पर सट्टा करने के पहले पूछते हैं कि लड़कियां कितनी होंगी

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दयानंद पांडेय: असंपादित : उपन्यास - लोक कवि अब गाते नहीं (10) : मुख़्तसर में यह कि एक गांव की एक ठकुराइन भरी जवानी में विधवा हो गईं। बाल बच्चे भी नहीं थे। लेकिन जायदाद ज्यादा थी और सुंदरता भी भरपूर। उनकी पढ़ाई लिखाई हालांकि हाई स्कूल तक ही थी तो भी ससुराल और मायके में उनके बराबर पढ़ी कोई औरत उनके घर में नहीं थी। औरत तो औरत कोई पुरुष भी हाई स्कूल पास नहीं था।

सो ठकुराइन में अपने ज्यादा पढ़े लिखे होने का गुमान भी सिर चढ़ कर बोलता था। इस तरह सुंदर तो वह थीं ही तिस पर ‘पढ़ी लिखी’ भी। सो नाक पर मक्खी भी नहीं बैठने देतीं। लेकिन उनका दुर्भाग्य था कि पति की दुर्घटना में मृत्यु हो जाने से वह जल्दी ही विधवा हो गईं। मातृत्व सुख भी उन्हें नहीं मिल पाया। शुरू में तो वह सुन्न पड़ी गुमसुम बनी रहीं। पर धीरे-धीरे उन का सुन्न टूटा तो उन्हें लगा कि उनके जेठ और देवर दोनों की नजर उनकी देह पर है। देवर तो मजाक ही मजाक में उन्हें कई बार धर दबोचता। उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगता। वह अपनी मर्यादा में ही सही इसका विरोध करतीं। लेकिन मुखर नहीं होतीं। फिर एक दुपहरिया जब अचानक उनके कमरे में जेठ भी आ धमके तो वह खौल पड़ीं। हार कर वह चिल्ला पड़ीं और जेठानी को आवाज दी। जेठ पर घड़ों पानी पड़ गया था और वह ‘दुलहिन-दुलहिन’ बुदबुदाते हुए सरक लिए। जेठ तो मारे शर्म के सुधर गए पर देवर नहीं सुधरा। हार कर उन्होंने सास और जेठानी को यह समस्या बताई। जेठानी तो समझ गईं और अपने पति पर लगाम लगाई लेकिन सास ने घुड़प दिया और उल्टे उन्हीं पर चरित्राहीनता का लांछन लगा दिया। सास बोली, ‘एक बेटे को डायन बनके खा गई और बाकी दोनों को परी बन के मोह रही है। कुलटा, कुलच्छनी!’

ठकुराइन सकते में आ गईं। बात लेकिन थमी नहीं। बढ़ती गई। बाद के दिनों में खाने, पहनने, बोलने बतियाने में भी बेशऊरी और चरित्राहीनता छलकने के आरोप गाढ़े होने लगे। हार मान कर ठकुराइन ने अपने पिता और भाई को बुलवाया। बीच-बचाव रिश्तेदारों, पट्टीदारों ने भी किया-कराया। लेकिन वह जो कहते हैं कि, ‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की।’ और आखि़रकार ठकुराइन ने एक बार फिर अपने पिता और भाई को बुलवाया। फिर जमीन जायदाद और मकान पर अपना कानूनी दावा ठोंक दिया।

अंततः पूरी जायदाद में तीसरा हिस्सा अपने नाम करवा कर वह अलग रहने लगीं। अब जेठ और देवर उनके खि़लाफ खुल करके सामने आ गए। उनको तरह-तरह से परेशान करते, अपमानित करते। लेकिन वह ख़ामोश रह कर सब कुछ पी जातीं। लेकिन एक दिन उन्हों ने ख़ामोशी तोड़ी और ऐसे तोड़ी की पूरा गांव हैरान रह गया।

उन्होंने सारा शील-संकोच, परदा-लिहाज तोड़ा और अपने पति का कुर्ता पायजामा पहन लिया। अपने पति की लाइसेंसी दोनाली बंदूक जो अब उनके नाम स्थानांतरित हो चुकी थी, उठाई और घर से बाहर आ कर अपने जेठ और देवर को ललकार दिया। लेकिन जेठ, देवर घर से बाहर नहीं निकले घर में ही दुबके रहे। ठकुराइन का चीख़ना चिल्लाना सुन कर एक बार देवर तमतमा कर उठा भी पर मां ने उसे हाथ जोड़ कर रोक लिया। बोलीं, ‘ऊ तो हाथी नीयर पगला गई है, कहीं गोली, वोली दाग देगी तो का होगा?’ देवर अफना कर रह गया। रह गया घर में ही।

ठकुराइन थोड़ी देर तक चीख़ती चिल्लाती रहीं, हाथ में दोनाली बंदूक लिए लहराती रहीं। पूरा गांव इकट्ठा हो गया। अवाक देखता रहा। पर जेठ-देवर, सास-जेठानी घर से बाहर नहीं निकले। घूंघट काढ़े कुछ बूढ़ी अधेड़ औरतों ने ठकुराइन को किसी तरह समझा बुझा कर घर के भीतर किया। कुर्ता पायजामा उतरवा कर फिर से साड़ी ब्लाउज पहनाया। शील-संकोच, मान-मर्यादा जैसी कुछ हिदायतें दीं। और यह हिदायतें जब ज्यादा हो गईं तो ठकुराइन बोलीं, ‘ई सब कुछ हमारे लिए ही है, उन लोगों के लिए कुछ नहीं?’ यह कह कर एक औरत के कंधे पर सिर रख कर वह फफक कर रो पड़ीं।

बाहर भीड़ छटने लगी। अंदर भले ठकुराइन रो पड़ी थीं पर बाहर एक बूढ़ा व्यक्ति लोगों से कह रहा था, ‘दुलहिन पर दुर्गा सवार हो गई हैं।’ जो भी हो अब ठकुराइन गांव में ही नहीं जवार में भी ख़बर थीं। उनके कुर्ते पायजामे और बंदूक लहराने की चर्चा चहुंओर थी। मिर्च-मसाले के साथ।

दिन फिर धीरे-धीरे गुजरने लगे। अब ठकुराइन के जेठ देवर भी उनसे घबराते। और कहीं कोई मोर्चा नहीं बांधते। तो भी उनके दिल का दर्द अभी बाकी था। सास तो खुले आम कहती, ‘हमारे कलेजे पर लिट्टी ठोंक रही है।’ जेठ, देवर भी इस मर्म को समझते। फिर धीरे-धीरे ठकुराइन के खि़लाफ व्यूह रचने में वह लग गए। इस बार सीधे कुछ करने-करवाने के बजाय वाया-वाया खुराफात शुरू हुई। किसी छोटी जाति के व्यक्ति को ठकुराइन के खि़लाफ लगा देना, किसी पट्टीदार को भड़का देना आदि। ठकुराइन सब समझतीं पर पहले ही की तरह फिर बड़ी ख़ामोशी से सब कुछ टाल जातीं। लेकिन जब उनके हलवाहे को जेठ, देवर ने भड़काया तो वह एक बार फिर खौल गईं। लेकिन अब की पति का कुरता पायजामा नहीं पहना उन्होंने। न ही दोनाली बंदूक उठाई। अबकी वह कुछ ठोस कार्यवाई करना चाहती थीं।

लेकिन तभी उनके दुर्भाग्य ने उन्हें एक बार फिर घेर लिया।

घरके आंगन में धोया हुआ गेहूं सुखवाने के लिए उन्होंने पसार रखा था। बाहर का दरवाजा किसी काम से खुला पड़ा रह गया था। कि तभी दो तीन बकरियां दौड़ती-उछलती घर में आ गईं। आंगन में पड़ा गेहूं चबाने लगीं। ठकुराइन वैसे ही खौली हुई थीं, बकरियों को गेहूं में मुंह डाले देखा तो भड़क गईं। घर में रखा एक डंडा उठाया बकरियों को मारने के लिए। बाकी बकरियां तो डंडा उठाते ही फुदक कर भाग गईं। लेकिन एक बकरी फंस गई। ठकुराइन ने सारा गुस्सा, सारा उबाल उसी बकरी पर उतार दिया। डंडे का प्रहार इतना जबरदस्त था कि वह बकरी बेचारी वहीं छटपटा कर छितरा गई। कुछ ही क्षणों में उसने सांस से भी छुट्टी ली और वहीं आंगन में दम तोड़ बैठी।

ठकुराइन डर गईं। माथा पकड़ कर बैठ गईं। पहली चिंता जीव हत्या की थी, इस अपराध बोध में इस पाप बोध में तो वह थीं ही दूसरी और कहीं बड़ी चिंता यह थी कि जाने किस की बकरी थी यह। और जिस भी किसी की बकरी होगी उसे जेठ, देवर चढ़ा भड़का कर जाने क्या-क्या करवाएंगे ?

और उन का यह डर सचमुच सच साबित हुआ। यह बकरी एक खटिक की थी। उसने आसमान सिर पर उठा लिया। ठकुराइन समझ नहीं पा रही थीं कि क्या करें वह। क्योंकि वह खटिक अब छिटपुट गालियों पर भी उतर आया था। वह अपने जेठ और देवर से न तो हार मानना चाहती थीं न ही उन के सामने झुकने को तैयार थीं। मायके में भी बार-बार वह आंसू बहाते, शिकायत करते तंग हो गई थीं। सो हार मान कर उन्होंने घर में ताला लगाया और चुपचाप शहर का रास्ता पकड़ा। शहर पहुंच कर पता किया कि सबसे बड़ा वकील कौन है? फिर उस वकील के घर का पता लगा कर उसके घर पहुंची। सुंदर थीं ही सो घर में एंट्री पाने में मुश्किल नहीं हुई, न ही वकील से मिलने में। वकील के चैंबर में गईं तो कुछ लोग वहां और भी बैठे थे। सो वह थोड़ा संकोच घोलती हुई बोलीं, ‘माफ कीजिए मैं जरा प्राइवेट में बात करना चाहती हूं।’ सुंदर और जवान स्त्री खुद ही प्राइवेट बात करना चाहते तो भला कौन पुरुष इंकार कर पाएगा ? वकील साहब भी इंकार नहीं कर पाए। वहां बैठे बाकी लोगों को यथासंभव जल्दी-जल्दी निपटाया और जब सब लोग चैंबर से बाहर निकल गए तो उन्होंने मुंशी को बुला कर बता दिया कि, ‘थोड़ी देर तक किसी को भी अंदर नहीं आने देना।’ फिर ठकुराइन से वह बोले, ‘हां, बताइए मैडम!’ फिर मैडम ने बकरी वाली मुश्किल मय पट्टीदारी के लोगों द्वारा खटिक को चढ़ाने भड़काने के विस्तार से बताई और बोलीं, ‘जो भी पैसा खर्च होगा, मैं करूंगी।’ फिर वह हाथ जोड़ कर विनती करती हुई बोलीं, ‘लेकिन मुझे बचा लीजिए वकील साहब!’ फिर अपनी जगह से उठ कर वह उनके पास तक गईं और उनके पैर छूती हुई बोलीं, ‘मुझे बचा लीजिए।’ फिर जोड़ा, ‘किसी भी कीमत पर।’ वकील साहब ने मौका देख कर उनकी पीठ पर हाथ फेरा, सांत्वना दी और कहा, ‘घबराइए नहीं बैठिए, कुछ सोचता हूं।’

फिर थोड़ी देर तक वह चिंतित मुद्रा में मौन रहे। माथे पर दो-चार बार हाथ फेरा। कानून की दो चार किताबें अलटीं-पलटीं और लगभग परेशान हो गए।

उन की परेशानी देख कर ठकुराइन बेकल हो गईं। बोलीं, ‘का नहीं बच पाऊंगी?’

‘आप जरा शांत बैठिए।’ कह कर वकील साहब ने अपनी पेशानी पर परेशानी की कुछ और रेखाएं गढ़ीं। फिर कुछ और कानूनी किताबें अलटीं-पलटीं। और जब उन्हें सामने बैठी मैडम की मूर्खता भरी गंभीरता पर पूरी तरह यकीन हो गया और यह भी कि अब चूकना नहीं चाहिए। माथे पर हाथ फेरते हुए बोले, ‘दरअसल आपने किसी आदमी की हत्या की होती तो आसान था, बचा लेता। क्यों कि तब सिर्फ धारा 302 ही लगती। लेकिन आपने तो जीव हत्या कर दी है। सो मामला डबल हो गया है और 302 की बजाय मामला दफा 604 का हो गया है।’ वकील साहब थोड़ा और गंभीर हुए, ‘दिक्कत यही हो रही है तिस पर यह बकरी खटिक की है। और आप शायद नहीं जानतीं खटिक अनुसूचित जाति में आता है। सो एक पेंच यह भी पड़ेगा।’

ठकुराइन थोड़ा और घबराईं। बोलीं, ‘लेकिन हम तो आपका बड़ा नाम सुनी हूं। तभी आप के पास आई हूं।’ वह थोड़ा और खुलीं, ‘जो भी कीमत देनी होगी मैं दूंगी। खर्चा-बर्चा का आप फिकिर मत करिए, मैं सब करूंगी। चाहिए तो आप जज-वज सब सहेज लीजिए।’ वह लगभग घिघियाईं, ‘बस आप कइसो हमको बचा लीजिए। गांव में हमारी बेइज्जती न हो, पट्टीदारों के आगे सिर न झुके।’

‘घबराइए नहीं।’ वकील साहब ने भरपूर सांत्वना देते हुए कहा, ‘अब आप हमारे पास इतने विश्वास से आई हैं तो कुछ तो करना ही पड़ेगा।’ वह निशाना और दुरुस्त करते हुए बोले, ‘अब समझिए कि अगर आप को नहीं बचा पाया तो हमारी वकालत तो बेकार हो गई। मेरी थू-थू होगी और मैं वकालत छोड़ दूंगा।’ वह बोले, ‘तो आप निश्चिंत रहिए मैं जी जान लगा दूंगा। आप को कुछ नहीं होगा। उलटे उस खटिक को ही फंसवा दूंगा। कि आखि़र उसकी बकरी आप के घर में घुसी कैसे? उसकी हिम्मत कैसे हुई एक शरीफ और इज्जतदार अकेली औरत के घर में बकरी घुसाने की।’

ठकुराइन वकील साहब के इस कहे पर बड़ी आश्वस्त हुईं। उनके चेहरे पर खुशी की कुछ रेखाएं खिलीं। वह बुदबुदाईं ‘आपकी बड़ी कृपा।’ फिर वकील साहब ने कुछ वाटर मार्क और वकालतनामा पर उनसे दस्तख़त करवाए। खटिक का और उनका पूरा पता लिखा। एक हजार रुपए फीस के वसूले। और बोले, ‘मैडम आप निश्चिंत हो जाइए। आप की इज्जत को संभालना अब हमारा काम है।’ उन्होंने एहतियात के तौर पर उनसे यह भी कह दिया, ‘आप इज्जतदार और प्रतिष्ठित औरत हैं सो आप को कचहरी, इजलास दौड़ने धूपने से भी छुट्टी दिलवा दूंगा जज साहब को दरख्वास्त दे कर। नाहक वहां आने से बेइज्जती होगी। आप बस यहां आ कर सीधे हमसे ही मिलती रहिएगा।’ फिर वकील साहब ने आगाह किया कि, ‘हमारे मुंशी या किसी जूनियर वकील से भी इस केस की चर्चा मत करिएगा। भूल कर भी नहीं। नहीं एक मुंह से दो मुंह, दो से चार, चार से चालीस मुंह बात फैलेगी। ख़ामख़ा जगहंसाई होगी और केस में भी नुकसान हो सकता है, हो जाए। सो ध्यान रखिएगा यह बात हमारे आप के बीच प्राइवेट ही रहे।’

ठकुराइन बिलकुल किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह वकील साहब की सारी बातें मान गईं। और निश्चिंत भाव से खुशी-खुशी गांव लौट गईं। गांव पहुंचने पर खटिक ने फिर हल्ला दंगा किया। पर दूसरे दिन पुलिस आई और उस खटिक को पकड़ ले गई। हुआ यह था कि वकील साहब ने ठकुराइन की ओर से पुलिस में खटिक के खि़लाफ एक अप्लीकेशन दे कर जान माल का ख़तरा बता दिया। और पुलिस वालों को पटा कर धारा 107 और 151 में खटिक को बंद करवा दिया। अपना ही एक जूनियर लगा कर उसे दूसरे दिन जमानत पर छुड़वा भी दिया। उसे कचहरी में अपने तख्ते पर बुलवाया। दो सौ रुपए दिए और अपनी बात समझाई।

खटिक गांव में वापस गया और ठकुराइन से माफी मांगने की बात कही। ठकुराइन ने उलटे उसे झाड़ दिया। बोली, ‘जाओ कचहरी में नाक रगड़ो। माफी वहीं मांगो।’ ठकुराइन बिलकुल वीर रस में थीं। खटिक चला गया। लेकिन कुछ दिन बाद ही खटिक फिर भाव खाने लगा। ठकुराइन भाग कर शहर गईं। वकील से मिलीं उन्होंने फिर सांत्वना दी, फीस ली। बाद के दिनों में तो जैसे यह क्रम ही बन गया। खटिक ठकुराइन से कभी गिड़गिड़ाता, कभी भाव खा जाता। ठकुराइन फिर शहर जातीं और बात ख़त्म हो जाती। लेकिन कुछ दिनों में फिर उभर जाती। क्योंकि होता यह था कि ठकुराइन के खि़लाफ कोई मुकदमा तो वास्तव में था नहीं लेकिन खटिक के खि़लाफ 107 व 151 का मुकदमा तो था ही। सो वह पेशी पर शहर जाता, वकील से मिलता, सौ पचास रुपए लेता और वकील के कहे मुताबिक गांव में ‘ऐक्ट’ करता। कभी कहता कि, ‘अब कि तो मैं फंस गया। लगता है मुकदमा हमारे उलटा जाएगा।’ तो कभी कहता, ‘अब तो ठकुराइन बच नहीं पाएंगी। सजा इन्हीं को होगी।’ क्योंकि वकील साहब के यहां से ऐसा ही कुछ कहने का निर्देश होता। जब जैसा निर्देश होता खटिक वैसा ही गांव में आ कर ऐक्ट करता। ठकुराइन के जेठ, देवर, सास भी मामले की तह में गए बिना ठकुराइन की दुर्दशा का आनंद लेते।

ठकुराइन का अब शहर जाना भी बढ़ने लगा था। वकील साहब उनसे फीस तो ले ही रहे थे। डोरे भी डाल रहे थे। ठकुराइन को यह सब ठीक नहीं लगता। लेकिन गांव में उनकी इज्जत वकील साहब बचाए हुए थे सो वह इसे अनचाहे ही सही शुरू-शुरू में बर्दाश्त करती रहीं। लेकिन बाद में उन्हें भी यह सब ठीक लगने लगा। वकील साहब की पुरुष गंध में भी वह बहकने लगीं। शुरू-शुरू में तो वकील साहब के चैम्बर में ही प्राइवेट बातचीत के दौरान नैन मटक्का करतीं, उनके घर में ही ठहरतीं। लेकिन बाद में वकील साहब के ही घर में महाभारत मचने लगी। वो कहते हैं न कि लहसुन का खाना और पर नारी की सोहबत छुपाए नहीं छुपती सो बात धीरे-धीरे खुलने लगी  थी। क्योंकि ठकुराइन पहले तो सिर्फ मुवक्किल थीं, बाद में ख़ास मुवक्किल बनीं और फिर अचानक एकदम ख़ास बन गईं वकील साहब की। हालांकि देह की सांकल ठकुराइन ने वकील साहब के लिए नहीं खोली थी पर आंखों से होते हुए मन की सांकल तक तो वकील साहब आ ही गए थे, यह बात ठकुराइन भी जान गई थीं। वकील साहब के साथ सिनेमा-विनेमा, चाट, पकौड़ी भी वह करने लगी थीं। लेकिन बाद में वकील साहब के घर में झंझट जब ज्यादा शुरू हो गई तो वकील साहब उन्हें एक होटल में ठहराने लगे। कभी-कभार होटल पहुंच कर हाल चाल भी वह ले लेते। लेकिन जल्दी ही मुख्य हाल चाल पर आ गए और ठकुराइन की मीठी-मीठी ना नुकुर के बावजूद उन्होंने उनकी देहबंध को आखि़र लांघ लिया। अब कई बार वकील साहब होटल में ही ठकुराइन के साथ दिन रंगीन कर लेते। लेकिन होटल में कई बार असुविधा होती सो उन्होंने ठकुराइन को शहर में ही घर ख़रीदने की राय दी। ठकुराइन ने घर ख़रीदा तो नहीं पर एक इंडिपेंडेंट घर किराए पर ले लिया। यह कह कर कि बाद में ख़रीद भी लूंगी। बाद में उन्होंने आवास विकास परिषद का एक एम.आई.जी. मकान ख़रीदा भी। इस बीच दो तीन बार एबॉर्शन की भी दिक्कत उठानी पड़ी ठकुराइन को। अंततः वकील साहब ने एक प्राइवेट डाक्टर से उन्हें कापर टी लगवा दिया। अब कोई दिक्कत नहीं थी। वकील साहब गांव में ठकुराइन की इज्जत बचाने की फीस धन और देह दोनों में वसूल रहे थे। सिलसिला चलता रहा। खटिक का 107 और 151 का मुकदमा कब का ख़त्म हो गया था लेकिन ठकुराइन के खि़लाफ दफा 604 का मुकदमा ख़त्म नहीं हो रहा था।

लेकिन ठकुराइन को इसकी फिकर नहीं थी।

वह तो आकंठ वकील साहब को जी रही थीं। हां, वकील साहब उन्हें जरूर नहीं जी रहे थे, वह तो भोग रहे थे। कभी-कभी किसी बात पर दोनों के बीच खटपट भी होती। लेकिन कुछ ही दिनों की तनातनी के बाद वकील साहब उन्हें ‘मना’ लेते। हालांकि तनातनी के दिनों ठकुराइन गांव चली जातीं। खेती बारी बटाई पर दे रखी थी। हिस्से में जो अनाज मिलता उसको बेच बाच कर खर्च चलातीं। कुछ भविष्य के लिए बैंक में भी जमा करती रहतीं। धीरे-धीरे समय बीतता गया। ठकुराइन भले देह सुख में डूब कुछ देखती सुनती नहीं थीं। पर लोग सब कुछ देख सुन रहे थे। गांव में जिस इज्जत बचाने के फेर में वह इस फांस में फंसी थीं वहां भी लोग दबी जबान और छुपे कान से ही सही जान चले थे कि जेठ, देवर को धूल चटाने वाली ठकुराइन शहर में एक वकील की रखैल बन गई हैं। बात ठकुराइन के मायके तक भी पहुंची। उनके भाई ने एकाध बार ऐतराज भी जताया पर बाद के दिनों में वह सिंगापुर चला गया कमाने। पिता का निधन हो गया। देवर, जेठ को वह मक्खी-मच्छर बराबर भी नहीं समझती थीं। गांव में ज्यादातर रहती नहीं थीं कि ताना सुनें। दूसरे, घर में कामधाम करने वाले, देखभाल करने वालों को पैसा, अनाज की मदद दे कर इतना उपकृत किए रहतीं कि वह होठ खोलना तो दूर डट कर आंख मूंद जाते। और जो कोई ठकुराइन की अनुपस्थिति में कभी कभार इन आदमियों से चर्चा चलाता भी तो ये सब तरेर देते। कहते, ‘ठकुराइन मलकिन पर अइसन लांछन की बात हमारे सामने करना भर मत। नहीं, जीभ खींच लूंगा।’

लोग प्रतिवाद करते, ‘तो शहर में रहती काहें हैं?’

‘इहां के नरक से ऊब कर।’ आदमी जोड़ते, ‘फिर यहां मलकिन को सुविधा भी कहां है ? शहर में बड़ी सुविधा है। सड़क है, बिजली है, दुकान हैं, सनीमा है। और एहले बड़ी बात वहां फटीचर नहीं हैं। इहां की तरह छोटी-टुच्ची बात करने के लिए।’

‘हां भई, जिसका खाओ, उसका बजाना भी पड़ता है।’ कह कर लोग बात ख़त्म कर देते।

लेकिन बात ख़त्म कहां होती थी भला?

दिन गुजश्रते गए। अब ठकुराइन के चेहरे से लावण्य छुट्टी लेने लगा था। विधवा जीवन का फ्रस्ट्रेशन और अनैतिक जीवन जीने का तनाव उनके चेहरे पर साफ दीखने लगा था। हालांकि शहर में वह पड़ोसियों से कोई ख़ास संपर्क नहीं रखती थीं और पूरी शिष्टता, भद्रता के साथ सिर पर सलीके से पल्लू रख कर ही घर से बाहर निकलती थीं तो भी तड़ने वाली आंखें तड़ लेती थीं। हालांकि घर में काम करने के लिए एक बूढ़ी औरत और एक छोटा लड़का भी वह अपने मायके से लाई थीं। तो भी अकेली औरत के पास जब तब एक पुरुष आता जाता रहे तो कोई सवाल न भी उठाए फिर भी सुलग जाता है। फिर उनकी अकेली औरत का ठप्पा! लोग कहते बिना पतवार की नाव है जो चाहे, जिधर चाहे बहा ले जाए। पर अब दिक्कत  यह थी कि बढ़ती उम्र के साथ-साथ उनका अकेलापन अब उन्हें सालने लगा था। इस अकेलेपन से ऊब कर दो एक बार वकील साहब से दबी जबान शादी कर लेने को भी उन्होंने कहा। पर वकील साहब टाल गए। उनकी दलील थी कि, वह बाल बच्चेदार हैं, शहर में उनकी हैसियत और रुतबा है सो लोग क्या कहेंगे? दूसरी दलील उम्र के गैप की थी, तीसरी दलील उनकी यह थी कि आप क्षत्रिय जाति की हैं और मैं कुर्मी। इस पर भी समाज में विवाद खड़ा हो सकता है। इसलिए यह संबंध जैसे चल रहा है वैसे ही चलने दें। इसी में हम दोनों की भलाई है और समाज की भी। ठकुराइन जबान पर तो लगाम लगा गईं पर मन ही मन कसमसाने भी लगीं। उन्होंने सोचा कि अब वकील साहब से पूरी तरह किनारा कर लें। पर वह यह सब अभी सोच ही रही थीं कि उन्होंने पाया कि अब वकील साहब खुद ही उनसे किनारा करने लगे हैं। अब उनका उन के घर में आना जाना भी कम से कम हो गया था। वह सब कुछ छोड़ कर अब गांव वापस जा कर रहने की सोचने लगी थीं। लेकिन उन का दफा 604 वाला बकरी की हत्या वाला केस भी फंसा पड़ा था। लेकिन उन्होंने गौर किया कि अब वकील साहब उनके केस पर भी बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे थे। न उन पर, न उन के केस पर।

ठकुराइन की चिंताओं का अब कोई पार नहीं था।

बाद में उन्होंने जब इसकी तह में जा कर पता लगाया तो एक बात तो साफ हो गई कि एक लड़की वकील साहब की जूनियर बन कर आ गई थी, वकील साहब की दिलचस्पी अब उस जूनियर वकील में बढ़ गई थी। यह तो वह समझीं। पर उनके केस में वह क्यों दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं यह वह समझ नहीं पा रही थीं। उन्होंने सोचा कि किसी दूसरे वकील से इस बारे में दरियाफ्त करें लेकिन उन्हें याद आई वकील साहब की हिदायत कि, ‘किसी भी से जिक्र नहीं करिएगा वरना केस बिगड़ जाएगा।’

सो वह चुप लगा गईं।

लेकिन कब तक चुप लगातीं भला? वकील साहब के चैंबर में उनका आना जाना बढ़ गया। वकिलाइन भी अब उनको देख कर नाराज नहीं होती थीं न ही कुढ़ती थीं। अब तो उनको कुढ़ने के लिए वह जूनियर वकील मिल गई थी। अब वकील साहब चैम्बर में प्राइवेट में उस जूनियर वकील से मिलते। इस फेर में कई बार ठकुराइन को भी बाहर बैठना पड़ जाता। उनको यह सब बहुत बुरा लगता लेकिन मन मसोस कर रह जातीं।

अब जब वह चैम्बर के बाहर बैठतीं तो चाहे अनचाहे किसी न किसी से बातचीत भी शुरू हो जाती। इस तरह आते जाते लोगों से परिचय भी बढ़ने लगा। हालांकि विधवा होने के नाते वह सादी साड़ी पहनतीं। मेकअप भी नहीं करतीं। वह सिर पर पल्लू रख कर बड़े अदब से, सलीके और शऊर से बतियातीं, गंभीर भी रहतीं, आंखों में शील संकोच सहेजे ज्यादा किसी से हंसती मुसकुराती नहीं थीं तो भी अब पहले की तरह सबको वह अनदेखा भी नहीं करतीं। पहले अपनी सुंदरता और जवानी का गुरूर भी था। सो सबको अनदेखा करते चलतीं। पर अब सुंदरता का वह गुरूर भी उतार पर था। वह चालीस की उम्र छू रहीं थीं तो भी जब वह रिक्शे से या पैदल जैसे भी चलतीं लोग मुड़-मुड़ कर उन्हें देखते जरूर। तो उन्हें लगता कि अभी जवानी बाकी है। अभी भी उन की देहयष्टि में दम है। उन्हें अपने पर गुरूर आ जाता।

इसी गुरूर में वह एक रोज एक सड़क पर खड़ी रिक्शा ढूंढ़ रही थीं। कि तभी वकील साहब का एक पुराना जूनियर वकील मोटर साइकिल से उधर से ही गुजरा। ठकुराइन को देख कर ठिठका, नमस्कार किया। रुका और हाल चाल पूछा। कहा कि, ‘जहां जाना हो चलिए मैं पहुंचा देता हूं।’ पर ठकुराइन ने बड़ी शालीनता से पल्लू ठीक करती हुई इंकार कर दिया। बोलीं, ‘जी बहुत मेहरबानी पर मैं रिक्शे से चली जाऊंगी। आप काहें तकलीफ करेंगे?’ कह कर वह वकील को टाल गईं। पर वकील गया नहीं रुका रहा। बोला, ‘अच्छा रिक्शा मिलने तक तो आप का साथ दे सकता हूं।’

‘हां, हां क्यों नहीं?’ हलका सा मुसकुरा कर ठकुराइन बोलीं। वकील इधर-उधर की बात करते हुए अनायास ही उनके केस के बारे में बात करने लगा। पूछते-पूछते जिरह करने लगा। हालांकि ठकुराइन उसकी हर जिरह टालती रहीं। पर जूनियर वकील जैसे ढिठाई पर उतर आया, ‘आखि़र कैसा केस है आपका जो इतने बरसों से ख़त्म नहीं हो रहा है। एक्कै कोर्ट में अटका पड़ा है।’

ठकुराइन फिर भी चुप रहीं।

‘अब तक तो केस हाई कोर्ट में पहुंच जाता है अपील में इतने सालों में और आपका केस अभी डिस्ट्रिक्ट जज के पास भी नहीं पहुंचा ? आखि़र है क्या?’

‘आप नहीं जानेंगे वकील साहब! बहुत बड़ा मामला है। वह तो वर्मा जी वकील साहब हैं कि बचाए हुए हैं नहीं तो हम तो फंस ही गई थीं।’

‘लेकिन केस है क्या?’ वह जूनियर वकील बोला, ‘आपकी कोई फाइल भी नहीं है चैम्बर में कि हम लोग देखते।’

‘केस बड़ा है इस लिए वकील साहब खुद देखते हैं।’

‘अरे तब भी फाइल कभी तो कोर्ट जाएगी-आएगी। तारीख़ लगेगी।’ वह माथे का पसीना पोंछते हुए बोला, ‘आखि़र केस है क्या ?’

‘दफा 604 का।’ ठकुराइन आहिस्ता से बोल पड़ीं।

‘दफा 604 ?’ वकील भड़का, ‘यही बताया न आपने कि दफा 604!’

‘जी।’ ठकुराइन ऐसे बोलीं जैसे यह बता कर कोई पाप कर बैठी हों। बोलीं, ‘जाने दीजिए। आप जाइए।’

‘हम तो चले जाते हैं मैडम पर दस बारह साल से हम भी इस कचहरी में प्रैक्टिस कर रहे हैं। थाना, एस.पी. भी देख रहे हैं। और आई.पी.सी. भी। तो भारतीय कानून में ऐसी कोई दफा तो है नहीं अभी तक। वह जूनियर वकील बोला, ‘बल्कि आई.पी.सी. में जो अंतिम दफा है वह है दफा 511 बस ! तो 604 कहां से आ जाएगी?’

‘लेकिन वर्मा जी तो हम को यही बताए थे कि दफा 604 हो गया।’’ ठकुराइन हकबकाती हुई बोलीं।

‘हो सकता है आप के सुनने में गलती हो गई हो।’ जूनियर वकील बोला, ‘ख़ैर, छोड़िए मामला क्या था ? हुआ क्या था आप से?’

‘मतलब?’ असमंजस में पड़ती हुई ठकुराइन बोलीं।

‘मतलब यह कि आप से अपराध क्या हुआ था?’

‘बकरी मर गई थी हमारे मारने से। एक खटिक की थी।’

‘ओ हो!’ ताली बजाते हुए जूनियर वकील बोला, ‘मुलेसर खटिक की तो नहीं?’

‘हां, लेकिन आप कैसे जानते हैं?’ ठकुराइन फिर अफनाईं।

‘जानता हूं? अरे पूरी कुंडली जानता हूं।’

‘कैसे?’

‘कचहरी में तख्ते पर बराबर आता है।’ वह बोला, ‘‘मैडम माफ कीजिए वर्मा साहब ने आप को डंस लिया।’

‘का कह रहे हैं आप?’

‘बताइए चैंबर में आपसे फीस लेते हैं तख्ते पर उस मुलेसर खटिक को फीस देते हैं तो का मुफ्त में? वह बोला, ‘फिर आप भी मैडम इतनी भोली हैं? घर में आगा पीछा कोई नहीं है का?’

‘काहें नाहीं सब कोई है।’

‘तो फिर कोई ये नहीं बताया कि बकरी मारना कोई अपराध नहीं।’

‘पर खटिक की थी।’ वह बोलीं, ‘ऐसा ही वकील साहब बोले थे।’

‘अरे लाखों बकरियां देश में हर घंटे कटती हैं। खटिक की हो या जुलाहा की। कोई दफा किसी पर लगती है क्या ?’ वह बोला, ‘चलिए गलती से किसी का नुकसान हो गया तो उसको उसका खर्चा-मुआवजा और अधिक से अधिक बकरी का दाम दे दीजिए। ई का कि फर्जी दफा 604 जो कहीं हइयै नहीं है, उसको सालों साल वकील के चैंबर में लड़िए।’ वह बोला, ‘आप तो मैडम फंस गईं?’

‘का बोल रहे हैं आप। सही-सही बोलिए।’ ठकुराइन जैसे अधमरी हो गईं। बोलीं, ‘‘वकील साहब तो बोले थे कि आदमी मारते हैं तो दफा 302 लगता है, आदमी की बकरी मार दिए तो डबल दफा लगती है दफा 604 और हमको अब तक बचाए भी हैं वो।’

‘आप बड़ी भोली हैं मैडम। आप को बचाए नहीं बेचे हैं। आप को बरगलाए हैं ऊ कानून के बाजार में। जो दफा कहीं भारतीय कानून में है ही नहीं।’ वह बोला, ‘हम पर विश्वास न हो तो आइए कचहरी किसी वकील, किसी जज से दरियाफ्त कर लीजिए!’

‘अब हम का बताएं, कहां आएं ?’ बोल कर ठकुराइन फफक कर रो पड़ीं। रोते-रोते वहीं सड़क पर सिर पकड़ कर बैठ गईं।

‘आप को हम पर यकीन न हो तो चैंबर में आ कर वर्मा साहब से ही पूछ लीजिए कि यह दफा 604 आई.पी.सी. में कहां है? और कि आपका केस किस कोर्ट में चल रहा है? सब कुछ दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा।’ जूनियर वकील बोला, ‘बस भगवान के लिए हमारा नाम मत बोलिएगा। मत बताइएगा कि हमने ई सब बताया है।’ वह बोला, ‘हां, जो हम झूठ साबित हो जाएं तो वहीं हमको अपने इस सैंडिल से मारिएगा, हम कुछ नहीं बोलूंगा।’ कह कर वह चलने लगा। बोला, ‘मैडम माफ कीजिए आप के साथ बड़ा भारी अन्याय कर दिया वर्मा साहब ने।’ पर ठकुराइन कुछ नहीं बोलीं। उनके मुंह में शब्द ही नहीं रह गया था। लोग आसमान से जमीन पर ऐसे में आ जाते हैं पर उनको लगता था कि वह आसमान से सीधे पाताल में जा कर डूब गई हैं। उनको गुमसुम देख कर वह वकील बोला, ‘हमारे साथ तो आप मोटर साइकिल पर बैठेंगी नहीं। रुकिए मैं आप के लिए रिक्शा बुलाता हूं।’ कह कर वह एक रिक्शा बुला कर लाया। ठकुराइन सड़क पर से उठीं, धूल झाड़ती हुई रिक्शे पर बैठीं। उन्होंने गौर किया कि कलफ लगी उनकी क्रीम कलर की साड़ी जगह-जगह काली पड़ गई थी, सड़क पर बैठ जाने से। उस वकील ने जाते-जाते उन्हें फिर नमस्कार किया। बोल कर, ‘मैडम नमस्कार!’ पर मैडम के मुंह से शब्द गायब थे। वह भौंचक थीं। उन्होंने धीरे से दोनों हाथ जोड़ दिए।

‘वर्मा जी ने इतना बड़ा धोखा दिया।’ रिक्शा जब चलने लगा तो वह अपने आप से ही बुदबुदाईं। वह निकली थीं बाजार जाने को पर वापस घर आ गईं। बुढ़िया महरी से पानी मांगा, पानी पी कर लेट गईं। दो दिन तक वह घर में ही पड़ी रहीं। बेसुध!

तीसरे दिन उन्होंने अपने पति का वह पुराना कुर्ता पायजामा फिर से ढूंढा। मिला तो वह जगह-जगह से कट पिट गया था। गईं बाजार, एक नया कुर्ता पायजामा और अंगोछा ख़रीदा। घर आईं पहना। अंगोछा गले में लपेटा, दोनाली बंदूक उठाई और रिक्शा ले कर पहुंच गईं सीधे वर्मा वकील के चैंबर पर। वह धड़घड़ाती हुई घुसीं। मुंशी ने उन का वेश देख कर उन्हें रोका भी कि, ‘साहब प्राइवेट बात कर रहे हैं।’ पर वह मानी नहीं बिन कुछ बोले चैंबर में घुस गईं। जब वह चैंबर में घुसीं तो सोफे पर बैठे वर्मा वकील की गोद में उनकी जूनियर वकील बाल खोले लेटी पड़ी थी और वह उसके स्तनों, कपोलों से खेल रहे थे। ठकुराइन को एक बारगी देख कर पहले तो वह पहचान भी नहीं पाए। दूर छिटक कर हड़बड़ाते हुए बोले, ‘कौन-कौन?’

‘दफा 604 हूं। पहचाने नहीं?’ ठकुराइन बिलबिलाईं।

‘अरे मैडम आप?’ ठकुराइन के हाथों में बंदूक देख कर घबराए वकील साहब की हलक सूख गई। सूखे गले से बोले, ‘बैठिए-बैठिए! बैठिए तो पहले।’

‘बैठने नहीं आई हूं। दफा 604 क्या होता है, कहां होता है जानने आई हूं।’ वह घुड़क कर बोलीं।

‘बैठिए तो।’ वकील साहब बोले, ‘शरीफ इज्जतदार महिला हैं आप। बैठिए तो।’

‘शरीफ और इज्जतदार ? मैं हूं ?’ वह बोलीं, ‘यह आप बोल रहे हैं?’

‘अरे बैठिए तो!’ वह बोले तब तक जूनियर वकील लड़की अपने कपड़े लत्ते ठीक-ठाक कर धीरे से सरक कर चैंबर से बाहर निकल गई। फिर चैंबर में मुंशी और जूनियर वकील भी आ पहुंचे। शोरगुल सुन कर घर के लोग भी आ गए। वकिलाइन भी। ठकुराइन का यह नया रूप देख कर वह भी ठक हो गईं। बड़ी मुश्किल से घर की औरतों और मुंशी ने मिल कर ठकुराइन को काबू किया। पर ठकुराइन लगातार दफा 604 की किताब मांगती रहीं, किस कोर्ट में उनका केस चल रहा है उस कोर्ट और जज का नाम पूछती रहीं। पर ठकुराइन के किसी भी सवाल का जवाब वकील साहब के पास नहीं था। वह कहने लगे, ‘मैडम इस समय आप अशांत हैं। जाइए घर पर आराम कीजिए। शांत हो कर आइएगा तब बात करेंगे।’

‘अच्छा छोड़िए।’ ठकुराइन वकिलाइन को खींचती हुई बोलीं, ‘आप ही इनसे पूछिए और जरा शांति से पूछिए कि बकरी मारने का जुर्म क्या होता है दफा 604? और नहीं तो फिर क्या होता है।’

‘हम कानून नहीं जानतीं।’ वकिलाइन डरी सहमी बोलीं।

‘अच्छा झूठे ही बहला फुसला कर किसी शरीफ औरत को रंडी बना दिया जाए, रखैल बना लिया जाए, इस अपराध का क्या कानून होता है। यह तो जानती होंगी?’ ठकुराइन सिसकते हुए दहाड़ीं। पर वकिलाइन सब कुछ समझते हुए भी चुप रहीं।

‘मैं हूं इस वर्मा वकील की रखैल!’ ठकुराइन बोलीं, ‘दफा 604 की मुजरिम जो इस वर्मा ने बनाया और मुझे इस दफा से बचाते-बचाते मुझ बेवा औरत को रंडी बना दिया, रखैल बना लिया। मेरे ही खर्चे पर। और अपनी फीस भी लेता रहा दफा 604 से बचाने के लिए।’ वह बिफरीं, ‘बताइए इतने सालों तक यह दोखी मुझे लूटता रहा। मैं क्या करूं? हे भगवान।’ कह कर वह फफक कर रो पड़ीं। फिर बंदूक उठाई। ट्रिगर दबाया वर्मा वकील को निशाना बना कर। सब लोग मारे डर के एक तरफ हो गए। पर गोली नहीं चली। इस अफरा तफरी में किसी ने धीरे से गोलियां बंदूक से निकाल दी थीं। ठकुराइन हैरान थीं। गोली निकल गई है वह फौरन  समझ गईं। उन्होंने आव देखा न ताव बंदूक पलटी और उसकी बट से ही वर्मा वकील पर धड़ाधड़ प्रहार किए। उस बकरी से भी ज्यादा प्रेशर का प्रहार! वर्मा जी का सिर फूट गया और मुंह भी। दौड़ कर लोगों ने ठकुराइन को पकड़ा। वकील साहब को बचा कर चैंबर से बाहर ले गए। ठकुराइन को समझाया बुझाया। उन्हें उनके घर भेजा। और वकील साहब को अस्पताल।

डाक्टरों ने बताया कि वकील साहब को हेड इंजरी हो गई है और वह कोमा में चल गए हैं। अब वकिलाइन दहाड़ मार कर रो पड़ीं। डाक्टरों ने उन्हें सांत्वना दी। दो दिन बाद वकील साहब होश में आ गए।

पर उधर पता चला कि ठकुराइन पागल हो गई हैं वह काला कोट पहने गले में फीता बांधे देख किसी को भी देखतीं, पत्थर, डंडा जो भी मिलता चला देतीं। दस पंद्रह वकील इस तरह घायल हो चुके थे। यह भी पता चला कि यह पता चलते ही ठकुराइन के जेठ, देवर फौरन शहर आ गए। उन्हें मानसिक चिकित्सालय में भरती करा दिया। और उनके इलाज पर तो उतना ध्यान नहीं दिया जितना इस बात पर कि वह लोग उनकी जायदाद के वारिस हैं। और ठकुराइन के जेठ, देवर के इस कानूनी दांव पेंच में भी ठकुराइन के खि़लाफ खड़े हुए यही वर्मा वकील।

बाद के दिनों में पागलपन के बिना पर ठकुराइन की जमीन जायदाद उनके जेठ, देवर ने अपने नाम करवा ली। और ठकुराइन फिर पागलखाने से बाहर आ गईं। कभी कुर्ता-पायजामा तो कभी पैंट कमीज पहने वह शहर की सड़कों पर नजर आतीं जिस तिस वकील को पत्थर ईटें मारती हुई। लोग उन्हें देखते ही कहते, ‘भागो भइया दफा 604 आ गई।’ और वह भी ईटें, पत्थर किसी पर भी चलाती हुई चिल्लातीं, ‘लो दफा  604 हो गया!’

और अब इन्हीं वर्मा वकील का बेटा अनूप लोक कवि को वीडियो अलबम बनाने का झांसा दे कर उन्हें फंसा रहा था। और फिलहाल मोबाइल फोन ख़रीदने की जुगत उन्हें बता रहा था। चेयरमैन साहब ने लोक कवि को आगाह भी किया कि, ‘जैसे बाप ने दफा 302 को डबल कर 604 में तब्दील कर उस ठकुराइन को पागल बना दिया वैसे ही उस चार सौ बीस वकील का यह बेटा भी उसका डबल यानी आठ सौ चालीस है तुम्हें खा जाएगा!’ लेकिन चेयरमैन साहब की हर अच्छी बुरी बात मान लेने वाले लोक कवि ने उन की इस बात पर जाने क्यों कान नहीं दिया।

अनूप ने अंततः लोक कवि को ऊषा का एक सेलुलर फोन ख़रीदवा दिया। सिम कार्ड डलवा कर लोक कवि सेलुलर फोन ऐसे इस्तेमाल करते गोया हाथ में फोन नहीं रिवाल्वर हो। बात भी वह बहुत संक्षिप्त करते और बात कई बार पूरी भी नहीं हो पाती तो भी वह खट से काट देते। लेकिन एक बार बंबई में कोई प्रोग्राम करने के बाद लोक कवि वापस आ रहे थे तो उन का यह सेलुलर फोन गायब हो गया। लोग पूछते भी कि, ‘कैसे गायब हो गया?’ तो लोक कवि बताते, ‘पी के टुन्न हो गया था, ट्रेन में कौनो मार लिया।’

‘कौन मार लिया?’ सवाल का जवाब अमूमन लोक कवि टाल जाते। लेकिन ग्रुप के अधिकतर कलाकारों का मानना था कि मोबाइल अनूप ने ही चुराया। दिक्कत यह थी कि लोक कवि का इस बार सिर्फ मोबाइल ही नहीं दस हजार रुपया भी साथ ही गायब हुआ। लेकिन रुपए के लिए लोग अनूप का नहीं मीनू का नाम बताते।

जो भी हो लोक कवि ने न तो अनूप से कुछ कहा न ही मीनू से। अनूप से तो उन्हें उतनी तकलीफ नहीं हुई जितनी कि मीनू से हुई। मीनू जिसके लिए उन्होंने क्या कुछ नहीं किया था? दो कमरे का छोटा ही सही एल.डी.ए. का एक मकान ख़रीद कर न सिर्फ दिया था बल्कि उसकी पूरी गिरस्ती बसाई थी। प्रोग्रामों के फेर में हांलैंड, इंगलैंड, बैंकाक, अमरीका, मारीशस, सूरीनाम जैसे कई देश घुमाया। मर्द ने छोड़ दिया तो उसको पूरा आसरा दिया। और तो और एक बार न जाने किसका गर्भ पेट में उसके आ गया तो उसने जाने कहां गुप चुप एबॉर्शन करवाया जो ठीक से हुआ नहीं और भ्रूण पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ, कोई कण बच्चेदानी में ही रह गया। उसकी जान सांसत में फंस गई। लगा कि बच नहीं पाएगी। ऐसे में भी लोक कवि ने दिल्ली ले जा कर उसका इलाज एक एक्सपर्ट डाक्टर से करवाया तब कहीं जा कर वह बची थी। लोक कवि ने पानी की तरह पैसा बहा कर उसकी जान बचाई थी, लगभग उसे नया जीवन दिया था। इस तरह जिसे जीवन दिया, आसरा दिया, अपने ग्रुप में स्टार कलाकार की हैसियत दी, कई विदेश यात्राएं कराईं। वह मीनू धोखे से उनका रुपया चुरा ले? वह मीनू जिसे वह अपना मन भी देते थे। वह मीनू? तकलीफ उन्हें बहुत हुई पर मन ही मन पी गए वह सारी तकलीफ। किसी से कुछ कहा नहीं। कहते भी तो क्या कहते? चुप ही रहे। लेकिन मन ही मन टीसते रहे।

उन्होंने अब नया मोबाइल फोन ख़रीद लिया था। चोरी न जाए इस लिए चौकन्ना बहुत हो गए थे। लेकिन जल्दी ही यह नया मोबाइल भी उनके कैंप रेजीडेंस से ही एक रात गायब हो गया। फिर उन्होंने तीसरा मोबाइल फोन ख़रीदा। लेकिन सेकेंड हैंड। अनूप ने ही ख़रीदवाया। लोक कवि जानते थे कि यह भी चोरी हो जाएगा। फिर भी ख़रीदा। हालांकि मोबाइल फोन की बहुत उपयोगिता उनके पास थी नहीं। क्योंकि ज्यादातर वह कार्यक्रमों में व्यस्त रहते जहां वह मोबाइल सुन नहीं पाते। डिस्टर्ब होते वह फोन से। ध्यान टूट जाता। दूसरे, संगीत के शोर में ठीक से सुनाई नहीं देता। और जब कार्यक्रम नहीं होता तब वह अमूमन अपने कैंप रेजीडेंस पर ही होते और यहां उनके पास टेलीफोन था ही। तो भी स्टेटस सिंबल मान कर वह मोबाइल फोन रखते। सोचते कि अगर लोग उनके हाथ में मोबाइल फोन नहीं देखेंगे तो मान लेंगे कि आमदनी कम हो गई है, मार्केट ठंडा पड़ गई है इसलिए मोबाइल फोन बिका गया। हैसियत नहीं रही। अमूमन जमीनी हकीकत पर रहने वाले और जिंदगी की हकीकत को अपने गानों में ढालने वाले लोक कवि दिखावे की नाक मेनटेन करने लगे थे। यह उन को खुद भी बुरा लगता था, लेकिन फिलहाल तो वह फंस गए थे। हालांकि उन्होंने यह भी ऐलान कर दिया था कि, ‘अबकी जो मोबाइल चोरी हुआ तो फेर नहीं ख़रीदूंगा!’ फिर वह जैसे खुद को तसल्ली देते, ‘फिर ई सेकेंड हैंड मोबाइल कोई चोरी करेगा क्या?’ लेकिन यह भ्रम भी उनका टूटा और जल्दी ही टूटा। यह सेकेंड हैंड मोबाइल भी चोरी हो गया।

लेकिन अपने ऐलान के मुताबिक उन्होंने फिर चौथा मोबाइल नहीं ख़रीदा।

फिर भी वह परेशान थे चोरियों से। अब उनके यहां तरह-तरह की चोरियां होने लगी थीं। इस कैंप रेजीडेंस में उनका जांघिया अंगोछा तक सुरक्षित नहीं रह गया था। कई-कई जोड़े वह रखते जांघिया, अंगोछे के फिर भी कई बार उन के लिए जांघिया अंगोछे का अकाल पड़ जाता। एक बार एक लड़की को उन्होंने पकड़ा भी रंगे हाथ तो वह बोली, ‘मासिक आ गया है गुरु जी, बांधना है!’ तो वह डपटे भी, ‘तो हमारा ही जांघिया, अंगोछा बांधोगी?’ वह बोली, ‘आखि़र का बांधें गुरु जी, कुर्ता पायजामा तो आपका बांध नहीं सकती!’ लोक कवि यह सुन कर निरुत्तर हो गए। उसे पैसे देते हुए बोले, ‘केयर फ्री टाइप कुछ मंगवा लो। वही बांधो!’

तो भी वह आए दिन की चोरियों से परेशान हो गए थे। पैसा, कुरता, पायजामा कुछ भी नहीं बचता। बिस्तर की चद्दर तक गायब होने लगी थी। वह कहते भी कि, ‘असल में ई लड़कियां गरीब परिवार से आती हैं तो अपने बाप भाई के लिए अंगोछा, जांघिया उठा ले जाती हैं, बिस्तर की चद्दर भी ले जाती हैं। पइसा कौड़ी भी ले जाती हैं तो चलिए बरदाश्त कर लेता हूं। पर इसका का करूं कि सम्मान में मिली शाल भी मंचवे पर से गायब हो जाती है!’ वह बिफरते, ‘बताइए सम्मान की शाल भोंसड़ी की सब चुरा लेती हैं! यही बात खटकती है।’ वह जैसे जोड़ते, ‘गरीबी का मतलब ई थोड़े है कि जिससे रोजी रोटी मिले उसी के घर चोरी करो!’ वह बोलते, ‘ई तो पाप है पाप। अरे, हम भी गरीबी देखा हूं, भयंकर गरीबी। चूहा मार के खाते थे, बकिर चोरी नहीं किया कभी।’ वह कहते, ‘आज भी जब कभी हवाई जहाज पर चढ़ता हूं उड़ते हुए नीचे देखता हूं तो रोता हूं। काहें से कि अपनी गरीबी याद आ जाती है। पर हम कबो चोरी नहीं किए!’

लेकिन लोक कवि चाहे जो कहें उनके यहां चोरी चौतरफा चालू थी। और अब तो उनके कुछ शिष्य कलाकार जो अलग ग्रुप बना लिए थे, लोक कवि का ही गाना गाते थे और गाने के आखि़र में तखल्लुस के तौर पर जहां लोक कवि का नाम आता था वहां से लोक कवि का नाम हटा कर अपना नाम जोड़ कर गा देते थे। पहले भी कुछ शिष्य ऐसा करते थे पर कभी कभार और चोरी छुपे। पर अब तो अकसर और खुल्लमखुल्ला। लोक कवि से इस बात की कोई शिकायत करता तो वह दुखी तो होते पर कहते, ‘जाने दीजिए सब कइसो कमा खा रहे हैं, जीने खाने दीजिए!’ पर जब कोई फिर भी प्रतिवाद करता तो वह कहते, ‘हमारे गाने में कोई अपना नाम खोंस लेता है तो गाना तो उसका नहीं न हो जाता है ? एह गाना का कैसेट है बाजशर में हमारे नाम से। लोग जानते सुनते हैं गानों को हमारे नाम से।’

‘तो भी!’ कहने वाला फिर भी प्रतिवाद करता।

‘तो भी?’ कह कर वह बिगड़ जाते, ‘चलिए इस कलाकार को तो हम बुला कर डांट दूंगा। बकिर किस-किस को डांटता फिरूंगा?’

‘का मतलब?’

‘मतलब ई कि बंबई से ले कर पटना तक हमारे गानों की चोरी हो रही है। हमारे ही गानों की धुन, हमारे ही गाने को भोजपुरी से बदल कर हिंदी में केहू से लिखवा-गवा कर फिल्मों में गोविंदा हीरो बने नाच रहे हैं तो हम का करूं? कई लोग भोजपुरियै में एने वोने बदल कर गा रहे हैं तो हम का करूं? केसे-केसे झगड़ा-लड़ाई करूं?’ उनकी तकलीफ जैसे उन की जबान पर आ जाती, ‘अब जब गाना सुनने वालों को ही फिकिर नहीं है तो अकेले हम का करूंगा?’ फिर वह अपने गानों की एक लंबी फेहरिस्त गिना जाते  कि कौन-कौन से गाने फिल्मों में चुरा लिए गए। तब जब कि इन गानों के कैसेट पहले ही से बाजार में थे। फिर वह बड़ी तकलीफ से बताते, ‘बकिर क्या कीजिएगा भोजपुरी गरीब गंवार की भाषा है। कोई इस के साथ कुछ भी कर ले भोजपुरिहा लोग चुप लगा जाते हैं। जइसे गरीब की लुगाई है भोजपुरी सो सबकी भौजाई है।’ वह रुकते नहीं बोलते जाते, ‘लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री हुए। पाकिस्तान को हरा दिए, देश को जिता दिए लेकिन भोजपुरी को जिताने की फिकिर नहीं की। चंद्रशेखर जी अपने बलिया वाले, अमरीका के जहाज को तेल दे दिए इराक की लड़ाई में बकिर भोजपुरी को सांस नहीं दे पाए। कुछ हजार लोगों की बोली डोगरी को, नेपाली को संविधान में बुला लिए लेकिन भोजपुरी को भुला गए। तो केहू कुछ बोला का?’

उनका इशारा संविधान की आठवीं अनुसूची में भोजपुरी को शामिल नहीं करने की ओर होता। वह कहते, ‘राष्ट्रपति थे बाबू राजेंदर प्रसाद। पटना के थे, भोजपुरी में ही खाते-पीते, बतियाते थे, उहो कुछ नहीं किए। एक से एक बड़े-बड़े नेता भोजपुरिहा हैं बकिर भोजपुरी ख़ातिर सब मरे हुए हैं। तब जब कि करोड़ों लोग भोजपुरी बोलते हैं, गाते हैं, सुनते हैं। हालैंड, मारीशस, सूरीनाम में भोजपुरी जिंदा है, ऊ लोग जिंदा रखे हैं जो लोग इहां से बंधुआ मजूर बन के गए थे बकिर इहां लोग भुला गए हैं।’ वह कहते, ‘आज कल एतना टी.वी. चैनल खुले हैं, पंजाबी, कन्नड़, बंगाली, मद्रासी, यहां तक कि उर्दू में भी पर एक्कौ चैनल भोजपुरी में काहे नहीं खुला?’ वह जैसे पूछते, ‘भोजपुरी में प्रतिभा नहीं है ? कि गाना नहीं है? कि नेता नहीं हैं? कि पइसा वाला लोग नहीं हैं? फिर भी नहीं खुला है भोजपुरी में चैनल। दूरदर्शन, आकाशवाणी वाले भी जेतना समय और भाषाओं को देते हैं भोजपुरी को कहां देते हैं?’ कहते-कहते लोककवि बिलबिला जाते। अफना जाते। कहने लगते, ‘बताइए अब पंजाबी गानों में दलेर मेंहदी आरा हिले, बलिया हिले, छपरा हिलेला दू लाइन गा देते हैं तो लोगों को नीक लगता है। मोसल्लम भोजपुरी में फिर काहे नाहीं सुनते हैं लोग? जानते हैं क्यों? वह जैसे पूछते और खुद ही जवाब भी देते, ‘एह नाते कि भोजपुरिहा लोगों में अपनी भाषा के प्रति भावना नहीं है। एही लिए भोजपुरी भाषा मर रही है।’

फिर वह बात ले दे कर भोजपुरी एलबम और सी.डी. पर ला कर पटक देते। कहते कि, ‘पंजाबी गानों के एतने अलबम टी.वी. पर दिखाए जाते हैं लेकिन भोजपुरी के नहीं। क्योंकि भोजपुरी में अलबम बने ही नहीं। एकाध छिटपुट बने भी होंगे तो हमको पता नहीं।’ कह कर वह पूरी तरह निराश हो जाते। और उनकी इसी निराशा को विश्राम देता अनूप कि, ‘घबराइए नहीं गुरु जी’ हम आप का वीडियो शूटिंग कर एलबम बनाएंगे।’’ और लोक कवि यह जानते हुए कि यह साला ठगी बतिया रहा है, उसकी ठगी में समा कर चहकने लगते। वह जैसे उसके वशीभूत हो जाते।

कई बार कुछ गंवा कर भी पाने की तरकीब आजमा कर सफल हो जाने वाले लोक कवि को बार-बार लगता कि अनूप उन्हें सिवाय लूटने के कुछ नहीं कर रहा। पर वह होता है न कि कुछ सपने किसी भी कीमत पर आदमी जोड़ता है भले ही उस सपने के सांचों में फिट न बैठे और निरंतर टूटता ही जाए फिर भी सपना न तोड़ना चाहे ! लोक कवि यही कर रहे थे और टूटते जा रहे थे। हंसते-हंसते। बाखुशी।

यह टूटना भी अजीब था उन का।

....जारी....

उपन्यासकार दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424 और This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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