कवि संतोषानंद को माइक छोड़ने के लिए मजबूर किया गया

E-mail Print PDF

: ...और आगरा में कविता की मौत हो गई : इस मौत पर सूरसदन में शोक नहीं खेमों में बंटा कोलाहल था : बाजारवाद के दौर में कविता का यह हश्र जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो वरिष्ठतम कवि विश्वेश्वर शर्मा को अंतत: कहना पड़ा कि जिसके बेहूदी के समय के गीत सर आंखों पर बैठाए उस अलमस्त फकीर की बेखुदी बर्दाश्त नहीं हुई : आगरा। एक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है... इस कालजयी गीत के रचयिता मंच पर थे लेकिन ना प्यार का नगमा गाया जा सका ना ही रवानी बन सकी।

महाकवि सूरदास के नाम पर बने सूरसदन प्रेक्षागृह में एक कविता की अकाल मौत हो गई। एक कवि का अपमान हुआ। अब विडंबना देखिए, इस मौत और अपमान पर प्रेक्षागृह में शोक नहीं था। जो था वह कोलाहल था, दो खेमों में बंटे लोगों का। कविता के माध्यम से संसद और विधानसभाओं को निशाना बनाने वाले यहां खुद शोर का हिस्सा थे। अवसान को जाती मंचीय कविता को एक बार फिर गर्त की ओर धकेला जा रहा था। अपनी भूमिका निभाने में भी सभी पिछड़ गए लेकिन उन सुधी श्रोताओं को धन्यवाद जिन्होंने दो बार अखाड़ा बन चुके मंच से भोर की सुगबुगाहट तक कविता का रसपान किया।

मौका था ताज महोत्सव की निरंतरता में सूरसदन में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का। रात परवान चढ़ने के बाद माइक पर खड़े थे एक प्यार का नगमा है..., जिंदगी की न टूटे लड़ी..., पुरवा सुहानी आई रे... जैसे कालजयी गीतों के रचयिता। कंपकंपाते पैरों और लड़खड़ाती जबान से 72 वर्ष का यह शख्स गीतों को सुर देने की कोशिश कर रहे था तभी वह घटा जिसने कविता को अवरुद्ध कर दिया। कविता को गति दी जा सकती थी लेकिन न पुत्र समान संचालक अपनी भूमिका से न्याय कर सके और नही पितृतुल्य वाणी पुत्र।

कवि को बुलाने की भूमिका में कालजयी, फिल्मफेयर अवार्ड विजेता जैसे संबोधन देने वाले मंच संचालक विनीत चौहान भी विनम्र पुत्र की भूमिका नहीं निभा सके। वह कवि संतोषानंद को माइक छोड़ने के लिए कह रहे थे और कवि संतोषानंद उस गीत को सुनाना चाहते थे जो उनके लिए प्यार के नगमे से बड़ा था। यह गीत श्रोताओं के लिए भी बड़ा हो सकता था लेकिन मर गया। खेमेबंद श्रोताओं और मंच ने शब्द शिल्पी को आदरपूर्वक संभालने के बजाए शब्दों के धक्के से बाहर कर दिया।

कविता की अकाल मौत के साथ उस कवि की गुमनामी और अकेलेपन के बोझ के साथ रुखसती हो चुकी थी जिसे मंच पर लाने के लिए कुछ लोगों का सहारा मिला था। लेकिन इसके बाद भी सूरसदन शांत नहीं था। एक कवयित्री को पहले पढ़ाने की छेड़ी गई मुहिम पर उठी टिप्पणी के बाद उनके पति एक प्रशासनिक अधिकारी से उलझ गए।

अमर उजाला, आगरा में प्रकाशित बृजेश दुबे की रिपोर्ट

इसको भी पढ़ें, क्लिक करें... अखाड़ा बन गया कवि सम्मेलन का मंच

ये भी देख सकते हैं.... कवि सम्मेलन में हंगामा के कुछ दृश्य


AddThis