तिवारी ने 'ठांय' से हवा में फायर किया तो सब लड़कियां भागने लगीं

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दयानंद पांडेयउपन्यास - लोक कवि अब गाते नहीं (8) : पोलादन चला तो आया गणेश तिवारी के घर से। पर रास्ते भर उनकी नीयत थाहता रहा। सोचता रहा कि कहीं ऐसा न हो कि पइसा भी चला जाए और खेत भी न मिले। ‘माया मिली न राम’ वाला मामला न हो जाए। वह इस बात पर भी बारहा सोचता रहा कि आखि़र गणेश बाबा फौजी का जोता बोया खेत जो उसने खुद बैनामा किया है, पांच लाख रुपया नकद ले कर, कैसे उसे वापिस मिल जाएगा भला?

वह इस बिंदु पर बार-बार सोचता रहा। सोचता रहा पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। अंततः हार मान कर उसने सीधे-सीधे यही मान लिया कि गणेश बाबा की तिकड़मी बुद्धि ही कुछ कर सकती हो तो खेत मिलेगा बिना पइसा वापिस दिए। बाकी तो कवनो रास्ता नइखै दिखाई देता। इसी उधेड़बुन में वह घर पहुंचा।

तीन चार दिन इसी उधेड़बुन में रहा। रातों में भी उसकी आंखों में नींद नहीं उतरती। यही सब वह सोचता रहता। उसे लगा वह पागल हो जाएगा। वह बार-बार सोचता कि गणेश तिवारी कहीं उसको ठग तो नहीं रहे हैं? कि पइसा भी ले लें और कि खेतवो न मिलै? काहे से कि उनकी ठगी विद्या का कोई पार नहीं था। इस विद्या की आड़ में कब वह किसको डंस लें इसका थाह नहीं मिलता था। फिर वह यह भी सोचता और बार-बार सोचता कि आखि़र कौन कानून से गणेश बाबा पइसा बिना वापिस दिए फौजी बाबा द्वारा जोता बोया खेत काटने के लिए वापिस दिया देंगे? तब जब कि वह बाकायदा रंगीन फोटो लगा कर रजिस्ट्री करवा चुका है। फिर उसने सोचा कि का पता गणेश बाबा उसकी आड़ में फौजी बाबा को ठगी विद्या से डंस रहे हों? पट्टीदारी का कवनो हिसाब किताब बराबर कर रहे हों? हो न हो यही बात हो! यह ध्यान आते ही वह उठ खड़ा हुआ। आधी रात हो चुकी थी फिर भी उसने आधी रात का ख़याल नहीं किया। सोई बीवी को जगाया। बक्से का ताला खुलवाया बीस हजार रुपया निकलवाया और लेकर पहुंच गया गणेश तिवारी के घर।

पहुंच कर कुंडा खटखटाया। धीरे-धीरे।

‘कौन है रे?’ आधी जागी, आधी निंदियायी तिवराइन ने जम्हाई लेते हुए पूछा।

‘पालागी पंडिताइन! पोलादन हईं।’

‘का रहे पोलदना! ई आधी रात क का बात परि गईल?’

‘बाबा से कुछ जरूरी बाति बा!’ उसने जोड़ा, ‘बहुत जरूरी। जगा देईं।’

‘अइसन कवन जरूरी बाति बा जे भिनहीं नाहीं हो सकत। आधिए रात कै होई?’ पल्लू और आंचल ठीक करती हुई वह बोलीं।

‘काम अइसनै बा पंडिताइन!’

‘त रुक जगावत हईं।’

कह कर पंडिताइन अपने पति को जगाने चली गईं। नींद टूटते ही गणेश तिवारी बउराए, ‘कवन अभागा आधी रात को आया है?’

‘पोलदना है।’ सकुचाते हुए पंडिताइन बोलीं, ‘चिल्लात काहें हईं ?’

‘अच्छा-अच्छा बैठाव सारे के बइठका में और बत्ती जरा द।’ कह कर वह धोती ठीक करने लगे। फिर मारकीन की बनियाइन पहनी, कुर्ता कंधे पर रखा और खांसते खंखारते बाहर आए। बोली में किंचित मिठास घोली। बोले, ‘का रे पोलदना सारे, तोंके नींद नाहीं आवेले का?’ तखत पर बैठते हुए खंखारते हुए धीरे से बोले, ‘हां, बोल कवन पहाड़ टूट गइल जवन तें आधी रात आ के जगा देहले?’

‘कुछऊ  नाहीं बाबा!’ गणेश तिवारी के दोनों पांव छू कर ऊंकड़ई बैठते हुए वह बोला, ‘वोही कमवा बदे आइल हईं बाबा।’

‘अइसै फोकट में?’ गणेश तिवारी की बोली थोड़ी तल्ख़ हुई।

‘नाई बाबा हई पइसा ले आइल हईं।’ धोती के फेंट से रुपयों की गड्डी निकालता हुआ वह बोला।

‘है केतना?’ कुछ-कुछ टटोलते, कुछ-कुछ गुरेरते हुए वह बोले।

‘बीस हजार रुपया!’ वह खुसफुसाया।

‘बस!’

‘बस धीरे-धीरे औरो देब।’ वह आंखें मिचमिचाता हुआ बोला, ‘जइसे-जइसे कमवा बढ़ी, तइसे-तइसे।’

‘बनिया का दुकान बूझा है का?’

‘नाहीं बाबा! राम-राम!’

‘त कवनो कर्जा खोज के देना है का?’

‘नाहीं बाबा।’

‘त हमारे पर विश्वास नइखै का?’

‘राम-राम! अपनहू से जियादा!’

‘तब्बो नौटंकी फइला रहा है!’ वह आंखें तरेर कर बोले, ‘फौजी पंडित का पांच लाख घोंटेगा और तीसो चालीस हजार खर्चने में फाट रहा है!’

‘बाबा जइसन हुकुम देईं।’

‘सबेरे दस हजार और दे जो!’ वह बोले, ‘फेर हम बताएंगे। बकिर बाकी पइसा भी तैयार रखना!’

‘ठीक बा बाबा!’ वह मन मार कर बोला।

‘और बात इधर-उधर मत करना।’

‘नाहीं-नाहीं। बिलकुल नाहीं।’

‘ठीक है त जो!’

‘बकिर बाबा काम हो जाई भला?’

‘काहें ना होई?’

‘मनो होई कइसे?’ वह थोड़ी थाह लेने की गरज से बोला।

‘इहै जान जाते घोड़न त पोलादन पासी काहें होते?’ वह थोड़ा मुसकुरा कर, थोड़ा इतरा कर बोले, ‘गणेश तिवारी हो जाते!’

‘राम-राम आप के हम कहां पाइब भला।’ वह उनके पांव पकड़ता हुआ बोला।

‘जो अब घरे!’ वह हंसते हुए बोले, ‘बुद्धि जेतना है, वोतने में ही रहो। जादा बुद्धि का घोड़ा मत दौड़ाओ!’ वह बोले, ‘आखि़र हम काहें ख़ातिर हैं?’

‘पालागी बाबा!’ कह कर वह गणेश तिवारी के पांव छूता हुआ चला गया।

दूसरे दिन सुबह फिर दस हजार रुपए ले कर वह आया तो गणेश तिवारी ने तीन चार सादे कागज पर उसके अंगूठे का निशान लगवा लिया।

वह फिर घर चला गया। धकधकाता दिल लिए। कि जाने का होगा। पैसा डूबेगा कि बचेगा।

हफ्ता, दो हफ्ता बीता। कुछ हुआ ही नहीं। वह गणेश तिवारी के पास जाता और आंखों-आंखों में प्रश्न फेंकता। तो उधर से गणेश तिवारी भी उसे आंखों-आंखों में ही जैसे तसल्ली देते। बोलते दोनों ही नहीं थे। गणेश तिवारी का तो नहीं पता पोलादन को, पर वह ख़ुद सुलगता रहता। मसोसता रहता कि काहें एतना पइसा दे दिया? काहें गणेश तिवारी जैसे ठग आदमी के फेर में पड़ गया? वह इसी उधेड़बुन में था कि एक रात गणेश तिवारी उसके घर आए। खुसुर-फुसुर किए और गांव छोड़ कर कहीं चले गए। एही रात फौजी तिवारी के घर पुलिस ने छापा डाला और उनके दोनों बेटों सहित उन्हें थाने उठा ले गई दूसरे दिन ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने वह और उनके दोनों बेटे पेश किए गए। बड़ी दौड़ धूप की उनके नाते रिश्तेदारों, पट्टीदारों और शुभचिंतकों ने पर जमानत नहीं मिली। क्योंकि उन पर हरिजन ऐक्ट लग गया था। बड़े से बड़ा वकील कुछ नहीं कर पाया! कहा गया कि अब तो हाइकोर्ट से ही जमानत मिलेगी। और जाने जमानत मिलेगी कि सजा?

जेल जाते-जाते फौजी तिवारी रो पड़े। रोते-रोते बोले, ‘ई गणेश तिवारी गोहुवन सांप है। डंसा इसी ने है। पोलदना तो इस्तेमाल हुआ है औजार की तरह।’ फिर उन्होंने एक भद्दी सी गाली दी गणेश तिवारी को! बोले, ‘भोसड़ी वाले को पचीस हजार की दलाली नहीं दी तो इस कमीनगी पर उतर आया!’

‘त दे दिए होते दलाली!’ फौजी तिवारी का साला बोला, ‘हई दिन तो नहीं देखना पड़ता!’

‘अब का बताएं?’ कह कर फौजी तिवारी पहले मूछों में फिर फफक कर रो पड़े।

शाम हो गई थी सो उन्हें और उनके बेटों को पुलिस वाले पुलिस ट्रक में बिठा कर जेल की ओर चल दिए। इस पूरे प्रसंग में फौजी तिवारी टूटे हुए, रुआंसे और असहाय कुछ न कुछ बुदबुदाते रहे थे और उनके बेटे निःशब्द थे। लेकिन उनके चेहरों पर आग खौल रही थी और आंखों में शोला समाया हुआ था।

जो भी हो गांव भर क्या पूरे जवार को जानते देर नहीं लगी कि यह सब गणेश तिवारी का किया धरा है। और इस बहाने गांव जवार में एक बार फिर गणेश तिवारी का आतंक बरपा हो गया। किसी गुंडे या किसी आतंकवादी का आतंक क्या होता होगा जो गणेश तिवारी का आतंक होता था। जो आतंक वह खादी पहन कर, बिना अहिंसा के और ख़ूब मीठा बोल कर बरपाते थे।

इस या उस तरह लोग आतंक में जीते और गणेश तिवारी की विलेज बैरिस्टरी चलती रहती।

कई-कई बार वह इस सबके बावजूद निठल्ले हो जाते। लगन नहीं होती तो गाने का सट्टा भी नहीं होता। मुकदमे नहीं होते तो कचहरी भी क्या करते जा कर? या मुकदमे कभी-कभार कम भी पड़ जाते। तो वह एक ख़ास तकनीक अपनाते। पहले वह तड़ते कि किस-किस के बीच तनातनी चल रही है या तनातनी के आसार हैं या आसार हो सकते हैं। इसमें से किसी एक पक्ष से कई-कई बैठकी में मीठा-मीठा बोल कर, उसकी एक-एक नस तोल कर वह उसके मन की पूरी थाह लेते। कुछ ‘उत्प्रेरक’ शब्द उसके कान में अनायास भेजते। प्रतिक्रिया में वह दूसरे पक्ष के लिए अप्रिय शब्दों का जखीरा खोल बैठता, कुछ राज अपने विरोधी पक्ष का बता जाता और अंततः उसकी ऐसी तैसी करने लगता। फिर गणेश तिवारी जब देखते कि चिंगारी शोला बन गई है तब उसे बड़े ‘शांत’ ढंग से चुप कराते और उसे बड़े धीरज और ढाढ़स के साथ समझाते, ‘ऊ साला कुकुर है तो उससे कुकुर बन कर लड़ोगे का?’ वह उसे बिना मौका दिए कहते, ‘आदमी हो आदमी की तरह रहो। कुत्ते के साथ कुत्ता बनना ठीक है का?’

‘तो करें का?’ अगला खीझ कर कहता।

‘कुछ नहीं आदमी बने रहो। और आदमी के पास बुद्धि होती है, सो बुद्धि से काम लो!’

‘का करेंगे बुद्धि ले कर ?’ अगला और बउराता।

‘बुद्धि का इस्तेमाल करो!’ वह उसे बड़े शांत ढंग से समझाते, ‘खुद लड़ने की क्या जरूरत है? तुम खुद क्यों लड़ते हो?’

‘तो का चूड़ी पहन कर बैठ जाएं?’

‘नाहीं भाई, चूड़ी पहनने को कौन कह रहा है?’

‘तो?’

‘तो क्या!’ वह धीरे से बोलते, ‘ख़ुद लड़ने से अच्छा है कि उसी को लड़ा देते हैं।’

‘कैसे?’

‘कैसे का?’ वह पूछते, ‘एकदम बुरबक हो क्या?’ वह जोड़ते, ‘अरे कचहरी काहें बनी है ! कर देते हैं एक ठो नालिश, दू ठो इस्तगासा!’

‘हो जाएगा!’ अगला खुशी से उछलता हुआ पूछता।

‘बिलकुल हो जाएगा।’ कह कर गणेश तिवारी दूसरे पक्ष को टोहते और उसके ख़िलाफ पहले पक्ष द्वारा की गई अप्रिय टिप्पणियों, खोले गए राज को बताते और जब दूसरा पक्ष भी आग बबूला होता तो उसे भी धीरज बंधाते। धीरज बंधाते-बंधाते उसे भी बताते कि, ‘खुद लड़ने की क्या जरूरत है?’ वह कहते, ‘ऐसा करते हैं कि उसी को लड़ा देते हैं।’

अंततः दोनों पक्ष  कचहरी जा कर भिड़ जाते बरास्ता गणेश तिवारी। कचहरी में उनका ‘ताव’ देखने लायक होता। सूट फाइल होने, काउंटर, रिज्वाइंडर में ही छ-आठ महीने गुजर जाते। साथ ही साथ दोनों पक्षों का जोश खरोश और ‘ताव’ भी उतर जाता। नौबत तारीख़ की आ जाती। और जैसा कि हमेशा कचहरियों में होता है न्याय कहिए, फैसला कहिए मिलता नहीं, तारीख़ ही मिलती है। और यह तारीख़ भी पाने के लिए पैसा खर्चना पड़ता। इस पर पक्ष या प्रतिपक्ष प्रतिवाद करता तो गणेश तिवारी बड़ी सफाई से उसे ‘राज’ की बात बताते कि, ‘अबकी की तारीख़ तुम्हारी तारीख़ है। तुम्हें मिली है। और तुम्हारी ही तारीख़ पर उसको भी आना पड़ेगा!’

‘और जो ऊ नहीं आया तो?’ अगला असमंजस में पड़ा पूछता।

‘आएगा न!’ वह बताते, ‘आख़िर गवर्मेंट की कचहरी की तारीख़  है। कैसे नहीं आएगा। और जो ऊ नहीं आएगा तो गवर्मेंट बंधवा कर बुलवाएगी। और नहीं कुछ तो उसका वकिलवा तो आएगा ही।’

‘आएगा न!’

‘बिलकुल आएगा!’ कह कर गणेश तिवारी उसे निश्चिंत करते। और भले ही जनरल डेट लगी हो तो भी गणेश तिवारी उसे उसकी तारीख़ बताते और उससे अपनी फीस वसूल लेते। यही काम और संवाद वह दूसरे पक्ष पर भी गांठते और उससे भी फीस वसूलते। दोनों पक्षों के वकीलों से कमीशन अलग वसूलते। कई बार मुवक्किल उनकी मौजूदगी में ही वकील को पैसा देता तो वह हालांकि अंगरेजी नहीं जानते थे तो भी मुवक्किल के सामने ट्वेंटी फाइव फिफ्टी, हंडरेड, टू हंडरेड, फाइव हंडरेड, थाउजेंड वगैरह जैसे उनकी जरूरत या रेशियो जो भी बनता बोल कर अपना कमीशन सुनिश्चित कर लेते। बाद में अगला पूछता कि, ‘वकील साहब से अऊर का बात हुई?’ तो वह बताते, ‘अरे कचहरी का ख़ास भाषा है, तू नहीं समझेगा।’ और हालत यह हो जाती कि जैसे-जैसे मुका्दमा पुराना पड़ता जाता दोनों पक्षों का ‘ताव’ टूटता जाता और वह ढीले पड़ते जाते। फिर एक दिन ऐसा आता कि कचहरी जाने के बजाय कचहरी का खर्चा लोग गणेश तिवारी के घर दे जाते। मुकदमा और पुराना होता तो दोनों पक्ष खुल्लमखुल्ला गणेश तिवारी को ‘खर्चा-बर्चा’ देने लगते और अंततः कचहरी में सिवाय तारीख़ों के कुछ मिलता नहीं सो दोनों पक्ष सुलह सफाई पर आ जाते और आखि़रकार एक सुलहनामा पर दोनों पक्ष दस्तखत करके मुकदमा उठा लेते। बहुत कम मुकदमे होते जो एक कोर्ट से दूसरी कोर्ट,  दूसरी कोर्ट से तीसरी कोर्ट तक पहुंच पाते। अमूमन तो तहसील में ही मामला ‘निपट’ जाता।

सौ दो सौ मुकदमों में से दस पांच ही जिला जज तक पहुंचते बरास्ता अपील वगैरह। और यहां से भी दो चार सौ मुकदमों में से दस पांच ही हाइकोर्ट का रुख़ कर पाते। अमूमन तो यहीं दफन हो जाते। फिर गणेश तिवारी जैसे लोग नए क्लाइंट की तलाश में निकल पड़ते। यह कहते हुए कि, ‘खुद लड़ने की क्या जरूरत है, उसी को लड़ा देते हैं।’ और ‘उसी को’ लड़ाने के फेर में आदमी खुद लड़ने लगता।

लेकिन गणेश तिवारी का यह नया शिकार पोलादन इस का अपवाद था। फौजी तिवारी को उसने सचमुच लड़ा दिया था क्योंकि गणेश तिवारी ने उसे हरिजन ऐक्ट का हथियार थमा दिया था। हरिजन ऐक्ट अब उनका नया अस्त्र था। और सचमुच वही हुआ जैसा कि गणेश तिवारी ने पोलादन से कहा था, ‘खेत बोए जरूर फौजी पंडित ने हैं पर काटोगे तुम।’ तो पोलादन ने वह खेत काटा, बाकायदा पुलिस की मौजूदगी में। खेत कटने तक फौजी तिवारी और उनके दोनों बेटे जमानत पर छूट कर आ गए थे पर मारे दहशत के वह खेत की ओर झांकने भी नहीं गए। खेत कटता रहा। काटता रहा पोलादन खुद। दो चार लोगों ने फौजी तिवारी से आ कर खुसफुसा कर बताया भी कि, ‘खेतवा काटता बा!’ पर फौजी तिवारी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, न ही उन के बेटों ने।

इस पूरे प्रसंग पर लोक कवि ने एक गाना भी लिखा। गाना तो नहीं चला पर लोक कवि की पिटाई जरूर हो गई इस बुढ़ौती में। फौजी तिवारी के छोटे बेटे ने की पिटाई। वह भी फौज में था और गणेश तिवारी, पोलादन के हथियार हरिजन एक्ट ने उसकी फौजी नौकरी दांव पर लगा दी थी।

बहरहाल, जब खेत वगैरह कट कटा गया, पोलादन पासी का बाकायदा कब्जा हो हवा गया खेतों पर तो एक रात गणेश तिवारी खांसते-खंखारते पोलादन पासी के घर खुद पहुंचे। क्यों कि वह तो बुलाने पर भी उनके घर नहीं आता था। ख़ैर, वह पहुंचे और बात ही बात में दबी जबान से फौजी तिवारी मद में बाकी पैसों का जिक्र कर बैठे। तिस पर पोलादन ने दबी जबान नहीं, खुली जबान गणेश तिवारी से प्रतिवाद किया। बोला, ‘कइसन पइसा ?’ उसने आंख तरेरी और जोड़ा, ‘बाबा चुपचाप बइठीं। नाई अब कानून हमहूं जानि गइल हईं।  कहीं आप के खि़लाफ भी कलक्टर साहब के अंगूठा लगा के दरखास दे देब त मारल फिरल जाई।’

सुन कर गणेश तिवारी का दिल धक् हो गया। आवाज मद्धिम हो गई। बोले, ‘राम-राम! ते त हमार चेला हऊवे! का बात करते हो। भुला जाओ पैसा वैसा!’ कह कर वह सिर पर पांव रख कर वहां से सरक लिए।

रास्ते भर वह सिर धुनते रहे। कि वह क्या करें ? पर कुछ समझ नहीं आ रहा था उन्हें। घर आए। ठीक से खाए भी नहीं। सोने गए तो पंडिताइन पैर दबाने लगीं। वह धीरे से बोले, ‘पैर नहीं, सिर में दर्द है।’ पंडिताइन सिर दबाने लगीं। सिर दबाते-दबाते दबी जबान पूछ बैठीं, ‘आखि़र का बात हो गइल?’

‘बात नाई बड़ा बात हो गइल!’ गणेश तिवारी बोले, ‘एक ठो भस्मासुर पैदा हो गइल हमसे!’

‘का कहत हईं ?’

‘कुछ नाहीं। तू ना समझबू। दिक् मत करो। चुपचाप सुति जा!’

पंडिताइन मन मार कर सो गईं। लेकिन गणेश तिवारी की आंखों में नींद नहीं थी। वह लगातार सोचते रहे कि भस्मासुर बने पोलादन से कैसे निपटा जाए! भगवान शंकर जैसी मति या क्षमता तो नहीं थी उनमें पर विलेज बैरिस्टर तो वह थे ही। लेकिन अभी तो यही विलेज बैरिस्टरी उनकी दांव पर थी। उधर फौजी तिवारी के छोटे बेटे की फौज की नौकरी दांव पर थी। पोलादन पासी के हरिजन ऐक्ट के हथियार से। सो उन्होंने उसी को साधने की ठानी। गए उसके पास मौका देख कर। पर उसने गणेश तिवारी के मुंह पर थूक दिया और भद्दी-भद्दी गालियां दी। कहा कि नरक में भी ठिकाना नहीं मिलेगा। पर गणेश तिवारी ने उसकी किसी भी बात का बुरा नहीं माना। उसका थूका थूक पोंछ लिया। बोले, ‘अब गलती हुई है तो प्रायश्चित भी करुंगा। और गलती करने पर छोटा भी बड़े को दंड दे सकता है। मैं दंड का भागी हूं।’ वह बोली में और मिठास घोलते हुए बोले, ‘मैं अधम नीच हूं ही इसी लायक ! फिर भी तुम लोगों के साथ भारी अन्याय हुआ है। इंसाफ भी कराऊंगा मैं ही। आखि़र हमारा ख़ून हो तुम लोग। हम लोगों की नसों में आखि़र एक ही ख़ून दौड़ रहा है। अब यह थोड़ा मतिभ्रम होने से बदल तो जाएगा नहीं। और न ई चमारों-सियारों और पासियों-घासियों की कुटिलता से बदल जाएगा। रहेंगे तो हम एक ही ख़ून। वह बोले, ‘तो ख़ून तो बोलेगा न नाती!’ इस तरह अंततः फौजी तिवारी का छोटा बेटा भी गणेश तिवारी के इस ‘एक ही ख़ून’ के पैंतरे में फंस गया। भावुक हो गया। फिर गणेश तिवारी और उसकी छनने लगी। उम्र की दीवार तोड़ कर साथ-साथ घूमने लगे दोनों। गलबहियां डाले। पूरा गांव अवाक था कि यह क्या हो रहा है ? विचलित पोलादन पासी भी हुआ यह सब देख सुन कर। वह थोड़ा सतर्क भी हुआ यह सोच कर कि गणेश तिवारी कहीं पलट कर उसे डंस न लें। पर उसे फिर से हरिजन ऐक्ट, कलक्टर और पुलिस की याद आई। तो इस तरह हरिजन ऐक्ट के हथियार के गुमान में वह बेख़बर हो गया कि, ‘हमार का बिगाड़ लिहैं गणेश तिवारी !’

दिन कटते रहे। एक मौसम बदल कर दूसरा आ गया पर पोलादन पासी का गुमान नहीं गया। उन दिनों उसका बेटा बंबई से कमा कर लौटा था। बिटिया की शादी बदे। शादी की तैयारी चल रही थी। पोलादन की नतिनी अपनी सखियों के साथ फौजी तिवारी वाले उसी खेत की मेड़ पर गन्ना चूस रही थी कि फौजी तिवारी का छोटा बेटा उधर से गुजरा। उसे देख कर पोलादन की नतिनी ने ताना कसा, ‘रस्सी जरि गइल, अईंठ ना गइल!’

‘का बोलली?’ फौजी का बेटा कमर में बंधी लाइसेंसी रिवाल्वर निकाल कर हाथ में लेता हुआ भड़क कर बोला।

‘जवन तू सुनलऽ ए बाबा!’ पोलादन की नातिन ने उसी तंज में कहा और खिलखिला कर हंस पड़ी। साथ की उसकी सखियां भी हंसने लगीं।

‘तनी एक बार फिर से त कहु!’ फौजी तिवारी का बेटा फिर भड़कता हुआ उसी ऐंठ से बोला।

‘ई बंदूकिया में गोलियो बा कि बस खालिए भांजत हऊव ए बाबा!’

इतना सुनना था कि फौजी ने दौड़ कर पोलादन की नातिन को कस कर पकड़ लिया, ‘भागती काहें है? आव बताईं कि बंदूक में केतना गोली है!’ कह कर उसने वहीं खेत में लड़की को लिटा कर निर्वस्त्र कर दिया। बाकी लड़कियां भाग चलीं। पोलादन की नातिन बड़ा चीख़ी चिल्लाई, हाथ पैर फेंक कर बहुत बचाव किया पर बच नहीं पाई बेचारी। अंततः उसकी लाज लुट गई। फौजी तिवारी का बेटा उस की देह पर झुका अभी निढाल ही हुआ था कि पोलादन पासी, उसका बेटा और नाती लाठी, भाला ले कर चिल्लाते आते दिखे। उसने आव देखा न ताव बगल में पड़ी रिवाल्वर उठाई। रिवाल्वर उठाते ही लड़की सन्न हो गई। बुदबदाई ‘नाई बाबा, नाई, गोली नाहीं।’

‘चुप भोंसड़ी!’ कह कर फौजी के बेटे ने रिवाल्वर उसके सिर पर दे मारी, साथ ही निशाना साधा और नजदीक आते पोलादन, उसके बेटे, उसकी नाती पर बारी-बारी गोलियां दाग दीं। फौजी तिवारी का बेटा भी फौजी था सो निशाना अचूक था। तीनों वहीं ढेर हो गए।

अब तीनों की लहुलुहान लाश और निर्वस्त्र लड़की खेत में पड़ी थी। इन्हें कोई ढंक रहा था तो सिर्फ सूरज की रोशनी!

पूरे गांव में सन्नाटा पसर गया। गाय, बैल, भैंस, बकरी सब के सब ख़ामोश थे। पेड़ों के पत्तों ने भी खड़खड़ाना बंद कर दिया था। हवा जैसे ठहर गई थी।

ख़ामोशी टूटी फौजी तिवारी की जीप की गड़गड़ाहट से। फौजी तिवारी उनके दोनों बेटे तथा परिवार की औरतों, बच्चों को ले कर घर में ताला लगा कर जीप में बैठ कर गांव से बाहर निकल गए। साथ में पैसा, रुपया, जेवर-कपड़ा-लत्ता भी ले लिया। फौजी तिवारी के बेटे ने जैसे सब कुछ सोच लिया था। शहर पहुंच कर उसने अपने वकील से संपर्क किया। पूरा वाकया सही-सही बताया और वकील की राय पर दूसरे दिन कोर्ट में सरेंडर कर दिया।

उधर गांव में पसरा सन्नाटा फिर पुलिस ने तोड़ा। फौजी तिवारी का घर तो भाग चुका था। पुलिस ने फिर भी ‘सुरागरशी’ की और गणेश तिवारी को धर लिया। लेकिन ‘हजूर-हजूर, माई-बाप’ बोल-बोल कर वह पुलिसिया मार पीट से अपने को बचाए रहे। और कुछ बोले नहीं। जानते थे कि थाने की पुलिस कुछ सुनने वाली नहीं है। हां, जब एस.एस.पी. आए तब वह उसके पैरों पर लोट गए। बोले, ‘हजूर आप तो जानते ही हैं कि हम गरीब गुरबा के साथी हैं।’ वह बोले, ‘ई पोलादन जी के साथ जब फौजी ने अन्याय किया था तब हम ही तो दरखास ले-ले आप हाकिमों के पास दौड़ रहे थे। और देखिए कि आज बेचारा ख़ानदान सहित मार दिया गया!’ कह कर वह रोने लगे। वह बोले, ‘हम तो उसके मददगार थे हजूर और दारोगा साहब हमहीं के बांध लिए हैं।’ कह कर वह फिर एस.एस.पी. के पैरों पर टोपी रख कर लेट गए।

‘क्या बात है यादव?’ एस.एस.पी. ने दारोगा से पूछा।

‘कुछ नहीं सर ड्रामेबाज है।’ दारोगा बोला, ‘सारी आग इसी की लगाई हुई है।’

‘कोई गवाह, कोई बयान वगैरह है इसके खि़लाफ?’

‘नो सर!’ दारोगा बोला, ‘गांव में इसकी बड़ी दहशत है। बताते भी हैं इसके खि़लाफ तो चुपके-चुपके, खुसुर-फुसुर। सामने आने को कोई तैयार नहीं है।’ वह बोला, ‘पर मेरी पक्की इंफार्मेशन है कि सारी आग, सारा जहर इस बुढ्ढे का ही फैलाया हुआ है।’

‘हजूर आप हाकिम हैं जो चाहें करें पर कलंक नहीं लगाएं।’ गणेश तिवारी फफक कर रोते हुए बोले, ‘गांव का एक बच्चा भी हमारे खि़लाफ कुछ नहीं कह सकता। राम कसम हजूर हमने आज तक एक चींटी भी नहीं मारी। हम तो अहिंसा के पुजारी हैं सर, गांधी जी के अनुयायी हैं सर!’

‘यादव तुम्हारे पास सिर्फ इंफषर्मेशन ही है कि कोई फैक्ट भी है।’

‘अभी तो इंफार्मेशन ही है सर। पर फैक्ट भी मिल ही जाएगा।’ दारोगा बोला, ‘थाने पहुंच कर सब कुछ खुद ही बक देगा सर!’

‘शट अप, क्या बकते हो!’ एस.एस.पी. बोला, ‘इसे फौरन छोड़ दो।’

‘किरिपा हजूर, बड़ी किरिपा!’ कह कर गणेश तिवारी एस.एस.पी. के पैरों से फिर लिपट गए।

‘चलो छोड़ो, हटो यहां से !’ एस.एस.पी. गणेश तिवारी से पैर छुड़ाता बोला, ‘पर जब तक यह केस निपट नहीं जाता, गांव छोड़ कर कहीं जाना नहीं।’

‘जैसा हुकुम हजूर!’ कह कर गणेश तिवारी वहां से फौरन दफा हो गए।

पर गांव में सन्नाटा और तनाव जारी था। गणेश तिवारी समझ गए कि केस लंबा खिंच गया और देर सबेर वह भी फंस सकते हैं। सो उन्होंने बड़ी चतुराई से पोलादन पासी, उसके बेटे और नाती की लाशों के पास से लाठी, भाला की बरामदगी दर्ज करवा दी। और फौजी तिवारी के वकील से मिल कर पेशबंदी कर ली। और वही हुआ जो वह चाहते थे। कोर्ट में उन्होंने साबित करवा लिया कि हरिजन ऐक्ट के नाम पर पोलादन पासी वगैरह फौजी तिवारी और उसके परिवार का उत्पीड़न कर रहे थे। यह पूरा मामला सवर्ण उत्पीड़न का है। पर सवर्ण उत्पीड़न पर कोई कानून नहीं है। सो वह इसका ठीक से प्रतिरोध नहीं कर पाए और हरिजन ऐक्ट के तहत पूर्व में जेल गए। तब जब कि बाकायदा नकद पांच लाख रुपए दे कर होशोहवास में खेत की रजिस्ट्री करवाई थी। पोलादन को यह पांच लाख रुपया देने का प्रमाण भी गणेश तिवारी ने पेश करवा दिया और खुद गवाह बन गए। बात हत्या की आई तो फौजी तिवारी के वकील ने इसे हत्या नहीं, आत्मरक्षार्थ कार्रवाई स्टैब्लिश किया। बताया कि तीन-तीन लोग लाठी भालों से लैस उसे मारने आ रहे थे तो उसके मुवक्किल को अपनी रक्षा ख़ातिर गोली चलानी पड़ी। कई पेशियों, तारीख़ों के बाद जिला जज भी वकील की इस बात से ‘कनविंस’ हो गया। रही बात पोलादन की नातिन के साथ बलात्कार की तो जांच और परीक्षण में वह भी ‘हैबीचुअल’ पाई गई। और यह मामला भी ले दे कर रफा दफा हो गया। पोलादन की नातिन भी चुपचाप ‘मुआवजा’ पा कर ‘ख़ामोश’ हो गई थी।’

बेचारी करती भी तो क्या?

सब कुछ निपट जाने पर एक दिन फौजी तिवारी के घर गणेश तिवारी पहुंचे। खांसते-खखारते। बात ही बात में गांधी टोपी ठीक कर के जाकेट में हाथ डालते हुए वह बोले, ‘आखि़र अपना ख़ून अपना, ख़ून है।’

‘चुप्प माधरचोद!’ फौजी तिवारी का छोटा बेटा बोला, ‘जिंदगी जहन्नुम बना दी पचीस हजार रूपए की दलाली ख़ातिर और अपना ख़ून, अपना ख़ून की रट लगाए बैठा है।’ वह खौलते हुए बोला, ‘भाग जा बुढ्ढे माधरचोद नहीं तुमको भी गोली मार दूंगा। तुम्हें मारने पर हरिजन ऐक्ट भी नहीं लगेगा।’

‘राम-राम! बच्चा बऊरा गया है। नादान है।’ कह कर गणेश तिवारी ने मनुहार भरी आंखों से फौजी तिवारी की ओर देखा। तो फौजी तिवारी की आंखें भी गणेश तिवारी को तरेर रही थीं। सो ‘नारायन-नारायन!’ करते हुए गणेश तिवारी ने बेआबरू हो कर ही सही वहां से खिसक लेने में ही भलाई सोची।

तो यह और ऐसी तमाम कथाओं और किंवदंतियों के केंद्र में रहने वाले यही गणेश तिवारी भुल्लन तिवारी की नतिनी की शादी में रोड़ा बनने की भूमिका बांध रहे थे। कारण दो थे। एक तो यह कि भुल्लन तिवारी की नतिनी की शादी ख़ातिर पट्टीदारी के लोगों में नामित ‘संभ्रांत’ में लोक कवि ने उनका नाम क्यों नहीं रखा। नाम रखना तो दूर मिलना भी जरूरी नहीं समझा। तब जब कि वह उन का ‘शिष्य’ है। दूसरा कारण यह था कि उन की जेब इस शादी में कैसे किनारे रह गई? तो इस तरह अहं और पैसा दोनों की भूख उनकी तुष्ट नहीं हो रही थी। सो ऐसे में वह चैन से कैसे बैठे रहते भला? ख़ास कर तब और जब लड़की का ख़ानदान ऐबी हो। बाप एड्स से मरा था और आजा जेल में था! फिर भी उन्हें नहीं पूछा गया। तो क्या उनकी ‘प्रासंगिकता’ गांव जवार में ख़तरे में पड़ गई थी? क्या होगा उनकी विलेज बैरिस्टरी का ? क्या होगा उनकी बियहकटवा वाली कलाकारी का?

वैसे तो हर गांव, हर जवार की हवा में शादी काटने वाले बियहकटवा बिचरते ही हैं। कोई नए रूप में, कोई पुराने रूप में तो कोई बहुरुपिया रूप में। लेकिन इस सब कुछ के बावजूद गणेश तिवारी का कोई सानी नहीं था। जिस सफाई, जिस सलीके, जिस सादगी से वह बियाह काटते थे उस पर अच्छे-अच्छे न्यौछावर हो जाएं। लड़की हो या लड़का सबके ऐब वह इस चतुराई से उघाड़ते और लगभग तारीफ के पुल बांधते हुए कि लोग लाजवाब हो जाते। और उनका ‘काम’ अनायास ही हो जाता। अब कि जैसे किसी लड़की का मसला हो तो वह बताते, ‘बड़ी सुंदर, बड़ी सुशील। पढ़ने लिखने में अव्वल। हर काम में ‘निपुण’। ऐसी सुशील लड़की आप को हजार वाट का बल्ब बार कर खोजिए तो नहीं मिलेगी। और सुंदर इतनी कि बाप रे बाप पांच छ लौंडे तक पगला चुके हैं।’

‘का मतलब?’

‘अरे, दू ठो तो अभिए मेंटल अस्पताल से वापिस आए हैं।’

‘इ काहें?’

‘अरे उन बेचारों का का दोष। ऊ लड़की हई है एतनी सुंदर।’ वह बताते, ‘बड़े-बड़े विश्वामित्र पगला जाएं।’

‘उसकी सुंदरता से इनके पागलपन का क्या मतलब ?

‘ए भाई, चार दिन आप से बतियाए और पांचवें दिन दूसरे से बोलने-बतियाने लगे, फिर तीसरे, चौथे से। तो बकिया तो पगला ही जाएंगे न!’

‘ई का कह रहे हैं आप?’ पूछने वाले का इशारा होता कि, ‘आवारा है क्या?’

‘बाकी लड़की गुणों की खान है।’ गणेश तिवारी अगले का सवाल और संकेत जानबूझ कर पी जाते और तारीफ के पुल बांधते जाते। उनका काम हो जाता।

कहीं-कहीं वह लड़की की ‘हाई हील’ की तारीफ कर बैठते पर संकेत साफ होता कि नाटी है। तो कहीं वह लड़की के मेकअप कला की तारीफ करते हुए संकेत देते कि लड़की सांवली है। बात और बढ़ानी होती तो वह डाक्टर, चमाइन, दाई, नर्स वगैरह शब्द भी हवा में बेवजह उछाल देते किसी न किसी हवाले से और संकेत एबार्सन का होता। भैंगी आंख, टेढ़ी चाल, मगरूर, घुंईस, गोहुवन जैसे पुराने टोटके भी वह सुरती ठोंकते खाते आजमा जाते। उनकी युक्तियों और उक्तियों की कोई एक चौहद्दी, कोई एक फ्रेम, कोई एक स्टाइल नहीं होती। वह तो नित नई होती रहती। मां का झगड़ालू होना, मामा का गुंडा होना, बाप का शराबी होना, भाई का लुक्कड़ या लखैरा होना वगैरह भी वह ‘अनजाने’ ही सुरती थूकते-खांसते परोस देते। लेकिन साथ-साथ यह संपुट भी जोड़ते जाते कि, ‘लेकिन लड़की है गुणों की खान।’ फिर अति सुशील, अति सुंदर सहित हर कार्य में निपुण, पढ़ाई-लिखाई में अव्वल, गृह कार्य में दक्ष वगैरह।’

यही-यही और ऐसी-ऐसी तरकीबें वह लड़कों के साथ भी आजमाते। ‘बड़ा होनहार, बड़ा वीर’ कहते हुए उसकी ‘संगत’ का भी बखान बघार जाते और काम हो जाता।

एक बार तो गजब हो गया। एक लड़के के पिता ने बड़े जतन से उस रोज बेटे की तिलक का मुहुर्त निकलवाया जिस दिन क्या उस दिन के आगे-पीछे भी गांव में गणेश तिवारी की उपस्थिति संभव नहीं थी। पर जाने कहां से ऐन तिलक चढ़ने के कुछ समय पहले वह न सिर्फ गांव में प्रगट हो गए बल्कि उसके घर उपस्थित हो गए। न सिर्फ उपस्थित हुए जाकेट से हाथ निकाल कर गांधी टोपी ठीक करते-करते तिलक चढ़ाने आए तिलकहरुवों के बीच जा कर बैठ गए। उन के वहां बैठते ही घर भर के लोगों के हाथ पांव फूल गए। दिल धकधकाने लगे। लोगों ने तिलकहरुवों की आवभगत छोड़ कर गणेश तिवारी की आवभगत शुरू कर दी। लड़के के पिता और बड़े भाई ने गणेश तिवारी के आजू-बाजू अपनी ड्यूटी लगा ली। ताकि उनके सम्मान में कोई कमी न आए दूसरे, उनके मुंह से कहीं लड़के की तारीफ न शुरू हो जाए। गणेश तिवारी का नाश्ता अभी चल रहा था और वह पूरी तरह ठीक वैसे ही काबू में थे जैसे अख़बारों में दंगों आदि के बाद ख़बरों का शीर्षक छपता है ‘स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्राण में।’ तो ‘तनावपूर्ण लेकिन नियंत्राण में’ वाली स्थिति में ही लड़के के पिता को एक उपाय यह सूझा कि क्यों न बेटे को बुला कर गणेश तिवारी के पांव छुलवा कर इनका आशीर्वाद दिला दिया जाए। ताकि गणेश तिवारी का अहं तुष्ट हो जाए और तिलक तथा विवाह बिना विघ्न-बाधा के संपन्न हो जाएं। और उन्होंने ऐसा ही किया। तेजी से घर में गए और उसी फुर्ती से बेटे को लिए चेहरे पर अतिरिक्त उत्साह और मुसकान टांके गणेश तिवारी के पास ले गए जो बीच तिलकहरुओं के स्पेशल नाश्ता पर जुटे हुए थे। लड़के को देखते ही गणेश तिवारी ने धोती की एक कोर उठाई और मुंह पोंछते हुए लड़के के पिता से भी ज्यादा मुसकान और उत्साह अपने चेहरे पर टांक लिया और आंखों का कैमरा ‘क्लोज शाट’ में लड़के पर ही टिका दिया। पिता के इशारे पर लड़का झुक कर दोनों हाथों से गणेश तिवारी के दोनों पांव दो-दो बार एक ही क्रम में कुछ छू कर चरण-स्पर्श कर ही रहा था कि गणेश तिवारी ने आशीर्वादों की झड़ी लगा दी। सारे विशेषण, सारे आशीर्वाद दे कर उन्होंने आखि़र अपना ब्रह्ममास्त्र फेंक दिया, ‘जियो बेटा! पढ़ाई लिखाई में तुम अव्वल थे ही, नौकरी भी तुम्हें अव्वल मिली है। वह बोले, ‘अब भगवान के आशीर्वाद से तुम्हारा विवाह भी हो ही रहा है। बस भगवान की कृपा से तुम्हारी मिर्गी भी ठीक हो जाए तो क्या कहना!’ वह बोले, ‘चलो हमारा पूरा-पूरा आशीर्वाद है!’ कह कर उन्होंने लड़के की पीठ थपथपाई। तिलकहरुओं की ओर मुसकुराते हुए मुखातिब हुए और लगभग वीर रस में बोले, ‘हमारे गांव, हमारे कुल की शान हैं ये।’ उन्होंने जोड़ा, ‘रतन है रतन। आप लोग बड़े खुशनसीब हैं जो ऐसे योग्य और होनहार युवक को अपना दामाद चुना है।’ कह कर वह उठ खड़े हुए बोले, ‘लंबी यात्रा से लौटा हूं। थका हुआ हूं। विश्राम जरूरी है। क्षमा करें चल रहा हूं। आज्ञा दें।’ कह कर दोनों हाथ उन्होंने जोड़े और वहां से चल दिए।

गणेश तिवारी तो वहां से चल दिए पर तिलकहरुओं की आंखों और मन में सवालों का सागर छोड़ गए। पहले तो आंखों-आंखों में यह सवाल सुलगा। फिर जल्दी ही जबान पर बदकने लगा यह सवाल कि, ‘लड़के को मिर्गी आती है?’ कि, ‘लड़का तो मिर्गी का रोगी है?’ कि, ‘मिर्गी के रोगी लड़के से शादी कैसे हो सकती है?’ कि, ‘लड़की की जिंदगी नष्ट करनी है क्या?’ और अंततः इन सवालों की आग शोलों में तब्दील हो गई। लड़के के पिता, भाई, नाते-रिश्तेदार और गांव के लोग भी सफाई देते रहे, कसमें खाते रहे कि, ‘लड़के को मिर्गी नहीं आती, ‘कि ‘लड़के को मिर्गी आती तो नौकरी कैसे मिलती ?’ कि ‘अगर शक हो ही गया है तो डाक्टर से जांच करवा लें!’ आदि-आदि। पर इन सफाइयों और कसमों का असर तिलकहरुओं पर जरा भी नहीं पड़ा। और वह लोग जो कहते हैं थारा-परात, फल-मिठाई, कपड़ा-लत्ता, पैसा वगैरह ले कर वहां से उठ खड़े हुए। फिर बिना तिलक चढ़ाए ही चले गए। यह कहते हुए, कि ‘लड़की की जिंदगी नष्ट होने से बच गई।’ साथ ही गणेश तिवारी की ओर भी इंगित करते हुए कि, ‘भला हो उस शरीफ आदमी का जिसने समय रहते आंखें खोल दीं। नहीं हम लोग तो फंस ही गए थे। लड़की की जिंदगी नष्ट हो जाती!’

अनायास ही जैसे आशीर्वाद दे कर गणेश तिवारी ने इस लड़के को निपटाया था वैसे ही भुल्लन तिवारी की नतिनी की शादी में भी वह अनायास ही के भाव में सायास निपटाने ख़ातिर जुट गए थे। भुल्लन तिवारी की नातिन को कम लोक कवि की जेब के बहाने अपनी गांठ की चिंता उन्हें कहीं ज्यादा सक्रिय किए थी। बात वैसे ही बिगड़ी हुई थी, गणेश तिवारी की सक्रियता ने आग में घी का काम किया। अंततः बात लोक कवि तक पहुंची। पहुंचाई भुल्लन तिवारी के बेटे के साले ने लखनऊ में और कहा कि, ‘बहिन के भाग में अभाग लिखा ही था लगता है भांजी के भाग में एहसे बड़ा अभाग लिखा है।’’

‘घबराइए मत।’ लोक कवि ने उन्हें सांत्वना दी। कहा कि, ‘सब ठीक हो जाएगा।’

‘कइसे ठीक हो जाएगा?’ साला बोला, ‘जब गणेश तिवारी का जिन्न उसके बियाह के पीछे लग गया है। जहां जाइए आप के पहले गणेश तिवारी चोखा चटनी लगा के सब मामिला पहिले ही बिगाड़ चुके होते हैं!’

‘देखिए अब का कहूं मैं, आप भी ब्राह्मण हैं। हमारे देवता तुल्य हैं बकिर बुरा मत मानिएगा।’ लोक कवि बोले, ‘गणेश तिवारी भी ब्राह्मण हैं। हमारे आदरणीय हैं। बकिर हैं कुत्ता। कुत्ते से भी बदतर!’ लोक कवि ने जोड़ा, ‘कुत्ते का इलाज हम जानता हूं। दू चार हजार मुंह पर मार दूंगा तो ई गुर्राने, भूंकने वाला कुत्ता दुम हिलाने लगेगा।’

‘लेकिन कब? जब सबहर जवार जान जाएगा तब? जब सब लोग थू-थू करने लगेंगे तब?’

‘नाहीं जल्दिए।’ लोक कवि बोले, ‘अब इहै गणेश तिवारिए आप के भांजी का तारीफ करेगा।’

‘तारीफ त करी रहा है।’ साला बोला, ‘तारीफ कर के ही तो ऊ काम बिगाड़ रहा है। कि लड़की सुंदर है, सुशील है। बकिर बाप अघोड़ी था। एड्स से मर गया और आजा खूनी है। जेल में बंद है।’

‘त ई बतिया कहां से छुपा लेंगे आप और हम?’

‘नाहीं बाति एहीं तक थोड़े ही है।’ वह बोला, ‘गणेश तिवारी प्रचारित कर रहे हैं कि भुल्लन तिवारी के पूरे परिवार को एड्स हो गया है। साथ ही भांजी का भी नाम वह नत्थी कर रहे हैं।’

‘भांजी को कैसे नत्थी कर लेंगे?’ लोक कवि भड़के।

‘ऊ  अइसे कि....। साला बोला, ‘जाने दीजिए ऊ बहुत गिरी हुई बात कहते हैं।’

‘का कहते हैं?’ धीरे से बुदबुदाए लोक कवि, ‘अब हमसे छुपाने से का फषयदा? आखि़र ऊ तो कहि रहे हैं न?’

‘ऊ  कह रहे हैं जीजा जी के लिए कि अघोड़ी था बेटी तक को नहीं छोड़ा। सो बेटी को भी एड्स हो गया है।’

‘बड़ा कमीना है!’ कह कर लोक कवि ने पुच्च से मुंह में दबी सुरती थूकी। बोले, ‘आप चलिए। हम जल्दिए गणेश तिवारी को लाइन पर लाता हूं।’ वह बोले, ‘ई बात था तो पहिलवैं बताए होते एह कमीना कुत्ता का इलाज हम कर दिए होते।’

‘ठीक है तो जइसे एतना देखें हैं आप तनी एतना और देख लीजिए।’ कह कर साला उठ खड़ा हुआ।

‘ठीक है, त फिर प्रणाम!’ कह कर लोक कवि ने दोनों हाथ जोड़ लिए।

भुल्लन तिवारी के बेटे के साले के जाते ही लोक कवि ने चेयरमैन साहब को फोन मिलाया और पूरी रामकहानी बताई। चेयरमैन साहब छूटते ही बोले, ‘जो पइसा तुम उसको देने को सोच रहे हो वही पइसा किसी लठैत या गुंडा को दे कर उसकी कुट्टम्मस करवा दो। भर हीक कुटवा दो, हाथ पैर तोड़वा दो सारा नारदपना भूल जाएगा।’

‘ई ठीक पड़ेगा भला?’ लोक कवि ने पूछा।

‘काहें बुरा का होगा? चेयरमैन साहब ने भी पूछा। वह बोले, ‘ऐसे कमीनों के साथ यही करना चाहिए।’

‘आप नहीं जानते ऊ दलाल है। हाथ पैर टूट जाने के बाद भी ऊ कवनो अइसन डरामा रच लेगा कि लेना का देना पड़ जाएगा।’ लोक कवि बोले, ‘जो अइसे मारपीट से ऊ सुधरने वाला होता तो अबले कई राउंड वह पिट-पिटा चुका होता। बड़ा तिकड़मी है सो आज तक कब्बो नाहीं पिटा।’ वह बोले, ‘खादी वादी पहन कर अहिंसा-पहिंसा वइसै बोलता रहता है। कहीं पुलिस-फुलिस का फेर पड़ गया तो बदनामी हो जाएगी।’

‘त का किया जाए? तुम्हीं बोलो !’

‘बोलना का है चल के कुछ पैसा उसके मुंह पर मारि आना है!’

‘त इसमें हम का करें?’

‘तनी सथवां चलि चलिए। और का!’

‘तुम्हारा शैडो तो हूं नहीं कि हरदम चला चलूं तुम्हारे साथ!’

‘का कहि रहे हैं चेयरमैन साहब!’ लोक कवि बोले, ‘आप तो हमारे गार्जियन हैं।’

‘ई बात है?’ फोन पर ही ठहाका मारते हुए चेयरमैन साहब बोले, ‘तो चलो कब चलना है ?’

‘नहीं, दू चार ठो पोरोगराम इधर लगे हैं, निपटा दूं तो बताता हूं।’ लोक कवि बोले, ‘असल में का है कि एह तर के बातचीत में आप के साथ होने से मामला बैलेंस रहता है और बिगड़ा काम बन जाता है।’

‘ठीक है, ठीक है ज्यादा चंपी मत करो। जब चलना तो बताना।’ वह रुके और बोले, ‘अरे हां, दुपहरिया में आज का कर रहे हो?’

‘कुछ नाईं, तनी रिहर्सल करेंगे कलाकारों के साथ।’

‘तो ठीक है जश्रा बीयर-सीयर ठंडी-ठंडी मंगवा लेना मैं आऊंगा।’ वह बोले, ‘तुमको और तुम्हारे रिहर्सल को डिस्टर्ब नहीं करुंगा। मैं चुपचाप पीता रहूंगा और तुम्हारा रिहर्सल देखता रहूंगा।’

‘हां, बकिर लड़कियों के साथ नोचा-नोची मत करिएगा।’

‘का बेवकूफी का बात करते हो।’ वह बोले, ‘तुम बस बीयर मंगाए रखना।’

‘ठीक है आइए!’ लोक कवि बेमन से बोले।

चेयरमैन साहब बीच दोपहर लोक कवि के पास पहुंच गए। रिहर्सल अभी शुरू भी नहीं हुआ था लेकिन चेयरमैन साहब की बीयर शुरू हो गई। बीयर के साथ के लिए लइया चना, मूंगफली और पनीर के कुछ टुकड़े कटवा कर मंगवा लिए थे। एक बोतल बीयर जब वह पी चुके और दूसरी बोतल खोलने लगे तो बोतल खोलते-खोलते वह लोक कवि से बेलाग हो कर बोले, ‘कुछ मटन-चिकन मंगवाओ और ह्विस्की भी!’ उन्हों ने जोड़ा, ‘अब ख़ाली बीयर-शीयर से दुपहरिया नहीं गुजरने वाली।’

‘अरे, लेकिन रिहर्सल होना है अभी।’ लोक कवि हिचकते हुए संकोच घोलते हुए बोले।

‘रिहर्सल को कौन रोक रहा है?’ चेयरमैन साहब बोले, ‘तुम रिहर्सल करते-करवाते रहो। मैं खलल नहीं डालूंगा। किचबिच-किचबिच मत करो, चुपचाप मंगवा लो।’ कह कर उन्हों ने जेब से कुछ रुपए निकाल कर लोक कवि की ओर फेंक दिए।

मन मार कर लोक कवि ने रुपए उठाए, एक चेले को बुलाया और सब चीजें लाने के लिए बाजार भेज दिया। इसी बीच रिहर्सल भी शुरू हो गया। तीन लड़कियों ने मिल कर नाचना और गाना शुरू कर दिया। हारमोनियम, ढोलक, बैंजो, गिटार, झाल, ड्रम बजने लगे। लड़कियां नाचती हुई गा रही थीं, ‘लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला / आलू, केला खइलीं त एतना मोटइलीं / दिनवा में खा लेहलीं, दू-दू रसगुल्ला!’ और बाकायदा झुल्ला दिखा-दिखा कर, आंखों को मटका-मटका कर, कुल्हों और छातियों के स्पेशल मूवमेंट्स के साथ वह गा रही थीं। और इधर ह्विस्की की चुस्की ले-ले कर चेयरमैन साहब भर-भर आंख ‘यह सब’ देख रहे थे। देख क्या रहे थे पूरा-पूरा मजा ले रहे थे। गाने की रिहर्सल ख़त्म हुई तो चेयरमैन साहब ने दो लड़कियों को अपनी तरफ बुलाया। दोनों सकुचाती हुई पहुंचीं तो उन्हें आजू-बाजू कुर्सियों पर बिठाया। उन दोनों की गायकी की तारीफ की। फिर इधर उधर की बातें करते हुए वह एक लड़की का गाल सहलाने लगे। गाल सहलाते-सहलाते बोले, ‘इसको थोड़ा चिकना और सुंदर बनाओ!’ लड़की लजाई। सकुचाती हुई बोली, ‘प्रोग्राम में मेकअप कर लेती हूं। सब ठीक हो जाता है।’

‘कुछ नहीं!’ चेयरमैन साहब बोले, ‘मेकअप से कब तक काम चलेगा? जवानी में ही मेकअप कर रही हो तो बुढ़ापे में का करोगी?’ वह बोले, ‘कुछ जूस वगैरह पियो, फल फ्रूट खाओ!’ कहते हुए वह अचानक उसकी ब्रेस्ट दबाने लगे, ‘यह भी बहुत ढीला है। इसको भी टाइट करो!’ लड़की अफना कर उठ खड़ी हुई तो वह उसकी हिप को लगभग दबाते और थपथपाते हुए बोले, ‘यह भी ढीला है, इसे भी टाइट करो। कुछ एक्सरसाइज वगैरह किया करो। अभी जवान हो, अभी से यह सब ढीला हो जाएगा तो कैसे काम चलेगा।’ वह सिगरेट का एक लंबा कश भरते हुए बोले, ‘सब टाइट रखो। जमाना टाइट का है। और अफना के भाग कहां रही हो? बैठो यहां अभी तुम्हें कुछ और भी बताना है।’ लेकिन वह लड़की ‘अभी आई!’ कह कर बाहर निकल गई। तो चेयरमैन साहब दूसरी लड़की की ओर मुखातिब हो गए जो बैठी-बैठी अर्थपूर्ण ढंग से मुसकुरा रही थी। तो उसे मुसकुराते देख चेयरमैन साहब भी मुसकुराते हुए बोले, ‘का रे तुम काहें बड़ा मुसकुरा रही है?’

‘ऊ लड़की अभी नई है चेयरमैन साहब!’ इठलाती हुई वह बोली, ‘अभी रंग नहीं चढ़ा है उस पर!’

‘बकिर तुम तो रंगा गई है!’ उसके दोनों गाल मीजते हुए चेयरमैन साहब बहकते हुए बोले।

‘ई सब हमरहू साथे मत करिए चेयरमैन साहब।’ वह किंचित सकुचाती, लजाती और लगभग प्रतिरोध दर्ज कराती हुई बोली, ‘हमारा भाई अभी आने वाला है। कहीं देख लेगा तो मुश्किल हो जाएगी।’

‘का मुश्किल हो जाएगी?’ वह उसके स्तनों की ओर एक हाथ बढ़ाते हुए बोले, ‘का गोली मार देगा?’

‘हां, मार देगा गोली!’ वह चेयरमैन साहब का हाथ बीच में ही दोनों हाथ रोकती हुई बोली, ‘झाड़ई, जूता, गोली जो भी पाएगा मार देगा?’

यह सुनते ही चेयरमैन साहब ठिठक गए। बोले, ‘का गुंडा, मवाली है का?’

‘है तो नहीं गुंडा मवाली पर जो आप लोग अइसेही करिएगा तो बन जाएगा!’ वह बोली, ‘वह तो हमारे गाने-नाचने पर भी बड़ा ऐतराज मचाता है। ऊ नहीं चाहता है कि हम प्रोग्राम करें।’

‘क्यों?’ चेयरमैन साहब की सनक अब तक सुन्न हो चुकी थी। सो वह दुबारा बड़े सर्द ढंग से बोले, ‘क्यों?’

‘ऊ  कहता है रेडियो, टी.वी. तक तो ठीक है। ज्यादा से ज्यादा सरकारी कार्यक्रम कर लो बस। बाकी प्राइवेट कार्यक्रम से ऊ भड़कता है।’

‘काहें?’

‘ऊ कहता है भजन, गीत, गजल तक तो ठीक है पर ई फिल्मी उल्मी गाना, छपरा हिले बलिया हिले टाइप गाना मत गाया करो।’ यह रुकी और बोली, ‘ऊ तो हमीं को कहता है कि नहीं मानोगी तो एक दिन ऐन कार्यक्रम में गोली मार दूंगा और जेल चला जाऊंगा!’

‘बड़ा डैंजर है साला!’ सिगरेट झाड़ते हुए चेयरमैन साहब उठ खड़े हुए। खंखारते हुए उन्होंने लोक कवि को आवाज दी और बोले, ‘तुम्हारा ई अड्डा बड़ा ख़तरनाक हो रहा है। मैं तो जा रहा हूं।’ कह कर वह सचमुच वहां से चल दिए। लोक कवि उनके पीछे-पीछे लगे भी कि, ‘खाना मंगवा रहा हूं खा-पी कर जाइए।’ फिर भी वह नहीं माने तो लोक कवि बोले, ‘एक आध पेग दारू और हो जाए!’ पर चेयरमैन साहब बिन बोले हाथ हिला कर मना करते हुए बाहर आ कर अपनी एंबेसडर में बैठ गए और ड्राइवर को इशारा किया कि बिना कोई देरी किए अब यहां से निकल चलो।

उनकी एंबेसडर स्टार्ट हो गई। चेयरमैन साहब चले गए।

भीतर वापस आ कर लोक कवि उस लड़की से हंसते हुए बोले, ‘मीनू तुमने तो आज चेयरमैन साहब की हवा टाइट कर दी!’

‘का करते गुरु जी आखि़र!’ वह किंचित संकोच में खुशी घोलती हुई बोली, ‘ऊ तो जब आप ने आंख मारी तभी हम समझ गई कि अब चेयरमैन साहब को फुटाना है।’

‘वो तो ठीक है पर वह तुम्हारा कौन भाई है जो इतना बवाली है?’ लोक कवि बोले, ‘उसको यहां मत लाया करो। डेंजर लोगों की यहां कलाकारों में जरूरत नहीं है।’

‘का गुरु जी आप भी चेयरमैन साहब की तरह फोकट में घबरा गए।’ मीनू बोली, ‘कहीं कवनो ऐसा भाई हमारा है? अरे, हमारा भाई तो एक ठो है जो भारी पियक्कड़ है। पी के हरदम मरा रहता है। उसको अपने बीवी बच्चों की ही फिकर नहीं रहती है तो हमारी फिकर कहां से करेगा?’ वह बोली, ‘और जो अइसे ही फिकर करता तो म्यूजिक पार्टियों में घूम-घूम कर प्रोग्राम ही क्यों करती?’

‘तुम तो बड़ी भारी कलाकार हो।’ मीनू की हिप पर हलकी सी चिकोटी काटते, सहलाते लोक कवि बोले, ‘बिलकुल डरामा वाली।’

‘अब कहां गुरु जी हम कलाकार रह गए। हां, पहले थे। दो तीन नाटक रेडियो पर भी हमारे आए थे।’

‘तो अब काहें नहीं जाती हो रेडियो पर?’ लोक कवि तारीफ के स्वर में बोले, ‘रेडियो पर ही क्यों टी.वी. सीरियलों पर भी जाओ!’

‘कहां गुरु जी?’ वह बोली, ‘अब कौन वहां पूछेगा।’

‘क्यों?’

‘फिल्मी गाने गा-गा कर फिल्मी कैसेटों पर नाच-नाच कर ऐक्टिंग वैक्टिंग भूल-भुला गई हूं।’ वह बोली, ‘और फिर यहां तुरंत-तुरंत पैसा भी मिल जाता है और रेगुलर मिलता है। लेकिन वहां पैसा कब मिलेगा, काम कब मिलेगा, काम देने वालों को भी नहीं पता होता है। और पैसे का तो और भी पता नहीं होता।’ वह रुकी और बोली, ‘हां, लेकिन लड़कियों को साथ सुलाने, लिपटाने-चिपटाने की बात सब को पता होती है।’

‘का बेवकूफी का बात करती हो।’ लोक कवि बोले, ‘कुछ और बात करो।’

‘काहें बुरा लग गया का गुरु जी!’ मीनू ठिठोली फोड़ती हुई बोली।

‘काहें नहीं बुरा लगेगा?’ लोक कवि बोले, ‘इसका मतलब है जो बाहर कहीं और जाती होगी तो अइसेही हमारी बुराई बतियाती होगी।’

‘अरे नहीं गुरु जी! राम-राम!’ कह कर वह अपने दोनों कान पकड़ती हुई बोली ‘आपके बारे में एह तरह का बात हम कहीं नहीं करती हूं।’ हम काहें ऐसा बात करूंगी गुरु जी!’ वह विनम्र होती हुई बोली, ‘आप हमें आसरा दिए गुरु जी। और हम एहसान फरामोश नहीं हूं।’ कह कर वह हाथ जोड़ कर लोक कवि के पांव छूने लगी।

‘ठीक है, ठीक है!’ लोक कवि आश्वस्त होते हुए बोले, ‘चलो रिहर्सल शुरू करो!’

‘जी गुरु जी!’ कह कर उसने हारमोनियम अपनी ओर खींचा और उस दूसरी लड़की जो थोड़ी दूर बैठी थी, उस को गुहराया और बोली ‘तुम भी आ जाओ भाई!’

वह लड़की भी आ गई तो हारमोनियम पर वह दोनों गाने लगीं, ‘लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला।’ इस को दुहराने के बाद दूसरी ने टेर ली और मीनू ने कोरस, ‘आलू केला खइली त एतना मोटइलीं, दिनवा में ख लेहलीं दू-दू रसगुल्ला, लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला।’ फिर दुबारा भी जब दोनों ने शुरू किया यह गाना कि, ‘लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला / आलू केला खइलीं....।’ तभी लोक कवि ने दोनों को डपट लिया, ‘यह क्या गा रही हो जी तुम लोग।’ वह बोले, ‘भजन गा रही हो कि देवी गीत कि गाना।’

‘गाना गुरु जी।’ दोनों एक साथ बोल पड़ीं।

‘तो इतना स्लो क्यों गा रही हो?’

‘स्लो नहीं गुरु जी, टेक ले कर न फास्ट होंगे!’

‘चोप्प साली।’ वह बोले, ‘टेक ले कर क्यों फास्ट होगी ? जानती नहीं हो डबल मीनिंग गाना है शुरू से ही इसे फास्ट में डाल दो।’

‘ठीक है गुरु जी!’ मीनू बोली, ‘बस ऊ ढोलक, बैंजो वाले भी आ जाते तो शुरू से फास्ट हो लेते। ख़ाली हरमुनिया पर तुरंतै कइसे फास्ट हो जाएं?’ उसने दिक्कत बताई।

‘ठीक है, ठीक है। रिहर्सल चालू रखो!’ कह कर लोक कवि चेयरमैन साहब द्वारा छोड़ दी गई बोतल से पेग बनाने लगे। शराब की चुस्की के साथ ही गानों के रिहर्सल पर भी नजर रखे रहे। तीन चार गानों के रिहर्सल के बीच ही ढोलक, गिटार, बैंजो, तबला, ड्रम, झाल वाले भी आ गए। सो सारे गाने लोक कवि के मन मुताबिक ‘फास्ट’ में फेंट कर गाए गए। इस बीच तीन लड़कियां और आ गईं। सजी-धजी, लिपी-पुती। देखते ही लोक कवि चहक पड़े। और अचानक गाना-बजाना रोकते हुए उन्होंने लगभग फरमान जारी कर दिया, ‘गाना-बजाना बंद करो, और कैसेट लगाओ। अब डांस का रिहर्सल होगा।’

....जारी....

उपन्यासकार दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424 और This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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