''कचहरी तो बेवा का तन देखती है''

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अमिताभजी : अदालतों के बारे में तथ्‍यपरक सच्‍चाई कहना कोर्ट ऑफ कंटेम्‍प्‍ट नहीं है : “न्याय वहाँ सीता है और क़ानून मारीच.” “न्याय मिलता भी है पर राम को नहीं. रावण को और उसके परिजनों को.” “हत्यारों, डकैतों को जमानत मिलती है. हाँ, राम को तारीख मिलती है.” “कचहरी तो बेवा का तन देखती है, खुलेगी कहाँ से बटन देखती है.” ये कुछ ऐसे वाक्य हैं जो दयानंद पाण्डेय जी के चर्चित उपन्यास 'अपने अपने युद्ध' में उपन्यास के मुख्य पात्र संजय के अपने मुकदमे के सिलसिले में न्यायपालिका की शरण में जाने के बाद में उसके अनुभवों के रूप में प्रस्तुत किये गए हैं.

लिखा तो और भी बहुत कुछ गया है पर मैं उन्हें यहाँ उद्धृत नहीं कर पा रहा हूँ. पर फिर भी इन शब्दों को आधार बनाते हुए मैं एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रकरण पर अपनी रायशुमारी करना चाहूँगा. कोर्ट को लेकर इस देश में ज्यादा बहस नहीं हुआ करते. कारण है एक ऐसे कानून का भय जिससे लगभग हर कोई कहीं ना कहीं डरता और घबराता है- कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट अर्थात अदालत की अवमानना. कोर्ट यानी “होली काउ” (पवित्र गाय) यानी एक ऐसा क्षेत्र जिसके सम्बन्ध में ज्यादा चर्चा परिचर्चा की जरूरत नहीं हो- जो कह दिया सो कह दिया, जो हो गया सो हो गया.

लेकिन यह मात्र आम धारणा या अवधारणा ही है. क्योंकि सच्चाई यह है कि अवमानना सम्बंधित कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट 1971 किसी भी तरह से कोर्ट के आदेशों की चर्चा-परिचर्चा करने से रोक नहीं लगाता. इस एक्ट की धारा दो में कहा गया है अवमानना दो किस्म के होते हैं- सिविल कंटेम्प्ट और क्रिमिनल कंटेम्प्ट. इसी धारा में सिविल कंटेम्प्ट परिभाषित किया गया है- “कोर्ट के किसी भी निर्णय, डिक्री, आदेश, रिट या कोर्ट के किसी प्रक्रिया का जानबूझ कर अनुपालन नहीं करना या कोर्ट को दिए गए किसी अंडरटेकिंग का जानबूझ कर उल्लंघन करना. क्रिमिनल अवमानना से अर्थ है-“ लिखित, मौखिक, संकेतात्मक या चाक्षुक ढंग से किसी ऐसी बात का प्रकाशन करना- (i) जो कोर्ट की ऑथोरिटी/ महत्ता को कम करता है या उसे अपमानित करता है या ऐसे प्रयास करता है. (ii) न्यायिक प्रक्रिया में द्वेषपूर्ण भाव पैदा करता है या उसमे हस्तक्षेप करता है या करने की कोशिश करता है (iii) न्यायिक प्रशासन मे हस्तक्षेप करता है या करने की कोशिश करता है.

सिविल कंटेम्प्ट के बारे में लगभग सभी लोगों का एक जैसा ही मत है कि यह न्यायिक प्रणाली और प्रक्रिया की महत्ता और ऑथोरिटी को कायम रखने के लिए नितांत आवश्यक है. कोर्ट के पास अपने आदेशों के अनुपालन के लिए कोई अलग से व्यवस्था तो होती नहीं है. कोर्ट को उसी कार्यपालिका के माध्यम से अपने आदेशों का अनुपालन कराना होता है जिसके कार्यों के विरुद्ध वे बहुधा निर्णय करते हैं. ऐसे में कई बार कार्यपालिका के सम्बंधित अधिकारियों की ऐसी मानसिक अवस्था बन जाती है जिसमें वे इस प्रकार के आदेशों को अपनी सत्ता की चुनौती के रूप में ले लेते हैं. ऐसे में इस तरह के अधिकारी न्यायालय के आदेशों को अंत तक नहीं मानने की कोशिश करते हैं. एक या अनेक प्रकार से उनका यह प्रयास होता है कि कोर्ट के आदेशों को टाला जाता रहे. ऐसी स्थितियों में वह कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का सिविल कंटेम्प्ट हिस्सा ही है जो कोर्ट को बल देता है और उसे अपने आदेशों को क्रियान्वित करा सकने की शक्ति देता है. ऐसे में यदि सिविल कंटेम्प्ट समाप्त कर दिया जाए तो उसके बाद न्यायपालिका का मतलब ही समाप्त हो जाएगा. “भय बिन होई ना प्रीती” की कहावत यहाँ भी उतना ही खरा उतरता है जितना किसी अन्य स्थान पर.

असली वाद-विवाद और मत-मतान्तर क्रिमिनल कंटेम्प्ट को ले कर है. इस बारे के एक साथ दो शक्तियां काम करती हैं- एक तो कोर्ट की गरिमा और प्रतिष्ठा और दूसरे अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता. ऐसा नहीं कि इन दोनों में सीधा विरोधाभास हो. बल्कि दोनों एक साथ लागू हो सकते हैं. व्यक्ति किसी मामले में अपनी खुली राय भी रख सकता है, उसे व्यक्त भी कर सकता है और इसके साथ कोर्ट की मर्यादा और गरिमा को भी बचाए रख सकता है. शायद इन्ही बातों के मद्देनज़र कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट में कई धाराओं की भी व्यवस्था की गयी. इसमें तमाम इनोसेंट प्रकाशन को अवमानना नहीं माना जाता. एक तो ऐसा तब होगा जब अपनी बात कहने वाले व्यक्ति को यह जानकारी ही नहीं हो कि वर्तमान में कोई न्यायिक प्रक्रिया जारी है. इसी तरह से वाजिब मूल्यांकन को कंटेम्प्ट नहीं माना जाता और फेयर तथा सत्यपरक रिपोर्टिंग भी अवमानना की श्रेणी में नहीं आते.

इसी तरह से दर्ज़नों सुप्रीम कोर्ट निर्णयों में भी यह आदेशित किया गया है कि कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का इस्तेमाल वाजिब कारणों से ही किया जाये, अकारण भय पैदा करने या अपने गलत कार्यों की रक्षा के लिए नहीं. यानी कुल मिला कर उच्चतम न्यायालय का प्रारम्भ से ही यह मत रहा है कि अवमानना कोई औज़ार नहीं जिसका बेजा इस्तेमाल किया जाता रहे, लेकिन इसकी जरूरत भी है ताकि न्यायालयों की गरिमा और प्रतिष्ठा बनी रहे. यह सर्वमान्य तौर पर माना जाता है कि न्यायालय की प्रतिष्ठा और गरिमा हर तरह से जनहित में आवश्यक है. इसमें वैसे भी किसी को कोई गुरेज नहीं होगा कि कोई भी व्यक्ति किसी भी आदमी या संस्था को अकारण बदनाम नहीं करे, उसके लिए अनुचित शब्दों का प्रयोग नहीं करे. यानी अपनी प्रतिष्ठा का ख़याल रखें और दूसरों की प्रतिष्ठा भी बनाए रखें.

यही उद्देश्य कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का है और इस रूप में यह सर्वथा उचित प्रतीत होता है. फिर ऐसा नहीं है कि इस प्रकार के प्रावधान केवल न्यायपालिका के लिए हैं. बल्कि हमारे क़ानून हर सामान्य व्यक्ति और हर संस्था को अपनी गरिमा बचाए रखने के लिए कानूनी अधिकार प्रदान करते हैं. आईपीसी की मानहानि से सम्बंधित धाराएँ बिलकुल इसी उद्देश्य के लिए दी गयी हैं, जिनके तहत हर व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या संस्थागत प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए विधि का सहारा ले सकता है. इस धारा में जेल तक का प्रावधान है और इस रूप में यह कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट से बहुत अलग नहीं है.

पर फिर ऐसा क्यों है कि आदमी किसी दूसरे से गाली-गलौज करने, उसे डराने-धमकाने, उसकी इज्जत उतारने और उसका मान-मर्दन करने से तो तनिक नहीं घबराता और मिनटों में किसी की भी बेइज्जती कर देता है, पर कोर्ट के बारे में बोलने से पहले पांच सौ बार सोचता है, तब जबकि कानून दोनों के लिए है, क़ानून में दोनों निषिद्ध है और सजा भी दोनों जगह है. जहां तक मैं समझ पाया हूँ इसका कारण भी यही है- “भय बिन होई ना प्रीत.” आदमी को लगता है कि कोर्ट एक ताकतवर संस्था है, उसमें अपनी शक्ति का उपयोग कर पाने की क्षमता है, जबकि औरों के बारे में ज्यादातर लोग आश्वस्त हैं कि वह कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा. इसीलिए दूसरों के प्रति एक किस्म का आचरण और कोर्ट के प्रति दूसरे तरह का.

लेकिन ऐसा कहीं नहीं है कि यदि कोई व्यक्ति कोर्ट-कचहरी या न्यायपालिका से जुड़ी सही बातें लिखेगा तो न्यायपालिका उसे बिलावजह कंटेम्प्ट में घसीट देगी. आज हम देख रहे हैं कि न्यायालयों, न्यायिक निर्णयों और न्यायाधीशों तक के आचरण को ले कर चर्चाएं हुईं, न्यूज़ और आर्टिकल लिखे गए और अंततोगत्वा उनमें से कई मामलों में उन सम्बंधित व्यक्तियों पर आपराधिक से लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाईयां तक हुई. लेकिन इनमें किसी भी प्रकरण में कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट तो नहीं हुआ? कहने का अर्थ मात्र यह है कि कोर्ट अवमानना को लेकर कोई अनावश्यक रूप से संवेदनशील नहीं हैं. पर साथ ही सभी पक्षों को यह देखना होगा कि इस क़ानून का उद्देश्य कोई भय का राज्य स्थापित करना नहीं है और ना ही इसके जरिये किसी संस्था को गलत-सही करने की इजाजत देना है.

इसका कुल मतलब यही है कि चूँकि न्यायपालिका का पूरा वजूद ही इसकी जनमानस में स्वीकार्यता और इसकी उचित प्रतिष्ठा पर है, अतः हर प्रभावित पक्ष की यह जिम्मेदारी है कि वह इस प्रतिष्ठा को बचाए रखने का प्रयास करे. आज हमारे पास यही न्यायपालिका है जिसकी ओर हम अन्य तमाम संस्थाओं से निराश हो जाने की स्थिति में आशा की दृष्टि से आखिरी रहनुमा के रूप में देखते हैं और यह भी सत्य है कि यदि किसी भी व्यवस्था में एक न्यायपालिका ना हो तो समाज में पूरी तरह अराजकता और तानाशाही कायम हो जाये. ऐसी स्थिति से बचने के लिए इसके अंदर और बाहर वाले हर व्यक्ति का यह नैतिक, शासकीय और न्यायिक उत्तरदायित्व है कि इसे इस तरह निष्कलंक और निष्पाप बनाए रखने में अपना पूर्ण सहयोग दें, जिससे इसकी मर्यादा पर आंच आने और इसके विषय में चर्चा-कुचर्चा होने की नौबत ही नहीं आये.

नहीं तो फिर बातें होंगी, बात का बतरंग होगा और देश तथा समाज के हर किसी व्यक्ति का अहित भी. दयानंद जी के उपन्यास के संजय को ऐसा सोचने और कहने की जरूरत ही नहीं आये, यही हम सभी लोगों की कोशिश रहनी चाहिए. ऐसे हालातों में ही कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट जैसे कानूनी प्रावधान अपना पूरा मकसद हासिल कर सकते हैं. नहीं तो खींचा-तानी की स्थिति आ जाने पर किसी भी पक्ष का भला नहीं होगा. प्राकृतिक न्याय का बहु-स्वीकृत सिद्धांत है-“न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, उसे होते दिखना भी चाहिए.” आज इस सिद्धांत के मूर्त-स्वरुप के स्थापना की पहले से भी अधिक जरूरत आन पड़ी है, क्योंकि जहां भी गड़बडि़यां नग्न आँखों से दिखने लगती हैं तो उसके लिए माइक्रोस्कोप की जरूरत थोड़े ही होती है.

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों लखनऊ में पदस्थ हैं.


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