'नरेंद्र जी कोई और नहीं वीरेंद्र सिंह जी हैं'

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दयानंदजी : किसी संपादक में मुख्‍यमंत्री का भोज ठुकराने की ताकत ना तब थी ना अब है : रीढ़ वाले पत्रकार और संपादक थे वह : प्रिय अमिताभ जी, आप ने इस बार फिर एक संकट खड़ा कर दिया है. 'अपने-अपने युद्ध' में नरेंद्र जी कौन हैं पूछ कर. आप से हारमोनियम के हज़ार टुकडे की तफ़सील में ही बताया था कि चरित्र कोई भी हो लेखक का व्यक्तिगत होता है, बेहद व्यक्तिगत.

अब चूंकि सवाल से कतराना भी ठीक नहीं होता, कायरता होती है. इसलिए बता रहा हूं. कोई दोगला चरित्र वाला पत्रकार, नेता या भ्रष्‍ट अफ़सर होता तो ज़रूर नो कमेंट कह कर निकल लेता. या फिर चुप लगा जाता. फिर बात चूंकि नरेंद्र जी जैसे चरित्र की भी है तो चुप रहने की ज़रूरत भी नहीं है. इसलिए भी कि अब नरेंद्र जी जैसे संपादकों-पत्रकारों की नस्ल विलुप्त हो चली है. जान ही लीजिए कि नरेंद्र जी कोई और नहीं आदरणीय वीरेंद्र सिंह जी हैं. जो स्वतंत्र भारत और पायनियर दोनों के संपादक रहे हैं. अपनी शर्तों पर जिए वीरेंद्र सिंह संस्मरण में अभी जल्दी ही भड़ास पर मैं लिख चुका हूं उनके बारे में. फिर भी वीरेंद्र सिंह जैसे लोगों के बारे में जितना लिखा जाए कम ही है. इसलिए भी कि रीढ़ वाले पत्रकार और संपादक थे वह. जो अब क्या हिंदी और क्या अंगरेजी या फिर कहें कि भारतीय पत्रकारिता से ऐसे लोग विदा ही नहीं तिरोहित भी हो चुके हैं. मुख्यमंत्री का भोज ठुकराने का जिगरा न तब किसी संपादक में था न अब. पर वीरेंद्र सिंह ने ठुकराया.

ऐसे उनके एक नहीं अनेक किस्से हैं. बल्कि एक बार का किस्सा और बता दूं. तब इसी उत्तर प्रदेश में श्रीपति मिश्र मुख्यमंत्री थे. उनका लगभग स्लोगन ही था कि 'नो वर्क, नो कंपलेंड' गरज यह कि न काम करेंगे, न गलती होगी. खैर उन्होंने जब अपने मुख्यमंत्रित्व का एक साल पूरा किया तब लखनऊ के चुने हुए स्वनामधन्य हिंदी-अंगरेजी संपादकों को भोजन पर बुलाया. पहुंचे भी संपादक लोग भोजन पर. लेकिन मुख्यमंत्री ही उपस्थित नहीं थे. तो भी क्या हुआ? मुख्यमंत्री निवास तो था न? तो संपादक जी लोगों ने छक कर भोजन किया. भोजन के बाद एक अंगरेजी के संपादक ने डकार लेते हुए आह भरी कि काश कि मुख्यमंत्री जी भी रहे होते तो एक बढि़या इंटरव्यू भी हो गया होता! सूचना विभाग का एक अधिकारी बोला, 'सर है न इंटरव्यू भी.'  'पर कहां?' सूचना विभाग के अधिकारी ने बने-बनाए इंटरव्यू की कापी उन संपादकों को सौंपते हुए कहा, 'सर तीनों इटरव्यू अलग-अलग हैं. हिंदी में भी है और अंगरेजी में भी. हां तीन संपादक थे. पायनियर के  एसएन. घोष, जो पद्मश्री भी थे, स्वतंत्र भारत के चंद्रोदय दीक्षित, अमृत प्रभात और नार्दन इंडिया पत्रिका के केबी माथुर थे.

खैर इन लोगों ने सहर्ष बने-बनाए इंटरव्यू की प्रतियां लीं और लाकर अपने-अपने अखबार में बाईलाइन छापा. जो इंटरव्यू उन्होंने लिए ही नहीं थे. सूचना विभाग ने तैयार किए थे. और ऐसे में वीरेंद्र सिंह मुख्यमंत्री का भोज ठुकरा देते थे. तब जब कि मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह उन्हें ठाकुरवाद की दुहाई देकर बुला रहे थे. और इन्हीं वीरेंद्र सिंह से जब स्वतंत्र भारत में उनसे जनरल मैनेजर ने खबर पर स्‍पष्‍टीकरण मांगा तो उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया था. और जयपुरिया उन्हें मनाते रहे कि ऐसा नहीं ऐसा था, पर वीरेंद्र सिंह तो वीरेंद्र सिंह थे कि जो कह दिया सो कह दिया, जो कर दिया सो कर दिया. टस से मस नहीं हुए.

एक खुलासा और सुनिए. जो शायद बहुत कम लोग जानते हैं. स्वतंत्र भारत से विदा होने के बाद वह नवभारत टाइम्स दिल्ली गए. रिज़र्व रेज़ीडेंट हो कर. उन्हें दिल्ली से लखनऊ जाने के लिए कहा गया. नवभारत टाइम्स में रेज़ीडेंट एडिटर बन कर जाने के लिए. उन्होंने पूरी विनम्रता से मना कर दिया. तब राजेंद्र माथुर नवभारत टाइम्स के संपादक थे. वीरेंद्र सिंह ने कहा कि जिस लखनऊ में वह संपादक रहे हैं वहां रेज़ीडेंट एडिटर होकर कैसे भला जा सकते हैं. फिर फटे दूध में मैं क्यों दही जमाऊं? वह कोई नया एडिशन लांच करना चाहते थे. जो शायद मध्य प्रदेश से ही तय था. बात आई-गई हो गई. पर बाद के दिनों में अचानक उन्होंने नवभारत टाइम्स से भी इस्तीफ़ा दे दिया. मैंने पूछा कि अब क्या हुआ? जानते है कि वह क्या बोले? सुनिए, आनंद आ जाएगा.

वह बोले,' मध्य प्रदेश के एक अखबार मालिक, (मैं अभी उस अखबार का नाम याद नहीं कर पा रहा हूं) मेरे पास आए और अपने अखबार में संपादक बनाने का प्रस्ताव कर बैठे. मैंने पूछा कि वो तो ठीक है पर यह बताइए कि आप मुझे जानते कैसे हैं? कि मध्य प्रदेश से आ कर अचानक मुझे संपादक बनाने का प्रस्ताव कर बैठे? अखबार मालिक ने थोडी ना नुकुर के बाद बता दिया कि राजेंद्र माथुर जी ने आप का नाम मुझे सुझाया है'. बस इतना काफी था. वीरेंद्र सिंह जैसे आदमी के लिए. वह बोले,'मैं समझ गया कि अब जिस अखबार का संपादक मुझे किसी दूसरे अखबार के लिए मेरा नाम सुझा रहा है, इसका मतलब उसका यकीन मेरे ऊपर नहीं रहा, न ही मेरी उपयोगिता उसकी नज़र में है. बस मैंने इस्तीफ़ा दे दिया.' फिर वह एक आस्ट्रेलियन डेली में करेस्‍पांडेंट हो गए. कहने लगे,' अब बहुत हो गई हिंदी माता की सेवा.' अब और तब भी के समय में चरण चांपू संपादकों, जो मालिक से लेकर नेताओं- अफ़सरों तक की चरण-रज लेने में निपुणता रखने, दलाली में प्रवीणता रखने वाले कुकुररमुत्तों और कुत्तों की फ़ौज़, से अलग वीरेंद्र सिंह जैसे लोग बहुत याद आते हैं. और नरेंद्र जी जैसे चरित्र में ढल कर हमारी कहानी या उपन्यास में अपनी पूरी ताकत से खडे हो जाते हैं. हम क्या कोई भी इसे नहीं रोक पाएगा.

एक बात और बताता चलूं अमिताभ जी कि मेरे ज़्यादातर पात्र गढे़ हुए नहीं होते, नकली या मुखौटा ओढ़ कर नहीं आते. वह चाहे नायक हों, प्रतिनायक हों. रहते अपनी ज़मीन पर ही हैं. अपने पानी पर ही हैं. हम उनका मेकअप-वेकअप भी नहीं करते. वो जो कबीर कहते थे न कि जस की तस धर दीनी चदरिया! या फिर अपने पंडित भवानी प्रसाद मिश्र लिख कर अपनी कविता में कहते थे,'जैसा तू बोलता है वैसा ही लिख!' तो यही कुछ करने का जतन करता हूं. अब इस का कितना निर्वाह कर पाता हूं, यह अपने सुधी पाठकों और आप जैसे मित्रों के आकलन पर छोड़ता हूं. पर क्या कीजिएगा वो अपने वसीम बरेलवी कहते हैं न कि हर शख्श दौडता है यहां भीड़ की तरफ़/ और चाहता है कि उसे रास्ता मिले/ इस दौरे मुंसिफ़ी में ज़रूरी नहीं वसीम कि जिस शख्श की खता हो उसी को सज़ा मिले.' और हमारे दोस्त बालेश्वर गाते थे,'दुशमन मिले सवेरे लेकिन मतलबी यार ना मिले' और आखिर में जोड़ते थे,'मूरख मिले बलेस्सर पर पढ़ा-लिखा गद्दार ना मिले.' पर क्या करें अमिताभ जी अब इन्हीं गद्दारों से सुबह शाम वास्ता पड़ता है और बिना किसी खता के ही सज़ा भुगतनी होती है. क्षण-क्षण, पल-प्रति-पल. नरेंद्र जी, वीरेंद्र सिंह, वसीम बरेलवी, पंडित भवानी प्रसाद मिश्र या बालेश्वर के कहे या सोचे से अब यह दुनिया नहीं चलती. यह दुनिया चलती है चापलूसों, भडुओं, दलालों और मक्कारों से. नीरा राडियाओं से बरखा दत्तों, ए. राजाओं, प्रभु चावलाओं, टाटाओं, अंबानियों, जे थामसों, सुरेश कलमाडियों और ऐसे तमाम नाम लेते जाइए, यह सिलसिला अंतहीन है.

खैर, एक छोटे से किस्से पर बात खत्म करना चाहता हूं. यह किस्सा किसी ऐतिहासिक व्यौरे से नहीं जनमानस में प्रचलित सुना-सुनाया है -  औरंगज़ेब की सेना में किसी जगह कोई सैनिक अफ़सर था. बहुत ही कड़क और सरकस. दबंग-गुंडा भी कह सकते हैं नाम था तुर्रम खां. एक बार किसी काम से वह सेना के ही एक मुंशी के पास गया. मुंशी ने गलती से उसका परिचय पूछ लिया, 'आप कौन?' तुर्रम खां भड़क गया. मुंशी से बोला, 'मुझे नहीं जानता?' मुंशी ने फिर से इनकार जताया. अब तुर्रम खां का पारा चढ़ गया. उस ने आव देखा न ताव. एक ज़ोरदार घूंसा मुंशी के मुंह पर धर दिया. और बोला, 'मैं तुर्रम खां.' और पूछा, 'अब जान गया मुझे?' मुंशी के आगे के दो दांत टूट गए थे तुर्रम के एक घूंसे से. सो वह तपाक से बोला, 'जी तुर्रम खां!' तुर्रम खां खुश हो गया. फिर चला गया. बाद के दिनों में समय ने करवट ली. तुर्रम खां का अन्यत्र तबादला हो गया. संयोग था कि उसी मुंशी को उनका तबादला पेपर तैयार करना था. मुंशी ने सब कुछ ठीक-ठीक लिखा. बस तुर्रम खां की शिनाख्त में लिख दिया कि तुर्रम खां के आगे के दो दांत टूटे हुए हैं. अब तुर्रम खां जब नई तैनाती पर पहुंचे तो वहां उनकी शिनाख्त ही मुशकिल हो गई. वह लाख कहें कि वह तुर्रम खां. वहां का मुंशी और लोग मानने को तैयार ही नहीं थे. खैर काम तो चलता रहा. पर महीने भर बाद फिर पहुंचे तुर्रम खां संबंधित मुंशी के पास वेतन लेने. मुंशी ने फिर इंकार किया. आजिज आ कर उन्होंने पूछ ही लिया कि आखिर कैसे नहीं हैं वह तुर्रम खां? मुंशी ने कागज़ देख कर बता दिया कि हमारे पास मौजूद कागज में तुर्रम खां के आगे के दो दांत टूटे लिखा गया है. तुर्रम खां लौट गए. समझ गए. कि अपना किया ही अपने सामने आ गया है. सारी अकड़ धूल में मिल गई थी. दूसरे दिन वह फिर पहुंचे उसी मुंशी के पास. अपना वेतन लेने. अबकी उनको वेतन मिल गया था. क्योंकि कगज में लिखी शिनाख्त से उनका चेहरा मेल खा गया था. दरअसल तुर्रम खां ने अपने आगे के दो दांत खुद तोड़ लिए थे.

तो अमिताभ जी, आज के तमाम तुर्रम खां से छुट्टी पाने के लिए ऐसे ही मुंशी चाहिए. जो अभी और बिलकुल अभी तो नहीं ही दिखते. शायद सिस्टम ने उन्हें लील लिया है. या कि वह मुंशी भी तुर्रम खां में तब्दील हो चुके हैं? ठीक-ठीक कह पाना अभी मुश्किल ही है.

लेखक दयानंद पांडेय जाने-माने साहित्यकार और पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है. दयानंद के लिखे अब तक के सभी उपन्यासों और लेखों को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें.


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