड़ कर तो कोई जानता ही नहीं। आप कैसे जान गए महंत जी?’

‘मैं लखनऊ ज़्यादा नहीं जाता, यह सच है। पर ब्यूरोक्रेसी में मेरे भी बहुत आदमी हैं। पता तो मुझे उसी दिन चल गया था।’

‘चलिए फिर कोई बात नहीं!’ आनंद ने बात ख़त्म करने की कोशिश की। पर अचानक महंत जी जैसे उसे अपमानित करने पर आ गए। बोले, ‘आप राजनीति के आदमी हो कर नौकरी क्यों करते हैं?’

‘इसलिए कि मैं अपने राजनीतिक मूल्यों से, आदर्शों से समझौता नहीं करना चाहता। ख़ैर, आप भी योगी हो कर राजनीति क्यों करते हैं?’ आनंद ने मासूमियत ओढ़ कर पूछा।

‘क्या योगी को राजनीति करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है? वह देश का नागरिक नहीं है?’

‘क्यों नहीं है पर फिर आप को अपने नाम से योगी शब्द हटा लेना चाहिए।’

‘सुना है आप गांधी के अनुयायी हैं, फिर पंडित भी हैं। तो आप पंडित हो कर भी शराब नहीं पीते हैं? तो ऐसे तो आप को भी अपने नाम के आगे से ब्राह्मण सूचक शब्द हटा देना चाहिए! गांधीवादी होने का पुछल्ला हटा लेना चाहिए!’

‘क्यों शराब पीना क्या संविधान के खि़लाफ़ है? क्या ग़ैर क़ानूनी है?’ आनंद अब उबाल पर था, ‘यह व्यक्तिगत मसला है, सार्वजनिक नहीं।’ वह बोला, ‘शराब को मैं जायज़ भी नहीं ठहरा रहा पर यह नितांत व्यक्तिगत मसला है। पी कर मैं कभी सार्वजनिक नहीं होता, उत्पात नहीं करता। पर आप? आप महंत जी?’

‘हां, हां बताइए क्या कहना चाहते हैं? कहिए!’ महंत जी मुसकुराए। मुसकुराए यह देख कर कि आनंद तिलमिला गया है। पर आनंद ने उन की मुसकुराहट में ही धीरे से जवाब दिया,

‘पर आप तो महंत जी दंगे करवाते हैं, योगी हो कर भी, भगवा पहन कर भी भोग के कार्यों में संलग्न दिखते हैं। आप को लोग हत्यारा कहते हैं।’

‘आनंद जी मैं दंगे नहीं करवाता। दंगाइयों का शमन करता हूं, करवाता हूं।’ महंत जी किचकिचाए, हत्यारा नहीं हूं मैं।’

‘क्यों क्या आप प्रशासन के अंग हैं? डी.एम. हैं कि एस.पी. क्या हैं? आखि़र किस क़ानून के तहत आप दंगाइयों के शमन का ठेका ले लेते हैं?’

‘मैं सांसद हूं। अपनी जनता के प्रति जवाबदेह हूं।’

‘क़ानून हाथ में लेकर?’ आनंद बोला, ‘क्षमा करें महंत जी, आप जिस पीठ के महंत हैं, उस पीठ के प्रति मेरे मन में गहरा आदर है, पूरी निष्ठा है। पर अफ़सोस कि उस गोरक्ष पीठ जिसके कि आप महंत हैं, सारे कार्य उस के विपरीत करते हैं?’

‘अब आप जैसों से हमें अपना आचरण, अपना कार्य सीखना होगा?’ महंत भड़के।

‘जी नहीं। मैं क्यों आप को कुछ सिखाने लगा। मुझे योग का क ख ग भी नहीं आता। पर जिस नाथ संप्रदाय का आप अपने को बताते हैं, उस नाथ संप्रदाय का थोड़ा बहुत साहित्य मैं ने भी पढ़ा है। आप ही के मंदिर से नाथ संप्रदाय की कुछ पुस्तकें बहुत पहले ख़रीदी थीं और पढ़ी थीं। उन्हीं के आधार पर यह बात कह रहा हूं।’

‘अच्छा-अच्छा!’ महंत जी जबरिया मुसकुराते हुए बोले, ‘तो आज आप मुझ से शास्त्रार्थ के मूड में हैं?’

‘जी नहीं मैं नाथ संप्रदाय का कोई आचार्य नहीं हूं, कोई विशेषज्ञ या संत भी नहीं हूं। पर थोड़ी बहुत जो जानकारी है उसी के आधार पर यह कह रहा हूं कि आप अपनी पीठ के विपरीत कार्य कर रहे हैं।’

‘जैसे? ज़रा मैं भी जानूं?’

‘आप को पता है कि जैसे पतंजलि के बिना भारत में योग की कोई अर्थवत्ता नहीं है, ठीक वैसे ही गुरु गोरख के बिना भारत में संत परंपरा की कोई अर्थवत्ता नहीं है। गुरु गोरख के बिना परम सत्य को पाने के लिए विधियों की जो तलाश शुरू हुई, साधना की जो व्यवस्था प्रतिपादित की गुरु गोरखनाथ ने, मनुष्य के भीतर अंतर-खोज के लिए जितने आविष्कार किए गुरु गोरखनाथ ने, किसी ने नहीं किए। मनुष्य के अंतरतम में जाने के लिए इतने द्वार तोड़े हैं गुरु गोरखनाथ ने कि लोग द्वारों में उलझ गए।’ वह बोला, ‘क्षमा करें महंत जी आप गुरु गोरखनाथ को भूल कर गोरखधंधे में लग गए हैं।’

‘यह आप कह रहे हैं!’ महंत संक्षिप्त सा बोले।

‘जी नहीं, गुरु गोरखनाथ कह रहे हैं मैं नहीं।’ आनंद बोला, ‘गुरु गोरखनाथ तो कहते हैं; मरौ वे जोगी मरौ, मरौ मरन है मीठा/तिस मरणी मरौ, जिस मरणी गोरख मरि दीठा। तो गुरु गोरखनाथ तो मरना सिखाते हैं। अहंकार को मारने की, द्वैत को मारने की बात करते हैं। उन की सारी साधना ही समय को मार कर शाश्वतता पाने की है, शाश्वत हो जाने की है, इसी लिए वह अब भी शाश्वत हैं। आप को पता है कबीर, नानक, मीरा यह सभी गोरख की शाखाएं हैं। इन के बीज गुरु गोरखनाथ ही हैं।’ वह बोला, ‘गुरु गोरखनाथ अहंकार को मारने की बात करते हैं। वह कहते हैं आप जितने अकड़ेंगे, छोटे होते जाएंगे। अकड़ना अहंकार को मज़बूत करता है। वह तो कहते हैं कि आप जितने गलेंगे, उतने बड़े हो जाएंगे, जितना पिघलेंगे उतने बड़े हो जाएंगे। अगर बिलकुल पिघल कर वाष्पी भूत हो जाएंगे तो सारा आकाश आप का है। गुरु गोरख सिखाते हैं कि आप का होना, परमात्मा का होना एक ही है।’ आनंद बोला, ‘पर महंत जी आप ध्यान दीजिए कि आप क्या कर रहे हैं, योगी हो कर भी यहां के लोगों को क्या सिखा रहे हैं? अपनी न सही, अपनी पीठ और गुरु गोरखनाथ का ही मान रख लीजिएगा तो सब ठीक हो जाएगा।’

‘आप को तो कहीं प्रोफ़ेसर होना चाहिए, कथावाचक होना चाहिए!’ महंत बोले, ‘कहां राजनीति में फंस गए हैं?’

‘राजनीति में नहीं महंत जी, नौकरी में हूं।’ वह बोला, ‘आप जैसे लोग राजनीति को साफ़ सुथरी होने नहीं देंगे और हमारे जैसे लोग फिर कहां आ पाएंगे राजनीति में?’

‘चलिए आप हम से मतभेद भले रखें, लाख रखें पर आप के लिए मेरे मन में इज़्ज़त हो गई है।’

‘मैं भी चाहता हूं कि जैसी इज़्ज़त जैसी भावना मेरे मन में आप की पीठ के लिए है, गुरु गोरखनाथ के लिए है, आप के लिए भी हो जाए!’ वह बोला, ‘गुरु गोरखनाथ का वह पद याद कीजिए; शून्य शहर गढ़ बस्ती, कौन सोता कौन जागे रे/लाल हमारे हम लालन के, तन सोता ब्रम्ह जागे रे! और आप हैं कि तन को जगाए हैं ब्रम्ह को सोने दे रहे हैं। यह कोई अच्छी बात है क्या? इस पद को कुमार गंधर्व की आवाज़ में कभी सुनिए। मर्म समझ में और जल्दी आएगा।’

‘मतलब आप चाहते हो आनंद जी की हम आध्यात्मिक हो जाएं, राजनीति छोड़ दें?’ वह बोले, ‘भइया इस जनम तो होने से रहा। बिना राजनीति के हम तो न रह पाएंगे?’

‘राजनीति छोड़ने के लिए मैं ने कहा भी नहीं!’ आनंद बोला, ‘आचरण छोड़ने के लिए कहा!’

‘यह आचरण छोड़ कर सड़क पर कटोरा ले कर बैठ जाऊं?’ महंत बोले, ‘ऐसे तो एक भी वोट न देगा कोई। क्यों बरबाद करना चाहते हो आनंद जी।’ उठते हुए महंत जी बोले, ‘आप अपने औज़ार चमकाओ, और हमें अपने औज़ार चमकाने दो। हमें आप की तरह नौकरी नहीं, राजनीति करनी है, देश की राजनीति, समाज को बचाने की राजनीति। अच्छा तो चेयरमैन साहब चलते हैं अब! अच्छी मीटिंग रही आज की।’

‘चलिए आप के गिले शिकवे तो दूर हो गए हम से?’

‘हां भई, फुल शास्त्रार्थ हो गया आज तो। अब बाक़ी क्या रहा?’

महंत जी को चेयरमैन सहित सारा अमला होटल के बाहर तक सी आफ़ करने गया। आनंद भी!

चेयरमैन के वापसी का अब समय हो चला था। वह बोले, ‘ओ.के. आनंद जी, अच्छी मीटिंग हो गई महंत जी के साथ। बिलकुल फ्रुटफुल!’ वह बोले, ‘पर मैडम ने सचमुच आप को इस सीट से टिकट आफ़र किया था?’

‘किया तो नहीं, पर हां करवाया था!’

‘तो आप को मान जाना था!’

‘आप जानते हैं सर कि मैं नौकरी में भले कंप्रोमाइज़ कर लूं। जीवन यापन है यह। पर राजनीति में मैं कंप्रोमाइज़ नहीं कर सकता। वह भी उस मैडम के साथ! हरगिज़ नहीं।’

‘इटस योर पर्सनल आनंद जी!’

‘थैंक यू सर!’

‘सुनता था कि आप की स्टडी बहुत अच्छी है, अच्छे ओरेटर हैं, आज देख भी लिया। इट्स नाइस! यू आर द एसेट आफ़ माई कंपनी।’

आनंद चुप रह गया।

यह तमाचा खा कर वह करता भी तो क्या?

तो क्या अब वह इस कंपनी की संपत्ति हो गया? अब वह आदमी नहीं रहा, कर्मचारी नहीं रहा, संपत्ति हो गया! कारपोरेट सेक्टर की नौकरी क्या कम थी उसे मारने के लिए? जो आज उसे यह तमग़ा भी मिल गया? उसे अपने आप से घिन आने लगी।

वह भी होटल से चलने को हुआ। और सिगरेट जला ली। कि तभी चेयरमैन का पी.ए. ही ही करता आया। बोला, ‘वेल सर! आनरेबिल चेयरमैन सर इज़ वेरी हैप्पी! हैप्पी टू यू सर!’
‘क्यों?’

‘महंत जी का इगो मसाज बहुत अच्छे से हो गया। अब देखिएगा प्रोडक्ट यहां बहुत अच्छे से रन करेगा!’

‘अच्छा!’ कह कर उस ने पुच्च से वहीं थूक दिया और सिगरेट भी फेंक दी। पर वह बेहया पी.ए. फिर बोला, ‘वेरी नाइस सर!’

‘उफ!’ कहते हुए उस ने माथे पर अपना हाथ फेरा।

‘वेरी सॉरी सर!’ कह कर पी.ए. सरक गया।

उस ने एम.डी. को बता दिया कि वह प्लेन छोड़ रहा है। वह अपने गांव जाना चाहता है। एम.डी. मान गए। वह बोले, ‘चाहें तो आप के लिए कंपनी की एक कार छोड़ दें?’
वह मान गया।

फिर वह अपने गांव चला गया है। पट्टीदारी में एक लड़के की तिलक आई है। अम्मा कहती हैं, ‘बाबू तुम को भी उन के दरवाज़े पर जाना चाहिए!’

‘पिता जी तो जाएंगे न?’

‘नहीं उन की तबीयत कुछ ठीक नहीं है।’

‘क्या हो गया है?’

‘वैसे ही कुछ अनमने से हैं। तुम नहीं होते तो जाते ही। अब जब तुम हो तो ज़रा देर के लिए हो आओ!’

‘अच्छा अम्मा!’

वह जाता है तो लड़के का पिता उसे देखते ही उल्लसित हो जाता है। बोला, ‘अरे आनंद! कब आए बैठो-बैठो!’

वह तिलकहरुओं के बीच ही उसे बिठा कर जलपान करवाते हैं। सीना चौड़ा कर तिलकहरुओं से आनंद का परिचय भी कराते हैं। ख़ूब-ख़ूब बखान करते हैं।

वह चुपचाप बैठा मुसकुराता रहता है। लड़के के पिता फिर व्यस्त हो जाते हैं। तमाम लोग आ रहे हैं जा रहे हैं। तिलक समारोह की ऱफ्तार बनी हुई है।

दो आदमियों की बातचीत चल रही है। आनंद आंख और कान वहीं केंद्रित कर लेता है। एक आदमी उस के गांव का ही कहार है। तिलकहरुओं की सेवा में लगा वह बातचीत चालू रखे है, ‘तो साहब आप लोग शहर से आए हैं?’

‘हां! क्यों?’

‘शहर में तो देवता रहते हैं!’

‘क्या मतलब?’ तिलक चढ़ाने आया आदमी भौंचक हो कर पूछता है, ‘तो फिर गांव में?’

‘गांव में तो राक्षस रहते हैं।’

‘तो फिर आदमी कहां रहते हैं?’ वह आदमी अब मज़े ले कर पूछ रहा है।

‘क़स्बा में, तहसील में।’

‘अच्छा!’

‘हां साहब!’

‘वो कैसे?’

‘देखिए साहब आज तो आप लोग तिलक में आए हैं। पहले से सब कुछ तय है। तो सारी तैयारी है। खाना जलपान। हर चीज़ का। पर मान लीजिए आप अचानक आ गए। हम आप को बढ़िया काला नमक चावल का भात खिलाना चाहते हैं। बढ़िया-बढ़िया तरकारी खिलाना चाहते हैं। ख़ूब मिठाई खिलाना चाहते हैं। जेब में भरपूर पइसा भी है। पर नहीं खिला सकते।’

‘क्यों?’

‘पइसा भी है और इच्छा भी। पर नहीं खिला सकते?’

‘क्यों नहीं खिला सकते?’

‘दुकान ही नहीं है ई सब सामान की गांव में तो कहां से खिलाएंगे?’

‘अच्छा-अच्छा!’

‘लेकिन क़स्बा में दुकान मिल जाएगा, शहर में मिल जाएगा।’

‘ओह तो ये बात है।’

‘तब नहीं तो और क्या?’ वह बोला, ‘अच्छा अभी मान लीजिए गांव में आधी रात को हमारा तबीयत ख़राब हो गया। पैसा है डॉक्टर का फीस देने का भी, दवाई का भी! पर यहां कहां डॉक्टर है? दवाई का दुकान कहां है? और शहर जो जाना भी चाहें तो सवारी कहां है आधी रात में। सवारी भी जुगाड़ लें तो रास्ता कहां है सवारी आने-जाने के लिए?’ वह अपने पैर पर का मच्छर मारते हुए बोला, ‘अब ई मच्छर शहर में तो दवाई फेंक कर मार देंगे पर इहां? मच्छर आप को मार डालेंगे।’

‘ये बात तो है!’

‘तो एही मारे कह रहा हूं कि शहर में देवता रहते हैं और गांव में राक्षस!’

वह खाना-वाना खा कर घर आता है। पिता के पास जाता है और पूछता है, ‘तबीयत ठीक तो है?’

‘हां ठीक है?’

वह सोने चला जाता है।

सो नहीं पाता। बड़ी देर तक करवट बदलता रहता है। नींद आती है तो नींद में सपना आता है। ख़ौफ़नाक सपना! वह भाग रहा है। बेतहाशा भाग रहा है। किसी नदी की ओर। कुछ लोग जाल ले कर उस के पीछे पड़े हैं। ढेर सारे लोग हैं। अपना-अपना जाल लिए। कुछ चेहरों को वह पहचान रहा है। कंपनी का चेयरमैन है, मंदिर का महंत है, मैडम चीफ़ मिनिस्टिर हैं। सभी एक साथ दौड़ा रहे हैं अपना-अपना जाल संभाले। पीछे से मुनव्वर भाई चिल्ला रहे हैं, ‘बचिए आनंद जी!’ अशोक जी कह रहे हैं, ‘और तेज़ भागिए!’ माथुर एडवोकेट कह रहा है, ‘घबराना मत आनंद तुम्हारी रिट फाइल कर दूंगा। इन सब को पार्टी बनाऊंगा।’ इस भीड़ में एक दारोग़ा भी है। उस के हाथ में जाल नहीं रिवाल्वर है जो वह हाथ में नचाता हुआ दौड़ रहा है। कह रहा है, ‘अब की नहीं छोडूंगा।’ नदी क़रीब आती जा रही है। नदी उस पार अम्मा-पिता जी हैं, पत्नी है, बच्चे हैं, सादिया है, सादिया की अम्मी हैं। यह सब पुकार रहे हैं, ‘भाग आओ बाबू इस पार भाग आओ!’ वह अपनी दौड़ और तेज़ करता है। कि तभी रेत में क़ासिम का दबा शव मिलता है। एक क्षण को वह फिर रुकता है। अब पत्नी पुकारती है, ‘भाग आइए इस पार!’ और वह नदी के जल में कूद जाता है। वह पाता है कि नदी के जल में पहले ही से जाल बिछा हुआ है। वह किसी मछली की मानिंद फंस जाता है। छटपटाने लगता है। उस का छटपटाना देख कर जमाल हंसता है, ‘बड़े आए थे साफ़ सुथरी राजनीति करने! ख़ुद साफ़ हो गए!’

उसकी नींद टूट जाती है।

सुबह नाश्ते के साथ पिता से बात भी करता जा रहा है। अचानक कहता है, ‘पिता जी अब मैं यहीं रहना चाहता हूं।’

‘क्यों क्या प्रधानी का चुनाव लड़ने का इरादा है?’ वह जैसे तंज़ करते हैं।

‘नहीं-नहीं।’

‘फिर?’

‘अब खेती-बाड़ी करना चाहता हूं।’

‘अच्छा-अच्छा!’ पिता अंगोछे से अपना हाथ मुंह पोंछते हुए बोलते हैं, ‘तो अब गांव में क्रांति करने का इरादा है? समाजवाद अब यहां भी आने वाला है?’

‘नहीं-नहीं।’ आनंद बोला, ‘आजीविका के तौर पर। असल में अब नौकरी छोड़ना चाहता हूं। नहीं हो पा रही हम से अब नौकरी। बड़ी ज़लालत है इस नौकरी में।’

‘ओह!’ पिता चिंतित हो गए हैं। और चुप भी।

आनंद भी चुप हो जाता है। चुप्पी अम्मा तोड़ती हैं, ‘फिर इतनी खेती भी कहां है जो पूरे परिवार का गुज़ारा चल सके। तुम्हारे और तुम्हारे बच्चों के ख़र्चे भी तो बढ़ गए हैं।’

‘नहीं बच्चे वहीं रहेंगे। बच्चे पढ़ेंगे। पत्नी नौकरी करती रहेगी।’ वह बोला, ‘मन होगा तो बाद में वह भी आ जाएगी।’

‘यहां रह भी पाओगे?’ पिता बोले, ‘ए.सी. में रहने वाला आदमी बिना बिजली के गांव में कैसे रहेगा?’

‘मैं रह लूंगा!’

‘चलो ठीक बात है। पर यहां आए दिन नाली के झगड़े, पानी के झगड़े, ट्रैक्टर, कंबाइन और पट्टीदारी के झगड़े फे़स कर लोगे? तिस पर मज़दूरों की समस्या, उन के झगड़े, यह सब है तुम्हारे वश का?’ वह बोले, ‘और इस सब से भी ऊपर यह कि गांव वाले भी तुम्हें बर्दाश्त कर लेंगे? या कि तुम गांव वालों को बर्दाश्त कर पाओगे?’

‘हां, बिलकुल!’

‘सोच लो बेटा!’ पिता जी बोले, ‘गांव का, वह भी इस गांव का जीवन अब आमूल चूल बदल गया है। अहा ग्राम्य जीवन भी क्या जीवन है! कविता अब काठ हो चली है। ग्राम्य जीवन अब अहा नहीं आह भरा हो गया है। शहर की, टी.वी. की सारी गंदगी यहां बजबजा रही है। तिस पर एक नई कहानी भी शुरू हो गई है।’

‘वह क्या?’

‘दलित उत्पीड़न नाम का एक नया हथियार आया है इन दिनों हमारे गांव में।’

‘यह तो पुराना क़ानून है।’

‘हां, पर इस्तेमाल नए ढंग से हो रहा है।’

‘मतलब?’

‘खदेरू का एक लड़का है। खदेरू जब भिलाई में काम करता था, तभी वहीं पैदा हुआ। अब खदेरू रिटायर हो कर गांव आ गया है। उस का लड़का भी। जवान जहान है। पर कोई काम धंधा नहीं करता। गांव में उस ने चोरी शुरू की। चोरी में कुत्ते आड़े आने लगे तो लाइन से गांव के सारे कुत्ते धीरे-धीरे कर के निर्बाध मार डाले। अब चोरी में आसानी हो गई। तांता लग गया गांव में चोरी का। लोगों को खदेरू के लड़के पप्पू पर शक हुआ। चोरियां बढ़ती गईं। पुलिस रिपोर्ट भी नहीं लिखती। लोग परेशान हो कर एस.पी. से मिले। पप्पू के खि़लाफ़ नामज़द रिपोर्ट हो गई। वह फ़रार हो गया। कुर्की आ गई। पर उस के नाम कुछ हो तब न कुर्की हो। चार साल तक फ़रार रहा पप्पू। अब साल भर से फिर गांव में लौटा है। फु़ल हेकड़ी में रहता है। एक बार रमेश ने कुछ कह दिया तो उस ने फ़ौरन थाना दिवस में उस के खि़लाफ़ अर्ज़ी लगा दी। दोनों पक्ष बुलाए गए। सुलहनामा हुआ। पप्पू को सुलहनामे में एक हज़ार रुपए मिले। उस की छाती चौड़ी हो गई। रमेश ने कहा भी कि यह चोर है। तो पप्पू बोला कि हम को साज़िशन फंसाया है पंडितों ने। रमेश के पास दो ही विकल्प था। या तो सुलहनामे में पैसा दे या दलित एक्ट में जेल जाए। उस ने पैसा दे दिया। अब पप्पू आए दिन किसी न किसी के खि़लाफ़ थाना दिवस या तहसील दिवस में एक अर्ज़ी डाल देता है। सुलहनामा होता है, वह पैसा लेता है। छाती चौड़ी कर लेता है। बाद में बात उठी कि हरदम गांव के लोग इसी को क्यों तंग करते हैं? तो बाद में इस ने पैंतरा बदल लिया। दूसरे किसी न किसी दलित को बहकाने लगा। अर्ज़ी दिलवाने लगा इस सौदेबाज़ी के साथ कि सुलहनामे में मिले पैसे में आधा हमारा, आधा तुम्हारा। दलित उत्पीड़न की जैसे इस गांव में बाढ़ आ गई है। गांव के आधे से अधिक लोग इस सुलहनामा के शिकार हो चुके हैं। कई लोग तो गांव में नहीं रहते तब भी। पप्पू अब यह सुलहनामे की हवा दूसरे गांवों में भी ले गया है। वह अब मोबाइल लिए मोटरसाइकिल से घूमता है। लोग उसे देखते ही दहशत में आ जाते हैं। रह पाओगे तुम इस गांव में?’ पिता पूछते हैं।

वह चुप है।

‘तुम साफ़ सुथरी राजनीति, गांधीवादी राजनीति का रट्टा लगवाओगे। यहां हिंदू युवा वाहिनी के नेता हैं। मसल पावर, मनी पावर वाली राजनीति के आदी। सर्वाइव कर पाओगे इन के बीच गांव में? कर पाओगे यह ज़मीनी राजनीति!’ पिता बोले, ‘तो भइया तुम शहर में रह कर ही नौकरी करो, राजनीति करो वही ठीक है। मैं जानता हूं तुम यहां सांस नहीं ले पाओगे। सुविधाओं में रहने के आदी मक्खियां-मच्छर देख कर भाग जाओगे। तुम्हारे बीवी बच्चे तुम्हें कोसेंगे तब भाग जाओगे।’

वह फिर चुप है।

‘तुम खेती की बात करते हो? खेती करोगे? खेती भी अब इनवेस्टमेंट मांगती है। खेती भी अब बिज़नेस हो गई है। पैसा नहीं लगाने पर खेती चौपट हो जाती है। पेंशन न मिले मुझे तो खेती नहीं कर सकता। पेंशन का पैसा खेती में लगाता हूं तो चार दाना पा जाता हूं। जिन के घर में नक़द पैसा नहीं है, उन की या तो खेती बरबाद है या फिर वह साहूकारों के हाथ में जा कर बरबाद हैं। तिस पर खेती भी कई बार शेयर मार्केट सा रिज़ल्ट देने लगती है। चार दिन भी जो देर से बुआई हुई या ज़रा भी खाद पानी देने में देरी हुई तो खेती भी दांव दे जाती है। पैदावार कम हो जाती है। खेती भी अब टाइमिंग मांगती है। जैसे कि अब की सूखा पड़ गया है, सारी टाइमिंग, सारा पैसा डूब गया है। ऐसे में कर पाओगे खेती? खाद, बीज, डीज़ल, मज़दूरी सब तो मंहगा हो गया है। टैªक्टर, कंबाइन का किराया भी। बस हमारी मेहनत और हमारा पैसा सस्ता रह गया है। कर पाओगे खेती?’

वह लगातार चुप है। और पिता का एकालाप जारी है।

‘यहां चीन अमरीका की बहस, सांप्रदायिकता के खि़लाफ़ लड़ाई, मानवाधिकार की बातों से खेती नहीं हो पाती। यह गांव है, सेमिनार नहीं। बहस नहीं होती यहां रगड़ाई और लड़ाई होती है, रगड़ जाओगे तो भूसी छूट जाएगी। ज़मीनी सच्चाई की बात तुम अपने भाषणों में करते हो न! तो यहां की ज़मीनी सच्चाई यह है। इज़्ज़त पानी इसी में है कि गांव आते-जाते रहो। यहां रहो नहीं। यहां रहोगे तो सारा भ्रम टूट जाएगा। यहां रहोगे तो कभी न कभी तुम्हारा सोशल एक्टिविस्ट का कीड़ा कुलबुलाएगा। मानोगे नहीं। कुछ नहीं तो नरेगा में घपला देखने लगोगे। ग्राम प्रधान दलित है और क्रिमिनल भी। या तो गोली ठोंक देगा या दलित एक्ट! चुप रह नहीं पाओगे। बोलोगे ज़रूर। नहीं कुछ तो सांप्रदायिक सद्भाव बताने लगोगे। समूचा गांव घेर लेगा। तब क्या करोगे?’

‘कोशिश करूंगा कि गांव को बदलूं। लोगों को, लोगों की सोच को बदलूं।’ वह धीरे से बोला।

‘गांव वाले तुम्हें बदल देंगे। तुम क्या गांव बदलोगे? अख़बारों में बयान छपवा कर। प्रेस कानफ्रेंस कर के? ऐसे नहीं बदलेगा गांव। नहीं बदलता लिख कर रख लो! बडे़-बड़े अक्षरों में लिख कर रख लो!’

वह समझ गया है कि पिता की पैसे भर की मर्ज़ी नहीं है कि वह गांव में रहे।

तो वह कैसे रह सकता है?

पिता से उसका कोल्डवार बचपन से चला आ रहा है। पर वह पिता से कभी उलझता नहीं है। चुपचाप खिसक लेता है। पिता अपनी वाली करते हैं, और वह अपनी वाली। पर दोनों आमने-सामने नहीं होते। वह पाता है कि पिता पीठ पीछे उस पर नाज़ भी करते हैं और उसे बच्चा भी समझते हैं। चाहते हैं कि वह किसी सैनिक की तरह उन्हें फ़ालो करे।
शायद हर पिता ऐसा ही चाहता है, ऐसे ही करता है। कम से कम उस पीढ़ी के पिता तो ऐसे ही हैं। गांव में एक बुजुर्ग हैं वह कहते ही रहते हैं कि हर पिता अपने बेटे में राम चाहता है, पर ख़ुद दशरथ नहीं बन पाता। हर पति अपनी पत्नी में सीता चाहता है, पर ख़ुद राम नहीं बन पाता।

ऐसा क्यों है?

‘पता है बाबू! मियां को सरकार ने लाखों रुपए का मुआवज़ा दिया है। मियां ने अपना फुटहा घर पक्का बना लिया है और घर पर पत्थर लगवा दिया है-क़ासिम के नाम का। क़ासिम मंज़िल!’ अब अम्मा सूचना परोस रही है। गांव का इतिहास भूगोल बता रही हैं, ‘लोग कहते हैं कि क़ासिम अपनी ज़िंदगी में तो इतना कमा नहीं पाता कि घर पक्का बनवा लेता। जानते हो बाबू फ़ौजी पंडित तुम्हारे पिता जी से कहने लगे कि आनंद ने पैसा दिलाया है तो आप को भी अपना हिस्सा लेना चाहिए। तो इन्हों ने उस को झिड़क दिया। कि, हराम का पैसा नहीं चाहिए, किसी की लाश का पैसा नहीं चाहिए। तो फ़ौजी पंडित अपना मुंह ले कर चले गए।’ फिर वह किसी के खेत, किसी की मेड़, किसी की नाली, किसी की सास के झगड़ों की फेहरिस्त और ब्यौरों में चली गईं।

अम्मा को सुनते-सुनते वह खाना खाता रहा। हूं हां करता हुआ। उसे याद आया कि जब वह पढ़ता था और गांव आता था तो वह जब वैसे ही बाग़ की ओर टहलने निकलता तो उस का एक छोटा भाई उस के साथ बड़ी फुर्ती से लग लेता। गांव की एक-एक सूचनाएं परोसता। गांव के झगड़े की, लोगों के भूत-प्रेत और चुड़ैल की। आस-पास के गांव तक की। किस का भूत कैसे उतरा, किस की चुड़ैल कैसे गई सारे ब्यौरे लगातार वह बोलता जाता।

खाना खा कर वह बोला, ‘अम्मा अब चलना चाहता हूं।’

‘लखनऊ?’

‘हां।’

‘एक दिन और रह जाते!’

‘रहने ही तो आया था। पर पिता जी नहीं चाहते जब तो कैसे रह सकता हूं।’ सांस खींचते हुए वह बोला।

‘तुम को मालूम नहीं पर मैं बताती हूं कि वह तुम्हें बहुत चाहते हैं।’

‘वह तो देख रहा हूं।’

‘जब तुम नहीं होते हो तो सब से तुम्हारी बहुत तारीफ़ बतियाते हैं। बतियाते-बतियाते मारे ख़ुशी में रोने लगते हैं।’ अम्मा बोलीं, ‘पर पता नहीं क्यों जब तुम सामने पड़ते हो तो वह पलट जाते हैं। पता नहीं क्या हो जाता है उन को कि तुम्हारी सारी बुराई देखने लगते हैं!’ कहते-कहते अम्मा रुआंसी हो गई।

‘कोई बात नहीं अम्मा, वह मेरे पिता हैं कुछ भी कह सकते हैं मुझे। मैं उन की बात का बिलकुल बुरा नहीं मानता। बस हम लोगों के सोचने का तरीक़ा थोड़ा अलग है। बस और कुछ नहीं। रही बात उन के विरोध की तो वह तो मैं बचपन से ही भुगत रहा हूं। अब तो आदत पड़ गई है!’

‘अच्छा बाबू फिर कब आओगे?’

‘देखो देखते हैं।’

‘हां बाबू जल्दी आना।’ अम्मा बोलीं, ‘इन की बात का बुरा मत मानना।’

‘ठीक अम्मा!’ कह कर उस ने अम्मा के पांव छुए और घर से बाहर आ गया।

लखनऊ आ कर वह रुटीन में समा गया।

हां पर उसने ग़ौर किया कि आफ़िस में उस का भाव फिर बढ़ गया था। लोग अब उसे रश्क की नज़र से देखते। पर वह अपनी ही नज़रों में और गिर जाता।

एक दिन वह अख़बार में विधान परिषद की एक रिपोर्ट पढ़ रहा था। रिपोर्ट बता रही थी कि विधान परिषद में सरकार ने स्वीकार किया है कि दलित एक्ट के फ़र्ज़ी मुक़दमे लिखवाए जा रहे हैं। कुछ महीनों में ही सैकड़ों फ़र्ज़ी मुक़दमे जांच में पाए गए हैं। एक शिक्षक नेता ने तो विधान परिषद में साफ़ कहा कि जिन स्कूलों में भी दलित अध्यापक हैं, वहां प्रधानाचार्यों को स्कूल चलाना मुश्किल हो गया है। अगर दलित अध्यापक या अध्यापिका स्कूल देर से आते हैं, या क्लास में नहीं पढ़ाते हैं और जो प्रधानाचार्य उन से इस बारे में पूछ ले तो वह दलित एक्ट की धमकी देते हैं। कुछ ने मुक़दमा लिखवा भी दिया है और निर्दोष होते हुए भी कई प्रधानाध्यापक जेल गए हैं दलित एक्ट में।

एक अधिकारी आनंद के घर आए हुए हैं। उन से इस बारे में चर्चा चली तो वह जैसे बर्स्ट कर गए। कहने लगे, ‘अच्छा है आनंद जी आप प्राइवेट सेक्टर में हैं। अभी वहां आरक्षण नहीं है।’

‘बात तो चल ही रही है।’

‘वह बाद की बात है। पर अभी तो नहीं है न?’ वह बताने लगे, ‘सरकारी आफ़िसों में तो हर जगह वर्ग संघर्ष की स्थिति आ गई है। चार-छह दलित कर्मचारी जो किसी आफ़िस में हैं तो वह पूरे आफ़िस को बंधक बना बैठे हैं। जिस को चाहते हैं, मुर्ग़ा बना देते हैं। जो काम चाहते हैं ले लेते हैं, जो चाहते हैं करवा लेते हैं। मामूली से मामूली दलित बाबू भी सीधे मंत्रियों से संपर्क में रहते हैं। दलित अधिकारी उन की फ़ौरन सुनते हैं। तो फिर आफ़िसों में किस की हिम्मत है जो दलितों की मनमर्ज़ी न चलने दे। वह ग़लत करें चाहे सही, सब कुछ सब को मानना है। नहीं मानिएगा तो भुगतिए दलित एक्ट!’ वह बोला, ‘क्या कर लिया रीता बहुगुणा जोशी ने? माफ़ी भी मांगी, मुर्ग़ा बन कर जेल गईं और घर भी फंुकवा बैठीं। यह क्या है? यह प्रजातंत्र है? क़ानून का राज है? कि सवर्ण उत्पीड़न है? मैं तो कहता हूं कि अब सवर्ण उत्पीड़न का भी एक क़ानून बन ही जाना चाहिए।’

‘ये तो मैं भी मानता हूं कि रीता बहुगुणा ने जो भी कुछ कहा वह ग़लत था, निदंनीय था पर इस को ले कर आधी रात को पुलिस की मौजूदगी में उन का घर जला दिया जाए यह तो हरगिज़ नहीं होना चाहिए था।’

‘और फिर उस में भी लीपापोती!’ अधिकारी मित्र बोला, ‘बिजली बोर्ड में तो परिणामी ज्येष्ठता को ले कर जैसे सेनाएं आमने-सामने होती हैं वैसे ही सवर्ण और दलित इंजीनियर आमने-सामने हैं। सचिवालय में भी कमोबेश यही स्थिति है।’ वह पूछता है, ‘भाई साहब, यह कौन सा दलितोत्थान है? सामाजिक समानता हमें किस असमानता, किस वर्ग संघर्ष की ओर ले जा रही है? ऐसे तो प्रदेश और देश जल जाएगा।’

‘हूं। है तो मामला गंभीर!’

‘यह वोट बैंक अब हमारे समाज के लिए, देश के लिए ज़हर होता जा रहा है। जल्दी ही कुछ नहीं हुआ तो समझिए कि कुछ अनर्थ हो जाएगा!’

‘यह बाज़ार, जातीयता और सांप्रदायिकता हमें कहां ले जाएगी यह हम सभी के लिए यक्ष प्रश्न है। गुंडई, भ्रष्टाचार वगै़रह अलग हैं। और हमारी सम्मानित जनता इस से त्रस्त है, इस का निदान चाहती है, वोट डालना नहीं चाहती। ड्राइंग रूम में बैठ कर चाहती है कि सब कुछ सुंदर-सुंदर सा हो जाए। पूंजीपति चाहते हैं कि आदमी अब आदमी न रहे, उन के लाभ के लिए रोबोट हो जाए। बहुत सारे लोग रोबोट हो भी गए हैं। वह सवाल नहीं पूछते, आदेश सुनते हैं। हमारे जैसे लोग रोबोट नहीं आदमी ही बने रहना चाहते हैं। अब इस आदमी का क्या करें जो रोबोट के साथ ट्यून नहीं हो पा रहा?’

यह कौन सी प्यास है?

वह फिर अपने शहर गया है। एक शादी में है। जयमाल के बाद दुल्हा अपनी दुल्हन के साथ नाच रहा है। डांस नंबर बज रहा है। दुल्हे की मां भी साथ आ गई है नाचने। कुछ टीनएज लड़कियां भी हैं। सभी नाचे जा रहे हैं। नाच में धुत्त हैं। कुछ शोहदे लड़के मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए डांस लोर पर पहुंच गए हैं। नाचते-नाचते लड़कियों को छू छा कर अभद्रता पर उतर आए हैं। एक लड़की का पिता यह सब देख रहा है। रहा नहीं जाता उस से। वह सीधे डांस फ्लोर पर जा कर अपनी बेटी का हाथ पकड़ कर डांस फ्लोर से बाहर खींचता है। कोने में ले जा कर समझाते हुए उस के कान में धीरे से कुछ कहता है। पर लड़की कंधे उचकाती हुई लगभग चिल्ला पड़ती है, ‘आई डोंट केयर!’ और डांस फ्लोर पर फिर से भाग कर पहुंचती है और फिर धुत्त हो कर नाचने लगती है! अब गाना बदल गया है। ‘कजरारे-कजरारे तेरे कारे-कारे नयना’ बज रहा है। लड़की का पिता बेबस हो कर अपनी बेटी को देख रहा है। लगभग अवश! और गाना बज रहा है, ‘मेरा चैन बैन सब उजड़ा, ज़ालिम नज़र हटा ले/बरबाद हो रहे हैं जी तेरे अपने शहर वाले! कजरारे-कजरारे!’

आनंद उस पिता की बेबसी को देख रहा है। और लड़की का बोला, ‘आई डोंट केयर!’ अभी तक किसी हथौड़े की तरह उस के कान में गूंज रहा है।

तो क्या सचमुच मेरे शहर वाले बरबाद हो रहे हैं? आनंद जैसे लोग उफ़ करते हैं, जैसे उस लड़की का पिता। सिस्टम फिर भी बरबाद होता जाता है। और कुछ कहने पर ये रोबोट बने लोग बोलते हैं, ‘आई डोंट केयर!’

तो केयर कौन करेगा भाई? यह रोबोट में तब्दील होता आदमी? तुम जो रोबोट में तब्दील हो चुके हो? पूंजीपति कहता है कि जैसे-जैसे, जो-जो हम विज्ञापन में दिखा रहे हैं वही देखो, वही समझो। हमारा प्रोडक्ट ख़रीदो, हम को मालामाल बनाओ रोबोट। रोबोट तुम को सोचने का अधिकार नहीं है, सवाल करने का अधिकार नहीं है, सिर्फ़ ख़रीदने का अधिकार है। सिर्फ़ सुनने का अधिकार है बोलने का नहीं, ज़्यादा बालोगे तो हम छंटनी कर देंगे। हज़ारों रोबोट निकाल देंगे। ख़ास कर अधेड़ और बूढे़ रोबोट! फिर एक ट्रस्ट खोल देंगे। यह ट्रस्ट भंडारा चलाएगा। तुम भंडारे में आ कर खाना खा लेना!

हा-हा हा हा!

रोबोट बनाने वाला आदमी हाहाकारी हंसी हंसता है। हंसता ही जा रहा है! कोई सुन भी रहा है?

यह भी एक प्यास है।

प्यास है या सिर के चौखट से टकराने का त्रास? वह जैसे छात्र जीवन में सर्वेश्वर की कविता पढ़ता था, ‘जब-जब सिर उठाया/चौखट से टकराया।’ वह भुनभुनाता है, ‘यह चौखट आखि़र कब बदलेगा? बदलेगा भला?’

....The End....

लेखक दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424, This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है. इसके पहले के सभी भागों को पढ़ने के लिए नीचे कमेंट बाक्स के ठीक बाद में आ रहे शीर्षकों पर एक-एक कर क्लिक करते जाइए.


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