उकताहट और तीन औरतें

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संगम पांडेय: रंगमंच : सौरभ शुक्ला की यह 18 साल बाद थिएटर में वापसी है। 1987 में उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति पर एक नाटक 'तांडव' लिखा और निर्देशित किया था। फिर वे श्रीराम सेंटर और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल होते हुए बरास्ते 'बैंडिट क्वीन' सिनेमा की ओर चले गए। अब कमानी ऑडिटोरियम में 'रेड हॉट' नाम की अपनी नई प्रस्तुति में वे बतौर लेखक, निर्देशक, अभिनेता एक बार फिर रंगमंच पर उपस्थित हुए हैं।

'रेड हॉट' प्रसिद्ध अमेरिकी नाटककार नील साइमन के नाटक का स्वयं सौरभ द्वारा किया रूपांतरण है। इसके केंद्र में एक ऐसा किरदार है जिसकी शादी को 22 साल हो चुके हैं और इस उम्र में उसे लगने लगा है कि जिंदगी बडी बोरियत भरी है, कि कहीं उसकी कोई पूछ नहीं है, कि वह व्यर्थ में ही समय बिताए जा रहा है, वगैरह वगैरह। ऐसे में अपनी जिंदगी में थोड़ी उत्तेजना लाने के लिए उसके दिमाग में विवाहेतर संबंध का आइडिया आता है। यह नाटक इसी सिलसिले में तीन अलग अलग किस्म की स्त्रियों से उसकी मुलाकात याकि मुठभेड़ की कहानी है। अपनी समूची मंचीय संरचना में प्रस्तुति लगातार काफी चुस्त है। उसकी मंच सज्जा में कहीं कोई झोल नहीं, कोई विंग्स नहीं। काफी बारीकी से फ्लैट के अंदर का दृश्य बनाया गया है, जिसमें ड्राइंगरूम से जुड़ा एक टेरेस है, जहां से झांककर नीचे गार्ड को आवाज दी जा सकती है। ड्राइंगरूम में एसी लगा है। कारपेट है। रसोई में सर्विस विंडो है, जहां से भीतर और बाहर खड़े दोनों पात्रों की बातचीत और कार्रवाइयां दर्शकों को दिखाई देती हैं। रसोई के भीतर रखे फ्रिज का थोड़ा सा हिस्सा भी दिखाई देता है। यानी दृश्य के यथार्थवाद में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। हिंदी थिएटर में अक्सर दिखाई देने वाले चीजों के चलताऊपन से यह प्रस्तुति पूरी तरह बरी है। मंच के बाएं सिरे पर एक दरवाजा है जिससे पात्र दृश्य में प्रवेश करते हैं।

पहली आगंतुका एक शादीशुदा स्त्री है। मुख्य पात्र परमिंदर सिंह सेठी उससे खान मार्केट के अपने रेस्त्रां में मिला था। इस मुलाकात का प्रयोजन उनके बीच स्पष्ट है, पर पुरुष इधर उधर की तमाम बातें किए जा रहा है और स्त्री मुद्दे पर आना चाहती है। वो बताता है कि उसने बारहवीं क्लास में ही लोलिता उपन्यास पूरा पढ़ लिया था, कि उसके डैडीजी ने कहा था कि पम्मी बिजनेस में अच्छा करना है तो अच्छा सूट पहनो। फिर वो उससे पूछता है कि क्या उसकी शादी में कोई प्रॉब्लम है जो वो उससे इस तरह मिलने आई है। उसकी बातों से ऊबी और थकी स्त्री स्पष्ट करती है कि वो यहां सेक्स के लिए आई है क्योंकि इससे उसे खुशी मिलती है, और यह कि किसी भी संबंध में सच सबसे जरूरी चीज है। लेकिन पम्मी को वह भावनाविहीन और आत्माविहीन मालूम देती है। उससे मिलने आने वाली दूसरी लड़की एक चलती पुर्जी फिल्मों की छोटी-मोटी एक्ट्रेस और मॉडल है। जो बताती है कि अब तक उसके 35 बॉयफ्रेंड रहे हैं, और कहती है- 'आदमी बड़े हॉर्नी होते हैं सरजी'। इस लड़की से बात कर रहे पम्मी में प्रौढ़ उम्र की कई इच्छाएं जाग्रत होती मालूम देती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि वह वैसा ही नाच रहा है जैसा लड़की उसे नचा रही है। तीसरी स्त्री उसके दोस्त की पत्नी और उसकी अपनी पत्नी की सहेली है। यहां स्थिति पूरी तरह बदली हुई है। वो उसे बताती है कि वो उससे भावनात्मक तौर पर मिलने आई है, न कि शारीरिक आकर्षण की वजह से। पम्मी उसे इस मुलाकात की संगत वजहें बता रहा है और असली सवालों में जाने से बच रहा है।

नाटक का एक दृश्य

छोटी-छोटी चीजें होती हैं जो थिएटर का आकर्षण बनाती हैं। कई तरह की दुविधाओं से घिरे प्रौढ़ उम्र के शख्स का चरित्र बनाने में सौरभ इनका सफल इस्तेमाल करते हैं। वो कनाट प्लेस में रिवोली के पास है- यह बात पत्नी से छिपानी है, या उसे पता भी चल जाए तो क्या फर्क पड़ता है- नुमा असमंजस पम्मी के किरदार का स्थायी भाव हैं। नए सेक्स संबंध में जाने की उसकी ऊहापोह या झट से उसे लपक लेने की उत्तेजना आदि भंगिमाएं प्रस्तुति में काफी रोचकता लाती हैं। तीन स्त्रियों के साथ वो तीन भावदशाओं में नजर आता है। आलेख इतना कसा हुआ है कि चार अलग-अलग चरित्रों की मानसिक दुनिया की उठापटक निरंतर उसमें एक दिलचस्प गति बनाए रखती है। तीनों स्त्री भूमिकाओं में निगार खान, मोना वसु और प्रीति ममगाईं का चरित्रांकन और अभिनय भी उतना ही कसा हुआ था। खास तौर से मॉडल लड़की की भूमिका में मोना वसु ने किरदार के कई शेड्स का अच्छा इस्तेमाल किया है।

लेखक संगम पांडेय टीवी और प्रिंट में लंबे समय तक काम करने के बाद इन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं. उनका यह लिखा जनसत्ता अखबार में आज प्रकाशित हुआ है. वहीं से साभार लेकर भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित किया जा रहा है.


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