नागार्जुन की कविताओं में आमजन की जिंदगी के रंग हैं

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महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा पटना स्थित एएन सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान में नागार्जुन जन्मशती के अवसर पर आयोजित दो दिवसीय समारोह में देशभर के साहित्यकारों के विमर्श का लब्बोलुआब था कि नागार्जुन जनकवि थे। ‘बीसवीं सदी का अर्थ : जन्मशती का संदर्भ’ श्रृंखला के तहत नागार्जुन एकाग्र पर आयोजित समारोह के उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता विश्‍वविद्यालय के कुलपति व वरिष्‍ठ कथाकार विभूति नारायण राय ने की।

श्री राय ने कहा कि इसी शताब्‍दी में मानवाधिकार का विचार भी आया। पहली बार युद्धबंदियों पर सकारात्मक सोच पैदा हुआ और उनके अधिकारों को भी रेखांकित किया गया। इस शताब्दी को अद्भुत विरोधाभासों की शताब्दी कहा जा सकता है। ऐसी परिस्थियों से परिचय इन कवियों को भी उस समय हुआ। जिन चार कवियों की जन्मशती मनाई जा रही है, हम जन्म शताब्दी श्रृंखला के तहत उन कवियों के कर्मस्थल पर विमर्श करने के लिए पटना में समारोह का आयोजन कर रहे हैं। कवि अरुण कमल ने कहा कि नागार्जुन की कविताओं में हमारे आस-पास की जिंदगी के रंग दिखाई देते हैं। उन्होंने गरीबों के बारे में, जन्म देने वाली मां के बारे में, मजदूरों के बारे में लिखा। लोकभाषा के संपर्क में रहने के कारण उनकी कविताएं औरों से अलग हैं। वे गहरी ममता और करूणा के कवि हैं। उनकी कविताओं में जीवन जीने की प्रेरणा है। इस क्रम में उन्होंने पाब्लो नेरुदा, शमशेर, निराला और अज्ञेय की कविताओं की चर्चा की।

कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि नागार्जुन को जितना प्यार मिला, वह दुर्लभ है। उन्हें जनकवि होने का गौरव प्राप्त हुआ है। उनकी तमाम कविताओं में आठ मात्रा के छंद से परिचय होता है। नागार्जुन की दूसरी खूबी थी, अपने समकालीन कवियों की सराहना करना और गलत बातों के लिए उनपर खुलकर लिखना, जो उन्हें दूसरे से अलग करता है। कवि आलोक धन्वा ने कहा कि नागार्जुन की कविताओं में आजादी की लड़ाई की अंतर्वस्तु शामिल है। उन्होंने कविताओं के जरिए कई लड़ाईयां लड़ीं। वे एक कवि के रूप में ही महत्वपूर्ण नहीं हैं अपितु नए भारत के निर्माता के रूप में दिखाई देते हैं।

उद्घाटन वक्तव्य में खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि वर्ष 1911 महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उसी वर्ष शमशेर, केदारनाथ, फैज एवं नागार्जुन पैदा हुए। उनके संघर्ष, क्रियाकलापों और उपलब्धियों के कारण बीसवीं सदी महत्वपूर्ण बन गया। इसी सदी में दुनियाभर में कई क्रांतियां हुई। उन्होंने कहा कि दुनिया से अभी शीतयुद्ध समाप्त नहीं हुआ है बल्कि शीतयुद्ध चल रहा है, जिसकी अगुवाई अमेरिका कर रहा है। उन्होंने कहा कि बीसवीं सदी में शोषण की प्रक्रिया के अंत में नागार्जुन कवि और रचनाकार के अलावे एक नागरिक की हैसियत से शामिल हैं। उनकी कविताओं की गूंज गांव के चौपालों तक सुनाई देती है।

वर्धा

‘नागार्जुन का काव्य’ पर आयोजित अकादमिक सत्र में साहित्यकार केदारनाथ सिंह ने कहा कि किसी कवि को श्रेष्ठ कहने की बजाय हमें आलोचना की कसौटी पर कविता की श्रेष्ठता सिद्ध करने की जरूरत है। आज कविताओं की जांच परख कम होती है, जबकि कवियों में तुलना ज्यादा। नागार्जुन स्थूल घटना को भी गहरी संवेदना से जोड़कर कविता रचते थे। जेल जीवन की सबसे अच्छी कविताएं नागार्जुन ने लिखी है। विमर्श में प्रो. बलराम तिवारी ने कहा कि नागार्जुन के आचरण में क्रांतिकारी गुण समाए था। वे सच्चे तात्कालिक बोध के कवि थे। उन्होंने जनसंपर्क को काव्य व्यवहार में उतारा। उनकी कविताएं राष्ट्रीय हलचल का सिस्मोग्राफ है।

प्रो. नीरज सिंह ने कहा कि संन्यास से गृहस्थ जीवन में वापस हुए कवि ने न केवल अपने घर-परिवार से नाता जोड़ा बल्कि जीवन पर्यन्त शोषित, पीड़ित जनता के प्रवक्ता बने रहे। वे कथनी और करनी के फर्क को मिटानेवाले अन्यतम रचनाकार थे। अध्यक्षीय वक्तव्य में बिजेन्द्र नारायण सिंह ने कहा कि नागार्जुन की कविता खबरों की क्रांति थी। वे एक मनीषी थे, उन्होंने जीवन पर्यन्त यायावर की भांति घूम कर शोषण, अन्याय व सामाजिक मूल्य को बचाने के लिए अपनी रचना में स्थान दिया।

‘नागार्जुन का गद्य’ पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता करते हुए खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि नागार्जुन में आत्मालोचन के गुण हैं इसलिए वे बेहद जनतांत्रिक हैं। साहित्यकार प्रेम कुमार मणि ने कहा कि बाबा का गद्य उनकी बैचेनी का विस्फोट है। राजेन्द्र राजन ने कहा कि नागार्जुन यह स्वीकारते थे कि वे अपने विचारों का प्रचार करते हैं। उन्होंने कहा कि रतिनाथ की चाची में नागार्जुन ने विधवा विवाह को एक राह देने की परिस्थिति बनाई। समारोह में उपस्थित नागार्जुन के बड़े सुपुत्र शोभाकान्त ने कहा कि नागार्जुन ने अपने जीवन की तमाम खूबियों और खामियों को रचनाओं में डाल दिया। साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजी गई लेखिका उषा किरण खान ने कहा कि स्त्री विमर्श शब्द का आगाज नागार्जुन ने भी किया। उन्होंने स्त्री को समाज में अनागरिक होते देखा था इसलिए स्त्रियों के कष्ट, बाल विवाह, बाल विधवा को उन्होंने लेखिनी का प्रमुख विषय बनाया। समारोह के संयोजक व विश्वविद्यालय के प्रो. संतोष भदौरिया ने मंच का संचालन किया तथा साहित्य विद्यापीठ के प्रो. केके सिंह ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर देशभर के वरिष्ठ कवि, कथाकार, आलोचक, समीक्षक व पटना के सुधीजन उपस्थित थे।


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