अब तो लखनऊ में आर्केस्ट्रा खोल लौंडियों को नचा कर कमा खा रहा

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दयानंद पांडेय: उपन्यास - लोक कवि अब गाते नहीं (7) : और आखि़र तब तक लोक कवि परेशान रहे, बेहद परेशान ! जब तक कि कमलेश मर नहीं गया। कमलेश बंबई में मरा तो विद्युत शवदाह गृह में फूंका गया। इसी तरह  बैंकाक में गोपाल तिवारी भी फूंका गया। लेकिन गांव में तो विद्युत शवदाह गृह नहीं था। तो जब कोइरी, बरई के परिवार वाले मरे तो लकड़ी से उन्हें फूंका जाना था।

घर परिवार में जल्दी कोई तैयार नहीं था उन्हें अग्नि देने को। भय था कि जो फूंकेगा, उसे भी एड्स हो जाएगा। फूंकना तो दूर की बात थी, कोई लाश उठाने या छूने को तैयार नहीं था। बात अंततः प्रशासन तक पहुंची तो जिश्ला प्रशासन ने इन सब को बारी-बारी फूंकने का इंतजाम करवाया। अभी यह सब निपटा ही था कि बैंकाक से लोक कवि के गांव के दो और नौजवान एड्स ले कर लौटे।

यह सब सुन कर लोक कवि से रहा नहीं गया। उन्होंने माथा पीट लिया। चेयरमैन साहब से बोले, ‘ई सब रोका नहीं जा सकता ?’

‘का ?’ चेयरमैन साहब सिगरेट पीते हुए अचकचा गए।

‘कि बैंकाक से आना जाना ही बंद हो जाए हमारे गांव के लोगों का !’

‘तुम अपने गांव के राजदूत हो का ?’ चेयरमैन साहब बोले, ‘कि तुम्हारा गांव कौनो देश है ? भारत से अलग !’

‘त का करें भला ?’

‘चुप मार के बैठ जाओ !’ वह बोले, ‘अइसे जइसे कहीं कुछ हुआ ही न हो!’

‘आप समझते नहीं हैं चेयरमैन साहब !’

‘का नहीं समझते हैं रे ?’ सिगरेट की राख झाड़ते हुए लोक कवि को डपट कर बोले चेयरमैन साहब।

‘बात तनिको जो इधर से उधर हुई तो समझिए कि मार्केट तो गई हमारी !’

‘का तुम हर बात में मार्केट पेले रहते हो !’चेयरमैन साहब बिदकते हुए बोले, ‘ई सबसे मार्केट नहीं जाती। क्योंकि पूरे गांव का ठेका तो तुम लिए नहीं हो। और फिर पंडितों को भी एड्स हो गया। ई बीमारी है, इसमें कोई का कर सकता है ? केहू को दोष देने से तो कुछ होता नहीं !’

‘आप नहीं समझेंगे!’ लोक कवि बोले, ‘आप का समझेंगे? आप तो राजनीति भी कब्बो मेन धारा वाला नहीं किए। तो राजनीतियै का दर्द आप नहीं जानते तो मार्केट का दर्द का जानेंगे आप?’

‘सब जानता हूं!’ चेयरमैन साहब बोले, ‘अब तुम हम को राजनीति सिखाएगा?’ वह किंचित मुसकुरा कर बोले, ‘अरे चनरमा के बारे में जानने के लिए चनरमा  पर जा कर रहना जरूरी है का। या फेर तुम्हारा गाना जानने के लिए, गाना सुनने के लिए गाना गाने भी आए जरूरी है का?’

‘ई हम कब बोले !’

‘त ई का बोले तुम कि राजनीति का मेन धारा !’ वह बोले, ‘अब हमारी पार्टी का सरकार नहीं है तब भी हम चेयरमैन हूं कि नाहीं ?’ उन्होंने खुद ही जवाब भी दिया, ‘हूं न? तो ई राजनीति नहीं तो का है बे?’

‘ई तो है!’ कह कर लोक कवि ने हाथ जोड़ लिया।

‘अब सुनो !’ चेयरमैन साहब बोले, ‘जब-तब मार्केट-मार्केट पेले रहते हो तो जानो कि तुम्हारा मार्केट कैसे ख़राब हो रहा है ?’

‘कैसे ?’ लोक कवि हकबकाए।

‘ई जो यादव राज में यादव मुख्यमंत्री के साथ तुम नत्थी हो गए!’ वह बोले, ‘ठीक है तुमको बड़का सरकारी इनाम मिल गया, पांच लाख रुपया मिल गया,  तुम्हारे नाम पर सड़क हो गया! यहां तक तो ठीक है। पर तुम एक जाति, एक पार्टी विशेष के गायक बन कर रह गए हो।’ वह उदास होते हुए बोले, ‘अरे, तुम्हारे  लोक गायक को मारने के लिए ई आर्केस्ट्रा कम पड़ रहा था कि तुम वहां भी नत्थी हो कर मरने के लिए चले गए पतंगा के मानिंद!’

‘हां, ई नोकसान तो हो गया।’ लोक कवि बोले, ‘मुख्यमंत्री जी की सरकार जाने का बाद तो हमारा पोरोगराम कम हो गया है। सरकारी पोरोगरामों में भी अब हम को उनका आदमी बता कर हमारा नाम उड़ा देते हैं !’

‘तब ?’

‘त अब का करें ?’

‘कुछ मत करो ! सब समय और भगवान के हवाले छोड़ दो !’

‘अब यही करना ही पड़ेगा !’ लोक कवि उन के पांव छूते हुए बोले।

‘अच्छा ये बताओ कि तुम्हारे भाई के जिस बेटे को एड्स हुआ था उस के बाल बच्चे हैं ?’

‘अरे नाहीं, उस का तो अभी बियाह नहीं हुआ था।’ वह हाथ जोड़ते हुए बोले, ‘अब की साल तय हुआ था। पर ससुरा बिना बियाह के मर गया ! भगवान ने ई बड़ा भारी उपकार किया।’

‘और ऊ बरई के बच्चे हैं ?’

‘हां, एक ठो बेटा है। घर वाले देख रहे हैं।’ लोक कवि बोले, ‘और ऊ  कोइरी के भी दो बच्चे हैं घर वाले देख रहे हैं।’

‘इन बच्चों को तो एड्स नहीं न है ?’

‘नहीं।’ लोक कवि बोले, ‘इन सबों के मर मरा जाने के बाद शहर के डाक्टर आए थे। इन बच्चों का ख़ून ले जा कर जांचे थे। सब सही निकले। किसी को एड्स नहीं है।’

‘और ऊ पंडितवा के बच्चों को ?’

‘उन को भी नहीं।’

‘पंडितवा के कितने बच्चे हैं ?’

‘एक ठो बेटी, एक ठो बेटा।’

‘पंडितवा का बाप तो जेल में है और पंडितवा अपनी बीवी समेत मर गया तो उस के बच्चों की देखभाल कौन कर रहा है ?’

‘बूढ़ा !’

‘कौन बूढ़ा ?’

‘पंडित जी तो बेचारे बुढ़ौती में निरपराध जेल काट रहे हैं, उन की बूढ़ा पंडिताइन बेचारी बच्चों को जिया रही हैं।’

‘ऊ  न्यौता खा कर पेट जियाने वाले पंडित के घर का खर्चा-बर्चा कैसे चल रहा है ?’

‘राम जाने !’ लोक कवि सांस लेते हुए बोले, ‘कुछ समय तो बैंकाक की कमाई चली ! अब सुनता हूं गांव में कब्बो काल चंदा लग जाता है। कोई अनाज, कोई  कपड़ा, कोई कुछ पैसा दे देता है !’ वह बोले, ‘भीख समझिए! कोई दान तो देता नहीं है। दूसरे, लड़की भी अब बियाहने लायक हो रही है ! राम जाने कइसे शादी होगी उस की।’ लोक कवि बोले, ‘जाने उस का बियाह हो पाएगा कि बाप की राह चल कर रंडी हो जाएगी !’ लोक कवि रुके और बोले, ‘बताइए बेचारे पंडित जी एतना धरम करम वाले थे, एक न्यौता खाना छोड़ के कोई ऐब नहीं था। बकिर जाने कौन जनम का पाप काट रहे हैं। एह जनम में तो कौनो पाप ऊ किए नाहीं। लेकिन लड़का एह गति मरा कलंक लगा कर और अपने बेकसूर हो कर भी बेचारे जेल काट रहे हैं !’

‘तुम पाप-पुण्य में विश्वास करते हो ?’

‘बिलकुल करता हूं !’

‘तो एक पुण्य कर डालो !’

‘का ?’

‘उस ब्राह्मण की बेटी के बियाह का खर्चा उठा लो !’

‘का ?’

‘हां, तुम्हारे कोई बेटी है भी नहीं।’ चेयरमैन साहब बोले, ‘बेसी पैसा मत खर्च करो। पचीस-पचास हजार जो तुम्हारी श्रद्धा में रुचे जा के बुढ़िया पंडिताइन को दे दो यह कह कर कि बिटिया का बियाह कर दीजिए!’ वह बोले, ‘मैं भी कुछ दस-पांच हजार कर दूंगा। हालांकि पचास साठ हजार में लड़की की शादी तो नहीं होती आज कल लेकिन उत्तम मद्धिम कुछ तो हो ही जाएगी।’ वह बोले, ‘नहीं, अभी तुम्हीं कह रहे थे कि बियाह नहीं हुआ तो बाप की राह चल कर रंडी हो जाएगी !’

चेयरमैन साहब बोले, ‘तुम यह सोच लो कि उसे रंडी की राह नहीं जाने देना है। तुम कुछ करो, कुछ मैं भी करता हूं, दो चार और लोगों से भी कहता हूं बाकी उसका नसीब!’

‘बाकी गांव में एह तर समाज सेवा करुंगा तो बिला जाऊंगा।’ लोक कवि संकोच घोलते हुए बोले, ‘हर घर में कोई न कोई समस्या है। तो हम किसका-किसका मदद करुंगा ? जिसका करुंगा, ऊ खुस हो जाएगा, जिसको मना करूंगा ऊ दुसमन हो जाएगा !’ वह बोले, एह तर तो सगरो गांव हमारा दुसमन हो जाएगा !’

‘इस पुण्य काम के लिए तुम पूरी दुनिया को दुश्मन बना लो।’ चेयरमैन साहब बोले, ‘और फिर कोई जरूरी है कि तुम यह मदद डंका बजा कर करो। चुपचाप कर दो। गुप-चुप ! कोई जाने ही ना !’ वह बोले, ‘दुनिया भर की रंडियों पर पैसा उड़ाते हो तो एक लड़की को रंडी बनने से बचाने के लिए कुछ पैसा खर्च कर के देखो।’

चेयरमैन साहब लोक कवि की नस पकड़ते हुए बोले, ‘क्या पता इस लड़की के आशीर्वाद से, इस के पुण्य से ही, तुम्हारी लड़खड़ाती मार्केट संभल जाए!’ वह बोले, ‘कर के देखो ! इस में सुख भी मिलेगा और मजा भी आएगा।’ फिर वह तंज करते हुए भी बोले, ‘न हो तो ‘मिसिराइन’ से भी मशविरा ले लो। देखना वह भी इसके लिए मना नहीं करेंगी।’

लोक कवि ने मिसिराइन से मशविरा तो नहीं किया पर लगातार इस बारे में सोचते रहे और एक दिन अचानक चेयरमैन साहब को फोन मिला कर बोले, ‘चेयरमैन साहब हम पचास हजार रुपया खर्चा काट-काट के जोड़ लिया हूं !’

‘किस लिए बे ?’

‘अरे, उस ब्राह्मण की बेटी को रंडी बनने से बचाने के लिए!’ लोक कवि बोले, ‘भूल गए का आप ? अरे, उस की शादी के लिए! आप ही तो बोले थे!’

‘अरे, हां भाई मैं तो भूल ही गया था !’ वह बोले, ‘चलो तुम पचास दे रहे तो पंद्रह हजार मैं भी दे दूंगा। दो एक और लोगों से भी दस बीस हजार दिलवा दूंगा!’ वह बोले, ‘कुछ और मैं करता लेकिन हाथ इधर जरा तंग है, पत्नी की बीमारी में खर्चा ज्यादा हो गया है। फिर भी तुम जिस दिन कहोगे, पैसा दे दूंगा। इतना पैसा तो अभी हमारे पास है। किसी लौंडे का भेज कर मंगवा लो !’

‘ठीक बा चेयरमैन साहब !’ कह कर लोक कवि ने पंद्रह हजार रुपए उन के यहां से मंगवा लिए। दो जगह से पांच-पांच हजार और एक जगह से दस हजार रुपए चेयरमैन साहब ने दिलवा दिए। इस तरह पैंतीस हजार रुपए यह और पचास हजार रुपए अपने मिला कर यानी कुल पचासी हजार रुपए ले जा कर लोक कवि ने पंडिताइन को दिए। यह कर कर कि, ‘पंडित जी के बड़े उपकार हैं हम पर। नतिनी के बियाह ख़ातिर ले लीजिए! ख़ूब धूमधाम से शादी कीजिए!’

पर पंडिताइन अड़ गईं। पैसा लेने से इंकार कर दिया। बताया कि पंडित जी ने तुम पर का उपकार किया हम नहीं जानते। पर ई तुम्हारा एहसान भी हम नहीं लेंगे। वह सिर पर पल्लू खींचती हुई बोलीं, ‘गांव का कही भला ? केकर-केकर ताना सुनब !’ वह बोलीं, ‘बेटवा के कलंक क ताना अबहिन ले नइखै ख़त्म भइल। त अब नतिनी ख़ातिर ताना हम नाई सुनब।’ वह बोलीं, ‘ताना सुनले के पहिलवैं कुआं में कूद के मरि जाब !’ कह कर वह रोने लगीं। बोली, ‘पंडित जी बेचारे जेल भले भुगत रहल बाटैं बकिर उन के केहु कतली नइखै कहत। सब कहला जे उन्हें गलत फंसावल गइल बा ! त उन का इज्जत से हमरो इज्जत रहे ले। बकिर बेटा बट्टा लगा गइल त करम फूट गईल !’ कह कर पंडिताइन फिर रोने लगीं।....बोलीं, ‘एतना रुपया हम राखब कहां ? हम नाई लेब !’

‘आखि़र समस्या का है ?’

‘समस्या ई है कि सुनेलीं तू लड़किन क कारोबार करेला और हमार नतिनी ई कारोबार नाहीं करी। ऊ नाईं नाची कूदी तोहरे कारोबार में !’

सुन कर लोक कवि तो एक बार सकते में आ गए। पर बोले, ‘आप के नतिनी के हम कहीं ले नहीं जाऊंगा।’ लोक कवि पंडिताइन की मुश्किल समझते हुए बोले, ‘शादी भी आप अपनी मर्जी से जहां चाहिएगा, जइसे चाहिएगा तय कर के कर लीजिएगा। पर ई पैसा रख लेईं आप। कामे आई !’ कह कर लोक कवि ने पंडिताइन के पैरों पर अपना सिर रख दिया, ‘बस ब्राह्मण देवता क आशीर्वाद चाहीं !ऽ

पर पंडिताइन अड़ी रहीं तो अड़ी रहीं। पैसा लेना तो दूर, छुआ भी नहीं।

लोक कवि दुखी मन से वापस आ गए।

चेयरमैन साहब के घर जा कर उन को उनका पैसा वापस करने लगे। तो चेयरमैन साहब भड़के, ‘ई का हो गया है रे तुम को !’

‘कुछ नाहीं।’ लोक कवि उदास हो कर बोले, ‘दरअसल हमारा गांव हम को समझ नहीं पाया !’

‘हुआ का ?’

‘तब की सम्मान के बाद गया था तो लोग नचनिया पदनिया कहने लगे थे!’

‘अब की का हुआ ?’ चेयरमैन साहब लोक कवि की बात बीच में ही काटते हुए बोले।

‘अब की लड़कियों का दलाल बन गया !’ कह कर लोक कवि रोए तो नहीं पर क्षुब्ध हो गए।

‘कौन बोला तुम्हें लड़कियों का दलाल ? उस का ख़ून पी जाऊंगा !’ चेयरमैन साहब उत्तेजित होते हुए बोले।

‘नहीं कोई एकदमै से दलाल शब्द नहीं बोला !’

‘तो ?’

‘पर ई कहा कि मैं लड़कियों का कारोबार करता हूं।’ लोक कवि निढाल होते हुए बोले, ‘सीधे-सीधे इस का मतलब दलाल ही तो हुआ ?’

‘कौन बोला कि तुम लड़कियों का कारोबार करते हो ?’ चेयरमैन साहब की उत्तेजना जारी थी।

‘और कौन !’ लोक कवि बोले, ‘वही पंडिताइन बोलीं। और ई पैसा लेने से इंकार कर दिया।’’

‘क्यों ?’

‘पंडिताइन बोलीं कि सुना है तुम लड़कियों का कारोबार करते हो और हमारी नतिनी ई कारोबार नहीं करेगी !’ लोक कवि खीझते हुए बोले, ‘बताइए हम लोग सोचे थे कि उस को गरीबी के फेर में रंडी बनने से बचाया जाए और पंडिताइन ने उलटे हम पर ही आरोप लगा दिया कि हम उन की नतिनी को रंडी बना देंगे !’ वह बोले, ‘तो भी हम बुरा नहीं माने। ई सोच के कि पुण्य के काम में बाधा आती है। तो इस को बाधा मान कर टाल गए। फिर हम यह भी बताए कि उन की नतिनी को हम कहीं ले नहीं जाएंगे और कि बियाह भी ऊ अपनी मर्जी से जहां चाहें करें। हम से कोई मतलब नहीं। उन के पैरों पर सिर रख कर कहा भी कि बस ब्राह्मण देवता क आशीर्वाद चाही !’

‘निरे बऊड़म हो तुम !’ चेयरमैन साहब बोले, ‘देवी को देवता कहोगे और आशीर्वाद मांगोगे तो कौन देगा?’

‘एहमें का गलत हो गया ?’ लोक कवि दरअसल चेयरमैन साहब की देवी देवता वाली बात समझे नहीं।

‘चलो कुछ भी गलत नहीं किया तुम ने !’ वह बोले, ‘गलती हम से हो गई जो एह काम ख़ातिर तुम को अकेले भेज दिया।’

‘तो का अब आप चलेंगे ?’

‘हां हम भी चलेंगे और तुम भी चलोगे।’ वह बोले, ‘लेकिन दस बीस दिन रुक कर।’

‘हम तो नहीं जाएंगे चेयरमैन साहब !’ लोक कवि बोले, ‘जब गांव जाता हूं बेइज्जत हो जाता हूं।’

‘देखो, नेक काम के लिए बेइज्जत होने में कोई बुराई नहीं है। एक नेक काम को हाथ में लिया है तो उसे पूरा कर के छोड़ो।’ वह बोले, ‘फिर तुम हर बात में इज्जत बेइज्जत मत ढूंढ़ा करो ! उस बार नचनिया पदनिया पर दुखी हो गए तुम। सम्मान का सारा मजा ख़राब कर दिया।’ वह जरा रुके और बोले, ‘ई बताओ कि तुम अमिताभ बच्चन को कलाकार मानते हो!’

‘हां, बहुत बड़े कलाकार हैं वह !’

‘तुम से भी बड़े हैं ?’ चेयरमैन साहब मजा लेते हुए बोले।

‘अरे हम कहां चेयरमैन साहब, और कहां ऊ ! काहें मजाक उड़ाते हैं।’

‘चलो किसी को तो तुमने अपने से बड़ा कलाकार माना !’ चेयरमैन साहब बोले, ‘तो यही अमिताभ बच्चन जब 1984 में इलाहाबाद से चुनाव लड़ा बहुगुणा के खि़लाफ तो क्या अख़बार, क्या नेता सभी यही कहते रहे कि नचनिया पदनिया है चुनाव का जीतेगा। हां, थोड़ा नाच कूद लेगा। लेकिन उस ने बहुगुणा जैसे दिग्गज को जब धूल चटा दिया, चुनाव हरा दिया तो लोगों के मुंह बंद हो गए।’ चेयरमैन साहब बोले, ‘तो जब इतने बड़े कलाकार को यह जमाना नचनिया पदनिया कह सकता है तो तुम्हें क्यों नहीं कह सकता ?’ वह बोले, ‘फिर वह इलाहाबाद जहां अमिताभ बच्चन का घर है वह अपने को इलाहाबादी मानता है और इलाहाबाद वाले उसे नचनिया पदनिया। तो भी वह बुरा नहीं माना। क्योंकि वह बड़ा कलाकार है। सचमुच में बड़ा कलाकार। उसमें बड़प्पन है।’ वह बोले, ‘तुम भी अपने में बड़प्पन लाओ और तनिक और विनम्रता सीखो !’

‘बाकि पंडिताइन....!’

‘कुछ नहीं पंडिताइन ने तुम को कुछ नहीं कहा। वह तो अपनी नतिनी की हिफाजत भर कर रही हैं। उस में कुछ भी बुरा मानने की बात नहीं है।’ वह बोले, ‘दस बारह रोज बाद मैं चलूंगा तुम्हारे साथ तब बात करना। अभी घर जाओ आराम करो, रिहर्सल करो और ई सब भूल जाओ !’

और सचमुच लोक कवि चेयरमैन साहब के साथ कुछ दिन बाद इस नेक अभियान पर एक बार फिर निकले। चेयरमैन साहब ने जरा युक्ति से काम लिया। पहले वह लोक कवि को साथ ले कर जेल गए। वहां पंडित भुल्लन तिवारी से मिले। पंडित जेल में थे जरूर पर माथे पर उन के तेज था। विपन्नता की चुगली उनका रोआं-रोआं कर रहा था पर वह कातिल नहीं हैं, यह भी उनका चेहरा बता रहा था। वह कहने लगे, ‘दो जून भोजन के लिए जरूर मैं इधर-उधर जाता था पर किसी अन्यायी के सामने, किसी स्वार्थ, किसी छल के लिए शीश झुका दूं यह मेरे खून में नहीं है, न ही मेरे संस्कार में।’ वह बोले, ‘रही अन्याय-न्याय की बात तो यह तो ऊपर वाले के हाथ है। मैं खूनी हूं कि नहीं इस का इंसाफ तो अब ऊपर की ही अदालत में होगा। बाकी रही इस जेल के अपमान की बात तो जरूर कहीं मेरे किसी पाप का ही यह फल है।’ साथ ही उन्होंने जोड़ा, ‘और यह भी जरूर मेरे किसी पाप का ही कुफल था कि गोपाल जैसा कुलंकी वंश मेरी कोख से जनमा !’ यह कहते हुए उन की आंखें डबडबा आईं। गला रुंध गया। फिर वह फफक कर रो पड़े।

‘मत रोइए!’ कह कर लोक कवि ने उन्हें सांत्वना दी और हाथ जोड़ कर कहा कि, ‘पंडित जी एक ठो विनती है, मेरी विनती मान लीजिए!’

‘मैं अभागा पंडित क्या तुम्हारी मदद कर सकता हूं ?’

‘आशीर्वाद दे सकते हैं।’

‘वह तो सदैव सब के साथ है।’ वह रुके और बोले, ‘पर इस अभागे के आशीर्वाद से क्या तुम्हारा बन सकता है ?’

‘बन सकता है पंडित जी !’ लोक कवि बोले, ‘पहले बस अब आप हां कह दीजिए।’

‘हां है, बोलो !’

‘पंडित जी एक ब्राह्मण कन्या का विवाह करवाने का पुण्य पाना चाहता हूं।’ वह बोले, ‘बियाह आप लोग अपने समाज में अपनी मर्जी से तय कीजिए। बाकी खर्चा बर्चा हमारे ऊपर छोड़ दीजिए।’

‘ओह समझा !’ भुल्लन पंडित बोले, ‘तुम मुझ पर उपकार करना चाहते हो!’ यह कहते हुए भुल्लन पंडित तल्ख़ हो गए। बोले, ‘पर किस खुशी में भाई ?’

‘कुछ नहीं पंडित जी यह मूर्ख है !’ चेयरमैन साहब बोले, ‘यह नाच गा कर तो बड़ा नाम गांव कमा चुका है और अब कुछ समाज सेवा करना चाहता है। एक पंथ दो काज। ब्राह्मण का आशीर्वाद और पुण्य दोनों चाहता है।’ वह बोले, ‘मना मत कीजिएगा !’

‘पर यह तो पंडिताइन ही बताएंगी।’ तौल-तौल कर बोलते हुए भुल्लन पंडित बोले, ‘घर गृहस्थी तो अब वही देख रही हैं। मैं तो कैदी हो गया हूं।’

‘लेकिन मीर मालिक तो आप ही हैं पंडित जी !’

‘था।’ वह बोले, ‘अब नहीं। अब कैदी हूं।’

मुलाकात का समय भी ख़त्म हो चुका था। भुल्लन पंडित के पांव छू कर दोनों जेल से बाहर आ गए।

‘घर में भूजी भांग नाईं, दुआरे हरि कीर्तन !’

‘का हुआ रे लोक कवि ?’

‘कुछ नाई। ई पंडितवे एतना अड़ियाते काहें हैं ? मैं आज तक नहीं समझ पाया।’ लोक कवि बोले, ‘रस्सी जल गई, ऐंठन नहीं गई। जेल में नरक भुगत रहे हैं, पंडिताइन भूखों मर रही हैं। खाने के लिए गांव में चंदा लग रहा है पर हमारा पैसा नहीं लेंगे।’ लोक कवि खीझते हुए बोले, ‘‘घीव दै बाभन नरियाय! कहां फंसा दिए चेयरमैन साहब। अब जाने भी दीजिए। ई पैसा कहीं और दान दे देंगे। बहुत गरीबी है। पैसा लेने ख़ातिर लोग मार कर देंगे।’’

‘घबराते काहें हो!’ चेयरमैन साहब बोले, ‘धीरज रखो जरा!’

फिर चेयरमैन साहब लोक कवि के घर पहुंचे। लोक कवि का घर क्या था पूरी सराय थी। वह भी लबे सड़क। दरअसल लोक कवि से गांव के लोगों के जलने का एक सबब उन का यह पक्का मकान भी था। छोटी जाति के व्यक्ति का ऐसा बड़ा पक्का मकान बड़ी जाति के लोगों को तो खटकता ही था छोटी जाति के लोगों को भी हजम नहीं होता था। चेयरमैन साहब ने भी इस बात पर अबकी दफा गशैर किया। बहरहाल, थोड़ी देर बाद वह लोक कवि को उन के घर पर ही छोड़ कर अकेले उन के गांव में निकले। कुछ जिम्मेदार लोगों से जिन को वह जानते भी नहीं थे, उन से मिले। उन का मन टटोला। फिर अपना मकसद बताया। बताया कि इस के पीछे कुछ और नहीं बस मन में आई मदद की मंशा है। फिर इन लोगों को ले कर लोक कवि के साथ वह भुल्लन तिवारी के घर गए। पंडिताइन से मिले। उन की खुद्दारी को मान दिया। बताया कि जेल में पंडित जी से भी वह लोग मिले थे। अपनी मंशा बताई थी तो पंडित जी ने सब कुछ आप के ऊपर छोड़ दिया है। फिर उन से चिरौरी करते हुए कहा कि, ‘रउरा मान जाईं त समझीं कि हमन के गंगा नहा लेहलीं।’ पंडिताइन कुछ बोलीं नहीं। थोड़ी देर तक सोचती रहीं फिर बिन बोले आंखों ही आंखों में बात गांव के लोगों पर छोड़ दिया। गांव के एक बुजुर्ग बोले, ‘पंडिताइन भौजी एहमें कौनो हरजा नइखै!’

‘जइसन भगवान क मर्जी!’ हाथ ऊपर उठाती हुई पंडिताइन बोलीं, ‘अब ई गांव भर क बेटी है!’

लेकिन पैसा पंडिताइन ने नहीं लिया। बताया कि जब शादी तय हो जाएगी तभी पैसे के बारे में देखा जाएगा। फिर गांव के ही दो लोगों की सुपुर्दगी में वह पचासी हजार रुपए रखवा दिए गए। दो तीन और लोगों ने शादी खोजने का जिम्मा लिया। सब कुछ ठीक-ठाक कर लोक कवि और चेयरमैन साहब वहां से उठे। चलते-चलते लोक कवि ने पंडिताइन के पैर छुए। कहा कि, ‘शादी में हमहूं के बोलावल जाई!’

‘अ काहें नाहीं!’ पंडिताइन पल्लू ठीक करती हुई बोलीं।

‘एतने ले नाहीं। कुछ औरो उत्तम मद्धिम, घटल बढ़ल होई, ऊहो बतावल जाई!’

‘अच्छा, मोहन बाबू!’ पंडिताइन की आंखों में कृतज्ञता थी।

लोक कवि अपने गांव से जब लखनऊ के लिए चले तो उन्हें लग रहा था कि सचमुच बड़े पुण्य का काम हो गया। वह ऐसा कुछ चेयरमैन साहब से बुदबुदा कर बोले भी,

‘सचमुच आज बड़ा खुशी का दिन है!’

‘चलो भगवान की दया से सब कुछ ठीक-ठाक हो गया!’ चेयरमैन साहब बोले। और ड्राइवर से कहा कि, ‘लखनऊ चलो भाई!’

लेकिन इस पूरे प्रसंग पर अगर कोई एक सब से ज्यादा उद्वेलित था, सब से ज्यादा दुखी था तो वह था लोक कवि का छोटा भाई जो कमलेश का पिता था। कमलेश के पिता को लगता था कि कमलेश की मौत का अगर कोई जिम्मेदार था तो वह गोपाल था। और उसी गोपाल की बेटी को ब्याहने को बेमतलब का खर्चा उस का बड़ा भाई मोहन कर रहा था जो अब लोक कवि बन कर इतरा रहा था। कमलेश के पिता को यह सब फूटी आंख नहीं सुहा रहा था। पर वह विवश था और चुप था। और उस का ही बड़ा भाई उस की छाती पर मूंग दल रहा था। नाम गांव कमाने के लिए। पर इधर लोक कवि मगन थे। मगन थे अपनी सफलता पर। कार में चलते हुए ठेका ले-ले कर वह कोई अपना ही गाना भी गुनगुना रहे थे। सांझ घिर आई थी। डूबते हुए सूरज का लाल गोला दूर आसमान में तिर रहा था।

लेकिन वो कहते हैं न कि ‘बड़-बड़ मार कोहबरे बाकी!’

वही हुआ।

सिर्फ पैसे भर से किसी का शादी ब्याह तय हो जाता तो फिर क्या बात होती? लोक कवि और चेयरमैन साहब पैसा दे कर निश्चिंत हो गए। पर बात सचमुच में निश्चिंत होने की थी नहीं। भुल्लन पंडित की नतिनी की शादी इतनी आसानी से होने वाली थी नहीं। बाप गोपाल का कलंक अब बेटी के सिर डोल रहा था। शादी के लिए वर पक्ष से सवाल शुरू होने के पहले ही एड्स का सवाल दौड़ कर खड़ा हो जाता। कहीं भी लोग जाते चाहे गांव के लोग होते या रिश्तेदार उन से पूछा जाता कि, ‘आप बेटी के पिता हैं, भाई हैं, क्या हैं ?’ लोग बताते कि, ‘नहीं गांव के हैं, पट्टीदार हैं, रिश्तेदार हैं।’ तो सवाल उठता कि, ‘भाई, पिता कहां हैं?’ बताया जाता कि पिता का निधन हो गया है और कि....! अभी बात पूरी भी नहीं होती कि वर पक्ष के लोग खुद ही बोल पड़ते, ‘अच्छा-अच्छा ऊ एड्स वाले दोखी कलंकी गोपला की बेटी है!’ वर पक्ष के लोग जोड़ते, ‘ऊ गोपाल जिस का बाप भी कतल के जुर्म में जेल काट रहा है ?’

रिश्तेदार, पट्टीदार जो भी होता निरुत्तर हो जाता। एकाध लोग तर्क भी देते कि इसमें लड़की का क्या दोष ? लेकिन एड्स जैसे भारी शब्द के आगे सारे तर्क पानी हो जाते। और वर पक्ष के लोग कसाई।

फिर गांव में एक विलेज बैरिस्टर थे। नाम था गणेश तिवारी। ऐसी बात जहां न भी पहुंची हो गणेश तिवारी पूरा चोखा चटनी लगा कर पहुंचाने में पूरी प्रवीणता हासिल रखते थे। न सिर्फ बात पहुंचाने की प्रवीणता हासिल रखते थे बल्कि बिना सुई, बिना तलवार, बिना छुरी, बिना धार वह किसी भी का सर कलम कर सकते थे, उस को समूल नष्ट कर सकते थे। और ऐसे कि कटने वाला तड़प भी न सके, मिटने वाला उफ्फ भी न कर सके। वह कहते, ‘वकील लोग वैसे ही थोड़े किसी को फांसी लगवा देते हैं।’ वह वकीलों के गले में बंधे फीते को इंगित करते हुए कहते, ‘अरे, पहले गटई में खुद फंसरी बांधते हैं फिर फांसी लगवाते हैं!’ फिर गणेश तिवारी बियाह काटने में तो इतना पारंगत थे जितना किसी के प्राण लेने में यमराज। वह किसी भी ‘वर’ को मिर्गी, दमा, टी.वी., जुआरी, शराबी वगैरह वगैरह गुणों से विभूषित कर सकते थे। ऐसे ही वह किसी भी कन्या का भले ही उसे मासिक धर्म भी न शुरू हुआ हो तो क्या दो, चार गर्भपात करवा सकते थे। इस निरापद भाव, इस तटस्थता, इस कुशलता और इस निपुणता के साथ कि वह भले ही आप की बेटी या बेटा क्यों न हो, एक बार तो आप भी मान ही लें। इस मामले में उनके दो चार नहीं ढेरों, सैकड़ों किस्से गांव जवार में किंवदंती बन चले थे। इतना कि जैसे कोई शुभ काम शुरू करने के पहले लोग ‘ऊं गणेशाय नमः’ कर के श्री गणेश करते थे ताकि कोई विघ्न बाधा नहीं पड़े ठीक वैसे ही यहां लोग शादी ब्याह का लगन निकालने ख़ातिर पंडित और उनके पंचांग को बाद में देखते, पहले यह देखते कि गणेश तिवारी किस तिथि को गांव में नहीं होंगे !

फिर भी जाने लोगों का दुर्भाग्य होता कि गणेश तिवारी के गांव में आने का दुर्निवार संयोग वह अचानक ऐन मौके पर प्रकट हो जाते। ऐसे कि लोगों के दिल धकधका जाते।

तो गणेश तिवारी का दुर्निवार संयोग भुल्लन तिवारी के बेटे गोपला की बेटी की शादी काटने में भी खादी का जाकेट पहन कर, टोपी लगा कर कूद पड़ा। ख़ास कर तब और उनके नथुने फड़फड़ा उठे जब उन्हें पता चला कि लोक कविया इसमें पैसा कौड़ी खर्च कर रहा है। लोक कविया को वह अपना शिष्य मानते थे। इस लिहाज से कि गणेश तिवारी खुद भी गवैया थे। एक कुशल गवैया। और चूंकि गांव में वह सवर्ण थे सो श्रेष्ठ भी थे और उम्र में भी लोक कवि से वरिष्ठ थे लेकिन चूंकि जाति से ब्राह्मण थे सो शुरू में वह गांव-गांव, गली-गली घूम-घूम कर नहीं गा पाए। चुनावी सभाओं में नहीं जा पाए गाना गाने। जब कि लोक कवि के लिए ऐसी कोई पाबंदी न पहले थे, न अब थी। और अब तो ऐसी पाबंदी गणेश तिवारी ने भी तोड़ दी थी। रामलीलाओं और कीर्तनों में गाते-बजाते अब वह ठाकुरों, ब्राह्मणों की शादियों में महफिल सजाने लगे थे। बाकायदा सट्टा लिखवा कर। पर बहुत बाद में। इतना कि जिले जवार से ज्यादा कोई उन्हें जानता भी नहीं था। तब जब कि इस उमर में भी भगवान ने उन के गले में सुर की मिठास, कशिश और गुण बख़्श रखा था। लोक कवि की तरह गणेश तिवारी के पास कोई आर्केस्ट्रा पार्टी नहीं थी, न ही साजिंदों का भारी भरकम बेड़ा। वह तो बस खुद हारमोनियम बजाते और ठेका लगाने के लिए एक ढोलक बजाने वाला साथ रखते। जो ब्राह्मण ही था। वह ढोलक बजाता और बीच-बीच में गणेश तिवारी को ‘रेस्ट’ देने की गरज से लतीफागोई भी करता। जिनमें ज्यादातर नानवेज लतीफे होते धुर गंवई स्टाइल के। लेकिन ये लतीफे सीधे-सीधे अश्लीलता छूने के बजाय सिर्फ संकेत भर देते सो ‘ब्राह्मण समाज’ में ‘खप-पच’ जाते। जैसे कि एक लतीफा वह अकसर ही सुनाते कि, ‘बलभद्दर तिवारी बड़े ही मजाकिया थे। पर वह अपने छोटे साले से कभी मजाक नहीं करते थे। छोटे साले को यह शिकायत हरदम बनी रहती कि, ‘जीजा हमसे मजाक क्यों नहीं करते?’

लेकिन जीजा अकसर टाल जाते। पर यह उलाहना जब ज्यादा चढ़ गया तो एक बार रात के खाने के समय बलभद्दर तिवारी ने यह उलाहना उतारने की ठानी। उन का दुआर बहुत बड़ा था। और सामने कुआं भी। कुएं के पास ही उन्होंने मिर्च के कुछ पौधे लगा रखे थे। सो खाने के पहले ही उन्होंने साले को बताया कि, ‘एक बड़ी समस्या है इस मिर्च की रखवाली।’

‘क्यों ?’ साले ने जिज्ञासा जताई।

‘क्योंकि एक औरत परकी हुई है। ज्यों मैं रात खाना खाने जाता हूं वह मिर्चा तोड़ने आ जाती है।’

‘यह तो बड़ा गड़बड़ है।’ साला बोला।

‘पर आज मिर्चा बच सकता है और जो तुम साथ दो तो उस औरत को पकड़ा जा सकता है।’

‘कैसे भला?’

‘वो ऐसे कि हम लोग आज बारी-बारी खाएं।’ बलभद्दर तिवारी बोले, ‘पहले तुम खा लेना, फिर मैं खाने जाऊंगा।’

‘ठीक बा जीजा !’

‘पर वह औरत बड़ी सुंदर है। उसके झांसे में मत आ जाना।’

‘अरे, नहीं जीजा !’

फिर तय बात के मुताबिक साले ने पहले खाना खा लिया। फिर बलभद्दर तिवारी खाने खाना गए। खाते-खाते वह पत्नी से बोले कि, ‘जरा टटका हरा मिर्च कुएं पर से तोड़ लाओ।’

पत्नी ने भाई की उपस्थिति के बहाने टाल मटोल की तो बलभद्दर तिवारी बोले, ‘पिछवाड़े के दरवाजे से चली जाओ।’

पत्नी मान गई। चली गई पिछवाड़े के दरवाजे से मिर्चा तोड़ने। इधर उन के भाई भी ‘सुंदर’ औरत को पकड़ने की फिराक में उतावले बैठे थे। मिर्चा तोड़ती औरत को देखते ही वह कूद पड़े और उसे कस कर पकड़ लिया। न सिर्फ पकड़ लिया उसके स्त्री अंगों को जहां तहां दबाने सहलाने भी लगे। दबाते-सहलाते चिल्लाने भी लगे, ‘जीजा-जीजा! पकड़ लिया। पकड़ लिया चोट्टिन को।’

जीजा भी आराम से लालटेन लिए पहुंचे। तब तक साले साहब औरत को भरपूर दबा-वबा चुके थे। पर लालटेन के उजाले में अपनी बहन को पहचान कर उन पर घड़ों पानी पड़ चुका था। बहन जी बड़ी लज्जित हुईं पर यह जरूर समझ गईं कि यह सारी कारस्तानी उन के मजाकिया पतिदेव की ही है। वे तंज करती हुई बोलीं, ‘आप को भी यह सब क्या सूझता है?’ वह बोलीं, ‘भाई-बहन को भी नहीं छोड़ते आप?’

‘कइसे छोड़ते?’ बलभद्दर तिवारी बोले, ‘तुम्हारे इस भाई को बड़ी शिकायत थी कि आप हमसे कोई मजाक क्यों नहीं करते सो सोचा कि सूखा-सूखा क्या करूं, प्रैक्टिकल मजाक कर दूं। सो आज इनकी शिकायत भी दूर कर दी।’ कहते हुए वह साले की तरफ मुसकुराते हुए मुखातिब हुए, ‘दूर हो गया न हो। कि कवनो कसर बाकी रह गया है ? रह गया हो तो उहो पूरा करवा दें।’

‘का जीजा!’ कह कर साला बाबू वहां से खिसक लिए।

यह लतीफा ढोलक मास्टर ठेंठ भोजपुरी में पूरे ड्रामाई अंदाज में ठोंकते और पूरा रस भर-भर के। सो लोग अघा जाते। और इस अघाए में ही सुर्ती ठोंक कर गणेश तिवारी की हारमोनियम बज जाती और वह गाने लगते, ‘रात अंधियारी मैं कैसे आऊं बालम!’ वह सुर में और मिठास घोलते, ‘सास ननद मोरी जनम की दुश्मन कैसे आऊं बालम!’ फिर वह गाते, ‘चदरिया में दगिया कइसे लागल / ना घरे रहलें बारे बलमुआ, ना देवरा रहै जागल / फिर कइसे दगिया लागल चदरिया में दगिया  कइसे लागल!’ यह और ऐसे गाने गा कर वह लोगों को जैसे दीवाना बना देते। क्या पढ़े-लिखे, क्या अनपढ़। वह फिल्मी गानों को दुत्कारते फिर भी बहुत फरमाइश पर कभी कभार फिल्मी भी गा देते पूरा भाष्य दे-दे कर। जैसे कि वह जब पाकीजा फिष्ल्म का गाना ‘इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मोरा’ गाते तो इस गाने में छुपी तकलीफ और उसका तंज भी अपने वाचन में बांचते और कहते कि, ‘पर लोग इस गाने में उस औरत की तकलीफ नहीं देखते, मजा लेते हैं। तब जब कि वह बजजवा, रंगरेजवा और सिपहिया सब को घेरे में लेती है। उसका दुपट्टा, दुपट्टा नहीं उसकी इज्जत है।’ उन के इस वाचन में डूब कर इस गाने को सुनने का रंग ही कुछ और हो जाता। ऐसे ही तमाम निर्गुण भी वह इसी ‘ठाठ’ में सुनाते और रह-रह जुमलेबाजी भी कसते रहते। और अंततः तमाम क्षेपक कथाओं को अपनी गायकी में गूंथते हुए गाते, ‘अंत में निकला ये परिणाम राम से बड़ा राम का नाम।’ कुछ पौराणिक कथाओं को भी वह अपनी गायकी में लाते। जैसे पांडवों के अज्ञातवास का एक प्रसंग उठाते जिसमें अर्जुन और उर्वशी प्रकरण आता। और अंततः उर्वशी जब अर्जुन से एक वर मांगती हुई अर्जुन से एक बेटा मांग बैठी तो अर्जुन मान जाते हैं। और जो युक्ति निकालते हैं उसे गणेश तिवारी ऐसे लयकारी में गाते, ‘तू जो मेरी मां बन जा, मैं ही तेरा लाल बनूं।’ इस गायकी में वह जैसे इस प्रसंग का दृश्य-दर-दृश्य उपस्थित कर देते तो लोग लाजवाब हो जाते। वह अपने ‘प्रोग्राम’ में तमाम भोजपुरी के पांरपरिक लोकगीतों को भी थाती की तरह इस्तेमाल करते।  सोहर, लचारी, सावन, गारी कुछ भी नहीं छोड़ते। और पूरे ‘पन’ से गाते।

बात ही बात में कोई लोक कवि की चर्चा छेड़ देता है तो वह कहते, ‘अरे ऊ तो हमारा चेला है ! बहुत सिखाया पढ़ाया।’ वह जैसे जोड़ते, ‘पहले बहुत बढ़िया गाता था। इतना कि कभी कभार हमको लगता कि हमसे भी बढ़िया न निकल जाए। आगे न निकल जाए, मैं यह सोच कर जलता था उस से। पर ससुरा बिखर गया।’ वह कहते, ‘अब तो लखनऊ में आर्केस्ट्रा खोल कर लौंड़ियों को नचा कर कमा खा रहा है। इन लौड़ियों को नचा कर दो चार गाने खुद भी गा लेता है।’ कहते हुए वह आह भरने लगते, ‘पर ससुरे ने भोजपुरी को बेंच दिया है। नेताओं की चाकरी कर नाम और इनाम कमा रहा है तो लौड़ियों को नचा कर रुपया कमा रहा है। मोटर गाड़ी से चलता है। हवाई जहाज में चढ़ता है। विदेश जाता है। मनो कुल ई कि बड़ा आदमी बन गया है। नसीब वाला है। पर कलाकार अब नहीं रहा, व्यापारी बन गया है। तकलीफ एही बात का है।’ वह कहते, ‘हमारा चेला है सो हमारी भी नाक कटती है।’

लेकिन लोक कवि?

लोक कवि यह तो मानते कि गणेश तिवारी जी उन से बहुत अच्छा गाते हैं और कि बहुत मीठा गला है उन का। पर ‘चेला’ की बात आते ही लोक कवि लगभग बिदक जाते। कहते, ‘ब्राह्मण हैं। पूजनीय हैं पर हम उन का शिष्य नहीं हूं। उन्होंने हमको कुछ सिखाया नहीं है। उलटे गांव में था तो नान जात कहके ‘काटते’ थे। हां, ई जरूर था कि हमको दुई चार गाना जरूर ऊ बताए जवन हम नहीं जानते थे और पीपर के पेड़ के नीचे गाना बजाना में भी हमको गाने का मौका देते थे।’ वह जोड़ते, ‘अब एह तरह ऊ अपने को हमारा गुरु मानते हैं तो हमको भी ऐतराज नाहीं है। बाकी  गांव के बुजुरुग हैं, ब्राह्मण हैं, हम आगे का कहीं।’

पर लोक कवि यह सब कुछ गणेश तिवारी के पीठ पीछे कहते। सामने तो चुप रहते। बल्कि जब गणेश तिवारी लोक कवि को देखते तो देखते ही गुहारते, ‘का रे चेला!’ और लोक कवि उन के पैर छूते हुए कहते, ‘पालागी पंडित जी!’ और वह ‘जियो चेला! जीते रहो ख़ूब नाम और यश कमाओ!’ कह कर आशीर्वाद देते। लोक कवि अपनी जेब के मुताबिक सौ-दो सौ, चार सौ पांच सौ रुपए धीरे से उन के पैरों पर रख देते जिसे गणेश तिवारी उसी ख़ामोशी से रख लेते। बात आई गई हो जाती।

एहसान फरामोशी की यह भी एक पराकाष्ठा थी।

पर गणेश तिवारी तो ऐसे ही थे, ऐसे ही रहने वाले थे। गांव में उन की पट्टीदारी का एक व्यक्ति फौज में था। रिटायर होने के कुछ समय पहले वह जवानों की भर्ती का काम पा गया। ख़ूब पैसा पीटा। गांव में आ कर ख़ूब भारी दो मंजिला घर बनवाया। पैसे की गरमी साफ दिखाई देती थी। जीप वगैरह भी ख़रीदी। फौजी की पत्नी ने खेत ख़रीदने की बात चलाई तो फौजी ने इन्हीं विलेज बैरिस्टर गणेश तिवारी से खेत ख़रीदने की चर्चा की। क्यों कि गणेश तिवारी को गांव भर का क्या पूरे जवार के लोगों की खसरा खतियौनी, रकबा, मालियत पुश्त-दर-पुश्त जबानी याद था। इसी बिना पर वह कब किस को भिंड़ा दें, किसको किसमें फंसा दें, कुछ ठिकाना नहीं होता। तो फौजी ने यही सुरक्षित समझा कि गणेश तिवारी की उंगली पकड़ कर खेत ख़रीदा जाए। गणेश तिवारी ने आनन फानन उन्हें पांच लाख में पांच बिगहा खेत ख़रीदवा भी दिया। रजिस्ट्री वगैरह हो गई तो भी फौजी ने गणेश तिवारी के मद में गांठ नहीं खोली। तो फिर एक दिन गणेश तिवारी ने खुद ही मुंह खोल दिया, ‘बेटा पचीस हजार रुपया हमको भी दे दो।’

‘वो तो ठीक है।’ फौजी बोला, ‘पर किस बात का ?’

‘किस बात का ?’ गणेश तिवारी बिदके, ‘अरे कवनो भीख या उधार थोड़े ही मांग रहे हैं। मेहनत किए हैं। अपना सब काम बिलवा कर, दुनिया भर का अकाज कर दौड़ भाग किए हैं तो मेहनत का मांग रहे हैं ?’

‘तो अब हमहीं रह गए हैं दलाली वसूलने ख़ातिर ? फौजी भड़क कर बोला, ‘शर्म भी नहीं आती पट्टीदारी में दलाली मांगते?’

‘शर्म करो तुम जो मेहनताना को दलाली बता रहे हो।’

‘काहे को शर्म करें ?’

‘तो चलो दलाली समझ कर ही सही पैसे दे दो!’ गणेश तिवारी बोले, ‘हमहीं बेशर्म हुए जा रहे हैं।’

‘बेशर्म होइए चाहे बेरहम। हम दलाली के मद में एक पइसा नहीं देंगे।’

‘नहीं दोगे तो बाद में झंखोगे।’ गणेश तिवारी ने जोड़ा, ‘रोओगे और रोए रुलाई नहीं आएगी!’

‘धमकी मत दीजिए। फौजी आदमी हूं कोई ऐरा गैरा नहीं।’

‘फौजी नहीं, कलंक हो!’ वह बोले, ‘जवानों की भरती में रिश्वत कमा कर आए हो। गवर्मेंट को बता दूंगा तो जेल में चक्की पीसोगे।’ उन्होंने एक बार फिर चेताया कि, ‘पैसे दे दो नहीं बहुत पछताओगे। बहुत रोओगे।’

‘नहीं दूंगा। फौजी झिड़कते हुए बोला, ‘एक बार नहीं, सौ बार कह रहा हूं कि नहीं दूंगा। रही बात गवर्मेंट की तो मैं अब रिटायर हो चुका हूं। फंड-वंड सब ले चुका हूं। गवर्मेंट नहीं, गवर्मेंट के बाप से कह दीजिए मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला।’

‘गवर्मेंट की छोड़ो, खेतवै में रो जाओगे।’

‘जाइए जो उखाड़ना हो उखाड़ लीजिए। पर मैं एक पैसा नहीं देने वाला।’

‘पैसा कइसे दोगे?’ वह हार कर बोले, ‘तुम्हारे नसीब में रोना जो लिखा है।’ कह कर गणेश तिवारी चुपचाप चले आए अपने घर। ख़ामोश रहे कुछ दिन। पर सचमुच वह ख़ामोश नहीं रहे। इधर फौजी ने अपने पुश्तैनी खेतों के साथ ही साथ ख़रीदे खेत की बड़ी जोरदार तैयारी कर बुवाई करवाई। खेत जब जोत बो गया तो गणेश तिवारी एक दिन ख़ामोश नजरों से खेत को देख भी आए। पर जाहिरा तौर पर कुछ फिर भी नहीं बोले।

एक रात अचानक उन्होंने अपने हरवाहे को बुलवाया। वह आया तो उसे भेज कर उस आदमी को बुलवाया जिससे फौजी ने खेत ख़रीदा था। वह आया भी। आते ही गणेश तिवारी के पांव छुए और किनारे जमीन पर ही उकडूं बैठ गया।

‘का रे पोलदना का हाल है तोर?’ किंचित प्यार की चाश्नी घोल कर आधे सुर में ही पूछा गणेश तिवारी ने।

‘बस बाबा, राउर आशीर्वाद बा।’

‘और का हो रहा है?’

‘कुछ नाहीं बाबा! अब तो खेतियो बारी नाहीं रहा। का करेंगे भला? बैठे-बैठे दिन काट रहे हैं।’

‘काहें तुम्हारा लड़का बंबई से वापस आ गया का ?’

‘नाहीं बाबा ऊ तो वोहीं है।’

‘तो तुम भी काहें नाहीं बंबई चले जाते ?’

‘का करेंगे उहां जा के बाबा ! उहां बड़ी सांसत है।’

‘कवने बात का सांसत है?’

‘रहने खाने का। हगने, मूतने का। पानी पीढ़ा का। कुल का सांसत है।’

‘त का इहां सांसत नाहीं है का?’

‘एह कुल का सांसत तो नहियै है।’ वह रुका और बोला, ‘बस खेतवा बेंच देने से काम काज कम हो गया है। निठल्ला हो गया हूं।’

‘अच्छा पोलादन ई बता कि जो तुम्हारा खेत तुमको फिर से वापिस मिल जाए तो ?’

‘अरे का कहत हईं बाबा!’ वह आंखें सिकोड़ता हुआ बोला, ‘अब तो ढेर पइसो चट कर गया हूं।’

‘का कर डाला रे?’

‘घर बनवा दिया है।’ वह मुसकुराता हुआ बोला, ‘पक्का घर बनवाया हूं।’

‘त कुल रुपया घर ही में फूंक दिया?’

‘नाहीं बाबा! दू ठो भईंस भी ख़रीदले बाड़ीं।

‘त कुच्छू पइसा नाहीं बचाया है?’ जैसे आह भर कर गणेश तिवारी ने पूछा, ‘कुच्छू नाहीं !’

‘नहीं बाबा तीस-चालीस हजशर त अबहिन हौ। बकिर ऊ नतिनी के बियाह ख़ातिर बचाए हूं।’

‘बचाए हो न?’ जैसे गणेश तिवारी को सांस मिल गई। वह बोले, ‘तब तो काम हो जाएगा।’’

‘कवन काम हो जाएगा।’ अचकचा कर पोलादन ने पूछा।

‘तुम बुरबक है। तुम नहीं समझेगा। ले सुरती बना पहले।’ कह कर जशेर की हवा ख़ारिज की गणेश तिवारी ने। पोलादन नीचे बैठा चूना लगा कर सुरती मलने लगा। और गणेश तिवारी ने चारपाई पर बैठे-बैठे बैठने की दिशा बदली और एक बार फिर हवा ख़ारिज की पर अबकी जश्रा धीरे से। फिर पोलादन से एक बीड़ा सुरती ले कर मुंह में जीभ तले दबाया और बोले, ‘अच्छा पोलदना ई बताओ कि अगर तुम्हारा खेत भी तुमको वापिस मिल जाए और तुमको पइसा भी वापिस न देना पड़े तो?’

‘ई कइसे हो जाई बाबा?’ पूछते हुए पोलादन हांफने लगा और दौड़ कर गणेश तिवारी के पांव पकड़ बैठा।

‘ठीक से बइठ, ठीक से।’ वह बोले, ‘घबराओ जिन।’

‘लेकिन बाबा सहियै अइसन हो जाई।’

‘हो जाई बकिर....!’

‘बकिर का?’ वह विह्वल हो गया।

‘कुछ खर्चा-बर्चा लगेगा।’

‘केतना?’ कहते हुए वह थोड़ा ढीला पड़ गया।

‘घबराओ नहीं।’ उसे आश्वस्त करते हुए वह अंगुलियों पर गिनती गिनते हुए धीरे से बोले, ‘यही कोई तीस चालीस हजशर रुपया!’

‘एतना रुपया?’ कहते हुए पोलादन निढाल हो कर मुह बा गया। पोलादन की यह आकृति देख गणेश तिवारी उसका मनोविज्ञान समझ गए। आवाज जरा और धीमी की। बोले, ‘सारा पैसा एक साथ नहीं खर्च होगा।’ वह रुके और बोले, अभी तुम पचीस हजशर रुपए दे दो। हाकिम हुक्काम को सुंघाता हूं। फिर बाकी तुम काम होने के बाद देना।’

‘बकिर काम हो जाई?’ उसकी सांस में जैसे सांस आ गई। बोला, ‘खेतवा मिलि जाई?’

‘बिलकुल मिलि जाई।’ वह बोले, ‘बेफिकिर हो जाओ।’

‘नाई मनो हम एह नाते कह रहे थे जे कि ऊ फौजी बाबा खेतवा जोत बो लिए हैं।’

‘खेतवा बो लिए हैं न?’

‘हां, बाबा!’

‘काटे तो नाहीं न हैं?’

‘अबिहन काटने लायक हुई नहीं है।’

‘त जाओ खेत बोया जरूर है उस पागल फौजी ने, बकिर काटोगे तुम।’ वह रुके और बोले, ‘बाकी पइसा तुम जल्दी से जल्दी ला कर गिन जाओ!’

‘ठीक बा बाबा!’ वह जरा मद्धिम आवाज में बोला।

‘इ बताओ कि हमरे पर तुमको विश्वास तो है न?’

‘पूरा-पूरा बाबा।’ वह बोला, ‘अपनहू से जियादा।’

‘तब इहां से जो! और हमरे साथे-साथे अपनहू पर विश्वास रख। तोर किस्मत बहुतै बुलंद बा।’ वह बोले, ‘रात भी जादा हो गई है।’

रात सचमुच ज्यादा हो गई थी। वह उन के पैर छू कर जाने लगा।

‘अरे पोलदना हे सुन!’ जाते-जाते अचानक गणेश तिवारी उसे गुहरा पड़े।

‘हां, बाबा!’ वह पलट कर भागता हुआ आया।

‘अब एह बात पर कहीं गांजा पी कर पंचाइत मत करने लगना!’

‘नाहीं बाबा!’

‘न ही अपने मेहरारू, पतोह, नात-रिश्तेदार से राय बटोरने लगना।’

‘काहें बाबा!’

‘अब जेतना कह रहा हूं वोतना कर।’ वह बोले, ‘ई बात हमारे तुम्हारे बीच ही रहनी चाहिए। कोई तीसरा भनक भी न पाने पाए।’

‘ठीक बा बाबा!’

‘हां, नाहीं त बना बनाया काम बिगड़ जाई।’

‘नाहीं हम केहू से कुछ नाहीं कहब।’

‘त अब इहां से जो और जेतना जल्दी हो सकै पइसा दे जो!’ वह रुके और बोले, ‘केहू से कवनो चर्चा नाहीं।’

‘जइसन हुकुम बाबा!’ कह कर उस ने फिर से गणेश तिवारी के दोनों पैर छुए और दबे पांव चला गया।

....जारी....

उपन्यासकार दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424 और This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है. इसके पहले के भाग को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- LKAGN part 6


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