मीनू मध्य प्रदेश से चल कर लखनऊ आई थी

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: उपन्यास - लोक कवि अब गाते नहीं (9) : कैसेट बजने लगा और लड़कियां नाचने लगीं। साथ-साथ लोक कवि भी इस डांस में छटकने-फुदकने लगे। वैसे तो लोक कवि मंचों पर भी छटकते, फुदकते, थिरकते थे, नाचते थे। यहां फष्कषर्् सिर्फ इतना भर था कि मंच पर वह खुद के गाए गाने में ही छटकते फुदकते नाचते थे। पर यहां वह दिदलेर मेंहदी के गाए ‘बोल तररर’ गाने वाले बज रहे कैसेट पर छटकते फुदकते थिरक रहे थे।

न सिर्फष् थिरक रहे थे, लड़कियों को कूल्हे, हिप, चेहरे और छातियों के मूवमेंट भी ‘पकड़-पकड़’ कर बताते जा रहे थे। हां, एक फष्कषर्् यह भी था कि मंच पर थिरकने में माइक के अलावा उन के एक हाथ में तुलसी की माला भी होती थी। पर यहां उन के हाथ में न माइक था, न माला। यहां उन के हाथ में शराब की गिलास थी जिसको कभी-कभी वह आस पास की किसी कुर्सी या किसी जगह पर रख देते थे, लड़कियों को कूल्हे, छातियों और हिप्स की मूवमेंट बताने ख़ातिर। आंखों, चेहरे और बालों की शिफष्त बताने ख़ातिर। लड़कियां तो कई थीं इस डांस रिहर्सल में और लोक कवि लगभग सभी पर ‘मेहरबान’ थे। पर मीनू नाम की लड़की पर वह ख़ास मेहरबान थे। जब तब वह मूवमेंट्स सिखाते-सिखाते उसे चिपटा लेते, चूम लेते, उसके बालों, गालों सहित उसकी ‘36’ वाली हिप ख़ास तौर पर सहला देते। तो वह मादक सी मुसकान भी रह-रह फेंक देती। बिलकुल कृतज्ञता के भाव में। गोया लोक कवि उसके बाल, गाल या हिप सहला कर उस पर ख़ास एहसान कर रहे हों। और जब वह मादक सी, मीठी सी मुसकान फेंकती तो उसमें सिर्फ लोक कवि ही नहीं, वहां उपस्थित सभी नहा जाते। मीनू दरअसल थी ही इस कष्दर मादक कि वह मुसकुराए तो भी, न मुसकुराए तो भी लोग उसकी मादकता में उभ-चूभ डूब ही जाते। मंचों पर तो कई बार उसकी इस मादकता से मार खाए बाऊ साहब टाइप लोगों या बाकों और शोहदों में गोली चलने की नौबत आ जाती और जब वह कुछ मादक फिष्ल्मी गानों पर नाचती तो सिर फुटव्वल मच जाती। ‘झूमेंगे गश्जश्ल गाएंगे लहरा के पिएंगे, तुम हमको पिलाओ तो बल खा केे पिएंगे....’ अर्शी हैदराबादी की गाई गश्जश्ल पर जब वह पानी से भरी बोतल को ‘डबल मीनिंग’ में हाथों में ले कर मंच से नीचे बैठे लोगों पर पानी उछालती तो ज्श्यादातर लोग उस पानी में भींगने के लिए पगला जाते। भले ही सर्दी उन्हें सनकाए हो तो भी वह पगलाए आगे कूद कर भागते आते। कभी-कभार कुछ लोग इस तरह की हरकत का बुरा भी मानते पर जवानी के जोश में आए लोग तो ‘बल खा के पिएंगे’ में बह जाते। बह जाते मीनू की बल खाती, धकियाती ‘हिप मूवमेंट्स’ के हिलकोरों मे। बढ़ियाई नदी की तरह उफनाई छातियों के हिमालय में खो जाते। खो जाते उस के अलस अलकों के जाल में। और जो इस पर कोई टू-टपर करे तो बाहों की आस्तीनें मुड़ जातीं। छूरे, कट्टे निकल आते। पिस्तौलें, राइफलें तन जातीं। फिर दौड़ कर आते पुलिस वाले, दौड़ कर आते कुछ ‘सभ्य, शरीफष् और जिश्म्मेदार लोग’ तब जा के यह जवानी का ज्वार बमुश्किल थमता। पर ‘झूमेंगे गश्जश्ल गाएंगे लहरा के पिएंगे, तुम हमको पिलाओ तो बल खा के पिएंगे....।’ का बुखार नहीं उतरता।

एक बार तो अजश्ब ही हो गया। कुछ बांके इतने बऊरा गए कि मीनू के मादक डांस पर ऐसे हवाई फषयरिंग करने लगे गोया फषयरिंग नहीं संगत कर रहे हों। फषयरिंग करते-करते वह बांके मंच पर चढ़ने लगे तो पुलिस ने ‘हस्तक्षेप’ किया। पुलिस भी मंच पर चढ़ गई। सबके हथियार कब्जश्े में कर लिए और बांकों को मंच से नीचे उतार दिया। तो भी अफरा तफरी मची रही। डांसर मीनू को मंच पर एक दारोगा ने भीड़ से बचाया। बचाते-बचाते वह अंततः मीनू पर खुद ही स्टार्ट हो गया। हिप, ब्रेस्ट, गाल, बाल सब पर रियाजश् मारने लगा। और जब एक बार मीनू को लगा कि भीड़ कुछ करे न करे, यह दारोगा इसी मंच पर जहां वह अभी-अभी नाची थी उसे जश्रूर नंगा कर देगा। तो वह अफनाई उकताई अचानक जशेर से चिल्लाई, ‘भाइयों इस दारोगा से मुझे बचाओ!’ फिर तो बौखलाई भीड़ उस दारोगा पर पिल पड़ी। मीनू तो बच गई उस सार्वजनिक अपमान से पर दारोगा की बड़ी दुर्गति हो गई। पहले राउंड में उसके बिल्ले, बैज, टोपी गई। फिर रिवाल्वर गया और अंततः उसकी देह से वर्दी से लगायत बनियान तक नुच-चुथ कर गशयब हो गई। अब वह था और उसका कच्छा था जो उसकी देह को ढंके हुए था। फिर भी वह मुसकुरा रहा था। ऐसे गोया सिकंदर हो। इस लिए कि वह खूब पिए हुए भी था। उसको वर्दी, रिवाल्वर, बैज, बिल्ला, टोपी आदि की याद नहीं थी। क्यों कि वह तो मीनू के मादक देह स्पर्श में जहां तहां नहाया हुआ मुसकुराता ऐसे खड़ा था, गोया वह जीता जागता आदमी नहीं, स्टैच्यू हो।

यहां रिहर्सल में मीनू के साथ लोक कवि भी लगभग वही कर रहे थे जो मंच पर तब दारोगा ने किया था। पर मीनू न तो यहां अफनाई दिख रही थी, न उकताई। खीझ और खुशी की मिली जुली रेखाएं उसके चेहरे पर तारी थीं। इसमें भी खीझ कम थी और खुशी ज्श्यादा।

खुशी ग्लैमर और पैसे की। जो लोक कवि की कृपा से ही उसे मयस्सर हुई थी। हालां कि यह खुशी, पैसा और ग्लैमर उसे उसकी कला की बदौलत नहीं, कला के दुरुपयोग के बल पर मिली थी। लोक कवि की टीम की यह ‘स्टार’ अश्लील और कामुक डांस के नित नए कीर्तिमान रचती जा रही थी। इतना कि वह अब औरत से डांसर, डांसर से सेक्स बम में तब्दील हो चली थी। इस स्थिति में वह खुद को घुटन में घसीटती हुई बाहर-बाहर चहचहाती रहती। चहचहाती और जब तब चिहुंक पड़ती। चिहुंकती तब जब उसे अपने बेटे की याद आ जाती। बेटे की याद में कभी-कभी तो वह बिलबिला कर रोने लगती। लोग बहुत समझाते, चुप कराते पर वह तो किसी बढ़ियाई नदी की तरह बहती जाती। वह पति, परिवार सब कुछ भूल भुला जाती लेकिन बेटे को ले कर बेबस थी। भूल नहीं पाती।

यह खुशी, पैसा और ग्लैमर मीनू ने बेटे से बिछड़ने की कष्ीमत पर बटोरा था।

बिछड़ी तो वह पति से भी थी। लेकिन पति की कमी ख़ास कर देह के स्तर पर पूरी करने वाले मीनू के पास ढेरों पुरुष थे। हालां कि पति वाली भावनात्मक सुरक्षा की कमी भी उसे अखरती थी, इतना कि कभी-कभी तो वह विक्षिप्त सी हो जाती। तो भी देह में शराब भर कर वह उस गैप को पूरा करने की कोशिश करती। किसी-किसी कार्यक्रम के दौरान कभी-कभार यह तनाव ज्श्यादा हो जाता, शराब ज्श्यादा हो जाती, ज्श्यादा चढ़ जाती तो वह होटल के अपने कमरे से छटपटाती बाहर आ जाती और डारमेट्री में जा कर खुले आम किसी ‘भुखाए’ साथी कलाकार को पकड़ बैठती। कहती, ‘मुझे कस के रगड़ दो, जो चाहे कर लो, जैसे चाहो कर लो लेकिन मेरे कमरे में चलो!’

तो भी उसकी देह संतुष्ट नहीं होती। वह दूसरा, तीसरा साथी ढूंढ़ती। भावनात्मक सुरक्षा का सुख फिर भी नहीं मिलता। वह तलाशती रहती निरंतर। पर न तो देह का नेह पाती, न मन का मेह। एक डिप्रेशन का दंश उसे डाहता रहता।

मीनू मध्य प्रदेश से चल कर लखनऊ आई थी। पिता उसके बरसों से लापता थे। बड़ा भाई पहले लुक्कड़ हुआ, फिर पियक्कड़ हो गया। हार कर मां ने सब्जी बेचनी शुरू की पर मीनू की कलाकार बनने की धुन नहीं गई। वह रेडियो, टी.वी. में कार्यक्रमों ख़ातिर चक्कर काटते-काटते एक ‘कल्चरल ग्रुप’ के हत्थे चढ़ गई। यह कल्चरल ग्रुप भी अजब था। सरकारी आयोजनों में एक साथ डांडिया, कुमायंूनी, गढ़वाली, मणिपुरी, संथाली नृत्य के साथ-साथ भजन, गश्जश्ल कौव्वाली जैसे किसी कार्यक्रम की डिमांड तुरंत परोस देता था।

तो उस संस्था ने मीनू को भी अपने ‘मीनू’ में शुमार कर लिया। वह जब-तब इस संस्था के कार्यक्रमों में बुक होने लगी। बुक होते-होते वह उमेश के फेरे में आते-आते उसकी बांहों में दुबकने लगी। बाहों में दुबकते-दुबकते उसके साथ कब सोने भी लगी यह वह खुद भी नहीं नोट कर पाई। पर यह जश्रूर था कि उमेश जो उस संस्था में गिटार बजाता था, वह अब गिटार के साथ-साथ मीनू को भी साधने लगा। मीनू की यह फिसलन कोई पहली फिसलन नहीं थी। उमेश उसकी जिश्ंदगी में तीसरा या चौथा था। तीसरा कि चौथा वह इस नाते तय नहीं कर पाती थी कि पहली बार जिसके मोहपाश में वह बंधी वह सचमुच उसका प्यार था। पहले आंखें मिलीं फिर वह दोनों भी मिलने लगे पर कभी संभोग के स्तर पर नहीं मिले। चूमा चाटी तक ही रह गए दोनों। ऐसा नहीं कि संभोग मीनू के लिए कोई टैबू था या वह चाहती नहीं थी। बल्कि वह तो आतुर थी। पर स्त्राी सुलभ संकोच में कुछ कह नहीं पाई और वह भी संकोची था। फिर कोई जगह भी उपलब्ध नहीं हुई तब दोनों को इस लिए वह देह के स्तर पर नहीं मिल पाए। मन के स्तर पर ही मिलते रहे फिर वह ‘नौकरी’ करने मुंबई चला गया और मीनू बिछुड़ कर लखनऊ रह गई। सो उसे भी वह अपनी जिंश्दगी में आया पुरुष मानती थी और नहीं भी। दूसरा पुरुष उसकी जिंश्दगी में आकाशवाणी का एक पैक्स था जिसने उसे वहां ऑडीशन में पास कर गाने को मौकष दिया था। बाद में वह उसकी आर्थिक मदद पर भी उतर आया और बदले में उसका शारीरिक दोहन करता। नियमित। इसी बीच वह दो बार गर्भवती भी हुई। दोनों बार उसे एबॉर्शन करवाना पड़ा और तकलीफष्, ताने भी भुगतने पड़े सो अलग। बाद में उस पैक्स ने ही उसे कापर टी लगवा लेने की तजवीजश् दी। शुरू में तो वह ना नुकुर करती रही पर बाद में वह मान गई।

कापर टी लगवा लिया।

शुरू में कुछ दिक्कष्त हुई। पर बाद में उसे इस सुविधा की नि¯श्चतता ने उन्मुक्त बना दिया। और दूरदर्शन में भी उसने इसी ‘दरवाजश्े’ से बतौर गायिका एंट्री ले ली। यहां एक असिस्टेंट डायरेक्टर उसका शोषक-पोषक बना। लेकिन दूरदर्शन पर दो कार्यक्रमों के बाद उसका मार्केट रेट ठीक हो गया कार्यक्रमों में। और वह टीवी. अर्टिस्ट कहलाने लगी सो अलग। बाद में इस असिस्टेंट डायरेक्टर का तबादला हो गया तो वह दूरदर्शन में अनाथ हो गई। आकाशवाणी का क्रेजश् पहले ही ख़त्म हो चुका था सो वह इस कल्चरल ग्रुप के हत्थे चढ़ गई। और इस कल्चरल ग्रुप में भी अब उमेश से दिल और देह दोनों निभा रही थी। कापर टी का संयोग कभी दिक्कष्त नहीं होने देता था। तो भी वह सपने नहीं जोड़ती थी। देह सुख से तीव्रतर सुख के आगे सपने जोड़ना उसे सूझा भी नहीं। उमेश हमउम्र था सुख भी भरपूर देता था। देह सुख में वह गोते पहले भी लगा चुकी थी पर आकाशवाणी का वह पैक्स और दूरदर्शन का वह असिस्टेंट डायरेक्टर उसकी देह में नेह नहीं भर पाते थे, दूसरे उसे हरदम यही लगता कि यह दोनों उसका शोषण कर रहे हैं। तीसरे, वह दोनों उसकी उम्र से ड्योढ़े दुगुने बड़े थे, अघाए हुए थे, सो उनमें खुद भी देह की वह ललक या भूख नहीं थी, तो वह मीनू की भूख कहां से मिटाते? वह तो उन के लिए खाने में सलाद, अचार का कोई एक टुकड़ा सरीखी थी। बस! फिर वह दोनों उसे भोगने में समय भी बहुत जाया करते थे। मूड बनाने और स्तंभन में ही वह ज्श्यादा समय खर्च डालते जब कि मीनू को जल्दी होती। पर प्रोग्राम और पैसे की ललक में वह उन्हें बर्दाश्त करती। लेकिन उमेश के साथ ऐसा नहीं था। उसके साथ वह कोई स्वार्थ या विवशता नहीं जी रही थी। हमउम्र तो वह था ही सो उसे न मूड बनना पड़ता था, न स्तंभन की फष्जश्ीहत थी। चांदी ही चांदी थी मीनू की। लेकिन हो यह गया था कि मीनू का उमेश के साथ रपटना देख कई और भी उसके फेरे मारने लगे थे। उमेश को यह नागवार गुजश्रता। लेकिन उमेश को सिर्फ नागवार गुजश्रने भर से तो कोई मानने वाला था नहीं। दो चार लोगों से इस फेर में उसकी कहा सुनी भी हो गई। तो भी बात थमी नहीं। वह हार गया और मीनू को कोई और भी चाहे यह उसे मंजश्ूर नहीं था। तब वह गाना भी गाता था, ‘तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, गश्ैर के दिल को सराहोगी तो मुश्किल होगी।’ लेकिन मीनू तो थी ही खिलंदड़ और दिलफेंक। तिस पर उसका हुस्न, उसकी नजशकत, उसकी उम्र किसी को भी उसके पास खींच लाती। उसकी कटोरे जैसी कजरारी मादक आंखें किसी भी को दीवाना बना देतीं। और वह भी हर किसी दीवाने को लिफ्श्ट दे देती। साथ बैठ जाती, हंसने-बतियाने लगती। ‘गैश्र के दिल को सराहोगी तो मुश्किल होगी।’ उमेश का गाया उसके कानों में नहीं समाता।

तो उमेश पगला जाता।

अंततः एक दिन उसने मीनू से शादी करने का प्रस्ताव रख दिया। प्रस्ताव सुनते ही मीनू हकबका गई। बात मम्मी पर डाल कर टालना चाहा। पर उमेश मीनू को ले कर उसकी मां से भी मिला। और मिलते-मिलते बात आखि़र बन गई। मीनू भी उमेश को चाहती थी पर शादी तुरंत इस लिए नहीं चाहती थी कि वह अभी बंधन में बंधना नहीं चाहती थी। थोड़ी आजशदी के दिन वह और जीना चाहती थी। वह जानती थी कि आज चाहे जितना दीवाना हो उमेश उसका शादी के बाद तो यह खुमारी टूटेगी। और जश्रूर टूटेगी। अभी यह प्रेमी है तो आसमान के तारे तोड़ता है कल पति होते ही वह ढेरों बंधनों में बांध यह आसमान भी छीन लेगा। तारे कहीं तड़प-तड़प कर दम तोड़ देंगे।

लेकिन यह सोचना उसका सिर्फ वेग में था।

जश्मीनी सचाई यह थी कि उसे शादी करनी थी। उसकी मां राजी थी। और जल्दी भी दो वजश्हों से थी। कि एक तो यह शादी बिना लेन देन की थी दूसरे, मीनू से तीन साल छोटी उसकी एक बहन और थी बीनू, उसकी भी शादी की ¯चता उसकी मां को करनी थी। मीनू तो कलाकार हो गई थी, चार पैसे जैसे भी सही कमा रही थी, पर बीनू न तो कमा रही थी, न कलाकार थी सो मीनू से ज्श्यादा ¯चता उसकी मां को बीनू की थी।

सो आनन फानन मीनू और उमेश की शादी हो गई। उमेश का छोटा भाई दिनेश भी शादी में आया और बीनू पर लट्टू हो गया। जल्दी ही बीनू और दिनेश की भी शादी हो गई।

शादी के बाद दिनेश भी उमेश और मीनू के साथ प्रोग्राम में जाने लगा। उमेश गिटार बजाता था, दिनेश भी धीरे-धीरे बैंजो बजाने लगा। माइक, साउंड बाक्स की साज संभाल, साउंड कंट्रोल वगश्ैरह भी समय बेसमय वह कर लेता था। कुछ समय बाद उसने बीनू को भी प्रोग्राम में ले जाना शुरू किया। बीनू भी कोरस में गाने लगी, समूह में नाचने लगी। लेकिन मीनू वाली लय, ललक, लोच और लौ बीनू में नदारद थी। सुर भी वह ठीक से नहीं लगा पाती थी। तो भी कुछ पैसे मिल जाते थे सो वह प्रोग्रामों में जा कर कुल्हा मटका कर ठुमके लगा आती थी। यह भी अजब इत्तफषक था कि मीनू और बीनू की शक्लें न सिर्फष् जश्रूरत से ज्श्यादा मिलती थीं, बल्कि उमेश और दिनेश की शक्लें भी आपस में बुरी तरह मिलती थीं। इतनी कि जश्रा दूर से यह दोनों भाई भी इन दोनों बहनों को देख तय करना कठिन पाते थे कि कौन वाली उन की है। यही हाल मीनू और बीनू उमेश, दिनेश को जश्रा दूर से देखतीं तो हो जाता। इस सब से सब से ज्श्यादा नुकसान मीनू का होता। क्यों कि कई बार बीनू द्वारा पेश लचर डांस मीनू के खाते में दर्ज हो जाता। मीनू को इससे अपनी इमेज की ¯चता तो होती पर वह कुढ़ती जश्रा भी नहीं थी।

अभी यह सब चल ही रहा था कि मीनू के दिन चढ़ गए।

ऐसे समय पर अमूमन औरतें खुश होती हैं। पर मीनू उदास हो गई। उसे अपना ग्लैमर समेत कैरियर डूबता नजश्र आया। उसने उमेश को ताने भी दिए कि क्यों उसने कापर टी निकलवा दिया? फिर सीधे एबॉर्शन करवाने के लिए साथ चलने के लिए कहने लगी। लेकिन उमेश ने एबॉर्शन करवाने पर सख़्त ऐतराजश् किया। लगभग फष्रमान जारी करते हुए कहा कि, ‘बहुत हो चुका नाचना गाना। अब घर गृहस्थी संभालो!’ तो भी मीनू ने बड़ा बबाल किया। पर मुद्दा ऐसा था कि उसकी मां से ले कर सास तक ने इस पर उसकी खि़लाफत की। बेबस 
मीनू को चुप लगाना पड़ा। फिर भी उसने प्रोग्रामों में जाना नहीं छोड़ा। उलटियां वगश्ैरह बंद होते ही वह जाने लगी। अब झूम कर नाचना उसने छोड़ दिया था। एहतियातन। वह हलके से दो चार ठुमके लगाती और बाकी काम ब्रेस्ट की अदाओं और आंखों के इसरार से चलाती और ‘मोरा बलमा आइल नैनीताल से’ जैसे गाने झूम कर गाती।

वह मां बनने वाली है यह बात वह जानती थी, उसका परिवार जानता था। बाकी बाहर कोई नहीं।

लेकिन जब पेट थोड़ा बाहर दिखने लगा तो वह चोली घाघरा पहनने लगी और पेट पर ओढ़नी डाल लेती। पर यह तरकष्ीब भी ज्श्यादा दिनों तक नहीं चली। फिर वह बैठ कर गाने लगी। और अंततः घर बैठ गई।

उसके बेटा पैदा हुआ।

अब वह खुश नहीं, बेहद खुश थी। बेटा जनमना उसे गुरूर दे गया। अब वह उमेश को भी डांटने-डपटने लगी। जब-तब। बेटे के साथ वह अपना ग्लैमर, प्रोग्राम सब कुछ भूल भाल गई। बेसुध उसी में खोई रहती। उसका टट्टी-पेशाब, दूध पिलाना, मालिश, उसको खिलाना, उस से बतियाना, दुलराना ही उसकी दुनिया थी। गाना उसका अब भी नहीं छूटा था। अब वह बेटे के लिए लोरी गाती।

अब वह संपूर्ण मां थी। दिलफेंक और ग्लैमरस औरत नहीं।

कोई देख कर यकष्ीन ही नहीं करता था कि यह वही मीनू है। पर यह भ्रम भी जल्दी ही टूटा। बेटा ज्यों साल भर का हुआ उसने प्रोग्रामों में पेंग मारना शुरू कर दिया। अब ऐतराज सास की ओर से शुरू हुआ। पर उमेश ने इस पर गशैर नहीं किया। इस बीच मीनू की देह पर जश्रा चर्बी आ गई थी पर चेहरे पर लावण्य और लाली निखार पर थी। नाचते गाते देह की चर्बी भी छंटने लगी थी। पर बेटे को दूध पिलाने से स्तन ढीले पड़ गए थे। इस का इलाज उसने ब्यूटी क्लीनिक जा कर इक्सरसाइजश् करने और रबर पैड वाले ब्रा से कर लिया था। गरज यह थी कि धीरे-धीरे वह फषर्म पर आ रही थी। इसी बीच उसकी ‘कल्चरल ग्रुप’ चलाने वाले कर्ता धर्ता से ठन गई।

वह पहली बार सड़क पर थी। बिना प्रोग्राम के।

वह फिर से दूरदर्शन और आकाशवाणी के फेरे मारने लगी। एक दिन दूरदर्शन गई तो लोक कवि अपना प्रोग्राम रिकार्ड करवा कर स्टूडियो से निकल रहे थे। मीनू ने जब जाना कि यही लोक कवि हैं तो वह लपक कर उन से मिली और अपना परिचय दे कर उन से उन का ग्रुप ज्वाइन करने का इरादा जताया। लोक कवि ने उसे टालते हुए कहा, ‘बाहर ई सब बात नहीं करता हूं। हमारे अड्डे पर आओ। फुर्सत से बात करूंगा। अभी जल्दी में हूं।’

लोक कवि के अड्डे पर वह उसी शाम पहुंच गई। लोक कवि ने पहले बातचीत मंे ‘आजश्माया’ फिर उसका नाचना गाना भी देखा। महीना भर फिर भी दौड़ाया। और अंततः एक दिन लोक कवि उस पर न सिर्फ पसीज गए बल्कि उस पर न्यौछावर हो गए। उसे लिटाया, चूमा-चाटा और संभोग सुख लूटने के बाद उस से कहा, ‘आती रहो, मिलती रहो!’ फिर उसे बांहों में भरते हुए चूमा और उसके कानों में फुसफुसाए, ‘तुमको स्टार बना दूंगा।’ फिर जोड़ा, ‘बहुत सुख देती हो। ऐसे ही देती रहो।’ फिर तो लोक कवि के यहां आते-जाते मीनू उन की म्यूजिकष्ल पार्टी में भी आ गई। और धीरे-धीरे सचमुच वह उन की टीम की स्टार कलाकार बन गई। टीम की बाकी औरतें, लड़कियां उस से जलने लगीं। लेकिन लोक कवि का चूंकि उसे ‘आशीर्वाद’ प्राप्त था सो सबकी जलन भीतर ही भीतर रहती, मुखरित नहीं होती। सिलसिला चलता रहा। इस बीच लोक कवि ने उसे शराबी भी बना दिया। शुरू-शुरू में जब लोक कवि ने एक रात सुरूर में उसे शराब पिलाई तो पहले तो वह नहीं, नहीं करती रही। कहती रही, ‘मैं औरत हूं। मेरा शराब पीना शोभा नहीं देगा।’

‘क्या बेवकूफष्ी की बात करती हो?’ लोक कवि मनुहार करते हुए बोले, ‘अब तुम औरत नहीं आर्टिस्ट हो। स्टार आर्टिस्ट।’ उन्हों ने उसे चूमते हुए जोड़ा, ‘और फिर शराब नहीं पियोगी तो आर्टिस्ट कैसे बनोगी?’ कह कर उस रात उसे जश्बरदस्ती दो पेग पिला दिया। जिसे बाद में मीनू ने उलटियां करके बाहर निकाल दिया। उस रात वह घर नहीं गई। लोक कवि की बांहों में बेसुध पड़ी रही। उस रात लोक कवि ने उसकी योनि को जब अपनी जीभों से नवाजश तो वह एक नए सुखलोक में पहुंच गई।

दूसरी सुबह जब वह घर पहुंची तो उमेश ने रात लोक कवि के अड्डे पर रुकने पर बड़ा ऐतराजश् जताया। पर मीनू ने उस ऐतराजश् की कुछ बहुत नोटिस नहीं ली। बोली, ‘तबीयत ख़राब हो गई तो क्या करती?’

फिर रात भर की जगी वह सो गई।

अब तक मीनू न सिर्फ लोक कवि की म्यूजिश्क पार्टी की स्टार थी बल्कि लोक कवि के आडियो कैसेटों के जाकेटों पर भी उसकी फषेटो प्रमुखता से छपने लगी थी। अब वह स्टेज और कैसेट दोनों बाजशर में थी और जशहिर है कि बाजशर में थी तो पैसे की भी कमी नहीं रह गई थी उसके पास। रात-बिरात कभी भी लोक कवि उसे रोक लेते और वह बिना ना नुकुर किए मुसकुरा कर रुक जाती। कई बार लोक कवि मीनू के साथ-साथ किसी और लड़की को भी साथ सुलाते तो भी वह बुरा नहीं मानती। उलटे ‘कोआपेरट’ करती। उसके इस ‘कोआपरेट’ का जिश्क्र लोक कवि खुद भी कभी कभार मूड में कर जाते। इस तरह किसी न किसी बहाने मीनू पर लोक कवि के ‘उपकार’ बढ़ते जाते। लोक कवि के इन उपकारों से मीनू के घर में समृद्धि आ गई थी पर साथ ही उसके दांपत्य में न सिर्फ खटास आ गई थी, बल्कि उसकी चूलें भी हिल गई थीं। हार कर उमेश ने सोचा कि एक और बच्चा पैदा करके ही मीनू के पांव बांधे जा सकते हैं। सो एक और बच्चे की इच्छा जताते हुए मीनू से कापर टी निकलवाने की बात किसी भावुक क्षण में उमेश ने कह दी तो मीनू भड़क गई। बोली, ‘एक बेटा तो है।’

‘पर अब वह पांच छः साल का हो गया है।’

‘तो?’

‘अम्मा भी चाहती हैं कि एक और बच्चा हो जाए जैसे दिनेश के दो बच्चे हैं, वैसे ही।’

‘तो अपनी अम्मा से कहो कि अपने साथ तुमको सुला लें फिर एक बच्चा और पैदा कर लें?’

‘क्या बकती हो?’ कहते हुए उमेश ने उसे एक जशेर का थप्पड़ मारा। बोला, ‘इतनी बत्तमीजश् हो गई हो!’

‘इसमें बत्तमीजश्ी की क्या बात है?’ पासा पलटती हुई मीनू नरम और भावुक हो कर बोली, ‘तुम अपनी अम्मा के बच्चे नहीं हो ? और उन के साथ सो जाओगे तो बच्चे नहीं रहोगे?’

‘तुम तब यही कह रही थी?’ उमेश बौखलाहट पर कषबू करते हुए बोला।

‘और नहीं तो क्या?’ वह बोली, ‘बात समझे नहीं और झापड़ मार दिया। आइंदा कभी हम पर हाथ मत उठाना। बताए देती हूं।’ आंखें तरेर कर वह बोली। और बैग उठा कर चलते-चलते बोली, ‘रिहर्सल में जा रही हूं।’

लेकिन उमेश ने उस दिन किसी घायल शेर की तरह गांठ बांध ली कि मीनू को एक न एक दिन लोक कवि की टीम से निकाल कर ही वह दम लेगा। चाहे जैसे। कई तरकष्ीबें, शिकायतें उसने भिड़ाई पर वह कामयाब नहीं हुआ। कामयाब होता भी भला कैसे ? लोक कवि के यहां मीनू की गोट इतनी पक्की थी कि कोई शिकायत, कोई राजनीति, उसका कोई खोट भी लोक कवि को नहीं दीखता। दीखता भी भला कैसे ?

वह तो इन दिनों लोक कवि की पटरानी बनी इतराती फिरती रहती।

वह तो घर भी नहीं जाती। पर हार कर जाती तो सिर्फष् बेटे के मोह में। बेटे की ख़ातिर। और इसी लिए वह दूसरा बच्चा नहीं चाहती थी कि फिर फंसना पड़ेगा, फिर बंधना पड़ेगा। यह ग्लैमर, यह पैसा फिर लौट कर मिले न मिले क्या पता ? वह सोचती और दूसरे बच्चे के ख़याल को टाल जाती। पर उमेश ने यह ख़याल नहीं टाला था। एक रात चरम सुख लूटने के बाद उसने आखि़र फिर यह बात धीरे-धीरे ही सही फिर चला दी। पहले तो मीनू ने इस बात को बिन बोले अनसुना कर दिया। पर उमेश फिर भी लगातार, ‘सुनती हो, सुन रही हो’ के संपुट के साथ बच्चे का पहाड़ा रटने लगा तो वह आजिश्जश् आ गई। फिर भी बात को टालती हुई धीरे से बुदबुदाई, ‘सो जाओ, नींद आ रही है।’

‘जब कोई जश्रूरी बात करता हूं तो तुम्हें नींद आने लगती है।’

‘चलो सुबह बात करेंगे।’ वह अलसाती हुई बुदबुदाई।

‘सुबह नहीं, अभी बात करनी है।’ वह लगभग फैष्सला देते हुए बोला, ‘सुबह तो डाक्टर के यहां चलना है।’

‘सुबह हमें हावड़ा पकड़नी है प्रोग्राम में जाना है।’ वह फिर बुदबुदाई।

‘हावड़ा नहीं पकड़नी है, कोई प्रोग्राम में नहीं जाना है।’

‘क्यों?’

‘डाक्टर के यहां चलना है।’

‘डाक्टर के यहां तुम अकेले हो आना।’

‘अकेले क्यों? काम तो तुम्हारा है।’

‘हमें कोई बीमारी नहीं है। हम का करेंगे डाक्टर के यहां जा कर।’ अब की वह जश्रा जशेर से बोली।

‘बीमारी है तुम्हें।’ उमेश पूरी कड़ाई से बोला।

‘कौन सी बीमारी?’ अब तक मीनू की आवाजश् भी कड़ी हो गई थी।

‘कापर टी की बीमारी।’

‘क्या?’

‘हां!’ उमेश बोला, ‘यही कल सुबह डाक्टर के यहां निकलवाना है।’

‘क्यों?’ वह तड़कती हुई बोली, ‘क्या फिर दूसरे बच्चे का सपना दीख गया?’

‘हां, और हमें यह सपना पूरा करना है।’

‘क्यों?’ वह बोली, ‘किस दम पर?’

‘तुम्हारा पति होने के दम पर!’

‘किस बात के पति?’ वह गरजी, ‘कमा के न लाऊं तो तुम्हारे घर में दोनों टाइम चूल्हा न जले, और यह कूलर, फ्रिज, कालीन, सोफा, डबल बेड यहां तक की तुम्हारी मोटर साइकिल भी नहीं दिखे!’

‘क्यों मैं भी कमाता हूं।’

‘जितना कमाते हो उतना तुम भी जानते हो।’

‘इधर-उधर जाने से तुम्हारी बोली और आदतें ज्श्यादा ही बिगड़ गई हैं।’

‘क्यों न जाऊं?’ वह चमक कर बोली, ‘तुम्हारे वश की तो अब मैं भी नहीं रही। महीने में दो चार बार आ जाते हो कांखते-पादते तो समझते हो बड़े भारी मर्द हो। और बोलते हो कि पति हो।’ वह रुकी नहीं बोलती रही, ‘सुख हमको दे नहीं सकते, चूल्हा चौका चला नहीं सकते और कहते हो कि पति हो! किस बात के पति हो जी तुम?’ वह बोली, ‘शराब भी तुम्हारी मेरी कमाई से चलती है। और क्या-क्या कहूं? क्या-क्या उलटू-उघाडं़ई?

‘लोक कवि ने तुमको छिनार बना दिया है। कल से तुम्हारा उसके यहां जाना बंद!’

‘क्यों बंद? किस बात के लिए बंद? फिर तुम होते कौन हो मेरा कहीं जाना बंद करने वाले?’

‘तुम्हारा पति!’

‘तुम मेरे कितने पति हो, जश्रा  अपने दिल पर हाथ रख कर पूछो।’

‘क्या कहना चाहती हो आखि़र तुम?’ उमेश बिगड़ता हुआ बोला।

‘यही कि अपना गिटार बजाओ। कहो तो गुरु जी से कह कर उन की टीम मेें फिर रखवा दूं। चार पैसा मिलेगा ही। और जश्रा अपनी शराब पर कषबू कर लो!’

‘मुझे नहीं जाना तुम्हारे उस भड़घवे गुरु जी के यहां जो अफष्सरों, नेताओं को लौड़िया सप्लाई करता है। जिस साले ने हमारी जिंश्दगी नरक कर दी। तुम्हें हमसे छीन लिया है।’

‘हमारी जिंश्दगी नरक नहीं की है गुरु जी ने। हमारी जिंश्दगी बनाई है। ये कहो।’

‘यह तुम्हीं कहो!’

‘क्यों नहीं कहूंगी।’ वह भावुक होती हुई बोली, ‘हमको तो ये शोहरत, ये पैसा उन्हीं की बदौलत मिली है। गुरु जी ने हमको कलाकार से स्टार कलाकार बनाया है।’

‘स्टार कलाकार नहीं, स्टार रंडी बनाया है।’ उमेश गरजा, ‘ये कहो ना! कहो ना कि स्टार रखैल बनाया है तुमको!’

‘अपनी जबान पर कंट्रोल करो!’ मीनू भी गरजी, ‘क्या-क्या अनाप शनाप बके जा रहे हो?’

‘बक नहीं रहा हूं, ठीक कह रहा हूं।’

‘तो तुम हमको रंडी, रखैल कहोगे?’

‘हां, रंडी, रखैल हो तो कहूंगा।’

‘मैं तुम्हारी बीवी हूं।’ वह आहत भाव से बोली, ‘तुम्हें ऐसा कहते हुए शर्म नहीं आती?’

‘आती है। तभी कह रहा हूं।’ वह बोला, ‘और फिर किस-किस को शर्म दिलाओगी? किस-किस के मुंह बंद कराओगी?’

‘तुम बहुत गिरे हुए आदमी हो।’

‘हां, हूं।’ वह बोला, ‘गिर तो उसी दिन गया था जिस दिन तुमसे शादी की।’

‘तो तुम्हें मुझसे शादी करने का पछतावा है?’

‘बिलकुल है।’

‘तो छोड़ क्यों नहीं देते?’

‘बेटा रोक लेता है, नहीं छोड़ देता।’

‘फिर कोई पूछेगी भी?’

‘हजशरों है पूछने वालियां?’

‘अच्छा?’

‘तो?’

‘तो भी हमें रंडी कहते हो।’

‘कहता हूं।’

‘कुत्ते हो।’

‘तू कुतिया है।’ वह बोला, ‘बेटे की ¯चता न होती तो इसी दम छोड़ देता तुझे।’

‘बेटे की बड़ी ¯चता है?’

‘आखि़र मेरा बेटा है?’

‘यह किस कुत्ते ने कह दिया कि ये तेरा बेटा है?’

‘दुनिया जानती है कि मेरा बेटा है।’

‘बेटा तूने जना है कि मैंने?’ वह बोली, ‘तो मैं जानती हूं कि इस का बाप कौन हैµकि तू?’

‘क्या बक रही है?’

‘ठीक बक रही हूं।’

‘क्या?’

‘हां, ये तेरा बेटा नहीं है।’ वह बोली, ‘तू इस का बाप नहीं है।’

‘हे माधरचोद, तो यह किसका पाप है, जो मेरे मत्थे मढ़ दिया?’ कह कर उमेश उस पर किसी गिद्ध की तरह टूट पड़ा। उसके बाल पकड़ कर खींचते हुए उसे लातों, जूतों मारने लगा। जवाब में मीनू ने भी हाथ पांव चलाए लेकिन उमेश के आगे वह पासंग भी नहीं ठहरी और बुरी तरह पिट गई। पति से तू-तू, मैं-मैं करना मीनू को बड़ा भारी पड़ गया। मार पीट से उसका मुंह सूज गया, होठों से खून बहने लगा। हाथ पैर भी छिल गए। और तो और उसी रात उसे घर भी छोड़ना पड़ा। अपने थोड़े बहुत कपड़े लत्ते बटोरे, ब्रीफकेस में भरा रिक्शा लिया। मेन रोड पर आ कर रिक्शा छोड़ टेंपो लिया और पहुंच गई लोक कवि के कैंप रेजश्ीडेंस पर। कई बार काल बेल बजाने पर लोक कवि के नौकर बहादुर ने दरवाजश खोला। मीनू को देखते ही वह चौंक पड़ा। बोला, ‘अरे आप भी आ गईं?’

‘क्यों?’ पति का सारा गुस्सा बहादुर पर उतारती हुई मीनू गरजी।

‘अरे नहीं, हम तो इश लिए बोला कि दो मेमशाब लोग पहले ही से भीतर हैं।’ मीनू की गरज से सहमते हुए बहादुर बोला।

‘तो क्या हुआ?’ थोड़ी ढीली पड़ती हुई मीनू ने बहादुर से धीरे से पूछा, ‘कौन-कौन हैं?’

‘शबनम मेमशाब और कपूर मेमशाब।’ बहादुर खुसफुसा कर बोला।

‘कोई बात नहीं।’ ब्रीफकेस बरामदे में पटकती हुई मीनू बोली।

‘कौन है रे बहादुर!’ अपने कमरे से लोक कवि ने चिल्ला कर पूछा, ‘बड़ा खड़बड़ मचाए हो?’

‘हम हैं गुरु जी!’ मीनू कमरे के दरवाजेश् के पास जा कर धीरे से बोली।

‘कौन?’ महिला स्वर सुन कर लोक कवि अचकचाए। यह सोच कर कि कहीं उन की धर्मपत्नी तो नहीं आ गईं? फिर सोचा कि उसकी आवाजश् तो बड़ी कर्कश है। और यह आवाजश् तो कर्कश नहीं है। वह अभी असमंजस में पड़े यही सब सोच रहे थे कि तभी वह फिर धीरे से बोली, ‘मैं हूं मीनू गुरु जी!’

‘मीनू?’ लोक कवि फिर अचकचाए और बोले, ‘तुम और इतनी रात को?’

‘हां, गुरु जी।’ वह अपराधी भाव से बोली, ‘माफष् कीजिए गुरु जी।’

‘अकेली हो कि कोई और भी है ?’

‘अकेली हूं गुरु जी।’

‘अच्छा रुको अभी आता हूं।’ कह कर लोक कवि ने जांघिया ढूंढ़ना शुरू किया। अंधेरे में। नहीं मिला तो वह बड़बड़ाए, ‘हे शबनम! लाइट जला!’

पर शबनम मुख मैथुन के बाद उन के पैरों के पास लेटी पड़ी थी। लेटे-लेटे ही सिर हिलाया। पर उठी नहीं। लोक कवि फिर भुनभुनाए, ‘सुन नहीं रही हो का? अरे, उठो शबनम! देखो मीनू आई है। बाहर खड़ी है। लगता है उस पर कोई आफष्त आई है!’ शबनम लेकिन ज्श्यादा नशे में भी थी सो वह उठी नहीं। कुनमुना कर रह गई। अंततः लोक कवि उसे एक तरफ हटाते हुए उठे कि उन का एक पैर नीता कपूर पर पड़ गया। वह चीख़ी, ‘हाय राम !’ लेकिन धीरे से। लोक कवि फिर बड़बड़ाए, ‘तुम भी अभी यहीं हो ? तुम तो कह रही थी चली जाऊंगी।’

‘नहीं गुरु जी का करें आलस लग गया। नहीं गई। अब सुबह जाऊंगी। वह अलसाई हुई बोली।

‘अच्छा चलो उठो!’ लोक कवि बोले, ‘लाइट जलाओ!’

‘क्यों?’

‘मीनू आई है। बाहर खड़ी है!’

‘मीनू को भी बुलाया था?’ नीता बोली, ‘अब आप कुछ कर भी पाएंगे?’

‘क्या जद-बद बकती रहती हो।’ वह बोले, ‘बुलाया नहीं था, अपने आप आई है। लगता है कुछ समस्या में है!’

‘तो इसी बिस्तर पर वह भी सोएंगी?’ नीता कपूर भुनभुनाई, ‘जगह कहां है?’

‘लाइट नहीं जला रही है रंडी तभी से बकबक-बकबक बहस कर रही है!’ कहते हुए लोक कवि भड़भड़ा कर उठे और लाइट जला दिया। लाइट जलाते ही दोनों लड़कियां कुनमुनाईं पर नंग धडंग पड़ी रहीं।

लोक कवि ने दोनों की देह पर चादर डाला, जांघिया नहीं मिला तो अंगोछा लपेटा, कुरता पहना और कमरे का दरवाजश खोला। मीनू को देखते ही वह सन्न हो गए। बोले, ‘ई चेहरा कइसे सूज गया? कहीं चोट लगा है कि कहीं गिर गई?’

‘नहीं गुरु जी!’ कहते हुए मीनू रुआंसी हो गई।

‘तो कोई मारा है का?’

लोक कवि ने पूछा तो मीनू बोली नहीं पर सिर हिला कर स्वीकृति दी। तो लोक कवि बोले, ‘किसने? का तेरे मरद ने?’ मीनू अबकी फिर नहीं बोली, सिर भी नहीं हिलाया और फफक कर रोने लगी। रोेते-रोते लोक कवि से लिपट गई। रोते-रोते बताया, ‘बहुत मारा।’

‘कौने बात पर?’

‘मुझे रंडी कहता है।’ वह बोली, ‘कहता है आप की रखैल हूं।’ बोलते-बोलते उसका गला रूंध गया और वह फिर फफक कर रोने लगी।

‘बड़ा लंठ है।’ लोक कवि बिदकते हुए बोले। फिर उसके घावों को देखा, उसके बाल सहलाए, सांत्वना दी और कहा कि, ‘अब कोई दवा तो यहां है नहीं। घाव को शराब से धो देता हंू और तुम दू तीन पेग पी लो, दर्द कुछ कम हो जाएगा, नींद आ जाएगी। कल दिन में डाक्टर को दिखा देना। बहादुर को साथ ले लेना।’ वह बोले, ‘हम लोग तो सुबह गाड़ी पकड़ कर पोरोगराम में चले जाएंगे।’

‘मैं भी आप के साथ चलूंगी।’

‘अब ई सूजा हुआ यह फुटहा मुंह ले कर कहां चलोगी?’ लोक कवि बोले, ‘भद्द पिटेगी। यहीं आराम करो। पोरोगराम से वापिस आऊंगा तब बात करेंगे।’ कह कर वह शराब की बोतल उठा लाए और मीनू के घाव शराब से धोने लगे।

‘गुरु जी, अब मैं कुछ दिन यहीं रहूंगी, जब तक कोई और इंतजशम नहीं हो जाता।’ वह जश्रा दबी जश्बान बोली।

लोक कवि कुछ नहीं बोले। उसकी बात लगभग पी गए।

‘आप को कोई ऐतराजश् तो नहीं है गुरु जी।’

‘हम को काहें ऐतराजश् होगा?’ लोक कवि बोले, ‘ऐतराजश् तुम्हारे मर्द को होगा।’

‘ऊ  तो हम को आप की रखैल कह ही रहा है।’

‘क्या बेवकूफी की बात कर रही हो?’

‘मैं कहती हूं कि आप मुझ को अपनी रखैल बना लीजिए।’

‘दिमाग तुम्हारा ख़राब हो गया है।’

‘क्यों?’

‘क्यों क्या ऐसे हम किस-किस को रखैल बनाता फिरूंगा।’ वह बोले, ‘लखनऊ में रहता हूं तो इस का का मतलब हम वाजिद अली शाह हूं?’ वह बोले, ‘हरम थोड़े बनाना है। ऐसे आती-जाती रहो यही ठीक है। आज तुम को रख लूं कल को यह दोनों जो लेटी हैं इन को रख लूं परसों और रख लूं फिर तो मैं बरबाद हो जाऊंगा। हम नवाब नहीं हूं। मजूर हूं। गा बजा के मजूरी करता हूं। अपना पेट चलाता हूं और तुम लोगों का भी। हां, थोड़ा मौज मजश भी कर लेता हूं तो इस का मतलब ई थोड़े है कि....?’ सवाल अधूरा सुना कर लोक कवि चुप हो गए।

‘तो यहां नहीं रहने देंगे हम को?’ मीनू लगभग गिड़गिड़ाई।

‘रहने को कौन मना किया?’ वह बोले, ‘तुम तो रखैल बनने को कह रही थी।’

‘मैं नहीं गुरु जी मेरा मरद कहता है तो मैंने कहा कि रखैल बन ही जाऊं।’

‘फालतू बात छोड़ो।’ लोक कवि बोले, ‘कुछ रोजश् यहां रह लो। फिर हो सके तो अपने मरद से पटरी बैठा लो नहीं कहीं और किराए पर कोठरी दिला दूंगा। सामान, बिस्तर करा दूंगा। पर यहां परमामिंट नहीं रहना है।’

‘ठीक है गुरु जी! जैसा आप कहें।’ मीनू बोली, ‘पर अब उस हरामी के पास मैं नहीं जाऊंगी।’

‘चलो सो जाओ! सुबह टेªन पकड़नी है।’ कह कर लोक कवि खुद बिस्तर पर लेट गए। बोले, ‘तुम भी यहीं कहीं लेट जाओ और बिजली बंद कर दो।’

लाइट बुझ गई लोक कवि के इस कैंप रेजीडेंस की।



यह कैंप रेजश्ीडेंस लोक कवि ने अभी नया-नया बनाया था। क्यों कि वह गैराज अब उन के रहने और रिहर्सल दोनों काम के लायकष् नहीं रह गया था और घर पर जिस ‘स्टाइल’ और ‘शौक’ से वह रहते थे, रह नहीं सकते थे। और रिहर्सल तो बिलकुल ही संभव नहीं था सो उन्हों ने यह तिमंजिश्ला कैंप रेजश्ीडेंस बनाया। नीचे का एक हिस्सा लोगों के आने-जाने, मिलने जुलने के लिए रखा। पहली मंजिश्ल रिहर्सल वगश्ैरह के लिए और दूसरी मंजिश्ल पर अपने रहने का इंतजशम किया। जब यह कैंप रेजश्ीडेंस उन्हों ने बनवाया तब मुस्तकिल देख रेख नहीं कर पाए। उन के लड़कों और चेलों ने इंतजशम देखा। कोई आर्किटेक्ट, इंजीनियर वगश्ैरह भी नहीं रखा। बस जैसे-जैसे राज मिस्त्राी बताता-बनाता गया वैसे-वैसे ही बना यह कैंप रेजश्ीडेंस। सौंदर्यबोध तो छोड़िए, कमरों और बाथरूम के साइजश् भी बिगड़ गए। ज्श्यादा से ज्श्यादा कमरा बनाने-निकालने के फेर में। सो सारा कुछ पहला तल्ला, दूसरा तल्ला में बिखर-बटुर कर रह गया। नक्शा बिगड़ गया मकान का। लोक कवि कहते भी कि, ‘इन बेवकूफषें के चलते पैसा माटी में मिल गया।’ पर अब जो था, सो था और इसी में काम चलाना था। लोक कवि बाहर आते जाते बहुत कुछ देख चुके थे। उसमें से बहुत कुछ वह अपने इस नए रेजश्ीडेंस में देखना चाहते थे। जैसे कई होटलों में वह बाथटब का आनंद ले चुके थे, लेते ही रहते थे। चाहते थे कि यह बाथटब का आनंद वह अपने इस नए घर में भी लें। पर यह सपना उन का खंडित इस लिए हुआ कि बाथरूम इतने छोटे बने कि उसमें बाथटब की फिटिंग ही नहीं हो सकती थी। तो भी यह सपना उन का खंडित भले हुआ हो पर टूटा नहीं। अंततः वह बाथटब लाए और बाथरूम के बजाय उसे छत पर ही खुले में रखवा दिया। वह उसमंे पहले पानी भरवाते पाइप से, फिर लेट जाते। लड़कियां या चेले या बहादुर या जो भी सुविधा से मिल जाए वह उसी में लेटे-लेटे उस से अपनी देह मलवाते। लड़कियां होतीं तो कई बार वह लड़कियों को भी उसमें खींच लेते और जल क्रीड़ा का आनंद लेते। कई बार रात में भी। इस ख़ातिर परदेदारी की गरजश् से उन्हों ने छत पर रंग बिरंगे परदे टंगवा दिए। लाल, हरे, नीले, पीले। ठीक वैसे ही जैसे कुछ होटलों के सामने विभिन्न रंग के झंडे टंगे होते हैं। पर यह सुरूर ज्श्यादा दिनों तक नहीं चला। वह जल्दी ही अपने देसीपन पर आ गए। और भरे बाथटब में भी बैठ कर लोटा-लोटा ऐसे नहाते गोया पानी बाथटब से नहीं बाल्टी से निकाल-निकाल नहा रहे हों। लेकिन यह सुरूर उतरते-उतरते उन्हें एक नया शौकष् चर्रायाµधूप में छतरी के नीचे बैठने का। साल दो साल वह सिर्फष् इस की चर्चा करते रहे और अंततः छतरी मय प्लास्टिक की मेजश् सहित ले आए। यह शौकष् भी अभी उतरा नहीं था कि पेजश्र का दौर आ गया। तो वह पेजश्र उन के कुछ बहुत काम का नहीं निकला। पर वह सबको बताते कि, ‘मेरे पास पेजश्र है। मेरा पेजश्र नंबर नोट कीजिए।’ पर अभी पेजश्र की खुमारी ठीक से चढ़ी भी नहीं थी कि मोबाइल फषेन आ धमके। जहां-तहां वह इस की चर्चा सुनते। कहीं-कहीं देखते भी। अंततः एक रोजश् अपनी महफिष्ल में इस का जिश्क्र वह छेड़ बैठे। बोले, ‘इ मोबाइल-फोबाइल का क्या चक्कर है?’ महफिष्ल में दो तीन कलाकार भी बैठे थे। बोले, ‘गुरु जी ले लीजिए। बड़ा मजश रहेगा। जहां से चाहिए वहां से बात करिए। टेªन में, कार में। और जेश्ब में धरे रहिए। जब चाहिए बतियाइए, जब चाहिए काट दीजिए।’ इस महफिष्ल में चेयरमैन साहब और वह ठाकुर पत्राकार भी जमे हुए थे। पर जितनी मुह उतनी बातें थीं। चेयरमैन साहब ‘मोबाइल-मोबाइल’ सुनते-सुनते उकता गए। लोक कवि से वह मुख़ातिब हुए। घूरते हुए बोले, ‘अब तुम मोबाइल लोगे? का यूज है तुम्हारे पास?’ वह बोले, ‘पइसा बहुत काटने लगा है का?’ पर लोक कवि चेयरमैन साहब की बात को सुन कर भी अनसुना कर गए। कुछ बोले नहीं। तो चेयरमैन साहब भी चुप लगा गए। ह्विस्की की चुस्की और सिगरेट के कश में गुम हो गए। लेकिन तरह-तरह के बखान, टिप्पणियां और मोबाइल के खर्चे की चर्चा चलती रही। पत्राकार ने एक सूचना दी कि, ‘बाकी खर्चे तो अपनी जगह। इसमें सबसे बड़ी आफत है कि जो फषेन काल आते हैं उसका भी प्रति काल, प्रति मिनट के हिसाब से पैसा लगता है।’ सभी ने हां में हां मिलाई और इस इनकमिंग काल के खर्चे को सबने ऐसे व्याख्यायित किया गोया हिमालय सा बोझ हो। लोक कवि सबकी बात बड़े गशैर से सुन रहे थे। सुनते-सुनते अचानक वह उछल कर खड़े हो गए। हाथ कान पर ऐसे लगाया गोया हाथ में फषेन हो और बच्चों का सा सुरूर और ललक भर कर बोले, ‘तो मैं न कुछ कहूंगा, न कुछ सुनूंगा। बस मोबाइल फषेन पास धरे रहूंगा। फिर तो खर्चा नहीं बढ़ेगा न?’

‘मतलब न काल करोगे न काल सुनोगे?’ चेयरमैन साहब भड़क कर बोले, ‘तब का करने के लिए मोबाइल फषेन रखोगे जी?’

‘सिर्फ एह मारे कि लोग जानें कि हमारे पास भी मोबाइल है। हमारा भी स्टेटस बना रहेगा। बस !’

‘धत चूतिए कहीं के।’ चेयरमैन साहब के इस संबोधन के साथ ही यह महफिष्ल उखड़ गई थी। क्यों कि चेयरमैन साहब सिगरेट झाड़ते हुए उठ खड़े हुए थे और पत्राकार भी।

तो भी लोक कवि माने नहीं। मोबाइल फषेन की उधेड़बुन में लगे रहे।

एक वकील का बिगड़ैल लड़का था अनूप। लड़कियों के फेर में वह लोक कवि के फेरे मारता रहता। बाहर की लड़कियों को वह लालच देता कि लोक कवि के यहां आर्टिस्ट बनवा देंगे और लोक कवि के यहां की लड़कियों को लालच देता कि टी.वी.आर्टिस्ट बनवा देंगे। इस ख़ातिर वह कुछ टेली फिष्ल्म, टेली सीरियल बनाने का भी ढांेग फैलाए रहता। किराए पर कैमरा ले कर वह शूटिंग वगश्ैरह का भी ताम-झाम जब तब फैलाए रहता। लोक कवि भी उसके इस ताम-झाम में फंसे हुए थे। दरअसल अनूप ने लोक कवि की एक नस पकड़ ली थी। लोक कवि जैसे शुरुआती दिनों में कैसेट मार्केट में आने के लिए परेशान, बेकष्रार, और तबाह थे ठीक वैसे ही अब के दिनों में उन की परेशानी सी.डी. और वीडियो एलबम की थी। इस बहाने वह विभिन्न टी.वी. चैनलों पर छा जाना चाहते थे। जैसे कि मान और दलेर मेंहदी सरीखे पंजाबी गायक उन दिनों विभिन्न एलबमों के माफषर््त विभिन्न चैनलों पर छाए हुए थे। पर भोजपुरी की सीमा, उन का जुगाड़ और किष्स्मत तीनों ही उन का साथ नहीं दे रहे थे और वह मन ही मन छटपटाते और शांत नहीं हो पाते। क्यों कि सी.डी. और एलबम की द्रौपदी को वह हासिल नहीं कर पा रहे थे। खुल कर सार्वजनिक रूप से अपनी छटपटाहट भी दर्जश् नहीं कर पा रहे थे। लोक कवि की इसी छटपटाहट को छांह दी थी अनूप ने।

अनूप जिसका बाप एडवोकेट पी.सी. वर्मा अपने जिश्ले का मशहूर वकील था। और उसकी वकालत के एक नहीं कइयों किष्स्से थे। लेकिन एक ठकुराइन पर दफष 604 वाला किष्स्सा सभी किष्स्सों पर भारी था।

....जारी....

उपन्यासकार दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424 और This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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