ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों में भी पहुंचे बाल साहित्‍य

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: काशी विद्यापीठ में बाल साहित्‍य पर दो दिवसीय संगोष्‍ठी : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, महामना मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान व हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग के संयुक्त तत्वावधान एवं भारत ज्ञान-विज्ञान समिति के सहयोग से ‘21वीं सदी के हिन्दी बाल साहित्य’ विषय पर महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी में देश के विभिन्न भागों से जाने माने बाल साहित्यकार उपस्थित रहे।

5 मार्च को संगोष्ठी का विधिवत उद्घाटन किया गया। इसकी अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति ने कहा कि ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों तक बाल साहित्य पहुंचना राष्ट्र के विकास और सौहार्द के लिए जरूरी है। भारत में सबसे बड़ी संख्या हिन्दी भाषी बच्चों की हैं। इन हिन्दी भाषी बच्चों में भी सर्वाधिक बच्चे भारत के ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में रहते हैं, जिनमें अधिकांश के माता -पिता विपन्न तथा साधनहीन हैं। ऐसे बच्चों तक बाल साहित्य पहुंचाना एक चुनौती है। इसके लिए बाल पुस्तकालयों की स्थापना की जानी चाहिए। जहाँ ऐसे बच्चों को निःशुल्क पुस्तकें पढ़ने के लिए उपलब्ध हो सके। शिक्षण संस्थाओं को भी इस दिशा में आगे आना चाहिए।

राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए बाल साहित्यकार श्रीप्रसाद ने कहा कि दुनिया में सबसे कम चिन्तन बाल साहित्य पर हुआ। आज प्राचीन बाल साहित्य का अध्ययन करने की आवश्यकता है। पंचतन्त्र बाल साहित्य का श्रेष्ठ उदाहरण है। इसकी शैली काफी विकसित थी। भारत में बाल साहित्य की श्रेष्ठ परम्परा रही है। काशी के भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और प्रेमचन्द ने बच्चों के लिए लेखन प्रारम्भ किया था। बाल पत्रकारिता की शुरुआत काशी से ही हुई थी।

संगोष्ठी की मुख्य वक्ता एवं आकाशवाणी की उप-महानिदेशक डा. अलका पाठक ने कहा कि सब देख सुनकर चुप रहना आदत बन गई है। सच बोलने के खतरे हैं, ऐसे भी समाचार छपते हैं जो माता-पिता के रिश्तों पर प्रश्न करते हैं। तो उस प्रकाशन का प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। आज के माता-पिता बच्चों पर नम्बर के लिए दबाव बनाते हैं न कि प्रकृति के साथ जीने की बात करते हैं, आज माता-पिता अपने सपनों का बोझ अपने बच्चों पर डाल रहे हैं, जो दुर्भागपूर्ण है।

राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय प्रवर्तन करते हुए नेशनल बुक ट्रस्ट के श्री मानस रंजन महापात्र ने कहा कि - वर्तमान समय में बाल मनोविज्ञान बदल रहा है। 21वीं सदी में हमारे सोच में परिवर्तन आया है। आज बच्चे क्या पढ़ना चाहते हैं यह जानने की जरुरत है और उसके अनुरूप ही साहित्य उपलब्ध कराने के दिशा में प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पिछली शताब्दी व वर्तमान शताब्दी के अबतक के साहित्य पर तुलानात्मक चर्चा होगी।

राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रारम्भ में स्वागत भाषण में प्रो. ओम प्रकाश सिंह, निदेशक पत्रकारिता संस्थान ने कहा कि वैश्वीकरण के इस दौर में साहित्य का रूपान्तरण हो रहा है। पुस्तक पत्रिका से चला बाल साहित्य आज इन्टरनेट तक पहुंच गया है। इन्टरनेट से दुनिया का वैश्वीकरण हुआ है। इस कारण यह विचार जरूरी है कि बच्चों का किस प्रकार का सहित्य इन्टरनेट पर उपलब्ध है और किस रूप में है।

उद्घाटन सत्र के उपरान्त सम्पन्न दूसरे सत्र में ‘‘बाल साहित्य : विज्ञान एवं इलेक्‍ट्रानिक माध्यम’’ विषय हुई चर्चा में वक्ताओं ने कहा कि बच्चों में विज्ञान के विषयों में पढ़ने तथा विज्ञान के रहस्यात्मक धारावाहिकों के प्रति रूचि अधिक रहती है। वर्तमान समय में ई-बुक, टीवी, सीडी आदि के माध्यम से विज्ञान के सम्बन्ध में फीचर, कहानी, सीरियल आदि बच्चों तक पहुंच रही है, जो काफी लोकप्रिय है।

दूसरे सत्र की अध्यक्षता बाल साहित्यकार एवं चिकित्सक डॉ. अमिताभ शंकर राय चैधरी ने किया। इस सत्र में डॉ. अनामिका श्रीवास्तव, डॉ. हेमन्त कुमार ने शोध पत्र प्रस्तुत किये। इस सत्र की चर्चा में डॉ. दिविक रमेश, डॉ. सुरेन्द्र विक्रम, श्रीमती श्वेता वर्मा, डॉ हेमन्त कुमार, श्रीमती सुशील शुक्ला, डॉ. बैकुंठ पाण्डेय, राजाराम साहू, प्रो. मंजुला चतुर्वेदी, प्रो. आरपी सिंह ने परिचर्चा में भाग लिया। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के चार राज्यों से आये 150 प्रतिभागी भाग लिए।

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र के अध्यक्ष एवं प्रमुख बाल साहित्यकार डॉ. श्रीप्रसाद जी ने कहा कि बाल साहित्य को बाल भावना के अनुरूप होना चाहिए। पौराणिक विषयों या अन्य भाषाओं के बाल साहित्य को हिन्दी के बाल साहित्य में प्रस्तुत करते समय उसे बाल मनोविज्ञान के साचे में ढालना जरूरी है। पौराणिक विषय को ज्यों का त्यों देने से बाल साहित्य, बाल साहित्य न रहकर प्रौढ़ों का साहित्य हो जाता है। उन्होंने कहा कि यूरोप में भी प्रारम्भिक दिनों में धार्मिक विषय बाल साहित्य में लिखे जाते थे। धीरे-धीरे परिवर्तन आया और फिर ज्ञान-विज्ञान की बातें लिखी जाने लगी। हिन्दी के बाल साहित्य में भी विकास का यही क्रम रहा है। पहले पौराणिक विषय अधिक होते थे अब तो हिन्दी के बाल साहित्य में ज्ञान-विज्ञान के विषय भी लिखे-पढ़े जा रहे हैं। उन्होंने अंग्रेजी के बाल साहित्य के अनुवाद को बच्चों को पढ़ाने के प्रति सावधान करते हुए कि ‘‘हैरीपॉटर’’ का अनुवाद भारतीय परिवेश एवं मूल्यों के अनुरूप नहीं है। हैरीपॉटर में जादू, चाकू आदि को भयावह रूप में लिखा गया है।

समापन सत्र के मुख्य वक्ता एवं प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉ. दिविक रमेश ने कहा कि इन्टरनेट पर इतना साहित्य आ गया है कि अभिभावक सावधान न रहे तो बच्चे अच्छी सूचना की जगह खराब सूचनाएं भी ले सकते हैं। इसी क्रम में डॉ. दिविक रमेश ने दुनिया की अन्य भाषाओं तथा भारत की भी भाषाओं में बड़ी मात्रा में उपलब्ध बाल साहित्य को हिन्दी में उपलब्ध कराने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इस कार्य में अनुवाद सहायक है। अन्य भाषाओं के बाल साहित्य का मात्र हिन्दी में अनुवाद उचित नहीं होगा बल्कि इसके साथ-साथ बच्चों की अनुभूति और मनोविज्ञान को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। अनुवाद करते समय विदेशी तथा दूर के पात्रों को परिचित पात्र बनाने से अनुवाद के बाद भी स्वाभाविकता आती है।

दो दिवसीय संगोष्ठी के दूसरे दिन सम्पन्न तीन सत्रों में बाल साहित्य : प्रकाशन, संरक्षण, प्रसार भारतीय परम्परा एवं दुनिया के बाल साहित्य पर चर्चा हुई। इन सत्रों डॉ. सुरेन्द्र विक्रम, डॉ. हेमन्त कुमार, प्रो. श्रद्धानन्द, प्रो. ओमप्रकाश सिंह, सुश्री साधना श्रीवास्तव, अमिताभ शंकर राय चौधरी ने अपने शोध पत्रों का वाचन किया।

समापन सत्र के पूर्व स्वरचित बाल कविता का पाठ हुआ। इसमें बाल साहित्य के डॉ. श्रीप्रसाद ने रसगुल्ले की खेती होती, चिड़ियों ने बन्दूक चलाई, घोड़ा गाड़ी, डॉ. दिविक रमेश ने पापा क्यों अच्छा लगाता है अपना प्यारा घर, अगर पेड़ भी चलते होते चिड़िया कभी पंख में भर कर, डॉ. बैकुण्ठ पाण्डेय ने हंगामा मच गया गांव में, जब आ गया सर्कस, डॉ. सुरेन्द्र विक्रम ने एक कथा है बड़ी पुरानी, मेरी मम्मी की मम्मी की, छात्रा नमिता शर्मा एवं अंजनी पाण्डेय ने बाल कविता प्रस्तुत किया।

विभिन्न सत्रों में हुई  चर्चा में सर्वश्री डॉ. शिवकुमार मिश्र, डॉ. प्रमथेश पाण्डेय, दानिश, डॉ. अवध बिहारी सिंह, दिग्विजय सिंह राठौर, डॉ. सुमन कुमार ओझा, श्री नागेन्द्र सिंह, श्री लोक नाथ, डॉ. सुनील कुमार, डॉ. जयप्रकाश श्रीवास्तव, जिनेश कुमार, आकाश कुमार, आशीष कुमार आदि ने भाग लिया। सत्रों का संचालन नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इण्डिया के संपादक मानस रंजन महापात्र ने किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. ओमप्रकाश सिंह एवं प्रो. श्रद्धानन्द ने किया।


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