लोक कवि ने सम्मान दिलाने को कहा तो पत्रकार ने डांसर की डिमांड की

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: उपन्यास - लोक कवि अब गाते नहीं (3) : कभी कभार तो अजब हो जाता। क्या था कि लोक कवि की टीम में कभी कदा डांसर लड़कियों की संख्या टीम में ज्यादा हो जाती और उनके मुकाबले युवा कलाकारों या संगतकर्ताओं की संख्या कम हो जाती। बाकी पुरुष संगतकर्ता या गायक अधेड़ या वृद्ध होते जिनकी दिलचस्पी गाने बजाने और हद से हद शराब तक होती।

बाकी सेक्स गेम्स में न तो वह अपने को लायक पाते न ही लोक कवि की तरह उनकी दिलचस्पी रहती। और एक-दो युवा कलाकार आखि़र कितनों की आग शांत करते भला? एक-दो में ही वह त्रस्त हो जाते। लेकिन लोक कवि के आर्केस्ट्रा टीम की लड़कियां इतनी बिगड़ चुकी थीं कि गाने बजाने और मयकशी के बाद देह की भूख उन्हें पागल बना देती। वह आधी रात झूमती-बहकती बेधड़क टीम के किसी भी पुरुष से ‘याचना’ कर बैठतीं। और बात जो नहीं बनती तो होटल के कमरे में मचलती वह बेकल हो जातीं और जैसे फरियाद कर बैठतीं, ‘तो कहीं से कोई मर्द बुला दो!’ इस कहने में कुछ शराब, कुछ माहौल, कुछ बिगड़ी आदतें तो कुछ देह की भूख सभी की खुमारी मिली जुली होती। और ऐसी बातें, सूचनाएं लोक कवि तक लगभग नहीं पहुंचतीं। ज्यादातर टीम के लोग ही खुसुर-फुसुर करते रहते। छन-छन कर बिखरी-बिखरी बातें कभी कभार लोक कवि तक पहुंचतीं तो वह उबल पड़ते। और ‘संबंधित’ लड़की को फौरन टीम से ‘आउट’ कर देते। बड़ी निर्ममता से।

बावजूद इस सबके लोक कवि की टीम में एंट्री पाने के लिए लड़कियों की लाइन लगी रहती। कई बार ठीक-ठाक पढ़ी लिखी लड़कियां भी इस लाइन में होतीं। गाने की शौकीन कुछ अफसरों की बीवियां भी लोक गायक के साथ गाने को न सिर्फ उत्सुक दीखतीं, बल्कि लोक कवि के गैराज में मय सिफारिश के पहुंच जातीं। लेकिन लोक कवि बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़ लेते। कहते, ‘मैं हूं अनपढ़ गंवार गवैया। गांव-गांव, शहर-शहर घूमता रहता हूं, नाचता गाता हूं। होटल मिल जाए, धर्मशाला मिल जाए, स्कूल, स्टेशन कहीं भी जगह मिल जाए सो लेता हूं। कहीं न जगह मिले तो मोटर या जीप में भी सो लेता हूं।’ वह फिर हाथ जोड़ते कहते, ‘आप लोग हाई-फाई हैं, आपकी व्यवस्था हम नहीं कर पाऊंगा। माफ कीजिए।’

तो लोक कवि अपनी आर्केस्ट्र टीम में अमूमन हाई-फाई किस्म की लड़कियों, औरतों को एंट्री नहीं देते थे। आम तौर पर निम्न मध्यम वर्ग या निम्न वर्ग की ही लड़कियों को वह अपनी टीम में एंट्री देते और बाद में उन्हें ‘हाई-फाई’ बता बनवा देते। पहले वह जैसे अपने पुराने उदघोषक दुबे जी के परिचय में उन की डी.एसपी. पत्नी और आई.ए.एस. बेटे का बख़ान जरूर करते थे, ठीक वैसे ही वह अब स्टेज पर पढ़ी लिखी लड़कियों का परिचय फला यूनिवर्सिटी से एम.ए. कर रही हैं या बी.ए. पास हैं, या फिर ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, बी.एस.सी. वगैरह जुमले लगा कर करने लगे। लेकिन इस फेर में कुछ कम पढ़ी लिखी लड़कियों का ‘मनोबल’ गिरने लगता। तो जल्दी ही इसकी दवा भी लोक कवि ने खोज ली।

लड़की चाहे कम पढ़ी लिखी हो चाहे ज्यादा, किसी भी लड़की को वह ग्रेजुएट से कम स्टेज पर नहीं बताते और यह सब वह सायास लेकिन अनायास अर्थ में पेश करते। बाद में वह ज्यादातर लड़कियों को किसी न किसी जगह पढ़ता बता देते। बताते कि ‘एम.ए. में पढ़ रही हैं पर भोजपुरी में गाने का शौक है तो हमारे साथ आ कर गाने का शौक पूरा कर रही हैं।’ वह जोड़ते, ‘आप लोग इन्हें आशीर्वाद दीजिए।’ यहां तक कि वह अपनी उदघोषिका लड़की को भी खुद पेश करते, ‘लखनऊ यूनिवर्सिटी में बी.एस.सी. कर रही हैं....’, तो उदघोषिका तो सचमुच बी.एस.सी. कर रही थी लेकिन कुछ शौक, कुछ घर की आर्थिक दिक्कतों ने उसे लोक कवि की टीम में हिंदी, अंगरेजी और भोजपुरी में एनाउनसिंग करने और जब तब कूल्हा मटकाऊ नृत्य करने के लिए विवश कर रखा था। बाद में उसकी अंगरेजी एनाउंसिंग के चलते जब लोक कवि की ‘मार्केट’ बढ़ी तो लोक कवि ने उसे एक हजार तो कभी डेढ़ हजार रुपए नाइट का भुगतान करना शुरू कर दिया। जब कि बाकी लड़कियां पांच सात सौ, ज्यादा से ज्यादा हजार रुपए नाइट तक ही पाती थीं। और वह भी नाच गाने की मेहनत मशक्श्कत के बाद की ‘सेवा सुश्रुषा’ भी जब-तब जिस तिस को करनी पड़ जाती थी सो अलग।

खै़र, एनाउंसर लड़की तो सचमुच पढ़ रही थी पर कुछ लड़कियां आठवीं, दसवीं या बारहवीं तक ही पढ़ी होतीं, न पढ़ी होतीं तो भी उन्हें स्टेज पर लोक कवि यूनिवर्सिटी में पढ़ता हुआ बता देते। एक लड़की तो दसवीं फेल थी और उसकी मां सब्जी बेचती थी पर कभी किसी समय वह जबलपुर यूनिवर्सिटी में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी रह चुकी थी, पति से झगड़े के बाद जबलपुर शहर और नौकरी छोड़ लखनऊ आई थी। पर लोक कवि उसकी लड़की को यूनिवर्सिटी में पढ़ता हुआ तो बताते ही उसकी मां को भी जबलपुर यूनिवर्सिटी की रिटायर प्रोफेसर बता देते तो संगी साथी कलाकार भी सुन कर फिस्स से हंस देते। डा. हरिवंश राय बच्चन अपनी मधुशाला में जैसे कहते थे कि, ‘मंदिर मस्जिद बैर बढ़ाते, मेल कराती मधुशाला’ कुछ-कुछ उसी तर्ज पर लोक कवि के यहां भी कलाकारों में हिंदू-मुस्लिम का भेद ख़त्म हो जाता। कई मुस्लिम लड़कियों के उन्होंने हिंदू नाम रख दिए थे तो कई हिंदू लड़कियों के नाम मुस्लिम। और लड़कियां बाखुशी इसे स्वीकार कर लेतीं। लेकिन तमाम इस सबके लोक कवि के मन में जाने क्यों अपने पिछड़ी जाति के होने की ग्रंथि फिर भी बनी रहती। इस ग्रंथि को ‘कवर’ करने के लिए वह पिछड़ी जाति की लड़कियों के नाम के आगे भी शुक्ला, द्विवेदी, तिवारी, सिंह, चौहान आदि जातीय संबोधन इस गरज से जोड़ देते ताकि लगे कि उनके साथ बड़े घरों की, ऊंची जातियों की लड़कियां भी नाचती गाती हैं।

लोक कवि में इधर और भी बहुतेरे बदलाव आ गए थे। कभी एक ठो कुर्ता पायजामा के लिए तरसने वाले, एक टाइम खाने के जुगाड़ में भटकने वाले लोक कवि अब मिनरल वाटर ही पीते थे। पानी की बोतल हमेशा उनके साथ रहती। वह लोगों से बताते भी कि, ‘खर्चा बढ़ गया है। दो-तीन सौ रुपए का तो मैं पानी ही रोज पी जाता हूं।’ वह जोड़ते, ‘दारू-शारू, खाने-पीने का खर्चा अलग है।’ अलग बात है अब वह भोजन के नाम पर सूप पर ज्यादा ध्यान देते थे। ‘चिकन सूप, फ्रूट सूप, वेजीटेबिल सूप’ वह बोलते। कई बार तो शराब को भी वह सूप ही बता कर पीते पिलाते। कहते, ‘सूप पीने से ताकत जादा आती है।’ इसी बीच लोक कवि ने एक एयरकंडीशन कार ख़रीद ली। वह अब इसी कार से चलते। बाकायदा ड्राइवर रख कर। लेकिन बाद में वह अपने ड्राइवर की मनमानी से जब तब परेशान हो जाते। पर उसको नौकरी से हटाते भी नहीं थे। अपने संगी साथियों से कहते भी थे, ‘जरा आप लोग इसको समझा दीजिए।’

‘आप खुद क्यों नहीं टाइट कर देते हैं गुरु जी!’ लोग कहते।

‘अरे, इ माली हम राजभर! का टाइट करूंगा इसको।’ कहते हुए लोक कवि बेचारगी में जैसे धंस से जाते थे।

इसी बीच चेयरमैन साहब के सौजन्य से लोक कवि का परिचय एक पत्रकार से हो गया। पत्रकार जाति का ठाकुर था और लोक कवि के पड़ोसी जनपद का वासी था। लोक कवि के गानों का रसिया भी। राजनीतिक हलकों व ब्यूरोक्रेसी में उसकी काफी अच्छी पैठ थी। पहले तो लोक कवि उस पत्रकार से बतियाने में हिचकिचाते थे। संकोचवश नहीं, भयवश। कि जाने क्या अंटशंट उनके बारे में भी वह लिख दे तो! उस पत्रकार ने लिखा भी एक लेख लोक कवि के बारे में। वह भी दिल्ली के एक दैनिक में जिसका कि वह संवाददाता था। पर जैसा कि लोक कवि डरते थे कि उनके बारे में वह कहीं अंट शंट न लिख दे, वैसा नहीं। फिर उस लेख के बाद लोक कवि का यह भय भी धीरे-धीरे छंटने लगा। फिर तो लोक कवि और उस पत्रकार की अकसर छनने लगी। जाम टकराने लगे। इतना कि दोनों ‘हमप्याला, हमनिवाला’ बन गए। जल्दी ही दोनों एक दूसरे को साधने भी लगे। पत्रकार को ‘मनोरंजन’ और शराब का एक ठिकाना मिल गया था और लोक कवि को सम्मान और पब्लिसिटी की द्रौपदी को जीतने का एक कुशल औजार। दोनों एक दूसरे के पूरक बन बाकायदा ‘गिव एंड टेक’ को फलितार्थ कर रहे थे।

लोक कवि पत्रकार को रोज भरपेट शराब मुहैया कराते। और कई बार तो यह दोनों सुबह से ही शुरू हो जाते। ऐसे जैसे बेड टी ले रहे हों। तो पत्रकार लोक कवि के लिए अकसर छोटे मोटे सरकारी कार्यक्रमों से लेकर प्राइवेट कार्यक्रमों तक का पुल बनता। पत्रकार ने उनके सरकारी कार्यक्रमों की फीस भी काफी बढ़वा दी। ब्यूरोक्रेसी पर जोर डाल कर। इतना ही नहीं बाद के दिनों में पिछड़ी जाति के एक नेता जब मुख्यमंत्री बने तो पत्रकार ने अपने संपर्कों और परिचय के बल पर लोक कवि की वहां भी एंट्री करवा दी। लोक कवि खुद भी पिछड़ी जाति के थे और मुख्य मंत्री भी पिछड़ी जाति के। सो दोनों की ट्यूनिंग इतनी ज्यादा जुड़ गई कि लोक कवि की पहचान मुख्यमंत्री की उपजाति के तौर पर फैलने लगी। तब जब कि लोक कवि उस उपजाति के नहीं थे। लेकिन चूंकि पहले ही से वह अपने नाम के आगे सरनेम लिखते ही नहीं थे, सो मुख्यमंत्री का सरनेम जब उनके नाम के आगे लगने लगा तो किसी को आपत्ति नहीं हुई। आपत्ति जिसको होनी चाहिए थी, वह लोक कवि ही थे पर उन्हें कोई आपत्ति थी नहीं। गाहे-बेगाहे जब उनका सरनेम जानने वाला कोई उन्हें टोकता कि, ‘का भई, यादव कब से हो गए?’ तो लोक कवि हंस कर बात को टाल जाते। टाल इसलिए जाते कि वह यादव न होते हुए भी ‘यादव’ को कैश कर रहे थे। यादव मुख्यमंत्री के करीब होने का सुख लूट रहे थे। इतना ही नहीं यादव समाज में भी अब लोक कवि ही ज्यादातर कार्यक्रमों के लिए बुलाए जाते। और बैनरों, पोस्टरों पर लोक कवि के नाम के साथ यादव भी उसी प्रमुखता से लिखा होता। यादव समाज में लोक कवि के लिए एक भावुक भारी स्वीकृति उमड़ने लगी। यादव समाज के कर्मचारी, पुलिस वाले तो आकर बड़ी श्रद्धा से लोक कवि के पांव छू कर छाती फुला लेते और कहते, ‘आपने हमारी बिरादरी का नाम रोशन कर दिया।’ प्रत्युत्तर में लोक कवि विनम्र भाव से बस मुसकुरा देते।

यादव समाज के कई अफसर भी लोक कवि को उन्हीं भावुक आंखों से देखते और हर संभव उनकी मदद करते, उनके काम करते।

कुछ ही समय में लोक कवि का रुतबा इतना बढ़ गया कि तमाम किस्म के लोगों को मुख्यमंत्री से मिलवाने के लिए वह पुल बन गए। छुटभैया नेता, अफसर, ठेकेदार और यहां तक कि यादव समाज के लोग भी मुख्यमंत्री से मिलने के लिए, मुख्यमंत्री से काम करवाने के लिए लोक कवि को संपर्क साधन बना बैठे। अफसरों को पोस्टिंग, ठेकेदारों को ठेका तो वह दिलवा ही देते, कुछ नेताओं को चुनाव में पार्टी का टिकट दिलवाने का आश्वासन भी वह देने लगे। और जाहिर है कि यह सब कुछ लोक कवि की बुद्धि और सामर्थ्य से परे था। परदे के बाहर यह सब करते लोक कवि जरूर थे पर परदे के पीछे तो लोक कवि के पड़ोसी जनपद का वह पत्रकार ही था जिसे चेयरमैन साहब ने लोक कवि से मिलवाया था। और यह सब करके लोक कवि मुख्यमंत्री के करीब सचमुच उतने नहीं हो पाए थे जितना कि उनके बारे में प्रचारित हो गया था। सचमुच में यह सब कर के मुख्यमंत्री के ज्यादा करीब वह पत्रकार ही हुआ था।

लोक कवि तो बस मुखौटा भर बन कर रह गए थे।

इस मुख्यमंत्री ने विभिन्न विधाओं के कलाकारों में पैठ बनाने के मकसद से उन्हें उपकृत करने के लिए एक नए लखटकिया सम्मान की घोषणा की। जिस में दो, पांच और पचास लाख तक की नकद सम्मान राशि समाहित थी। साथ ही संबंधित कलाकार के गृह जनपद या जहां भी उसे सम्मानित किया जाता उसके नाम पर किसी सड़क का भी नाम रखने का प्राविधान रखा। इस सम्मान से कई नामी गिरामी फिल्मी कलाकार, निर्देशक अभिनेता, गायक तो सम्मानित किए ही गए एक सुपरस्टार को मुख्यमंत्री ने अपने गृह जनपद ले जा कर पचास लाख रुपए के पुरस्कार से सम्मानित किया। इस सम्मान समारोह में लोक कवि ने भी कार्यक्रम पेश किया। उनका एक गाना, ‘हीरो बंबे वाला लमका झूठ बोलेला।’ सिर चढ़ कर बोला। और उनकी खूब वाह-वाह हुई।

लेकिन लोक कवि खुश नहीं थे।

लोक कवि का गम यह था कि वह मुख्यमंत्री के करीबी माने जाते थे, उनकी बिरादरी के न हो कर भी उनकी बिरादरी के माने जाते थे। और इससे भी बड़ी बात यह थी कि वह कलाकार भी ख़राब नहीं थे। मुख्यमंत्री की बहुत सारी सभाएं बिना लोक कवि के गायन के शुरू नहीं होती थीं तो भी वह इस लखटकिया सम्मान से वंचित थे। तब जब कि एक माने हुए फिल्म निर्देशक ने तो मुख्यमंत्री को बाकायदा चिट्ठी लिख कर कहा था कि, ‘फलां तारीख़ को मेरा जन्म दिन है चाहूंगा कि आप इस मौके पर मुझे भी सम्मान से नवाज दें।’ और मुख्यमंत्री ने उस फिल्म निर्देशक का अनुरोध मान लिया था। उसे सम्मानित किया था। कहा गया कि यह मुस्लिम तुष्टिकरण है। वह फिल्म निर्देशक मुस्लिम था। पर यह सब कहने सुनने की बातें थीं। सच यह था कि उस फिल्म निर्देशक में सचमुच काबिलियत थी और उसने कम से कम दो लैंड मार्क फिल्में तो बनाई ही थीं। हां, लेकिन मुख्यमंत्री को फिल्म निर्देशक द्वारा चिट्ठी लिख कर अपने को सम्मानित करने का अनुरोध करना जरूर निंदा का विषय था। एक सांध्य दैनिक में फिल्म निर्देशक की इस चिट्ठी की फोटो कापी छप जाने से यह निंदा हुई भी। पर गनीमत यह थी कि यह चिट्ठी एक सांध्य दैनिक में छपी थी सो बात ज्यादा नहीं फैली। लेकिन इस सबसे न सिर्फ इस फिल्म निर्देशक की थू-थू हुई बल्कि इस लखटकिया पुरस्कार की भी ख़ूब छिछालेदर हुई।

लेकिन लोक कवि का इस सब से कुछ लेना देना नहीं था। उन की चिंता यह थी कि इस सम्मान से वह क्यों वंचित हैं।

बाद में तो कई लोग टोकते तो कुछ लोग तंज करने के अंदाज में लोक कवि से पूछने भी लगे, ‘आप कब सम्मानित हो रहे हैं?’ तो लोक कवि खिसियानी हंसी हंस कर टाल जाते। कहते, ‘अरे, मैं तो बहुत छोटा कलाकार हूं!’ पर मन ही मन सुलग जाते।

आखि़र इस सुलगन को विस्तार एक रोज शराब पीते हुए उन्होंने पत्रकार को दिया। पत्रकार टुन्नावस्था को प्राप्त हो रहा था। सब कुछ सुन कर वह उछलते हुए बोला, ‘तो आपने पहले ही क्यों नहीं यह इच्छा बताई?’

‘तो इ सब अब हमको ही बताना पड़ेगा?’ लोक कवि शिकायत करते हुए बोले, ‘आपकी कुछ जिम्मेदारी नहीं है?’ वह तुनके, ‘आपको खुदै यह करा देना था!’

‘हां। भाई करा दूंगा। दुखी मत होइए।’ कह कर पत्रकार ने लोक कवि को सांत्वना दी। फिर कहा कि, ‘बकिर एक काम हमारा भी करवा दीजिएगा।’

‘कोई काम आपका रुका भी है ?’ लोक कवि तरेर कर बोले। वह तनाव में थे भी।

‘लेकिन यह काम थोड़ा दूसरे किसिम का है !’

‘का है ?’ लोक कवि का तनाव थोड़ा-थोड़ा छंटने लगा था।

‘आपके यहां एक डांसर है।’ पत्रकार ने आह भरी और जोड़ा, ‘बड़ी कटीली है। उसके कट्स भी गजब के हैं। बिलकुल नसें तड़का देती है।’

‘अलीशा न !’ लोक कवि ने पत्रकार की नस पकड़ी।

‘नहीं, नहीं !’

‘तो और कवन है हमारे यहां ऐसी कंटीली डांसर जो आप की नसें तड़का दे रही है ?’

‘ऊ जो निशा तिवारी है न !’ पत्रकार सिसकारी भरी आह भरते हुए बोला।

‘त उसको तो भूल जाइए आप।’

‘क्या ?’

‘हां।’

‘तो आप भी लोक कवि ई सम्मान को भूल जाइए।’

‘नाराज काहें हो रहे हैं आप!’ लोक कवि पुचकारते हुए बोले, ‘और भी कई हसीन-हसीन लड़कियां हैं।’

‘नहीं लोक कवि अभी वही चाहिए!’ पत्रकार पूरे रूआब और शराब में बोला।

‘उसमें है का ?’ लोक कवि मनुहार करते हुए बोले, ‘उससे अच्छी तो अलीशा है !’

‘अलीशा नहीं लोक कवि निशा ! निशा कहिए। निशा तिवारी !’

‘चलिए हम मान गए। लेकिन ऊ मानेगी नहीं।’ लोक कवि मन मसोस कर बोले। आखि़र लखटकिया सम्मान की द्रौपदी जीतने का प्रश्न था।

‘क्यों नहीं मानेगी ?’ पत्रकार भड़का, ‘आप तो अभी से काटने में लग गए हैं।’

‘काट नहीं रहा हूं। हकीकत बता रहा हूं।’

‘चलिए आप की ओर से ओ.के. है ?’

‘हां, भाई ओ.के. है।’

‘तो फिर इधर भी डन है।’

‘का डन है ?’ लोक कवि पत्रकार की अंगरेजी समझे नहीं थे।

‘अरे, मतलब आपका सम्मान हो गया।’

‘कहां हुआ, कब हुआ मेरा सम्मान?’ लोक कवि घबराए हुए बोले, ‘सब जबानी-जबानी हो गया!’ वह बुदबुदाए भी कि ‘जब आप को चढ़ जाती है तो अइसेही इकट्ठे दस ठो ताजमहल खड़ा कर देते हैं।’ पर सच यह था कि लोक कवि को भी चढ़ गई थी।

‘काहें घबराते हैं लोक कवि!’ पत्रकार बोला, ‘डन कह दिया तो हो गया।’ वह अटका, ‘मतलब आपका काम हो गया। हो गया समझिए। अब यह मेरी प्रतिष्ठा की बात है कि आपको यह सम्मान दिलवाएं। मुख्यमंत्री साले से कल ही बात करता हूं।’

‘गाली जिन दीजिए!’

‘काहें नहीं दूंगा। बंबई से साले आ-आ कर सम्मान पैसा ढो ले जा रहे हैं और एहीं बैठे हमारे लोक कवि को पूछा ही नहीं।’ वह बहकता हुआ बोला, ‘आज तो गाली दूंगा कल भले ही नहीं दूं।’

‘देखिएगा कहीं गाली गलौज में काम न बिगड़ जाए।’ लोक कवि ने आगाह किया।

‘कहीं काम नहीं बिगड़ेगा। अब आप सम्मानित होने की तैयारी करिए और किसी दिन निशा के इंतजाम की भी तैयारी नहीं भूलिएगा। !’ कह कर पत्रकार ने गिलास में बची शराब खटाक से देह में ढकेली और उठ खड़ा हुआ।

‘अच्छा त प्रणाम !’ लोक कवि सम्मान मिलने की खुशी में भावुक होते हुए बोले।

‘मैं तो जा ही रहा हूं। तो ‘प्रणाम’ काहे कह रहे हैं ?’ पत्रकार बिदकता हुआ बोला। पत्रकार दरअसल लोक कवि द्वारा कहे गए ‘प्रणाम’ के निहितार्थ को अब तक जान चुका था कि लोक कवि अमूमन किसी उपस्थित को टरकाने भगाने की गरज से ‘प्रणाम’ कहते थे।

‘गलती हो गई।’ कह कर लोक कवि ने पत्रकार के पांव छू लिए और बोले, ‘पालागी।’

‘तो ठीक है कल परसों में मुख्यमंत्री से संपर्क साधता हूं। और बात करता हूं।’ पत्रकार चलते हुए बोला, ‘लेकिन आप इसे डन समझिए।’

‘डन ? मतलब का बताए थे आप ?’

‘मतलब काम हो गया समझिए।’

‘आप की किरपा है।’ लोक कवि ने फिर उसके पांव छू लिए।

....जारी....

दयानंद पांडेयउपन्यासकार दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424 और This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है. इसके पहले के भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- LKAGN part one और LKAGN part two


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